पारस जिन चरन निरख, हरख यों लहायो | Paras Jin Charan Nirakh Harakh Yon Lahayo

पारस जिन चरन निरख, हरख यों लहायो

पारस जिन चरन निरख, हरख यों लहायो,
चितवन चन्दा चकोर, ज्यों प्रमोद पायो ।।पारस।।

ज्यों सुन घनघोर शोर, मोरहर्षको न ओर,
रंक निधिसमाज राज, पाय मुदित थायो ।।१।। पारस. ।।

ज्यों जन चिरछुधित होय, भोजन लखि सुखित होय,
भेषज गदहरन पाय, सरुज सुहरखायो ।।२।। पारस. ।।

वासर भयो धन्य आज, दुरित दूर परे भाज,
शांतदशा देख महा, मोहतम पलायो ।।३।। पारस. ।।

जाके गुन जानन जिम, भानन भवकानन इम,
जान ‘दौल’ शरन आय, शिवसुख ललचायो ।।४।। पारस. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ९५

अर्थ

भगवान पार्श्वनाथ के चरणों के दर्शन पाकर ऐसा हर्ष होता है जैसे चन्द्रमा को देखकर चकोर पक्षी अत्यन्त प्रमुदित होता है।

जैसे बादलों की घटा को देखकर और उसकी गड़गड़ाहट को सुनकर मोर पक्षी की प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता, जैसे धन, समाज व राज को पाकर निर्धन-रंक को प्रसन्नता होती है।

जैसे अत्यन्त भूख से विकल मनुष्य, भोजन को देखकर सुख का अनुभव करता है और जैसे- सरुज (रोगी) रोग को दूर करनेवाली औषधि को पाकर प्रफुल्लित होता है।

आज का दिन धन्य है, सभी पाप दूर भागने लगे हैं, प्रभु की शांत छवि को देखकर मोहरूपी महान अंधकार विघटने लगा है।

इस भव-वन में आपके गुणों को जानकर उनकी निज में प्रतीति अनुभूति होने लगती है, मोक्ष-सुख के लिए लालायित होकर व यह सब जानकर दौलतराम आपकी शरण में आया है।

शब्दार्थ: ओर = अन्त; सरुज = रोगी; भेषज = दवा।

स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पद 64।

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