पारस जिन चरन निरख, हरख यों लहायो,
चितवन चन्दा चकोर, ज्यों प्रमोद पायो ।।पारस।।
ज्यों सुन घनघोर शोर, मोरहर्षको न ओर,
रंक निधिसमाज राज, पाय मुदित थायो ।।१।। पारस. ।।
ज्यों जन चिरछुधित होय, भोजन लखि सुखित होय,
भेषज गदहरन पाय, सरुज सुहरखायो ।।२।। पारस. ।।
वासर भयो धन्य आज, दुरित दूर परे भाज,
शांतदशा देख महा, मोहतम पलायो ।।३।। पारस. ।।
जाके गुन जानन जिम, भानन भवकानन इम,
जान ‘दौल’ शरन आय, शिवसुख ललचायो ।।४।। पारस. ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ९५
