तर्ज : तिहारे ध्यान की मूरत…
परम सौभाग्य है जिनवर, दर्श आनंदमय पाया।
सहज अनुभूति निज प्रगटी, निजानंद सिंधु उछलाया ।। टेक ।।
अनन्तानन्त शक्तियाँ उछलती, देखी अन्तर में।
हुआ सन्तुष्ट निज में ही, प्रभो ! सर्वांग विलसाया।। 1।।
अहो ! अव्यक्त निज स्वरूप, हुआ व्यक्त हे स्वामी।
आप सम आपकी प्रभुता, लखी मम चित्त हुलसाया।। 2 ।।
विदेही रूप निज देखा, अहो ! निष्कर्म नीरागी।
हुआ अन्तर्मुखी निर्मद कि जाननहार जनाया।। 3।।
अहो ! निष्काम निरंजन, सहज चिद्ब्रह्म प्रभु निहारा।
हुआ निष्पाप अति पावन, परम ब्रह्मचर्य पाया है।। 4।।
अहो ! सर्वस्व पाने योग्य, पाया है स्वयं में ही।
छूटने योग्य सब छूटा, नमन अद्वैत है भाया।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४४ से ४५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’