तर्ज : सुनकर वाणी जिनवर की…
परम प्रभु निज माँहि निहारा, आनंद उर न समाय रे।
रागादि भावों से न्यारा, आनंद उर न समाय रे।।टेक ।।
सिद्ध समान परम अविकारा, आनंद उर न समाय रे।
गुण अनंत अक्षय भंडारा, आनंद उर न समाय रे।।1।।
स्वयं सिद्ध ध्रुव जाननहारा, आनंद उर न समाय रे।
प्रभुता का नहीं दीखे पारा, आनंद उर न समाय रे।।2।।
तृप्त रहूँ संतुष्ट रहूँ नित, आनंद उर न समाय रे।
सहजहिं होवे मुक्त अवस्था, आनंद उर न समाय रे ।।3।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’