परम प्रभु अन्तर में निरखे, आनंद भयो अपार रे | Param Prabhu Antar Mem Nirakhe Anamd Bhayo Apar Re

तर्ज : प्रभु तुम…

परम प्रभु अन्तर में निरखे, आनंद भयो अपार रे।। टेक ।।

नाशा जन्म-मरण भय दीखा अविनाशी पद सार रे।
दीन भावना दूर भयी सब, प्रभुता अपरम्पार रे ।।1।।

पर द्रव्यों की चाह न उपजे, बरसे समरस धार रे।
तृप्त रहूँ नित तुष्ट रहूँ नित, भाव रहे अविकार रे।।2।।

भक्ति भाव सहज उमगावे, लख अद्भुत उपकार रे।
अहो ! जिनेश्वर अगणित वंदन, लहूँ मुक्ति सुखकार रे ।।3।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’