परम जननी धरम कथनी | Param Janani Dharam Kathani

परम जननी धरम कथनी

परम जननी धरम कथनी, भवार्णव पार कौ तरनी ।
अनक्षरि घोष आपत की, अक्षरजुत गनधरौं वरनी ॥टेक॥

निरवेयौ नयनु जोगन ते, भविन कौं तत्व अनुसरनी ।
विथरनी शुद्ध दरसन की, मिथ्यातम मोह की हरनी ॥१॥

मुकति मन्दिर के चढ़ने को, सुगम-सी सरल निसरनी ।
अंधेरे कूप में परतां, जगत उद्धार की करनी ॥२॥

तृषा के ताप मेटन कौ, करत अमृत वचन झरनी ।
कथंचित वाद आदरनी, अवर एकान्त परिहरनी ॥३॥

तेरा अनुभौ करत मोकौं, बनत आनन्द उर भरनी ।
फिर पौ संसार दुखिया हूँ, गही अब आनि तुम सरनी ॥४॥

अरज ‘बुधजन’ की सुन जननी, हरौ मेरी जनम मरनी ।
नमूं कर जोरि मन वचतैं, लगा के सीस कौं धरनी ॥५॥


Artist: पं. बुधजन जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं बुधजन कृत भजन)

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