पाने योग्य स्वयं में पाया, व्यर्थ न भव में भरमाऊँ | pane yogya svayam mem paya vyartha na bhava mem bharamau

पाने योग्य स्वयं में पाया, व्यर्थ न भव में भरमाऊँ

पाने योग्य स्वयं में पाया, व्यर्थ न भव में भरमाऊँ ।
सहज स्वयं में तृप्त हुआ प्रभु, पर भावों को नहीं चाहूँ ।।टेक।।

करने का अवकाश न किंचित्, अखिल विश्व में दिखता है ।
सब द्रव्यों का सभी परिणमन, स्वयं सहज ही होता है ।।
सर्व विकल्प अंकिचित्कर है, अरे! व्यर्थ क्यों अकुलाऊँ ।।1।।

हुआ सहज निर्भार शान्त, ज्ञाता स्वरूप निज जाना है ।
दृष्टि में प्रत्यक्ष वर्तता, अक्षय सुख खजाना है ।।
निर्वांछक हो गया सहज चित, पूर्ण चिदानंद प्रभु भाऊँ ।।2।।

जगे परम पुरुषार्थ अनुपम, शुद्ध दशा भी आयेगी ।
दृष्टि ध्रुव पर आन टिकी, निश्चय स्थिरता आयेगी ।।
हुआ परम संतोष भावना आतम में ही रम जाऊँ ।।3।।


स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ११८