पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्तृत्व
डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल
प्रकाशक: पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर। प्रथम संस्करण रक्षाबन्धन, 13 अगस्त 1973। यह ग्रन्थ इन्दौर विश्वविद्यालय द्वारा पी.एच.डी. के लिए स्वीकृत शोध प्रबन्ध है।
नीचे ग्रन्थ का संक्षिप्त सार है। पूरा ग्रन्थ पीडीएफ में है।
Pandit_Todarmal_Vyaktitva_Aur_Kartritva_Bharill.pdf (16445 KB)
ग्रन्थ की रूपरेखा
ग्रन्थ सात अध्यायों में है:
- पूर्ववर्ती धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक परिस्थितियाँ
- जीवनवृत्त और व्यक्तित्व
- रचनाएँ और उनका परिचय
- वर्ण्य विषय और दार्शनिक विचार
- गद्य शैली
- भाषा
- उपसंहार: हिन्दी भाषा और साहित्य को पंडितजी का योगदान
अन्त में तीन परिशिष्ट हैं: ब्र. रायमलजी द्वारा लिखित जीवन पत्रिका और इन्द्रध्वज विधान महोत्सव पत्रिका, सन्दर्भ ग्रन्थ सूची, और नामानुक्रमणिका।
व्यक्तित्व
समय: परम्परागत मान्यता में पंडितजी की आयु केवल 27 वर्ष मानी जाती है। लेखक का निश्चित मत है कि वे 47 वर्ष जीवित रहे और उनका जन्म वि. सं. 1776 या 1777 में हुआ। मृत्यु वि. सं. 1821 के माघ और वि. सं. 1824 के चैत्र के बीच किसी समय हुई।
निवास: वे जयपुर के निवासी थे और उनका अधिकांश जीवन ढूँढाड प्रदेश में बीता। आजीविका के लिए उन्हें चार पाँच वर्ष शेखावाटी के सिंघाणा नगर में रहना पड़ा, जहाँ वे दिल्ली के एक साहूकार के यहाँ कार्य करते थे। उनकी आर्थिक स्थिति साधारण थी।
परिवार: पिता जोगीदास, माता रम्भादेवी। जाति खण्डेलवाल, गोत्र गोदीका। बड़े पुत्र हरिचन्द और छोटे पुत्र गुमानीराम।
शिक्षा: उनकी शिक्षा जयपुर की तेरापंथ सैली (आध्यात्मिक अध्ययन मण्डली) में हुई। उन्होंने स्वयं किसी गुरु का नाम नहीं लिखा; लेखक के अनुसार सम्भावना यही है कि उनके शिक्षागुरु बाबा बंशीधरजी रहे होंगे। बाद में वे स्वयं इस सैली के संचालक बने। प्राकृत, संस्कृत और हिन्दी के साथ उन्होंने कन्नड भाषा और लिपि का भी स्वयं अभ्यास किया और कन्नड लिपि के ताडपत्र ग्रन्थों पर व्याख्यान करते थे।
सम्पर्क: ब्र. रायमलजी शाहपुरा से सिंघाणा जाकर तीन वर्ष तक उनके पास तत्त्वाभ्यास करते रहे। जयपुर लौटने के पश्चात् जयपुर नरेश माधोसिंह के दीवान रतनचन्द और बालचन्द छाबड़ा उनकी दैनिक सभा के श्रोता बने। वि. सं. 1821 में जयपुर का इन्द्रध्वज विधान महोत्सव उनके सान्निध्य में हुआ। मुलतान के साधर्मियों की शंकाओं के समाधान में लिखा उनका पत्र स्वयं एक ग्रन्थ बन गया। पं. जयचन्दजी छाबड़ा और पं. सेवाराम जैसे विद्वान् भी उनसे प्रेरित हुए।
स्वभाव: वे विनम्र पर स्वाभिमानी और सरल स्वभावी थे। गृहस्थ होते हुए भी उनकी वृत्ति साधुता की थी। तत्त्वज्ञान के प्रश्नों में उनके कथन प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किए जाते थे। उन्हें “आचार्यकल्प” कहा जाता है।
अन्त: राजा माधोसिंह के राज्यकाल में जयपुर में हुए साम्प्रदायिक उपद्रव में उनका दुःखद अन्त हुआ। पं. बखतराम शाह के “बुद्धि विलास” (वि. सं. 1827) के अनुसार कुछ मतान्ध लोगों द्वारा लगाए गए आरोप के सन्दर्भ में राजा ने श्रावकों को कैद किया और दुष्टों के भड़काने पर पंडित टोडरमलजी को मृत्युदण्ड दिया। यह भी कहा जाता है कि उन्हें हाथी के पैर के नीचे कुचलवाया गया था।
कर्तृत्व (रचनाएँ)
उन्होंने छोटी बड़ी बारह रचनाएँ लिखीं, जिनका परिमाण लगभग एक लाख श्लोक प्रमाण (करीब पाँच हजार पृष्ठ) है।
- रहस्यपूर्ण चिट्ठी (वि. सं. 1811): मुलतान वालों की शंकाओं के समाधान में लिखा प्रसिद्ध आध्यात्मिक पत्र।
- सम्यग्ज्ञानचन्द्रिका: गोम्मटसार जीवकाण्ड, गोम्मटसार कर्मकाण्ड, लब्धिसार और क्षपणासार की भाषाटीका। विषय समझाने के लिए हजारों संदृष्टियाँ (चार्ट) बनाईं, जो अलग से “अर्थसंदृष्टि अधिकार” में हैं।
- गोम्मटसार पूजा: संस्कृत और हिन्दी छन्दों में।
- त्रिलोकसार भाषाटीका
- समोसरण वर्णन
- मोक्षमार्ग प्रकाशक: उनका मौलिक और अत्यन्त लोकप्रिय ग्रन्थ। नौवाँ अधिकार अपूर्ण रह गया।
- आत्मानुशासन भाषाटीका
- पुरुषार्थसिद्ध्युपाय भाषाटीका: अपूर्ण रह गई थी, जिसे बाद में दीवान रतनचन्द की प्रेरणा से पं. दौलतराम कासलीवाल ने वि. सं. 1827 में पूर्ण किया।
सम्यग्ज्ञानचन्द्रिका और त्रिलोकसार भाषाटीका के प्रारम्भ में विषय में सरलता से प्रवेश के लिए विशाल भूमिकाएँ लिखी गई हैं।
विचार और योगदान
- उनके अनुसार मोक्षमार्ग आत्मविज्ञान ही है, जिसे वे वीतराग विज्ञान कहते हैं। जो कुछ इसमें रुकावट डालता है, वह सब मिथ्या है। मिथ्याभाव के उन्होंने गृहीत और अगृहीत दो भेद किए।
- क्रियाकाण्ड, भट्टारकवाद और शिथिलाचार जैसे बाहरी आडम्बर का उन्होंने शास्त्र प्रमाण, तर्क और अनुभव से खण्डन किया।
- निश्चयाभासी, व्यवहाराभासी और उभयाभासी का विश्लेषण, नय कथनों का मर्म, चार अनुयोग और उनका अध्ययन क्रम, वक्ता और श्रोता के लक्षण उनके प्रमुख विषय हैं।
- उनकी गद्य शैली दृष्टान्तयुक्त, प्रश्नोत्तरमयी और सुगम है; इसका सर्वोत्तम निर्वाह मोक्षमार्ग प्रकाशक में है। लेखक उन्हें हिन्दी गद्य के निर्माताओं में महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं।
स्रोत: डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल, “पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्तृत्व”, पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर (1973)। पीडीएफ इंटरनेट आर्काइव पर उपलब्ध डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ इंडिया की स्कैन प्रति है। सार इसी ग्रन्थ के आधार पर है; विस्तृत अध्ययन के लिए मूल ग्रन्थ देखें।