रहस्यपूर्ण चिट्ठी
आचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी
मिती फागुन बदी ५, संवत् १८११ को मुलतान के साधर्मी भाइयों को लिखा गया पत्र। पाठ का आधार: मोक्षमार्ग प्रकाशक, सस्ती ग्रन्थमाला कमेटी, धर्मपुरा, देहली (तृतीय आवृत्ति, वीर नि. सं. २४८६), जिसके अन्त में यह चिट्ठी मूल भाषा में छपी है।
नीचे पहले पत्र का संक्षिप्त सार है, फिर पूरा मूल पाठ। मूल छपे पृष्ठों की स्कैन पीडीएफ में है।
Rahasyapurna_Chitthi_Todarmal.pdf (3485 KB)
पत्र का प्रसंग
मुलतान के अध्यात्म रसिक भाई खानचन्दजी, गंगाधरजी, श्रीपालजी, सिद्धारथदासजी आदि ने स्वानुभव के विषय में कुछ प्रश्न लिखकर भाई रामसिंघजी भुवानीदासजी को भेजे थे। उसके समाचार जहानाबाद के साधर्मियों ने पंडितजी को लिखे। उन्हीं प्रश्नों का उत्तर यह पत्र है।
पंडितजी प्रारम्भ में ही प्रसन्नता प्रकट करते हैं कि इस काल में अध्यात्म के रसिक बहुत थोड़े हैं, और धन्य हैं वे जो स्वात्मानुभव की बात भी करते हैं। इसके समर्थन में पद्मनन्दि पंचविंशतिका का श्लोक देते हैं कि जिसने प्रीतिपूर्वक आत्मा की बात भी सुनी है, वह निश्चय से भव्य है और भावी निर्वाण का पात्र है।
मुख्य विषय
१. स्वानुभव का स्वरूप। जीव अनादि से मिथ्यादृष्टि है। दर्शनमोह के उपशम, क्षयोपशम या क्षय से आपापर का यथार्थ श्रद्धान होता है, तब जीव सम्यक्त्वी होता है। उसका जो ज्ञान है वह सम्यग्ज्ञान है, और वह केवलज्ञान का अंश है। जैसे थोड़ा सा मेघपटल विलय होने पर प्रगट हुआ प्रकाश सम्पूर्ण प्रकाश का अंश है।
२. सविकल्प और निर्विकल्प दशा। सम्यक्त्वी के परिणाम दो प्रकार प्रवर्तते हैं। विषय कषाय या पूजा, दान, शास्त्राभ्यास रूप प्रवर्तन सविकल्प है। जब परिणाम स्वरूप में मग्न होकर केवल आत्मा को जानने में लगते हैं, वह निर्विकल्प स्वानुभव है।
३. शुभाशुभ में रहते हुए सम्यक्त्व। गुमास्ता का दृष्टान्त: गुमास्ता सेठ का काम करता है, उसे अपना भी कहता है, हर्ष विषाद भी पाता है, पर भीतर जानता है कि यह मेरा कार्य नहीं। सेठ का धन चुराकर अपना माने तो चोर कहलाए। वैसे ही सम्यक्त्वी कर्मोदय जनित शुभाशुभ कार्य करता हुआ भी भीतर श्रद्धान रखता है कि यह मेरा नहीं; जो शरीराश्रित व्रत संयम को भी अपना माने तो मिथ्यादृष्टि है।
४. अनुभव में मन और इन्द्रियाँ। अनुभव के समय पाँच इन्द्रियों का व्यापार रुक जाता है। मतिश्रुत ज्ञान मन के द्वारा ही अनुभव में प्रवर्तता है। मन अमूर्तिक को भी ग्रहण करता है, क्योंकि मतिश्रुत का विषय सर्व द्रव्य कहे हैं (तत्त्वार्थसूत्र १-२६)। इसी प्रसंग में समयसार नाटक का अनुभव सम्बन्धी दोहा भी उद्धृत है।
५. अनुभव प्रत्यक्ष या परोक्ष। तत्त्वार्थसूत्र और तर्कशास्त्र के लक्षण के अनुसार मतिश्रुत परोक्ष है, इसलिये अनुभव में भी आत्मा परोक्ष ही है; आत्मा के प्रदेश आकार भासित नहीं होते। फिर भी नयचक्र की गाथा में अनुभव को “पच्चक्खो” कहा है। इसका समाधान पंडितजी अंधे पुरुष के मिश्री चखने के दृष्टान्त से करते हैं: मिश्री का आकार उसे परोक्ष है, पर जीभ से लिया स्वाद प्रत्यक्ष है। वैसे ही अनुभव में आत्मा परोक्ष है, पर परिणाम से जो स्वाद आया वह प्रत्यक्ष है। अथवा जो प्रत्यक्ष की भाँति यथार्थ प्रतिभासित हो उसे भी प्रत्यक्ष कहते हैं।
६. निर्विकल्प में अधिक आनन्द क्यों। सविकल्प दशा में ज्ञान अनेक ज्ञेयों में बँटा रहता था; निर्विकल्प दशा में केवल आत्मा को जानने में लगता है, इसलिये वहाँ इन्द्रियातीत आनन्द अधिक होता है।
७. अनुभव कौन गुणस्थान में। चौथे गुणस्थान से ही होता है, पर चौथे में बहुत काल के अन्तराल से, और ऊपर के गुणस्थानों में शीघ्र शीघ्र। नीचे और ऊपर का भेद परिणामों की मग्नता में है।
८. श्रुतज्ञान और केवलज्ञान। अष्टसहस्री के प्रमाण से: स्याद्वाद रूप श्रुतज्ञान और केवलज्ञान दोनों तत्त्वों के प्रकाशक हैं; भेद इतना है कि केवलज्ञान प्रत्यक्ष है और श्रुतज्ञान परोक्ष। चौथे गुणस्थान वाले का और केवली का ज्ञान सम्यग्ज्ञान की अपेक्षा एक जाति है, प्रत्यक्षता की अपेक्षा नहीं। एक परोक्ष जानता है, दूसरा प्रत्यक्ष, इतना ही विशेष है।
९. निश्चय और व्यवहार सम्यक्त्व। मुलतान के भाइयों ने निश्चय व्यवहार सम्यक्त्व का जो स्वरूप लिखा उसे पंडितजी सत्य कहते हैं, और इतना जोड़ते हैं कि सम्यक्त्वी के व्यवहार सम्यक्त्व में निश्चय सम्यक्त्व गर्भित है।
१०. दृष्टान्तों की मर्यादा। द्वितीया का चन्द्रमा, जल बिन्दु, अग्निकण जैसे दृष्टान्त एक प्रयोजन दिखाने के लिये हैं, सर्वांग नहीं मिलते। द्वितीया के चन्द्रमा का दृष्टान्त प्रदेशों की अपेक्षा नहीं, ज्ञान की अंश रूप जाति दिखाने के लिये है।
पत्र का समापन
अन्त में पंडितजी लिखते हैं कि जो बात जानते हैं वह सब लिखने में नहीं आती। अध्यात्म के लिये समयसारादि ग्रन्थ और आगम की चर्चा के लिये गोम्मटसारादि ग्रन्थों का अभ्यास रखना और अपने स्वरूप में मग्न रहना। जब तक मिलना न हो, पत्र शीघ्र शीघ्र लिखते रहना।
उक्त संस्करण की प्रस्तावना इसे पंडितजी की सबसे पुरानी रचना बताती है। डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल (“पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्तृत्व”) लिखते हैं कि इसमें आगम प्रमाण, समुचित तर्क और लोकप्रचलित उदाहरणों से गम्भीर विषय सरल ढंग से समझाया गया है, और पंडितजी की आध्यात्मिक रुचि के दर्शन सर्वत्र होते हैं। उस ग्रन्थ का सार: पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व और कर्तृत्व (डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल) | Pandit Todarmal : Vyaktitva Aur Kartritva (Dr. Hukamchand Bharill)
मूल पाठ
ॐ
पंडित प्रवर टोडरमलजी की रहस्य पूर्ण चिट्ठी
॥ श्री ॥
सिद्ध श्री मुलतान नगर महा शुभ स्थान विषैं साधर्मी भाई अनेक उपमा योग्य अध्यातम रस रोचक भाई श्री खानचन्दजी, गंगाधरजी, श्रीपालजी, सिद्धारथदासजी, अन्य सर्व साधर्मी योग्य लिखतं टोडरमल के श्री प्रमुख विनय शब्द अवधारना । यहाँ यथा सम्भव आनन्द है, तुम्हारे चिदानन्द घन के अनुभव से सहजानन्दकी वृद्धि चाहिए ।
अपरंच तुम्हारो एक पत्र भाई जी श्रीरामसिंघजी भुवानीदासजी को आया था । तिसके समाचार जहानाबादतें और साधर्मियों ने लिखे थे । सो भाई जी ऐसे प्रश्न तुम सारिषे ही लिखें! अवार वर्तमान काल में अध्यातम के रसिक बहुत थोड़े हैं । धन्य हैं जे स्वात्मानुभव की वार्ता भी करै हैं, सो ही कहा है:
श्लोक: तत्प्रति प्रीत चित्तेन, येन वार्तापि हि श्रुता ।
निश्चितं सः भवेद्भव्यो, भाव निर्वाण भाजनम् ॥
पद्मनन्दि पंच विंशतिका । (एकत्व शीतिः २३)
अर्थ: जिहि जीव प्रसन्न चित्त करि इस चेतन स्वरूप आत्मा की बात ही सुनी है, सो निश्चय कर भव्य है । अल्पकालविषैं मोक्ष का पात्र है । सो भाई जी तुम प्रश्न लिखे तिसके उत्तर अपनी बुद्धि अनुसार कुछ लिखिए है सो जानना और अध्यात्म आगम की चर्चा गर्भित पत्र तो शीघ्र शीघ्र देवो करो, मिलाप कभी होगा तब होगा । अर निरन्तर स्वरूपानुभव में रहना, श्रीरस्तु ।
अथ स्वानुभव दशाविषै प्रत्यक्ष परोक्षादिक प्रश्ननिके उत्तर बुद्धि अनुसार लिखिये हैं ।
तहाँ प्रथम ही स्वानुभव का स्वरूप जानने निमित्त लिखै हैं ।
जीव पदार्थ अनादितैं मिथ्यादृष्टी है । सो आपापरके यथार्थ रूप से विपरीत श्रद्धान का नाम मिथ्यात्व है । बहुरि जिस काल किसी जीव के दर्शन मोह के उपशम, क्षयोपशम या क्षय तैं आपापर का यथार्थ श्रद्धांन रूप तत्त्वार्थ श्रद्धान होय, तब जीव सम्यक्ती होय है । यातैं आपापरका श्रद्धानविषैं शुद्धात्म श्रद्धान रूप निश्चय सम्यक्त गर्भित है । बहुरि जो आपापर का यथार्थ श्रद्धान नाहीं है अर जिनमतविषैं कहे जे देव, गुरु, धर्म तिन ही कूं मानै है, अन्य मत विष कहे देवादि वा तत्त्वादि तिनको नाहीं मानै है, तो ऐसे केवल व्यवहार सम्यक्त करि सम्यक्ती नाम पावै नाहीं । तातैं स्वपर भेद विज्ञान को लिये जो तत्त्वार्थ श्रद्धान होय सो सम्यक्त जानना ।
बहुरि ऐसा सम्यक्ती होते सन्ते जो ज्ञान पंचेन्द्री व छठा मन के द्वारा क्षयोपशम रूप मिथ्यात्व दशा में कुमति कुश्रुतिरूप होय रहा था सोई ज्ञान अब मतिश्रुति रूप सम्यग्ज्ञान भया । सम्यक्ती जेता कछु जानै सो जानना सर्व सम्यग्ज्ञान रूप है ।
जो कदाचित् घट पटादिक पदार्थंनिकूं अयथार्थं भी जानैं तो वह आवरण जनित उदय को अज्ञान भाव है । जो क्षयोपशम रूप प्रगट ज्ञान है सो तो सर्वं सम्यग्ज्ञान ही है, जातैं जाननेविषैं विपरीत रूप पदार्थंनिकौं न साधै है । सो यह सम्यग्ज्ञान केवलज्ञानका अंश है । जैसे थोड़ा सा मेघ पटलविलय भये कुछ प्रकाश प्रगटै है सो सर्व प्रकाश का अंश है ।
जो ज्ञान मतिश्रुति रूप प्रवर्त्तैं है सो ही ज्ञान बधता बधता केवलज्ञान रूप होय है । इसलिये सम्यग्ज्ञान की अपेक्षा तो जाति एक है । बहुरि इस सम्यक्ती के परिणामविषैं सविकल्प तथा निर्विकल्परूप होय दो प्रकार प्रवर्त्तैं । तहाँ जो विषय कषायादिरूप वा पूजा, दान, शास्त्राभ्यासादिक रूप प्रवर्त्तैं सो सविकल्परूप जानना ।
यहाँ प्रश्न: जो शुभाशुभ रूप परिणमते हुए सम्यक्तका अस्तित्व कैसें पाइए ?
ताका समाधान: जैसे कोई गुमास्ता साहू के कार्यविषै प्रवर्त्तै है, उस कार्य को अपना भी कहे है, हर्ष विषाद को भी पावै है, तिसकार्य विषै प्रवर्त्तते अपनी और साहू की जुदाई कौं नाहीं विचारै है परन्तु अन्तरंग श्रद्धान ऐसा है कि यह मेरा कारज नाहीं । ऐसा कार्यकर्ता गुंमास्ता साहूकार है परन्तु वह साहू के धन कूं चुराय अपना मानै तो गुमास्ता चोर ही कहिए । तैसे कर्मोदय जनित शुभाशुभ रूप कार्यको करता हुआ तदरूप परिणमै, तथापि अन्तरंग ऐसा श्रद्धान है कि यह कार्य मेरा नाहीं । जो शरीराश्रित व्रत संयम को भी अपना मानै तो मिथ्यादृष्टि होय । सो ऐसे सविकल्प परिणाम होंय हैं । अब सविकल्प ही के द्वारकरि निर्विकल्प परिणाम होने का विधान कहिए है:
वह सम्यक्ती कदाचित् स्वरूप ध्यान करने को उद्यमी होय है तहाँ प्रथम स्वपर स्वरूप भेद विज्ञान करै; नो कर्म, द्रव्यकर्म, भावकर्म रहित चैतन्य चित्त चमत्कारमात्र अपना स्वरूप जानै; पीछैं परका भी विचार छूट जाय, केवल स्वात्म विचार ही रहै है; तहाँ अनेक प्रकार निजस्वरूपविषै अहंबुद्धि धारै है । मैं चिदानन्द हूँ, शुद्ध हूँ, सिद्ध हूँ, इत्यादिक विचार होते संते सहज ही आनन्द तरंग उठै है, रोमांच होय है, ता पीछे ऐसा विचार तो छूट जाय, केवल चिन्मात्र स्वरूप भासने लागै; तहाँ सर्व परिणाम उस रूपविषै एकाग्र होय प्रवर्त्तैं । दर्शन ज्ञानादिक का वा नय प्रमाणादिकका भी विचार विलय जाय ।
चैतन्य स्वरूप जो सविकल्प ताकरि निश्चय किया था, तिस ही विषै व्याप्य व्यापक रूप होय ऐसे प्रवर्त्तैं जहाँ ध्याता ध्यायपनो दूर भयो । सो ऐसी दशा का नाम निर्विकल्प अनुभव है । सो बड़े नय चक्र ग्रन्थविषै ऐसे ही कहा है:
गाथा: तच्चाणे सण काले समयं बुज्झेदि जुत्ति मग्गेण ।
णो आराहण समये पच्चक्खो अणुहवो जह्मा ॥ २६६ ॥
अर्थ तत्त्व का अवलोकन का जो काल ता विषैं समय जो है शुद्धात्मा ताको जुत्ता जो नय प्रमाण ताकरि पहिले जानै । पीछें आराधन समय जो अनुभव काल, तिहि विषैं नय प्रमाण नाहीं है, जातें प्रत्यक्ष अनुभव है । जैसे रत्न की खरीद विषैं अनेक विकल्प करै हैं, प्रत्यक्ष वाको पहरिये तब विकल्प नाहीं, पहरने का सुख ही है । ऐसे सविकल्प के द्वारे निर्विकल्प अनुभव होय है ।
बहुरि जो ज्ञान पंच इन्द्री व छठा मन के द्वारे प्रवर्त्तें था सो ज्ञान सब तरफ सों सिमट कर निर्विकल्प अनुभव विषैं केवल स्वरूप सन्मुख भया । जातें वह ज्ञान क्षयोपशमरूप है सो एक काल विषैं एक ज्ञेय ही को जानै, सो ज्ञान स्वरूप जानने को प्रवर्त्या तब अन्य का जानना सहज ही रह गया । तहाँ ऐसी दशा भई जो बाह्य विकार होंय तौ भी स्वरूप ध्यानी को कछु खबर नाहीं, ऐसे मतिज्ञान भी स्वरूप सन्मुख भया । बहुरि नयादिक के विचार मिटते श्रुतज्ञान भी स्वरूप सन्मुख भया । ऐसा वर्णन समयसार की टीका आत्मख्यातिविषैं किया है तथा आत्म अवलोकनादिविषै है । इस ही वास्ते निर्विकल्प अनुभवकौं अतेन्द्रिय कहिए है जातैं इन्द्रीनका धर्म तौ यह है जो स्पर्श, रस, गंध और वर्ण कौं जानै सो यहाँ नाहीं अर मन का धर्म यह है जो अनेक विकल्प करै सो भी यहाँ नाहीं । तातैं जब जो ज्ञान इन्द्री मन के द्वारे प्रवर्त्तें था सो ही ज्ञान अब अनुभवविषैं प्रवर्त्तें है तथापि इस ज्ञान को अतेन्द्रिय कहिये है । बहुरि इस स्वानुभवकौं मन द्वारे भी भया कहिए जातें इस अनुभवविषै मतिज्ञान श्रुतज्ञान ही हैं, और कोई ज्ञान नाहीं ।
मतिश्रुतज्ञान इन्द्री मनके अवलम्बन बिना होय नाहीं, सो इन्द्री मन का तो अभाव ही है जातैं इन्द्रियका विषय मूर्त्तीक पदार्थ ही है । बहुरि यहाँ मतिज्ञान है जातें मन का विषय मूर्तिक अमूर्तीक पदार्थ है, सो यहाँ मन सम्बन्धी परिणाम स्वरूपविषैं एकाग्र होय अन्य चिन्ता का निरोध करै हैं तातें याकौं मन द्वारै कहिये है ।
“एकाग्र चिन्ता निरोधो ध्यानम्” ऐसा ध्यान का भी लक्षण है, ऐसा अनुभव दशाविषें सम्भवै है । तथा नाटक के कवित्तविषै कहा है:
दोहाः वस्तु विचारत भाव सें, मन पावै विश्राम ।
रस स्वादित सुख ऊपजं, अनुभव याकौ नाम ॥
ऐसे मन बिना जुदा परिणाम स्वरूपविषैं प्रवर्त्ता नाहीं तातैं स्वानुभवकौं मन जनित भी कहिए है, सो अतेन्द्रिय कहने में अरु मन जनित कहने में कुछ विरोध नाहीं; विवक्षा भेद है ।
बहुरि तुम लिखा “जो आत्मा अतेन्द्रिय है सो अतेन्द्रिय ही करि ग्रहा जाय” सो भाई जी, मन अमूर्तीक का भी ग्रहण करै है जातैं मतिश्रुतज्ञान का विषय सर्व द्रव्य कहे हैं । उक्तं च तत्त्वार्थ सूत्रे:
“मति श्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्व सर्व पर्यायेषु । ” (१-२६)
बहुरि तुमने “प्रत्यक्ष परोक्ष संबंधी प्रश्न लिखे” सो भाईजी प्रत्यक्ष परोक्ष के तो भेद हैं नाहीं । चौथे गुणस्थान में सिद्ध समान क्षायक सम्यक्त हो जाय है, तातें सम्यक्त तो केवल यथार्थ श्रद्धान रूप ही है । वह जीव शुभाशुभ कार्य करता भी रहै, तातैं तुमने जो लिख्या था कि “निश्चय सम्यक्त प्रत्यक्ष है और व्यवहार सम्यक्त परोक्ष है” सो ऐसा नाहीं है । सम्यक्त के तो तीन भेद हैं तहाँ उपशम सम्यक्त अरु क्षायक सम्यक्त तो निर्मल हैं, जातें वे मिथ्यात्व के उदय करि रहित हैं अर क्षयोपशम सम्यक्त समल है । बहुरि इस सम्यक्तविषैं प्रत्यक्ष परोक्ष भेद तो नाहीं हैं ।
क्षायक सम्यक्तीकैं शुभाशुभ रूप प्रवर्त्तता वा स्वानुभवरूप प्रवर्त्तता सम्यक्त गुण तो सामान्य ही है तातैं सम्यक्तके तो प्रत्यक्ष परोक्ष भेद न मानना । बहुरि प्रमाण के प्रत्यक्ष परोक्ष भेद हैं सो प्रमाण सम्यग्ज्ञान है; तातें मतिज्ञान श्रुतज्ञान तो परोक्ष प्रमाण हैं और अवधि मनःपर्यय केवलज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण हैं ।
यथाः “आद्ये परोक्षं । प्रत्यक्षमन्यत्” । (तत्त्वार्थ सूत्र १-११, १२)
ऐसा सूत्र कहा है तथा तर्क शास्त्रविषैं प्रत्यक्ष परोक्ष का ऐसा लक्षण कहा है:
“स्पष्टप्रतिभासात्मकंप्रत्यक्षमस्पष्टं परोक्षं । ”
जो ज्ञान अपने विषयकौं निर्मलतारूप नीके जानै सो प्रत्यक्ष अर स्पष्ट नीके न जानै सो परोक्ष; सो मतिज्ञान श्रुतज्ञान का विषय तो घना परन्तु एक ही ज्ञेय कौं सम्पूर्ण न जान सकै तातैं परोक्ष है और अवधि मनःपर्यय ज्ञान के विषय थोरे हैं तथापि अपने विषयकौं स्पष्ट नीके जानै तातैं एक देश प्रत्यक्ष है अर केवलज्ञान सर्व ज्ञेयकौं आप स्पष्ट जानैं तातैं सर्व प्रत्यक्ष है ।
बहुरि प्रत्यक्षके दोय भेद हैं । एक परमार्थ प्रत्यक्ष दूसरा व्यवहार प्रत्यक्ष । अवधि मनः पर्यय और केवलज्ञान तो स्पष्ट प्रतिभासरूप हैं ही, तातैं पारमार्थिक प्रत्यक्ष हैं । बहुरि नेत्र आदिकतैं वरणादिककौं जानिए है, तातैं इनकौं सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहिए, जातैं जो एक वस्तु में मिश्र अनेक वर्ण हैं ते नेत्रकर नीके ग्रहे जाय हैं ।
बहुरि परोक्ष प्रमाण के पांच भेद हैं १ स्मृति, २ प्रत्यभिज्ञान, ३ तर्क, ४ अनुमान, ५ आगम ।
तहाँ जो पूर्व वस्तु जानी को याद करि जानना सो स्मृति कहिए ।
दृष्टांत कर वस्तु निश्चय कीजिये सो प्रत्यभिज्ञान कहिए ।
हेतु के विचार तें लिया जो ज्ञान सो तर्क कहिए ।
हेतुतें साध्य वस्तुका जो ज्ञान सो अनुमान कहिए ।
आगम तें जो ज्ञान होय सो आगम कहिए ।
ऐसे प्रत्यक्ष परोक्ष प्रमाण के भेद किये हैं, सोई स्वानुभव दशा में जो आत्मा को जानिए सो श्रुतज्ञान कर जानिए है । श्रुतज्ञान है सो मतिज्ञान पूर्वक ही है सो मतिज्ञान श्रुतज्ञान परोक्ष कहे तातैं यहाँ आत्मा का जानना प्रत्यक्ष नाहीं । बहुरि अवधि मनःपर्यय का विषय रूपी पदार्थ ही है, केवलज्ञान छद्मस्थकै है नाहीं, तातैं अनुभवविषैं अवधि मनःपर्यय केवल करि आत्मा का जानना नाहीं । बहुरि यहाँ आत्माकूं स्पष्ट नीके जानै है, तातैं पारमार्थिक प्रत्यक्षपना तो सम्भवै नाहीं । बहुरि जैसे नेत्रादिकसे जानिए है तैसे एक देश निर्मलता लिये भी आत्मा के असंख्यात प्रदेशादिक न जानिए है तातैं सांव्यवहारिक प्रत्यक्षपणो भी सम्भवै नाहीं ।
यहाँ पर तो आगम-अनुमानादिकं परोक्ष ज्ञान करि आत्मा का अनुभव होय है । जैनागमविषै जैसा आत्मा का स्वरूप कहा है ताकूं तैसां जान उस विषैं परिणामोंको मग्न करै है तातैं आगम परोक्ष प्रमाण कहिए । अथवा मैं आत्मां ही हूँ तातैं मुझविषैं ज्ञान है; जहाँ जहाँ ज्ञान है तहाँ तहाँ आत्मा है जैसे सिद्धादिक हैं । बहुरि जहाँ आत्मा नाहीं तहाँ ज्ञान भी नाहीं जैसे मृतक कलेवरादिक हैं । ऐसे अनुमान करि वस्तुका निश्चय कर उस विषै परिणाम मग्न करै है, तात अनुमान परोक्ष प्रमाण कहिए । अथवा आगम अनुमानादिक कर जो वस्तु जानने मैं आया तिसहीकों याद रखके उस विषै परिणाम मग्न करैं है तातैं स्मृति कहिए, ऐसे इत्यादिक प्रकार से स्वानुभवविषैं परोक्ष प्रमाण कर ही आत्मा का जानना होय है । पीछे जो स्वरूप जाना तिस ही विषै परिणाम मग्न हो हैं ताका कछु विशेष जानपना होता नाहीं ।
बहुरि यहाँ प्रश्न: जो सविकल्प निर्विकल्पविषैं जानने का विशेष नाहीं तो अधिक आनन्द कंसे होय है ?
ताका समाधान: सविकल्प दशाविषैं जो ज्ञान अनेक ज्ञेयकौं जानने रूप प्रवर्तें था, वह निर्विकल्प दशाविषें केवल आत्मा को ही जानने में प्रवर्त्या, एक तो यह विशेषता है । दूसरी यह विशेषता है जो परिणाम नाना विकल्पविषैं परिणमैं था सो केवल स्वरूप ही सौं तादात्मरूप होय प्रवर्त्या । तीजी यह विशेषता है कि इन दोनों विशेषताओं से कोई वचनातीत अपूर्व आनन्द होय है जो विषय सेवनविषैं उसके अंश की भी जात नाहीं तातैं उस आनन्द को अतेन्द्रिय कहिये ।
बहुरि यहाँ प्रश्न: जो अनुभवविषैं भी आत्मा परोक्ष ही है तौ ग्रंथनविषैं अनुभवकूं प्रत्यक्ष कैसे कहिये ? कारण कि ऊपरकी गाथा विषैं ही “पच्चक्खो अणुहवो जम्हा” ऐसा कहा है ।
ताका समाधान: अनुभव विषै आत्मा तौ परोक्ष ही है, कछु आत्मा के प्रदेश आकार तौ भासते नाहीं । परन्तु जो स्वरूपविषे परिणाम मग्न होते स्वानुभव भया, सो वह स्वानुभव प्रत्यक्ष है । स्वानुभवका स्वाद कछु आगम अनुमानादिक परोक्ष प्रमाणादिक कर न जानै है । आप ही अनुभवके रस स्वादकौं वेदं है । जैसे कोई आंधा पुरुष मिश्री कौं आस्वादै है, तहाँ मिश्रीके आकारादिक तो परोक्ष हैं और जिह्वा करि जो स्वाद लिया है वह स्वाद प्रत्यक्ष है, ऐसा जानना ।
अथवा जो प्रत्यक्ष की सी नाईं होय तिसकौं भी प्रत्यक्ष कहिए । जैसे लोकविषैं कहिए है “हमने स्वप्नविषैं वा ध्यान विषैं फलाने पुरुष को प्रत्यक्ष देखा” सो प्रत्यक्ष देखा नाहीं परन्तु प्रत्यक्षकी सी नाईं प्रत्यक्षवत् यथार्थ देखा तातैं तिसको प्रत्यक्ष कहिए; तैसे अनुभवविषैं आत्मा प्रत्यक्ष की नाईं यथार्थ प्रतिभासै है, तातैं इस न्यायकरि आत्मा का भी प्रत्यक्ष जानना होय है, ऐसे कहिये तो दोष नाहीं । कथन तो अनेक प्रकार होय परन्तु वह सर्व आगम अध्यात्म शास्त्रनसौं विरोध न होय तैसे विवक्षा भेदकरि जानना । यहाँ प्रश्न: जो ऐसे अनुभव कौन गुणस्थान में कहे हैं ?
ताका समाधान: चौथे ही से होय हैं परन्तु चौथे तो बहुत काल के अन्तराल में होय हैं और ऊपर के गुणठाने शीघ्र शीघ्र होय हैं ।
बहुरि प्रश्न: जो अनुभव तो निर्विकल्प है तहाँ ऊपर के और नीचे के गुणस्थाननि में भेद कहा ?
ताका उत्तर: परिणामन की मग्नता विषे विशेष है । जैसे दोय पुरुष नाम ले हैं अर दोही का परिणाम नाम विखै है, तहाँ एक कै तो मग्नता विशेष है अर एक कै स्तोक है तैसे जानना ।
बहुरि प्रश्न: जो निर्विकल्प अनुभवविषै कोई विकल्प नाहीं तो शुक्लध्यान का प्रथम भेद प्रथक्त्ववितर्कवीचार कहा, तहाँ प्रथक्त्व-वितर्कवीचार-नाना प्रकारका श्रुत अर वीचार-अर्थ, व्यंजन, योग, संक्रमन रूप ऐसे क्यों कहा ?
तिसका उत्तर: कथन दोय प्रकार है । एक स्थूल रूप है, एक सूक्ष्म रूप है । जैसे स्थूलता करि तो छठे ही गुणस्थाने सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत कहा अर सूक्ष्मता कर नवमें गुणस्थान ताईं मैथुन संज्ञा कही तैसे यहाँ स्वानुभवविषै निर्विकल्पता स्थूलरूप कहिये है । बहुरि सूक्ष्मताकरि प्रथक्त्ववितर्क वीचारादिक भेद वा कषायादि दशमा गुणस्थान ताईं कहे हैं । सो अब आपके जानने में वा अन्य के जानने में आवै ऐसा भाव का कथन स्थूल जानना अर जो आप भी न जानैं अर केवली भगवान् ही जानै सो ऐसे भाव का कथन सूक्ष्म जानना । चरणानुयोगादिकविषैं स्थूल कथन की मुख्यता है अर करणानुयोगादिक विषैं सूक्ष्म कथन की मुख्यता है, ऐसा भेद और भी ठिकाने जानना । ऐसे निर्विकल्प अनुभव का स्वरूप जानना ।
बहुरि भाई जी, तुम तीन दृष्टांत लिखे वा दृष्टांत विषैं प्रश्न लिखा सो दृष्टांत सर्वाङ्ग मिलता नाहीं । दृष्टांत है सो एक प्रयोजनकौं दिखावै है सो यहाँ द्वितीया का विधु ( चन्द्रमा ), जलविन्दु, अग्निकण ए तो एक देश हैं अर पूर्णमाशी का चन्द्र, महासागर तथा अग्निकुण्ड ये सर्व देश हैं । तैसे ही चौथे गुणस्थानवर्ती आत्माके ज्ञानादि गुण एक देश प्रगट भये हैं तिनकी अर तेरहवें गुणस्थानवर्ती आत्मा के ज्ञानादिक गुण सर्व प्रगट होय हैं तिनकी एक जाति है ।
तहाँ प्रश्न: जो एक जाति है तो जैसे केवली सर्व ज्ञेयकौं प्रत्यक्ष जानै हैं तैसे चौथे गुणस्थान वाला भी आत्माकौं प्रत्यक्ष जानता होगा ?
ताका उत्तर: सो भाईजी, प्रत्यक्षता की अपेक्षा एक जाति नाहीं । सम्यग्ज्ञानकी अपेक्षा एक जाति है । चौथे गुणस्थान वाले कै मतिश्रुत रूप सम्यग्ज्ञान है और तेरहवें गुणस्थान वाले कै केवलरूप सम्यग्ज्ञान है । बहुरि एक देश सर्व देश का तौ अन्तर इतना ही है जो मतिश्रुत-ज्ञान वाला अमूर्तिक वस्तु को अप्रत्यक्ष और मूर्तिक वस्तु को भी प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष किंचित् अनुक्रमसौं जानै है अर केवलज्ञानी सर्व वस्तुको सर्वथा युगपत् जानै है । वह परोक्ष जानै यह प्रत्यक्ष जानै, इतना ही विशेष है अर सर्व प्रकार एकही जाति कहिए तौ जैसे केवली युगपत् अप्रत्यक्ष अप्रयोजन रूप ज्ञेयकौं निर्विकल्परूप जानै तैसे ए भी जानै सो तो है नाहीं, तातैं प्रत्यक्ष परोक्ष में विशेष जानना कह्या है !
श्लोक: स्याद्वाद केवल ज्ञाने सर्व तत्त्व प्रकाशने ।
भेद साक्षाद् साक्षाच्च ह्यवस्त्वन्यंतम् भवेत् ॥
अष्टसहस्री दशमः परिच्छेदः १०५ ।
याका अर्थ: स्याद्वाद जो श्रुतज्ञान अर केवलज्ञान-ये दोय तत्त्वों के प्रकाशन हारे हैं । विशेष इतना: केवलज्ञान प्रत्यक्ष है, श्रुतज्ञान परोक्ष है । वस्तुरूपं से यह दोनों एक दूसरे से भिन्न नाहीं हैं ।
बहुरि तुम निश्चय अर व्यवहार सम्यक्त का स्वरूप लिखा सो सत्य है; परन्तु इतना जानना, सम्यक्तीकै व्यवहार सम्यक्तविषै निश्चय सम्यक्त गर्भित है, सदैव गमन ( परिणमन ) रूप है ।
बहुरि तुम लिख्या: कोई साधर्मी कहै है “आत्माकौं प्रत्यक्ष जानैं तो कर्मवर्गणाकौं प्रत्यक्ष क्यों न जानैं ?”
सो कहिए है: आत्माकौं प्रत्यक्ष तो केवली ही जानैं, कर्मवर्गणा को अवधिज्ञानी भी जानै है ।
बहुरि तुम लिख्या: द्वितीयाके चन्द्रमाकी ज्यों आत्माके प्रदेश थोरे खुले कहो ?
ताका उत्तर: सो दृष्टांत प्रदेशनकी अपेक्षा नाहीं, यह दृष्टांत गुण की अपेक्षा है । जो सम्यक्त्व, स्वानुभव और प्रत्यक्षादिक सम्बन्धी प्रश्न तुमने लिखे थे, तिनका उत्तर अपनी बुद्धि अनुसार लिखा है । तुम हू जिनवाणीतैं तथा अपनी परणति से मिलाय लेना । विशेष कहाँ ताईं लिखिये, जो बात जानिए सो लिखनेमें आवे नाहीं । मिले कछु कहिये भी, सो मिलना कर्माधीन, तातैं भला यह है कि चैतन्य स्वरूप की प्राप्तिके उद्यममें रहना व अनुभवमें वर्तना । वर्तमानकालविषै अध्यात्म तत्त्व तो आत्मा ही है ।
तिस समयसार ग्रन्थकी अमृतचन्द्र आचार्यकृत टीका संस्कृतविषै है अर आगमकी चर्चा गोम्मटसारविषै है तथा और भी अन्यग्रन्थविषैं है । जो जानी है, सो सर्व लिखनेमें आवै नाहीं । तातैं तुम अध्यात्म तथा आगम ग्रन्थका अभ्यास रखना अर अपने स्वरूपविषैं मग्न रहना और तुम कोई विशेष ग्रन्थ जाने हों तो मुझकौं लिख भेजना । साधर्मीकै तो परस्पर चर्चा ही चाहिए अर मेरी तो इतनी बुद्धि है नाहीं परन्तु तुम सारिखे भाइनसौं परस्पर विचार है, सो अब कहाँ तक लिखिये ? जेते मिलना नाहीं तेतैं पत्र तो शीघ्र ही लिखा करो ।
मिती फागुन बदी ५ सं० १८११
टोडरमल
मूल पाठ उक्त संस्करण के छपे पृष्ठों से अक्षरशः लिया गया है, पुरानी वर्तनी जैसी छपी है वैसी रखी है। एक स्थान पर पृष्ठ का किनारा कटा है (“निश्चय सम्यक्त गर्भित है”), वहाँ पाठ मोक्षमार्ग प्रकाशक के १९८४ के दिल्ली संस्करण से मिलाकर पूरा किया है। कोई अशुद्धि दिखे तो कृपया बताएँ।
स्रोत: मोक्षमार्ग प्रकाशक, सस्ती ग्रन्थमाला कमेटी, देहली (वीर नि. सं. २४८६)। स्कैन प्रति श्री गणेश वर्णी दिगम्बर जैन संस्थान, नरिया, वाराणसी के संग्रह से इंटरनेट आर्काइव पर उपलब्ध है (पब्लिक डोमेन)।