पंच-परम पद मंगलकारी, भव्य भजो नित ही सुखकारी | pamcha parama pada mamgalakari bhavya bhajo nita hi sukhakari

तर्जः यह विधि मंगल…

पंच-परम पद मंगलकारी, भव्य भजो नित ही सुखकारी।
अरहंत अनन्त चतुष्टय धारी, वीतराग तिहुँ, जग हितकारी ।। 1 ।।

सकल कर्म-रिपु सिद्ध निवारी, निजपद दर्शावे अविकारी।
आचारज छत्तीस गुण धारी, सकल संघ नायक दुखहारी ।। 2 ।।

उपाध्याय शिक्षा मनहारी, देवें शिष्य लें शिवकारी।
मूल अट्ठाईस गुण के धारी, साधु जजों जन आनन्दकारी ।। 3 ।।

दुर्धर ब्रह्मचर्य व्रतधारी, सम्यक् रत्नत्रय दातारी।
पंच-परमेष्ठी के गुण गावें, वे निश्चय ही शिव पद पावें ।। 4 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’