पलकन से मग झारूँ ए री हे महा जो मुनि आवे द्वार मेरे | Palkan Se Mag Jharun E Ri He Maha Jo Muni Aave Dwar Mere

पलकन से मग झारूँ ए री हे महा जो मुनि आवे द्वार मेरे

(श्याम कल्याण व इमन कल्याण)

पलकन से मग झारूँ ए री हे महा जो मुनि आवे द्वार मेरे ॥टेर ॥

कनक रतनमय कर ले झारी चरण कमल को पखालूँ ॥१॥

कर पर कर घर अशन कराऊँ, भव भव के अघ टारूँ ।
जनम कृतारथ जब ही मेरो, ‘जग’ जिन रूप निहारूँ ॥२॥


स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन १ (विभिन्न कवियों के भजन)

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