१. धर्मोपदेशामृत (भाग 1/3)
कायोत्सर्गार्यताङ्गो जयति जिनपतिर्नाभिसूनुर्महात्मा
मध्याह्ने यस्य भास्वानुपरि परिगतो राजतेऽस्मोग्रमूर्तिः
चक्रं कर्मेन्धनानामतिबहुदहतो दूरमौदास्यवात-
स्फूर्यत्सद्ध्यानवह्नेरिव रुचिरतरः प्रोद्गतो विस्फुलिङ्गः ॥१॥
अर्थ: दोपहर के समय जिस आदीश्वर भगवान् के ऊपर रहा हुआ तेजस्वी सूर्य ज्ञानावरणादि कर्मरूपी ईंधन को पल भर में भस्म करने वाली तथा वैराग्यरूपी पवन से जलायी हुई, ध्यानरूपी अग्नि से उत्पन्न हुए मनोहर फुलिंगा के समान जान पड़ता है ऐसे कायोत्सर्ग सहित विस्तीर्ण शरीर के धारी तथा अष्टकर्मों के जीतने वाले उत्तम पुरुषों के स्वामी महात्मा श्रीनाभिराजा के पुत्र श्रीऋषभदेव भगवान् सदा जयवन्त हैं।
नो किञ्चित्करकार्यमस्ति गमनप्राप्यं न किञ्चिद्दृशो-
र्दृश्यं यस्य न कर्णयोः किमपि हि श्रोतव्यमप्यस्ति न।
तेनालम्बितपाणिरुज्झितगतिर्नासाग्रदृष्टी रहः -
सम्प्राप्तोऽतिनिराकुलो विजयते ध्यानैकतानो जिनः॥२॥
अर्थ: भगवान् को हाथ से करने योग्य कोई कार्य नहीं रहा है इसलिए तो उन्होंने हाथों को नीचे लटका दिया है तथा जाने के लायक कोई स्थान नहीं रहा है इसलिए वे निश्चल खड़े हुए हैं और देखने योग्य कोई पदार्थ नहीं रहा है इसलिए भगवान् ने नाक के ऊपर अपनी दृष्टि दे रखी है तथा एकान्तवास इसलिए किया है कि भगवान् को पास में रहकर कोई बात सुनने के लिए नहीं रही है इसलिए इस प्रकार अत्यन्त निराकुल तथा ध्यानरस में लीन भगवान् सदा लोक में जयवन्त हैं।
रागो यस्य न विद्यते क्वचिदपि प्रध्वस्तमोहग्रहा-
दस्त्रादेः परिवर्जनान्न च बुधैर्द्वेषोऽपि सम्भाव्यते।
तस्मात्साम्यमथात्मबोधनमतो जातः क्षयः कर्मणा-
मानन्दादिगुणाश्रयस्तु नियतं सोऽर्हन् सदा पातु वः॥३॥
अर्थ: मोह तथा परिग्रह के नाश हो जाने के कारण न तो किसी पदार्थ में जिस अर्हंत का राग ही प्रतीत होता है तथा अर्हंत भगवान् ने समस्त शस्त्र आदि को छोड़ दिया है इसलिए विद्वानों को किसी में जिस अर्हंत का द्वेष भी देखने में नहीं आता तथा द्वेष के न रहने के कारण जो शान्तस्वभावी है तथा शान्तस्वभावी होने के ही कारण जिस अर्हंत ने अपनी आत्मा को जान लिया है तथा आत्मा का ज्ञाता होने के कारण जो अर्हंत कर्मों से रहित है तथा कर्मों से रहित होने के ही कारण जो आनन्द आदि गुणों का आश्रय है ऐसे अर्हंत भगवान् मेरी सदा रक्षा करें अर्थात् ऐसे अर्हंत भगवान् का मैं सदा सेवक हूँ।
इन्द्रस्य प्रणतस्य शेखरशिखारत्नार्कभासानख-
श्रेणीतेक्षणबिम्बशुम्भदलिभृद्भूरोल्लसत्पाटलम् ।
श्रीसङ्गादङ्घ्रियुगं जिनस्य दधदप्यम्भोजसाम्यं रज-
स्त्यक्तं जाड्यहरं परं भवतु नश्चेतोऽर्पितं शर्मणे ॥४॥
अर्थ: जिस प्रकार कमलों पर भ्रमर गुंजार करते हैं उसी प्रकार भगवान् के चरण कमलों को बड़े-बड़े इन्द्र आकर नमस्कार करते हैं तथा उनके मुकुट के अग्रभाग में लगे हुए जो रत्न उनकी प्रभा सहित भगवान् के चरणों के नखों में उन इन्द्रों के नेत्रों के प्रतिबिम्ब पड़ते हैं इसलिए भगवान् के चरणों पर भी इन्द्रों के नेत्ररूपी भौंरे निवास करते हैं तथा जिस प्रकार कमल कुछ सफेदी लिए लाल होते हैं उस ही प्रकार भगवान् के चरण कमल भी कुछ सफेदी लिए हुए लालवर्ण हैं तथा जिस प्रकार कमलों में लक्ष्मी रहती है उस ही प्रकार भगवान् के चरण कमल भी लक्ष्मी के स्थान हैं अर्थात् चरण कमलों के आराधन करने से भव्य जीवों को उत्तम मोक्षरूपी लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इसलिए यद्यपि कमल तथा भगवान् के चरणकमल इन गुणों से समान हैं तथापि कमल धूलि सहित है तथा जड़ हैं और भगवान् के चरणकमल धूलि (पाप) रहित हैं तथा जड़ता के दूर करने वाले हैं अतः कमलों से भी उत्कृष्ट भगवान् के चरणकमल सदा मेरे मन में स्थित रहें तथा कल्याण करें।
जयति जगदधीशः शान्तिनाथो यदीयं स्मृतमपि हि जनानां पापतापोपशान्त्यै ।
विबुधकुलकिरीटप्रस्फुरन्नीलरत्न द्युतिचलमधुपालीचुम्बितं पादपद्मम् ॥५॥
अर्थ: नाना प्रकार के देवताओं के मुकुट, उनमें लगी हुई नीलमणि उनकी जो प्रभा वही चलती हुई भ्रमरों की पंक्ति से सहित जिस शान्तिनाथ भगवान् के चरणकमल स्मरण किए हुए समस्त जनों के पाप तथा संताप को दूर कर देते हैं ऐसे वे तीनलोक के स्वामी श्रीशांतिनाथ भगवान् सदा जयवंत रहें।
स जयति जिनदेवो सर्वविद्विश्वनाथोऽवितथवचनहेतुक्रोधलोभादिमुक्तः ।
शिवपुरपथपांथप्राणिपाथेयमुच्चैर्जनितपरमशर्मा येन धर्मोऽभ्यधायि ॥६॥
अर्थ: सबके जानने वाले तथा तीनलोक के स्वामी और क्रोध-लोभादि से रहित इसीलिए सत्य वचन के बोलने वाले श्रीजिनदेव सदा जयवंत हैं, जिन श्रीजिनदेव ने मोक्षमार्ग को गमन करने वाले प्राणियों को पाथेय (टोसा) स्वरूप तथा उत्तम कल्याण के करने वाले उत्कृष्ट धर्म का निरूपण किया है।
धर्मो जीवदया गृहस्थशमिनो,र्भेदाद्द्विधा च त्रयं,
रत्नानां परमं तथा दशविधोत्कृष्टक्षमादिस्ततः।
मोहोद्भूतविकल्पजालरहिता, वागङ्गसङ्गेज्झिता,
शुद्धानन्दमयात्मनः परिणतिर्धर्माख्यया गीयते ॥७॥
अर्थ: समस्त जीवों पर दया करना इसी का नाम धर्म है अथवा एकदेश गृहस्थ का धर्म तथा सर्वदेश मुनियों का धर्म इस प्रकार उस धर्म के दो ही भेद हैं अथवा उत्कृष्ट रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र) ही धर्म है अथवा उत्तमक्षमा-मार्दव-आर्जव आदिक दश प्रकार भी धर्म है अथवा मोह से उत्पन्न हुए समस्त विकल्पों से रहित तथा जिसको वचन से निरूपण नहीं कर सकते ऐसी जो शुद्ध तथा आनन्दमय आत्मा की परिणति उसी का नाम उत्कृष्ट धर्म है इस प्रकार सामान्यतया धर्म का लक्षण तथा भेद इस श्लोक में बतलाये गये हैं।
आद्या सद्व्रतसञ्चयस्य जननी, सौख्यस्य सत्सम्पदां,
मूलं धर्मतरोरनश्वरपदा, रोहैकनिःश्रेणिका।
कार्या सद्भिरिहाङ्गिषु प्रथमतो, नित्यं दया धार्मिकैः
धिङ्नामाऽप्यदयस्य तस्य च परं, सर्वत्र शून्या दिशः ॥८॥
अर्थ: जो समस्त उत्तम व्रतों के समूह में मुख्य है तथा सच्चे सुख और श्रेष्ठ संपदाओं को उत्पन्न करने वाली है और जो धर्मरूपी वृक्ष की जड़ है (अर्थात् जिस प्रकार जड़ बिना वृक्ष नहीं ठहरता उसी प्रकार दया, बिना धर्म के भी नहीं ठहर सकती) तथा जो मोक्षरूपी महल के अग्रभाग में चढ़ने के लिए सीढ़ी के समान है ऐसे धर्मात्मा पुरुषों को समस्त प्राणियों पर दया अवश्य करनी चाहिए किन्तु जिस पुरुष के चित्त में लेशमात्र भी दया नहीं है उस पुरुष के लिए धिक्कार है तथा समस्त दिशा उसके लिए शून्य है अर्थात् जो निर्दयी है उसका कोई भी मित्र नहीं होता।
संसारे भ्रमतश्चिरं तनुभृतः, के के न पित्रादयो,
जातास्तद्धममाश्रितेन खलु ते, सर्वे भवन्त्याहताः।
नन्वात्मापि हतो यदत्र निहतो, जन्मान्तरेषु ध्रुवं,
हन्तारं प्रतिहन्ति हन्त बहुशः, संस्कारतो नु क्रुधः ॥९॥
अर्थ: चिरकाल से संसार में भ्रमण करते हुए इस दीन प्राणी के कौन-कौन माता पिता भाई आदिक नहीं हुए? अर्थात् सर्व हो चुके इसलिए यदि कोई प्राणी किसी जीव को मारे तो समझना चाहिए कि उसने अपने कुटुम्बी को ही मारा तथा अपनी आत्मा का भी उसने घात किया क्योंकि यह नियम है जो मनुष्य किसी दीन प्राणी को एकबार मारता है उस समय उस मरे हुए जीव के क्रोधादि की उत्पत्ति होती है तथा जन्मान्तर में उसका संस्कार बैठा रहता है इसलिए जिस समय कारण पाकर उस मृत प्राणी का संस्कार प्रकट हो जाता है उस समय वह हिंसक को (अर्थात् पूर्वभव में अपने मारने वाले जीव को) अनेक बार मारता है इसलिए ऐसे दुष्ट हिंसक के लिए धिक्कार हो।
त्रैलोक्यप्रभुभावतोऽपि सरुजोऽप्येकं निजं जीवितं,
प्रेयस्तेन विना स कस्य भवितेत्याकांक्षतः प्राणिनः।
निःशेषव्रतशीलनिर्मलगुणाधारात्ततो निश्चितं,
जन्तोर्जीवितदानतस्त्रिभुवने सर्वप्रदानं लघु ॥१०॥
अर्थ: यदि किसी दरिद्री से भी यह बात कही जावे कि भाई तू अपने प्राण दे दे तथा तीन लोक की संपदा ले ले तब वह यही कहता है कि मैं ही मर जाऊँगा तो उस संपदा को कौन भोगेगा। अतः तीन लोक की संपदा से भी प्राणियों को अपने प्राण प्यारे हैं। इसलिए समस्त व्रत तथा शीलादि निर्मल गुणों का स्थानभूत जो यह प्राणी का जीवित दान है उसकी अपेक्षा संसार में सर्व दान छोटे हैं यह बात भलीभाँति निश्चित है।
स्वर्गायाऽव्रतिनोऽपि सार्द्रमनसः, श्रेयस्करी केवला,
सर्वप्राणिदया तया तु रहितः, पापस्तपस्थोऽपि च१।
तद्दानं बहु दीयतां तपसि वा, चेतः स्थिरं धीयतां,
ध्यानञ्च२ क्रियतां जना न सफलं, किञ्चिद्दयावर्जितम् ॥११॥
अर्थ: चाहे मनुष्य अव्रती व्रतरहित क्यों न होवे यदि उसका चित्त समस्त प्राणियों के प्राणों को किसी प्रकार दुख न पहुँचाना रूप दया से भीगा हुआ है तो समझना चाहिए कि उस पुरुष को वह दया स्वर्ग तथा मोक्ष रूप कल्याण को देने वाली है किन्तु यदि किसी पुरुष के हृदय में दया का अंश न हो तो चाहे वह कैसा भी तपस्वी क्यों न होवे तथा वह चाहे इच्छानुसार ही दान क्यों न देता हो अथवा वह कितना भी तप में चित्त को क्यों न स्थिर करता हो तथा वह कैसा भी ध्यानी क्यों न हो पापी ही समझा जाता है क्योंकि दया रहित कोई भी कार्य सफल नहीं होता।
सन्तः सर्वसुरासुरेन्द्रमहितं, मुक्तेः परं कारणं,
रत्नानां दधति त्रयं त्रिभुवन, प्रद्योति काये सति।
वृत्तिस्तस्य यदन्नतः परमया, भक्त्यार्पिताज्जायते
तेषां सद्गृहमेधिनां गुणवतां, धर्मो न कस्य प्रियः॥१२॥
अर्थ: जिस सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी रत्नत्रय की समस्त सुरेन्द्र तथा असुरेन्द्र भक्ति से पूजन करते हैं तथा जो मोक्ष का उत्कृष्ट कारण है अर्थात् जिसके बिना कदापि मुक्ति नहीं हो सकती तथा जो तीन लोक का प्रकाश करने वाला है ऐसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूप रत्नत्रय को देह की स्थिरता रहते हुए ही मुनिगण धारण करते हैं तथा श्रद्धा-तुष्टि आदि गुणों से संयुक्त गृहस्थियों के द्वारा भक्ति से दिये हुए दान से उन उत्तम मुनियों के शरीर की स्थिति रहती है इसलिए ऐसे गृहस्थों का धर्म किसको प्रिय नहीं है अर्थात् सब ही उसको प्रिय मानते हैं।
आराध्यन्ते जिनेन्द्रा गुरुषु च विनतिर्धार्मिकैः प्रीतिरुच्चैः,
पात्रेभ्यो दानमापन्निहतजनकृते तच्चकारुण्यबुद्ध्या।
तत्त्वाभ्यासःस्वकीयव्रतरतिरमलं दर्शनं यत्र पूज्यं
तद्गार्हस्थ्यं बुधानामितरदिह पुनर्दुःखदो मोहपाशः॥१३॥
अर्थ: तथा जिस गृहस्थाश्रम में जिनेन्द्र भगवान् की पूजा उपासना की जाती है तथा निर्ग्रन्थ गुरुओं की भक्ति, सेवा आदि की जाती है और जिस गृहस्थाश्रम में धर्मात्मा पुरुषों का परस्पर में स्नेह से बर्ताव होता है तथा मुनि आदि उत्तमादि पात्रों को दान दिया जाता है तथा दुखी दरिद्रियों को जिस गृहस्थाश्रम में करुणा से दान दिया जाता है और जहाँ पर निरन्तर जीवादि तत्त्वों का अभ्यास होता रहता है तथा अपने-अपने व्रतों में प्रीति रहती है और जिस गृहस्थाश्रम में निर्मल सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है वह गृहस्थाश्रम विद्वानों के द्वारा पूजनीय होता है किन्तु उससे विपरीत इस संसार में केवल दुख का देने वाला है तथा मोह का जाल है।
आदौ दर्शनमुन्नतं व्रतमितः सामायिकं प्रोषध-
स्त्यागश्चैव सचित्तवस्तुनि दिवाभुक्तं तथा ब्रह्म च।
नारम्भो न परिग्रहोऽननुमतिर्निर्दिष्टमेकादश
स्थानानीति गृहिव्रते व्यसनितात्यागस्तदाद्यः स्मृतः ॥१४॥
अर्थ: सबसे पहले १. जीवादि पदार्थों में शंकादि दोष रहित श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन का जिसमें धारण होवे उसको दर्शन प्रतिमा कहते हैं। २. अहिंसादि पाँच अणुव्रत तथा दिग्व्रतादि तीन गुणव्रत और देशावकाशिकादि चार शिक्षाव्रत इस प्रकार जिसमें बारह व्रत धारण किये जावे वह दूसरी व्रत प्रतिमा कहलाती है। ३. तीनों कालों में समता धारण करना सामायिक प्रतिमा है और ४. अष्टमी आदि चारों पर्वों में आरम्भ रहित उपवास करना चौथी प्रोषध प्रतिमा है। ५. जिस प्रतिमा में सचित्त वस्तुओं का भोग न किया जाये उसको सचित्तत्याग नामक पाँचवीं प्रतिमा कहते हैं। ६. जिस प्रतिमा के धारण करने में रात्रिभोजन का सर्वथा निषेध किया गया है उसको रात्रिभुक्तित्याग प्रतिमा कहते हैं। ७. जिस प्रतिमा के धारण करने से आजन्म स्वस्त्री तथा परस्त्री दोनों का त्याग करना पड़ता है वह ब्रह्मचर्य नामक सातवीं प्रतिमा है। ८. किसी प्रकार धनादि का उपार्जन न करना आरम्भत्याग नामक आठवीं प्रतिमा है। ९. जिस प्रतिमा के धारण करते समय धन-धान्य, दासी-दासादि का त्याग किया जाता है वह नवमी परिग्रहत्याग नामक प्रतिमा है। १०. घर के कामों में और व्यापार में (ऐसा करना चाहिए, ऐसा नहीं करना चाहिए) इत्यादि अनुमति का न देना अनुमतित्याग नामक दशमी प्रतिमा है। ११. ग्यारहवीं प्रतिमा उसको कहते हैं कि जहाँ पर अपने उद्देश्य से भोजन न किया गया हो ऐसे गृहस्थों के घर में मौन सहित भिक्षापूर्वक आहार करना इस प्रकार ये ग्यारह व्रत (प्रतिमा) श्रावकों के हैं, इन सब व्रतों में भी प्रथम सप्त व्यसनों का त्याग अवश्य कर देना चाहिए क्योंकि व्यसनों के त्याग किये बिना एक भी प्रतिमा धारण नहीं की जा सकती।
यत्रोक्तं प्रतिमाभिराभिरभितो विस्तारिभिःसूरिभिः
ज्ञातव्यं तदुपासकाध्ययनतो गेहिव्रतं विस्तरात्।
तत्रापि व्यसनोज्झनं यदि तदप्यासूच्यतेऽत्रैव यत्
तन्मूलः सकलः सतां व्रतविधिर्याति प्रतिष्ठां पराम्॥१५॥
अर्थ: समन्तभद्र आदि बड़े-बड़े आचार्यों ने ग्यारह प्रतिमा तथा और भी गृहस्थों के व्रत अत्यन्त विस्तार के साथ अपने-अपने ग्रन्थों में वर्णन किये हैं इसलिए उपासकाध्ययन से इनका स्वरूप विस्तार से जानना चाहिए और उन्हीं आचार्यों ने जुआ खेलना, मद्य पीना, मांस खाना आदि सातों व्यसनों का भलीभाँति स्वरूप दिखाकर उनके त्याग की अच्छी तरह विधि बतलायी है तथा इस ग्रन्थ में भी उन सप्त व्यसनों के त्याग का वर्णन किया जायेगा क्योंकि सप्त व्यसनों के त्याग से ही सज्जनों की व्रत विधि अत्यन्त प्रतिष्ठा को प्राप्त करती है बिना व्यसनों के त्याग के नहीं।
द्यूतमांससुरावेश्याखेटचौर्यपराङ्गनाः ।
महापापानि सप्तेति व्यसनानि त्यजेद् बुधः ॥१६॥
अर्थ: १. जुआ खेलना, २. मांस खाना, ३. मद्य पीना, ४. वेश्या के साथ उपभोग करना, ५. शिकार खेलना, ६. चोरी करना, ७. परस्त्री का सेवन करना-ये सात व्यसनों के नाम हैं तथा विद्वानों को इन व्यसनों का त्याग अवश्य करना चाहिए।
भुवनमिदमकीर्तेश्चौर्यवेश्यादिसर्वव्यसनपतिरशेषापन्निधिः पापबीजम् ।
विषमनरकमार्गेष्वग्रयायीति मत्वा क इह विशदबुद्धिर्द्यूतमङ्गीकरोति ॥१७॥
अर्थ: जो समस्त अपकीर्तियों का घर है अर्थात् जिसके खेलने से संसार में अपकीर्ति ही फैलती है तथा जो चोरी वेश्यागमन आदि बचे हुए व्यसनों का स्वामी है (अर्थात् जिस प्रकार राजा के आधीन मंत्री आदि हुआ करते हैं उसी प्रकार जुआ के आधीन समस्त बचे हुए व्यसन हैं) और जो समस्त आपत्तियों का घर है तथा जिसके सम्बन्ध से निरंतर पाप की ही उत्पत्ति होती रहती है तथा जो समस्त नरकादि खोटी गतियों का मार्ग बतलाने वाला है ऐसे सर्वथा निकृष्ट जुआ नामक व्यसन को कौन बुद्धिमान् अंगीकार कर सकता है? अर्थात् कोई नहीं।
क्वाकीर्तिः क्व दरिद्रता क्व विपदः क्व क्रोधलोभादयः
चौर्यादिव्यसनं क्व च क्व नरके दुःखं मृतानां नृणाम्।
चेतश्चेदुरुमोहतो न रमते द्यूते वदन्त्युन्नत-
प्रज्ञा यद्भुवि दुर्नयेषु निखिलेष्वेतद्धुरि स्मर्यते॥१८॥
अर्थ: इस जुआ के विषय में बड़े-बड़े गणधरादिकों का यह कथन है कि मोह के उदय में मनुष्य की जुआ में प्रवृत्ति होती है यदि मनुष्य के मोह के उपशम होने से जुआ में प्रवृत्ति न होवे तो कदापि संसार में इसकी अपकीर्ति नहीं फैल सकती है और न यह दरिद्री बन सकता है तथा न इसको किसी प्रकार की विपत्ति घेर सकती है और इस मनुष्य के क्रोध-लोभादि की भी उत्पत्ति कदापि नहीं हो सकती तथा चोरी आदि व्यसन भी इसका कुछ नहीं कर सकते और मरने पर यह नरकादि गतियों की वेदना का भी अनुभव नहीं कर सकता क्योंकि समस्त व्यसनों में जुआ ही मुख्य कहा गया है इसलिए सज्जनों को इस जुआ से अपनी प्रवृत्ति को अवश्य हटा लेना चाहिए।
बीभत्सु प्राणिघातोद्भवमशुचि कृमिस्थानमश्लाघ्यमूलं
हस्तेनाक्ष्णापि शक्यं यदिह न महतां स्पृष्टुमालोकितुं च।
तन्मांसं भक्ष्यमेतद्वचनमपि सतां गर्हितं यस्य साक्षात्
पापं तस्यात्र पुंसो भुवि भवति कियत् का गतिर्वा न विद्मः॥१९॥
अर्थ: देखते ही जो मनुष्यों को प्रबल घृणा का उत्पन्न करने वाला है तथा जिसकी उत्पत्ति दीन प्राणियों के मारने पर होती है और जो अपवित्र है तथा नाना प्रकार के दृष्टिगोचर जीवों का जो स्थान है और जिसकी समस्त सज्जन पुरुष निन्दा करते हैं तथा जिसको इस संसार में सज्जन पुरुष न हाथ से ही छू सकते हैं और न आँख से ही देख सकते हैं और ‘‘मांस खाने योग्य होता है’’ यह वचन भी सज्जनों को प्रबल घृणा का उत्पन्न करने वाला है ऐसे सर्वथा अपावन मांस को जो साक्षात् खाता है आचार्य कहते हैं हम नहीं जान सकते उस मनुष्य के कितने पापों का संसार में संचय होता है! तथा उसकी कौन-सी गति होती है!।
गतो १ज्ञातेः कश्चिद्बहिरपि न यद्येति सहसा
शिरो हत्वा हत्वा कलुषितमना रोदिति जनः।
परेषामुत्कृत्य प्रकटितमुखं खादति पलं
कले रे निर्विण्णा वयमिहभवच्चित्रचरितैः ॥२०॥
अर्थ: यदि कोई अपना भाई, पिता, पुत्र आदि दैव योग से (मरना तो दूर रहे) बाहर भी चला जावे तथा वह जल्दी लौट कर न आवे तो मनुष्य शिर कूट-कूट कर रोता है तथा मन में नाना प्रकार के बुरे भावों का चिंतन करता है किन्तु अपने कुटुम्बियों से भिन्न दूसरे जीवों के मांस को उपाट-उपाट कर खाता है तथा लेशमात्र भी लज्जा नहीं करता है इसलिए आचार्य कहते हैं कि अरे कलिकाल! तेरे नाना प्रकार के चरित्रों से हम सर्वथा विरक्त हैं अर्थात् तेरे चरित्रों का हमको पता नहीं लग सकता।
सकलपुरुषधर्मभ्रंशकार्यत्र जन्मन्यधिकमधिकमग्रे यत्परं दुःख हेतुः।
तदपि यदि न मद्यं त्यज्यते बुद्धिमद्भिः स्वहितमिह किमन्यत्कर्म धर्माय कार्यम् ॥२१॥
अर्थ: यह मदिरा इस जन्म में समस्त पीने वाले प्राणियों के धर्म को मूल से खोने वाली है तथा परलोक में अत्यन्त तीव्र नाना प्रकार के नरकों के दुखों की देने वाली है ऐसा होने पर भी यदि विद्वान् मद पीना न छोड़ें तो समझ लेना चाहिए कि उन मनुष्यों के द्वारा अपने हितकारी धर्म के लिए कोई भी उत्कृष्ट कार्य नहीं बन सका क्योंकि व्यसनी कुछ भी उत्तम कार्य नहीं कर सकते।
आस्तामेतद्यदिह जननीं बल्लभां मन्यमाना
निन्द्याश्चेष्टा विदधति जना निस्त्रपाः पीतमद्याः।
तत्राधिक्यं पथि निपतिता यत्किरत्सारमेयाद्-
वक्त्रे मूत्रं मधुरमधुरं भाषमाणाः पिबन्ति ॥२२॥
अर्थ: आचार्य कहते हैं कि मदिरा के पीने वाले मनुष्य यदि निर्लज्ज होकर अपनी माता को स्त्री मानें तथा उसके साथ नाना प्रकार की खोटी चेष्टा करें तो यह बात तो कुछ बात नहीं किन्तु सब से अधिक बात यह है कि मद्य के नशे में आकर जब मार्ग में गिर जाते हैं तथा जिस समय उनके मुख में कुत्ते मूतते हैं उसको मिष्ट-मिष्ट कहते हुए तत्काल गटक जाते हैं।
याः खादन्ति पलं पिबन्ति च सुरां जल्पन्ति मिथ्यावचः
स्निह्यन्ति द्रविणार्थमेव विदधत्यर्थप्रतिष्ठाक्षतिम्।
नीचानामपि दूरवक्रमनसः पापात्मिकाः कुर्वते
लालापानमहर्निशं न नरकं वेश्यां विहायापरम् ॥२३॥
अर्थ: जो सदा मांस खाती हैं तथा जो निरन्तर मद्यपान करती हैं और जिनको झूठ बोलने में अंशमात्र भी संकोच नहीं होता तथा जिनका स्नेह विषयी मनुष्यों के साथ केवल धन के लिए है और जो द्रव्य तथा प्रतिष्ठा को मूल से उड़ाने वाली हैं अर्थात् वेश्या के साथ संयोग करने से धन तथा प्रतिष्ठा दोनों किनारा कर जाते हैं तथा जिनके चित्त में सदा छल-कपट दगाबाजी ही रहती है और जो अत्यन्त पापिनी हैं तथा जो धन के लोभ से अत्यन्त नीच धीवर, चाण्डाल आदि की लार का भी निरन्तर पान करती हैं ऐसी वेश्याओं से दूसरा नरक संसार में है! यह बात सर्वथा झूठ है।
रजकशिलासदृशीभिः कुक्कुरकर्परसमानचरिताभिः ।
गणिकाभिर्यदि सङ्गः कृतमिह परलोकवार्ताभिः ॥२४॥
अर्थ: जो वेश्या धोबी की कपड़े पछीटने की शिला के समान है अर्थात् जिस प्रकार शिला पर समस्त प्रकार के कपड़े लाकर पछीटे जाते हैं उसी प्रकार इस वेश्या के साथ भी समस्त निकृष्ट से निकृष्ट जाति के मनुष्य आकर रमण करते हैं अथवा दूसरा इसका आशय यह भी है कि जिस प्रकार शिला पर समस्त प्रकार के कपड़ों के मैल का संचय होता है उसी प्रकार वेश्यारूपी शिला पर भी नाना जातियों के मनुष्य के वीर्यरूपी मैल का समूह इकट्ठा होता है तथा जो वेश्या कुत्तों के लिए कपाल के समान हैं अर्थात् जिस प्रकार मरे हुए मनुष्य के कपाल पर लड़ते लड़ाते नानाप्रकार के कुत्ते इकट्ठे होते हैं उसी प्रकार इस वेश्या पर भी नाना जातियों के मनुष्य आकर टूटते हैं तथा नाना प्रकार के परस्पर में कलह करते हैं इसलिए ऐसी निकृष्ट वेश्याओं के साथ यदि कोई पुरुष सम्बन्ध करे तो समझ लेना चाहिए कि उसका परलोक नष्ट हो चुका।
या दुर्देहैकवित्ता वनमधिवसति त्रातृसम्बन्धहीना
भीतिर्यस्याः स्वभावादशनधृततृणा नापराधं करोति।
वध्यालं सापि यस्मिन्ननुमृगवनितामांसपिण्डस्य लोभात्
आखेटेऽस्मिन् रतानामिह किमु न किमन्यत्र नो यद्विरूपम्॥२५॥
अर्थ: जिस बेचारी मृगी के सिवाय देह के दूसरा कोई धन नहीं है तथा जो सदा वन में ही भ्रमण करती रहती है और जिसका कोई भी रक्षा करने वाला नहीं है तथा जिसको स्वभाव से ही भय लगता है तथा जो केवल तृण को ही खाने वाली है और किसी का जो लेशमात्र भी अपराध नहीं करती ऐसी भी दीन मृगी को केवल मांस टुकड़े के लोभी तथा शिकार के प्रेमी, जो दुष्ट पुरुष बिना कारण मारते हैं उनको इस लोक में तथा परलोक में नाना प्रकार के विरुद्ध कार्यों का सामना करना पड़ता है अर्थात् इसलोक में तो वे दुष्ट पुरुष रोग शोक आदि दुखों का अनुभव करते हैं तथा परलोक में उनको नरक जाना पड़ता है।
तनुरपि यदि लग्ना कीटिका स्याच्छरीरे
भवति तरलचक्षुर्व्याकुलो यः स लोकः।
कथमिह मृगयाप्तानन्दमुत्खातशस्त्रो
मृगमकृतविकारं ज्ञातदुःखोऽपि हन्ति ॥२६॥
अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि जो मनुष्य शरीर से किसी प्रकार कीड़ी आदि के सम्बन्ध हो जाने से ही अधीर होकर जहाँ तहाँ देखने लग जाता है (अर्थात् उसको वह चींटी आदि का सम्बन्ध ही पीड़ा का पैदा करने वाला हो जाता है) तथा जो दुख का भलीभाँति जानने वाला है वह मनुष्य भी शिकार में आनन्द मानकर निरपराध दीन मृग को हथियार उठाकर मारता है? यह बड़ा आश्चर्य है।
यो येनैव हतः स तं हि बहुशो हन्त्येव यैर्वञ्चितो
नूनं वञ्चयते स तानपि भृशं जन्मान्तरेऽप्यत्र च।
स्त्रीबालादिजनादपि स्फुटमिदं शास्त्रादपि श्रूयते
नित्यं वञ्चनहिंसनोज्झनविधौ लोकाः कुतो मुह्यत ॥२७॥
अर्थ: स्त्री बालक आदि से तथा शास्त्र से जब यह बात भलीभाँति मालूम है कि जो प्राणी इस जन्म में एकबार भी दूसरे प्राणी को मारता है वह दूसरे जन्म में उस मरे हुए प्राणी से अनन्त बार मारा जाता है तथा जो मनुष्य इस जन्म में एक बार भी दूसरे प्राणी को ठगता है वह दूसरे जन्म में अनन्त बार उसी पूर्वभव में ठगे हुए प्राणी से ठगाया जाता है फिर भी हे लोक! तू दूसरे के ठगने में तथा मारने में, रात-दिन लगा रहता है यह बड़े आश्चर्य की बात है इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि वे ऐसे अनर्थ के करने वाले दूसरे के मारने, ठगने में अपने चित्त को न लगावें।
अर्थादौ प्रचुरप्रपञ्चरचनैर्यै वञ्चयन्ते परान्
नूनं ते नरकं व्रजन्ति पुरतः पापव्रजादन्यतः।
प्राणाः प्राणिषु तन्निबन्धनतया तिष्ठन्ति नष्टे धने
यावान् दुःखभरो नरे न मरणे तावानिह प्रायशः ॥२८॥
अर्थ: जो दुष्ट मनुष्य नाना प्रकार के छल कपट दगाबाजी से दूसरे मनुष्यों को धन आदि के लिए ठगते हैं उनको दूसरे पापी जनों से पहले ही नरक जाना पड़ता है क्योंकि (धनं वै प्राणाः) इस नीति के अनुसार मनुष्यों के धन ही प्राण हैं, यदि किसी रीति से उनका धन नष्ट हो जावे तो उनको इतना प्रबल दुख होता है कि जितना उनको मरते समय भी नहीं होता इसलिए प्राणियों को चाहिए कि वे प्राणस्वरूप दूसरे के धन को कदापि हरण न करे तथा न हरण करने का प्रयत्न ही करे।
चिन्ताव्याकुलताभयारतिमतिभ्रंशोऽतिदाहभ्रम -
क्षुत्तृष्णाहतिरोगदुःखमरणान्येतान्यहो आस्ताम्।
यान्यत्रैव पराङ्गनाहितमतेस्तद्भूरिदुःखं चिरं
श्वभ्रे भावि यदग्निदीप्तवपुलौहाङ्गनालिङ्गनात्॥२९॥
अर्थ: जो मनुष्य परस्त्री के सेवन करने वाले हैं उनको इसी लोक में जो चिंता, व्याकुलता, भय, द्वेष, बुद्धि का भ्रष्टपना, शरीर का दाह, भूख, प्यास, रोग, जन्म-मरण आदिक दुख होते हैं, वे कोई अधिक दुख नहीं किन्तु जिस समय उन परस्त्री सेवी मनुष्यों को नरक में जाना पड़ता है तथा वहाँ पर जब उनको परस्त्री की जगह लोहे की पुतली से आलिंगन करना पड़ता है उस समय उनको अधिक दुख होता है।
धिक् तत्पौरुषमासतामनुचितास्ता बुद्धयस्तेगुणाः
माभून्मित्रसहायसम्पदपि सा तज्जन्म यातु क्षयम्।
लोकानामिह येषु सत्सु भवति व्यामोहमुद्राङ्कितं
स्वप्नेऽपि स्थितिलङ्घनात्परधनस्त्रीषु प्रसक्तं मनः॥३०॥
अर्थ: जिन पौरुष आदि के होते हुए अपनी स्थिति को उल्लंघन कर मोह से स्वप्न में भी परस्त्री तथा पर धन में मनुष्यों का मन आसक्त हो जाये, ऐसे उस पौरुष के लिए धिक्कार हो तथा वह अनुचित बुद्धि से भी दूर रहो तथा वे गुण भी नहीं चाहिए और ऐसी मित्रों की सहायता तथा संपत्ति की भी आवश्यकता नहीं।
द्यूताद्धर्मसुतः पलादिह बको मद्याद्यदोर्नन्दनाः,
चारुः कामुकया मृगान्तकतया स ब्रह्मदत्तो नृपः।
चौर्याच्चाच्छवभूतिरन्यवनितादोषाद्दशास्यो हठात्,
एकैकव्यसनाहता इति जनाः सर्वैर्न को नश्यति ॥३१॥
अर्थ: जुआ से तो युधिष्ठिर नामक राजा राज्य से भ्रष्ट हुए, उनको नाना प्रकार के दुख उठाने पड़े, मांसभक्षण से बक नाम का राजा राज्य से भ्रष्ट हुआ, अंत में नरक गया और मद्य पीने से यदुवंशी राजा के पुत्र नष्ट हुए, वेश्या व्यसन के सेवन से चारुदत्त सेठ दरिद्रावस्था को प्राप्त हुए, और भी नाना प्रकार के दुखों का उनको सामना करना पड़ा और शिकार की लोलुपता से ब्रह्मदत्त नाम का राजा राज्य से भ्रष्ट हुआ, उसे नरक जाना पड़ा, चोरी व्यसन से सत्यघोष नामक पुरोहित को गोबर खाना, सर्व धनहरण हो जाना आदि नाना प्रकार के दुखों को सहनकर अंत में मल्ल की मुष्टि से मरकर नरक को गया, परस्त्री सेवन से रावण को अनेक दुख भोगने पड़े तथा मरकर नरक गया। आचार्य कहते हैं कि एक-एक व्यसन के सेवन से जब इन मनुष्यों की ऐसी बुरी दशा हुई, ये नष्ट हुए तब जो मनुष्य सातों व्यसनों का सेवन करने वाला है वह क्यों नहीं नष्ट होगा? इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि वे किसी भी व्यसन के फंदे में न पड़े।
न परमियति१ भवति२ व्यसनान्यपराण्यपि प्रभूतानि।
त्यक्त्वा सत्यमपथप्रवृत्तयः क्षुद्रबुद्धीनाम् ॥३२॥
अर्थ: आचार्य महाराज और भी उपदेश देते हैं कि जिन व्यसनों का ऊपर कथन किया गया है वे ही व्यसन हैं ऐसा नहीं समझना चाहिए किन्तु और भी व्यसन हैं वे यही हैं अल्पबुद्धि मिथ्यादृष्टियों की श्रेष्ठ मार्ग को छोड़कर निकृष्ट मार्ग में प्रवृत्ति हो जाना इसलिए जीवों को चाहिए कि वे व्यसनों की रक्षा के लिए निकृष्ट मार्गों में प्रवृत्ति न करें।
सर्वाणि व्यसनानि दुर्गतिपथाः स्वर्गापवर्गार्गलाः
वज्राणि व्रतपर्वतेषु विषमाः संसारिणां शत्रवः।
प्रारम्भे मधुरेषु पाककटुकेष्वेतेषु सद्धीधनैः
कर्तव्या न मतिर्मनागपि हितं वाञ्छद्भिरात्मनः॥३३॥
अर्थ: जिन मनुष्यों की बुद्धि निर्मल है तथा जो अपनी आत्मा का हित चाहते हैं उनको कदापि व्यसनों की ओर नहीं झुकना चाहिए क्योंकि ये समस्त व्यसन दुर्गति को ले जाने वाले हैं तथा स्वर्ग मोक्ष के प्रतिबंधक हैं और समस्त व्रतों के नाश करने वाले हैं। प्राणियों के ये परम शत्रु हैं। प्रारम्भ में मधुर होने पर भी अंत में कटुक हैं इसलिए इनसे स्वप्न में भी हित की आशा नहीं होती।
मिथ्यादृशां विसदृशां च पथच्युतानां मायाविनां व्यसनिनां च खलात्मनां च।
सङ्गं विमुञ्चत बुधाः कुरुतोत्तमानां गन्तुं मतिर्यदि समुन्नतमार्ग एव ॥३४॥
अर्थ: हे भव्य जीवो! यदि तुम उत्तम मार्ग में जाना चाहते हो तो तुम कदापि मिथ्यादृष्टि, विपरीत बुद्धि, मार्ग भ्रष्ट, छली, व्यसनी और दुष्ट जीवों के साथ सम्बन्ध मत करो यदि तुमको सम्बन्ध ही करना है तो उत्तम मनुष्यों के साथ ही सम्बन्ध करो।
स्निग्धैरपि व्रजत मा सह सङ्गमेभिः क्षुद्रैः कदाचिदपि पश्यत सर्षपाणाम्।
स्नेहोऽपि सङ्गतिकृतः खलताश्रितानां लोकस्य पातयति निश्चितमश्रु नेत्रात् ॥३५॥
अर्थ: यह नियम है कि दुष्ट पुरुष जब अपना काम निकालना चाहते हैं तब मीठे वचनों से ही निकालते हैं किन्तु आचार्य इस बात का उपदेश देते हैं कि दुष्ट पुरुष चाहे जैसे सरल तथा मिष्टवादी क्यों न हो तो भी उनके साथ कदापि सज्जनों को सम्बन्ध नहीं करना चाहिए क्योंकि इस बात को प्रत्यक्ष देखो कि जब सरसों खलरूप में परिणत हो जाती है उस समय उससे निकला हुआ तेल आँखों में लगाते ही मनुष्यों को अश्रुपात करा देता है।
कलावेकः साधुर्भवति कथमप्यत्र भवने
स चाघातः क्षुद्रैः कथमकरुणैर्जीवति चिरम्।
अतिग्रीष्मे शुष्यत्सरसि विचरच्चञ्चुचरतां
वकोटानामग्रे तरलशफरी गच्छति कियत् ॥३६॥
अर्थ: जिस समय ग्रीष्म ऋतु में तालाबों का पानी सूख जाता है उस समय पानी के अभाव से ही बेचारी मछलियाँ मर जाती हैं, यदि दैवयोग से दश पाँच बची भी रहें तो लंबी चोंचों के धारी बगुले उनको बात ही बात में घटक जाते हैं इसलिए ग्रीष्मऋतु में मछलियों का नाम निशान दृष्टिगोचर नहीं होता उसी प्रकार प्रथम तो इस कलिकाल में सज्जन उत्पन्न ही नहीं होते यदि दैवयोग से एक दो उत्पन्न भी होते हैं तो दया रहित दुष्ट पुरुषों के फंदे में फँसकर अधिक समय तक जी नहीं पाते इसलिए इस कलिकाल में प्रायः सज्जनों का अभाव सा ही है।
इह वरमनुभूतं भूरि दारिद्र्य दुःखं वरमतिविकराले कालवक्त्रे प्रवेशः।
भवतु वरमितोऽपि क्लेशजालं विशालं न च खलजनयोगाज्जीवितं वा धनं वा ॥३७॥
अर्थ: आचार्य कहते हैं कि संसार में दरिद्रता का दुख भोगना अच्छा है अथवा मर जाना अच्छा है वा और भी सांसारिक नाना प्रकार की पीड़ाओं का सहन करना उत्तम है किन्तु दुष्टजन के सम्बन्ध से जीना तथा दुष्टजन के साथ धन कमाना उत्तम नहीं।
मुनिधर्म का कथन
आचारो दशधर्मसंयमतपोमूलोत्तराख्या गुणाः
मिथ्यामोहमदोज्झनं शमदमध्यानाप्रमादस्थितिः।
वैराग्यं समयोपबृंहणगुणा रत्नत्रयं निर्मलं,
पर्यन्ते च समाधिरक्षयपदानन्दाय धर्मो यतेः॥३८॥
अर्थ: जिस धर्म में दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपाचार, वीर्याचार इस प्रकार पाँच प्रकार के आचार तथा उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य तथा उत्तम ब्रह्मचर्य इस प्रकार का दश धर्म तथा बारह प्रकार का संयम तथा बारह प्रकार का तप और आठ प्रकार के मूलगुण तथा चौरासी लाख उत्तरगुण तथा मिथ्यात्व, मोह, मद का त्याग और शम-दम, ध्यान तथा प्रमाद रहित स्थिति और वैराग्य तथा जिनशासन की महिमा के बढ़ाने वाले अनेक गुण और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र स्वरूप निर्मल रत्नत्रय तथा अंत में समाधि विद्यमान है ऐसा मुनियों का धर्म अक्षयपद आनन्द के लिए है।
स्वं शुद्धं प्रविहाय चिद्गुणमयंभ्रान्त्याणुमात्रेऽपि यत्,
सम्बन्धाय मतिः परे भवति तद् बंधाय मूढात्मनः।
तस्मात्त्याज्यमशेषमेव महतामेतच्छरीरादिकं,
तत्कालादि विनादियुक्तित इदं तत्त्यागकर्मव्रतम् ॥३९॥
अर्थ: अपने शुद्ध चैतन्य को छोड़कर परमाणुमात्र पर पदार्थों में भी चैतन्य गुण के भ्रम से यदि मूढ़ पुरुषों की बुद्धि लग जावे तो उस बुद्धि से केवल कर्मबंध ही होता है इसलिए सज्जन पुरुषों को शरीर आदि के समस्त पदार्थों का अवश्य त्याग कर देना चाहिए। यदि आयु कर्म के प्रबल होने से शरीरादि का त्याग न हो सके तो शरीरादि के त्याग करने के लिए मुनिव्रत ही धारण करने योग्य है क्योंकि मुनिव्रत धारण करना ही शरीर आदि के त्याग की क्रिया है।
मुक्त्वा मूलगुणान्यतेर्विदधतः शेषेषु यत्नं परं,
दण्डो मूलहरो भवत्यविरतं पूजादिकं वाञ्छतः।
एकं प्राप्तमरेः प्रहारमतुलं हित्वा शिरश्छेदकं,
रक्षत्यङ्गुलिकोटिखण्डनकरं कोऽन्यो रणे बुद्धिमान् ॥४०॥
अर्थ: युद्ध करते समय अनेक प्रकार के प्रहार होते हैं उनमें कई एक तो शिर के छेदने वाले होते हैं तथा कई एक अंगुलि के अग्रभाग के छेदने वाले होते हैं उनमें यदि कोई पुरुष शिर के छेदने वाले प्रहार को छोड़कर अंगुली के अग्रभाग को छेदन करने वाले प्रहार से रक्षा करे तो उसका जिस प्रकार उससे रक्षा करना व्यर्थ है उसी प्रकार जो यति मूलगुणों को छोड़कर शेष उत्तर गुणों के पालन करने के लिए प्रयत्न करते हैं तथा निरंतर पूजा आदि को चाहते हैं उनको आचार्य मूलछेदक दण्ड देते हैं इसलिए मुनियों को प्रथम मूलगुणव्रत पालना चाहिए पीछे उत्तरगुणों का पालन करना चाहिए।
म्लाने क्षालनतः कुतः कृतजलाद्यारम्भतः संयमो,
नष्टे व्याकुलचित्तताथ महतामप्यन्यतः प्रार्थनम्।
कौपीनेऽपि हृते परैश्च झटिति क्रोधः समुत्पद्यते,
तन्नित्यं शुचि रागहृच्छमवतां वस्त्रं ककुम्मण्डलम् ॥४१॥
अर्थ: यदि संयमी वस्त्र रक्खे तो उसके मलिन होने पर धोने के लिए जल आदि का उनको आरम्भ करना पड़ेगा और यदि जल आदि का आरम्भ करना पड़ा तो उनका संयम ही कहाँ रहा तथा यदि वह वस्त्र नष्ट हो गया तब उनके चित्त में व्याकुलता होगी तथा उसके लिए यदि वे किसी से प्रार्थना करेंगे तो उनकी अयाचक वृत्ति छूट जायेगी और वस्त्रों को छोड़कर यदि वे कौपीन (लंगोट) ही रक्खे तो भी उसके खो जाने पर उनको क्रोध पैदा होगा इसलिए समस्त वस्त्रों का त्यागकर मुनिगणों के नित्य पवित्र राग का नाशक दिशा का मंडल ही वस्त्र है, ऐसा समझना चाहिए।
काकिन्या अपि संग्रहो न विहितः क्षौरं यया कार्यते,
चित्तक्षेपकृदस्त्रमात्रमपि वा तत्सिद्धये नाश्रितम्।
हिंसाहेतुरहो जटाद्यपि तथा यूकाभिरप्रार्थनैः,
वैराग्यादिविवर्धनाय यतिभिः केशेषु लोचः कृतः॥४२॥
अर्थ: मुनिगण अपने पास एक कौड़ी भी नहीं रखते जिससे कि वे दूसरे से मुंडन करा सकें तथा मुंडन के लिए छुरा, कैंची आदि अस्त्र भी नहीं रखते क्योंकि उनके रखने से क्रोधादि की उत्पत्ति से चित्त बिगड़ता है तथा वे जटा भी नहीं रख सकते क्योंकि जटाओं में अनेक जूं आदि जीवों की उत्पत्ति होती है इसलिए जटा रखने से हिंसा होती है तथा मुंडन कराने के लिए वे दूसरे से द्रव्य भी नहीं माँग सकते क्योंकि उनकी अयाचक वृत्ति का परिहार होता है इसलिए वैराग्य की अतिशय वृद्धि के लिए ही मुनिगण अपने हाथों से केशों को उपाटते हैं, इसमें अन्य कोई मानादि कारण नहीं है।
यावन्मे स्थितिभोजनेऽस्ति दृढता पाण्योश्च संयोजने,
भुञ्जे तावदहं रहाम्यथ विधावेषा प्रतिज्ञा यतेः।
कायेऽप्यस्पृहचेतसोऽन्यविधिषु प्रोल्लासिनःसन्मतेः,
न ह्येतेन दिवि स्थितिर्न नरके सम्पद्यते तद्विना ॥४३॥
अर्थ: जो मुनिगण अपने शरीर में भी ममत्व कर रहित हैं तथा समाधिमरण करने में उत्साही हैं तथा श्रेष्ठ ज्ञान के धारक हैं उनकी विधि में यह कड़ी प्रतिज्ञा रहती है कि जब तक हमारी खड़े होकर आहार लेने में तथा दोनों हाथों को जोड़ने में शक्ति मौजूद है तब तक हम भोजन करेंगे, नहीं तो कदापि न करेंगे जिससे उनको स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा उनको नरक नहीं जाना पड़ता किन्तु जो इस प्रतिज्ञा से रहित हैं उनको अवश्य नरक जाना पड़ता है।
एकस्यापि ममत्वमात्मवपुषः स्यात्संसृतेः कारणं,
का बाह्यार्थकथा प्रथीयसि तपस्याराध्यमानेऽपि च।
तद्वास्यां हरिचंदनेऽपि च समःसंश्लिष्टतोऽप्यङ्गतो,
भिन्नं स्वं स्वयमेकमात्मनि धृतं पश्यत्यजस्रं मुनिः ॥४४॥
अर्थ: विस्तीर्ण तप के आराधन करने पर भी यदि एक अपने शरीर में भी “यह मेरा है” ऐसा ममत्व हो जावे तो वह ममत्व ही संसार में परिभ्रमण का कारण हो जाता है तब यदि शरीर से अतिरिक्त धन-धान्य में ममता की जावेगी तो वह ममता क्या न करेगी? ऐसा जानकर तथा चाहे कोई उनके शरीर में कुल्हाड़ी मारे, चाहे उनके शरीर में चन्दन का लेप करे तो भी कुल्हाड़ी और चंदन में सम होकर मुनिगण क्षीर-नीर के समान आत्मा, शरीर का सम्बन्ध होने पर भी अपने में, अपने से, अपने को निरंतर भिन्न ही देखते हैं।
तृणं वा रत्नं वा रिपुरथ परं मित्रमथवा,
सुखं वा दुःखं वा पितृवनमदो१ सौधमथवा।
स्तुतिर्वा निन्दा वा मरणमथवा जीवितमथ,
स्फुटं निर्ग्रन्थानां द्वयमपि समं शान्तमनसाम् ॥४५॥
अर्थ: तथा उन शान्त रस के लोलुपी मुनियों के तृण तथा रत्न, मित्र और शत्रु, सुख तथा दुख, श्मशान भूमि और राजमन्दिर, स्तुति तथा निन्दा, मरण और जीवित दोनों समान है।
वयमिह निजयूथभ्रष्टसारङ्गकल्पाः परपरिचयभीताः क्वापि किंचिच्चरामः।
विजन२मधिवसामो न व्रजामः प्रमादं ३सुकृतमनुभवामो यत्र तत्रोपविष्टाः ॥४६॥
अर्थ: जिस प्रकार मृग अपने समूह से जुदा होकर तथा दूसरों से भयभीत होकर जहाँ तहाँ विचरता फिरता है तथा एकान्त में रहता है तथा प्रतिसमय प्रतिबुद्ध रहता है और जहाँ तहाँ बैठकर आनन्द भोगता है उसी प्रकार हमारे लिए भी वह कौन-सा दिन आयेगा जिस दिन हम अपने कुटुम्बियों से जुदे होकर तथा फिर उन से परिचय न हो जाये इससे भयभीत होकर हम भी यहाँ वहाँ विचरेंगे तथा एकान्तवास में रहेंगे और प्रमादी न बनेंगे तथा जहाँ-तहाँ बैठकर अपने आत्मानंद का अनुभव करेंगे।
कति न कति न वारान् भूपतिर्भूरिभूतिः,
कति न कति न वारानत्र जातोऽस्मि कीटः।
नियतमिति न कस्याप्यस्ति सौख्यं न दुःखं,
जगति तरलरूपे किं मुदा किं शुचा वा ॥४७॥
अर्थ: इस संसार में कितनी-कितनी बार तो हम बड़ी-बड़ी संपत्ति के धारी राजा न हो गये तथा कितनी-कितनी बार इसी संसार में हम क्षुद्र कीड़े न हो चुके इसलिए यही मालूम होता है कि चंचलरूप इस संसार में किसी का सुख तथा दुख निश्चित नहीं है अतः सुख और दुख के होने पर हर्ष और विषाद कदापि नहीं करना चाहिए।
प्रतिक्षणमिदं हृदि स्थितमतिप्रशान्तात्मनो,
मुनेर्भवति संवरः परमशुद्धिहेतुर्ध्रुवम्।
रजःखलु पुरातनं गलति नो नवं ढौकते,
ततोऽपि निकटं भवेदमृतधाम दुःखोज्झितम् ॥४८॥
अर्थ: परम शांत मुद्रा के धारी मुनियों के इस प्रकार उपर्युक्त भावना करने से परम शुद्धि का करने वाला संवर होता है तथा उसके होते हुए जो कुछ प्राचीन कर्म आत्मा के साथ लगे रहते हैं तब गल जाते हैं तथा नवीन कर्मों का आगमन भी बंद हो जाता है तथा उन मुनियों के लिए समस्त प्रकार के दुखों से रहित मुक्ति भी सर्वथा समीप हो जाती है।
प्रबोधो नीरन्ध्रं प्रवहणममन्दं पृथुतपः,
सुवायुर्यैः प्राप्तो गुरुगणसहायाः प्रणयिनः।
कियन्मात्रस्तेषां भवजलधिरेषोऽस्य च परः,
कियद्दूरे पारः स्फुरति महतामुद्यमयुताम् ॥४९॥
अर्थ: जिन मुनियों के पास छिद्ररहित सम्यग्ज्ञानरूपी जहाज मौजूद है तथा अमन्द विस्तीर्ण तपरूपी पवन भी जिनके पास है तथा स्नेही बड़े-बड़े गुरु भी जिनके सहायी हैं उन उद्यमी महात्मा मुनियों के लिए यह संसाररूपी समुद्र कुछ भी नहीं है तथा इस संसाररूपी समुद्र का पार भी उनके समीप में ही है।
अभ्यस्यतान्तरदृशं किमु लोकभक्त्या,
मोहं कृशीकुरुत किं वपुषा कृशेन।
एतद्द्वयं यदि न किं बहुभिर्नियोगैः,
क्लेशैश्च किं किमपरैः प्रचुरैस्तपोभिः ॥५०॥
अर्थ: भो मुनिगण! आनन्दस्वरूप शुद्धात्मा का अनुभव करो, लोक के रिझाने के लिए प्रयत्न मत करो तथा मोह को कृश करो, शरीर के कृश करने में कुछ भी नहीं रखा है क्योंकि जब तक तुम इन दो बातों को न करोगे तब तक तुम्हारा यम, नियम करना भी व्यर्थ है तथा तुम्हारा क्लेश सहना भी बिना प्रयोजन का है और तुम्हारे, नाना प्रकार के, किये हुए तप भी व्यर्थ हैं।
जुगुप्सते संसृतिमत्र मायया तितिक्षते प्राप्तपरीषहानपि।
न चेन्मुनिर्दुष्टकषायनिग्रहाच्चिकित्सति स्वान्तमघप्रशान्तये ॥५१॥
अर्थ: जो मुनि सर्वथा आत्मा के अहित करने वाले दुष्ट कषायों को जीतकर पापों के नाश के लिए अपने चित्त को स्वस्थ बनाना नहीं चाहता वह मुनि समस्त लोक के सामने कपट से संसार की निन्दा करता है तथा कपट से ही वह क्षुधा, तृषा आदि बाईस परीषहों को सहन करता है।
हिंसा प्राणिषु कल्मषं भवति सा प्रारम्भतः सोऽर्थतः,
तस्मादेव भयादयोऽपि नितरां दीर्घा ततः संसृतिः।
तत्रासातमशेषमर्थत इदं मत्वेति यस्त्यक्तवान्,
मुक्त्यर्थी पुनरर्थमाश्रितवता तेनाहतः सत्पथः ॥५२॥
अर्थ: प्राणियों को मारने से पाप होता है तथा वह पाप आरंभ से होता है और वह आरंभ धन से होता है तथा धन के होते ही लोभ आदि की उत्पत्ति होती है और लोभ आदि के होने से दीर्घ संसार होता है तथा संसार से अनन्त दुख होते हैं इस प्रकार से सब बातें द्रव्य से होती हैं इस बात को जानकर मोक्ष के अभिलाषी मुनियों ने द्रव्य का त्याग कर दिया है किन्तु जिसने धन को आश्रयण किया है उसने सच्चे मार्ग का नाश ही कर दिया है ऐसा समझना चाहिए।
दुर्ध्यानार्थमवद्यकारणमहो निर्ग्रन्थताहानये,
शय्याहेतु तृणाद्यपि प्रशमिनां लज्जाकरं स्वीकृतम्।
यत्तत्किं न गृहस्थयोग्यमपरं स्वर्णादिकं साम्प्रतं,
निर्ग्रन्थेष्वपि चैतदस्ति नितरां प्रायः प्रविष्टः कलिः ॥५३॥
अर्थ: आचार्य कहते हैं निर्ग्रन्थ मुनि शय्या के कारण यदि घास आदि को भी स्वीकार कर लें तो वह स्वीकार भी उनके खोटे ध्यान के लिए होता है तथा निन्दा का करने वाला और निर्ग्रन्थता में हानि पहुँचाने वाला होता है तथा लज्जा को करने वाला भी होता है तब वे निर्ग्रन्थ यतीश्वर गृहस्थ के योग्य सुवर्ण आदि को कब रख सकते हैं? यदि इस काल में निर्ग्रन्थ सुवर्ण आदि को रखें तो समझना चाहिए कि यह कलिकाल का ही माहात्म्य है।
कादाचित्को बंधः क्रोधादेः कर्मणः सदा सङ्गात्।
नातः क्वापि कदाचित्परिग्रहग्रहवतां सिद्धिः ॥५४॥
अर्थ: और भी आचार्य कहते हैं कि क्रोधादि कर्मों के द्वारा तो प्राणियों के कर्मों का बंध कभी-कभी ही होता है किन्तु परिग्रह से प्रतिक्षण बंध होता रहता है अतएव परिग्रहधारियों को किसी काल में तथा किसी प्रदेश में भी सिद्धि नहीं होती । इसलिए भव्य जीवों को कदापि धनधान्य से ममता नहीं रखनी चाहिए।
मोक्षेऽपि मोहादभिलाषदोषो विशेषतो मोक्षनिषेधकारी।
यतस्ततोऽध्यात्मरतो मुमुक्षुर्भवेत्किमत्र कृताभिलाषः ॥५५॥
अर्थ: स्त्री-पुत्र आदि की अभिलाषा का करना तो दूर रहा यदि मोक्ष के लिए भी अभिलाषा की जावे तो वह दोषस्वरूप समझी जाती है इसलिए वह मोक्ष की निषेध करने वाली होती है। इसीलिए जो मुनि अपनी आत्मा के रस में लीन हैं तथा मोक्ष के अभिलाषी हैं वे स्त्री पुत्र आदि में कब अभिलाषा कर सकते हैं।
परिग्रहवतां शिवं यदि तदानलः शीतलो,
यदीन्द्रियसुखं सुखं तदिह कालकूटः सुधा।
स्थिरा१ यदि तनुस्तदा स्थिरतरं तडिच्चाम्बरे२,
भवेऽत्र रमणीयता यदि तदिन्द्रजालेऽपि च ॥५६॥
अर्थ: यदि परिग्रहधारियों को भी मुक्ति कही जावेगी तो अग्नि को भी शीतल कहना पड़ेगा तथा यदि इन्द्रियों से पैदा हुए सुख को भी सुख कहोगे तो विष को भी अमृत मानना पड़ेगा और यदि शरीर को स्थिर कहोगे तो आकाश में बिजली को भी स्थिर कहना पड़ेगा तथा संसार में रमणीयता कहोगे तो इन्द्रजाल में भी रमणीयता कहनी पड़ेगी। इसलिए इस बात को मानो कि जिस प्रकार अग्नि शीतल नहीं होती उसी प्रकार परिग्रहधारियों को कदापि मुक्ति नहीं हो सकती और जिस प्रकार विष अमृत नहीं होता उसी प्रकार इन्द्रिय सुख भी कदापि सुख नहीं हो सकता तथा जिस प्रकार बिजली स्थिर नहीं होती उसी प्रकार यह शरीर भी स्थिर नहीं हो सकता तथा जिस प्रकार इन्द्रजाल में रमणीयता नहीं होती उसी प्रकार संसार में भी रमणीयता नहीं हो सकती।
स्मरमपि हृदि येषां ध्यानवन्हिप्रदीप्ते,
सकलभुवनमल्लं दह्यमानं विलोक्य।
कृतभिय इव नष्टास्ते कषाया न तस्मिन्,
पुनरपि हि समीयुः साधवस्ते जयन्ति ॥५७॥
अर्थ: वे यतीश्वर सदा इस लोक में जयवंत हैं जिन यतीश्वरों के हृदय में ध्यानरूपी अग्नि के जाज्वल्यमान होने पर तीनों लोक के जीतने वाले कामदेवरूपी प्रबल योद्धा को जलते हुए देखकर भय से ही मानों भाग गये तथा ऐसे भागे कि फिर न आ सके।
अनर्घ्यरत्नत्रयसम्पदोऽपि निर्ग्रंथतायाः पदमद्वितीयम्।
अपि प्रशान्ताः स्मरवैरिवध्वाः वैधव्यदास्ते गुरवो नमस्याः ॥५८॥
अर्थ: अमूल्य रत्नत्रयरूपी संपत्ति के धारी होकर भी जो निर्ग्रंथ पद के धारक हैं तथा शान्त मुद्रा के धारी होने पर भी जो कामदेव रूपी बैरी की स्त्री को विधवा करने वाले हैं ऐसे वे उत्तम गुरु सदा नमस्कार करने योग्य हैं।
आचार्य परमेष्ठी की स्तुति
ये स्वाचारमपारसौख्यसुतरोर्बीजं परं पञ्चधा
सद्बोधाः स्वयमाचरन्ति च परानाचारयन्त्येव च।
ग्रंथग्रंथिविमुक्तमुक्तिपदवीं प्राप्ताश्च यैः प्रापिताः
ते रत्नत्रयधारिणः शिवसुखं कुर्वन्तु नः सूरयः ॥५९॥
अर्थ: जो सद्ज्ञान के धारक आचार्य अपार सौख्यरूपी वृक्ष उसको उत्पन्न करने वाले पाँच प्रकार के आचार को स्वयं आचरण करते हैं तथा दूसरों को आचरण कराते हैं तथा जहाँ पर किसी प्रकार के परिग्रह का लेश नहीं ऐसी मुक्ति को स्वयं जाते हैं और दूसरों को पहुँचाते हैं इसलिए इस प्रकार निर्मल रत्नत्रय के धारी आचार्यवर हमारे लिए मोक्षसुख को प्रदान करें।
भ्रान्तिप्रदेशु बहुवर्त्मसु जन्मकक्षे पन्थानमेकममृतस्य परं नयन्ति।
ये लोकमुन्नतधियः प्रणमामि तेभ्यस्तेनाप्यहं जिगमिषुर्गुरुनायकेभ्यः ॥६०॥
अर्थ: इस संसार में भ्रम को उत्पन्न करने वाले अनेक मार्गों में से जो गुरु लोक को सुख के देने वाले एक मोक्षमार्ग को ले जाते हैं तथा स्वयं उच्च ज्ञान के धारक हैं ऐसे उन श्रेष्ठ गुरुओं को उसी मार्ग में जाने की इच्छा करने वाला मैं भी मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।
उपाध्याय परमेष्ठी की स्तुति
शिष्याणामपहाय मोहपटलं कालेन दीर्घेण य-
ज्जातं स्यात्पदलाञ्छितोज्ज्वलवचो-दिव्याञ्जनेन स्फुटम्।
ये कुर्वन्ति दृशं परामतितरां सर्वावलोके क्षमां
लोके कारणमन्तरेण १भिषजास्ते पान्तुनोऽध्यापकाः॥६१॥
अर्थ: जो उपाध्याय परमेष्ठी अनादिकाल से लगे हुए मोह के परदे को स्याद्वाद से अविरोधी ऐसे अपने उपदेशरूपी दिव्य अंजन से हटाकर शिष्यों की दृष्टि को अत्यन्त निर्मल तथा समस्त पदार्थों के देखने में समर्थ बनाते हैं ऐसे बिना कारण के ही वैद्य वे उपाध्याय मेरी इस संसार में रक्षा करें।
साधु परमेष्ठी की स्तुति
उन्मुच्यालयबंधनादपि दृढात्कायेऽपि वीतस्पृहा
श्चित्ते मोहविकल्पजालमपि यद्दुर्भेद्यमन्तस्तमः।
भेदायास्य हि साधयन्ति तदहो ज्योतिर्जितार्कप्रभं
ये सद्बोधमयं भवन्तु भवतां ते साधवः श्रेयसे॥६२॥
अर्थ: जो साधु परमेष्ठी अत्यन्त कठिन भी गृहरूपी बंधन से अपने को छुड़ाकर तथा अपने शरीर में भी इच्छारहित होकर कठिनता से भेदने योग्य ऐसे मोह से पैदा हुए विकल्पों के समूहरूप भीतरी अंधकार के नाश करने के लिए सूर्य की प्रभा को भी नीची करने वाली सम्यग्ज्ञानरूपी ज्योति को निरन्तर सिद्ध करते रहते हैं, ऐसे उन साधु परमेष्ठी के लिए नमस्कार है अर्थात् वे मेरे कल्याण के लिए होवे।
वीतराग की महिमा का वर्णन
वज्रे पतत्यपि भयद्रुतविश्वलोक,मुक्ताध्वनि प्रशमिनो न चलन्ति योगात् ।
बोधप्रदीपहृतमोहमहान्धकाराः, सम्यग्दृशः किमुत शेषपरीषहेषु ॥६३॥
अर्थ: जिस वज्र के शब्द के भय से चकित होकर समस्त लोकमार्ग को छोड़ देते हैं ऐसे वज्र के गिरने पर भी जो शान्तात्मा मुनि, ध्यान से कुछ भी विचलित नहीं होते तथा जिन्होंने सम्यग्ज्ञानरूपी दीपक से समस्त मोहान्धकार को नाश कर दिया है और जो सम्यग्दर्शन के धारी हैं वे मुनि परीषहों के जीतने में कब चलायमान हो सकते हैं? अर्थात् परीषह उनका कुछ भी नहीं कर सकते।
ग्रीष्मऋतु में पर्वत के शिखर पर ध्यानी मुनीश्वरों की स्तुति
प्रोद्यत्तिग्मकरोग्रतेजसि लसच्चण्डानिलोद्यद्दिशि
स्फारीभूतसुतप्तभूमिरजसि प्रक्षीणनद्यम्भसि ।
ग्रीष्मे ये गुरुमेदिनीध्रशिरसि ज्योतिर्निधायोरसि
ध्वान्तध्वंसकरं वसन्ति मुनयस्ते सन्तु नः श्रेयसे ॥६४॥
अर्थ: जिस ग्रीष्मऋतु में अत्यन्त तीक्ष्ण धूप पड़ती है तथा चारों दिशाओं में भयंकर लू चलती है तथा जिस ऋतु में अत्यन्त संताप को देने वाला गरम रेत फैला हुआ है तथा नदियों का पानी सूख जाता है ऐसी भयंकर ग्रीष्मऋतु में जो मुनि समस्त अन्धकार को नाश करने वाली सम्यग्ज्ञानरूपी ज्योति को अपने मन में रखकर अत्यन्त ऊँची पहाड़ी की चोटी पर निवास करते हैं उन मुनियों के लिए मेरा नमस्कार हो अर्थात् वे मुनि मेरे कल्याण के लिए होवे।
वर्षाकाल में वृक्षों के नीचे स्थित मुनियों की स्तुति
ते वः पान्तु मुमुक्षवः कृतरवैरब्दै रतिश्यामलैः
शश्वद्वारि वमद्भिरब्धिविषयक्षारत्वदोषादिव ।
काले मज्जदिले पतद्गिरिकुले धावद्धुनीसंकुले
झंझावातविसंस्थुले तरुतले तिष्ठन्ति ये साधवः॥६५॥
अर्थ: जिस वर्षाकाल में काले-काले मेघ भयंकर शब्द करते हैं, समुद्र के क्षार दोष से ही मानो जो जहाँ तहाँ जल वर्षाते हैं, जिस काल में जमीन नीचे को धसक जाती है तथा पर्वतों से बड़े-बड़े पत्थर गिरते हैं तथा जल की भरी हुई नदियाँ सब जगह दौड़ती फिरती हैं तथा जो वर्षाकाल वृष्टि सहित पवन से भयंकर हो रहा है ऐसे भयंकर वर्षाकाल में जो मोक्षाभिलाषी मुनि वृक्षों के नीचे बैठ कर तप करते हैं उन मुनियों के लिए नमस्कार है अर्थात् वे मुनि मेरी रक्षा करे।
म्लायत्कोकनदे गलत्पिकमदे भ्रश्यद् द्रुमौघच्छदे,
हर्षद्रोमदरिद्रके हिमऋतावत्यन्तदुःखप्रदे।
ये तिष्ठन्ति चतुष्पथे पृथुतपः सौधस्थिताः साधवो,
ध्यानोष्णाप्रहितोग्रशीतविधुरास्ते मे विदध्युः श्रियम् ॥६६॥
अर्थ: जिस शीतकाल में कमल कुम्हला जाते हैं तथा बन्दरों का मद गल जाता है और वृक्षों के पत्ते जल जाते हैं तथा जिस शीतकाल में वस्त्र रहित दरिद्रों के शरीर पर रोमांच खड़े हो जाते हैं और भी जो नाना प्रकार के दुखों का देने वाला है ऐसे भयंकर शीतकाल में अत्यन्त तपस्वी तथा ध्यान रूपी अग्नि से समस्त शीत को नाश करने वाले जो यतीश्वर खुले मैदान में निर्भयता से निवास करते हैं वे यतीश्वर मुझे अविनाशी लक्ष्मी प्रदान करें।
कालत्रये बहिरवस्थितजातवर्षा शीतातपप्रमुखसंघटितोग्रदुःखे।
आत्मप्रबोधविकले सकलोऽपि कायक्लेशो वृथा वृतिरितरोज्झितशालिवप्रे ॥६७॥
अर्थ: जो मुनि अपने आत्मज्ञान की कुछ भी परवाह न कर बाहर में रहकर वर्षा, शीत, गर्मी तीनों कालों में उत्पन्न हुए दुखों को सहन करते हैं उनका उस प्रकार का दुख सहना वैसा ही निरर्थक मालूम होता है जैसा कि धान्य के कट जाने पर खेत की बाढ़ लगाना निरर्थक होता है इसलिए मुनियों को आत्मज्ञान पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
सम्प्रत्यस्ति न केवली किल कलौ त्रैलोक्यचूडामणिः,
तद्वाचः परमासतेऽत्र भरतक्षेत्रे जगद्द्योतिकाः।
सद्रत्नत्रयधारिणो यतिवरास्तेषां समालंबनं,
तत्पूजा जिनवाचिपूजनमतः साक्षाज्जिनः पूजितः ॥६८॥
अर्थ: यद्यपि इस समय इस कलिकाल में तीन लोक के पूजनीय केवली भगवान् विराजमान नहीं हैं तो भी इस भरतक्षेत्र में समस्त जगत् को प्रकाश करने वाली उन केवली भगवान् की वाणी मौजूद है तथा उस वाणी के आधार श्रेष्ठ रत्नत्रय के धारी मुनि हैं इसलिए उन मुनियों की पूजन तो सरस्वती की पूजन है तथा सरस्वती की पूजन साक्षात् केवली भगवान् की पूजन है ऐसा भव्य जीवों को समझना चाहिए।
स्पृष्टा यत्र मही तदंघ्रिकमलैस्तत्रैति सत्तीर्थतां,
तेभ्यस्तेपि सुराः कृताञ्जलिपुटा नित्यं नमस्कुर्वते।
तन्नामस्मृतिमात्रतोऽपि जनता निष्कल्मषा जायते,
ये जैना यतयश्चिदात्मनिरता १ध्यानं समातन्वते ॥६९॥
अर्थ: जो यतीश्वर आत्मा में लीन होकर ध्यान करते हैं उन जैन यतीश्वरों के चरण कमलों से स्पृष्ट भूमि उत्तमतीर्थ बन जाती है तथा उन यतीश्वरों को हाथ जोड़ मस्तक नवाकर बड़े-बड़े देव आकर नमस्कार करते हैं तथा उनके स्मरण मात्र से ही जीवों के समस्त पाप गल जाते हैं इसलिए यतीश्वरों को सदा ध्यान में लीन रहना चाहिए।
सम्यग्दर्शनवृत्त२बोधनिचितः शान्तः शिवैषी मुनि-
र्मन्दैः स्यादवधीरितोऽपि विशदः साम्यं यदालम्ब्यते।
आत्मा तैर्विहतो यदत्र विषमध्वान्तश्रिते निश्चितं,
सम्पातो भवितोग्रदुःखनरके तेषामकल्याणिनाम् ॥७०॥
अर्थ: सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का धारी तथा शांत और मोक्षाभिलाषी जो मुनि दुष्टों से अपमानित होकर भी स्वच्छ अंतःकरण से समता को धारण करता है उसकी तो आत्मा शुद्ध ही होती है किन्तु जो उनकी निन्दा करने वाले हैं उन्होंने अपनी आत्मा का घात कर लिया क्योंकि वे दुष्ट कल्याण रहित पुरुष ऐसे नरक में गिरेंगे जो नरक भयंकर अंधकार से व्याप्त है तथा कठिन दुःखों का स्थान है इसलिए मुनियों को चाहिए कि दुष्ट कैसी भी निंदा करें तो भी उनको समता ही धारण करनी योग्य है।
मानुष्यं प्राप्य पुण्यात्प्रशममुपगता रोगवद्भोगजालं३,
मत्वा गत्वा वनांतं दृशि विदिचरणे ये स्थिताःसंगमुक्ताः।
कः स्तोता वाक्पथातिक्रमणपटुगुणैराश्रितानां मुनीनां,
स्तोतव्यास्तेमहद्भिर्भुवि य इह तदंघ्रिद्वयेभक्ति भाजः ॥७१॥
अर्थ: पुण्ययोग से मनुष्य भव को पाकर तथा शान्ति को प्राप्त होकर और भोगों को रोग तुल्य जानकर तथा वन में जाकर समस्त परिग्रह से रहित होकर जो यतीश्वर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र में स्थित होते हैं, वचनागोचर गुणों से सहित उन मुनियों की प्रथम तो कोई स्तुति का करने वाला ही नहीं, यदि कोई स्तुति कर सके भी तो वे ही पुरुष उनकी स्तुति कर सकते हैं जो उन मुनियों के चरण कमलों की आराधन करने वाले महात्मा पुरुष हैं।
रत्नत्रयधर्म का कथन
तत्त्वार्थाप्ततपोभृतां यतिवराः श्रद्धानमाहुर्दृशं
ज्ञानं जानदनूनमप्रतिहतं स्वार्थाविसन्देहवत्।
चारित्रं विरतिः प्रमादविलसत्कर्मास्रवाद्योगिनां
एतन्मुक्ति पथस्त्रयं च परमोधर्मो भवच्छेदकः ॥७२॥
अर्थ: गणधरादिदेव जीवादि पदार्थ तथा आप्त और गुरुओं पर श्रद्धान रखने को सम्यग्दर्शन कहते हैं तथा जिसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं है तथा जो संशयरहित तथा पूर्ण है ऐसे ज्ञान को सम्यग्ज्ञान कहते हैं तथा प्रमाद सहित कर्मों के आगमन के रुक जाने को सम्यक्चारित्र कहते हैं तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र ही मुक्ति का मार्ग है तथा संसार को नाश करने वाला परमधर्म है।
हृदयभुवि दृगेकं बीजमुप्तं त्वशङ्काप्रभृतिगुणसदम्भः सारिणीसिक्तमुच्चैः।
भवदवगमशाखश्चारुचारित्रपुष्पस्तरुरमृतफलेन प्रीणयत्याशु भव्यम् ॥७३॥
अर्थ: आचार्य कहते हैं कि अंतःकरणरूपी पृथिवी में बोया हुआ तथा निःशंकित आदि आठ गुणरूपी उत्तम जल की भरी हुई नलियों से सींचा हुआ सम्यग्दर्शनरूपीबीज, सम्यग्ज्ञानरूपी शाखाओं का धारी तथा चारित्ररूपी पुष्प से सहित वृक्षस्वरूप में परिणत होकर शीघ्र ही भव्य जीवों को मोक्षरूपी फल से संतुष्ट करता है।
दृगवगमचरित्रालंकृतः सिद्धिपात्रं लघुरपि न गुरुः स्यादन्यथात्वे कदाचित्।
स्फुटमवगतमार्गो याति मन्दोऽपि गच्छन्नभिमतपदमन्यो नैव तूर्णोऽपि जन्तुः ॥७४॥
अर्थ: जिसको मार्ग मालूम है ऐसा मनुष्य यदि धीरे-धीरे चले तो भी जिस प्रकार अभिमत स्थान पर पहुँच जाता है किन्तु जिसको मार्ग कुछ भी नहीं मालूम है वह चाहे कितनी भी जल्दी चले तो भी वह अपने अभिमत स्थान पर नहीं पहुँच सकता। उसी प्रकार जो मुनि तप आदि का तो बहुत थोड़ा करने वाला है किन्तु सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का धारी है वह शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त हो जाता है किन्तु जो तप आदि का तो बहुत करने वाला है परन्तु सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रय का धारी नहीं है, वह कितना भी प्रयत्न करे तो भी मोक्ष को नहीं पा सकता इसलिए मोक्षाभिलाषियों को सम्यग्दर्शनादि की सबसे अधिक महिमा समझनी चाहिए।
वनशिखिनि मृतोऽन्धः सञ्चरन्बाढमंघ्रिद्वितयविकलमूर्ति र्वीक्षमाणोऽपि खञ्जः।
अपि सनयनपादोऽश्रद्दधानश्च तस्माद्दृगवगमचरित्रैः संयुतैरैव सिद्धिः ॥७५॥
अर्थ: वन में अग्नि लगने पर उस वन में रहने वाला अंधा तो देख न सका इसलिए दौड़ता हुआ भी मर गया तथा दोनों चरणों का लूला लगी हुई अग्नि को देखता हुआ दौड़ न सकने के कारण तत्काल भस्म हो गया और आँख तथा पैर सहित भी आलसी इसलिए मर गया कि उसको अग्नि लगने का श्रद्धान ही नहीं हुआ। इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि केवल सम्यग्दर्शन तथा केवल सम्यग्ज्ञान और केवल सम्यक्चारित्र मोक्ष के लिए कारण नहीं हैं किन्तु तीनों मिले हुए ही हैं।
बहुभिरपि किमन्यैः प्रस्तरैः रत्नसंज्ञैर्वपुषिजनितखेदैर्भारकारित्वयोगात् ।
हतदुरिततमोभिश्चारुरत्नै रनर्घ्यै स्त्रिभिरपि कुरुतात्मालंकृतिं दर्शनाद्यैः ॥७६॥
अर्थ: संसार में यद्यपि रत्न संज्ञा बहुत से पत्थरों की भी है किन्तु उनसे कुछ भी प्रयोजन नहीं क्योंकि वे केवल भारकारी होने के कारण शरीर को खिन्न करने वाले ही हैं इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि हे मुनीश्वरों! जो समस्त अंधकार के नाश करने वाले हैं तथा अमूल्य और मनोहर हैं ऐसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी तीन रत्नों से ही अपनी आत्मा को शोभित करो ये ही वास्तविक रत्न है।
जयति सुखनिधानं मोक्षवृक्षकबीजं, सकलमलविमुक्तं दर्शनं यद्विना स्यात् ।
मतिरपि कुमतिर्नु दुश्चरित्रं चरित्रं भवति मनुजजन्म प्राप्तमप्राप्तमेव ॥७७॥
अर्थ: जिस सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान मिथ्याज्ञान कहलाता है, चरित्र मिथ्याचरित्र कहलाता है प्राप्त हुआ भी मनुष्य जन्म न पाया हुआ सा कहलाता है। ऐसा सुखस्वरूप तथा मोक्ष रूपी सुख का देने वाला और निर्मल सम्यग्दर्शनरूपी रत्न सदा इस लोक में जयवंत है।
भवभुजगनागदमनी दुःखमहादावशमनजलवृष्टिः।
मुक्ति - सुखामृतसरसी जयति दृगादित्रयी सम्यक् ॥७८॥
अर्थ: संसाररूपी सर्प को नाश करने में नागदमनी तथा दुःखरूपी दावानल के बुझाने के लिए जलवृष्टि और मोक्षरूपी सुखामृत की सरोवरी (तालाब) ऐसी समीचीन रत्नत्रयी सदा इस लोक में जयवंत है।
वचनविरचितैवोत्पद्यते भेदबुद्धिर्दृगवगमचरित्राण्यात्मनः स्वं स्वरूपम्।
अनुपचरितमेतच्चेतनैकस्वभावं व्रजति विषयभावं योगिनां योगदृष्टेः ॥७९॥
अर्थ: व्यवहारनय की अपेक्षा से ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र जुदे-जुदे मालूम पड़ते हैं, निश्चयनय की अपेक्षा से इनमें किसी प्रकार का भेद नहीं है किन्तु ये तीनों आत्मस्वरूप ही हैं तथा समस्त लोकालोक को देखने वाले केवली भगवान् वास्तविक रीति से इन तीनों को चैतन्य से अभिन्न स्वरूप ही देखते हैं।
निरूप्य तत्त्वं स्थिरतामुपागता मतिः सतां शुद्धनयावलम्बिनी।
अखण्डमेकं विशदं चिदात्मकं निरन्तरं पश्यति तत्परं महः ॥८०॥
अर्थ: जीवाजीवादि समस्त तत्त्वों को देखकर जिन सज्जनों की मति स्थिर हो गई है तथा शुद्धनय को आश्रयण करने वाली हो गई है वे ही मनुष्य निर्मल तथा उत्कृष्ट चित्स्वरूप ज्योति को देखते हैं।
दृष्टिर्निर्णीतिरात्माह्ययविशदमहस्यत्र बोधः प्रबोधः
शुद्धं चारित्रमत्र स्थितिरिति युगपद्बंधविध्वंसकारि।
बाह्यं बाह्यार्थमेव त्रितयमपि तथा स्याच्छुभोवाऽशुभोवा
बंधः संसारमेवं श्रुतनिपुणधियः साधवस्तं वदन्ति॥८१॥
अर्थ: आत्मारूपी निर्मल तेज में निश्चय (विश्वास) करना तो निश्चयसम्यग्दर्शन है तथा उसी तेज में जानपना निश्चयज्ञान है तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञानस्वरूप में स्थित रहना सम्यक्चारित्र है और इन तीनों की एकता कर्मबंध के नाश करने वाली है तथा इस निश्चयरत्नत्रय से जो बाह्य है सो बाह्य ही है और चाहे वह शुभ हो, चाहे अशुभ हो बंध का ही कारण है तथा बंध का कारण होने से संसार का भी कारण है ऐसा श्रुतज्ञान के पारंगत आचार्य कहते हैं। इसलिये भव्यजीवों को निश्चयरत्नत्रय के ही लिये प्रयत्न करना चाहिए तथा व्यवहाररत्नत्रय को भी सर्वथा न छोड़कर निश्चयरत्नत्रय का साधक समझना चाहिए।
दशलक्षणधर्म का कथन
जडजनकृतबाधाक्रोधहासाप्रियादावपि सति न विकारं यन्मनो याति साधोः।
अमलविपुल१चित्तेरुत्तमा सा क्षमादौ शिवपथपथिकानां तत्सहायत्वमेति ॥८२॥
अर्थ: मूर्खजनों से किए हुए बंधन हास्य आदि के होने पर तथा कठोर वचनों के बोलने पर जो साधु अपने निर्मल धीर-वीर चित्त से विकृत नहीं होता उसी का नाम उत्तमक्षमा है तथा वह उत्तमक्षमा मोक्षमार्ग को जाने वाले मुनियों को सबसे प्रथम सहायता करने वाली है।
श्रामण्यपुण्यतरुरत्र२ गुणौघशाखापत्रप्रसूननिचितोऽपि फलान्यदत्त्वा।
याति क्षयं क्षणात एव घनोग्रकोपदावानलात् त्यजत तं यतयोऽतिदूरम् ॥८३॥
अर्थ: आचार्य कहते हैं कि गुणरूपी जो शाखा पत्र-फूल से सहित ऐसा यह यतिरूपी वृक्ष है यदि इसमें भयंकर क्रोधरूपी दावानल प्रवेश कर जावे तो यह किसी प्रकार फल न देकर बात ही बात में नष्ट हो जाता है इसलिए यतीश्वरों को चाहिए कि क्रोध आदि को वे दूर से ही छोड़ देवें।
तिष्ठामो वयमुज्ज्वलेन मनसा रागादिदोषोज्झिता,
लोकः किञ्चिदपि स्वकीयहृदये स्वच्छन्दचरो मन्यताम्।
साध्या शुद्धिरिहात्मनः शमवतामत्रापरेण द्विषा,
मित्रेणापि किमु स्वचेष्टितफलं स्वार्थः स्वयं लप्स्यते ॥८४॥
अर्थ: रागद्वेषादि से रहित होकर हम तो अपने उज्ज्वल चित्त से रहेंगे। स्वेच्छाचारी यह लोक अपने हृदय में चाहे हमको भला बुरा कैसा भी मानो क्योंकि सभी पुरुषों को अपने आत्मा की शुद्धि करनी चाहिए और इस लोक में बैरी अथवा मित्रों से हमको क्या है? अर्थात् वे हमारा कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि जो हमारे साथ द्वेषरूप तथा प्रीतिरूप परिणाम करेगा उसका फल उसको अपने आप मिल जायेगा।
दोषानाघुष्य लोके मम भवतु सुखी दुर्जनश्चेद्धनार्थी
मत्सर्वस्वं गृहीत्वा रिपुरथ सहसा जीवितं स्थानमन्यः।
मध्यस्थस्त्वेवमेवाखिलमिह हि जगज्जायतां सौख्यराशि-
र्मत्तो माभूदसौख्यं कथमपि भविनः कस्यचित्पूत्करोमि ॥८५॥
अर्थ: मेरे दोषों को सबके सामने प्रकट कर संसार में दुर्जन सुखी होवे तथा धन का अर्थी मेरे समस्त धन आदि को ग्रहण कर सुखी होवे तथा बैरी मेरे जीवन को लेकर सुखी होवे और जिनको मेरे स्थान के लेने की अभिलाषा है, वे स्थान लेकर आनन्द से रहें तथा जो रागद्वेष रहित मध्यस्थ होकर रहना चाहें वे मध्यस्थ रहकर ही सुख से रहें। इस प्रकार समस्त जगत् सुख से रहो किन्तु किसी भी संसारी को मुझसे दुख न पहुँचे ऐसा मैं सबके सामने पुकार-पुकार कर कहता हूँ।
किं जानासि न वीतरागमखिलं त्रैलोक्यचूडामणिं
किं तद्धर्ममुपाश्रितं न भवता किं वा न लोको जडः।
मिथ्यादृग्भिरसज्जनैरपटुभिः किञ्चित्कृतोपद्रवात्-
यत् कमार्जनहेतुमस्थिरतया बाधां मनो मन्यसे ॥८६॥
अर्थ: मिथ्यादृष्टि दुर्जन मूर्ख जनों से किए हुए उपद्रव से चंचल होकर कर्मों के पैदा करने में कारणभूत ऐसी वेदना का तू अनुभव करता है सो क्या? हे मन तीन लोक के पूजनीक वीतरागपने को तू नहीं जानता है अथवा जिस धर्म का तूने आश्रय किया है उस धर्म को तू नहीं जानता है अथवा यह समस्त लोक अज्ञानी जड़ है इस बात का तुझे ज्ञान नहीं है।
मार्दवधर्म का वर्णन
धर्माङ्गमेतदिह मार्दवनामधेयं जात्यादिगर्वपरिहारमुशन्ति सन्तः।
तद्धार्यते किमुत बोधदृशा समस्तं स्वप्नेन्द्रजालसदृशं जगदीक्षमाणैः ॥८७॥
अर्थ: उत्तम पुरुष जाति, बल, ज्ञान, कुल आदि गर्वों के त्याग को मार्दवधर्म कहते हैं तथा यह धर्मों का अंगभूत है। इसलिए जो मनुष्य अपनी सम्यग्ज्ञानरूपी दृष्टि से समस्त जगत् को स्वप्न तथा इन्द्रजाल के तुल्य देखते हैं वे अवश्य ही इस मार्दवनामक धर्म को धारण करते हैं।
कास्था सद्मनि सुन्दरेऽपि परितो दंदह्यमानेऽग्निभिः
कायादौ तु जरादिभिः प्रतिदिनं गच्छत्यवस्थान्तरम्।
इत्यालोचयतो हृदि प्रशमिनः भास्वद्विवेकोज्ज्वले
गर्वस्यावसरः कुतोऽत्र घटते भावेषु सर्वेष्वपि ॥८८॥
अर्थ: अत्यन्त मनोहर भी है किन्तु जिसके चारों तरफ अग्नि जल रही है ऐसे घर के बचने में जिस प्रकार अंशमात्र भी आशा नहीं की जाती। उसी प्रकार जो शरीर वृद्धावस्था से सहित है तथा प्रतिदिन एक अवस्था को छोड़कर दूसरी अवस्था को धारण करता रहता है वह शरीर सदाकाल रहेगा यह कब विश्वास हो सकता है? इस प्रकार निरन्तर विवेक से अपने निर्मल हृदय में विचार करने वाले मुनि के समस्त पदार्थों में अभिमान करने के लिए अवसर ही नहीं मिल सकता इसलिए मुनियों को सदा ऐसा ही ध्यान करना चाहिए।
आर्जवधर्म का वर्णन
हृदि यत्तद्वाचि बहिः फलति तदेवार्जवं भव्यतेतत्।
धर्मो निकृतिरधर्मो द्वाविह ‘सुरसद्मनरकपथौ’ ॥८९॥
अर्थ: मन में जो बात होवे उसी को वचन से प्रकट करना (न कि मन में कुछ दूसरा होवे तथा वचन से कुछ दूसरा ही बोले) इसको आचार्य आर्जवधर्म कहते हैं तथा मीठी बात लगाकर दूसरे को ठगाना इसको अधर्म कहते हैं और इसमें आर्जवधर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा अधर्म नरक को ले जाने वाला होता है इसलिए आर्जवधर्म के पालन करने वाले भव्य जीवों को, किसी के साथ माया से बर्ताव नहीं करना चाहिए।
मायित्वं कुरुते कृतं सकृदपिच्छायाविघातं गुणे-
ष्वायातैर्यमिनोऽर्जितेष्विह गुरुक्लेशैः शमादिष्वलम्।
सर्वे तत्र यदासते विनिभृताः क्रोधादयस्तत्वत-
स्तत्पापं-बत येन दुर्गतिपथे जीवश्चिरं भ्राम्यति॥९०॥
अर्थ: आचार्य कहते हैं कि यदि एक बार भी किसी के साथ मायाचारी की जावे तो वह मायाचारी बड़ी कठिनता से संचय किए हुए अहिंसा, सत्यादि मुनियों के गुणों को फीका बना देती है अर्थात् वे गुण आदरणीय नहीं रहते और उस मायारूपी मकान में नाना प्रकार के क्रोधादि शत्रु छिपे बैठे रहते हैं और उस मायाचार से उत्पन्न हुए पाप से जीव नानाप्रकार के दुर्गति के पथ में भ्रमण करता रहता है इसलिए मुनियों को माया अपने पास नहीं फटकने देना चाहिए।
सत्यधर्म का वर्णन
स्वपरहितमेव मुनिभिर्मितममृतसमं सदैव सत्यं च।
वक्तव्यं वचनमथ प्रविधेयं धीधनैर्मौनम् ॥९१॥
अर्थ: उत्कृष्ट ज्ञान के धारण करने वाले मुनियों को प्रथम तो बोलना ही नहीं चाहिए। यदि बोले तो ऐसा वचन बोलना चाहिए जो समस्त प्राणियों के हित का करने वाला हो तथा परमित हो और अमृत के समान प्रिय हो तथा सर्वथा सत्य हो किन्तु जो वचन जीवों को पीड़ा देने वाला हो तथा कड़वा हो तो उस वचन की अपेक्षा मौन साधना ही अच्छा है।
सति सन्ति व्रतान्येव सूनृते वचसि स्थिते।
भवत्याराधिता सद्भिर्जगत्पूज्या च भारती ॥९२॥
अर्थ: जो मनुष्य सत्य वचन बोलने वाला है अर्थात् सत्य व्रत का पालन करने वाला है उसके समस्त व्रत विद्यमान हैं। सज्जन पुरुष तीन लोक में पूजनीय सरस्वती को भी सिद्ध कर लेता है।