पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका (आचार्य पद्मनन्दि), हिन्दी अनुवाद सहित | Padmanandi Panchvinshatika (Acharya Padmanandi)

पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका (आचार्य पद्मनन्दि), हिन्दी अनुवाद सहित

रचयिता: आचार्य पद्मनन्दि
हिन्दी अनुवाद: पं॰ गजाधरलाल जैन
सम्पादन: पं॰ जवाहरलाल शास्त्री, भीण्डर
प्रकाशक: जैन विद्यापीठ, सागर (म॰ प्र॰)
संस्करण: २०१७ (आवृत्ति ११००)

धर्मोपदेशामृत, दानोपदेशन, अनित्यपञ्चाशत्, एकत्वसप्तति, यतिभावनाष्टक, उपासकसंस्कार, निश्चयपञ्चाशत्, ब्रह्मचर्यरक्षावर्ति, विविध स्तुतियाँ आदि अधिकारों में श्रावक और मुनि धर्म, व्यवहार-निश्चय रत्नत्रय तथा आत्मस्वरूप का विवेचन।

Padmanandi Panchvinshatika by Acharya Padmanandi: some 25 chapters on shravak and muni dharma, ratnatraya and the nature of the soul, with Hindi translation by Pt. Gajadharlal Jain.


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF):


:open_book: मूल श्लोक और श्लोक अर्थ, अधिकार अनुसार पढ़ें:

हर श्लोक अलग, उसके नीचे उसका अर्थ, इसी ग्रन्थ के PDF से ज्यों का त्यों (स्कैन से टंकित, मिलान बाकी)।

१. धर्मोपदेशामृत (भाग 1/3)

कायोत्सर्गार्यताङ्गो जयति जिनपतिर्नाभिसूनुर्महात्मा
मध्याह्ने यस्य भास्वानुपरि परिगतो राजतेऽस्मोग्रमूर्तिः
चक्रं कर्मेन्धनानामतिबहुदहतो दूरमौदास्यवात-
स्फूर्यत्सद्ध्यानवह्नेरिव रुचिरतरः प्रोद्गतो विस्फुलिङ्गः ॥१॥

अर्थ: दोपहर के समय जिस आदीश्वर भगवान् के ऊपर रहा हुआ तेजस्वी सूर्य ज्ञानावरणादि कर्मरूपी ईंधन को पल भर में भस्म करने वाली तथा वैराग्यरूपी पवन से जलायी हुई, ध्यानरूपी अग्नि से उत्पन्न हुए मनोहर फुलिंगा के समान जान पड़ता है ऐसे कायोत्सर्ग सहित विस्तीर्ण शरीर के धारी तथा अष्टकर्मों के जीतने वाले उत्तम पुरुषों के स्वामी महात्मा श्रीनाभिराजा के पुत्र श्रीऋषभदेव भगवान् सदा जयवन्त हैं।


नो किञ्चित्करकार्यमस्ति गमनप्राप्यं न किञ्चिद्दृशो-
र्दृश्यं यस्य न कर्णयोः किमपि हि श्रोतव्यमप्यस्ति न।
तेनालम्बितपाणिरुज्झितगतिर्नासाग्रदृष्टी रहः -
सम्प्राप्तोऽतिनिराकुलो विजयते ध्यानैकतानो जिनः॥२॥

अर्थ: भगवान् को हाथ से करने योग्य कोई कार्य नहीं रहा है इसलिए तो उन्होंने हाथों को नीचे लटका दिया है तथा जाने के लायक कोई स्थान नहीं रहा है इसलिए वे निश्चल खड़े हुए हैं और देखने योग्य कोई पदार्थ नहीं रहा है इसलिए भगवान् ने नाक के ऊपर अपनी दृष्टि दे रखी है तथा एकान्तवास इसलिए किया है कि भगवान् को पास में रहकर कोई बात सुनने के लिए नहीं रही है इसलिए इस प्रकार अत्यन्त निराकुल तथा ध्यानरस में लीन भगवान् सदा लोक में जयवन्त हैं।


रागो यस्य न विद्यते क्वचिदपि प्रध्वस्तमोहग्रहा-
दस्त्रादेः परिवर्जनान्न च बुधैर्द्वेषोऽपि सम्भाव्यते।
तस्मात्साम्यमथात्मबोधनमतो जातः क्षयः कर्मणा-
मानन्दादिगुणाश्रयस्तु नियतं सोऽर्हन् सदा पातु वः॥३॥

अर्थ: मोह तथा परिग्रह के नाश हो जाने के कारण न तो किसी पदार्थ में जिस अर्हंत का राग ही प्रतीत होता है तथा अर्हंत भगवान् ने समस्त शस्त्र आदि को छोड़ दिया है इसलिए विद्वानों को किसी में जिस अर्हंत का द्वेष भी देखने में नहीं आता तथा द्वेष के न रहने के कारण जो शान्तस्वभावी है तथा शान्तस्वभावी होने के ही कारण जिस अर्हंत ने अपनी आत्मा को जान लिया है तथा आत्मा का ज्ञाता होने के कारण जो अर्हंत कर्मों से रहित है तथा कर्मों से रहित होने के ही कारण जो आनन्द आदि गुणों का आश्रय है ऐसे अर्हंत भगवान् मेरी सदा रक्षा करें अर्थात् ऐसे अर्हंत भगवान् का मैं सदा सेवक हूँ।


इन्द्रस्य प्रणतस्य शेखरशिखारत्नार्कभासानख-
श्रेणीतेक्षणबिम्बशुम्भदलिभृद्भूरोल्लसत्पाटलम् ।
श्रीसङ्गादङ्घ्रियुगं जिनस्य दधदप्यम्भोजसाम्यं रज-
स्त्यक्तं जाड्यहरं परं भवतु नश्चेतोऽर्पितं शर्मणे ॥४॥

अर्थ: जिस प्रकार कमलों पर भ्रमर गुंजार करते हैं उसी प्रकार भगवान् के चरण कमलों को बड़े-बड़े इन्द्र आकर नमस्कार करते हैं तथा उनके मुकुट के अग्रभाग में लगे हुए जो रत्न उनकी प्रभा सहित भगवान् के चरणों के नखों में उन इन्द्रों के नेत्रों के प्रतिबिम्ब पड़ते हैं इसलिए भगवान् के चरणों पर भी इन्द्रों के नेत्ररूपी भौंरे निवास करते हैं तथा जिस प्रकार कमल कुछ सफेदी लिए लाल होते हैं उस ही प्रकार भगवान् के चरण कमल भी कुछ सफेदी लिए हुए लालवर्ण हैं तथा जिस प्रकार कमलों में लक्ष्मी रहती है उस ही प्रकार भगवान् के चरण कमल भी लक्ष्मी के स्थान हैं अर्थात् चरण कमलों के आराधन करने से भव्य जीवों को उत्तम मोक्षरूपी लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इसलिए यद्यपि कमल तथा भगवान् के चरणकमल इन गुणों से समान हैं तथापि कमल धूलि सहित है तथा जड़ हैं और भगवान् के चरणकमल धूलि (पाप) रहित हैं तथा जड़ता के दूर करने वाले हैं अतः कमलों से भी उत्कृष्ट भगवान् के चरणकमल सदा मेरे मन में स्थित रहें तथा कल्याण करें।


जयति जगदधीशः शान्तिनाथो यदीयं स्मृतमपि हि जनानां पापतापोपशान्त्यै ।
विबुधकुलकिरीटप्रस्फुरन्नीलरत्न द्युतिचलमधुपालीचुम्बितं पादपद्मम् ॥५॥

अर्थ: नाना प्रकार के देवताओं के मुकुट, उनमें लगी हुई नीलमणि उनकी जो प्रभा वही चलती हुई भ्रमरों की पंक्ति से सहित जिस शान्तिनाथ भगवान् के चरणकमल स्मरण किए हुए समस्त जनों के पाप तथा संताप को दूर कर देते हैं ऐसे वे तीनलोक के स्वामी श्रीशांतिनाथ भगवान् सदा जयवंत रहें।


स जयति जिनदेवो सर्वविद्विश्वनाथोऽवितथवचनहेतुक्रोधलोभादिमुक्तः ।
शिवपुरपथपांथप्राणिपाथेयमुच्चैर्जनितपरमशर्मा येन धर्मोऽभ्यधायि ॥६॥

अर्थ: सबके जानने वाले तथा तीनलोक के स्वामी और क्रोध-लोभादि से रहित इसीलिए सत्य वचन के बोलने वाले श्रीजिनदेव सदा जयवंत हैं, जिन श्रीजिनदेव ने मोक्षमार्ग को गमन करने वाले प्राणियों को पाथेय (टोसा) स्वरूप तथा उत्तम कल्याण के करने वाले उत्कृष्ट धर्म का निरूपण किया है।


धर्मो जीवदया गृहस्थशमिनो,र्भेदाद्द्विधा च त्रयं,
रत्नानां परमं तथा दशविधोत्कृष्टक्षमादिस्ततः।
मोहोद्भूतविकल्पजालरहिता, वागङ्गसङ्गेज्झिता,
शुद्धानन्दमयात्मनः परिणतिर्धर्माख्यया गीयते ॥७॥

अर्थ: समस्त जीवों पर दया करना इसी का नाम धर्म है अथवा एकदेश गृहस्थ का धर्म तथा सर्वदेश मुनियों का धर्म इस प्रकार उस धर्म के दो ही भेद हैं अथवा उत्कृष्ट रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र) ही धर्म है अथवा उत्तमक्षमा-मार्दव-आर्जव आदिक दश प्रकार भी धर्म है अथवा मोह से उत्पन्न हुए समस्त विकल्पों से रहित तथा जिसको वचन से निरूपण नहीं कर सकते ऐसी जो शुद्ध तथा आनन्दमय आत्मा की परिणति उसी का नाम उत्कृष्ट धर्म है इस प्रकार सामान्यतया धर्म का लक्षण तथा भेद इस श्लोक में बतलाये गये हैं।


आद्या सद्‌व्रतसञ्चयस्य जननी, सौख्यस्य सत्सम्पदां,
मूलं धर्मतरोरनश्वरपदा, रोहैकनिःश्रेणिका।
कार्या सद्भिरिहाङ्गिषु प्रथमतो, नित्यं दया धार्मिकैः
धिङ्नामाऽप्यदयस्य तस्य च परं, सर्वत्र शून्या दिशः ॥८॥

अर्थ: जो समस्त उत्तम व्रतों के समूह में मुख्य है तथा सच्चे सुख और श्रेष्ठ संपदाओं को उत्पन्न करने वाली है और जो धर्मरूपी वृक्ष की जड़ है (अर्थात् जिस प्रकार जड़ बिना वृक्ष नहीं ठहरता उसी प्रकार दया, बिना धर्म के भी नहीं ठहर सकती) तथा जो मोक्षरूपी महल के अग्रभाग में चढ़ने के लिए सीढ़ी के समान है ऐसे धर्मात्मा पुरुषों को समस्त प्राणियों पर दया अवश्य करनी चाहिए किन्तु जिस पुरुष के चित्त में लेशमात्र भी दया नहीं है उस पुरुष के लिए धिक्कार है तथा समस्त दिशा उसके लिए शून्य है अर्थात् जो निर्दयी है उसका कोई भी मित्र नहीं होता।


संसारे भ्रमतश्चिरं तनुभृतः, के के न पित्रादयो,
जातास्तद्धममाश्रितेन खलु ते, सर्वे भवन्त्याहताः।
नन्वात्मापि हतो यदत्र निहतो, जन्मान्तरेषु ध्रुवं,
हन्तारं प्रतिहन्ति हन्त बहुशः, संस्कारतो नु क्रुधः ॥९॥

अर्थ: चिरकाल से संसार में भ्रमण करते हुए इस दीन प्राणी के कौन-कौन माता पिता भाई आदिक नहीं हुए? अर्थात् सर्व हो चुके इसलिए यदि कोई प्राणी किसी जीव को मारे तो समझना चाहिए कि उसने अपने कुटुम्बी को ही मारा तथा अपनी आत्मा का भी उसने घात किया क्योंकि यह नियम है जो मनुष्य किसी दीन प्राणी को एकबार मारता है उस समय उस मरे हुए जीव के क्रोधादि की उत्पत्ति होती है तथा जन्मान्तर में उसका संस्कार बैठा रहता है इसलिए जिस समय कारण पाकर उस मृत प्राणी का संस्कार प्रकट हो जाता है उस समय वह हिंसक को (अर्थात् पूर्वभव में अपने मारने वाले जीव को) अनेक बार मारता है इसलिए ऐसे दुष्ट हिंसक के लिए धिक्कार हो।


त्रैलोक्यप्रभुभावतोऽपि सरुजोऽप्येकं निजं जीवितं,
प्रेयस्तेन विना स कस्य भवितेत्याकांक्षतः प्राणिनः।
निःशेषव्रतशीलनिर्मलगुणाधारात्ततो निश्चितं,
जन्तोर्जीवितदानतस्त्रिभुवने सर्वप्रदानं लघु ॥१०॥

अर्थ: यदि किसी दरिद्री से भी यह बात कही जावे कि भाई तू अपने प्राण दे दे तथा तीन लोक की संपदा ले ले तब वह यही कहता है कि मैं ही मर जाऊँगा तो उस संपदा को कौन भोगेगा। अतः तीन लोक की संपदा से भी प्राणियों को अपने प्राण प्यारे हैं। इसलिए समस्त व्रत तथा शीलादि निर्मल गुणों का स्थानभूत जो यह प्राणी का जीवित दान है उसकी अपेक्षा संसार में सर्व दान छोटे हैं यह बात भलीभाँति निश्चित है।


स्वर्गायाऽव्रतिनोऽपि सार्द्रमनसः, श्रेयस्करी केवला,
सर्वप्राणिदया तया तु रहितः, पापस्तपस्थोऽपि च१।
तद्दानं बहु दीयतां तपसि वा, चेतः स्थिरं धीयतां,
ध्यानञ्च२ क्रियतां जना न सफलं, किञ्चिद्दयावर्जितम् ॥११॥

अर्थ: चाहे मनुष्य अव्रती व्रतरहित क्यों न होवे यदि उसका चित्त समस्त प्राणियों के प्राणों को किसी प्रकार दुख न पहुँचाना रूप दया से भीगा हुआ है तो समझना चाहिए कि उस पुरुष को वह दया स्वर्ग तथा मोक्ष रूप कल्याण को देने वाली है किन्तु यदि किसी पुरुष के हृदय में दया का अंश न हो तो चाहे वह कैसा भी तपस्वी क्यों न होवे तथा वह चाहे इच्छानुसार ही दान क्यों न देता हो अथवा वह कितना भी तप में चित्त को क्यों न स्थिर करता हो तथा वह कैसा भी ध्यानी क्यों न हो पापी ही समझा जाता है क्योंकि दया रहित कोई भी कार्य सफल नहीं होता।


सन्तः सर्वसुरासुरेन्द्रमहितं, मुक्तेः परं कारणं,
रत्नानां दधति त्रयं त्रिभुवन, प्रद्योति काये सति।
वृत्तिस्तस्य यदन्नतः परमया, भक्त्यार्पिताज्जायते
तेषां सद्गृहमेधिनां गुणवतां, धर्मो न कस्य प्रियः॥१२॥

अर्थ: जिस सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी रत्नत्रय की समस्त सुरेन्द्र तथा असुरेन्द्र भक्ति से पूजन करते हैं तथा जो मोक्ष का उत्कृष्ट कारण है अर्थात् जिसके बिना कदापि मुक्ति नहीं हो सकती तथा जो तीन लोक का प्रकाश करने वाला है ऐसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूप रत्नत्रय को देह की स्थिरता रहते हुए ही मुनिगण धारण करते हैं तथा श्रद्धा-तुष्टि आदि गुणों से संयुक्त गृहस्थियों के द्वारा भक्ति से दिये हुए दान से उन उत्तम मुनियों के शरीर की स्थिति रहती है इसलिए ऐसे गृहस्थों का धर्म किसको प्रिय नहीं है अर्थात् सब ही उसको प्रिय मानते हैं।


आराध्यन्ते जिनेन्द्रा गुरुषु च विनतिर्धार्मिकैः प्रीतिरुच्चैः,
पात्रेभ्यो दानमापन्निहतजनकृते तच्चकारुण्यबुद्ध्या।
तत्त्वाभ्यासःस्वकीयव्रतरतिरमलं दर्शनं यत्र पूज्यं
तद्गार्हस्थ्यं बुधानामितरदिह पुनर्दुःखदो मोहपाशः॥१३॥

अर्थ: तथा जिस गृहस्थाश्रम में जिनेन्द्र भगवान् की पूजा उपासना की जाती है तथा निर्ग्रन्थ गुरुओं की भक्ति, सेवा आदि की जाती है और जिस गृहस्थाश्रम में धर्मात्मा पुरुषों का परस्पर में स्नेह से बर्ताव होता है तथा मुनि आदि उत्तमादि पात्रों को दान दिया जाता है तथा दुखी दरिद्रियों को जिस गृहस्थाश्रम में करुणा से दान दिया जाता है और जहाँ पर निरन्तर जीवादि तत्त्वों का अभ्यास होता रहता है तथा अपने-अपने व्रतों में प्रीति रहती है और जिस गृहस्थाश्रम में निर्मल सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है वह गृहस्थाश्रम विद्वानों के द्वारा पूजनीय होता है किन्तु उससे विपरीत इस संसार में केवल दुख का देने वाला है तथा मोह का जाल है।


आदौ दर्शनमुन्नतं व्रतमितः सामायिकं प्रोषध-
स्त्यागश्चैव सचित्तवस्तुनि दिवाभुक्तं तथा ब्रह्म च।
नारम्भो न परिग्रहोऽननुमतिर्निर्दिष्टमेकादश
स्थानानीति गृहिव्रते व्यसनितात्यागस्तदाद्यः स्मृतः ॥१४॥

अर्थ: सबसे पहले १. जीवादि पदार्थों में शंकादि दोष रहित श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन का जिसमें धारण होवे उसको दर्शन प्रतिमा कहते हैं। २. अहिंसादि पाँच अणुव्रत तथा दिग्व्रतादि तीन गुणव्रत और देशावकाशिकादि चार शिक्षाव्रत इस प्रकार जिसमें बारह व्रत धारण किये जावे वह दूसरी व्रत प्रतिमा कहलाती है। ३. तीनों कालों में समता धारण करना सामायिक प्रतिमा है और ४. अष्टमी आदि चारों पर्वों में आरम्भ रहित उपवास करना चौथी प्रोषध प्रतिमा है। ५. जिस प्रतिमा में सचित्त वस्तुओं का भोग न किया जाये उसको सचित्तत्याग नामक पाँचवीं प्रतिमा कहते हैं। ६. जिस प्रतिमा के धारण करने में रात्रिभोजन का सर्वथा निषेध किया गया है उसको रात्रिभुक्तित्याग प्रतिमा कहते हैं। ७. जिस प्रतिमा के धारण करने से आजन्म स्वस्त्री तथा परस्त्री दोनों का त्याग करना पड़ता है वह ब्रह्मचर्य नामक सातवीं प्रतिमा है। ८. किसी प्रकार धनादि का उपार्जन न करना आरम्भत्याग नामक आठवीं प्रतिमा है। ९. जिस प्रतिमा के धारण करते समय धन-धान्य, दासी-दासादि का त्याग किया जाता है वह नवमी परिग्रहत्याग नामक प्रतिमा है। १०. घर के कामों में और व्यापार में (ऐसा करना चाहिए, ऐसा नहीं करना चाहिए) इत्यादि अनुमति का न देना अनुमतित्याग नामक दशमी प्रतिमा है। ११. ग्यारहवीं प्रतिमा उसको कहते हैं कि जहाँ पर अपने उद्देश्य से भोजन न किया गया हो ऐसे गृहस्थों के घर में मौन सहित भिक्षापूर्वक आहार करना इस प्रकार ये ग्यारह व्रत (प्रतिमा) श्रावकों के हैं, इन सब व्रतों में भी प्रथम सप्त व्यसनों का त्याग अवश्य कर देना चाहिए क्योंकि व्यसनों के त्याग किये बिना एक भी प्रतिमा धारण नहीं की जा सकती।


यत्रोक्तं प्रतिमाभिराभिरभितो विस्तारिभिःसूरिभिः
ज्ञातव्यं तदुपासकाध्ययनतो गेहिव्रतं विस्तरात्।
तत्रापि व्यसनोज्झनं यदि तदप्यासूच्यतेऽत्रैव यत्
तन्मूलः सकलः सतां व्रतविधिर्याति प्रतिष्ठां पराम्॥१५॥

अर्थ: समन्तभद्र आदि बड़े-बड़े आचार्यों ने ग्यारह प्रतिमा तथा और भी गृहस्थों के व्रत अत्यन्त विस्तार के साथ अपने-अपने ग्रन्थों में वर्णन किये हैं इसलिए उपासकाध्ययन से इनका स्वरूप विस्तार से जानना चाहिए और उन्हीं आचार्यों ने जुआ खेलना, मद्य पीना, मांस खाना आदि सातों व्यसनों का भलीभाँति स्वरूप दिखाकर उनके त्याग की अच्छी तरह विधि बतलायी है तथा इस ग्रन्थ में भी उन सप्त व्यसनों के त्याग का वर्णन किया जायेगा क्योंकि सप्त व्यसनों के त्याग से ही सज्जनों की व्रत विधि अत्यन्त प्रतिष्ठा को प्राप्त करती है बिना व्यसनों के त्याग के नहीं।


द्यूतमांससुरावेश्याखेटचौर्यपराङ्गनाः ।
महापापानि सप्तेति व्यसनानि त्यजेद् बुधः ॥१६॥

अर्थ: १. जुआ खेलना, २. मांस खाना, ३. मद्य पीना, ४. वेश्या के साथ उपभोग करना, ५. शिकार खेलना, ६. चोरी करना, ७. परस्त्री का सेवन करना-ये सात व्यसनों के नाम हैं तथा विद्वानों को इन व्यसनों का त्याग अवश्य करना चाहिए।


भुवनमिदमकीर्तेश्चौर्यवेश्यादिसर्वव्यसनपतिरशेषापन्निधिः पापबीजम् ।
विषमनरकमार्गेष्वग्रयायीति मत्वा क इह विशदबुद्धिर्द्यूतमङ्गीकरोति ॥१७॥

अर्थ: जो समस्त अपकीर्तियों का घर है अर्थात् जिसके खेलने से संसार में अपकीर्ति ही फैलती है तथा जो चोरी वेश्यागमन आदि बचे हुए व्यसनों का स्वामी है (अर्थात् जिस प्रकार राजा के आधीन मंत्री आदि हुआ करते हैं उसी प्रकार जुआ के आधीन समस्त बचे हुए व्यसन हैं) और जो समस्त आपत्तियों का घर है तथा जिसके सम्बन्ध से निरंतर पाप की ही उत्पत्ति होती रहती है तथा जो समस्त नरकादि खोटी गतियों का मार्ग बतलाने वाला है ऐसे सर्वथा निकृष्ट जुआ नामक व्यसन को कौन बुद्धिमान् अंगीकार कर सकता है? अर्थात् कोई नहीं।


क्वाकीर्तिः क्व दरिद्रता क्व विपदः क्व क्रोधलोभादयः
चौर्यादिव्यसनं क्व च क्व नरके दुःखं मृतानां नृणाम्।
चेतश्चेदुरुमोहतो न रमते द्यूते वदन्त्युन्नत-
प्रज्ञा यद्भुवि दुर्नयेषु निखिलेष्वेतद्धुरि स्मर्यते॥१८॥

अर्थ: इस जुआ के विषय में बड़े-बड़े गणधरादिकों का यह कथन है कि मोह के उदय में मनुष्य की जुआ में प्रवृत्ति होती है यदि मनुष्य के मोह के उपशम होने से जुआ में प्रवृत्ति न होवे तो कदापि संसार में इसकी अपकीर्ति नहीं फैल सकती है और न यह दरिद्री बन सकता है तथा न इसको किसी प्रकार की विपत्ति घेर सकती है और इस मनुष्य के क्रोध-लोभादि की भी उत्पत्ति कदापि नहीं हो सकती तथा चोरी आदि व्यसन भी इसका कुछ नहीं कर सकते और मरने पर यह नरकादि गतियों की वेदना का भी अनुभव नहीं कर सकता क्योंकि समस्त व्यसनों में जुआ ही मुख्य कहा गया है इसलिए सज्जनों को इस जुआ से अपनी प्रवृत्ति को अवश्य हटा लेना चाहिए।


बीभत्सु प्राणिघातोद्भवमशुचि कृमिस्थानमश्लाघ्यमूलं
हस्तेनाक्ष्णापि शक्यं यदिह न महतां स्पृष्टुमालोकितुं च।
तन्मांसं भक्ष्यमेतद्वचनमपि सतां गर्हितं यस्य साक्षात्
पापं तस्यात्र पुंसो भुवि भवति कियत् का गतिर्वा न विद्मः॥१९॥

अर्थ: देखते ही जो मनुष्यों को प्रबल घृणा का उत्पन्न करने वाला है तथा जिसकी उत्पत्ति दीन प्राणियों के मारने पर होती है और जो अपवित्र है तथा नाना प्रकार के दृष्टिगोचर जीवों का जो स्थान है और जिसकी समस्त सज्जन पुरुष निन्दा करते हैं तथा जिसको इस संसार में सज्जन पुरुष न हाथ से ही छू सकते हैं और न आँख से ही देख सकते हैं और ‘‘मांस खाने योग्य होता है’’ यह वचन भी सज्जनों को प्रबल घृणा का उत्पन्न करने वाला है ऐसे सर्वथा अपावन मांस को जो साक्षात् खाता है आचार्य कहते हैं हम नहीं जान सकते उस मनुष्य के कितने पापों का संसार में संचय होता है! तथा उसकी कौन-सी गति होती है!।


गतो १ज्ञातेः कश्चिद्बहिरपि न यद्येति सहसा
शिरो हत्वा हत्वा कलुषितमना रोदिति जनः।
परेषामुत्कृत्य प्रकटितमुखं खादति पलं
कले रे निर्विण्णा वयमिहभवच्चित्रचरितैः ॥२०॥

अर्थ: यदि कोई अपना भाई, पिता, पुत्र आदि दैव योग से (मरना तो दूर रहे) बाहर भी चला जावे तथा वह जल्दी लौट कर न आवे तो मनुष्य शिर कूट-कूट कर रोता है तथा मन में नाना प्रकार के बुरे भावों का चिंतन करता है किन्तु अपने कुटुम्बियों से भिन्न दूसरे जीवों के मांस को उपाट-उपाट कर खाता है तथा लेशमात्र भी लज्जा नहीं करता है इसलिए आचार्य कहते हैं कि अरे कलिकाल! तेरे नाना प्रकार के चरित्रों से हम सर्वथा विरक्त हैं अर्थात् तेरे चरित्रों का हमको पता नहीं लग सकता।


सकलपुरुषधर्मभ्रंशकार्यत्र जन्मन्यधिकमधिकमग्रे यत्परं दुःख हेतुः।
तदपि यदि न मद्यं त्यज्यते बुद्धिमद्भिः स्वहितमिह किमन्यत्कर्म धर्माय कार्यम् ॥२१॥

अर्थ: यह मदिरा इस जन्म में समस्त पीने वाले प्राणियों के धर्म को मूल से खोने वाली है तथा परलोक में अत्यन्त तीव्र नाना प्रकार के नरकों के दुखों की देने वाली है ऐसा होने पर भी यदि विद्वान् मद पीना न छोड़ें तो समझ लेना चाहिए कि उन मनुष्यों के द्वारा अपने हितकारी धर्म के लिए कोई भी उत्कृष्ट कार्य नहीं बन सका क्योंकि व्यसनी कुछ भी उत्तम कार्य नहीं कर सकते।


आस्तामेतद्यदिह जननीं बल्लभां मन्यमाना
निन्द्याश्चेष्टा विदधति जना निस्त्रपाः पीतमद्याः।
तत्राधिक्यं पथि निपतिता यत्किरत्सारमेयाद्-
वक्त्रे मूत्रं मधुरमधुरं भाषमाणाः पिबन्ति ॥२२॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि मदिरा के पीने वाले मनुष्य यदि निर्लज्ज होकर अपनी माता को स्त्री मानें तथा उसके साथ नाना प्रकार की खोटी चेष्टा करें तो यह बात तो कुछ बात नहीं किन्तु सब से अधिक बात यह है कि मद्य के नशे में आकर जब मार्ग में गिर जाते हैं तथा जिस समय उनके मुख में कुत्ते मूतते हैं उसको मिष्ट-मिष्ट कहते हुए तत्काल गटक जाते हैं।


याः खादन्ति पलं पिबन्ति च सुरां जल्पन्ति मिथ्यावचः
स्निह्यन्ति द्रविणार्थमेव विदधत्यर्थप्रतिष्ठाक्षतिम्।
नीचानामपि दूरवक्रमनसः पापात्मिकाः कुर्वते
लालापानमहर्निशं न नरकं वेश्यां विहायापरम् ॥२३॥

अर्थ: जो सदा मांस खाती हैं तथा जो निरन्तर मद्यपान करती हैं और जिनको झूठ बोलने में अंशमात्र भी संकोच नहीं होता तथा जिनका स्नेह विषयी मनुष्यों के साथ केवल धन के लिए है और जो द्रव्य तथा प्रतिष्ठा को मूल से उड़ाने वाली हैं अर्थात् वेश्या के साथ संयोग करने से धन तथा प्रतिष्ठा दोनों किनारा कर जाते हैं तथा जिनके चित्त में सदा छल-कपट दगाबाजी ही रहती है और जो अत्यन्त पापिनी हैं तथा जो धन के लोभ से अत्यन्त नीच धीवर, चाण्डाल आदि की लार का भी निरन्तर पान करती हैं ऐसी वेश्याओं से दूसरा नरक संसार में है! यह बात सर्वथा झूठ है।


रजकशिलासदृशीभिः कुक्कुरकर्परसमानचरिताभिः ।
गणिकाभिर्यदि सङ्गः कृतमिह परलोकवार्ताभिः ॥२४॥

अर्थ: जो वेश्या धोबी की कपड़े पछीटने की शिला के समान है अर्थात् जिस प्रकार शिला पर समस्त प्रकार के कपड़े लाकर पछीटे जाते हैं उसी प्रकार इस वेश्या के साथ भी समस्त निकृष्ट से निकृष्ट जाति के मनुष्य आकर रमण करते हैं अथवा दूसरा इसका आशय यह भी है कि जिस प्रकार शिला पर समस्त प्रकार के कपड़ों के मैल का संचय होता है उसी प्रकार वेश्यारूपी शिला पर भी नाना जातियों के मनुष्य के वीर्यरूपी मैल का समूह इकट्ठा होता है तथा जो वेश्या कुत्तों के लिए कपाल के समान हैं अर्थात् जिस प्रकार मरे हुए मनुष्य के कपाल पर लड़ते लड़ाते नानाप्रकार के कुत्ते इकट्ठे होते हैं उसी प्रकार इस वेश्या पर भी नाना जातियों के मनुष्य आकर टूटते हैं तथा नाना प्रकार के परस्पर में कलह करते हैं इसलिए ऐसी निकृष्ट वेश्याओं के साथ यदि कोई पुरुष सम्बन्ध करे तो समझ लेना चाहिए कि उसका परलोक नष्ट हो चुका।


या दुर्देहैकवित्ता वनमधिवसति त्रातृसम्बन्धहीना
भीतिर्यस्याः स्वभावादशनधृततृणा नापराधं करोति।
वध्यालं सापि यस्मिन्ननुमृगवनितामांसपिण्डस्य लोभात्
आखेटेऽस्मिन् रतानामिह किमु न किमन्यत्र नो यद्विरूपम्॥२५॥

अर्थ: जिस बेचारी मृगी के सिवाय देह के दूसरा कोई धन नहीं है तथा जो सदा वन में ही भ्रमण करती रहती है और जिसका कोई भी रक्षा करने वाला नहीं है तथा जिसको स्वभाव से ही भय लगता है तथा जो केवल तृण को ही खाने वाली है और किसी का जो लेशमात्र भी अपराध नहीं करती ऐसी भी दीन मृगी को केवल मांस टुकड़े के लोभी तथा शिकार के प्रेमी, जो दुष्ट पुरुष बिना कारण मारते हैं उनको इस लोक में तथा परलोक में नाना प्रकार के विरुद्ध कार्यों का सामना करना पड़ता है अर्थात् इसलोक में तो वे दुष्ट पुरुष रोग शोक आदि दुखों का अनुभव करते हैं तथा परलोक में उनको नरक जाना पड़ता है।


तनुरपि यदि लग्ना कीटिका स्याच्छरीरे
भवति तरलचक्षुर्व्याकुलो यः स लोकः।
कथमिह मृगयाप्तानन्दमुत्खातशस्त्रो
मृगमकृतविकारं ज्ञातदुःखोऽपि हन्ति ॥२६॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि जो मनुष्य शरीर से किसी प्रकार कीड़ी आदि के सम्बन्ध हो जाने से ही अधीर होकर जहाँ तहाँ देखने लग जाता है (अर्थात् उसको वह चींटी आदि का सम्बन्ध ही पीड़ा का पैदा करने वाला हो जाता है) तथा जो दुख का भलीभाँति जानने वाला है वह मनुष्य भी शिकार में आनन्द मानकर निरपराध दीन मृग को हथियार उठाकर मारता है? यह बड़ा आश्चर्य है।


यो येनैव हतः स तं हि बहुशो हन्त्येव यैर्वञ्चितो
नूनं वञ्चयते स तानपि भृशं जन्मान्तरेऽप्यत्र च।
स्त्रीबालादिजनादपि स्फुटमिदं शास्त्रादपि श्रूयते
नित्यं वञ्चनहिंसनोज्झनविधौ लोकाः कुतो मुह्यत ॥२७॥

अर्थ: स्त्री बालक आदि से तथा शास्त्र से जब यह बात भलीभाँति मालूम है कि जो प्राणी इस जन्म में एकबार भी दूसरे प्राणी को मारता है वह दूसरे जन्म में उस मरे हुए प्राणी से अनन्त बार मारा जाता है तथा जो मनुष्य इस जन्म में एक बार भी दूसरे प्राणी को ठगता है वह दूसरे जन्म में अनन्त बार उसी पूर्वभव में ठगे हुए प्राणी से ठगाया जाता है फिर भी हे लोक! तू दूसरे के ठगने में तथा मारने में, रात-दिन लगा रहता है यह बड़े आश्चर्य की बात है इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि वे ऐसे अनर्थ के करने वाले दूसरे के मारने, ठगने में अपने चित्त को न लगावें।


अर्थादौ प्रचुरप्रपञ्चरचनैर्यै वञ्चयन्ते परान्
नूनं ते नरकं व्रजन्ति पुरतः पापव्रजादन्यतः।
प्राणाः प्राणिषु तन्निबन्धनतया तिष्ठन्ति नष्टे धने
यावान् दुःखभरो नरे न मरणे तावानिह प्रायशः ॥२८॥

अर्थ: जो दुष्ट मनुष्य नाना प्रकार के छल कपट दगाबाजी से दूसरे मनुष्यों को धन आदि के लिए ठगते हैं उनको दूसरे पापी जनों से पहले ही नरक जाना पड़ता है क्योंकि (धनं वै प्राणाः) इस नीति के अनुसार मनुष्यों के धन ही प्राण हैं, यदि किसी रीति से उनका धन नष्ट हो जावे तो उनको इतना प्रबल दुख होता है कि जितना उनको मरते समय भी नहीं होता इसलिए प्राणियों को चाहिए कि वे प्राणस्वरूप दूसरे के धन को कदापि हरण न करे तथा न हरण करने का प्रयत्न ही करे।


चिन्ताव्याकुलताभयारतिमतिभ्रंशोऽतिदाहभ्रम -
क्षुत्तृष्णाहतिरोगदुःखमरणान्येतान्यहो आस्ताम्।
यान्यत्रैव पराङ्गनाहितमतेस्तद्भूरिदुःखं चिरं
श्वभ्रे भावि यदग्निदीप्तवपुलौहाङ्गनालिङ्गनात्॥२९॥

अर्थ: जो मनुष्य परस्त्री के सेवन करने वाले हैं उनको इसी लोक में जो चिंता, व्याकुलता, भय, द्वेष, बुद्धि का भ्रष्टपना, शरीर का दाह, भूख, प्यास, रोग, जन्म-मरण आदिक दुख होते हैं, वे कोई अधिक दुख नहीं किन्तु जिस समय उन परस्त्री सेवी मनुष्यों को नरक में जाना पड़ता है तथा वहाँ पर जब उनको परस्त्री की जगह लोहे की पुतली से आलिंगन करना पड़ता है उस समय उनको अधिक दुख होता है।


धिक् तत्पौरुषमासतामनुचितास्ता बुद्धयस्तेगुणाः
माभून्मित्रसहायसम्पदपि सा तज्जन्म यातु क्षयम्।
लोकानामिह येषु सत्सु भवति व्यामोहमुद्राङ्कितं
स्वप्नेऽपि स्थितिलङ्घनात्परधनस्त्रीषु प्रसक्तं मनः॥३०॥

अर्थ: जिन पौरुष आदि के होते हुए अपनी स्थिति को उल्लंघन कर मोह से स्वप्न में भी परस्त्री तथा पर धन में मनुष्यों का मन आसक्त हो जाये, ऐसे उस पौरुष के लिए धिक्कार हो तथा वह अनुचित बुद्धि से भी दूर रहो तथा वे गुण भी नहीं चाहिए और ऐसी मित्रों की सहायता तथा संपत्ति की भी आवश्यकता नहीं।


द्यूताद्धर्मसुतः पलादिह बको मद्याद्यदोर्नन्दनाः,
चारुः कामुकया मृगान्तकतया स ब्रह्मदत्तो नृपः।
चौर्याच्चाच्छवभूतिरन्यवनितादोषाद्दशास्यो हठात्,
एकैकव्यसनाहता इति जनाः सर्वैर्न को नश्यति ॥३१॥

अर्थ: जुआ से तो युधिष्ठिर नामक राजा राज्य से भ्रष्ट हुए, उनको नाना प्रकार के दुख उठाने पड़े, मांसभक्षण से बक नाम का राजा राज्य से भ्रष्ट हुआ, अंत में नरक गया और मद्य पीने से यदुवंशी राजा के पुत्र नष्ट हुए, वेश्या व्यसन के सेवन से चारुदत्त सेठ दरिद्रावस्था को प्राप्त हुए, और भी नाना प्रकार के दुखों का उनको सामना करना पड़ा और शिकार की लोलुपता से ब्रह्मदत्त नाम का राजा राज्य से भ्रष्ट हुआ, उसे नरक जाना पड़ा, चोरी व्यसन से सत्यघोष नामक पुरोहित को गोबर खाना, सर्व धनहरण हो जाना आदि नाना प्रकार के दुखों को सहनकर अंत में मल्ल की मुष्टि से मरकर नरक को गया, परस्त्री सेवन से रावण को अनेक दुख भोगने पड़े तथा मरकर नरक गया। आचार्य कहते हैं कि एक-एक व्यसन के सेवन से जब इन मनुष्यों की ऐसी बुरी दशा हुई, ये नष्ट हुए तब जो मनुष्य सातों व्यसनों का सेवन करने वाला है वह क्यों नहीं नष्ट होगा? इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि वे किसी भी व्यसन के फंदे में न पड़े।


न परमियति१ भवति२ व्यसनान्यपराण्यपि प्रभूतानि।
त्यक्त्वा सत्यमपथप्रवृत्तयः क्षुद्रबुद्धीनाम् ॥३२॥

अर्थ: आचार्य महाराज और भी उपदेश देते हैं कि जिन व्यसनों का ऊपर कथन किया गया है वे ही व्यसन हैं ऐसा नहीं समझना चाहिए किन्तु और भी व्यसन हैं वे यही हैं अल्पबुद्धि मिथ्यादृष्टियों की श्रेष्ठ मार्ग को छोड़कर निकृष्ट मार्ग में प्रवृत्ति हो जाना इसलिए जीवों को चाहिए कि वे व्यसनों की रक्षा के लिए निकृष्ट मार्गों में प्रवृत्ति न करें।


सर्वाणि व्यसनानि दुर्गतिपथाः स्वर्गापवर्गार्गलाः
वज्राणि व्रतपर्वतेषु विषमाः संसारिणां शत्रवः।
प्रारम्भे मधुरेषु पाककटुकेष्वेतेषु सद्धीधनैः
कर्तव्या न मतिर्मनागपि हितं वाञ्छद्भिरात्मनः॥३३॥

अर्थ: जिन मनुष्यों की बुद्धि निर्मल है तथा जो अपनी आत्मा का हित चाहते हैं उनको कदापि व्यसनों की ओर नहीं झुकना चाहिए क्योंकि ये समस्त व्यसन दुर्गति को ले जाने वाले हैं तथा स्वर्ग मोक्ष के प्रतिबंधक हैं और समस्त व्रतों के नाश करने वाले हैं। प्राणियों के ये परम शत्रु हैं। प्रारम्भ में मधुर होने पर भी अंत में कटुक हैं इसलिए इनसे स्वप्न में भी हित की आशा नहीं होती।


मिथ्यादृशां विसदृशां च पथच्युतानां मायाविनां व्यसनिनां च खलात्मनां च।
सङ्गं विमुञ्चत बुधाः कुरुतोत्तमानां गन्तुं मतिर्यदि समुन्नतमार्ग एव ॥३४॥

अर्थ: हे भव्य जीवो! यदि तुम उत्तम मार्ग में जाना चाहते हो तो तुम कदापि मिथ्यादृष्टि, विपरीत बुद्धि, मार्ग भ्रष्ट, छली, व्यसनी और दुष्ट जीवों के साथ सम्बन्ध मत करो यदि तुमको सम्बन्ध ही करना है तो उत्तम मनुष्यों के साथ ही सम्बन्ध करो।


स्निग्धैरपि व्रजत मा सह सङ्गमेभिः क्षुद्रैः कदाचिदपि पश्यत सर्षपाणाम्।
स्नेहोऽपि सङ्गतिकृतः खलताश्रितानां लोकस्य पातयति निश्चितमश्रु नेत्रात् ॥३५॥

अर्थ: यह नियम है कि दुष्ट पुरुष जब अपना काम निकालना चाहते हैं तब मीठे वचनों से ही निकालते हैं किन्तु आचार्य इस बात का उपदेश देते हैं कि दुष्ट पुरुष चाहे जैसे सरल तथा मिष्टवादी क्यों न हो तो भी उनके साथ कदापि सज्जनों को सम्बन्ध नहीं करना चाहिए क्योंकि इस बात को प्रत्यक्ष देखो कि जब सरसों खलरूप में परिणत हो जाती है उस समय उससे निकला हुआ तेल आँखों में लगाते ही मनुष्यों को अश्रुपात करा देता है।


कलावेकः साधुर्भवति कथमप्यत्र भवने
स चाघातः क्षुद्रैः कथमकरुणैर्जीवति चिरम्।
अतिग्रीष्मे शुष्यत्सरसि विचरच्चञ्चुचरतां
वकोटानामग्रे तरलशफरी गच्छति कियत् ॥३६॥

अर्थ: जिस समय ग्रीष्म ऋतु में तालाबों का पानी सूख जाता है उस समय पानी के अभाव से ही बेचारी मछलियाँ मर जाती हैं, यदि दैवयोग से दश पाँच बची भी रहें तो लंबी चोंचों के धारी बगुले उनको बात ही बात में घटक जाते हैं इसलिए ग्रीष्मऋतु में मछलियों का नाम निशान दृष्टिगोचर नहीं होता उसी प्रकार प्रथम तो इस कलिकाल में सज्जन उत्पन्न ही नहीं होते यदि दैवयोग से एक दो उत्पन्न भी होते हैं तो दया रहित दुष्ट पुरुषों के फंदे में फँसकर अधिक समय तक जी नहीं पाते इसलिए इस कलिकाल में प्रायः सज्जनों का अभाव सा ही है।


इह वरमनुभूतं भूरि दारिद्र्य दुःखं वरमतिविकराले कालवक्त्रे प्रवेशः।
भवतु वरमितोऽपि क्लेशजालं विशालं न च खलजनयोगाज्जीवितं वा धनं वा ॥३७॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि संसार में दरिद्रता का दुख भोगना अच्छा है अथवा मर जाना अच्छा है वा और भी सांसारिक नाना प्रकार की पीड़ाओं का सहन करना उत्तम है किन्तु दुष्टजन के सम्बन्ध से जीना तथा दुष्टजन के साथ धन कमाना उत्तम नहीं।


मुनिधर्म का कथन


आचारो दशधर्मसंयमतपोमूलोत्तराख्या गुणाः
मिथ्यामोहमदोज्झनं शमदमध्यानाप्रमादस्थितिः।
वैराग्यं समयोपबृंहणगुणा रत्नत्रयं निर्मलं,
पर्यन्ते च समाधिरक्षयपदानन्दाय धर्मो यतेः॥३८॥

अर्थ: जिस धर्म में दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपाचार, वीर्याचार इस प्रकार पाँच प्रकार के आचार तथा उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य तथा उत्तम ब्रह्मचर्य इस प्रकार का दश धर्म तथा बारह प्रकार का संयम तथा बारह प्रकार का तप और आठ प्रकार के मूलगुण तथा चौरासी लाख उत्तरगुण तथा मिथ्यात्व, मोह, मद का त्याग और शम-दम, ध्यान तथा प्रमाद रहित स्थिति और वैराग्य तथा जिनशासन की महिमा के बढ़ाने वाले अनेक गुण और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र स्वरूप निर्मल रत्नत्रय तथा अंत में समाधि विद्यमान है ऐसा मुनियों का धर्म अक्षयपद आनन्द के लिए है।


स्वं शुद्धं प्रविहाय चिद्गुणमयंभ्रान्त्याणुमात्रेऽपि यत्,
सम्बन्धाय मतिः परे भवति तद् बंधाय मूढात्मनः।
तस्मात्त्याज्यमशेषमेव महतामेतच्छरीरादिकं,
तत्कालादि विनादियुक्तित इदं तत्त्यागकर्मव्रतम् ॥३९॥

अर्थ: अपने शुद्ध चैतन्य को छोड़कर परमाणुमात्र पर पदार्थों में भी चैतन्य गुण के भ्रम से यदि मूढ़ पुरुषों की बुद्धि लग जावे तो उस बुद्धि से केवल कर्मबंध ही होता है इसलिए सज्जन पुरुषों को शरीर आदि के समस्त पदार्थों का अवश्य त्याग कर देना चाहिए। यदि आयु कर्म के प्रबल होने से शरीरादि का त्याग न हो सके तो शरीरादि के त्याग करने के लिए मुनिव्रत ही धारण करने योग्य है क्योंकि मुनिव्रत धारण करना ही शरीर आदि के त्याग की क्रिया है।


मुक्त्वा मूलगुणान्यतेर्विदधतः शेषेषु यत्नं परं,
दण्डो मूलहरो भवत्यविरतं पूजादिकं वाञ्छतः।
एकं प्राप्तमरेः प्रहारमतुलं हित्वा शिरश्छेदकं,
रक्षत्यङ्गुलिकोटिखण्डनकरं कोऽन्यो रणे बुद्धिमान् ॥४०॥

अर्थ: युद्ध करते समय अनेक प्रकार के प्रहार होते हैं उनमें कई एक तो शिर के छेदने वाले होते हैं तथा कई एक अंगुलि के अग्रभाग के छेदने वाले होते हैं उनमें यदि कोई पुरुष शिर के छेदने वाले प्रहार को छोड़कर अंगुली के अग्रभाग को छेदन करने वाले प्रहार से रक्षा करे तो उसका जिस प्रकार उससे रक्षा करना व्यर्थ है उसी प्रकार जो यति मूलगुणों को छोड़कर शेष उत्तर गुणों के पालन करने के लिए प्रयत्न करते हैं तथा निरंतर पूजा आदि को चाहते हैं उनको आचार्य मूलछेदक दण्ड देते हैं इसलिए मुनियों को प्रथम मूलगुणव्रत पालना चाहिए पीछे उत्तरगुणों का पालन करना चाहिए।


म्लाने क्षालनतः कुतः कृतजलाद्यारम्भतः संयमो,
नष्टे व्याकुलचित्तताथ महतामप्यन्यतः प्रार्थनम्।
कौपीनेऽपि हृते परैश्च झटिति क्रोधः समुत्पद्यते,
तन्नित्यं शुचि रागहृच्छमवतां वस्त्रं ककुम्मण्डलम् ॥४१॥

अर्थ: यदि संयमी वस्त्र रक्खे तो उसके मलिन होने पर धोने के लिए जल आदि का उनको आरम्भ करना पड़ेगा और यदि जल आदि का आरम्भ करना पड़ा तो उनका संयम ही कहाँ रहा तथा यदि वह वस्त्र नष्ट हो गया तब उनके चित्त में व्याकुलता होगी तथा उसके लिए यदि वे किसी से प्रार्थना करेंगे तो उनकी अयाचक वृत्ति छूट जायेगी और वस्त्रों को छोड़कर यदि वे कौपीन (लंगोट) ही रक्खे तो भी उसके खो जाने पर उनको क्रोध पैदा होगा इसलिए समस्त वस्त्रों का त्यागकर मुनिगणों के नित्य पवित्र राग का नाशक दिशा का मंडल ही वस्त्र है, ऐसा समझना चाहिए।


काकिन्या अपि संग्रहो न विहितः क्षौरं यया कार्यते,
चित्तक्षेपकृदस्त्रमात्रमपि वा तत्सिद्धये नाश्रितम्।
हिंसाहेतुरहो जटाद्यपि तथा यूकाभिरप्रार्थनैः,
वैराग्यादिविवर्धनाय यतिभिः केशेषु लोचः कृतः॥४२॥

अर्थ: मुनिगण अपने पास एक कौड़ी भी नहीं रखते जिससे कि वे दूसरे से मुंडन करा सकें तथा मुंडन के लिए छुरा, कैंची आदि अस्त्र भी नहीं रखते क्योंकि उनके रखने से क्रोधादि की उत्पत्ति से चित्त बिगड़ता है तथा वे जटा भी नहीं रख सकते क्योंकि जटाओं में अनेक जूं आदि जीवों की उत्पत्ति होती है इसलिए जटा रखने से हिंसा होती है तथा मुंडन कराने के लिए वे दूसरे से द्रव्य भी नहीं माँग सकते क्योंकि उनकी अयाचक वृत्ति का परिहार होता है इसलिए वैराग्य की अतिशय वृद्धि के लिए ही मुनिगण अपने हाथों से केशों को उपाटते हैं, इसमें अन्य कोई मानादि कारण नहीं है।


यावन्मे स्थितिभोजनेऽस्ति दृढता पाण्योश्च संयोजने,
भुञ्जे तावदहं रहाम्यथ विधावेषा प्रतिज्ञा यतेः।
कायेऽप्यस्पृहचेतसोऽन्यविधिषु प्रोल्लासिनःसन्मतेः,
न ह्येतेन दिवि स्थितिर्न नरके सम्पद्यते तद्विना ॥४३॥

अर्थ: जो मुनिगण अपने शरीर में भी ममत्व कर रहित हैं तथा समाधिमरण करने में उत्साही हैं तथा श्रेष्ठ ज्ञान के धारक हैं उनकी विधि में यह कड़ी प्रतिज्ञा रहती है कि जब तक हमारी खड़े होकर आहार लेने में तथा दोनों हाथों को जोड़ने में शक्ति मौजूद है तब तक हम भोजन करेंगे, नहीं तो कदापि न करेंगे जिससे उनको स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा उनको नरक नहीं जाना पड़ता किन्तु जो इस प्रतिज्ञा से रहित हैं उनको अवश्य नरक जाना पड़ता है।


एकस्यापि ममत्वमात्मवपुषः स्यात्संसृतेः कारणं,
का बाह्यार्थकथा प्रथीयसि तपस्याराध्यमानेऽपि च।
तद्वास्यां हरिचंदनेऽपि च समःसंश्लिष्टतोऽप्यङ्गतो,
भिन्नं स्वं स्वयमेकमात्मनि धृतं पश्यत्यजस्रं मुनिः ॥४४॥

अर्थ: विस्तीर्ण तप के आराधन करने पर भी यदि एक अपने शरीर में भी “यह मेरा है” ऐसा ममत्व हो जावे तो वह ममत्व ही संसार में परिभ्रमण का कारण हो जाता है तब यदि शरीर से अतिरिक्त धन-धान्य में ममता की जावेगी तो वह ममता क्या न करेगी? ऐसा जानकर तथा चाहे कोई उनके शरीर में कुल्हाड़ी मारे, चाहे उनके शरीर में चन्दन का लेप करे तो भी कुल्हाड़ी और चंदन में सम होकर मुनिगण क्षीर-नीर के समान आत्मा, शरीर का सम्बन्ध होने पर भी अपने में, अपने से, अपने को निरंतर भिन्न ही देखते हैं।


तृणं वा रत्नं वा रिपुरथ परं मित्रमथवा,
सुखं वा दुःखं वा पितृवनमदो१ सौधमथवा।
स्तुतिर्वा निन्दा वा मरणमथवा जीवितमथ,
स्फुटं निर्ग्रन्थानां द्वयमपि समं शान्तमनसाम् ॥४५॥

अर्थ: तथा उन शान्त रस के लोलुपी मुनियों के तृण तथा रत्न, मित्र और शत्रु, सुख तथा दुख, श्मशान भूमि और राजमन्दिर, स्तुति तथा निन्दा, मरण और जीवित दोनों समान है।


वयमिह निजयूथभ्रष्टसारङ्गकल्पाः परपरिचयभीताः क्वापि किंचिच्चरामः।
विजन२मधिवसामो न व्रजामः प्रमादं ३सुकृतमनुभवामो यत्र तत्रोपविष्टाः ॥४६॥

अर्थ: जिस प्रकार मृग अपने समूह से जुदा होकर तथा दूसरों से भयभीत होकर जहाँ तहाँ विचरता फिरता है तथा एकान्त में रहता है तथा प्रतिसमय प्रतिबुद्ध रहता है और जहाँ तहाँ बैठकर आनन्द भोगता है उसी प्रकार हमारे लिए भी वह कौन-सा दिन आयेगा जिस दिन हम अपने कुटुम्बियों से जुदे होकर तथा फिर उन से परिचय न हो जाये इससे भयभीत होकर हम भी यहाँ वहाँ विचरेंगे तथा एकान्तवास में रहेंगे और प्रमादी न बनेंगे तथा जहाँ-तहाँ बैठकर अपने आत्मानंद का अनुभव करेंगे।


कति न कति न वारान् भूपतिर्भूरिभूतिः,
कति न कति न वारानत्र जातोऽस्मि कीटः।
नियतमिति न कस्याप्यस्ति सौख्यं न दुःखं,
जगति तरलरूपे किं मुदा किं शुचा वा ॥४७॥

अर्थ: इस संसार में कितनी-कितनी बार तो हम बड़ी-बड़ी संपत्ति के धारी राजा न हो गये तथा कितनी-कितनी बार इसी संसार में हम क्षुद्र कीड़े न हो चुके इसलिए यही मालूम होता है कि चंचलरूप इस संसार में किसी का सुख तथा दुख निश्चित नहीं है अतः सुख और दुख के होने पर हर्ष और विषाद कदापि नहीं करना चाहिए।


प्रतिक्षणमिदं हृदि स्थितमतिप्रशान्तात्मनो,
मुनेर्भवति संवरः परमशुद्धिहेतुर्ध्रुवम्।
रजःखलु पुरातनं गलति नो नवं ढौकते,
ततोऽपि निकटं भवेदमृतधाम दुःखोज्झितम् ॥४८॥

अर्थ: परम शांत मुद्रा के धारी मुनियों के इस प्रकार उपर्युक्त भावना करने से परम शुद्धि का करने वाला संवर होता है तथा उसके होते हुए जो कुछ प्राचीन कर्म आत्मा के साथ लगे रहते हैं तब गल जाते हैं तथा नवीन कर्मों का आगमन भी बंद हो जाता है तथा उन मुनियों के लिए समस्त प्रकार के दुखों से रहित मुक्ति भी सर्वथा समीप हो जाती है।


प्रबोधो नीरन्ध्रं प्रवहणममन्दं पृथुतपः,
सुवायुर्यैः प्राप्तो गुरुगणसहायाः प्रणयिनः।
कियन्मात्रस्तेषां भवजलधिरेषोऽस्य च परः,
कियद्दूरे पारः स्फुरति महतामुद्यमयुताम् ॥४९॥

अर्थ: जिन मुनियों के पास छिद्ररहित सम्यग्ज्ञानरूपी जहाज मौजूद है तथा अमन्द विस्तीर्ण तपरूपी पवन भी जिनके पास है तथा स्नेही बड़े-बड़े गुरु भी जिनके सहायी हैं उन उद्यमी महात्मा मुनियों के लिए यह संसाररूपी समुद्र कुछ भी नहीं है तथा इस संसाररूपी समुद्र का पार भी उनके समीप में ही है।


अभ्यस्यतान्तरदृशं किमु लोकभक्त्या,
मोहं कृशीकुरुत किं वपुषा कृशेन।
एतद्द्वयं यदि न किं बहुभिर्नियोगैः,
क्लेशैश्च किं किमपरैः प्रचुरैस्तपोभिः ॥५०॥

अर्थ: भो मुनिगण! आनन्दस्वरूप शुद्धात्मा का अनुभव करो, लोक के रिझाने के लिए प्रयत्न मत करो तथा मोह को कृश करो, शरीर के कृश करने में कुछ भी नहीं रखा है क्योंकि जब तक तुम इन दो बातों को न करोगे तब तक तुम्हारा यम, नियम करना भी व्यर्थ है तथा तुम्हारा क्लेश सहना भी बिना प्रयोजन का है और तुम्हारे, नाना प्रकार के, किये हुए तप भी व्यर्थ हैं।


जुगुप्सते संसृतिमत्र मायया तितिक्षते प्राप्तपरीषहानपि।
न चेन्मुनिर्दुष्टकषायनिग्रहाच्चिकित्सति स्वान्तमघप्रशान्तये ॥५१॥

अर्थ: जो मुनि सर्वथा आत्मा के अहित करने वाले दुष्ट कषायों को जीतकर पापों के नाश के लिए अपने चित्त को स्वस्थ बनाना नहीं चाहता वह मुनि समस्त लोक के सामने कपट से संसार की निन्दा करता है तथा कपट से ही वह क्षुधा, तृषा आदि बाईस परीषहों को सहन करता है।


हिंसा प्राणिषु कल्मषं भवति सा प्रारम्भतः सोऽर्थतः,
तस्मादेव भयादयोऽपि नितरां दीर्घा ततः संसृतिः।
तत्रासातमशेषमर्थत इदं मत्वेति यस्त्यक्तवान्,
मुक्त्यर्थी पुनरर्थमाश्रितवता तेनाहतः सत्पथः ॥५२॥

अर्थ: प्राणियों को मारने से पाप होता है तथा वह पाप आरंभ से होता है और वह आरंभ धन से होता है तथा धन के होते ही लोभ आदि की उत्पत्ति होती है और लोभ आदि के होने से दीर्घ संसार होता है तथा संसार से अनन्त दुख होते हैं इस प्रकार से सब बातें द्रव्य से होती हैं इस बात को जानकर मोक्ष के अभिलाषी मुनियों ने द्रव्य का त्याग कर दिया है किन्तु जिसने धन को आश्रयण किया है उसने सच्चे मार्ग का नाश ही कर दिया है ऐसा समझना चाहिए।


दुर्ध्यानार्थमवद्यकारणमहो निर्ग्रन्थताहानये,
शय्याहेतु तृणाद्यपि प्रशमिनां लज्जाकरं स्वीकृतम्।
यत्तत्किं न गृहस्थयोग्यमपरं स्वर्णादिकं साम्प्रतं,
निर्ग्रन्थेष्वपि चैतदस्ति नितरां प्रायः प्रविष्टः कलिः ॥५३॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं निर्ग्रन्थ मुनि शय्या के कारण यदि घास आदि को भी स्वीकार कर लें तो वह स्वीकार भी उनके खोटे ध्यान के लिए होता है तथा निन्दा का करने वाला और निर्ग्रन्थता में हानि पहुँचाने वाला होता है तथा लज्जा को करने वाला भी होता है तब वे निर्ग्रन्थ यतीश्वर गृहस्थ के योग्य सुवर्ण आदि को कब रख सकते हैं? यदि इस काल में निर्ग्रन्थ सुवर्ण आदि को रखें तो समझना चाहिए कि यह कलिकाल का ही माहात्म्य है।


कादाचित्को बंधः क्रोधादेः कर्मणः सदा सङ्गात्।
नातः क्वापि कदाचित्परिग्रहग्रहवतां सिद्धिः ॥५४॥

अर्थ: और भी आचार्य कहते हैं कि क्रोधादि कर्मों के द्वारा तो प्राणियों के कर्मों का बंध कभी-कभी ही होता है किन्तु परिग्रह से प्रतिक्षण बंध होता रहता है अतएव परिग्रहधारियों को किसी काल में तथा किसी प्रदेश में भी सिद्धि नहीं होती । इसलिए भव्य जीवों को कदापि धनधान्य से ममता नहीं रखनी चाहिए।


मोक्षेऽपि मोहादभिलाषदोषो विशेषतो मोक्षनिषेधकारी।
यतस्ततोऽध्यात्मरतो मुमुक्षुर्भवेत्किमत्र कृताभिलाषः ॥५५॥

अर्थ: स्त्री-पुत्र आदि की अभिलाषा का करना तो दूर रहा यदि मोक्ष के लिए भी अभिलाषा की जावे तो वह दोषस्वरूप समझी जाती है इसलिए वह मोक्ष की निषेध करने वाली होती है। इसीलिए जो मुनि अपनी आत्मा के रस में लीन हैं तथा मोक्ष के अभिलाषी हैं वे स्त्री पुत्र आदि में कब अभिलाषा कर सकते हैं।


परिग्रहवतां शिवं यदि तदानलः शीतलो,
यदीन्द्रियसुखं सुखं तदिह कालकूटः सुधा।
स्थिरा१ यदि तनुस्तदा स्थिरतरं तडिच्चाम्बरे२,
भवेऽत्र रमणीयता यदि तदिन्द्रजालेऽपि च ॥५६॥

अर्थ: यदि परिग्रहधारियों को भी मुक्ति कही जावेगी तो अग्नि को भी शीतल कहना पड़ेगा तथा यदि इन्द्रियों से पैदा हुए सुख को भी सुख कहोगे तो विष को भी अमृत मानना पड़ेगा और यदि शरीर को स्थिर कहोगे तो आकाश में बिजली को भी स्थिर कहना पड़ेगा तथा संसार में रमणीयता कहोगे तो इन्द्रजाल में भी रमणीयता कहनी पड़ेगी। इसलिए इस बात को मानो कि जिस प्रकार अग्नि शीतल नहीं होती उसी प्रकार परिग्रहधारियों को कदापि मुक्ति नहीं हो सकती और जिस प्रकार विष अमृत नहीं होता उसी प्रकार इन्द्रिय सुख भी कदापि सुख नहीं हो सकता तथा जिस प्रकार बिजली स्थिर नहीं होती उसी प्रकार यह शरीर भी स्थिर नहीं हो सकता तथा जिस प्रकार इन्द्रजाल में रमणीयता नहीं होती उसी प्रकार संसार में भी रमणीयता नहीं हो सकती।


स्मरमपि हृदि येषां ध्यानवन्हिप्रदीप्ते,
सकलभुवनमल्लं दह्यमानं विलोक्य।
कृतभिय इव नष्टास्ते कषाया न तस्मिन्,
पुनरपि हि समीयुः साधवस्ते जयन्ति ॥५७॥

अर्थ: वे यतीश्वर सदा इस लोक में जयवंत हैं जिन यतीश्वरों के हृदय में ध्यानरूपी अग्नि के जाज्वल्यमान होने पर तीनों लोक के जीतने वाले कामदेवरूपी प्रबल योद्धा को जलते हुए देखकर भय से ही मानों भाग गये तथा ऐसे भागे कि फिर न आ सके।


अनर्घ्यरत्नत्रयसम्पदोऽपि निर्ग्रंथतायाः पदमद्वितीयम्।
अपि प्रशान्ताः स्मरवैरिवध्वाः वैधव्यदास्ते गुरवो नमस्याः ॥५८॥

अर्थ: अमूल्य रत्नत्रयरूपी संपत्ति के धारी होकर भी जो निर्ग्रंथ पद के धारक हैं तथा शान्त मुद्रा के धारी होने पर भी जो कामदेव रूपी बैरी की स्त्री को विधवा करने वाले हैं ऐसे वे उत्तम गुरु सदा नमस्कार करने योग्य हैं।


आचार्य परमेष्ठी की स्तुति


ये स्वाचारमपारसौख्यसुतरोर्बीजं परं पञ्चधा
सद्बोधाः स्वयमाचरन्ति च परानाचारयन्त्येव च।
ग्रंथग्रंथिविमुक्तमुक्तिपदवीं प्राप्ताश्च यैः प्रापिताः
ते रत्नत्रयधारिणः शिवसुखं कुर्वन्तु नः सूरयः ॥५९॥

अर्थ: जो सद्ज्ञान के धारक आचार्य अपार सौख्यरूपी वृक्ष उसको उत्पन्न करने वाले पाँच प्रकार के आचार को स्वयं आचरण करते हैं तथा दूसरों को आचरण कराते हैं तथा जहाँ पर किसी प्रकार के परिग्रह का लेश नहीं ऐसी मुक्ति को स्वयं जाते हैं और दूसरों को पहुँचाते हैं इसलिए इस प्रकार निर्मल रत्नत्रय के धारी आचार्यवर हमारे लिए मोक्षसुख को प्रदान करें।


भ्रान्तिप्रदेशु बहुवर्त्मसु जन्मकक्षे पन्थानमेकममृतस्य परं नयन्ति।
ये लोकमुन्नतधियः प्रणमामि तेभ्यस्तेनाप्यहं जिगमिषुर्गुरुनायकेभ्यः ॥६०॥

अर्थ: इस संसार में भ्रम को उत्पन्न करने वाले अनेक मार्गों में से जो गुरु लोक को सुख के देने वाले एक मोक्षमार्ग को ले जाते हैं तथा स्वयं उच्च ज्ञान के धारक हैं ऐसे उन श्रेष्ठ गुरुओं को उसी मार्ग में जाने की इच्छा करने वाला मैं भी मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।


उपाध्याय परमेष्ठी की स्तुति


शिष्याणामपहाय मोहपटलं कालेन दीर्घेण य-
ज्जातं स्यात्पदलाञ्छितोज्ज्वलवचो-दिव्याञ्जनेन स्फुटम्।
ये कुर्वन्ति दृशं परामतितरां सर्वावलोके क्षमां
लोके कारणमन्तरेण १भिषजास्ते पान्तुनोऽध्यापकाः॥६१॥

अर्थ: जो उपाध्याय परमेष्ठी अनादिकाल से लगे हुए मोह के परदे को स्याद्वाद से अविरोधी ऐसे अपने उपदेशरूपी दिव्य अंजन से हटाकर शिष्यों की दृष्टि को अत्यन्त निर्मल तथा समस्त पदार्थों के देखने में समर्थ बनाते हैं ऐसे बिना कारण के ही वैद्य वे उपाध्याय मेरी इस संसार में रक्षा करें।


साधु परमेष्ठी की स्तुति


उन्मुच्यालयबंधनादपि दृढात्कायेऽपि वीतस्पृहा
श्चित्ते मोहविकल्पजालमपि यद्दुर्भेद्यमन्तस्तमः।
भेदायास्य हि साधयन्ति तदहो ज्योतिर्जितार्कप्रभं
ये सद्बोधमयं भवन्तु भवतां ते साधवः श्रेयसे॥६२॥

अर्थ: जो साधु परमेष्ठी अत्यन्त कठिन भी गृहरूपी बंधन से अपने को छुड़ाकर तथा अपने शरीर में भी इच्छारहित होकर कठिनता से भेदने योग्य ऐसे मोह से पैदा हुए विकल्पों के समूहरूप भीतरी अंधकार के नाश करने के लिए सूर्य की प्रभा को भी नीची करने वाली सम्यग्ज्ञानरूपी ज्योति को निरन्तर सिद्ध करते रहते हैं, ऐसे उन साधु परमेष्ठी के लिए नमस्कार है अर्थात् वे मेरे कल्याण के लिए होवे।


वीतराग की महिमा का वर्णन


वज्रे पतत्यपि भयद्रुतविश्वलोक,मुक्ताध्वनि प्रशमिनो न चलन्ति योगात् ।
बोधप्रदीपहृतमोहमहान्धकाराः, सम्यग्दृशः किमुत शेषपरीषहेषु ॥६३॥

अर्थ: जिस वज्र के शब्द के भय से चकित होकर समस्त लोकमार्ग को छोड़ देते हैं ऐसे वज्र के गिरने पर भी जो शान्तात्मा मुनि, ध्यान से कुछ भी विचलित नहीं होते तथा जिन्होंने सम्यग्ज्ञानरूपी दीपक से समस्त मोहान्धकार को नाश कर दिया है और जो सम्यग्दर्शन के धारी हैं वे मुनि परीषहों के जीतने में कब चलायमान हो सकते हैं? अर्थात् परीषह उनका कुछ भी नहीं कर सकते।


ग्रीष्मऋतु में पर्वत के शिखर पर ध्यानी मुनीश्वरों की स्तुति


प्रोद्यत्तिग्मकरोग्रतेजसि लसच्चण्डानिलोद्यद्दिशि
स्फारीभूतसुतप्तभूमिरजसि प्रक्षीणनद्यम्भसि ।
ग्रीष्मे ये गुरुमेदिनीध्रशिरसि ज्योतिर्निधायोरसि
ध्वान्तध्वंसकरं वसन्ति मुनयस्ते सन्तु नः श्रेयसे ॥६४॥

अर्थ: जिस ग्रीष्मऋतु में अत्यन्त तीक्ष्ण धूप पड़ती है तथा चारों दिशाओं में भयंकर लू चलती है तथा जिस ऋतु में अत्यन्त संताप को देने वाला गरम रेत फैला हुआ है तथा नदियों का पानी सूख जाता है ऐसी भयंकर ग्रीष्मऋतु में जो मुनि समस्त अन्धकार को नाश करने वाली सम्यग्ज्ञानरूपी ज्योति को अपने मन में रखकर अत्यन्त ऊँची पहाड़ी की चोटी पर निवास करते हैं उन मुनियों के लिए मेरा नमस्कार हो अर्थात् वे मुनि मेरे कल्याण के लिए होवे।


वर्षाकाल में वृक्षों के नीचे स्थित मुनियों की स्तुति


ते वः पान्तु मुमुक्षवः कृतरवैरब्दै रतिश्यामलैः
शश्वद्वारि वमद्भिरब्धिविषयक्षारत्वदोषादिव ।
काले मज्जदिले पतद्गिरिकुले धावद्धुनीसंकुले
झंझावातविसंस्थुले तरुतले तिष्ठन्ति ये साधवः॥६५॥

अर्थ: जिस वर्षाकाल में काले-काले मेघ भयंकर शब्द करते हैं, समुद्र के क्षार दोष से ही मानो जो जहाँ तहाँ जल वर्षाते हैं, जिस काल में जमीन नीचे को धसक जाती है तथा पर्वतों से बड़े-बड़े पत्थर गिरते हैं तथा जल की भरी हुई नदियाँ सब जगह दौड़ती फिरती हैं तथा जो वर्षाकाल वृष्टि सहित पवन से भयंकर हो रहा है ऐसे भयंकर वर्षाकाल में जो मोक्षाभिलाषी मुनि वृक्षों के नीचे बैठ कर तप करते हैं उन मुनियों के लिए नमस्कार है अर्थात् वे मुनि मेरी रक्षा करे।


म्लायत्कोकनदे गलत्पिकमदे भ्रश्यद् द्रुमौघच्छदे,
हर्षद्रोमदरिद्रके हिमऋतावत्यन्तदुःखप्रदे।
ये तिष्ठन्ति चतुष्पथे पृथुतपः सौधस्थिताः साधवो,
ध्यानोष्णाप्रहितोग्रशीतविधुरास्ते मे विदध्युः श्रियम् ॥६६॥

अर्थ: जिस शीतकाल में कमल कुम्हला जाते हैं तथा बन्दरों का मद गल जाता है और वृक्षों के पत्ते जल जाते हैं तथा जिस शीतकाल में वस्त्र रहित दरिद्रों के शरीर पर रोमांच खड़े हो जाते हैं और भी जो नाना प्रकार के दुखों का देने वाला है ऐसे भयंकर शीतकाल में अत्यन्त तपस्वी तथा ध्यान रूपी अग्नि से समस्त शीत को नाश करने वाले जो यतीश्वर खुले मैदान में निर्भयता से निवास करते हैं वे यतीश्वर मुझे अविनाशी लक्ष्मी प्रदान करें।


कालत्रये बहिरवस्थितजातवर्षा शीतातपप्रमुखसंघटितोग्रदुःखे।
आत्मप्रबोधविकले सकलोऽपि कायक्लेशो वृथा वृतिरितरोज्झितशालिवप्रे ॥६७॥

अर्थ: जो मुनि अपने आत्मज्ञान की कुछ भी परवाह न कर बाहर में रहकर वर्षा, शीत, गर्मी तीनों कालों में उत्पन्न हुए दुखों को सहन करते हैं उनका उस प्रकार का दुख सहना वैसा ही निरर्थक मालूम होता है जैसा कि धान्य के कट जाने पर खेत की बाढ़ लगाना निरर्थक होता है इसलिए मुनियों को आत्मज्ञान पर विशेष ध्यान देना चाहिए।


सम्प्रत्यस्ति न केवली किल कलौ त्रैलोक्यचूडामणिः,
तद्वाचः परमासतेऽत्र भरतक्षेत्रे जगद्द्योतिकाः।
सद्रत्नत्रयधारिणो यतिवरास्तेषां समालंबनं,
तत्पूजा जिनवाचिपूजनमतः साक्षाज्जिनः पूजितः ॥६८॥

अर्थ: यद्यपि इस समय इस कलिकाल में तीन लोक के पूजनीय केवली भगवान् विराजमान नहीं हैं तो भी इस भरतक्षेत्र में समस्त जगत् को प्रकाश करने वाली उन केवली भगवान् की वाणी मौजूद है तथा उस वाणी के आधार श्रेष्ठ रत्नत्रय के धारी मुनि हैं इसलिए उन मुनियों की पूजन तो सरस्वती की पूजन है तथा सरस्वती की पूजन साक्षात् केवली भगवान् की पूजन है ऐसा भव्य जीवों को समझना चाहिए।


स्पृष्टा यत्र मही तदंघ्रिकमलैस्तत्रैति सत्तीर्थतां,
तेभ्यस्तेपि सुराः कृताञ्जलिपुटा नित्यं नमस्कुर्वते।
तन्नामस्मृतिमात्रतोऽपि जनता निष्कल्मषा जायते,
ये जैना यतयश्चिदात्मनिरता १ध्यानं समातन्वते ॥६९॥

अर्थ: जो यतीश्वर आत्मा में लीन होकर ध्यान करते हैं उन जैन यतीश्वरों के चरण कमलों से स्पृष्ट भूमि उत्तमतीर्थ बन जाती है तथा उन यतीश्वरों को हाथ जोड़ मस्तक नवाकर बड़े-बड़े देव आकर नमस्कार करते हैं तथा उनके स्मरण मात्र से ही जीवों के समस्त पाप गल जाते हैं इसलिए यतीश्वरों को सदा ध्यान में लीन रहना चाहिए।


सम्यग्दर्शनवृत्त२बोधनिचितः शान्तः शिवैषी मुनि-
र्मन्दैः स्यादवधीरितोऽपि विशदः साम्यं यदालम्ब्यते।
आत्मा तैर्विहतो यदत्र विषमध्वान्तश्रिते निश्चितं,
सम्पातो भवितोग्रदुःखनरके तेषामकल्याणिनाम् ॥७०॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का धारी तथा शांत और मोक्षाभिलाषी जो मुनि दुष्टों से अपमानित होकर भी स्वच्छ अंतःकरण से समता को धारण करता है उसकी तो आत्मा शुद्ध ही होती है किन्तु जो उनकी निन्दा करने वाले हैं उन्होंने अपनी आत्मा का घात कर लिया क्योंकि वे दुष्ट कल्याण रहित पुरुष ऐसे नरक में गिरेंगे जो नरक भयंकर अंधकार से व्याप्त है तथा कठिन दुःखों का स्थान है इसलिए मुनियों को चाहिए कि दुष्ट कैसी भी निंदा करें तो भी उनको समता ही धारण करनी योग्य है।


मानुष्यं प्राप्य पुण्यात्प्रशममुपगता रोगवद्भोगजालं३,
मत्वा गत्वा वनांतं दृशि विदिचरणे ये स्थिताःसंगमुक्ताः।
कः स्तोता वाक्पथातिक्रमणपटुगुणैराश्रितानां मुनीनां,
स्तोतव्यास्तेमहद्भिर्भुवि य इह तदंघ्रिद्वयेभक्ति भाजः ॥७१॥

अर्थ: पुण्ययोग से मनुष्य भव को पाकर तथा शान्ति को प्राप्त होकर और भोगों को रोग तुल्य जानकर तथा वन में जाकर समस्त परिग्रह से रहित होकर जो यतीश्वर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र में स्थित होते हैं, वचनागोचर गुणों से सहित उन मुनियों की प्रथम तो कोई स्तुति का करने वाला ही नहीं, यदि कोई स्तुति कर सके भी तो वे ही पुरुष उनकी स्तुति कर सकते हैं जो उन मुनियों के चरण कमलों की आराधन करने वाले महात्मा पुरुष हैं।


रत्नत्रयधर्म का कथन


तत्त्वार्थाप्ततपोभृतां यतिवराः श्रद्धानमाहुर्दृशं
ज्ञानं जानदनूनमप्रतिहतं स्वार्थाविसन्देहवत्।
चारित्रं विरतिः प्रमादविलसत्कर्मास्रवाद्योगिनां
एतन्मुक्ति पथस्त्रयं च परमोधर्मो भवच्छेदकः ॥७२॥

अर्थ: गणधरादिदेव जीवादि पदार्थ तथा आप्त और गुरुओं पर श्रद्धान रखने को सम्यग्दर्शन कहते हैं तथा जिसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं है तथा जो संशयरहित तथा पूर्ण है ऐसे ज्ञान को सम्यग्ज्ञान कहते हैं तथा प्रमाद सहित कर्मों के आगमन के रुक जाने को सम्यक्चारित्र कहते हैं तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र ही मुक्ति का मार्ग है तथा संसार को नाश करने वाला परमधर्म है।


हृदयभुवि दृगेकं बीजमुप्तं त्वशङ्काप्रभृतिगुणसदम्भः सारिणीसिक्तमुच्चैः।
भवदवगमशाखश्चारुचारित्रपुष्पस्तरुरमृतफलेन प्रीणयत्याशु भव्यम् ॥७३॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि अंतःकरणरूपी पृथिवी में बोया हुआ तथा निःशंकित आदि आठ गुणरूपी उत्तम जल की भरी हुई नलियों से सींचा हुआ सम्यग्दर्शनरूपीबीज, सम्यग्ज्ञानरूपी शाखाओं का धारी तथा चारित्ररूपी पुष्प से सहित वृक्षस्वरूप में परिणत होकर शीघ्र ही भव्य जीवों को मोक्षरूपी फल से संतुष्ट करता है।


दृगवगमचरित्रालंकृतः सिद्धिपात्रं लघुरपि न गुरुः स्यादन्यथात्वे कदाचित्।
स्फुटमवगतमार्गो याति मन्दोऽपि गच्छन्नभिमतपदमन्यो नैव तूर्णोऽपि जन्तुः ॥७४॥

अर्थ: जिसको मार्ग मालूम है ऐसा मनुष्य यदि धीरे-धीरे चले तो भी जिस प्रकार अभिमत स्थान पर पहुँच जाता है किन्तु जिसको मार्ग कुछ भी नहीं मालूम है वह चाहे कितनी भी जल्दी चले तो भी वह अपने अभिमत स्थान पर नहीं पहुँच सकता। उसी प्रकार जो मुनि तप आदि का तो बहुत थोड़ा करने वाला है किन्तु सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का धारी है वह शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त हो जाता है किन्तु जो तप आदि का तो बहुत करने वाला है परन्तु सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रय का धारी नहीं है, वह कितना भी प्रयत्न करे तो भी मोक्ष को नहीं पा सकता इसलिए मोक्षाभिलाषियों को सम्यग्दर्शनादि की सबसे अधिक महिमा समझनी चाहिए।


वनशिखिनि मृतोऽन्धः सञ्चरन्बाढमंघ्रिद्वितयविकलमूर्ति र्वीक्षमाणोऽपि खञ्जः।
अपि सनयनपादोऽश्रद्दधानश्च तस्माद्दृगवगमचरित्रैः संयुतैरैव सिद्धिः ॥७५॥

अर्थ: वन में अग्नि लगने पर उस वन में रहने वाला अंधा तो देख न सका इसलिए दौड़ता हुआ भी मर गया तथा दोनों चरणों का लूला लगी हुई अग्नि को देखता हुआ दौड़ न सकने के कारण तत्काल भस्म हो गया और आँख तथा पैर सहित भी आलसी इसलिए मर गया कि उसको अग्नि लगने का श्रद्धान ही नहीं हुआ। इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि केवल सम्यग्दर्शन तथा केवल सम्यग्ज्ञान और केवल सम्यक्चारित्र मोक्ष के लिए कारण नहीं हैं किन्तु तीनों मिले हुए ही हैं।


बहुभिरपि किमन्यैः प्रस्तरैः रत्नसंज्ञैर्वपुषिजनितखेदैर्भारकारित्वयोगात् ।
हतदुरिततमोभिश्चारुरत्नै रनर्घ्यै स्त्रिभिरपि कुरुतात्मालंकृतिं दर्शनाद्यैः ॥७६॥

अर्थ: संसार में यद्यपि रत्न संज्ञा बहुत से पत्थरों की भी है किन्तु उनसे कुछ भी प्रयोजन नहीं क्योंकि वे केवल भारकारी होने के कारण शरीर को खिन्न करने वाले ही हैं इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि हे मुनीश्वरों! जो समस्त अंधकार के नाश करने वाले हैं तथा अमूल्य और मनोहर हैं ऐसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी तीन रत्नों से ही अपनी आत्मा को शोभित करो ये ही वास्तविक रत्न है।


जयति सुखनिधानं मोक्षवृक्षकबीजं, सकलमलविमुक्तं दर्शनं यद्विना स्यात् ।
मतिरपि कुमतिर्नु दुश्चरित्रं चरित्रं भवति मनुजजन्म प्राप्तमप्राप्तमेव ॥७७॥

अर्थ: जिस सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान मिथ्याज्ञान कहलाता है, चरित्र मिथ्याचरित्र कहलाता है प्राप्त हुआ भी मनुष्य जन्म न पाया हुआ सा कहलाता है। ऐसा सुखस्वरूप तथा मोक्ष रूपी सुख का देने वाला और निर्मल सम्यग्दर्शनरूपी रत्न सदा इस लोक में जयवंत है।


भवभुजगनागदमनी दुःखमहादावशमनजलवृष्टिः।
मुक्ति - सुखामृतसरसी जयति दृगादित्रयी सम्यक् ॥७८॥

अर्थ: संसाररूपी सर्प को नाश करने में नागदमनी तथा दुःखरूपी दावानल के बुझाने के लिए जलवृष्टि और मोक्षरूपी सुखामृत की सरोवरी (तालाब) ऐसी समीचीन रत्नत्रयी सदा इस लोक में जयवंत है।


वचनविरचितैवोत्पद्यते भेदबुद्धिर्दृगवगमचरित्राण्यात्मनः स्वं स्वरूपम्।
अनुपचरितमेतच्चेतनैकस्वभावं व्रजति विषयभावं योगिनां योगदृष्टेः ॥७९॥

अर्थ: व्यवहारनय की अपेक्षा से ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र जुदे-जुदे मालूम पड़ते हैं, निश्चयनय की अपेक्षा से इनमें किसी प्रकार का भेद नहीं है किन्तु ये तीनों आत्मस्वरूप ही हैं तथा समस्त लोकालोक को देखने वाले केवली भगवान् वास्तविक रीति से इन तीनों को चैतन्य से अभिन्न स्वरूप ही देखते हैं।


निरूप्य तत्त्वं स्थिरतामुपागता मतिः सतां शुद्धनयावलम्बिनी।
अखण्डमेकं विशदं चिदात्मकं निरन्तरं पश्यति तत्परं महः ॥८०॥

अर्थ: जीवाजीवादि समस्त तत्त्वों को देखकर जिन सज्जनों की मति स्थिर हो गई है तथा शुद्धनय को आश्रयण करने वाली हो गई है वे ही मनुष्य निर्मल तथा उत्कृष्ट चित्स्वरूप ज्योति को देखते हैं।


दृष्टिर्निर्णीतिरात्माह्ययविशदमहस्यत्र बोधः प्रबोधः
शुद्धं चारित्रमत्र स्थितिरिति युगपद्बंधविध्वंसकारि।
बाह्यं बाह्यार्थमेव त्रितयमपि तथा स्याच्छुभोवाऽशुभोवा
बंधः संसारमेवं श्रुतनिपुणधियः साधवस्तं वदन्ति॥८१॥

अर्थ: आत्मारूपी निर्मल तेज में निश्चय (विश्वास) करना तो निश्चयसम्यग्दर्शन है तथा उसी तेज में जानपना निश्चयज्ञान है तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञानस्वरूप में स्थित रहना सम्यक्चारित्र है और इन तीनों की एकता कर्मबंध के नाश करने वाली है तथा इस निश्चयरत्नत्रय से जो बाह्य है सो बाह्य ही है और चाहे वह शुभ हो, चाहे अशुभ हो बंध का ही कारण है तथा बंध का कारण होने से संसार का भी कारण है ऐसा श्रुतज्ञान के पारंगत आचार्य कहते हैं। इसलिये भव्यजीवों को निश्चयरत्नत्रय के ही लिये प्रयत्न करना चाहिए तथा व्यवहाररत्नत्रय को भी सर्वथा न छोड़कर निश्चयरत्नत्रय का साधक समझना चाहिए।


दशलक्षणधर्म का कथन


जडजनकृतबाधाक्रोधहासाप्रियादावपि सति न विकारं यन्मनो याति साधोः।
अमलविपुल१चित्तेरुत्तमा सा क्षमादौ शिवपथपथिकानां तत्सहायत्वमेति ॥८२॥

अर्थ: मूर्खजनों से किए हुए बंधन हास्य आदि के होने पर तथा कठोर वचनों के बोलने पर जो साधु अपने निर्मल धीर-वीर चित्त से विकृत नहीं होता उसी का नाम उत्तमक्षमा है तथा वह उत्तमक्षमा मोक्षमार्ग को जाने वाले मुनियों को सबसे प्रथम सहायता करने वाली है।


श्रामण्यपुण्यतरुरत्र२ गुणौघशाखापत्रप्रसूननिचितोऽपि फलान्यदत्त्वा।
याति क्षयं क्षणात एव घनोग्रकोपदावानलात् त्यजत तं यतयोऽतिदूरम् ॥८३॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि गुणरूपी जो शाखा पत्र-फूल से सहित ऐसा यह यतिरूपी वृक्ष है यदि इसमें भयंकर क्रोधरूपी दावानल प्रवेश कर जावे तो यह किसी प्रकार फल न देकर बात ही बात में नष्ट हो जाता है इसलिए यतीश्वरों को चाहिए कि क्रोध आदि को वे दूर से ही छोड़ देवें।


तिष्ठामो वयमुज्ज्वलेन मनसा रागादिदोषोज्झिता,
लोकः किञ्चिदपि स्वकीयहृदये स्वच्छन्दचरो मन्यताम्।
साध्या शुद्धिरिहात्मनः शमवतामत्रापरेण द्विषा,
मित्रेणापि किमु स्वचेष्टितफलं स्वार्थः स्वयं लप्स्यते ॥८४॥

अर्थ: रागद्वेषादि से रहित होकर हम तो अपने उज्ज्वल चित्त से रहेंगे। स्वेच्छाचारी यह लोक अपने हृदय में चाहे हमको भला बुरा कैसा भी मानो क्योंकि सभी पुरुषों को अपने आत्मा की शुद्धि करनी चाहिए और इस लोक में बैरी अथवा मित्रों से हमको क्या है? अर्थात् वे हमारा कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि जो हमारे साथ द्वेषरूप तथा प्रीतिरूप परिणाम करेगा उसका फल उसको अपने आप मिल जायेगा।


दोषानाघुष्य लोके मम भवतु सुखी दुर्जनश्चेद्धनार्थी
मत्सर्वस्वं गृहीत्वा रिपुरथ सहसा जीवितं स्थानमन्यः।
मध्यस्थस्त्वेवमेवाखिलमिह हि जगज्जायतां सौख्यराशि-
र्मत्तो माभूदसौख्यं कथमपि भविनः कस्यचित्पूत्करोमि ॥८५॥

अर्थ: मेरे दोषों को सबके सामने प्रकट कर संसार में दुर्जन सुखी होवे तथा धन का अर्थी मेरे समस्त धन आदि को ग्रहण कर सुखी होवे तथा बैरी मेरे जीवन को लेकर सुखी होवे और जिनको मेरे स्थान के लेने की अभिलाषा है, वे स्थान लेकर आनन्द से रहें तथा जो रागद्वेष रहित मध्यस्थ होकर रहना चाहें वे मध्यस्थ रहकर ही सुख से रहें। इस प्रकार समस्त जगत् सुख से रहो किन्तु किसी भी संसारी को मुझसे दुख न पहुँचे ऐसा मैं सबके सामने पुकार-पुकार कर कहता हूँ।


किं जानासि न वीतरागमखिलं त्रैलोक्यचूडामणिं
किं तद्धर्ममुपाश्रितं न भवता किं वा न लोको जडः।
मिथ्यादृग्भिरसज्जनैरपटुभिः किञ्चित्कृतोपद्रवात्-
यत् कमार्जनहेतुमस्थिरतया बाधां मनो मन्यसे ॥८६॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि दुर्जन मूर्ख जनों से किए हुए उपद्रव से चंचल होकर कर्मों के पैदा करने में कारणभूत ऐसी वेदना का तू अनुभव करता है सो क्या? हे मन तीन लोक के पूजनीक वीतरागपने को तू नहीं जानता है अथवा जिस धर्म का तूने आश्रय किया है उस धर्म को तू नहीं जानता है अथवा यह समस्त लोक अज्ञानी जड़ है इस बात का तुझे ज्ञान नहीं है।


मार्दवधर्म का वर्णन


धर्माङ्गमेतदिह मार्दवनामधेयं जात्यादिगर्वपरिहारमुशन्ति सन्तः।
तद्धार्यते किमुत बोधदृशा समस्तं स्वप्नेन्द्रजालसदृशं जगदीक्षमाणैः ॥८७॥

अर्थ: उत्तम पुरुष जाति, बल, ज्ञान, कुल आदि गर्वों के त्याग को मार्दवधर्म कहते हैं तथा यह धर्मों का अंगभूत है। इसलिए जो मनुष्य अपनी सम्यग्ज्ञानरूपी दृष्टि से समस्त जगत् को स्वप्न तथा इन्द्रजाल के तुल्य देखते हैं वे अवश्य ही इस मार्दवनामक धर्म को धारण करते हैं।


कास्था सद्मनि सुन्दरेऽपि परितो दंदह्यमानेऽग्निभिः
कायादौ तु जरादिभिः प्रतिदिनं गच्छत्यवस्थान्तरम्।
इत्यालोचयतो हृदि प्रशमिनः भास्वद्विवेकोज्ज्वले
गर्वस्यावसरः कुतोऽत्र घटते भावेषु सर्वेष्वपि ॥८८॥

अर्थ: अत्यन्त मनोहर भी है किन्तु जिसके चारों तरफ अग्नि जल रही है ऐसे घर के बचने में जिस प्रकार अंशमात्र भी आशा नहीं की जाती। उसी प्रकार जो शरीर वृद्धावस्था से सहित है तथा प्रतिदिन एक अवस्था को छोड़कर दूसरी अवस्था को धारण करता रहता है वह शरीर सदाकाल रहेगा यह कब विश्वास हो सकता है? इस प्रकार निरन्तर विवेक से अपने निर्मल हृदय में विचार करने वाले मुनि के समस्त पदार्थों में अभिमान करने के लिए अवसर ही नहीं मिल सकता इसलिए मुनियों को सदा ऐसा ही ध्यान करना चाहिए।


आर्जवधर्म का वर्णन


हृदि यत्तद्वाचि बहिः फलति तदेवार्जवं भव्यतेतत्।
धर्मो निकृतिरधर्मो द्वाविह ‘सुरसद्मनरकपथौ’ ॥८९॥

अर्थ: मन में जो बात होवे उसी को वचन से प्रकट करना (न कि मन में कुछ दूसरा होवे तथा वचन से कुछ दूसरा ही बोले) इसको आचार्य आर्जवधर्म कहते हैं तथा मीठी बात लगाकर दूसरे को ठगाना इसको अधर्म कहते हैं और इसमें आर्जवधर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा अधर्म नरक को ले जाने वाला होता है इसलिए आर्जवधर्म के पालन करने वाले भव्य जीवों को, किसी के साथ माया से बर्ताव नहीं करना चाहिए।


मायित्वं कुरुते कृतं सकृदपिच्छायाविघातं गुणे-
ष्वायातैर्यमिनोऽर्जितेष्विह गुरुक्लेशैः शमादिष्वलम्।
सर्वे तत्र यदासते विनिभृताः क्रोधादयस्तत्वत-
स्तत्पापं-बत येन दुर्गतिपथे जीवश्चिरं भ्राम्यति॥९०॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि यदि एक बार भी किसी के साथ मायाचारी की जावे तो वह मायाचारी बड़ी कठिनता से संचय किए हुए अहिंसा, सत्यादि मुनियों के गुणों को फीका बना देती है अर्थात् वे गुण आदरणीय नहीं रहते और उस मायारूपी मकान में नाना प्रकार के क्रोधादि शत्रु छिपे बैठे रहते हैं और उस मायाचार से उत्पन्न हुए पाप से जीव नानाप्रकार के दुर्गति के पथ में भ्रमण करता रहता है इसलिए मुनियों को माया अपने पास नहीं फटकने देना चाहिए।


सत्यधर्म का वर्णन


स्वपरहितमेव मुनिभिर्मितममृतसमं सदैव सत्यं च।
वक्तव्यं वचनमथ प्रविधेयं धीधनैर्मौनम् ॥९१॥

अर्थ: उत्कृष्ट ज्ञान के धारण करने वाले मुनियों को प्रथम तो बोलना ही नहीं चाहिए। यदि बोले तो ऐसा वचन बोलना चाहिए जो समस्त प्राणियों के हित का करने वाला हो तथा परमित हो और अमृत के समान प्रिय हो तथा सर्वथा सत्य हो किन्तु जो वचन जीवों को पीड़ा देने वाला हो तथा कड़वा हो तो उस वचन की अपेक्षा मौन साधना ही अच्छा है।


सति सन्ति व्रतान्येव सूनृते वचसि स्थिते।
भवत्याराधिता सद्भिर्जगत्पूज्या च भारती ॥९२॥

अर्थ: जो मनुष्य सत्य वचन बोलने वाला है अर्थात् सत्य व्रत का पालन करने वाला है उसके समस्त व्रत विद्यमान हैं। सज्जन पुरुष तीन लोक में पूजनीय सरस्वती को भी सिद्ध कर लेता है।

१. धर्मोपदेशामृत (भाग 2/3)

आस्तामेतदमुत्र सूनृतवचाः कालेन यल्लप्स्यते
सद्भूपत्वसुरत्वसंसृतिसरित्पाराप्तिमुख्यं फलम्।
यत्प्राप्नोति यशः शशांकविशदं शिष्टेषु यन्मान्यतां
यत्साधुत्वमिहैव जन्मनि परं तत्केन संवर्ण्यते ॥९३॥

अर्थ: तथा और भी आचार्य कहते हैं कि सत्यवादी मनुष्य परभव में जाकर श्रेष्ठ चक्रवर्ती राजा बनते हैं तथा इन्द्रादि फल को प्राप्त कर लेते हैं और सबसे उत्कृष्ट मोक्षरूपी फल को भी प्राप्त कर लेते हैं यह बात तो दूर रही किन्तु इसी भव में वे चन्द्रमा के समान उत्तम कीर्ति को पा लेते हैं तथा शिष्ट मनुष्य उनको बड़ी प्रतिष्ठा से देखते हैं और वे सज्जन कहे जाते हैं इत्यादि नानाप्रकार के उत्तम फल उनको मिलते हैं जो कि सर्वथा अवर्णनीय है। इसलिए सज्जनों को अवश्य ही सत्य बोलना चाहिए।


शौचधर्म का वर्णन


यत्परदारार्थादिषु जन्तुषु निःस्पृहमहिंसकं चेतः।
दुर्भेद्यान्तर्मलहृत्तदेव शौचं परं नान्यत् ॥९४॥

अर्थ: जो परस्त्री तथा पराये धन में इच्छारहित है तथा किसी भी जीव के मारने की जिसकी भावना नहीं है और जो अत्यन्त दुर्भेद्य लोभ क्रोधादि मल का हरण करने वाला है ऐसा चित्त ही शौच धर्म है किन्तु उससे भिन्न कोई शौचधर्म नहीं है।


गंगासागरपुष्करादिषु सदा तीर्थेषु सर्वेष्वपि
स्नातस्यापि न जायते तनुभृतः प्रायो विशुद्धिः परा।
मिथ्यात्वादिमलीमसं यदि मनो बाह्येऽतिशुद्धोदकै
धौतं किं बहुशोऽपि शुद्ध्यति सुरापूरप्रपूर्णो घटः ॥९५॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं जिस प्रकार अत्यन्त घृणित मद्य से भरा हुआ घड़ा यदि बहुत बार शुद्ध जल से धोया भी जावे तो भी वह शुद्ध नहीं हो सकता उसी प्रकार जो मनुष्य बाह्य में गंगा पुष्कर आदि तीर्थों में स्नान करने वाला है किन्तु उसका अंतःकरण नानाप्रकार के क्रोधादि कषायों से मलीमस है तो वह कदापि उत्कृष्ट शुद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए मनुष्य को सबसे प्रथम अपने अंत:करण को शुद्ध करना चाहिए क्योंकि जब तक अंत:करण शुद्ध न होगा तब तक सर्व बाह्य क्रिया व्यर्थ है।


संयमधर्म का वर्णन


जन्तुकृपार्दितमनसः समितिषु साधोः प्रवर्तमानस्य।
प्राणेन्द्रियपरिहारः१ संयममाहुर्महामुनयः ॥९६॥

अर्थ: जिसका चित्त जीवों की दया से भीगा हुआ है तथा जो ईर्या, भाषा, एषणा आदि पाँच समितियों का पालन करने वाला है ऐसे साधु के जो षट्काय के जीवों की हिंसा का तथा इन्द्रियों के विषयों का त्याग है उसी को गणधरादिदेव संयमधर्म कहते हैं।


मानुष्यं किल दुर्लभं भवभृतस्तत्रापि जात्यादय-
स्तेष्वेवाप्तवचःश्रुतिःस्थितिरतस्तस्याश्च दृग्बोधने।
प्राप्ते ते अपि२ निर्मले अपि परं स्यातां न येनोज्झिते
स्वर्मोक्षैकफलप्रदे स च कथं न श्लाघ्यते संयमः ॥९७॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि प्रथम तो इस संसाररूपी गहन वन में भ्रमण करते हुए प्राणियों को मनुष्य होना ही अत्यन्त कठिन है किन्तु किसी कारण से मनुष्य जन्म प्राप्त भी हो जावे तो उत्तम ब्राह्मणादि जाति मिलना अति दुःसाध्य है। यदि किसी प्रबल दैवयोग से उत्तम जाति भी मिल जावे तो अर्हन्त भगवान् के वचनों का सुनना बड़ा दुर्लभ है यदि उनके सुनने का भी सौभाग्य प्राप्त हो जावे तो संसार में अधिक जीवन नहीं मिलता यदि अधिक जीवन भी मिले तो सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति होनी अतिकठिन है यदि किसी पुण्य के उदय से अखण्ड तथा निर्मल सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति भी हो जावे तो उस संयमधर्म के बिना वे स्वर्ग तथा मोक्षरूपी फल के देने वाले नहीं हो सकते इसलिए सबकी अपेक्षा संयम अतिप्रशंसनीय है अतः ऐसे संयम की अवश्य ही रक्षा करना चाहिए।


तपधर्म का वर्णन


कर्ममलविलयहेतोर्बोधदृशा तप्यते तपः प्रोक्तम्।
तद् द्वेधा द्वादशधा जन्माम्बुधियानपात्रमिदम् ॥९८॥

अर्थ: सम्यग्ज्ञानरूपी दृष्टि से भले प्रकार वस्तु के स्वरूप को जानकर ज्ञानावरणादि कर्ममल के नाश की बुद्धि से जो तप किया जाता है वही तप कहा गया है तथा वह तप मूल में बाह्य, अभ्यन्तर के भेद से दो प्रकार है और १. अनशन, २. अवमौदर्य, ३. वृत्तिपरिसंख्यान, ४. रसपरित्याग, ५ विविक्तशय्यासन, ६. कायक्लेश, इस रीति से छह प्रकार का बाह्य तथा १. प्रायश्चित्त, २. विनय, ३. वैयावृत्त्य, ४. स्वाध्याय, ५. व्युत्सर्ग, ६. ध्यान; इस प्रकार छह प्रकार का अभ्यन्तर इस रीति से उस तप के बारह भी भेद हैं तथा वह तप संसाररूपी समुद्र से पार करने के लिए जहाज के समान है अर्थात् मोक्ष का देने वाला है।


कषायविषयोद्धटप्रचुरतस्करौघो हठात्
तपः सुभटताडितो विघटते यतो दुर्जयः।
अतो हि निरुपद्रवश्चरति तेन धर्मश्रिया
यतिः समुपलक्षितः पथि विमुक्तिपुर्याः सुखम् ॥९९॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं यद्यपि क्रोधादि कषायरूपी उद्धत तथा प्रबल चोरों का समूह दुर्जय है अर्थात् साधारण रीति से जीतने में नहीं आ सकता तो भी जिस समय तपरूपी प्रबल योद्धा उसके सामने आता है उस समय उसकी कुछ भी तीन-पाँच नहीं चलती अर्थात् बात ही बात में वह जीत लिया जाता है इसलिए जो योगीश्वर तपरूप सुभट के साथ धर्मरूपी लक्ष्मी से युक्त है वह मोक्षरूपी नगर के मार्ग में निरुपद्रव तथा सुख से चला जाता है।


मिथ्यात्वादेर्यदिह भविता दुःखमुग्रं तपोभ्यो
जातं तस्मादुदककणिकैकेव सर्वाब्धिनीरात्।
स्तोकं तेन प्रसभमखिलं कृच्छ्रलब्धे नरत्वे
यद्येत्तर्हि स्खलति तदहो का क्षतिर्जीव ते स्यात् ॥१००॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि हे जीव जिस प्रकार समस्त समुद्र की अपेक्षा जल का कण अत्यन्त छोटा होता है उसी प्रकार तप के करने से बहुत थोड़े दुख का तुझे अनुभव करना पड़ता है किन्तु जिस समय मिथ्यात्व के उदय से तू नरक जायेगा उस समय तुझको नाना प्रकार के छेदन भेदन आदि असह्य दुखों का सामना करना पड़ेगा तो भी तू न जाने तप से क्यों भयभीत होता है? तथा तेरी तप के करने में क्या हानि है?।


त्यागधर्म का वर्णन


व्याख्या या क्रियते श्रुतस्य यतये यद्दीयते पुस्तकं
स्थानं संयमसाधनादिकमपि प्रीत्या सदाचारिणा।
स त्यागो वपुरादिनिर्ममतया नो किंचनास्ते यते-
राकिंचन्यमिदं च संसृतिहरो धर्मः सतां सम्मतः ॥१०१॥

अर्थ: शास्त्रों का भलीभाँति व्याख्यान करना तथा मुनियों को पुस्तकें तथा स्थान और संयम के साधन पिच्छिका कमण्डलु आदि का देना सदाचारियों का उत्कृष्ट त्याग धर्म है और मेरा कुछ भी नहीं है ऐसा विचार कर अत्यन्त निकट शरीर में भी ममता छोड़ देना आकिंचन्य नामक धर्म है तथा वह यति के होता है और वह समस्त संसार का नाश करने वाला है तथा समस्त श्रेष्ठ पुरुषों के द्वारा वह आदरणीय है।


आकिंचन्यधर्म का स्वरूप वर्णन


विमोहा मोक्षाय स्वहितनिरताश्चारुचरिताः
गृहादि त्यक्त्वा ये विदधति तपस्तेऽपि विरलाः।
तपस्यन्तोऽन्यस्मिन्नपि यमिनि शास्त्रादि ददतः
सहायाः स्युर्ये ते जगति यमिनो दुर्लभतराः ॥१०२॥

अर्थ: जिनका सर्वथा मोह गल गया है तथा अपने आत्मा के हित में ही निरन्तर लगे रहते हैं और सुन्दर चरित्र के धारण करने वाले हैं तथा घर, स्त्री, पुत्रादि को छोड़कर मोक्ष के लिए तप करते हैं वे मुनि संसार में विरले ही हैं तथा जो स्वतः अपने हित के लिए तप करने वाले हैं तथा दूसरे तपस्वियों के लिए जो शास्त्रादि का दान करते हैं और उनके सहायी भी हैं ऐसे योगीश्वर तो संसार के बीच में अत्यन्त ही दुर्लभ हैं अर्थात् बड़ी कठिनाई से मिलते हैं।


परं मत्वा सर्वं परिहृतमशेषं श्रुतविदा,
वपुः पुस्ताद्यास्ते तदपि निकटं चेदिति मतिः।
ममत्वाभावे तत्सदपि न सदन्यत्र घटते,
जिनेन्द्राज्ञाभंगो भवति च हठात् कल्मषमृषेः ॥१०३॥

अर्थ: समस्त शास्त्र के जानने वाले वीतरागी ने अपनी आत्मा से समस्त वस्तु को भिन्न जानकर सबका त्याग कर दिया है। यदि कहोगे कि सबको छोड़ते समय शरीर, पुस्तकादि का क्यों नहीं त्याग किया तो उसका समाधान यही है कि उनकी शरीरादि में भी किसी प्रकार की ममता नहीं रही है इसलिए वे मौजूद भी, नहीं मौजूद की तरह ही है अर्थात् मुनियों का शरीरादि, बिना आयुकर्म के नाश हुए छूट नहीं सकता यदि वे बीच में ही छोड़ देवे तो उनको प्राण घात करने के कारण हिंसा का भागी होना पड़ेगा। इसलिए शरीरादि तो रहता है किन्तु वे शरीरादि में किसी प्रकार का ममत्व नहीं रखते परन्तु यदि वे शरीरादि में किसी प्रकार का ममत्व करें तो उसको जिनेन्द्र की आज्ञाभंगरूप महान दोष का भागी होना पड़े अर्थात् जब तक ममत्व रहेगा तब तक वे मुनि ही नहीं कहलाये जा सकते।


ब्रह्मचर्यधर्म का वर्णन


यत्संगाधारमेतच्चलति लघु च यत्तीक्ष्णदुःखौघधारं
मृत्पिण्डीभूतभूतं कृतबहुविकृतिभ्रान्तिसंसारचक्रम्।
ता नित्यं यन्मुमुक्षुर्यतिरमलमतीः शान्तमोहः प्रपश्ये-
ज्जामीः पुत्रीः सवित्रीरिवहरिणदृशस्तत्परं ब्रह्मचर्यम् ॥१०४॥

अर्थ: जिस प्रकार कुम्भकार का चाक जमीन के आधार से चलता है तथा उस चाक की तीक्ष्ण धारा रहती है और उसके ऊपर मिट्टी का पिण्ड भी रहता है तथा वह चाक नाना प्रकार के कुशूल, स्थास आदि घट के विकारों को करता है उसी प्रकार संसाररूपी चाक की आधार यह स्त्री है अर्थात् यह स्त्री न होती तो कदापि संसार में भटकता न फिरता तथा इस संसाररूपी चाक में अत्यन्त तीक्ष्ण दुखों का समूह ही धार है अर्थात् संसार में नाना प्रकार के नरकादि दुखों का सामना करना पड़ता है और इस संसाररूपी चाक के ऊपर नाना प्रकार के जीव जो हैं वे ही पिण्ड हैं तथा वह संसाररूपी चाक देव, मनुष्यादि नाना प्रकार के विकार कराकर जीवों को भ्रमण कराने वाला है अतः स्त्री ही संसार चक्र का कारण है इसलिए जो मोक्ष का अभिलाषी मनुष्य उन स्त्रियों को माता, बहिन, पुत्री के समान मानता है उसी के उत्कृष्ट धर्म का भलीभाँति पालन होता है अतः ब्रह्मचारी मनुष्यों को चाहिए कि वे कदापि स्त्रियों के साथ सम्बन्ध न रखें।


अविरतमिह तावत्पुण्यभाजो मनुष्याः
हृदि विरचितरागाः कामिनीनां वसन्ति।
कथमपि न पुनस्ता जातु येषां तदंघ्रीः
प्रतिदिनमतिनम्रास्तेऽपि नित्यं स्तुवन्ति ॥१०५॥

अर्थ: जो पुरुष निरन्तर स्त्रियों के हृदय में प्रीति उपजावने वाले हैं अर्थात् जिनको स्त्रियाँ चाहती हैं यद्यपि वे भी संसार में धन्य हैं परन्तु जिन मनुष्यों के हृदय में स्त्रियाँ स्वप्न में भी निवास नहीं करती वे उनसे भी अधिक धन्य हैं तथा उन वीतरागी पुरुषों के चरण कमलों को स्त्रियों के प्रिय पात्र बड़े-बड़े चक्रवर्ती आदि भी शिर झुकाकर नमस्कार करते हैं इसलिए जिन पुरुषों को संसार में अपनी कीर्ति फैलाने की इच्छा है उनको कदापि स्त्रियों के जाल में नहीं फँसना चाहिए।


वैराग्यत्यागदारुद्वयकृतरचना चारुनिश्रेणिका यैः
पादस्थानैरुदारैर्दशभिरनुगता निश्चलैर्ज्ञानदृष्टेः।
योग्या स्यादारुरुक्षोः शिवपदसदनं गन्तुमित्येषु केषां
नो धर्मेषु त्रिलोकीपतिभिरपि सदा स्तूयमानेषु हृष्टिः॥१०६॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि जिसके इधर-उधर वैराग्य तथा त्यागरूपी मनोहर दो काष्ट लगे हुए हैं तथा जिसमें बड़े-बड़े मजबूत दशधर्मरूपी पादस्थान (दण्डे) मौजूद हैं ऐसी सीढ़ी मोक्षरूपी महल को चढ़ने की इच्छा करने वाले मनुष्य के चढ़ने के लिए योग्य है क्योंकि जो तीन लोक के पति इन्द्रादिकों से वन्दनीक हैं उन दश धर्मों के धारण करने में किसको हर्ष नहीं हो सकता है ? अर्थात् समस्त मोक्षाभिलाषी उनको हर्ष के साथ धारण कर सकते हैं।


शुद्धात्मा की परिणतिरूप धर्म का वर्णन


निःशेषामलशीलसद्गुणमयीमत्यन्तसाम्यस्थितां
वन्दे तां परमात्मनः प्रणयिनीं कृत्यान्तगां स्वस्थताम्।
यत्रानन्तचतुष्टयामृतरसित्वात्मानमन्तर्गतं
न प्राप्नोति जरादिदुःखसहशिखः संसारदावानलः॥१०७॥

अर्थ: समस्त निर्मल शील गुणस्वरूप तथा सर्वथा समतारूप अवस्था में होने वाली और उत्कृष्ट आत्मा से प्रीति कराने वाली तथा जिसके होने पर किसी प्रकार का कर्त्तव्य बाकी नहीं रहता ऐसी स्वस्थता को मैं नमस्कार करता हूँ जिस अनंत ज्ञानादि अनन्त चतुष्टय स्वरूप, स्वस्थतारूपी अमृत नदी के भीतर रहे हुए आत्मा को जरा आदि दुःसह शिखा को धारण करने वाला भी संसाररूपी बड़वानल प्राप्त नहीं हो सकता।


आयातेऽनुभवे भवारिमथने निर्मुक्तमूर्त्याश्रये
शुद्धेऽन्यादृशि सोमसूर्यहुतभुक्कान्तेरनन्तप्रभे।
यस्मिन्नस्तमुपैति चित्रमचिरान्निःशेषवस्त्वन्तरं
तद्वन्दे विपुलप्रमोदसदनं चिद्रूपमेकं महः ॥१०८॥

अर्थ: समस्त कर्मादि बैरियों के नाश करने वाले तथा शरीरादि के आश्रय से रहित अर्थात् जिसको किसी प्रकार के शरीर आदि का आश्रय नहीं है और शुद्ध तथा दूसरे के प्रत्यक्ष के अगोचर तथा चन्द्रमा-सूर्य और अग्नि से भी अनन्तगुणी प्रभा को धारण करने वाले जिस चैतन्यस्वरूप उत्कृष्ट तेज के अनुभव होने पर बात ही बात में समस्त पर पदार्थ अस्त हो जाते हैं ऐसे अनेक प्रकार के प्रमोद को पैदा करने वाले उस चैतन्यस्वरूप तेज को मैं शिर झुकाकर नमस्कार करता हूँ।


जातिर्याति न यत्र यत्र च मृतो मृत्युर्जरा जर्जरा
जाता यत्र न कर्मकायघटना नो वाग्रुजो १व्याधयः।
यत्रात्मैव परं चकास्ति विशदज्ञानैकमूर्तिः विभु-
र्नित्यं तत्पदमाश्रिता निरुपमाः सिद्धाः सदा पान्तु वः ॥१०९॥

अर्थ: जहाँ पर न जन्म है, न मरण है, न जरा है, न कर्मों का तथा शरीर का सम्बन्ध है, न वाणी है और न रोग है तथा जहाँ पर निर्मलज्ञान को धारण करने वाला और प्रभु आत्मा सदा प्रकाशमान है ऐसे उस अविनाशी पद में रहने वाले उपमा रहित (अर्थात् जिनको किसी की उपमा ही नहीं दे सकते ऐसे) सिद्ध भगवान् मेरी रक्षा करें अर्थात् ऐसे सिद्धों की मैं शरण लेता हूँ।


दुर्लक्ष्येपि चिदात्मनि श्रुतबलात्किंचित्स्वसंवेदनात्
ब्रूमः किंचिदिह प्रबोधनिधिभिर्ग्राह्यं न किञ्चिच्छलम्।
मोहे राजनि कर्मणामतितरां प्रौढान्तराये रिपौ
दृग्बोधावरणद्वये सति मतिस्तादृक्कुतो मादृशाम् ॥११०॥

अर्थ: जिस प्रकार अमूर्तिक होने के कारण आकाश आदि किसी के देखने में नहीं आ सकते उसी प्रकार यद्यपि यह आत्मा किसी के दृष्टिगोचर नहीं है तो भी उस चैतन्यस्वरूप आत्मा के स्वरूप को शास्त्र के बल से अथवा अपने अनुभव से मैं वर्णन करता हूँ इसलिए बुद्धिमानों को इसमें किसी प्रकार की दगाबाजी नहीं समझनी चाहिए क्योंकि समस्त कर्मों का राजा मोहनीय और अत्यन्त प्रबल अंतरायरूपी शत्रु तथा ज्ञानावरण-दर्शनावरण अभी मेरी आत्मा के साथ लगे हुए हैं इसलिए वास्तविक स्वरूप के कहने में मेरी बुद्धि कैसे प्रवीण हो सकती है?


विद्वन्मन्यतया सदस्यतितरामुद्दण्डवागडम्बराः
शृङ्गारादिरसैः प्रमोदजनकं व्याख्यानमातन्वते।
ये ते च प्रतिसद्म सन्ति बहवो व्यामोहविस्तारिणो
येभ्यस्तत्परमात्मतत्त्वविषयं ज्ञानं तु ते दुर्लभाः ॥१११॥

अर्थ: अपने को विद्वान् मानकर शृंगारादि रस सहित नाना प्रकार के प्रमोद जनक व्याख्यानों को कहने वाले तथा सभा में व्यर्थ वचनों के आडम्बर को धारण करने वाले और मनुष्यों को सन्मार्ग से भुलाने वाले पुरुष संसार में प्रतिगृह बहुत से मिलेंगे परन्तु जो परमात्म तत्त्व के ज्ञान के देने वाले हैं ऐसे मनुष्य बड़ी कठिनाई से मिलते हैं।


आपद्धेतुषु रागरोषनिकृतिप्रायेषु दोषेष्वलं
मोहात्सर्वजनस्य चेतसि सदा सत्सु स्वभावादपि।
तन्नाशाय च संविदे च फलवत्काव्यं कवेर्जायते
शृङ्गारादिरसं तु सर्वजगतो मोहाय दुःखाय च ॥११२॥

अर्थ: समस्त मनुष्यों के चित्तों में नाना प्रकार के दुख देने वाले ऐसे राग-द्वेष, माया, क्रोध, लोभ आदि दोष स्वभाव से ही रहते हैं इसलिए जो कवि का काव्य उनको मूल में उड़ा देता है तथा सम्यग्ज्ञान का उत्पन्न करने वाला होता है वास्तव में वही कार्यकारी समझना चाहिए अर्थात् जिसमें वीतरागपने का वर्णन होवे, वही काव्य फल को देने वाला है और शृंगारादि रस तो समस्त जगत् को मोह के उत्पन्न करने वाले तथा दुख के देने वाले हैं इसलिए भव्यों को चाहिए कि वे वीतराग भाव को दर्शाने वाले शास्त्रों का ही अभ्यास करें।


कालादपि प्रसृतमोहमहांधकारे मार्गं न पश्यति जनो जगति प्रशस्तं।
क्षुद्राः क्षिपन्ति दृशि दुःश्रुतिधूलिमस्य न स्यात्कथं गतिर निश्चितदुष्पथेषु ॥११३॥

अर्थ: अनादिकाल से फैले हुए मोहरूपी महान् अन्धकार से व्याप्त इस जगत् में बिचारे मोही जीव एक तो स्वयमेव ही श्रेष्ठ मार्ग को नहीं देख सकते हैं। यदि किसी रीति से देख भी सकें तो दुष्ट पुरुष और भी उनकी आँखों में शृंगारादि शास्त्र सुनाकर धूली डालते हैं इसलिए कहाँ तक वे जीव खोटे मार्ग में गमन नहीं कर सकते?


विण्मूत्रकृमिसंकुले कृतघृणैरंत्रादिभिः पूरिते
शुक्रासृग्वरयोषितामपि तनुर्मातुः कुगर्भेऽजनि।
सापि क्लिष्टरसादिधातुघटिता पूर्णा मलाद्यैरहो
चित्रं चन्द्रमुखीति जातमतिभिर्विद्वद्भिरावर्ण्यते ॥११४॥

अर्थ: यह स्त्री का शरीर विष्टा, मूत्र तथा नाना प्रकार के कीड़ों से व्याप्त और प्रबल घृणा को पैदा करने वाले आंत, मांस आदि से पूरित तथा वीर्य, रक्त आदि से पुष्ट ऐसे खोटे माता के गर्भ से उत्पन्न हुआ है और स्वयं भी वह स्त्री नाना प्रकार के खोटे वीर्य रक्त आदि से बनी हुई है तथा मल आदि से युक्त है तो भी नीच विद्वान् कवि ऐसी स्त्री को चन्द्रमुखी कहते हैं यह बड़े आश्चर्य की बात है।


कचा यूकावासा मुखमजिनबद्धास्थिनिचयः
कुचौ मांसोच्छ्रायौ जठरमपि विष्ठादिघटिका।
मलोत्सर्गे यंत्रं जघनमबलायाः क्रमयुगं
तदाधारस्थूणे किमिह किल रागाय महताम् ॥११५॥

अर्थ: स्त्री के केश तो जुआँ के घर हैं, मुख चर्म से वेष्टित हाड़ों का समूह है, स्तन मांस के पिण्ड हैं, उदर विष्ठा आदि खराब चीजों का घर है, योनिस्थान, मूत्र आदि के बहने का नाला है और दोनों चरण उस योनि स्थान के ठहरने के लिए खम्भों के समान हैं इसलिए ऐसी खराब स्त्री में विद्वान् पुरुष कदापि राग नहीं कर सकते।


परमधर्मनदाज्जडमीनकान् शशिमुखीवडिशेनसमुद्धृतान् ।
अतिसमुल्लसिते रतिमुर्मुरे पचति हा हतकः स्मरधीवरः ॥११६॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि यह हिंसक कामदेवरूपी धीवर जीवरूप मछलियों को उत्कृष्ट धर्मरूपी तालाब से निकालकर स्त्रीरूपी मांस सहित कांटे पर लटकाकर अत्यन्त प्रज्वलित संभोगरूपी भाड़ में भूँजती है यह बड़े दुख की बात है।


येनेदं जगदापदम्बुधिगतं कुर्वीत मोहो हठात्
येनैते प्रतिजन्तु हन्तुमनसः क्रोधादयो दुर्जयाः।
येन भ्रातरियं च संसृतिसरित् संजायते दुस्तरा
तज्जानीहि समस्तदोषविषमं स्त्रीरूपमेतद्ध्रुवम्॥११७॥

अर्थ: जिस स्त्री के रूप की सहायता से मोह, जबर्दस्ती मनुष्य को नाना प्रकार के दुख देता है तथा उसी रूप की सहायता से समस्त जीवों के नाशक क्रोधादि कषाय दुर्जय हो जाते हैं और उसी रूप की सहायता से संसाररूपी नदी तैरी नहीं जा सकती अर्थात् अथाह हो जाती है इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि हे भव्यो उस स्त्री के रूप को समस्त दोषों से भी भयंकर समझो।


मोहव्याधभटेन संसृतिवने मुग्धौघबंधापदे,
पाशाः पंकजलोचनादिविषयाः सर्वत्र सज्जीकृताः।
मुग्धास्तत्र पतन्ति तानपि वरानास्थाय वांञ्छन्त्यहो,
हा कष्टं परजन्मनेऽपि न विदः क्वापीति धिङ्मूर्खताम् ॥११८॥

अर्थ: इस संसार वन में भोले जीवरूपी मृगों को बाँध कर दुख देने के लिए मोहरूपी सुभट ने चिड़िया मारने को सब जगह लोचनादि विषयरूपी जाल फैला रखे हैं और उन विषयरूपी जालों को श्रेष्ठ मानकर भोले जीव उनमें आकर फँस जाते हैं यह बड़े दुख की बात है किन्तु आत्मा के स्वरूप को जानने वाले विद्वान् स्वप्न में भी उन जालों में नहीं फँसते और परलोक के लिए भी उन विषयों को हितकारी नहीं समझते इसलिए आचार्य कहते हैं कि मूर्खता के लिए धिक्कार है।


एतन्मोहतकप्रयोगविहितभ्रान्तिभ्रमच्चक्षुषा
पश्यत्येष जनोऽसमञ्जसमसद्बुद्धिर्ध्रुवं व्यापदे।
अप्येतान्विषयाननन्तनरकक्लेशप्रदानस्थिरान्
यच्छश्वत्सुखसागरानिव सतश्चेतः प्रियान्मन्यते ॥११९॥

अर्थ: यह कुबुद्धि मनुष्य, मोहरूपी ठग उसके प्रयोग से उत्पन्न हुए भ्रम से भ्रान्त जो नेत्र उससे विपरीत ही देखता है तथा विपरीत देखने से नाना प्रकार के दुखों का अनुभव करता है तो भी अनन्त नरकों के दुखों को देने वाले तथा बिजली के समान चंचल इन विषयों को स्थिर तथा निरन्तर सुख के देने वाले और चित्त को प्रिय मानता है।


संसारेऽत्र घनाटवीपरिसरे मोहष्ठकः कामिनी-
क्रोधाद्याश्च तदीयपेटकमिदं तत्सन्निधौ जायते।
प्राणी तद्विहितप्रयोगविकलः तद्वश्यतामागतो
न स्वं चेतयते लभेत विपदं ज्ञातुः प्रभोः कथ्यताम् ॥१२०॥

अर्थ: इस संसाररूपी विस्तीर्ण वन में ठग तो मोह है और स्त्री तथा क्रोध, मान, माया आदि उसके पास प्राणियों को ठगने की सामग्री है (अर्थात् स्त्री, क्रोधादि कारणों से ही वह प्राणियों को ठगता है) तथा प्राणी उसके प्रयोग से विकल होकर उसके आधीन पड़े हुए हैं और अपने स्वरूप को भी नहीं जानते हैं तथा नाना प्रकार की आपत्तियों को सहते हैं इसलिए ग्रन्थकार कहते हैं कि हे जीव तुझे उस ज्ञानानन्द स्वरूप आत्मा का अर्थात् श्रीसर्वज्ञदेव का ही आश्रय करना चाहिए।


ऐश्वर्यादि गुणप्रकाशनतया मूढा हि ये कुर्वते
सर्वेषां टिरिटिल्लितानि पुरतः पश्यन्ति नो व्यापदः।
विद्युल्लोलमपि स्थिरं परमपि स्वं पुत्रदारादिकं
मन्यन्ते यदहो तदत्र विषमं मोहप्रभोः शासनम् ॥१२१॥

अर्थ: मूढ़ पुरुष मैं लक्ष्मीवान् हूँ तथा मैं ज्ञानवान हूँ इत्यादि अपने गुणों को प्रकाशित करते हैं तथा समस्त पुरुषों के सामने नाना प्रकार की गालियों को बकते हैं किन्तु आने वाली नरकादि विपत्तियों पर कुछ भी ध्यान नहीं देते तथा बिजली के समान चंचल भी पुत्र, स्त्री आदि को स्थिर मानते हैं और अपने से भिन्न भी उनको अपना मानते हैं इसलिए आचार्य कहते हैं कि मोह चक्रवर्ती की आज्ञा बड़ी कठोर है।


क्व यामः किं कुर्मः कथमिह सुखं किं च भविता
कुतो लभ्या लक्ष्मीः क इह नृपतिः सेव्यत इति।
विकल्पानां जालं जडयति मनः पश्यत सतां
अपि ज्ञातार्थानामिह महदहो मोहचरितम् ॥१२२॥

अर्थ: हम कहाँ जावें, क्या करें, कैसे सुख हो, किस रीति से लक्ष्मी मिले, किस राजा की सेवा टहल करें इत्यादि नाना प्रकार के विकल्पों के समूह संसार में प्राणियों के उत्पन्न होते रहते हैं तथा भले प्रकार वस्तु के स्वरूप को जानने वाले भी मनुष्यों के मन को जड़ बना देते हैं यह प्रत्यक्ष गोचर है इसलिए ग्रन्थकार कहते हैं कि मोह का चरित्र बड़ा आश्चर्यकारी है।


विहाय व्यामोहं धनसदनतन्वादिविषये
कुरुध्वं तत्तूर्णं किमपि निजकार्यं बत बुधाः।
न येनेदं जन्म प्रभवति सुनृत्वादिवघटना
पुनः स्यान्न स्याद्वा किमपरवचोऽडम्बरशतैः ॥१२३॥

अर्थ: आचार्य उपदेश देते हैं कि अरे बुद्धिमानों विशेष कहाँ तक कहें शीघ्र स्त्री, पुत्र, धन, घर आदि पदार्थों से मोह छोड़कर ऐसा कोई काम करो जिससे तुमको फिर जन्म न धारण करना पड़े क्योंकि नहीं मालूम फिर उत्तम कुल, जिनधर्म का शरण, निर्ग्रन्थ गुरु का उपदेश आदि मिले या नहीं मिले।


वाचस्तस्य प्रमाणं य इह जिनपतिः सर्वविद्वीतरागो
रागद्वेषादिदोषैरुपहत-मनसो नेतरस्यानृतत्वात्।
एतन्निश्चित्य चित्ते श्रयत बत बुधा विश्वतत्त्वोपलब्ध्यै
मुक्तेर्मूलं तमेकं भ्रमति किमु बहुष्वंधवद् दुष्पथेषु ॥१२४॥

अर्थ: और भी आचार्य कहते हैं कि जो समस्त पदार्थों को अच्छी तरह जानने वाला है तथा वीतराग है और ज्ञानावरणादि चार घातिया कर्मों से रहित है उसी का वाक्य प्रमाण है किन्तु उससे विपरीत जो अल्पज्ञानी, रागी आदि हैं उनका वचन असत्य होने से प्रमाण नहीं है ऐसा मन में ठानकर हे पंडितो केवलज्ञान की प्राप्ति के लिए मुक्ति के देने वाले उस अर्हन्त का ही आश्रय करो, क्यों व्यर्थ अंधे के समान जहाँ-तहाँ खोटे मार्ग में गिरते-फिरते हो।


यः कल्पयेत् किमपि सर्वविदोऽपि वाचि सन्दिह्य तत्त्वमसमञ्जसमात्मबुद्ध्या।
खे पत्रिणां विचरतां सुदृशेक्षितानां संख्यां प्रति प्रविदधाति स वादमंधः ॥१२५॥

अर्थ: जो मूढ़, सर्वज्ञ के वचन में भी सन्देह कर अपनी बुद्धि की गढ़न्त से अपरमार्थभूत तत्त्वों की कल्पना करता है वह वैसा ही काम करता है कि जिस प्रकार अंधा मनुष्य आकाश में जाते हुए पक्षियों की गिनती में अच्छे नेत्र वाले पुरुष के साथ विवाद करता है।


उक्तं जिनैर्द्वादशभेदमङ्गं श्रुतं ततो बाह्यमनन्तभेदम्।
तस्मिन्नुपादेयतया चिदात्मा ततः परं हेयतयाऽभ्यधायि ॥१२६॥

अर्थ: श्रुत के दो भेद हैं एक अंगश्रुत और दूसरा बाह्यश्रुत। उनमें अंगश्रुत बारह प्रकार का जिनेन्द्र भगवान् ने कहा है तथा बाह्यश्रुत के अनन्त भेद कहे हैं परन्तु उन दोनों श्रुतों में ज्ञानदर्शनशाली आत्मा ही ग्राह्य (ग्रहण करने योग्य) कहा है किन्तु उससे जुदे समस्त पदार्थ हेय (त्यागने योग्य) कहे हैं।


अल्पायुषामल्पधियामिदानीं कुतः समस्तश्रुतपाठशक्तिः।
तदत्र मुक्तिं प्रति बीजमात्रमभ्यस्यतामात्महितं प्रयत्नात् ॥१२७॥

अर्थ: इस पंचमकाल में ज्ञान, आयु आदि के निरंतर क्षीण होने से मनुष्य अल्पायु तथा अल्पज्ञान के धारी रह गये हैं इसलिए वे समस्त श्रुत का अभ्यास नहीं कर सकते। अतः जो पुरुष मोक्ष के अभिलाषी हैं उनको मुक्ति के देने वाले तथा आत्मा के हितकारी श्रुत का तो अवश्य ही बड़े प्रयत्न के साथ अभ्यास करना चाहिए।


निश्चेतव्यो जिनेन्द्रस्तदतुलवचसां गोचरेऽर्थे परोक्षे
कार्यः सोऽपि प्रमाणं वदत किमपरेणात्र१ कोलाहलेन।
सत्यां छद्मस्थतायामिह समयपथस्वानुभूतिप्रबुद्धा
भो भो भव्या यतध्वं दृगवगमनिधावात्मनि प्रीतिभाजः ॥१२८॥

अर्थ: वर्तमानकाल में जिनेन्द्र हैं ऐसा विश्वास अवश्य करना चाहिए तथा जो पदार्थ सूक्ष्म तथा दूर होने के कारण दृष्टिगोचर नहीं है किन्तु जिनेन्द्र ने उनका वर्णन अपनी दिव्यध्वनि से किया है तो वे भी अवश्य हैं ऐसा मानना चाहिए। परन्तु जिनेन्द्र अथवा जिनेन्द्र के वचन में व्यर्थ संशय करना ठीक नहीं क्योंकि इस काल में समस्त जीव थोड़े ज्ञान के धारी हैं इसलिए आचार्य कहते हैं कि जिन भगवान् के कहे हुए सिद्धान्त मार्ग से स्वानुभव को प्राप्त कर सदा प्रबुद्ध और अपनी आत्मा में प्रीति को भजने वाले, हे भव्य जीवो ! तुम सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी निधि के लिए अवश्य यत्न करो।


तद्ध्यायत तात्पर्याज्ज्योतिः सच्चिन्मयं विना यस्मात्।
सदपि न सत्सति यस्मिन् निश्चितमाभासते विश्वम् ॥१२९॥

अर्थ: जिस श्रेष्ठ तथा ज्ञानस्वरूप चैतन्य के बिना समस्त पदार्थ मौजूद भी नहीं मौजूद के समान हैं और जिस चैतन्य के होने पर समस्त पदार्थों का प्रकट रीति से प्रतिभास होता है ऐसे ज्ञानस्वरूप आत्मारूपी ज्योति की भव्य जीवों को अवश्य आराधना तथा उपासना करनी चाहिए।


अज्ञो यद्भवकोटिभिः क्षपयति स्वं कर्म तस्माद्बहु
स्वीकुर्वन् कृतसंवरः स्थिरमना ज्ञानी तु तत्तत्क्षणात्।
तीक्ष्णक्लेशहयाश्रितोऽपि हि पदं नेष्टं तपःस्यन्दनो
नेयं तन्नयति प्रभुं स्फुटतरज्ञानैकसूतोज्झितः ॥१३०॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि अज्ञानी जीव कठोर तप आदि के द्वारा जितने कर्मों को करोड़ वर्ष में क्षय करता है उससे अधिक कर्मों को, स्थिर मन होकर संवर का धारी ज्ञानी जीव क्षणमात्र में क्षय कर देता है सो ठीक ही है क्योंकि जिस तपरूपी रथ में तीक्ष्ण क्लेशरूपी घोड़ा लगे हुए हैं किन्तु ज्ञानरूपी सारथी नहीं हैं तो वह तपरूपी रथ कदापि आत्मारूपी प्रभु को मोक्षस्थान में नहीं ले जा सकता।


कर्माब्धौ तद्विचित्रोदयलहरिभरव्याकुले व्यापदुग्र-
भ्राम्यन्नक्रादिकीर्णे मृतिजनननलसद्वाडवावर्तगर्ते।
मुक्तःशक्त्या हतांगः प्रतिगति स पुमान् मज्जनोन्मज्जनाभ्या-
मप्राप्यज्ञानपोतं तदनुगतिजडः पारगामी कथं स्यात् ॥१३१॥

अर्थ: ग्रन्थकार कहते हैं कि यह कर्म एक प्रकार का बड़ा भारी समुद्र है क्योंकि जिस प्रकार समुद्र अनेक लहरों से व्याप्त है उसी प्रकार यह कर्मरूपी समुद्र भी अनेक उदय रूप लहरों से व्याप्त है तथा जिस प्रकार समुद्र में नाना प्रकार के भयंकर मगरमच्छादि हुआ करते हैं उसी प्रकार इस कर्मरूपी समुद्र में भी इष्ट वियोग, अनिष्ट संयोग आदि नाना प्रकार की आपत्तिरूप मगरमच्छादि विद्यमान हैं तथा जिस प्रकार समुद्र में बड़वानल भँवर गड्ढे हुआ करते हैं उसी प्रकार इस कर्मरूपी समुद्र में भी नाना प्रकार के जन्म-मरण आदि बड़वानल भँवर हैं इसलिए ऐसे भयंकर समुद्र में शक्तिहीन तथा अनादिकाल से सर्वत्र गोता खाता हुआ मनुष्य जब तक ज्ञानरूपी अनुकूल जहाज को न प्राप्त करेगा तब तक कदापि पार नहीं हो सकता।


शश्वन्मोहमहान्धकारकलिते त्रैलोक्यसद्मान्यसौ,
जैनी वागमलप्रदीपकलिका न स्याद्यदि द्योतिका।
भावानामुपलब्धिरेव न भवेत् सम्यक्त्वदृष्टेतर-
प्राप्तित्यागकृते पुनस्तनुभृतां दूरे मतिस्तादृशी ॥१३२॥

अर्थ: मोहरूपी गाढ़े अंधकार से व्याप्त इस तीनलोकरूपी मकान को प्रकाश करने वाला यदि यह भगवान् की वाणीरूप दीपक न होता तो इष्ट की प्राप्ति तथा अनिष्ट का त्याग तो दूर रहे मनुष्यों को पदार्थों का भी ज्ञान न होता।


शान्ते कर्मण्युचितसकलक्षेत्रकालादिहेतौ
लब्धे स्वास्थ्यं कथमपि लसद्योगमुद्राविशेषम् ।
आत्माधर्मो यदयमसुखस्फीतसंसारगर्ता
दुद्धृत्य स्वं सुखमयपदे धारयत्यात्मनैव ॥१३३॥

अर्थ: समस्त कर्मों के उपशम होने पर तथा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप योग्य सामग्री के मिलने पर जब यह आत्मा ध्यान में लीन होकर अपने स्वरूप का चिन्तन करता है, उस समय नाना दुःखों के देने वाले संसाररूपी गड्ढे से छूटकर अपने से ही अपने को उत्तम सुख में पहुँचाता है इसलिए आत्मा से अतिरिक्त कोई धर्म नहीं है।


नो शून्यो न जडो न भूतजनितो नो कर्तृभावं गतो
नैको न क्षणिको न विश्वविततो नित्यो न चैकान्ततः ।
आत्मा कायमितिश्चिदेकनिलयः कर्ता च भोक्ता स्वयं
संयुक्तः स्थिरताविनाशनजननैः प्रत्येकमेकक्षणे ॥१३४॥

अर्थ: एकांत से न आत्मा शून्य है, न जड़ है, न पंचभूत से उत्पन्न हुआ है, न कर्ता है, न एक है, न क्षणिक है, न लोकव्यापी है, न नित्य है, किन्तु अपने शरीर के परिमाण है तथा सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान आदि गुणों का आधार है और अपने कर्मों का कर्ता है और अपने ही कर्मों का भोक्ता है तथा एक ही क्षण में सदा काल उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य इन तीनों धर्मों से सहित है।


क्वात्मा तिष्ठति कीदृशः स कलितः केनात्र यस्येदृशी
भ्रान्तिस्तत्र विकल्पसंभृतमना यः कोऽपि स ज्ञायताम्।
किंचान्यस्य कुतो मतिःपरमियं भ्रान्ताऽशुभात्कर्मणो
नीत्वा नाशमुपायतस्तदखिलं जानाति ज्ञाता प्रभुः॥१३५॥

अर्थ: आत्मा का नहीं जानने वाला यदि कोई मनुष्य किसी को पूछे कि आत्मा कहाँ रहता है? कैसा है? कौन आत्मा को भलीभाँति जानता है तो उसको यही कहना चाहिए कि जिसके मन में कैसा है, कहाँ है इत्यादि विकल्प उठ रहे हैं वही आत्मा है उसके अतिरिक्त कोई आत्मा नहीं है क्योंकि जड़ में कैसा है, कहाँ है इत्यादि कदापि बुद्धि नहीं हो सकती परन्तु अशुभकर्म से जीवों की बुद्धि भ्रांत हो रही है इसलिए जब यह आत्मा उन कर्मों को मूल से नाशकर देता है उस समय आपसे आप ही यह अपने स्वरूप को तथा दूसरे पदार्थों को जानने लग जाता है इसलिए आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहिचानने के अभिलाषियों को तप आदि के द्वारा कर्मों के नाश करने का अवश्य प्रयत्न करना चाहिए।


आत्मा मूर्तिविवर्जितोऽपि वपुषि स्थित्वापि दुर्लक्ष्यतां
प्राप्तोपि स्फुरति स्फुटं यदहमित्युल्लेखतः संततम्।
तत्किं मुह्यत शासनादपि गुरोर्भ्रान्तिः समुत्सृज्यता-
मन्तः पश्यत निश्चलेन मनसा तं तन्मुखाक्षव्रजाः ॥१३६॥

अर्थ: यद्यपि इस आत्मा की कोई मूर्ति नहीं है और यह शरीर के भीतर ही रहता है इसलिए इसको प्रत्यक्ष देखना अत्यन्त कठिन है तो भी (अहं जानामि, अहं करोमि) मैं जानता हूँ तथा मैं करता हूँ इत्यादि प्रतीतियों से यह स्पष्ट रीति से जाना जाता है तथा गुरु आदि के उपदेश से भी भलीभाँति इसका ज्ञान होता है अतः ग्रन्थकार कहते हैं-हे भव्य जीवो मन को तथा इन्द्रियों को निश्चल कर अपने अभ्यंतर में इस आत्मा का अनुभव करो क्यों व्यर्थ बाह्य पदार्थों में मोह करते हो।


व्यापी नैव शरीर एव यदसावात्मा स्फुरत्यन्वहं
भूतो नान्वायतो न भूतजनितो ज्ञानी प्रकृत्या यतः।
नित्ये वा क्षणिकेऽथवा न कथमप्यर्थक्रिया युज्यते
तत्रैकत्वमपि प्रमाणदृढ़या भेदप्रतीत्याहतम् ॥१३७॥

अर्थ: यह आत्मा निरंतर शरीर में ही रहा हुआ मालूम पड़ता है इसलिए तो व्यापक नहीं और स्वभाव से ही यह ज्ञानी है इसलिए यह पृथ्बी, अप्, तेज आदि पाँच पदार्थों से भी पैदा हुआ नहीं मालूम होता तथा यह सर्वथा नित्य भी नहीं क्योंकि नित्य में किसी प्रकार का परिणाम नहीं हो सकता और आत्मा के तो क्रोधादि परिणाम भलीभाँति अनुभव में आते हैं तथा यह आत्मा सर्वथा क्षणिक भी नहीं हो सकता क्योंकि प्रथम क्षण में उत्पन्न होकर यदि यह द्वितीय क्षण में नष्ट हो जायेगा तो किसी प्रकार की क्रिया इसमें नहीं हो सकती तथा आत्मा एक स्वरूप है यह भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि कभी क्रोधी, कभी लोभी इत्यादि नाना पर्याय आत्मा की मालूम होती हैं।


कुर्यात्कर्म शुभाशुभं स्वयमसौ भुङ्क्ते स्वयं तत्फलं
सातासातगतानुभूतिकलनादात्मा न चान्यादृशः।
चिद्रूपः स्थितिजन्मभंगकलितः कर्मावृतः संसृतौ
मुक्तौ ज्ञानदृगेकमूर्तिरमलस्त्रैलोक्यचूडामणिः ॥१३८॥

अर्थ: ग्रन्थकार कहते हैं कि यह आत्मा शुभ तथा अशुभ कर्मों को निरन्तर करता रहता है तथा सातावेदनीय और असातावेदनीय कर्म के उदय से स्वयं उसका फल भोगता है किन्तु अन्य कोई कर्ता तथा भोक्ता नहीं और यह आत्मा सदा चैतन्यस्वरूप है तथा उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य तीनों धर्मों से सहित है और संसारावस्था में यह कर्मों से सहित है परन्तु मोक्ष अवस्था में इसके साथ किसी कर्म का सम्बन्ध नहीं तथा यह आत्मा सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान का धारक है और तीनों लोक के शिखर पर विराजता है।


आत्मानमेवमधिगम्य नयप्रमाणनिक्षेपकादिभिरभिश्रयतेकचित्ताः।
भव्या यदीच्छत भवार्णवमुत्तरीतुमुत्तुङ्गमोहमकरोग्रतरं गभीरम् ॥१३९॥

अर्थ: फिर भी आचार्य उपदेश देते हैं- भव्य जीवो यदि तुम मोहरूपी मगर से सहित तथा गंभीर संसाररूपी समुद्र को तरने की इच्छा करते हो तो एकचित्त होकर नय, प्रमाण तथा नाम, स्थापना आदि के द्वारा आत्मा को भलीभाँति जानो और उसी का आश्रय करो।


भवरिपुरिह तावद् दुःखदो यावदात्मन् तव विनिहतधामा कर्मसंश्लेषदोषः।
स भवति किल रागद्वेषहेतोस्तदादौ झटिति शिवसुखार्थी यत्नतस्तौ जहीहि ॥१४०॥

अर्थ: फिर भी आचार्य कहते हैं कि अरे आत्मा जब तक मेरे साथ समस्त तेज को मूल से उड़ाने वाला कर्मों का बंध लगा हुआ है तब तक तुझको यह संसाररूपी बैरी नाना प्रकार के दुखों को देने वाला है तथा वह संसाररूपी बैरी राग-द्वेष से उत्पन्न होता है इसलिए यदि तू मोक्ष सुख का अभिलाषी है तो शीघ्र ही रागद्वेष को त्याग कर जिससे तेरी आत्मा के साथ कर्म का बंध नहीं रहे तथा तुझे संसार का दुख न भोगना पड़े।


लोकस्य त्वं न कश्चिन्न स तव यदिह स्वार्जितं भुज्यते कः
सम्बन्धस्तेन सार्धं तदसति सति वा तत्र कौ रोषतोषौ।
कायेऽप्येवं जडत्वात्तदनुगतसुखादावपि ध्वंसभावा-
द्देवं निश्चित्य हंस स्वबलमनुसर स्थायि मा पश्य पार्श्वम् ॥१४१॥

अर्थ: भो आत्मन्! न तो तू लोक का है न तेरा ही लोक है तथा तू ही शुभ-अशुभ को उत्पन्न करता है तथा तू ही उसको भोगता है फिर इस लोक के साथ सम्बन्ध करना वृथा है तथा लोक के होने पर दुख तथा लोक के होने पर संतोष करना भी व्यर्थ है और शरीर तो जड़ है इसलिए इसके नहीं होते हुए क्रोध तथा इसके होते हुए संतोष करना भी बिना प्रयोजन का है तथा इन्द्रिय आदि पदार्थों से उत्पन्न हुआ सुख विनाशीक है इसलिए इसके होते हुए रोष तथा इसके होते हुए संतोष मानना भी निष्प्रयोजन है इसलिए ऐसा भलीभाँति विचार कर तुझे अपना बल जो अनन्त ज्ञानादिक है उसकी आराधना करनी चाहिए और तुझे अपने स्वरूप से दूर नहीं रहना चाहिए अर्थात् अपने अन्तरंग में प्रवेश कर तुझे समस्त परिग्रह का त्याग कर देना चाहिए।


आस्तामन्यगतौ प्रतिक्षणलसद् दुःखाश्रितायामहो
देवत्वेऽपि न शान्तिरस्ति भवतो रम्येऽणिमादिश्रिया।
यत्तस्मादपि मृत्युकालकलयाधस्ताद्धठात्पात्यसे
तत्तन्नित्यपदं प्रति प्रतिदिनं रे जीव यत्नं कुरु ॥१४२॥

अर्थ: जहाँ पर प्रतिक्षण में दुख ही दुख है ऐसी नरक, तिर्यंचादि गति तो दूर ही रहो परन्तु जहाँ पर सदा अणिमा, महिमा आदिक लक्ष्मी निवास करती हैं ऐसी देवगति में भी तेरे लिए अंशमात्र भी सुख नहीं है क्योंकि वहाँ से भी तुझे मरण की बेला बलात् नीचे गिरा देती है अर्थात् मृत्यु के समय में स्वर्ग से भी नीचे गिरना पड़ता है इसलिए आचार्य कहते हैं, हे जीव तुझे अविनाशी मोक्ष पद के लिए ही सर्वदा प्रयत्न करना चाहिए।


यद् दृष्टं बहिरङ्गनादिषु चिरं तत्रानुरागोऽभवत्
भ्रान्त्या भूरि तथापि ताम्यसि ततो मुक्त्वा तदन्तर्विश।
चेतस्तत्र गुरोः प्रबोधवसतेः किञ्चित्तदाकर्ण्यतां
प्राप्ते यत्र समस्तदुःखविरमाल्लभ्येत नित्यं सुखम् ॥१४३॥

अर्थ: आचार्य उपदेश देते हैं कि अरे मन चिरकाल से तूने बाह्य स्त्री आदि पदार्थों को देखा है इसलिए तेरा भ्रम से उनमें अनुराग होता है तथा उसी अनुराग से सदा तू दुःखित होता है इसलिए स्त्री आदि से राग छोड़कर तू अपने अंतरंग में प्रवेश कर तथा ज्ञान के सागर श्रीपरमगुरु से ऐसा कोई उपदेश सुन जिससे तेरे समस्त दुखों का नाश हो जावे तथा तुझे अविनाशी मोक्षरूपी सुख की प्राप्ति हो जावे।


किमाल - कोलाहलैरमलबोधसम्पन्निधेः
समस्ति यदि कौतुकं किल तवात्मनो दर्शने।
निरुद्धसकलेन्द्रियो रहसि मुक्तसंगग्रहः
कियन्त्यपि दिनान्यतः स्थिरमना भवान् पश्यतु ॥१४४॥

अर्थ: आचार्य उपदेश देते हैं कि यदि तू समस्त निर्मल ज्ञान के धारी आत्मा के देखने की इच्छा करता है तो तुझे समस्त स्पर्शनादि इन्द्रियों को रोककर तथा समस्त प्रकार के स्थान परिग्रह का नाशकर और कुछ दिन एकान्त में बैठकर तथा कुछ दिन स्थिर मन होकर उसको देखना चाहिए व्यर्थ कोलाहल करने में क्या रखा है।


(जीव और मन का परस्पर में संवाद)


भो चेतः किमु जीव तिष्ठसि कथं चिन्तास्थितं सा कुतो
रागद्वेषवशात्तयोः परिचयः कस्माच्च जातस्तव।
इष्टानिष्टसमागमादिति यदि श्वभ्रं तदावां गतौ
नोचेन्मुञ्च समस्तमेतदचिरादिष्टादिसंकल्पनम् ॥१४५॥

अर्थ: जीव मन से पूछता है कि रे मन तू कैसे रहता है, मन उत्तर देता है कि मैं सदा चिंता मैं व्यग्र रहता हूँ फिर जीव पूछता है कि तुझे चिंता क्यों है फिर मन उत्तर देता है कि मुझे राग-द्वेष के कारण से चिंता है फिर जीव पूछता है कि तेरा इनके साथ परिचय कहाँ से हुआ फिर मन उत्तर देता है कि भली बुरी वस्तुओं के सम्बन्ध से राग-द्वेष का परिचय हुआ है तब फिर जीव कहता है कि हे मन यदि ऐसी बात है तो शीघ्र ही भली बुरी वस्तुओं के सम्बन्ध को छोड़ो, नहीं तो हम दोनों को नरक में जाना पड़ेगा।


ज्ञानज्योतिरुदेति मोहतमसो भेदः समुत्पद्यते
सानन्दा कृतकृत्यता च सहसा स्वान्ते समुन्मीलति।
यस्यैकस्मृतिमात्रतोऽपि भगवानत्रैव देहान्तरे
देवस्तिष्ठति मृग्यतां सरभसादन्यत्र किं धावत॥१४६॥

अर्थ: आचार्य उपदेश देते हैं कि जिस एक आत्मा के स्मरण मात्र से सम्यग्ज्ञानरूपी तेज का उदय होता है तथा मोहरूपी अंधकार दूर हो जाता है और चित्त में नाना प्रकार का आनन्द होता है तथा कृतकृत्यता भी चित्त में उदित हो जाती है वही अनन्त शक्ति का धारक भगवान् आत्मा इस ही शरीर में निवास करता है उसको ढूँढ़ो, व्यर्थ क्या दूसरी जगह अज्ञानी होकर फिरते हो?


जीवाजीवविचित्रवस्तुविविधाकारर्द्धिरूपादयो
रागद्वेषकृतोऽत्र मोहवशतो दृष्टाः श्रुताः सेविताः।
जातास्ते दृढबंधनं चिरमतो दुःखं तवात्मन्निदं
नूनं जानत एव किं बहिरसावद्यापि धीर्धावति॥१४७॥

अर्थ: फिर भी आचार्य महाराज उपदेश देते हैं कि अरे जीव इस संसार में चेतन, अचेतन स्वरूप नाना प्रकार के पदार्थ तथा नाना प्रकार के आकार और भाँति-भाँति की संपदा तथा रूप, रस आदि सर्व मोह के वश से रागद्वेष को करने वाले हैं और मोह के वश से ही देखे गये हैं तथा सुने गये हैं और सेवन किये गये हैं और इस ही कारण मोह से चिरकाल पर्यंत वे सर्व पदार्थ तेरे दृढ़ बंधन हुए हैं तथा दृढ़ बंधन से ही तुझे नाना प्रकार के दुख भोगने पड़े हैं ऐसा भलीभाँति जानते हुए भी तेरी बुद्धि बाह्य पदार्थों में दौड़ती है यह बड़े आश्चर्य की बात है।


भिन्नोऽहं वपुषो बहिर्मलकृतान्नानाविकल्पौघतः,
शब्दादेश्च चिदेकमूर्तिरमलः शान्तः सदानन्दभाक्।
इत्यास्था स्थिरचेतसो दृढतरं साम्यादनारम्भिणः,
संसाराद्भयमस्ति किं यदि तदप्यन्यत्र कः प्रत्ययः ॥१४८॥

अर्थ: नाना प्रकार के विष्टा, मूत्रादि मल के घर स्वरूप इस शरीर से मैं भिन्न हूँ तथा मन में उठे हुए नाना प्रकार के विकल्पों से भी मैं भिन्न हूँ और शब्द, रस आदि से भी मैं जुदा हूँ तथा मेरी एक चैतन्यमयी मूर्ति है और मैं समस्त प्रकार के मल से रहित हूँ तथा क्रोधादि के अभाव से मैं सदा शांत हूँ और सदा काल आनन्द का भजने वाला हूँ इस प्रकार का जिसके मन में मजबूत श्रद्धान है तथा समता का धारी होने से जिसका समस्त प्रकार का आरम्भ छूट गया है ऐसे मनुष्य को किसी प्रकार संसार से भय नहीं हो सकता और जब उसको संसार ही भय का करने वाला नहीं तब उसको कोई वस्तु भय की करने वाली नहीं हो सकती।


किं लोकेन किमाश्रयेण किमथ द्रव्येण कायेन किं,
किं वाग्भिः किमुतेन्द्रियैः किमसुभिः किं तै र्विकल्पै रपि।
सर्वे पुद्गलपर्यया बत परे त्वत्तः प्रमत्तो भवन्-
नात्मन्नेभिरभिश्रयस्यतितरामालेन किं बंधनम् ॥१४९॥

अर्थ: आचार्य फिर भी उपदेश देते हैं कि न तो तुझे लोक से प्रयोजन है न लोक के आश्रय से प्रयोजन है और न तुझे द्रव्य से प्रयोजन है न वाणी से प्रयोजन है तथा न तुझे स्पर्शनादि इन्द्रियों से प्रयोजन है न तुझे खोटे विकल्पों से प्रयोजन है क्योंकि ये समस्त पुद्गल द्रव्य की पर्याय हैं और तू चैतन्यस्वरूप है इसलिए ये तेरे स्वरूप से सर्वथा जुदे ही हैं अतः इन वस्तुओं में प्रमाद करता हुआ क्यों वृथा तू दृढ़ बंधन को बाँधता है अर्थात् लोक आदि से ममता करने से तू बंधेगा ही, छूटेगा नहीं।


सतताभ्यस्तभोगानामप्यसत्सुखमात्मजम् ।
अप्यपूर्वं सदित्यास्था चित्ते यस्य स तत्त्ववित् ॥१५०॥

अर्थ: जिस मनुष्य के चित्त में ऐसा विचार उत्पन्न हो गया है कि निरंतर भोगे हुए भी भोगों से पैदा हुआ सुख अशुभ है तथा केवल आत्मा से उत्पन्न हुआ सुख अपूर्व तथा शुभ है वही पुरुष भले प्रकार तत्त्व का ज्ञाता है ऐसा समझना चाहिए। किन्तु उससे भिन्न, विपरीत श्रद्धानी कदापि तत्त्व ज्ञाता नहीं हो सकता।


प्रतिक्षणमयं जनो नियतमुग्रदुःखातुरः क्षुदादिभिरभिश्रयंस्तदुपशान्तयेऽन्नादिकम्।
तदेव मनुते सुखं भ्रमवशाद्यदेवासुखं समुल्लसति कच्छुकारुजि यथा शिखिस्वेदनम्॥१५१॥

अर्थ: ग्रन्थकार कहते हैं-जिस प्रकार खाज का रोगी मनुष्य अग्नि से खाज के सेकने में सुख मानता है परन्तु अग्नि से सेकना केवल दुख का ही देने वाला है उसी प्रकार यह संसारी जीव जब क्षुधा, तृषा आदि व्याधियों से पैदा हुए दुखों से अत्यन्त पीड़ित होता है तथा उसकी शांति के लिए अन्न जल का आश्रयण करता है उस समय यद्यपि वह अन्न, जल आदि पदार्थ दुख स्वरूप हैं तो भी भ्रम से उनको सुख मानता है।


आत्मा स्वं परमीक्षते यदि समं तेनैव संचेष्टते
तस्मा एव हितस्ततोऽपि च सुखी तस्यैव सम्बन्धभाक्।
तस्मिन्नेव गतो भवत्यविरतानन्दामृताम्भोनिधिः
किंचान्यत्सकलोपदेशनिवहस्यैतद्रहस्यं परम् ॥१५२॥

अर्थ: जब यह आत्मा अपने स्वरूप को देखता है तो स्वयं अपने स्वरूप के साथ ही चेष्टा करता है तथा अपने स्वरूप के लिए ही हितस्वरूप बनता है तथा अपने से ही सुखी होता है तथा अपना ही सम्बन्धी होता है तथा निरंतर जो आनन्दरूप अमृत उसका समुद्र स्वरूप जो अपना स्वरूप उसमें ही लीन होता है इस प्रकार समस्त प्रवृत्तियों की आत्मा में जो दृढ़ स्थिति है यही समस्त उपदेश का असली तात्पर्य है इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है।


परमानन्दाब्जरसं सकलविकल्पान्यसुमनसस्त्यक्त्वा।
योगी स यस्य भजते स्तिमितान्तःकरणषट्चरणः ॥१५३॥

अर्थ: जिस योगी का निश्चल मनरूपी भ्रमर समस्त विकल्परूपी अन्य फूलों को छोड़कर उत्कृष्ट आनंद के धारी शुद्धात्मारूपी कमल के रस का सेवन करता है वही योगीश्वर पूजने योग्य है।


जायन्ते विरसा रसा विघटते गोष्ठी कथाकौतुकं,
शीर्यन्ते विषयास्तथा विरमति प्रीतिः शरीरेऽपि च।
जोषं वागपि धारयत्यविरतानन्दात्मशुद्धात्मनः
चिन्तायामपि यातुमिच्छति समं दोषैर्मनः पञ्चताम् ॥१५४॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि परमानंद स्वरूप शुद्धात्मा की प्राप्ति तो दूर ही रहो किन्तु केवल उसकी चिंता करने पर ही शृंगारादि रस विरस हो जाते हैं, स्त्री-पुत्र आदि की गोष्ठी (सलाह) नष्ट हो जाती है और उनकी कथा और कुतर्क दूर भाग जाते हैं तथा इन्द्रियों के विषय भी सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और स्त्री, पुत्र आदि की प्रीति तो दूर ही रही शरीर में भी प्रीति नहीं रहती और वचन भी मौन को धारण कर लेता है और समस्त रागद्वेषादि दोषों के साथ मन भी विनाश को प्राप्त हो जाता है इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि ये शुद्धात्मा की चिंता में ही निमग्न बने रहें।


आत्मैकः सोपयोगो मम किमपि ततो नान्यदस्तीतिचिन्ता-
भ्यासास्ताशेषवस्तोः स्थितपरममुदा यद्गतिर्नो विकल्पे।
ग्रामे वा कानने वा जनजनितसुखे निःसुखे वा प्रदेशे
साक्षादाराधना सा श्रुतविशदमतेर्बाह्यमन्यत्समस्तम् ॥१५५॥

अर्थ: दर्शन ज्ञानमयी आत्मा ही एक मेरा है इससे भिन्न कोई भी वस्तु मेरी नहीं है इस प्रकार की चिंता से जिस मनुष्य के मन की परिणति बाह्य पदार्थों से सर्वथा छूट गई है तथा जिसकी शास्त्र के अभ्यास से बुद्धि निर्मल हो गई है और जो परमानंद का धारी है उस मनुष्य के मन की प्रवृत्ति का विकल्पों से हट जाना तथा गाँव में अथवा वन में अथवा मनुष्यों को सुख के उपजाने वाले प्रदेश में अथवा दुख उपजावने वाले प्रदेश में भी मन का न जाना किन्तु अपने आत्मा के अनुभव में ही लीन होना यही उत्कृष्ट आराधना है परन्तु इससे भिन्न सब बाह्य है तथा सर्व त्यागने योग्य है।


यद्यन्तर्निहितानि खानि तपसा बाह्येन किं फल्गुना
नैवान्तर्निहितानि खानि तपसा बाह्येन किं फल्गुना।
यद्यन्तर्बहिरन्यवस्तु तपसा बाह्येन किं फल्गुना
नैवान्तर्बहिरन्यवस्तुतपसा बाह्येन किं फल्गुना ॥१५६॥

अर्थ: आचार्य फिर भी उपदेश देते हैं कि बाह्य वस्तु से जुदे होकर यदि इन्द्रियों का शुद्धात्मा के साथ सम्बन्ध रहा तो बाह्य में तप करना व्यर्थ है और यदि इन्द्रियों का शुद्धात्मा के साथ सम्बन्ध न रहा तो भी तप करना व्यर्थ है और यदि अंतरंग अथवा बाह्य में अन्य पदार्थों की ममता बनी रही तो तप करना व्यर्थ है तथा यदि अंतरंग में तथा बाह्य में किसी पदार्थ से ममता नहीं रही तो भी तप करना व्यर्थ ही है।


शुद्धं वागतिवर्तितत्त्वमितरद्वाच्यं च तद्वाचकं
शुद्धादेशमिति प्रभेदजनकं शुद्धेतरत्कल्पितं।
तत्राद्यं श्रयणीयमेव विदुषा शेषद्वयोपायतः
सापेक्षा नयसंहतिः फलवती संजायते नान्यथा ॥१५७॥

अर्थ: ग्रन्थकार कहते हैं कि शुद्धनय तो वचन के द्वारा कहा नहीं जा सकता किन्तु व्यवहारनय ही वचन के द्वारा कहा जाता है तथा वह व्यवहारनय शुद्धनय को कहने वाला है इसलिए उसको शुद्धादेश शुद्धनय को कहने वाला भी कहते हैं और जो भेद को उत्पन्न कराने वाला है उसको अशुद्धनय कहते हैं इस रीति से शुद्ध, शुद्धादेश तथा अशुद्ध के भेद से नय के तीन भेद हुए उन तीनों में शुद्धनय जो है सो शुद्धादेश तथा अशुद्धनय के उपाय से होता है इसलिए विद्वानों को शुद्धनय का ही आश्रय करना चाहिए तथा यह नियम है कि आपस में एक दूसरे की अपेक्षा करने वाला ही नय का समूह कार्यकारी हो सकता है परन्तु एकान्त से भिन्न नहीं।


ज्ञानं दर्शनमप्यशेषविषयं जीवस्य नार्थान्तरं
शुद्धादेशविवक्षया स हि ततश्चिद्रूप इत्युच्यते।
पर्यायैश्च गुणैश्च साधु विदिते तस्मिन् गिरा सद्गुरो-
र्ज्ञातं किं न विलोकितं न किमथ प्राप्तं न किं योगिभिः ॥१५८॥

अर्थ: यद्यपि व्यवहार नय से ज्ञानदर्शन आत्मा से भिन्न हैं तथापि शुद्धनय की विवक्षा करने पर समस्त पदार्थों को हाथ की रेखा के समान जानने वाला तथा देखने वाला ज्ञान तथा दर्शन आत्मा से कोई भिन्न वस्तु नहीं है किन्तु दर्शन, ज्ञान चेतना स्वरूप ही यह आत्मा है इसलिए जिन योगियों ने श्रेष्ठ गुरुओं के उपदेश से यदि गुण तथा पर्यायों सहित आत्मा को जान लिया तो उनने समस्त को जान लिया तथा सबको देख लिया तथा जो कुछ प्राप्त करने योग्य वस्तु थी उस सबको भी पा लिया।


यन्नान्तर्न बहिः स्थितं न च दिशि स्थूलं न सूक्ष्मं पुमान्
नैव स्त्री न नपुंसकं न गुरुतां प्राप्तं न यल्लाघवम्।
कर्मस्पर्शशरीरगंधगणनाव्याहारवर्णोज्झितं
स्वच्छं ज्ञानदृगेकमूर्ति तदहं ज्योतिःपरं नापरम्॥१५९॥

अर्थ: आत्मज्ञानी पुरुष इस प्रकार का विचार करता है कि न मैं भीतर हूँ, न बाहर हूँ, न किसी दिशा में हूँ, न मोटा हूँ, न पतला हूँ, न पुरुष हूँ, न स्त्री हूँ, न नपुंसक हूँ, न भारी हूँ, न हलका हूँ और न मेरा कर्म है, न स्पर्श है, न शरीर है, न गंध है, न संख्या है, न शब्द है, न वर्ण है तथा जो अत्यन्त स्वच्छ तथा ज्ञानदर्शनमयी मूर्ति की धारक ज्योति है वही मैं हूँ और उससे भिन्न कोई नहीं हूँ।


जानन्ति स्वयमेव यद्विमलसच्चिद्रूपमानंदवत्,
प्रोच्छिन्ने यदनाद्यमंदमसकृन्मोहान्धकारे हठात्।
सूर्याचन्द्रमसावतीत्य यदहो विश्वप्रकाशात्मकं,
तज्जीयात्सहजं सुनिष्कलमहं शब्दाभिधेयं महः ॥१६०॥

अर्थ: आनंद के धारी जिस चैतन्यरूपी तेज को अनादिकाल से विद्यमान तथा गाढ़ मोहरूपी अंधकार को तप के द्वारा सर्वथा नाशकर केवल ज्ञान के धारी पुरुष अपने आप जान लेते हैं तथा जो चैतन्यरूपी तेज सूर्य चन्द्रमा के तेज को फीका करने वाला है तथा समस्त पदार्थों का भलीभाँति प्रकाश करने वाला है और जिसका मैं (अहम्) इस शब्द से अनुभव होता है तथा जो स्वाभाविक है ऐसा वह चैतन्यरूपी तेज सदा काल जयवन्त रहो।


यज्जायते किमपि कर्मवशादसातं सातं च यत्तदनुयायि विकल्पजालम्।
जातं मनागपि न यत्र पदं तदेव देवेन्द्रवन्दितमहं शरणं गतोऽस्मि ॥१६१॥

अर्थ: जिस मोक्ष पद में न तो कर्म के वश से साता होती है और न कर्म के वश से असाता होती है तथा उन साता तथा असाता के अभाव में जहाँ पर किसी प्रकार के विकल्प ही नहीं उठते हैं और जिस पद की बड़े-बड़े इंद्रादिक भी स्तुति करते हैं ऐसे मोक्षपद की शरण को मैं प्राप्त होना चाहता हूँ।


धिक्कान्तास्तनमण्डलं धिगमलप्रालेयरोचिःकरान्
धिक्कर्पूरविमिश्रचंदनरसं धिक् ताञ्जलादीनपि।
यत्प्राप्तं न कदाचिदत्र तदिदं संसारसंतापहृत्
लग्नं चेदतिशीतलं गुरुवचोदिव्यामृतं मे हृदि ॥१६२॥

अर्थ: संसार में यह बात भलीभाँति प्रचलित है तथा अज्ञानी मनुष्य इस बात को मानते भी हैं कि यदि किसी प्रकार का संताप हो जावे तो उस संतप्त प्राणी को स्त्री के स्तनों के स्पर्श से तथा चन्द्रमा की किरण आदि के सेवन से संताप को दूर कर देना चाहिए परन्तु ज्ञानी मनुष्य इस बात को सर्वथा नहीं मानता तथा इससे विपरीत ही विचार करता है अर्थात् वह कहता है कि जिसकी कभी भी प्राप्ति नहीं हुई है तथा जो सब संसार के दुखों को दूर करने वाला है और जो अत्यन्त शीतल है ऐसा यदि गुरुओं का वचन मेरे मन में मौजूद है तो जिनको मनुष्य शीतल करने वाले कहते हैं ऐसे स्त्री के कुचों को धिक्कार हो तथा चन्द्रमा की शीतल किरणों को धिक्कार हो तथा कर्पूर मिले हुए चंदन के रस को धिक्कार हो तथा जल आदि को भी धिक्कार हो।


जित्वा मोहमहाभटं भवपथे दत्तोग्रदुःखश्रमे
विश्रान्ता विजनेषु योगिपथिका दीर्घे चरन्तः क्रमात्।
प्राप्ता ज्ञानधनाश्चिरादभिमतं स्वात्मोपलं तिष्ठति
नित्यानंदकलत्रसंगसुखिनो ये तत्र तेभ्यो नमः ॥१६३॥

अर्थ: जो योगीश्वर रूप पथिक अत्यन्त दुख को देने वाले संसाररूपी विशाल मार्ग में विचरते हुए समस्त ज्ञानादिक धन को चुराने वाले मोहरूपी योद्धा को जीतकर निर्जन स्थान में विश्राम लेते हैं तथा जो ज्ञानरूपी धन के स्वामी हैं और जिसका कभी भी नहीं नाश होने वाला है ऐसा जो आत्मिक सुखरूपी स्त्री उसके संग से जो सदा सुखी हैं तथा अपने आत्मा के स्वरूप की जहाँ पर प्राप्ति होती है ऐसे स्थान में विराजमान हैं उन योगियों को मैं नमस्कार करता हूँ।


इत्यादिधर्म एष क्षितिपतिसुरसुखानर्घ्यमाणिक्यकोषः
पाथो दुःखानलानां परमपदलसत्सौधसोपानराजिः ।
एतन्माहात्म्यमीशः कथयति जगतां केवली साध्वधीती ।
सर्वस्मिन् वाङ्‌मयेऽथ स्मरति परमहो मादृशस्तस्य नाम ॥१६४॥

अर्थ: ग्रन्थकार कहते हैं कि पूर्व में जो दया आदिक पाँच प्रकार का धर्म कहा है वह धर्म बड़े- बड़े चक्रवर्ती आदिक राजाओं के तथा इन्द्र, अहमिन्द्र आदि के सुख का देने वाला है तथा समस्त दुखों को मूल से नाश करने वाला है और वह धर्म निर्वाणरूपी महल के चढ़ने के लिए पैड़ी के समान है अर्थात् जो मनुष्य धर्म को धारण करता है उनको मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसे उस धर्म के माहात्म्य को साक्षात् केवली अथवा समस्त द्वादशांग के पाठी गणधर ही वर्णन कर सकते हैं परन्तु मेरे समान मनुष्य तो केवल उसके नाम को ही स्मरण कर सकते हैं।


शश्वज्जन्मजरान्तकालविलसद्दुःखौघसारीभवत्
संसारोगमहारुजोऽपहतयेऽनन्तप्रमोदाय वै।
एतद्धर्मरसायनं ननु बुधाः कर्तुं मतिश्चेत्तदा
मिथ्यात्वाविरतिप्रमादनिकरः क्रोधादि संत्यज्यताम्॥१६५॥

अर्थ: भो भव्य जीवो! यदि तुम निरन्तर जन्म-जरा-मरण आदिक समस्त दुखों को देने वाले संसाररूपी भयंकर रोग के दूर करने के लिए धर्मरूपी रसायन का आश्रय लेना चाहते हो तथा अनन्त सुख की प्राप्ति के लिए भी धर्मरूपी रसायन का आश्रय करना चाहते हो तो मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद तथा क्रोधादि कषायों का सर्वथा त्याग करो।


नष्टं रत्नमिवाम्बुधौ निधिरिव प्रभ्रष्टदृष्टेर्यथा
योगो यूपशलाकयोश्च गतयोः पूर्व्वापरौ तोयधी।
संसारेऽत्र तथा नरत्वमसकृद्दुःखप्रदे दुर्लभं
लब्धे तत्र च जन्म निर्मलकुले तत्रापि धर्मे मतिः॥१६६॥

अर्थ: जिस प्रकार अथाह समुद्र में यदि रत्न गिर पड़े फिर उसका मिलना बहुत कठिन है तथा जैसे अंधे को निधि मिलना अत्यन्त दुर्लभ है और जिस प्रकार समुद्र में किसी स्थान पर दो काष्ठ खण्डों को छोड़ देना उनमें एक को पूर्व दिशा की ओर बहा देना तथा दूसरे को पश्चिम दिशा की ओर बहा देना फिर उनका उसी स्थान पर मिलना दुःसाध्य है उसी प्रकार निरंतर नाना प्रकार के दुखों के देने वाले इस संसार में मनुष्य जन्म का पाना बहुत कठिन है यदि दैवयोग से मनुष्य जन्म भी मिल जावे तो फिर उत्तम कुल मिलना अत्यन्त दुर्लभ है यदि किसी समय में उत्तम कुल की भी प्राप्ति हो जावे तो फिर धर्म में श्रद्धा होना अत्यन्त दुःसाध्य है इसलिए भव्य जीवों को ऐसे अत्यन्त दुर्लभ धर्म की अवश्य उपासना करनी चाहिए।


न्यायादन्धकवर्तकीयकजनाख्यानस्य संसारिणां
प्राप्तं वा बहुकल्पकोटिभिरिदं कृच्छ्रान्नरत्वं यदि।
मिथ्यादेवगुरूपदेशविषयव्यामोहनीचान्वय-
प्रायैः प्राणभृतां तदेव सहसा वैफल्यमागच्छति ॥१६७॥

अर्थ: प्रथम तो मनुष्य जन्म पाना संसार में अत्यन्त कठिन काम है दैवयोग से अंधे के हाथ में बटेर के समान करोड़ों कल्पों के बाद यदि इस अत्यन्त दुःसाध्य मनुष्य जन्म की प्राप्ति भी हो जावे तो वह मनुष्य जन्म खोटे देव तथा खोटे गुरुओं के उपदेश से निष्फल चला जाता है तथा विषयों में आसक्तता से तथा व्यसनादिक नीच कार्य करने से भी वह बात ही बात में व्यर्थ चला जाता है।


लब्धे कथं कथमपीह मनुष्यजन्मन्त्यङ्ग प्रसंगवशतो हि कुरु स्वकार्यम्।
प्राप्तं तु कामपि गतिं कुमते तिरश्चां कस्त्वां भविष्यति विबोधयितुं समर्थः ॥१६८॥

अर्थ: हे भव्यजीव ! बड़े पुण्य कर्म के उदय से तुझे इस मनुष्य जन्म की प्राप्ति हुई है इसलिए शीघ्र ही कोई अपने हित का करने वाला काम कर, नहीं तो रे मूर्ख ! जिस समय तिर्यञ्च आदि खोटी गति को प्राप्त हो जायेगा तो वहाँ पर तुझे कोई समझा भी नहीं सकेगा।


जन्म प्राप्य नरेषु निर्मलकुले क्लेशान्मतेः पाटवं
भक्तिं जैनमते कथं कथमपि प्रागर्जिताच्छ्रेयसः।
संसारार्णवतारकं सुखकरं धर्मं न ये कुर्वते
हस्तप्राप्यमनर्घ्यरत्नमपि ते मुञ्चन्ति दुर्बुद्धयः ॥१६९॥

अर्थ: जो मनुष्य अत्यन्त कठिन मनुष्य जन्म को पाकर तथा उत्तम कुल को पाकर और किसी प्रकार पूर्वकाल में उपार्जन किये हुए पुण्य के उदय से जैनधर्म के भक्त भी होकर संसार समुद्र से पार करने वाले तथा नाना प्रकार के सुख के देने वाले धर्म की सेवा नहीं करते हैं वे मूर्ख हाथ में आये हुए अमूल्य रत्न को छोड़ देते हैं।


तिष्ठत्यायुरतीव दीर्घमखिलान्यङ्गानि दूरं दृढा-
न्येषा श्रीरपि मे वशं गतवती किं व्याकुलत्वं मुधा।
आयत्यां निरवग्रहो गतवया धर्मं करिष्ये भरा-
दित्येवं बत चिंतयन्नपि जडो यात्यन्तकग्रासताम् ॥१७०॥

अर्थ: अभी मेरी आयु बहुत है हाथ, पैर, नाक, कान आदिक भी मजबूत हैं तथा लक्ष्मी भी विद्यमान है इसलिए व्यर्थ धर्मादि के लिए क्यों व्याकुल होना चाहिए किन्तु इस समय तो आनंद से भोगों को भोगना चाहिए। भविष्यत्काल में जिस समय वृद्ध हो जाऊँगा उस समय निश्चय कर अच्छी तरह धर्म का आराधन करूँगा इस प्रकार विचार करते करते ही मूर्ख मर जाता है इसलिए विद्वानों को चाहिए कि वे मृत्यु सदा शिर पर छाई हुई है, इस भय से निरंतर धर्म की आराधना करें।


पलितेकदर्शनादपि सरति सतश्चित्तमाशु वैराग्यम्।
प्रतिदिनमितरस्य पुनः सह जरया वर्द्धते तृष्णा ॥१७१॥

अर्थ: जो पुरुष ज्ञानी हैं वे तो सफेद केश को देखते ही वैराग्य को प्राप्त होते हैं किन्तु जो मनुष्य ज्ञान रहित हैं उनको तो जैसा-जैसा सफेद केशों का दर्शन होता जाता है वैसी वैसी ही उनकी तृष्णा और भी बढ़ती चली जाती है और उनको वैराग्य की बात भी बुरी लगती है।


आजातेर्नस्त्वमसि दयिता नित्यमासन्नगासि
प्रौढास्याशे किमथ बहुना स्त्रीत्वमालम्बितासि।
अस्मत्केशग्रहणमकरोदग्रतस्ते जरेयं
मर्षस्येतन्मम च हतके स्नेहलाद्यापि चित्रम्॥१७२॥

अर्थ: हे तृष्णे! आजन्म से तू हमारी प्रिया है और तू सदा हमारे पास रहने वाली है तथा तू प्रौढ़ा है और अधिक कहाँ तक कहा जाये तू साक्षात् हमारी स्त्री ही है परन्तु अरे दुष्ट तेरे सामने भी इस जरा ने हमारे केश पकड़ लिए हैं तो भी तू सहन करती है फिर भी हमारी प्यारी है यह बड़े आश्चर्य की बात है।


रङ्कायते परिवृढोऽपि दृढोऽपि मृत्युमभ्येति दैववशतः क्षणतोऽत्र लोके।
तत्कः करोति मदमम्बुजपत्रवारिबिन्दूपमैर्धनकलेवरजीविताद्यैः॥१७३॥

अर्थ: जो मनुष्य इस संसार में धनी हैं वह क्षण भर में रंक हो जाता है और जो रंक हैं वह पल भर में धनी हो जाता है तथा जो बलवान् दिखता है वह दैवयोग से मृत्यु को प्राप्त हो जाता है इसलिए ऐसा कौन बुद्धिमान् है जो धन, शरीर, जीवन आदि को कमल के पत्ते पर जल की बूँद के समान विनाशीक जानकर भी मद करे अर्थात् कोई भी मद नहीं कर सकता।


प्रातर्दर्भदलाग्रकोटिघटितावश्यायबिन्दूत्कर-
प्रायाः प्राणधनांगजप्रणयिनीमित्रादयो देहिनाम्।
अक्षाणां सुखमेतदुग्रविषवद्धर्मं विहाय स्फुटं
सर्वं भङ्गुरमत्र दुःखदमहो मोहः करोत्यन्यथा ॥१७४॥

अर्थ: संसार में प्राणियों के प्राण धनादि, स्त्री, मित्र, पुत्र आदिक प्रातःकाल में दर्भ के पत्ते के अग्रभाग पर लगे हुए ओस के बूँद के समान चंचल हैं और इन्द्रियों से उत्पन्न हुए सुख भयंकर जहर के समान हैं तथा एक धर्म तो अविनाशी तथा सुख का देने वाला है किन्तु धर्म से भिन्न समस्त वस्तु क्षणभर में विनाशीक हैं तथा दुख देने वाली हैं परन्तु यह मोह अन्यथा ही करता है अर्थात् जो वस्तु नित्य तथा सुख को देने वाली हैं वे मोह के उदय से अनित्य तथा दुख को देने वाली मालूम पड़ती हैं और जो वस्तु अनित्य तथा दुख को देने वाली है वे मोह के कारण नित्य तथा सुख को देने वाली जान पड़ती है।


तावद्वल्गति वैरिणां प्रति चमूस्तावत्परं पौरुषं,
तीक्ष्णस्तावदसिर्भुजौ दृढतरौ तावच्च कोपोद्गमः।
भूपस्यापि यमो न यावददयः क्षुत्पीडितः सम्मुखं,
धावत्यन्तरिदं विचिन्त्य विदुषा तद्रोधको मृग्यते॥१७५॥

अर्थ: जब तक क्षुधा से पीड़ित यह निर्दयी काल, राजा के भी सामने नहीं पड़ता तब तक उस राजा की सेना भी जहाँ-तहाँ उछलती फिरती है तथा उत्कृष्ट पौरुष भी मालूम पड़ता है तथा तब तक तलवार खूब शत्रुओं के नाश करने के लिए पैनी बनी रहती है तथा भुजा भी बलवान् रहती हैं और कोप का भी उदय रहता है परन्तु जिस समय वह कालबली सामने पड़ जाता है तब ऊपर लिखी हुई बातों में से एक भी बात नहीं होती ऐसा भलीभाँति विचार कर विद्वान् पुरुष उस काल के रोकने वाले को ढूँढ़ते हैं।


रतिजलरममाणो मृत्युकैवर्तहस्तप्रसृतघनजरोरुप्रोल्लसज्जालमध्ये।
निकटमपि न पश्यत्यापदां चक्रमुग्रं भवसरसि वराको लोकमीनौघ एषः ॥१७६॥

अर्थ: जिस प्रकार मल्लाहों के द्वारा बिछाये हुए जाल में रहकर भी मछलियों का समूह जल में क्रीड़ा करता रहता है किन्तु मारे जायेंगे इस प्रकार आई हुई आपत्ति पर कुछ भी ध्यान नहीं देता उसी प्रकार यह लोकरूपी मीनों का समूह मृत्युरूपी मल्लाहों के द्वारा बिछाये हुए प्रबल जरारूपी जाल में रहकर इन्द्रियों के विषय में प्रीतिरूपी जो जल उसमें निरन्तर क्रीड़ा ही करता रहता है किन्तु आने वाली नरकादि आपत्तियों पर कुछ भी विचार नहीं करता।


क्षुद्भुक्तेस्तृडपीह शीतलजलाद् भूतादिका मन्त्रतः,
सामादेरहितो गदाद्गदगणः शांतिं नृभिर्नीयते।
नो मृत्युस्तु सुरैरपीति हि मृते मित्रेऽपि पुत्रेऽपि वा,
शोको न क्रियते बुधैः परमहो धर्मस्ततस्तज्जयः ॥१७७॥

अर्थ: मनुष्य क्षुधा को भोजन से, प्यास को शीतल जल के पीने से तथा भूतादिकों को मंत्र से तथा बैरी को साम-दाम-दण्डादिक से और रोग को औषधि आदि से शान्त कर लेते हैं परन्तु मृत्यु को देवादिक भी शान्त नहीं कर सकते इसलिए विद्वान् पुरुष मित्र तथा पुत्र के मर जाने पर भी शोक नहीं करते किन्तु वे उत्तम धर्म का ही आराधन करते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि उत्तम धर्म से ही मृत्यु का जय होता है।


त्यक्त्वा दूरं विधुरपयसो दुर्गतिक्लिष्टकृच्छ्रान्,
लब्धानंदं सुचिरममरश्रीसरस्यां रमन्ते।
एत्यैतस्या नृपपदसरस्यक्षयं धर्मपक्षा,
यान्त्येतस्मादपि शिवपदं मानसं भव्यहंसाः ॥१७८॥

अर्थ: जिस प्रकार हंस नामक पक्षी खराब जल के भरे हुए तालाब को छोड़कर निर्मल जल के भरे हुए सरोवर में अपने पंखों के बल से चला जाता है तथा वहाँ पर चिरकाल तक आनंद से क्रीड़ा करता है तथा अपने पंखों के ही बल से उस सरोवर को छोड़कर दूसरे सरोवर को चला जाता है इस ही प्रकार क्रमशः नाना उत्तम सरोवरों के आनंद को भोगता-भोगता वही हंस मानस सरोवर को प्राप्त हो जाता है तथा वह वहाँ पर चिरकाल तक नाना प्रकार के आनन्दों का भोग करता है उसी प्रकार ये भव्यरूपी हंस भी धर्मरूपी पंख के बल से दुखरूपी जलसे भरे हुए दुर्गतिरूप तालाब को छोड़कर देवलोक सम्बन्धी जो लक्ष्मीरूपी सरोवरी उसमें आनंद के साथ चिरकाल तक क्रीड़ा करते हैं तथा उसको भी छोड़कर धर्म के ही बल से वे नाना प्रकार के चक्रवर्ती आदि राजाओं के पदरूपी सरोवर में क्रीड़ा करते हैं अर्थात् चक्रवर्ती आदि पद का भोग करते हैं पीछे उससे विमुख होकर धर्म के बल से ही वे भव्यरूपी हंस मोक्ष पदरूपी मानस सरोवर को प्राप्त हो जाते हैं इसलिए भव्यों को चाहिए कि वे ऐसे माहात्म्य सहित धर्म का सदा आराधन करें।


जायन्ते जिनचक्रवर्तिबलभृद्भोगीन्द्रकृष्णादयो,
धर्मादेव दिगङ्गनाङ्गविलसच्छ्वेतयशश्चन्दनाः।
तद्धीना नरकादियोनिषु नरा दुःखं सहन्ते ध्रुवं,
पापेनेति विजानता किमिति नो धर्मः सता सेव्यते ॥१७९॥

अर्थ: जो मनुष्य धर्मात्मा हैं, वे मनुष्य धर्म के बल से ही तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलभद्र, धरणेन्द्र, नारायण, प्रतिनारायण आदि पद के धारी हो जाते हैं तथा उनकी कीर्ति समस्त दिशाओं में एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक फैल जाती है और जो धर्म से रहित हैं वे तो निश्चय कर नरकादि योनियों में नाना प्रकार के दुखों को ही सहते हैं ऐसा जानते हुए भी आचार्य कहते हैं कि विद्वान् मनुष्य धर्म की क्यों नहीं आराधना करते अर्थात् उनको अवश्य धर्म की आराधना करनी चाहिए।


स स्वर्गः सुखरामणीयकपदं ते ते प्रदेशाः पराः,
सारा सा च विमानराजिरतुलप्रेंखत्पताकापटाः।
ते देवाश्च पदातयः परिलसत्तन्नंदनं ता स्त्रियः,
शक्रत्वं तदनिन्द्यमेतदखिलं धर्मस्य विस्फूर्जितम् ॥१८०॥

अर्थ: सुख तथा सुंदरता का अद्वितीय स्थान तो वह स्वर्ग तथा वे वे महा मनोहर स्वर्गों के प्रदेश जिनके ऊपर अनुपम पताका उड़ रही है ऐसे विमानों की पंक्ति और प्यादे स्वरूप वे देवता तथा वह मनोहर नन्दनवन और मनोहर देवांगना तथा वह अत्यन्त निर्मल इंद्रपना इत्यादि समस्त विभूति धर्म के ही माहात्म्य से मिलती है इसलिए ऐसे पवित्र धर्म का आराधन भव्य जीवों को अवश्य करना चाहिए।


यत् षट्खण्डमही नवोरुनिधयो द्विःसप्तरत्नानि यत्,
तुङ्गा यद्विरदा रथाश्च चतुराशीतिश्च लक्षाणि यत्।
यच्चाष्टादश कोटयश्च तुरगा योषित्सहस्राणि यत्,
षट्युक्ता नवतिर्यदेकविभुता तद्धाम धर्मप्रभोः ॥१८१॥

अर्थ: वह तो छह खंड की पृथ्वी और वे बड़ी-बड़ी नौ निधि तथा वे समस्त सिद्धि के करने वाले चौदह रत्न और वे चौरासी लाख बड़े-बड़े हाथी तथा विमान के समान चौरासी लाख बड़े-बड़े रथ और वे अठारह करोड़ पवन के समान चंचल घोड़े तथा वे देवांगना के समान छियानवे हजार स्त्रियाँ तथा वह इन समस्त विभूतियों का चक्रवर्तपना इत्यादि समस्त विभूति धर्म के प्रताप से ही मिलती है। इसलिए भव्य जीवों को ऐसे धर्म की आराधना अवश्य करनी चाहिए।


धर्मो रक्षति रक्षितो ननु हतो हन्ति ध्रुवं देहिनां,
हन्तव्यो न ततः स एव शरणं संसारिणां सर्वथा।
धर्मः प्रापयतीह तत्पदमपि ध्यायन्ति यद्योगिनो,
नो धर्मात्सुहृदस्ति नैव च सुखी नो पण्डितो धार्मिकात् ॥१८२॥

अर्थ: धर्म की रक्षा होने पर तो धर्म प्राणियों की रक्षा करता है परन्तु नाश होने पर वह प्राणियों का भी नाश कर देता है इसलिए भव्य जीवों को कदापि धर्म का नाश नहीं करना चाहिए क्योंकि समस्त प्राणियों का सहायक धर्म ही है तथा जिस (मोक्ष) पद को योगीश्वर सदा ध्यान करते रहते हैं उस पद को भी देने वाला है इसलिए धर्म से बढ़कर कोई भी सच्चा मित्र नहीं है और धर्मात्मा पुरुष से अधिक कोई भी सुखी नहीं है।


नानायोनिजलौघलङ्घितदिशि क्लेशोर्मिजालाकुले
प्रोद्भूताद्भुतभूरिकर्ममकरग्रासीकृतप्राणिनि ।
दुष्पर्यन्तगभीरभीषणतरे जन्माम्बुधौ मज्जतां
नो धर्मादपरोऽस्ति तारक इहाश्रान्तं यतध्वं बुधाः ॥१८३॥

अर्थ: अनेक प्रकार की जो नरकादि योनि वे ही हुआ जल उससे जिसने समस्त दिशाओं को व्याप्त कर लिया है तथा नाना प्रकार की दुःखरूपी तरंगें जिसमें मौजूद हैं और उत्पन्न हुए जो नाना प्रकार के शुभाशुभ कर्म वे ही हुए मगर, उनके द्वारा जिसमें जीव खाये जा रहे हैं और न जिसका अंत है तथा जो गंभीर तथा भयंकर हैं ऐसे संसाररूपी समुद्र में डूबते हुए जीवों को पार करने वाला एक धर्म ही है इसलिए विद्वानों को चाहिए कि वे सदा धर्म के करने में ही प्रयत्न करें।

१. धर्मोपदेशामृत (भाग 3/3)

जन्मोच्चैः कुल एव सम्पदधिके लावण्यवारां निधिः,
नीरोगं वपुरायुरादि सकलं धर्माद्ध्रुवं जायते।
सा न श्रीरथवा जगत्सु न सुखं तन्न शुभ्रा गुणाः,
यैरुत्कण्ठितमानसैरेव नरो नाश्रीयते धार्मिकः ॥१८४॥

अर्थ: संपदा से अधिक उत्तम कुल में जन्म तथा लावण्य और निरोग शरीर तथा आयु आदि समस्त बात निश्चय से धर्म के प्रताप से ही मिलती हैं और ऐसी कोई लक्ष्मी नहीं है जो एकदम आकर धर्मात्मा पुरुष का आश्रय न ले तथा वह उत्तम सुख तथा वे निर्मल गुण भी संसार के भीतर कोई नहीं हैं जो धर्मात्मा पुरुष को स्वयमेव आकर आश्रय न करे।


भृङ्गा पुष्पितकेतकीमिव मृगा वन्यामिव स्वस्थलीं,
नद्यः सिन्धुमिवाम्बुजाकरमिव श्वेतच्छदाः पक्षिणः।
शौर्यत्यागविवेकविक्रमयशः सम्पत्सहायादयः,
सर्वे धार्मिकमाश्रयन्ति न हितं धर्मं विना किञ्चन ॥१८५॥

अर्थ: जिस प्रकार भौंरा स्वयमेव आकर फूली हुई केतकी का आश्रय कर लेता है तथा जिस प्रकार मृग वन में अपने रहने के स्थान को स्वयमेव जाकर आश्रय कर लेते हैं तथा जिस प्रकार नदी स्वयमेव समुद्र को प्राप्त हो जाती है और जिस प्रकार हंस नामक पक्षी मानसरोवर को स्वयमेव प्राप्त कर लेते हैं उसी प्रकार वीरत्व, दान, विवेक, विक्रम, कीर्ति, संपत्ति, सहाय आदिक वस्तु स्वयमेव धर्मात्मा को आकर आश्रय कर लेते हैं, किन्तु धर्म के बिना कोई भी वस्तु नहीं मिलती इसलिए जो मनुष्य वीरत्वादि वस्तुओं को चाहते हैं उनको चाहिए कि वे निरंतर धर्म करें जिसके उनको बिना परिश्रम से वे वस्तु मिल जावें।


सौभागीयसि कामिनीयसि सुतश्रेणीयसि श्रीयसि
प्रासादीयसि चेत्सुखीयसि सदा रूपीयसि प्रीयसि।
यद्वानन्तसुखामृताम्बुधिपरस्थानीयसीह ध्रुवं
निर्धूताखिलदुःखदापदि सुहृद्धर्मे मतिर्धार्यताम् ॥१८६॥

अर्थ: जो तुम सौभाग्य की इच्छा करते हो और कामिनी की अभिलाषा करते हो तथा बहुत से पुत्रों के प्राप्त करने की इच्छा करते हो और जो यदि तुम्हारे उत्तम लक्ष्मी को प्राप्त करने की इच्छा है वा उत्तम मकान पाने की इच्छा है अथवा यदि तुम सुख चाहते हो तथा उत्तमरूप मिलने की इच्छा करते हो और समस्त जगत् के प्रिय बनना चाहते हो अथवा जहाँ पर सदा अविनाशी सुख की राशि मौजूद है ऐसे उत्तम मोक्ष रूपी स्थान को चाहते हो तो तुम नाना प्रकार के दुखों को देने वाली आपत्तियों के दूर करने वाले जिन भगवान् के बताये हुए धर्म में ही अपनी बुद्धि को स्थिर करो (धर्म का ही आराधन करो)।


संछन्नं कमलैर्मरावपि सरः सौधं वनेप्युन्नतं
कामिन्यो गिरिमस्तकेऽपि सरसाः साराणि रत्नानि च।
जायन्तेऽपि च लेप काष्ठघटिताः सिद्धिप्रदा देवताः
धर्मश्चेदिह वाञ्छितं तनुभृतां किं किं न सम्पद्यते ॥१८७॥

अर्थ: यद्यपि मरुदेश निर्जल कहा जाता है परन्तु धर्म के प्रभाव से मारवाड़ में भी मनोहर कमलों कर सहित तालाब हो जाते हैं और वन में मकानादि कुछ भी नहीं होते परन्तु धर्म के प्रताप से वहाँ पर भी विशाल घर बन जाते हैं उसी प्रकार यद्यपि निर्जन पहाड़ में किसी भी मनोज्ञ वस्तु की प्राप्ति नहीं होती तो भी धर्मात्मा पुरुषों को धर्म की कृपा से वहाँ पर भी मन को हरण करने वाली स्त्रियों की तथा उत्तम-उत्तम रत्नों की प्राप्ति हो जाती है और यद्यपि चित्राम के तथा काठ के बनाये हुए देवता कुछ भी नहीं दे सकते तो भी धर्म के माहात्म्य से वे भी वांछित पदार्थों को देने वाले हो जाते हैं। विशेष कहाँ तक कहा जाये यदि संसार में धर्म है तो जीवों को कठिन से कठिन वस्तु की प्राप्ति भी बात ही बात में हो जाती है इसलिए भव्य जीवों को सदा धर्म की ही आराधन करना चाहिए।


दूरादभीष्टमभिगच्छति पुण्ययोगात्
पुण्याद्विना करतलस्थमपि प्रयाति।
अन्यत् परं प्रभवतीह निमित्तमात्रं
पात्रं बुधाः भवत निर्मलपुण्यराशेः ॥१८८॥

अर्थ: पुण्य के उदय से दूर रही हुई भी वस्तु अपने आप आकर प्राप्त हो जाती है किन्तु जब पुण्य का उदय नहीं रहता तब हाथ में रखी हुई भी वस्तु नष्ट हो जाती है यदि पुण्य पाप से भिन्न कोई दूसरा पदार्थ सुख दुख का देने वाला है तो एक निमित्त मात्र है अर्थात् पुण्य-पाप ही सुख-दुख का देने वाला है इसलिए ग्रन्थकार कहते हैं कि भव्य जीवों को चाहिए कि वे निर्मल पुण्य के पात्र बनें।


कोप्यंधोऽपि सुलोचनोऽपि जरसा ग्रस्तोऽपि लावण्यवान्
निष्प्राणोऽपि हरिर्विरूपतनुरप्याघुष्यते मन्मथः।
उद्योगोज्झितचेष्टितोऽपि नितरामालिङ्ग्यते च श्रिया
पुण्यादन्यदपि प्रशस्तमखिलं जायेत यद्दुर्धटम् ॥१८९॥

अर्थ: पुण्य के उदय से अंधा भी सुलोचन कहलाता है तथा पुण्य के ही उदय से रोगी भी रूपवान कहलाता है और निर्बल भी पुण्य के उदय से सिंह के समान पराक्रमी कहा जाता है तथा पुण्य के ही उदय से बदसूरत भी कामदेव के समान सुन्दर कहा जाता है तथा पुण्य के ही उदय से आलसी को भी लक्ष्मी अपने आप आकर वर लेती है विशेष कहाँ तक कहा जाये जो उत्तम से उत्तम वस्तु संसार में दुर्लभ कही जाती हैं वे भी पुण्य के ही उदय से सब सुलभ हो जाती हैं अर्थात् वे बिना परिश्रम के ही प्राप्त हो जाती हैं इसलिए भव्य जीवों को सदा पुण्य का ही आराधन करना चाहिए।


बन्धस्कन्धसमाश्रितं सृणिभृतामारोहकाणामलं
पृष्ठे भारसमर्पणं कृतवतां संचालनं ताडनम्।
दुर्वाचं वदतामपि प्रतिदिनं सर्वं सहन्ते गजा
निर्द्धाम्नां बलिनोऽपि यत्तदखिलं दुष्टो विधिश्चेष्टते ॥१९०॥

अर्थ: यद्यपि महावत की अपेक्षा हाथी बलवान् होते हैं तो भी महावत उनको बाँधते हैं तथा उनके ऊपर चढ़ते हैं और उनको अंकुश भी मारते हैं तथा उनकी पीठ पर बोझा भी लादते हैं और उनको अपनी इच्छानुसार चलाते हैं तथा और भी ताड़ना करते हैं और प्रतिदिन उनको गाली भी देते हैं और उन हाथियों को ये सब बातें सहन भी करनी पड़ती हैं इस ही प्रकार उत्तम पुरुषों पर नीच पुरुष भी अपना प्रभाव डालते हैं इसलिए आचार्य कहते हैं, ये समस्त चेष्टायें दुष्ट कर्म की हैं अर्थात् पाप के द्वारा ही ये सब बातें होती हैं इसलिए भव्यों को चाहिए कि वे सदा पुण्य का ही उपार्जन करें तथा पाप का नाश करें।


सर्पो हारलता भवत्यसिलता सत्पुष्पदामायते
सम्पद्येत रसायनं विषमपि प्रीतिं विधत्ते रिपुः।
देवा यान्ति वशं प्रसन्नमनसः किं वा बहु ब्रूमहे
धर्मो यस्य नभोऽपि तस्य सततं रत्नैः परैर्वर्षति ॥१९१॥

अर्थ: जो मनुष्य धर्मात्मा हैं उनके धर्म के प्रभाव से भयंकर सर्प भी मनोहर हार बन जाते हैं तथा पैनी तलवार भी उत्तम फूलों की माला बन जाती है और धर्म के प्रभाव से ही प्राणघातक विष भी उत्तम रसायन बन जाता है तथा धर्म के ही माहात्म्य से बैरी भी प्रीति करने लग जाता है और प्रसन्नचित्त होकर देव, धर्मात्मा पुरुष के आधीन हो जाते हैं। ग्रन्थकार कहते हैं कि विशेष कहाँ तक कहा जाये जिस मनुष्य के हृदय में धर्म है अर्थात् जो मनुष्य धर्मात्मा है उनके धर्म के प्रभाव से आकाश से भी उत्तम रत्नों की वर्षा होती है इसलिए भव्य जीवों को धर्म से कदापि विमुख नहीं होना चाहिए।


उग्रग्रीष्मरविप्रतापदहनज्वालाभितप्तश्चलन्
यः पित्तप्रकृतिर्मरौ मृदुतरः पान्थः पथा पीडितः ।
तद्द्वाग्लब्धहिमाद्रिकुञ्जरचितप्रोद्दामयन्त्रोल्लसद्
धारावेश्मसमो हि संसृतिपथे धर्मो भवेद्देहिनाम् ॥१९२॥

अर्थ: जो बटोही ग्रीष्मकाल में भयंकर सूर्य की संतापरूपी अग्नि की ज्वालाओं से अत्यन्त तप्तायमान है और पित्त प्रकृति वाला है तथा कोमल शरीर का धारी है और मारवाड़ की भूमि में गमन करने वाला है अतएव जो अत्यन्त दुःखित है यदि वह दैवयोग से हिमालय पर्वत की गुफा में बने हुए फुव्वारों सहित मनोहर धारागृह (फव्वारों सहित घर) को पा लेवे तो वह परम सुखी होता है उसी प्रकार जो जीव अनादिकाल से इस संसार में जन्म-मरण आदि दुखों को सहता है तथा निरंतर नरकादि योनियों में भ्रमता है यदि वह भी धारागृह के समान इस धर्म को संसार में पा लेवे तो सुखी हो जाता है अर्थात् शान्ति का अनुभव करने लग जाता है इसलिए जो मनुष्य शान्ति को चाहने वाले हैं उनको अवश्य धर्म का ही आराधन करना चाहिए।


संहारोग्रसमीरसंहतिहतप्रोद्भूतनीरोल्लसत्-
तुङ्गोर्मिभ्रमितोरुनक्रमकरग्राहादिभिर्भीषणे ।
अम्भोधौ विधुतोग्रवाडवशिखिज्वालाकराले पत-
ज्जन्तोःखेऽपि विमानमाशु कुरुते धर्मः समालम्बनम् ॥१९३॥

अर्थ: जो समुद्र प्रलयकाल में उठा हुआ भयंकर पवन का समूह, उससे उछलता हुआ जल उसकी ऊँची-ऊँची तरंगें उनमें भ्रमण करते हुए जो मगरमच्छ आदि जलजीव उनसे भयंकर हो रहा है तथा तीक्ष्ण बड़वानल की ज्वाला से भी भयंकर है ऐसे समुद्र में गिरते हुए प्राणी को धर्म नहीं गिरने देता है तथा आकाश में भी विमान रचकर शीघ्र ही अवलंबन देता है।


उह्यन्ते ते शिरोभिः सुरपतिभिरपि स्तूयमानाः सुरौघैः
गीयन्ते किन्नरीभिर्ललितपदलसद्गीतिभिर्भक्तिरागात् ।
बंभ्रम्यन्ते च तेषां दिशि दिशि विशदाः कीर्तयः का न वा स्यात्
लक्ष्मीस्तेषु प्रशस्ता विदधति मनुजा ये सदा धर्ममेकम् ॥१९४॥

अर्थ: जो मनुष्य सदा एक धर्म को ही धारण करते हैं अर्थात् जो धर्मात्मा हैं उनको इन्द्र भी मस्तक पर धारण करते हैं तथा बड़े-बड़े देव उनकी स्तुति करते हैं और उन धर्मात्मा पुरुषों के गुण बड़ी शांति से किन्नरी जाति की देवी गाती है तथा उन धर्मात्मा पुरुषों की कीर्ति समस्त दिशाओं में फैल जाती है और उन धर्मात्मा पुरुषों को उत्तम से उत्तम लक्ष्मी की भी प्राप्ति होती है इसलिए भव्य जीवों को ऐसा महिमा युक्त धर्म अवश्य धारण करने योग्य है।


धर्मः श्रीवशमन्त्र एष परमो धर्मश्च कल्पद्रुमो
धर्मः कामगवीप्सितप्रदमणिर्धर्मः परं दैवतम् ।
धर्मः सौख्यपरं परामृतनदीसम्भूतिसत्पर्वतो
धर्मो भ्रातरुपास्यतां किमपरैः क्षुद्रैरसत्कल्पनैः ॥१९५॥

अर्थ: समस्त प्रकार की लक्ष्मी को देने वाला होने के कारण यह धर्म लक्ष्मी के वश करने को मंत्र के समान है तथा यह धर्म वांछित चीजों का देने वाला कल्पवृक्ष है और धर्म ही कामधेनु है तथा धर्म ही समस्त चिन्ताओं को पूर्ण करने वाला चिन्तामणि रत्न है, धर्म ही उत्कृष्ट देवता है और धर्म ही उत्कृष्ट सुखों की राशिरूपी जो अमृत नदी उसके उत्पन्न कराने में पर्वत के समान है अर्थात् जिस प्रकार हिमालय आदि पहाड़ों से नदियां उत्पन्न होती हैं उसी प्रकार धर्म से भी सुखों की परम्परारूप नदी की उत्पत्ति होती है (सुख मिलता है)। इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि अरे भाइयों व्यर्थ नीच कल्पनाओं को करके क्या? केवल धर्म का ही सेवन करो जिससे तुम्हारे सर्व कार्य सिद्ध हो जावें।


आस्तामस्य विधानतः पथि गतिर्धर्मस्य वार्तापि यैः
श्रुत्वा चेतसि धार्यते त्रिभुवने तेषां न काः सम्पदः ।
दूरे सज्जलपानमज्जनसुखं शीतैः सरोमारुतैः
प्राप्तं पद्मरजः सुगन्धिभिरपि श्रान्तं जनं मोदयेत् ॥१९६॥

अर्थ: धर्म के मार्ग में विधिपूर्वक गमन करना तो दूर रहो किन्तु जो धर्म की बातों के प्रेमी मनुष्य केवल उसको सुनकर धारण कर लेते हैं उनके भी तीन लोक में समस्त संपदाओं की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार शीतल जल के पीने का सुख तथा स्नान करने का सुख तो दूर ही रहो अर्थात् उससे तो शांति होती ही है किन्तु जो तालाब की वायु कमलों की रज से सुगन्धित हो रही है तथा शीतल है उससे उत्पन्न हुआ जो सुख वह भी थके हुए मनुष्य को शान्त कर देता है इसलिए भव्य जीवों को सदा धर्म का ही आश्रय लेना चाहिए।


यत्पादपङ्कजरजोभिरपि प्रणामान्
लग्नैः शिरस्यमलबोधकलावतारः।
भव्यात्मनां भवति तत्क्षणमेव मोक्षं
स श्रीगुरुर्दिशतु मे मुनिवीरनन्दी१॥१९७॥

अर्थ: जिन वीरनंदी गुरु के प्रणाम पूर्वक मस्तक में लगाये हुए चरण कमलों की रज से ही भव्य जीवों को बात ही बात में निर्मल ज्ञान की प्राप्ति होती है वे श्री वीरनन्दी मुनि मेरे गुरु मुझे मोक्ष देवे।


दत्तानन्दमपारसंसृतिपथश्रान्तश्रमच्छेदकृत्
प्रायो दुर्लभमत्र कर्णपुटकैर्भव्यात्मभिः पीयताम्
निर्यातं मुनिपद्मनन्दिवदनप्रालेयरश्मेः परं
स्तोकं यद्यपि सारताधिकमिदं धर्मोपदेशामृतम्॥१९८॥

अर्थ: जो धर्मोपदेश रूपी अमृत पीने पर उत्तम आनन्द का देने वाला है और जो संसाररूपी अपार मार्ग उसमें थके हुए जो प्राणी उनकी थकावट को दूर करने वाला है तथा जो पुण्यहीन पुरुषों को अत्यन्त दुर्लभ है और जो पद्मनन्दि मुनि के मुख चन्द्रमा से निकला हुआ है अर्थात् जिस प्रकार चन्द्रमा से अमृत निकलता है, उसी प्रकार पद्मनन्दि मुनि के मुखचन्द्र से भी धर्मोपदेशरूपी अमृत निकला है, यद्यपि वह धर्मोपदेशामृत शब्दों से थोड़ा वर्णन किया गया है तो भी सार से अधिक है ऐसा वह धर्मोपदेशामृत भव्यों को अवश्य पीना चाहिए।

२. दानोपदेश

जीयाज्जिनो जगति नाभिनरेन्द्रसूनुः श्रेयो नृपश्च कुरुगोत्रगृहप्रदीपः।
याभ्यां बभूवतुरिह व्रतदानतीर्थे सारक्रमे परमधर्मरथस्य चक्रे ॥१॥

अर्थ: श्री नाभि राजा के पुत्र श्री वृषभ भगवान् सदा इस लोक में जयवन्त रहें तथा कुरु गोत्ररूपी घर के प्रकाश करने वाले श्री श्रेयान् राजा भी इस लोक में सदा जयवन्त रहें जिन दोनों महात्माओं की कृपा से उत्कृष्ट धर्मरूपी रथ के चक्रस्वरूप अर्थात् परमधर्मरूपी रथ के चलाने वाले तथा सार क्रम से सहित व्रततीर्थ तथा दानतीर्थ की उत्पत्ति हुई है।


श्रेयोऽभिधस्य नृपतेः शरदभ्रशुभ्रभ्राम्यद्यशोभृतजगतत्रितयस्य तस्य।
किं वर्णयामि ननु सद्मनि यस्य भुक्तं त्रैलोक्यवंदितपदेन जिनेश्वरेण ॥२॥

अर्थ: शरदकाल के मेघ के समान जो उज्ज्वल भ्रमण करता हुआ यश उससे जिसने तीनों जगत् को पूर्ण कर दिया है अर्थात् जिनका उज्ज्वल यश तीनों लोक में फैला हुआ है ऐसे श्री श्रेयांस नामक राजा की (ग्रन्थकार कहते हैं कि) हम क्या प्रशंसा करें जिन श्रेयान् राजा के घर में तीनलोक के पूजनीय श्री ऋषभदेव भगवान् ने आहार लिया था।


श्रेयान् नृपो जयति यस्य गृहे तदा खादेकाद्यवन्द्यमुनिपुंगवपारणायाम्।
सा रत्नवृष्टिरभवज्जगदेकचित्रहेतुर्यया वसुमतीत्वमिता धरित्री ॥३॥

अर्थ: वह श्रेयांस नामक राजा सदा जयवंत रहे। जिस श्रेयांस राजा के घर में तीनलोक के वंदनीय श्री ऋषभदेव की पारणा के समय वह तीनलोक के आश्चर्य करने वाली रत्नों की वर्षा होती हुई कि जिस वर्षा से यह पृथ्वी साक्षात् वसुमती नाम को धारण करती है।


प्राप्तेऽपि दुर्लभतरेऽपि मनुष्यभावे स्वप्नेन्द्रजालसदृशेऽपि हि जीवितादौ।
ये लोभकूपकुहरे पतिताः प्रवक्ष्ये कारुण्यतः खलु तदुद्धरणाय किञ्चित् ॥४॥

अर्थ: अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य जन्म को पाकर तथा स्वप्न के समान और इन्द्रजाल के समान जीवन यौवन आदि के होने पर भी जो मनुष्य लोभरूपी कुएँ में गिरे हुए हैं उनके उद्धार के लिए आचार्य कहते हैं कि मैं दयाभाव से कुछ कहूँगा।


कान्तात्मजद्रविणमुख्यपदार्थसार्थप्रोत्थातिघोरघनमोहमहासमुद्रे ।
पोतायते गृहिणि सर्वगुणाधिकत्वाद्दानं परं परमसात्त्विकभावयुक्तम् ॥५॥

अर्थ: स्त्री, पुत्र, धन आदिक जो मुख्य पदार्थों का समूह उससे उठा हुआ जो अत्यन्त घोर तथा प्रचुर मोह उसके विशाल समुद्र स्वरूप इस गृहस्थाश्रम से पार होने के लिए परम सात्विक भाव से दिया हुआ तथा सर्व गुणों में अधिक ऐसा उत्कृष्ट दान ही जहाज स्वरूप है।


नानाजनाश्रितपरिग्रहसम्भृतायाः सत्पात्रदानविधिरेव गृहस्थतायाः।
हेतुः परः शुभगतेर्विषमे भवेऽस्मिन्नावः समुद्र इव कर्मठकर्णधारः ॥६॥

अर्थ: जिसका खेवटिया चतुर है ऐसी अथाह समुद्र में पड़ी हुई भी नाव जिस प्रकार मनुष्य को तत्काल में पार कर देती है उसी प्रकार इस भयंकर संसार में स्त्री पुत्र आदि नाना जनों के आधीन जो परिग्रह से सहित इस गृहस्थपने में रहे हुए मनुष्य के लिए श्रेष्ठ पात्र में दी हुई दान विधि ही शुभगति को देने वाली होती है इसलिए भव्यजीवों को गृहस्थाश्रम में रहकर अवश्य दान देना चाहिए।


आयासकोटिभिरुपार्जितमङ्गजेभ्यो यज्जीवितादपि निजाद्दयितं जनानाम्।
वित्तस्य तस्य सुगतिः खलु दानमेकमन्या विपत्तय इति प्रवदन्ति सन्तः ॥७॥

अर्थ: नाना प्रकार के दुखों से जो धन पैदा किया गया है तथा जो पुत्रों से तथा अपने जीवन से भी मनुष्यों को प्यारा है उस धन की यदि अच्छी गति है तो केवल दान ही है अर्थात् वह धन दान से ही सफल होता है किन्तु दान के अतिरिक्त दिया हुआ वह धन विपत्ति का ही कारण है ऐसा सज्जन पुरुष कहते हैं इसलिए भव्य जीवों को अपना कमाया हुआ धन दान में ही खर्च करना चाहिए।


भुक्त्यादिभिः प्रतिदिनं गृहिणो न सम्यङ्नष्टा रमापि पुनरेति कदाचिदत्र ।
सत्पात्रदानविधिना तु गताप्युदेति क्षेत्रस्थ बीजमिव कोटिगुणं वटस्य ॥८॥

अर्थ: गृहस्थ के जिस लक्ष्मी का भोगादि से नाश होता है वह लक्ष्मी कदापि लौटकर नहीं आती परन्तु जो लक्ष्मी मुनि आदिक उत्तम पात्रों के दान देने में खर्च होती है वह लक्ष्मी भूमि में स्थित वट वृक्ष के बीज के समान कोटि गुणी होती है अर्थात् जो मनुष्य लक्ष्मी पाकर निरभिमान होकर दान देते हैं वे इन्द्रादि संपदाओं का भोग करते हैं इसलिए यदि मनुष्य को लक्ष्मी की वृद्धि की आकांक्षा है तो उसको अवश्य मुनि आदि पात्रों को दान देना चाहिए।


यो दत्तवानिह मुमुक्षुजनाय भुक्तिं भक्त्याश्रितः शिवपथे न धृतः स एव।
आत्मापि तेन विदधत्सुरसङ्ग नूनमुच्चैः पदं व्रजति तत्सहितोऽपि शिल्पी ॥९॥

अर्थ: जिस प्रकार कारीगर जैसा-जैसा ऊँचा मकान बनाता जाता है उतना-उतना आप भी ऊँचा होता चला जाता है उसी प्रकार जो मनुष्य मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य को भक्ति पूर्वक आहार दान देता है वह उस मुनि को ही मुक्ति को नहीं पहुँचाता किन्तु स्वयं भी जाता है इसलिए ऐसा स्वपर हितकारी दान मनुष्यों को अवश्य देना चाहिए।


यः शाकपिण्डमपि भक्तिरसानुविद्धबुद्धिः प्रयच्छति जनो मुनिपुंगवाय ।
स स्यादनन्तफलभागथ बीजमुप्तं क्षेत्रे न किं भवति भूरिकृषीवलस्य ॥१०॥

अर्थ: उस ही प्रकार जो श्रावक भक्तिपूर्वक मुनि को शाकपिण्ड का भी आहार देता है वह अनन्त सुखों का भोक्ता होता है। जिस प्रकार किसान थोड़ा बीज बोता है उसके बीज की अपेक्षा धान्य अधिक पैदा होता है इसलिए थोड़े से बहुत की इच्छा करने वाले श्रावकों को खूब दान देना चाहिए।


साक्षान्मनोवचनकायविशुद्धिशुद्धः पात्राय यच्छति जनो ननु भुक्तिमात्रम् ।
यस्तस्य संसृतिसमुत्तरणैकबीजे पुण्ये हरिर्भवति सोऽपि कृताभिलाषः ॥११॥

अर्थ: जो मनुष्य भलीभाँति मन, वचन, काय को शुद्ध कर उत्तम पात्र के लिए आहार दान देता है उस मनुष्य के संसार से पार करने में कारणभूत पुण्य की, नाना प्रकार की संपत्ति का भोग करने वाला इन्द्र भी अभिलाषा करता है इसलिए गृहस्थाश्रम में सिवाय दान के दूसरा कोई कल्याण करने वाला नहीं अतः श्रावकों को दान की ओर अवश्य लक्ष्य देना चाहिए।


मोक्षस्य कारणमभीष्टतमत्र लोके तद्धार्यते मुनिभिरङ्गबलात्तदन्नात् ।
तद्दीयते च गृहिणा गुरुभक्ति भाजा तस्माद्धृतो गृहिजनेन विमुक्ति मार्गः ॥१२॥

अर्थ: इस संसार में मोक्ष का कारण रत्नत्रय है तथा उस रत्नत्रय को शरीर में शक्ति होने पर मुनिगण पालते हैं और मुनियों के शरीर में शक्ति अन्न से होती है तथा मुनियों के लिए उस अन्न को श्रावक भक्ति पूर्वक देते हैं इसलिए वास्तविक रीति से गृहस्थ ने ही मोक्षमार्ग को धारण किया है ऐसा समझना चाहिए।


नानागृहव्यतिकरार्जितपापपुञ्जैः खञ्जीकृतानि गृहिणो न तथा व्रतानि ।
उच्चैः फलं विदधतीह यथैकदापि प्रीत्यातिशुद्धमनसा कृतपात्रदानम् ॥१३॥

अर्थ: गृह सम्बन्धी नाना प्रकार के आरंभों से उपार्जन किये हुए जो पाप उनसे असमर्थ किये हुए ऐसे व्रत गृहस्थों को कुछ भी ऊँचे फल को नहीं दे सकते जैसा कि प्रीतिपूर्वक तथा शुद्ध मन से उत्तमादि पात्रों के लिए एक समय भी दिया हुआ दान उत्तम फल को देता है इसलिए ऊँचे फल के अभिलाषियों को सदा उत्तमादि पात्रों को दान देना चाहिए।


मूले तनुस्तदनु धावति वर्धमाना यावच्छिवं सरिदिवानिशमासमुद्रम् ।
लक्ष्मीः सदृष्टिपुरुषस्य यतीन्द्रदानपुण्यात्पुरःसह यशोभिरतीद्धफेनैः ॥१४॥

अर्थ: जिस पहाड़ से नदी निकलती है वहाँ पर यद्यपि नदी की धार पतली होती है परन्तु समुद्र पर्यन्त जिस प्रकार फेन सहित वह उत्तरोत्तर बढ़ती ही चली जाती है उसी प्रकार यद्यपि सम्यग्दृष्टि के पहले लक्ष्मी थोड़ी होती है परन्तु मुनीश्वरों के लिए दिये हुए दान के प्रभाव से कीर्ति के साथ मोक्ष पर्यन्त वह इन्द्र, अहमिन्द्र, चक्रवर्ती, तीर्थंकरादि रूप से दिन-दिन बढ़ती ही चली जाती है इसलिए सम्यग्दृष्टि को अवश्य दान देना चाहिए।


प्रायः कुतो गृहगते परमात्मबोधः शुद्धात्मनो भुवि यतः पुरुषार्थसिद्धिः ।
दानात्पुनर्ननु चतुर्विधतः करस्था सा लीलयैव कृतपात्रजनानुषङ्गात् ॥१५॥

अर्थ: जिस परमात्मा के ज्ञान से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूप चार पुरुषार्थों की सिद्धि होती है उस परमात्मा का ज्ञान, सम्यग्दृष्टि को घर में रहकर कदापि नहीं हो सकता परन्तु उन पुरुषार्थों की सिद्धि, उत्तमादि पात्रों को आहार, औषधि, अभय, शास्त्र रूप चार प्रकार के दान देने से पल भर में हो जाती है। इसलिए धर्म, अर्थ आदि पुरुषार्थों के अभिलाषी सम्यग्दृष्टियों को उत्तम आदि पात्रों को अवश्य दान देना चाहिए।


नामापि यः स्मरति मोक्षपथस्य साधोराशु क्षयं व्रजति तद्दुरितं समस्तम् ।
यो भुक्तभेषजमठादिकृतोपकारः संसारमुत्तरति सोऽत्र नरो न चित्रम्॥१६॥

अर्थ: जो मनुष्य मोक्षार्थी साधु का नाममात्र भी स्मरण करता है उसके समस्त पाप क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं किन्तु जो भोजन, औषधि, मठ आदि बनवाकर मुनियों का उपकार करता है वह संसार से पार हो जाता है। इसमें आश्चर्य ही क्या है अर्थात् ऐसे उपकारी को तो मोक्ष होना ही चाहिए।


किं ते गृहाः किमिह ते गृहिणो नु येषामन्तर्मनस्सु मुनयो न हि संचरन्ति ।
साक्षादथ स्मृतिवशाच्चरणोदकेन नित्यं पवित्रितधराग्रशिरः प्रदेशाः ॥१७॥

अर्थ: जिन मुनियों के चरण कमल के जल स्पर्श से जिन घरों की भूमि पवित्र हो जाती है तथा जिन गृहस्थों के मस्तक भी पवित्र हो जाते हैं उन उत्तम मुनियों का जिन घरों में संचार नहीं है तथा जिन गृहस्थों के मन में भीतर भी जिन मुनियों का प्रवेश नहीं है वे घर तथा गृहस्थ दोनों ही बिना प्रयोजन के हैं इसलिए गृहस्थों को उत्तम आदि पात्रों को अवश्य दान देना चाहिए जिससे मुनियों के आगमन से उनके घर पवित्र बने रहें तथा उनका गृहस्थपना भी कार्यकारी गिना जावे।


देवः स किं भवति यत्र विकारभावो धर्मः स किं न करुणाऽङ्गिषु यत्र मुख्या।
तत्किं तपो गुरुरथास्ति न यत्र बोधः सा किं विभूतिरिह यत्र न पात्रदानम् ॥१८॥

अर्थ: वह देव कैसा? जिसके स्त्री आदि को देखकर विकार है तथा वह धर्म किस काम का? जिसमें दया मुख्य नहीं गिनी गई है। जिससे आत्मा आदि का ज्ञान नहीं होता वह तप तथा वह गुरु किस काम का ? तथा वह संपदा भी किस काम की ? जिसके होने पर उत्तम आदि पात्रों को दान न दिया जावे।


किं ते गुणाः किमिह तत्सुखमस्ति लोके सा किं विभूतिरथ या न वशं प्रयाति।
दानव्रतादिजनितो यदि मानवस्य धर्मो जगतत्रयवशीकरणैकमन्त्रः ॥१९॥

अर्थ: जिस मनुष्य के पास तीनों जगत् को वश करने में मंत्रस्वरूप तथा दान, व्रत आदि से उत्पन्न हुआ धर्म मौजूद है उस मनुष्य के उत्तमोत्तम गुण तथा उत्तमोत्तम सुख और उत्तमोत्तम ऐश्वर्य सब अपने आप आकर वश में हो जाते हैं इसलिए उत्तमोत्तम गुण के अभिलाषियों को दान, व्रत आदि को अवश्य करना चाहिए।


सत्पात्रदानजनितोन्नतपुण्यराशिरेकत्र वा परजने नरनाथलक्ष्मीः।
आद्यात्परस्तदपि दुर्गत एव यस्मादागामिकालफलदायि न तस्य किञ्चित् ॥२०॥

अर्थ: एक मनुष्य तो उत्तम पात्र दान से पैदा हुए श्रेष्ठ पुण्य का संचय करता है और दूसरा राज्य लक्ष्मी का अच्छी तरह भोग करता है परन्तु उन दोनों में दूसरा राज्य लक्ष्मी का भोगकरने वाला ही पुरुष दरिद्री है क्योंकि आगामीकाल में उसको किसी प्रकार की संपत्ति आदि का फल नहीं मिल सकता किन्तु पात्रदान करने वाले को तो आगामीकाल में उत्तम संपदारूपी फलों की प्राप्ति होती है इसलिए भव्य जीवों को खूब दान देकर खूब ही पुण्य का संचय करना चाहिए।


दानाय यस्य न धनं न वपुर्व्रताय नैवं श्रुतं च परमोपशमाय नित्यम्।
तज्जन्म केवलमलं मरणाय भूरि संसारदुःखमृतिजातिनिबन्धनाय ॥२१॥

अर्थ: जिस मनुष्य का धन तो दान के लिए नहीं है तथा शरीर व्रत के लिए नहीं है और उत्तम शांति के पैदा करने के लिए शास्त्र नहीं है उस मनुष्य का जन्म संसार के जन्म-मरण आदि अनेक दुखों के भोगने का कारण जो मरण उसके लिए है।


प्राप्ते नृजन्मनि तपः परमस्तु जन्तोः संसार सागरसमुत्तरणैकसेतुः।
माभूद्विभूतिरिह बंधनहेतुरेव देवे गुरौ शमिनि पूजनदानहीना ॥२२॥

अर्थ: अत्यन्त दुर्लभ इस मनुष्यभव के प्राप्त होने पर मनुष्य को संसार समुद्र से पार करने के लिए पुल के समान श्रेष्ठ तप का मिलना उत्तम है परन्तु इस लोक में अर्हन्त तथा गुरु के पूजन तथा दान के उपयोग में न आने वाली तथा केवल कर्मबन्ध की ही कारण ऐसी विभूति की कोई आवश्यकता नहीं।


भिक्षावरा परिहृताखिलपापकारिकार्यानुबंधविधुराश्रितचित्तवृत्तिः ।
सत्पात्रदानरहिता विततोग्रदुःखदुर्लंघ्यदुर्गतिंकरी न पुनर्विभूतिः ॥२३॥

अर्थ: जिस भिक्षा के होने पर चित्त की वृत्ति समस्त प्रकार के पाप को पैदा करने वाले कार्यों के सम्बन्ध से दुःखित नहीं होती (अर्थात् पाप के करने वाले कार्यों की ओर झाँकती भी नहीं) ऐसी भिक्षा तो उत्तम है किन्तु विस्तीर्ण नाना प्रकार के दुखों से नहीं पार करने योग्य ऐसी दुर्गति को देने वाली तथा उत्तम आदि पात्रों के दान के उपयोग से रहित विभूति की कोई आवश्यकता नहीं।


पूजा न चेज्जिनपतेः पदपङ्कजेषु दानं न संयतजनाय च भक्तिपूर्वम्।
नो दीयते किमु ततः सदवस्थितायाः शीघ्रं जलाञ्जलिरगाधजले प्रविश्य ॥२४॥

अर्थ: जिस गृहस्थाश्रम में जिनेन्द्रभगवान् के चरणकमलों की पूजा नहीं है तथा भक्ति भाव से संयमी जनों के लिए दान भी नहीं दिया जाता आचार्य कहते हैं कि अत्यन्त गहरे जल में प्रवेश करके उस गृहस्थाश्रम के लिए जल की अंजलि दे देनी चाहिए।


कार्यं तपः परमिह भ्रमता भवाब्धौ मानुष्यजन्मनि चिरादतिदुःखलब्धे।
सम्पद्यते न तदणुव्रतिनापि भाव्यं जायेत चेदहरहः किल पात्रदानम् ॥२५॥

अर्थ: चिरकाल से इस संसाररूपी समुद्र में भ्रमण करते हुए प्राणियों को कष्ट से इस मनुष्य भव की प्राप्ति हुई है इसलिए इस मनुष्य जन्म में अवश्य तप करना चाहिए यदि तप न हो सके तो अणुव्रत अवश्य ही धारण करना चाहिए जिससे प्रतिदिन निश्चय से उत्तम आदि पात्रों का दान हुआ करे।


ग्रामान्तरं व्रजति यः स्वगृहाद् गृहीत्वा पाथेयमुन्नततरं स सुखी मनुष्यः।
जन्मान्तरं १प्रविशतोऽस्य तथा व्रतेन दानेन चार्जितशुभं सुखहेतुरेकम् ॥२६॥

अर्थ: जो मनुष्य अपने घर से अच्छी तरह पाथेय (टोसा) लेकर दूसरे गाँव को जाता है वह मनुष्य जिस प्रकार सुखी रहता है उसी प्रकार जो मनुष्य परलोक को गमन करता है उस मनुष्य के व्रत तथा दान से पैदा किया हुआ एक पुण्य ही सुख का कारण है इसलिए जो मनुष्य परलोक में सुख के अभिलाषी हैं वे मनुष्य व्रतों को धारण कर तथा दान देकर खूब पुण्य का संचय करना चाहिए।


यत्नः कृतोऽपि मदनार्थयशोनिमित्तं दैवादिह व्रजति निष्फलतां कदाचित्।
संकल्पमात्रमपि दानविधौ तु पुण्यं कुर्यादसत्यपि हि पात्रजने प्रमोदात् ॥२७॥

अर्थ: संसार में काम-भोग के लिए तथा धन के लिए अथवा यश के लिए किया हुआ प्रयत्न यद्यपि दैवयोग से किसी समय निष्फल हो जाता है परन्तु उत्तम आदि पात्रों के नहीं होते हुए भी हर्षपूर्वक दान देवेंगे ऐसा दान का संकल्प ही पुण्य का करने वाला होता है। इसलिए ऐसे उत्तम दान का मनुष्यों को अवश्य ध्यान रखना चाहिए।


सद्भागते किल विपक्षजनेऽपि सन्तः कुर्वन्ति मानमतुलं वचनाशनाद्यैः।
यत्तत्र चारुगुणरत्ननिधानभूते पात्रे मुदा महति किं क्रियते न शिष्टैः ॥२८॥

अर्थ: बैरी भी यदि अपने घर आवे तो सज्जन मनुष्य मधुर-मधुर वचनों से तथा भोजन आदि से उसका बड़ा भारी सम्मान करते हैं तो जो उत्तम सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय के धारी हैं तथा पूज्य हैं ऐसे पात्र में सज्जन हर्ष पूर्वक क्या नहीं करेंगे अर्थात् उसको अवश्य ही नवधाभक्ति से आहार देवेंगे।


सूनोर्मृतेरपि दिनं न सतस्तथा स्याद्बाधाकरं बत यथा मुनिदानशून्यम्॥
दुर्वारदुष्टविधिना न कृते ह्यकार्ये पुंसा कृते तु मनुते मतिमाननिष्टम् ॥२९॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि सज्जन पुरुष को पुत्र के मरने का दिन भी उतना दुख का देने वाला नहीं होता जितना कि मुनि के दान रहित दिन दुख का देने वाला होता है क्योंकि विद्वान् पुरुष दुर्दैव से किये हुए कार्य को उतना अनिष्ट नहीं मानता जितना अपने द्वारा किये हुए कार्य को अनिष्ट मानता है इसलिए विद्वानों को अपने करने योग्य दान रूपी कार्य अवश्य करना चाहिए।


ये धर्म कारणसमुल्लसिता विकल्पास्त्यागेन ते धनयुतस्य भवन्ति सत्याः।
स्पृष्टाः शशाङ्ककिरणैरमृतं क्षरन्तश्चन्द्रोपलाः किल लभन्त इह प्रतिष्ठाम् ॥३०॥

अर्थ: जिस प्रकार किसी मकान में चन्द्रकान्तमणि लगी हुई है जब तक उनके साथ चन्द्रमा की किरणों का स्पर्श नहीं होता तब तक उनसे पानी नहीं झर सकता इसलिए उनकी कोई प्रतिष्ठा नहीं करता किन्तु जिस समय चन्द्रमा के स्पर्श होने से उनसे पानी निकलता है उस समय उनकी बड़ी भारी प्रतिष्ठा होती है उसी प्रकार धनी पुरुष के चित्त में जो जिन-मंदिर बनवाना, तीर्थयात्रा करना आदि धर्म के कारण उत्पन्न होते हैं वे बिना पात्रदान के सत्यभूत नहीं समझे जाते किन्तु पात्रदान से ही वे सच समझे जाते हैं इसलिए गृहस्थियों को पात्रदान अवश्य देना चाहिए क्योंकि यह सभी में मुख्य हैं।


मन्दायते य इह दानविधौ धनेऽपि सत्यात्मनो वदति धार्मिकताञ्च यत्तत्।
माया हृदि स्फुरति सा मनुजस्य तस्य या जायते तदिदमुत्र सुखाचलेषु ॥३१॥

अर्थ: जो मनुष्य धन के होते भी दान देने में आलस करता है तथा अपने को धर्मात्मा कहता है वह मनुष्य मायाचारी है अर्थात् उस मनुष्य के हृदय में कपट भरा हुआ है तथा उसका वह कपट दूसरे भव में उसके समस्त सुखों का नाश करने वाला है।


ग्रासस्तदर्धमपि देयमथार्धमेव तस्यापि सन्ततमणुव्रतिना यथर्द्धिः।
इच्छानुरूपमिह कस्य कदात्र लोके द्रव्यं भविष्यति सदुत्तमदानहेतुः ॥३२॥

अर्थ: गृहस्थियों को अपने धन के अनुसार एक ग्रास अथवा आधा ग्रास वा चौथाई ग्रास अवश्य ही दान देना चाहिए। क्योंकि इस संसार में उत्तम पात्रदान का कारण इच्छानुसार द्रव्य कब किसके होगा।


मिथ्यादृशोऽपि रुचिरेव मुनीन्द्रदाने दद्यात्पशोरपि हि जन्म सुभोगभूमौ।
कल्पाङ्घ्रिपा ददति यत्र सदीप्सितानि सर्वाणि तत्र विदधाति न किं सुदृष्टेः ॥३३॥

अर्थ: मुनि आदि उत्तम पात्रदान में मिथ्यादृष्टि पशु को केवल की हुई रुचि (अनुमोदना) ही जब उसको उत्तम भोगभूमि आदि के सुखों को देने वाली होती है तब साक्षात् दान को देने वाले सम्यग्दृष्टि के तो वह दान क्या-क्या इष्ट तथा उत्तम चीजों को न देगा। अर्थात् अवश्य स्वर्ग, मोक्ष आदि के सुख को देगा।


दानाय यस्य न समुत्सहते मनीषा तद्योग्यसम्पदि गृहाभिमुखे च पात्रे।
प्राप्तं खनावपि महार्घ्यतरं विहाय रत्नं करोति विमतिस्तलभूमिभेदम् ॥३४॥

अर्थ: योग्य संपदा के होने पर भी तथा मुनि के घर आने पर भी जिस मनुष्य की बुद्धि दान देने में उत्साह नहीं करती अर्थात् जो दान देना नहीं चाहता वह मूर्ख पुरुष खानि में मिले हुए अमूल्य रत्न को छोड़कर व्यर्थ पाताल की भूमि को खोदता है।


नष्टा मणीरिव चिराज्जलधौ भवेस्मिन्नासाद्य चारुनरतार्थजिनेश्वराज्ञाः।
दानं न यस्य स जडः प्रविशेत्समुद्रं सच्छिद्रनावमधिरुह्य गृहीतरत्नः ॥३५॥

अर्थ: चिरकाल से समुद्र में पड़ी हुई मणि के समान इस संसार में उत्तम मनुष्यत्व तथा धन और जिनेन्द्र भगवान् की आज्ञा को प्राप्त कर जो मनुष्य उत्तम आदि पात्रों में दान नहीं देता वह मूर्ख मनुष्य टूटी-फूटी नाव पर चढ़कर तथा बहुत से रत्नों को साथ में लेकर दूसरे द्वीप में जाने के लिए समुद्र में प्रवेश करता है ऐसा समझना चाहिए।


यस्यास्ति नो धनवतः किल पात्रदानमस्मिन्परत्र च भवे यशसे सुखाय।
अन्येन केनचिदनूनसुपुण्यभाजा क्षिप्तः स सेवकनरो धनरक्षणाय ॥३६॥

अर्थ: जो धनी मनुष्य इस भव में कीर्ति के लिए तथा परभव में सुख के लिए उत्तम आदि पात्रों को दान नहीं देता है तो समझना चाहिए वह उस धन का मालिक नहीं है किन्तु किसी अत्यन्त पुण्यवान् पुरुष ने उस मनुष्य को उस धन की रक्षा के लिए नियुक्त किया है।


चैत्यालये च जिनसूरिबुधार्चने च दाने च संयतजनस्य सुदुःखिते च।
यच्चात्मनि स्वमुपयोगि तदेव नूनमात्मीयमन्यदिह कस्यचिदन्यपुंसः ॥३७॥

अर्थ: जो धन जिनमन्दिर के काम में लगाया जाता है तथा जिसका उपयोग जिनेन्द्र भगवान् की पूजा में तथा आचार्यों की पूजा में वा अन्य विद्वानों की पूजा में होता है तथा जो संयमी जनों के दान में खर्च किया जाता है तथा जो धन दुःखितों को दिया जाता है और जो धन अपने उपयोग में आता है वह धन तो अपना समझना चाहिए किन्तु जिस धन का ऊपर कहे हुए कामों में उपयोग न होवे उस धन को किसी और मनुष्य का धन समझना चाहिए।


पुण्यक्षयात्क्षयमुपैति न दीयमाना लक्ष्मीरतः कुरुत संततपात्रदानम्।
कूपे न पश्यत जलं गृहिणः समन्तादाकृष्यमाणमपि वर्धत एव नित्यम् ॥३८॥

अर्थ: हे गृहस्थो ! कुँआ से सदा चारों तरफ से निकला हुआ भी जल जिस प्रकार निरन्तर बढ़ता ही रहता है घटता नहीं है उसी प्रकार संयमी पात्रों के दान में व्यय की हुई लक्ष्मी सदा बढ़ती ही जाती है घटती नहीं किन्तु पुण्य के क्षय होने पर ही वह घटती है इसलिए मनुष्य को सदा संयमी पात्रों में दान देना चाहिए।


सर्वान्गुणानिह परत्र च हन्ति लोभः सर्वस्य पूज्यजनपूजनहानिहेतुः।
अन्यत्र तत्र विहितेऽपि हि दोषमात्रमेकत्र जन्मनि परं प्रथयन्ति लोकाः ॥३९॥

अर्थ: जो लोभ पूज्य जन जो अर्हन्त आदिक उनकी पूजा आदि में हानि को पहुँचाने वाला है वह लोभ इस भव में तथा परभव में समस्त मनुष्यों के सम्यग्दर्शन आदि गुणों को घातता है किन्तु जो लोभ लौकिक विवाह आदि कार्यों में किया जाता है उस लोभ को तो इस जन्म में मनुष्य केवल दोष ही कहते हैं इसलिए मनुष्य को दान पूजन आदि में कदापि लोभ नहीं करना चाहिए।


जातोऽप्यजात इव स श्रियमाश्रितोऽपि रङ्कः कलंकरहितोऽप्यगृहीतनामा।
कम्बोरिवाश्रितमृतेरपि यस्य पुंसः शब्दः समुच्छलति नो जगति प्रकामम् ॥४०॥

अर्थ: शंख की तरह जिस मनुष्य का मृत्यु के पीछे दान से उत्पन्न हुए यश का शब्द भली-भाँति संसार में नहीं फैलता, वह मनुष्य पैदा हुआ भी नहीं पैदा हुआ सा है तथा लक्ष्मीवान भी दरिद्री ही है तथा कलंक रहित है तो भी उसका कोई भी नाम नहीं लेता इसलिए मनुष्य को अवश्य दान देना चाहिए।


श्वापि क्षितेरपि विभुर्जठरं स्वकीयं कर्मोपनीतविधिना विदधाति पूर्णम्।
किन्तु प्रशस्यनृभवार्थविवेकितानामेतत्फलं यदिह सन्ततपात्रदानम् ॥४१॥

अर्थ: संसार में कर्मानुसार कुत्ता भी अपने पेट को भरता है तथा अपने कर्मानुकूल राजा भी अपने पेट को भरता है इसलिए पेट भरने में तो कुत्ता तथा राजा समान ही हैं परन्तु उत्तम नर भव पाने का तथा श्रीमान् होने का तथा उत्तम विवेकी होने का केवल एक यही फल है कि निरन्तर उत्तम आदि पात्रों में दान देना इसलिए जो मनुष्य उत्तम मनुष्यपने का तथा श्रीमान् होने का और विवेकी होने का अभिमान रखता है उसको अवश्य पात्रदान देना चाहिए।


आयासकोटिभिरुपार्जितमङ्गजेभ्यो यज्जीवितादपि निजाद्दयितं जनानाम्।
वित्तस्य तस्य नियतं प्रविहाय दानमन्या विपत्तय इति प्रवदन्ति सन्तः ॥४२॥

अर्थ: परदेश जाना, सेवा करना इत्यादि नाना प्रकार से जो धन पैदा किया गया है तथा जो मनुष्यों को अपने पुत्रों से तथा जीवन से भी प्यारा है उस धन की सफलता को एक गति, दान ही है किन्तु दान को छोड़कर और कोई दूसरी गति नहीं है और सब विपत्ति ही विपत्ति है ऐसा सज्जन पुरुष कहते हैं इसलिए समस्त प्रकार के सुखों का देने वाला मनुष्य को दान अवश्य करना चाहिए।


नार्थः पदात्पदमपि व्रजति त्वदीयो व्यावर्तते पितृवनान्ननु बन्धुवर्गः।
दीर्घे पथि प्रवसतो भवतः सखैकं पुण्यं भविष्यति ततः क्रियतां तदेव ॥४३॥

अर्थ: मरते समय यह तेरा धन एक पैड से दूसरे पैड तक भी नहीं जाता तथा बन्धुओं का समूह श्मशान भूमि से ही लौट आता है परन्तु इस दीर्घ संसार में भ्रमण करते हुए तुझको तेरा पुण्य ही एक मित्र होगा अर्थात् वही तेरे साथ जायेगा इसलिए तुझे पुण्य का ही उपार्जन करना चाहिए।


सौभाग्यशौर्यसुखरूपविवेकिताद्या विद्यावपुर्धनगृहाणि कुले च जन्म।
सम्पद्यतेऽखिलमिदं किल पात्रदानात्तस्मात्किमत्र सततं क्रियते न यत्नः ॥४४॥

अर्थ: सौभाग्य, शूरता, सुख, विवेक आदिक तथा विद्या, शरीर, धन, घर और उत्तम कुल में जन्म ये सब बातें उत्तमादि पात्रदान से ही होती हैं इसलिए भव्य जीवों को सदा पात्रदान में ही प्रयत्न करना चाहिए।


न्यासश्च सद्म च करग्रहणञ्च सूनोरर्थेन तावदिह कारयितव्यमास्ते।
धर्माय दानमधिकाग्रतया करिष्ये सञ्चिंतयन्नपि गृही मृतिमेति मूढः ॥४५॥

अर्थ: मुझे धन जमीन में गाड़ना है तथा धन से मुझे मकान बनवाना है और पुत्र का विवाह करना है इतने काम करने पर यदि अधिक धन होगा तो धर्म के लिए दान करूँगा ऐसा विचार करता ही करता मूर्ख प्राणी अचानक ही मर जाता है तथा कुछ भी नहीं कर पाता इसलिए मनुष्य को धन मिलने पर सबसे पहले दान करना चाहिए तथा दान से अतिरिक्त विचार कदापि नहीं करना चाहिए।


किं जीवितेन कृपणस्य नरस्य लोके निर्भोगदानधनबंधनबद्धमूर्तेः।
तस्माद्वरं बलिभुगुन्नतभूरिवाग्भिर्व्याहूतकाककुल एव बलिं स भुङ्क्ते ॥४६॥

अर्थ: जिस लोभी पुरुष की मूर्ति भोग तथा दान रहित धनरूपी बंधन से बंधी हुई है उस कृपण पुरुष का इस लोक में जीना सर्वथा व्यर्थ है क्योंकि उस पुरुष की अपेक्षा वह काक ही अच्छा है जो कि ऊँचे शब्द से और दूसरे बहुत से काकों को बुलाकर मिलकर भोजन करता है।


औदार्ययुक्तजनहस्तपरम्पराप्तव्यावर्तनप्रसृतखेदभरादतिखिन्नाः ।
अर्था गताः कृपणगेहमनन्तसौख्यपूर्णा इवानिशमबाधमति स्वपन्ति ॥४७॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि उदारता सहित जो मनुष्य उनके हाथों से पैदा हुआ, जो भ्रमण उससे उत्पन्न हुआ, जो अत्यन्त खेद उससे खिन्न होकर समस्त धन, कृपण के घर चले गये हैं तथा वहीं पर वे बाधा रहित आनन्द के साथ सोते हैं ऐसा मालूम होता है।


उत्कृष्टपात्रमनगारमणुव्रताढ्यं मध्यं व्रतेन रहितं सुदृशं जघन्यम्।
निर्दशनं व्रतनिकाययुतं कुपात्रं युग्मोज्झितं नरमपात्रमिदञ्च विद्धि ॥४८॥

अर्थ: उत्तमपात्र तो महाव्रती (मुनि) हैं तथा अणुव्रती (श्रावक) मध्यमपात्र हैं और व्रतरहित सम्यग्दृष्टि जघन्यपात्र हैं तथा व्रतसहित मिथ्यादृष्टि कुपात्र हैं तथा अव्रती मिथ्यादृष्टि अपात्र हैं ऐसा जानना चाहिए।


तेभ्यः प्रदत्तमिह दानफलं जनानामेतद्विशेषणविशिष्टमदुष्टभावात्।
अन्यादृशेऽथ हृदये तदपि स्वभावादुच्चावचं भवति किं बहुभिर्वचोभिः ॥४९॥

अर्थ: निर्मल भाव से उत्तम आदि पात्रों के लिए दिया हुआ दान मनुष्यों को उत्तम आदि फल का देने वाला होता है तथा जो दान मायाचार अथवा दुष्ट परिणामों से दिया जाता है वह भी नीचे ऊँचे फल का स्वभाव से देने वाला होता है इसलिए आचार्य कहते हैं इस विषय में हम विशेष क्या कहें दान अवश्य फल का देने वाला होता है।


चत्वारि यान्यभयभेषजभुक्तिशास्त्रदानानि तानि कथितानि महाफलानि।
नान्यानि गोकनकभूमिरथाङ्गनादिदानानि निश्चितमवद्यकराणि यस्मात् ॥५०॥

अर्थ: अभय, औषध, आहार, शास्त्र इस प्रकार से दान चार प्रकार का है तथा वह चार प्रकार का दान तो महाफल का देने वाला कहा है परन्तु इससे भिन्न गौ, सुवर्ण, जमीन, रथ, स्त्री आदि दान महाफल का देने वाला नहीं कहा है वह निन्दा का कराने वाला ही कहा है इसलिए महाफल के अभिलाषियों को ऊपर कहा हुआ चार प्रकार का ही दान देना चाहिए।


यद्दीयते जिनगृहाय धरादि किंचित्तत्तत्र संस्कृतिनिमित्तमिह प्ररूढम्।
आस्ते ततस्तदतिदीर्घतरं हि कालं जैनञ्च शासनमतः कृतमस्ति दातुः ॥५१॥

अर्थ: जो जिन मन्दिर के बनाने के लिए अथवा सुधार के लिए जमीन, धन आदिक दिये जाते हैं उससे जिनमन्दिर अच्छा बनता है तथा उस जिनमन्दिर के प्रभाव से बहुत काल तक जिनेन्द्र का मत इस पृथ्वी मण्डल पर विराजमान रहता है इसलिए दाता ने जिनमन्दिर के लिए जमीन धन आदि देकर जैन मत का उद्धार किया ऐसा समझना चाहिए।


दानप्रकाशनमशोभनकर्मकार्यकार्पण्यपूर्णहृदयाय न रोचतेऽदः।
दोषोज्झितं सकललोकसुखप्रदायि तेजोरवेरिव सदा हतकौशिकाय ॥५२॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि खोटा जो मिथ्यात्वरूपी कर्म उसका कार्य जो कृपणता उससे जिसका हृदय भरा हुआ है ऐसे कृपण पुरुष को समस्त दोष से रहित तथा सर्वलोक को सुख का देने वाला दान का प्रकाशरूप कार्य अच्छा नहीं लगता जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश घूक (उल्लू) को अच्छा नहीं लगता है।


दानोपदेशनमिदं कुरुते प्रमोदमासन्नभव्यपुरुषस्य न चेतरस्य।
जातिः समुल्लसति दारु न भृङ्गसङ्गादिन्दीवरं हसति चन्द्रकरैर्न चाश्मा ॥५३॥

अर्थ: और भी आचार्य कहते हैं कि जिस प्रकार भ्रमरों के संग से चमेली ही विकसित होती है लकड़ी विकसित नहीं होती तथा चन्द्रमा की किरणों से कुमुदनी ही प्रफुल्लित होती है पाषाण प्रफुल्लित नहीं होता उसी प्रकार जिसको थोड़े ही काल में मोक्ष होने वाला है ऐसे भव्य मनुष्य को ही यह दान का उपदेश हर्ष का करने वाला होता है अभव्य को यह दान का उपदेश कुछ भी हर्ष का करने वाला नहीं होता।


रत्नत्रयाभरणवीरमुनीन्द्रपादपद्मद्वयस्मरणसंजनितप्रभावः ॥
श्रीपद्मनन्दिमुनिराश्रितयुग्मदानपञ्चाशतं ललितवर्णचयं चकार॥५४॥

अर्थ: आचार्यवर दानोपदेशरूप प्रकरण को समाप्त करते हुए कहते हैं कि रत्नत्रयरूपी भूषण से भूषित ऐसे श्री वीरनन्दी नामक मुनि के दोनों चरण कमलों के स्मरण से उत्पन्न हुआ है उत्तम प्रभाव जिसको ऐसा श्री पद्मनन्दी नामक मुनि उत्तमोत्तम वर्णों की रचना से ५२ श्लोकों में दान का प्रकरण समाप्त करता हूँ।

३. अनित्यपञ्चाशत

जयति जिनो धृतिधनुषामिषुमाला भवति योगियोधानाम्।
यद्वाकरुणामय्यपि मोहरिपुप्रहतये तीक्ष्णा ॥१॥

अर्थ: दयामयी भी जिस जिनेन्द्र की वाणी धैर्यरूपी धनुष को धारण करने वाले योगिरूपी योद्धाओं के मोहरूपी बैरी के नाश करने के लिए पैनी बाणों की पंक्ति के समान है वे जिनेन्द्र इस संसार में सदा जयवन्त हैं।


यद्येकत्र दिने न विभुक्तिरथ वा निद्रा न रात्रौ भवेत्
विद्रात्यम्बुजपत्रवद्दहनतोभ्याशस्थिताद्यद्ध्रुवम्।
अस्त्रव्याधिजलादितोऽपि सहसा यच्च क्षयं गच्छति
भ्रातः कात्र शरीरके स्थितमतिर्नाशेऽस्यकोविस्मयः ॥२॥

अर्थ: यदि एक दिन खाया न जाये अथवा रात्रि में सोया न जाये तो यह शरीर पास में रही हुई अग्नि से जिस प्रकार कमल का पत्र मुरझा जाता है उसी प्रकार मुरझा जाता है तथा हथियार, रोग, जल, अग्नि आदि से भी यह पलभर में नष्ट हो जाता है इसलिए आचार्य कहते हैं कि हे भाई! यह शरीर कब तक रहेगा ऐसा कोई निश्चय नहीं है अथवा यह जल्दी नष्ट होगा इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं है। अतः इस शरीर में किसी प्रकार की ममता न रखकर अपना आत्मकल्याण करो।


दुर्गन्धाशुचिधातुभित्तिकलितं सच्छादितं चर्मणा
विण्मूत्रादिभृतं क्षुधादिविलसद्दुःखाखुभिश्छिद्रितम्।
क्लिष्टं कायकुटीरकं स्वयमपि प्राप्तं जरावह्निना
चेदेतत्तदपि स्थिरं शुचितरं मूढो जनो मन्यते॥३॥

अर्थ: जिस देहरूपी झोपड़े की भीतें दुर्गन्ध और अपवित्र ऐसी मल, मूत्र आदि धातुओं की बनी हुई हैं तथा जो ऊपर से चाम से ढका हुआ है और विष्टा, मूत्र आदि से भरा हुआ है तथा भूख, प्यास आदिक जो दुख वे ही हुए चूहे उन्होंने जिसमें बिल बना रखे हैं अर्थात् जो दुखों का भण्डार है और वृद्धावस्था रूपी अग्नि जिसके चारों ओर मौजूद है ऐसे शरीररूपी झोपड़े को भी मूढ़ प्राणी अविनाशी तथा पवित्र मानते हैं यह बड़े आश्चर्य की बात है।


अम्भोबुद्बुदसन्निभा तनुरियं श्रीरिन्द्रजालोपमा
दुर्वाताहतवारिवाहसदृशाः कान्तार्थपुत्रादयः।
सौख्यं वैषयिकं सदैव तरलं मत्ताङ्गनापांगवत्
तस्मादेतदुपप्लवाप्तिविषये शोकेन किं किं मुदा॥४॥

अर्थ: शरीर तो जल के बबूलों के समान है और लक्ष्मी इन्द्रजाल के समान है तथा स्त्री, धन, पुत्र, मित्र आदिक नष्ट हुए मेघों के समान पलभर में विनाशीक हैं और युवती स्त्री के कटाक्ष के समान चंचल यह विषय सम्बन्धी सुख है इसलिए आचार्य कहते हैं कि इनके नाश होने पर विद्वानों को न तो शोक करना चाहिए तथा मिलने पर हर्ष भी नहीं मानना चाहिए।


दुःखे वा समुपस्थितेऽथ मरणे शोको न कार्यो
बुधैः सम्बन्धो यदि विग्रहेण यदयं सम्भूतिधात्र्येतयोः।
तत्तस्मात्परिचिंतनीयमनिशं संसारदुःखप्रदो
येनास्य प्रभवः पुरः पुनरपि प्रायो न सम्भाव्यते ॥५॥

अर्थ: देह के सम्बन्ध से यद्यपि संसार में दुख तथा शोक आकर उपस्थित होते हैं तो भी विद्वानों को किसी पदार्थ के लिए दुख तथा शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि यह देह दुख तथा शोक ही पैदा करने वाली भूमि है इसलिए विद्वानों को निरन्तर उस आत्मस्वरूप का चिंतन करना चाहिए जिससे भविष्य में नाना प्रकार के संसार के दुखों को देने वाली इस शरीर की उत्पत्ति फिर से न होवे।


दुर्वारार्जितकर्मकारणवशादिष्टे प्रणष्टे नरे
यत् शोकं कुरुते यदत्र नितरामुन्मत्तलीलायितम्।
यस्मात्तत्र कृते न सिध्यति किमप्येतत्परं जायते
नश्यन्त्येव नरस्य मूढमनसो धर्मार्थकामादयः॥६॥

अर्थ: जिसका निवारण नहीं हो सकता तथा पूर्वभव में संचित, ऐसे कर्मरूपी कारण के वश से जो मनुष्य अपने प्रिय स्त्री, पुत्र आदि के नष्ट होने पर उन्मादी मनुष्य की लीला के समान इस संसार में बिना प्रयोजन का अत्यन्त शोक करता है उस मूर्ख मनुष्य को उस प्रकार के व्यर्थ शोक करने से कुछ भी नहीं मिलता तथा उस मूढ़ मनुष्य के धर्म, अर्थ, काम आदि का भी नाश हो जाता है इसलिए विद्वानों को इस प्रकार का शोक कदापि नहीं करना चाहिए।


उदेति पाताय रविर्यथा तथा शरीरमेतन्ननु सर्वदेहिनाम्।
स्वकालमासाद्य निजेऽपि संस्थिते करोति कः शोकमतः प्रबुद्धधीः॥७॥

अर्थ: जिस प्रकार सूर्य, अस्त होने के लिए उदय होता है उसी प्रकार यह शरीर भी निश्चय से नाश होने के लिए ही उत्पन्न होता है इसलिए स्वकाल के अनुसार अपने प्रिय स्त्री, पुत्र आदि के मरने पर भी हिताहित के जानने वाले मनुष्य कदापि शोक नहीं करते।


भवन्ति वृक्षेषु पतन्ति नूनं पत्राणि पुष्पाणि फलानि यद्वत्।
कुलेषु तद्वत्पुरुषाः किमत्र हर्षेण शोकेन च सन्मतीनाम्॥८॥

अर्थ: जिस प्रकार वृक्षों पर अपने-अपने काल के अनुसार नाना जाति के पत्ते, फूल, फल उत्पन्न होते हैं तथा अपने-अपने काल के अनुसार ही वे नष्ट भी होते हैं उसी प्रकार अपने-अपने कर्मों के अनुसार मनुष्य उच्च-नीच आदि कुलों में जन्म लेते हैं तथा नष्ट भी होते हैं इसलिए ऐसा भलीभाँति समझकर बुद्धिमानों को उनकी उत्पत्ति में हर्ष तथा नाश में शोक कदापि नहीं करना चाहिए।


दुर्लङ्घ्याद्भवितव्यताव्यतिकरान्नष्टे प्रिये मानुषे
यच्छोकः क्रियते तदत्र तमसि प्रारभ्यते नर्तनम्।
सर्वं नश्वरमेव वस्तु भुवने मत्वा महत्या धिया
निर्धूताखिलदुःखसन्ततिरहो धर्मः सदा सेव्यताम्॥९॥

अर्थ: जिसका दुख से भी उल्लंघन नहीं हो सकता ऐसी जो भवितव्यता (दैव) उसके व्यापार से अपने प्रिय स्त्री, पुत्र आदि के नष्ट होने पर जो मनुष्य शोक करता है वह अंधकार में नृत्य को आरंभ करता है ऐसा जान पड़ता है (अर्थात् अंधकार में किये हुए नृत्य को कोई देख नहीं सकता इसलिए जिस प्रकार अंधकार में नृत्य का आरम्भ व्यर्थ होता है उसी प्रकार स्त्री, पुत्र आदि के लिए मनुष्य का शोक करना भी व्यर्थ है) अतः आचार्य उपदेश देते हैं कि हे भव्य जीवो ! अपने ज्ञान से संसार में सब चीजों को विनाशीक समझकर समस्त दुखों की संतान को जड़ से उखाड़ने वाले धर्म का ही सदा तुम सेवन करो।


पूर्वोर्पार्जितकर्मणा विलिखितं यस्यावसानं यदा
तज्जायेत तदैव तस्य भविनो ज्ञात्वा तदेतद्ध्रुवम्।
शोकं मुञ्च मृते प्रियेऽपि सुखदं धर्मं कुरुष्वादरात्
सर्पे दूरमुपागते किमिति भोस्तद्घृष्टिराहन्यते॥१०॥

अर्थ: पूर्व भव में संचित कर्म के द्वारा जिस प्राणी का अन्त जिस काल में लिख दिया गया है उस प्राणी का अंत उसी काल में होता है ऐसा भली-भाँति निश्चय करके हे भव्य जीवो ! तुम अपने प्रिय भी स्त्री, पुत्र आदि के मरने पर शोक छोड़ दो तथा बड़े आदर से धर्म का आराधन करो क्योंकि सर्प के दूर चले जाने पर उसकी रेखा का पीटना व्यर्थ है।


ये मूर्खा भुवि तेऽपि दुःख हतये व्यापारमातन्वते
सा मा भूदथवा स्वकर्मवशतस्तस्मान्न ते तादृशाः।
मूर्खान्-मूर्ख-शिरोमणींन्ननु वयं तानेव मन्यामहे
ये कुर्वन्ति शुचं मृते सति निजे पापाय दुःखाय च ॥११॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि अपने कर्म के वश से, चाहे दुखों की निवृत्ति हो अथवा न हो तो भी जो दुख की निवृत्ति के लिए व्यापार करते हैं यद्यपि वे भी संसार में मूर्ख हैं तो भी हम उनको अतिमूर्ख नहीं मानते किन्तु जो अपने प्रिय स्त्री, पुत्र आदि के मरने पर पाप के लिए अथवा दुखों की उत्पत्ति के लिए शोक करते हैं उन्हीं को निश्चय से हम मूर्ख शिरोमणि अर्थात् वज्रमूर्ख मानते हैं इसलिए विद्वानों को स्त्री-पुत्र आदि के मरने पर कदापि शोक नहीं करना चाहिए।


किं जानासि न किं शृणोषि न न किं प्रत्यक्षमेवेक्षसे
निश्शेषं जगदिन्द्रजालसदृशं रम्भेव सारोज्झितम्।
किं शोकं कुरुषेऽत्र मानुषपशो लोकान्तरस्थे निजे
तत्किञ्चित् कुरु येन नित्यपरमानन्दास्पदं गच्छसि ॥१२॥

अर्थ: हे मूढ़ मनुष्य! यह समस्त जगत् इन्द्रजाल के समान अनित्य है तथा केला के स्तंभ के समान निस्सार है इस बात को क्या तू नहीं जानता है अथवा सुनता नहीं है वा प्रत्यक्ष देखता नहीं है जो कि स्त्री, पुत्र आदि के दूसरे लोक में रहने पर भी तू उनके लिए इस संसार में व्यर्थ शोक करता है। कोई ऐसा काम कर जिससे तुझे अविनाशी तथा उत्तम सुख को देने वाले स्थान की प्राप्ति होवे।


जातो जनो म्रियत एव दिने च मृत्योः प्राप्ते पुनस्त्रिभुवनेऽपि न रक्षकोऽस्ति।
तद्यो मृते सति निजेऽपि शुचं करोति पूत्कृत्य रोदिति वने विजने स मूढः॥१३॥

अर्थ: जो मनुष्य पैदा हुआ है वह मरण के दिन अवश्य ही मरता है तथा मरते समय तीनों लोक में उसकी कोई भी रक्षा नहीं कर सकता है इसलिए आचार्य कहते हैं कि जो मनुष्य अपने प्रिय स्त्री, पुत्र आदि के मरने पर शोक करता है वह मनुष्य जहाँ पर कोई जन नहीं ऐसे वन में जाकर फुक्का मार-मार कर रोता है ऐसा जान पड़ता है।


इष्टक्षयो यदिह ते यदनिष्ठयोगः पापेन तद्भवति जीव पुराकृतेन।
शोकं करोषि किमु तस्य कुरु प्रणाशं पापस्य तौ न भवतः पुरतोऽपि येन॥१४॥

अर्थ: आचार्य उपदेश देते हैं कि हे जीव ! यह जो तेरे इष्ट स्त्री, पुत्र आदि का नाश तथा अनिष्ट सर्प आदि का सम्बन्ध होता है वह पूर्वकाल में सञ्चय किये हुए तेरे पाप के उदय से ही होता है इसलिए तू शोक क्यों करता है उस पाप का सर्वथा नाशकर, जिससे फिर तेरे भविष्य में इष्ट वियोग तथा अनिष्ट संयोग का उदय न होवे।


नष्टे वस्तुनि शोभनेऽपि हि तदा शोकःसमारभ्यते
तल्लाभोऽथ यशोऽथ सौख्यमथ वा धर्मोऽथ वा स्याद्यदि
यद्येकोऽपि न जायते कथमपि स्फारैः प्रयत्नैरपि
प्रायस्तत्र सुधीर्मुधा भवति कः शोकोऽग्ररक्षोवशः ॥१५॥

अर्थ: प्रिय भी वस्तु के नाश होने पर शोक तब करना चाहिए जब कि उसकी प्राप्ति हो जावे अथवा शोक करने से कीर्ति फैले अथवा सुख वा धर्म हो किन्तु अनेक बड़े से बड़े प्रयत्नों के करने पर भी उपर्युक्त वस्तुओं में से किसी भी वस्तु की प्राप्ति नहीं दिख पड़ती इसीलिए विद्वान् पुरुष इष्ट वस्तु के नाश होने पर भी प्रायः कुछ भी व्यर्थ शोक नहीं करते ।


एकद्रुमे निशि वसन्ति यथा शकुन्ताः प्रातः प्रयान्ति सहसा सकलासु दिक्षु।
स्थित्वा कुले बत तथान्यकुलानि मृत्वा लोकाः श्रयन्ति विदुषा खलु शोच्यते कः॥१६॥

अर्थ: रात्रि के समय जिस प्रकार एक ही वृक्ष पर नाना देशों से आकर पक्षी निवास करते हैं तथा सबेरा होते ही शीघ्र वे जुदी-जुदी दिशाओं में जुदे-जुदे होकर उड़ जाते हैं उसी प्रकार बहुत से मनुष्य एक कुल में जन्म लेकर पुनः अपने कर्म के अनुसार मरकर नाना कुलों में जन्म लेते हैं ऐसी संसार की स्थिति को जानकर विद्वान् लोग कदापि शोक नहीं करते ।


दुःखव्यालसमाकुलं भववनं जाड्यान्धकाराश्रितं
तस्मिन्दुर्गतिपल्लिपातिकुपथैः भ्राम्यन्ति सर्वाङ्गिनः।
तन्मध्ये गुरुवाक्यदीपममलं ज्ञानप्रभाभासुरं
प्राप्यालोक्य च सत्पथं सुखपदं याति प्रबुद्धो ध्रुवम्॥१७॥

अर्थ: नाना प्रकार के दुःखरूपी सर्प और हस्तियों से व्याप्त तथा अज्ञानरूपी अन्धकार से युक्त और नरक आदि गतिरूपी भीलों के भयंकर मार्गों से सहित, इस संसाररूपी वन में समस्त प्राणी भटकते फिरते हैं किन्तु उन प्राणियों में चतुर मनुष्य निर्मल ज्ञानरूपी प्रभा से देदीप्यमान ऐसे गुरुओं के वचनरूपी दीपक को पाकर तथा उस वचनरूपी दीपक के द्वारा उत्तममार्ग को देखकर मोक्षपद को प्राप्त कर लेता है।


यैव स्वकर्मकृतकालकलात्र जन्तुस्तत्रैव याति मरणं न पुरो न पश्चात्।
मूढास्तथापि हि मृते स्वजने विधाय शोकं परं प्रचुरदुःखभुजो भवन्ति॥१८॥

अर्थ: पूर्वोपाजित अपने कर्मों के द्वारा जो मरण का समय निश्चित हो गया है उसी के अनुसार प्राणी मरता है आगे पीछे नहीं मरता ऐसा जानकर भी आत्मीय मनुष्य के मरने पर अज्ञानीजन शोक करते हैं तथा नाना प्रकार के दुखों को भोगते हैं।


वृक्षाद् वृक्षमिवाण्डजा मधुलिहः पुष्पाच्च पुष्पं यथा
जीवा यान्ति भवाद्भवान्तरमिहाश्रान्तं तथा संसृतौ।
तज्जातेऽथ मृतेऽथ वा न हि मुदं शोकं न कस्मिन्नपि
प्रायः प्रारभतेऽधिगम्य मतिमानस्थैर्यमित्यङ्गिनाम् ॥१९॥

अर्थ: जिस प्रकार पक्षी एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर चले जाते हैं तथा जिस प्रकार भौंरा एक फूल से दूसरे फूल पर उड़कर चले जाते हैं उसी प्रकार इस संसार में अपने-अपने कर्म के वश से जीव निरंतर एक गति से दूसरी गति में जाते हैं इस प्रकार प्राणियों की अनित्यता को समझकर विद्वान् न तो प्रायः प्राणियों की उत्पत्ति में हर्ष ही मानता है और न उनके मरने पर शोक ही करता है।


भ्राम्यन् कालमनन्तमत्र जनने प्राप्नोति जीवो न वा
मानुष्यं यदि दुष्कुले तदघतः प्राप्तं पुनर्नश्यति।
सज्जातावथ तत्र याति विलयं गर्भेऽपि जन्मन्यपि
द्राग्बाल्येऽपि ततोऽपि नो वृष इति प्राप्ते प्रयत्नो वरः ॥२०॥

अर्थ: अनन्तकाल पर्यन्त इस संसार में भ्रमण करते हुए इस जीव को मनुष्यपने की प्राप्ति होवे ही ऐसा कोई निश्चय नहीं (नहीं भी होती है) दैवयोग से यदि हो भी जावे तो खोटे कुल में जन्म लेने पर भी वह पाया हुआ मनुष्यपना, उस खोटे कुल में किये हुए पापों से नष्ट हो जाता है यदि श्रेष्ठ जाति में भी जन्म हो जावे तो प्रथम तो गर्भ में ही मर जाता है इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि धर्म के लिए ही प्रयत्न करना उत्तम है क्योंकि धर्म में ही यह शक्ति है कि वह प्राणियों को जन्म-जरा आदि से छुड़ाता है तथा जहाँ पर किसी प्रकार का दुख नहीं ऐसे मोक्ष पद में ले जाकर जीवों को धरता है।


स्थिरं सदपि सर्वदा भृशमुदेत्यवस्थान्तरैः
प्रतिक्षणमिदं जगज्जलदकूटवन्नश्यति।
तदत्र भवमाश्रिते मृतिमुपागते वा जने
प्रियेऽपि किमहो मुदा किमु शुचा प्रबुद्धात्मनः ॥२१॥

अर्थ: यद्यपि द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा यह लोक सदा विद्यमान है तो भी पर्यायार्थिकनय की अपेक्षा मेघों के समूह के समान यह क्षण-क्षण में विनाशीक है इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि हे बुद्धिमान् पुरुषो ! इस संसार में अपने प्रिय मनुष्य के उत्पन्न होने पर क्या तो हर्ष करने में रखा है? तथा प्रिय मनुष्य के मर जाने पर क्या शोक करने में रखा है? अर्थात् तुम्हारा हर्ष तथा शोक करना बिना प्रयोजन का है।


लङ्घ्यन्ते जलराशयः शिखरिणो देशास्तटिन्यो जनैः
सा वेला तु मृतेर्न पक्ष्मचलनस्तोकापि देवैरपि।
तत्कस्मिन्नपि संस्थिते सुखकरं श्रेयो विहाय ध्रुवं
कः सर्वत्र दुरन्तदुःखजनकं शोकं विदध्यात् सुधीः ॥२२॥

अर्थ: मनुष्य बड़े-बड़े समुद्रों को पार कर जाते हैं तथा बड़े-बड़े पर्वतों का तथा देशों का उल्लंघन कर जाते हैं और विस्तृत नदियों को भी तिर जाते हैं परन्तु मरण के समय को मनुष्यों की क्या बात देव भी निमेषमात्र के लिए भी नहीं टाल सकते हैं इसलिए आचार्य कहते हैं कि ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष होगा? जो किसी अपने प्रिय मनुष्य के मर जाने पर समस्त प्रकार के कल्याण को देने वाले उत्तमधर्म को न करके नाना प्रकार के नरकादि दुखों को देने वाले शोक को करेगा।


आक्रन्दं कुरुते यदत्र जनता नष्टे निजे मानुषे
जाते यच्च मुदं तदुन्नतधियो जल्पन्ति वातूलताम्।
यज्जाड्यात्कृतदुष्टचेष्टितभवत्कर्मप्रबन्धोदयात्
मृत्युत्पत्तिपरम्परामयमिदं सर्वं जगत्सर्वदा ॥२३॥

अर्थ: जो मनुष्य अपने प्रिय मनुष्य के मरने पर तो चीख मार-मार कर रोते हैं तथा उत्पन्न होने पर हर्ष मानते हैं उनकी उस प्रकार की चेष्टा को बुद्धिमान् पुरुष बावलापन कहते हैं क्योंकि यह समस्त जगत् तो अज्ञान से की हुई जो खोटी-खोटी क्रिया उनसे उत्पन्न हुआ जो कर्मों का बंधन उसके उदय से सदा मरण तथा जन्मों की परम्परा स्वरूप ही है।


गुर्वी भ्रान्तिरियं जडत्वमथ वा लोकस्य यस्माद्वसन्
संसारे बहुदुःखजालजटिले शोकीभवत्यापदि।
भूतप्रेतपिशाचफेरवचितापूर्णे श्मशाने गृहं
कः कृत्वा भयदादमङ्गलकृते भावाद् भवेच्छङ्कितः॥२४॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि यह लोक का एक बड़ा भारी भ्रम है अथवा उसकी मूर्खता कहनी चाहिए कि अनेक दुखों से व्याप्त इस संसार में रहता हुआ भी आपत्ति के आने पर शोक करता है क्योंकि जो श्मशान, भूतप्रेत, पिशाच तथा भयंकर शब्द और चिता आदि से व्याप्त है ऐसे श्मशान में घर बनाकर तथा रहकर ऐसा कौन पुरुष होगा जो मंगलस्वरूप तथा नाना प्रकार के भय को करने वाले पदार्थों से भय करेगा।


भ्रमति नभसि चन्द्रः संसृतौ शश्वदङ्गी लभत उदयमस्तं पूर्णतां हीनताञ्च।
कलुषितहृदयः सन् याति राशिं च राशेस्तनुमिह तनुतस्तत्कोऽत्र मोदश्च शोकः॥२५॥

अर्थ: जिस प्रकार चन्द्रमा सदा आकाश में भ्रमण करता रहता है उसी प्रकार यह प्राणी भी निरंतर संसार में एक गति से दूसरी गति में भ्रमण करता रहता है तथा जिस प्रकार चन्द्रमा उदित होता है तथा अस्त होता है उसी प्रकार यह प्राणी भी जन्मता तथा मरता है तथा जिस प्रकार चन्द्रमा बढ़ता और घटता है उसी प्रकार यह प्राणी भी बालपने को तथा युवापने को और वृद्धपने को प्राप्त होता है तथा जिस प्रकार चन्द्रमा कलंकित होकर मीन आदि राशि से कर्क आदि राशि को प्राप्त होता है, ऐसी वास्तविक ‘स्थिति को’ भलीभाँति जानकर जन्म-मरण में कदापि हर्ष तथा शोक नहीं मानना चाहिए।


तडिदिव चलमेतत्पुत्रदारादिसर्वं किमिति तदभिघाते खिद्यते बुद्धिमद्भिः।
स्थितिजननविनाशं नोष्णतेवाऽनलस्य व्यभिचरति कदाचित्सर्वभावेषु नूनम्॥२६॥

अर्थ: संसार में पुत्र, स्त्री आदिक समस्त पदार्थ बिजली के समान चंचल तथा विनाशीक हैं इसलिए स्त्री-पुत्र आदि के नाश होने पर बुद्धिमानों को कदापि शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि जिसप्रकार अग्नि में उष्णपना सर्वदा रहता है उसी प्रकार समस्त पदार्थों में उत्पाद, विनाश तथा ध्रौव्य ये तीनों धर्म सदा रहते हैं।


प्रियजनमृतिशोकः सेव्यमानोऽतिमात्रं जनयति तदसातं कर्म यच्चाग्रतोऽपि।
प्रसरति शतशाखं देहिनि क्षेत्र उप्तं वट इव तनुबीजं त्यज्यतां स प्रयत्नात्॥२७॥

अर्थ: क्षेत्र में बोया हुआ छोटा भी वटवृक्ष का बीज जिस प्रकार शाखा प्रशाखा स्वरूप में परिणत होकर फैल जाता है उसी प्रकार अपने प्रिय स्त्री, पुत्र आदि के मरने पर जो अत्यन्त शोक किया जाता है वह शोक उस असाताकर्म को पैदा करता है जो असाताकर्म उत्तरोत्तर शाखा-प्रशाखा रूप में परिणत होकर फैलता चला जाता है अर्थात् उस असाता कर्म के उदय से नरक, तिर्यञ्च आदि अनेक योनियों में भ्रमण करने से नानाप्रकार के दुख सहने पड़ते हैं इसलिए आचार्य कहते हैं कि विद्वानों को ऐसा शोक जैसे छूटे वैसे छोड़ देना चाहिए।


आयुः क्षतिः प्रतिक्षणमेतन्मुखमन्तकस्य तत्र गता।
सर्वे जनाः किमेकः शोचयत्यन्यं मृतं मूढः॥२८॥

अर्थ: प्रतिसमय आयु का नाश होता है तथा यह आयु का नाश ही यमराज का मुख है और उसमें अनेक जीव प्रविष्ट हो चुके हैं फिर भी यह अकेला अज्ञानी जीव अपने प्रिय के मरने पर मालूम नहीं क्यों शोक करता है ?


यो नात्र गोचरं मृत्योर्गतो याति न यास्यति।
स हि शोकं मृते कुर्वन् शोभते नेतरः पुमान्॥२९॥

अर्थ: जो प्राणी न तो मरा है तथा न मर रहा है और न मरेगा यदि वह अपने प्रिय के मरने पर शोक करे तो उसका शोक तो शोभा को प्राप्त हो सकता है किन्तु जो अनन्तों बार तो मर चुका तथा मर रहा है और अनन्तों ही बार मरेगा यदि वह शोक करे तो उसका शोक करना सर्वथा व्यर्थ है इसलिए विद्वानों को अपने प्रिय स्त्री-पुत्र आदि के मरने पर कदापि शोक नहीं करना चाहिए।


प्रथममुदयमुच्चैर्दूरमारोहलक्ष्मीमनुभवति च पातं सोऽपि देवो दिनेशः।
यदि किल दिनमध्ये तत्र केषां नराणां वसति हृदि विषादः सत्स्ववस्थान्तरेषु॥३०॥

अर्थ: सूर्यदेव भी एक ही दिन में प्रथम तो प्रातःकाल में उदित होकर ऊँचा चढ़ता हुआ अत्यन्त शोभा को धारण करता है तथा पश्चात् सायंकाल में अस्त हो जाता है उसी प्रकार समस्त पदार्थों की एक अवस्था से दूसरी अवस्था होती है उन अवस्थाओं को देखकर ऐसे कौन बुद्धिमान् मनुष्य होंगे जो अपने मन में विषाद करेंगे ? अर्थात् ऐसी स्वाभाविक स्थिति पर बुद्धिमान् कदापि खेद नहीं कर सकते।


आकाश एव शशिसूर्यमरुत्खगाद्याः भूपृष्ठ एव शकटप्रमुखाश्चरन्ति।
मीनादयश्च जल एव यमस्तु याति सर्वत्र कुत्र भविनां भवति प्रयत्नः॥३१॥

अर्थ: चन्द्र, सूर्य, पवन, पक्षी, आदिक तो आकाश में ही चलते हैं तथा गाड़ी, सिंह, व्याघ्र आदिक जमीन पर ही चलते हैं और मछली, मगर आदिक जल में ही चलते हैं परन्तु यह काल (यम) सब जगह पर चलता है अर्थात् यह काल प्राणियों को पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि आदि किसी स्थान पर नहीं छोड़ता फिर इससे बचने का प्रयत्न किया जावे तो कहाँ किया जावे ?


किं देव किमु देवता किमगदो विद्यास्ति किं किं मणिः
किं मन्त्रं किमुताश्रयःकिमु सुहृत्किं वा सुगन्धोऽस्ति सः।
अन्ये वा किमु भूपतिप्रभृतयः सन्त्यत्र लोकत्रये
यैः सर्वैरपि देहिनः स्वसमये कर्मोदितं वार्यते ॥३२॥

अर्थ: तीनों लोक में भी देव, देवी, वैद्य, विद्या, मणि, मंत्र, भृत्य, मित्र, सुगन्ध तथा राजा आदिक एक-एक की तो क्या बात सब मिलकर भी अपने समय में उदय आये हुए प्राणियों के कर्म को नहीं रोक सकते।


गीर्वाणा अणिमादिस्वस्थमनसः शक्ताः किमत्रोच्यते
ध्वस्तास्तेऽपि परम्परेण स परस्तेभ्यः कियान् राक्षसः।
रामाख्येन च मानुषेण निहतः प्रोल्लङ्घ्य सोप्यम्बुधिं
रामोऽप्यन्तकगोचरः समभवत् कोऽन्यो बलीयान् विधेः॥३३॥

अर्थ: विशेष कहाँ तक कहा जाये क्योंकि जो देव अणिमा-महिमा आदि ऋद्धि के धारी थे तथा सब प्रकार से समर्थ थे उनको भी उस रावण नामक राक्षस ने विध्वंस कर दिया जो रावण उन देवों के सामने कुछ भी चीज न था तथा उस रावण को भी, समुद्र को पार कर राम नामक मनुष्य ने मार दिया तथा वह राम भी कालबली का ग्रास बन गया, इसलिए आचार्य कहते हैं कि समय से बलवान संसार में कोई भी नहीं है।


सर्वत्रोद्गतशोकदावदहनव्याप्तं जगत्काननं
मुग्धास्तत्र वधूमृगीगतधियस्तिष्ठन्ति लोकैणकाः।
कालव्याध इमान् निहन्ति पुरतः प्राप्तान् सदा निर्दयः
तस्माज्जीवति नो शिशुर्न च युवा वृद्धोऽपि नो कश्चन ॥३४॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि यह संसाररूपी वन तो सब जगह उठा हुआ जो शोकरूपी दावानल उससे व्याप्त हो रहा है तथा इस संसाररूपी वन में लोकरूपी जो मृग हैं वे स्त्रीरूपी मृगी के वश होकर पड़े हुए हैं और यह कालरूपी व्याध आगे आये हुए उन लोकरूपी दीन मृगों को सदा काल मारता है जिससे न तो इस संसार में कोई बालक सदा जीता है तथा न कोई युवा सदा जीता है और न कोई वृद्ध ही सदा जीता है।


संपच्चारुलताः प्रियापरिलसद्वल्लीभिरालिङ्गितः
पुत्रादिप्रियपल्लवो रतिसुखप्रायैः फलैराश्रितः।
जातः संसृतिकानने जनतरुः कालोग्रदावानल-
व्याप्तश्चेन्न भवेत्तदा बत बुधैरन्यक्तिमालोक्यते ॥३५॥

अर्थ: संपदारूपी मनोहर लताओं से युक्त तथा स्त्रीरूपी जो मनोहर बेल उससे आलिंगन किया हुआ और पुत्र आदिक उत्तम पल्लवों का धारी तथा रति से उत्पन्न हुए जो सुख वे ही हुए फल उनसे सहित, ऐसा यह संसाररूपी वन में पैदा हुआ मनुष्यरूपी वृक्ष है। यह मनुष्यरूपी वृक्ष कालरूपी जो भयंकर दावाग्नि उससे भस्म न हो जावे इसके लिए बुद्धिमानों को अवश्य उसके सार्थक होने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।


वाञ्छन्त्येव सुखं तदत्र विधिना दत्तं परं प्राप्यते
नूनं मृत्युमुपाश्रयन्ति मनुजास्तत्राप्यतो बिभ्यति।
इत्थं कामभयप्रसक्तहृदयाः मोहान्मुधैव ध्रुवं
दुःखोर्मिप्रचुरे पतन्ति कुधियः संसारघोरार्णवे॥३६॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि संसार में समस्त प्राणी इन्द्रियों से पैदा हुए सुख की अभिलाषा सदा करते रहते हैं किन्तु वह सुख कर्मानुसार मिलता है इच्छानुसार नहीं मिलता तथा सर्व जीव निश्चय से मरते हैं तो भी उस मृत्यु से डरते रहते हैं इस प्रकार मोह से कामातुर तथा भयातुर होकर ये “मूढ़बुद्धि प्राणी” व्यर्थ ही नाना प्रकार के दुखरूपी तरंगों से व्याप्त इस संसाररूपी समुद्र में डूबते हैं।


स्वसुखपयसि दीव्यन्मृत्यु कैवर्तहस्तप्रसृतघनजरोरूप्रोल्लसज्जालमध्ये।
निकटमपि न पश्यत्यापदां चक्रमग्रं भवसरसि वराको लोकमीनौघ एषः॥३७॥

अर्थ: और भी आचार्य उपदेश देते हैं कि जिस प्रकार मल्लाह द्वारा बिछाये हुए जाल में मछलियों का समूह खेलता रहता है किन्तु समीप में रही हुई मरणरूपी भयंकर आपत्ति के ऊपर कुछ भी ध्यान नहीं देता उसी प्रकार यह दीन लोकरूपी मछलियों का समूह, अपने सुखरूपी जल में कालरूपी मल्लाह के हाथ से फैलाये हुए जरारूपी विस्तीर्ण जाल में क्रीड़ा करता रहता है किन्तु (व्यर्थ में हमारा जीवन चला जायेगा) इस प्रकार पास में रही हुई भी आपत्ति के ऊपर कुछ भी ध्यान नहीं देता।


शृण्वन्नन्तकगोचरं गतवतः पश्यन् बहून् गच्छतो
मोहादेव जनस्तथापि मनुते स्थैर्यं परं ह्यात्मनः।
सम्प्राप्तेऽपि च वार्धके स्पृहयति प्रायो न धर्माय यत्
तद्बध्नात्यधिकाधिकं स्वमसकृत् पुत्रादिभिर्बन्धनैः ॥३८॥

अर्थ: यह लोक, बहुत से जीव मर गये इस बात को सुनता हुआ भी तथा बहुतों को मरते हुए स्वयं देखता हुआ भी मोह से आत्मा को निश्चल ही मानता है तथा वृद्धावस्था के आने पर भी धर्म की ओर कुछ भी लक्ष्य नहीं देता किन्तु उस अवस्था में भी पुत्र, स्त्री आदि के ‘बंधन से’ निरन्तर अपने को और भी ज्यादा बाँधता है।


दुश्चेष्टाकृतकर्मशिल्पिरचितं दुःसन्धि दुर्बन्धनं
सापायस्थितिदोषधातुमलवत्सर्वत्र यन्नश्वरम्।
आधिव्याधिजरामृतिप्रभृतयो यच्चात्र चित्रं न तत्
तच्चित्रं स्थिरता बुधैरपि वपुष्यत्रापि यन्मृग्यते॥३९॥

अर्थ: जो देह, बुरी-बुरी क्रिया से किया गया जो कर्म वही हुआ एक प्रकार का कारीगर, उससे बना हुआ है तथा खोटी सन्धि और खोटे बंधन से सहित है और जिसकी स्थिति नाश से सहित है तथा जो नाना प्रकार के दोष तथा मलमूत्र, वीर्य आदि सात कुधातुओं से संयुक्त है ऐसे देह में आधि, व्याधि, जरा, मरण आदिक होते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, किन्तु आश्चर्य इस बात का है कि विद्वान् मनुष्य भी ऐसे शरीर को सर्वथा स्थिर मानते हैं।


लब्धा श्रीरिह वाञ्छिता वसुमती भुक्ता समुद्रावधिः
प्राप्तास्ते विषया मनोहरतराः स्वर्गेऽपि ये दुर्लभाः।
पश्चाच्चेन्मृतिरागमिष्यति ततस्तत्सर्वमेतद्विषा-
श्लिष्टं भोज्यमिवातिरम्यमपि धिग्मुक्तिः परं मृग्यताम् ॥४०॥

अर्थ: इस संसार में वांछित लक्ष्मी भी प्राप्त कर ली तथा सागरान्त पृथ्वी का राज्य भी भोग लिया है और जो विषय स्वर्ग में भी नहीं प्राप्त हो सकते ऐसे अत्यन्त मनोहर विषयों को भी पा लिया किन्तु जिस समय मृत्यु पास में आ जावेगी उस समय अत्यन्त मनोहर ये सब बातें विष युक्त भोजन के समान दुख देने वाली हो जायेगी इसलिए इनको धिक्कार हो ऐसा विचार कर हे भव्य जीवो! जहाँ पर किसी प्रकार के दुख नहीं ऐसी मुक्ति का ही आश्रय करो।


युद्धे तावदलं रथेभतुरगा वीराश्च दृप्ता भृशं
मन्त्रःशौर्यमसिश्च तावदतुलः कार्यस्य संसाधकः।
राज्ञोऽपि क्षुधितोऽपि निर्दयमना यावज्जघत्सुर्यमः
क्रुद्धो धावति नैव सन्मुखमितो यत्नो विधेयो बुधैः ॥४१॥

अर्थ: जब तक भूखा, निर्दयी, समस्त जीवों का विध्वंस करने वाला तथा क्रोधी यमराज सामने नहीं आता तभी तक लड़ाई में राजा के रथ, हस्ती, घोड़ा तथा अत्यन्त गर्व करने वाले सुभट तथा मन्त्र, वीरता और अनुपम तलवार आदि काम में आते हैं किन्तु जब यमराज सामने पड़ जाता है अर्थात् मर जाते हैं उस समय उपर्युक्त कोई भी चीज काम में नहीं आती इसलिए बुद्धिमान् पुरुषों को जिस प्रकार बने उस प्रकार से इस काल के सर्वथा नाश के लिए ही यत्न करना चाहिए।


राजापि क्षणमात्रतो विधिवशाद्रङ्कय्यते निश्चितं
सर्वव्याधिविवर्जितोऽपि तरुणोऽप्याशु क्षयं गच्छति।
अन्यैः किं किल सारतामुपगते श्रीजीविते द्वे तयोः
संसारे स्थितिरीदृशीति विदुषा क्वान्यत्र कार्यो मदः ॥४२॥

अर्थ: अपने पूर्वोपार्जित कर्म के वश से राजा भी क्षण भर में निश्चय से निर्धन हो जाता है तथा समस्त रोगों से रहित भी जवान मनुष्य देखते-देखते नष्ट हो जाता है इसलिए समस्त पदार्थों में सारभूत जीवन तथा धन की जब संसार में ऐसी स्थिति है तब और पदार्थों की क्या बात ? अर्थात् वे तो अवश्य ही विनाशीक हैं अतः विद्वानों को किसी पदार्थ में अहंकार नहीं करना चाहिए।


हन्ति व्योम स मुष्टिनाथ सरितं शुष्कां तरत्याकुलः
तृष्णार्तोऽथ मरीचिकाः पिबति च प्रायः प्रमत्तो भवन्।
प्रोत्तुङ्गाचलचूलिकागतमरुत्प्रेङ्खत्प्रदीपोपमैः
यः सम्पत्सुतकामिनीप्रभृतिभिः कुर्यान्मदं मानवः ॥४३॥

अर्थ: जो मनुष्य अत्यन्त ऊँची पहाड़ की चोटी उस पर चलती हुई पवन उससे झकोरे खाते हुए दीपक के समान चंचल ऐसी संपदा तथा पुत्र, स्त्री आदिक में अभिमान करता है वह मनुष्य उन्मादी होकर आकाश को मुट्ठी से मारता है तथा अत्यन्त आकुल होकर सूखी नदी को तिरता है और प्यास से अत्यन्त आकुल होकर मरीचिका को पीता है ऐसा मालूम होता है।


लक्ष्मीं व्याधमृगीमतीव चपलामाश्रित्य भूपा मृगाः
पुत्रादीनपरान्मृगानतिरुषा निघ्नन्ति सेर्ष्यं किल।
सज्जीभूतघनापदुन्नतधनुः संलग्नसंहृच्छरं
नो पश्यन्ति समीपमागतमपि क्रुद्धं यमं लुब्धकम्॥४४॥

अर्थ: आचार्य उपदेश देते हैं कि राजारूपी जो मृग हैं वे अत्यन्त चंचल तथा शिकारी की हिरणी के समान इस संपदा को पाकर पुत्र, भाई आदिक जो दूसरे मृग हैं उनको अत्यन्त क्रोध तथा ईर्ष्या से मारते हैं किन्तु बड़ी भारी आपत्तिरूप धनुष का धारी तथा संहाररूपी बाण को हाथ में लिए हुए और पास में आये हुए क्रोधी यमराजरूपी हिंसक की ओर कुछ भी लक्ष्य नहीं देते यह आश्चर्य की बात है।


मृत्योर्गोचरमागते निजजने मोहेन यः शोककृत्
नो गन्धोऽपि गुणस्य तस्य बहवो दोषा पुनर्निश्चितम्।
दुःखं वर्धत एव नश्यति चतुर्वर्गो मतेर्विभ्रमः
पापं रुक् च मृतिश्च दुर्गतिरथ स्याद्दीर्घसंसारिता॥४५॥

अर्थ: जो मनुष्य अपने प्रियजन के मर जाने पर मोह के वश होकर शोक करता है उसको किसी प्रकार गुण की प्राप्ति तो होती नहीं किन्तु निश्चय से उल्टे दोष ही उत्पन्न हो जाते हैं तथा दुख बढ़ता चला जाता है और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ये चारों पुरुषार्थ नष्ट हो जाते हैं तथा बावला हो जाता है और उसके पाप तथा रोगों की उत्पत्ति भी हो जाती है और अंत में मर भी जाता है पीछे दुर्गतिरूपी रथ में बैठकर चिरकाल तक संसार में भ्रमण करता रहता है इसलिए विद्वानों को कदापि शोक नहीं करना चाहिए।


आपन्मयसंसारे क्रियते विदुषा किमापदि विषादः।
कस्त्रस्यति लङ्घनतः प्रविधाय चतुष्पथे सदनम्॥४६॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि यह संसार तो आपत्ति स्वरूप है फिर भी नहीं मालूम बुद्धिमान् पुरुष आपत्ति के आने पर क्यों खेद करते हैं क्योंकि जो चौराहे पर मकान बनाता है वह क्या उसके उल्लंघन होने पर दुःखित होता है ? कदापि नहीं।


वातूल एष किमु किं ग्रहसंगृहीतो भ्रान्तोऽथ वा किमु जनः किमथ प्रमत्तः।
जानाति पश्यति शृणोति च जीवितादि विद्युच्चलं तदपि नो कुरुते स्वकार्यम्॥४७॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि क्या इस मनुष्य को वाय आ गई है अथवा किसी भूत-पिशाच ने पकड़ लिया है या वह बावला हो गया है अथवा उन्मादी हो गया है जो कि समस्त जीवन, धन, स्त्री, पुत्र आदि को बिजली के समान चंचल तथा विनाशीक जानता है, देखता है, सुनता है, तो भी अपने हित के करने वाले कार्य को अंशमात्र भी नहीं करता।


दत्तं नौषधमस्य नैव कथितः कस्याप्ययं मन्त्रिणो
नोकुर्याच्छुचमेवमुन्नतमतिर्लोकान्तरस्थे निजे।
यत्ना यान्ति यतोऽङ्गिनः शिथिलतां सर्वे मृतेः सन्निधौ
बन्धाश्चर्मविनिर्मिता परिलसद्वर्षाम्बुसिक्ता इव ॥४८॥

अर्थ: अपने प्रिय मनुष्य के मर जाने पर बुद्धिमानों को ऐसा शोक कदापि नहीं करना चाहिए कि मैंने इसको दवा नहीं दी अथवा किसी वैद्य अथवा मंत्रवादी को बुलाकर नहीं दिखाया क्योंकि जिस प्रकार चाम के बंध वर्षाकाल में पानी पड़ने से ढीले हो जाते हैं उसी प्रकार मनुष्य की मृत्यु के समीप में रहने पर किये हुए प्रयत्न भी नहीं किए हुए से लगते हैं।


स्वकर्मव्याघ्रेण स्फुरितनिजकालादिमहसा
समाघ्रातः साक्षाच्छरणरहिते संसृतिवने।
प्रिया मे पुत्रा मे द्रविणमपि मे मे गृहमिदं
वदन्नेवं मे मे पशुरिव जनो याति मरणम्॥४९॥

अर्थ: जिसमें कोई शरण नहीं है ऐसे वन में बलवान् व्याघ्र से पकड़ा हुआ दीन पशु जिस प्रकार मे, मे, करके मर जाता है उसी प्रकार शरण रहित इस संसाररूपी वन में अपने काल आदि बल संयुक्त कर्मरूपी व्याघ्र से पकड़ा हुआ यह जन स्त्री मेरी है, पुत्र मेरे हैं, धन मेरा है, यह घर मेरा है, इस प्रकार मे, मे करता-करता व्यर्थ मर जाता है इसलिए विद्वानों को कदापि किसी पदार्थ में ममत्वबुद्धि नहीं रखनी चाहिए।


दिवानि खण्डानि गुरूणि मृत्युना विहन्यमानस्य निजायुषो भृशम्।
पतन्ति पश्यन्नपि नित्यमग्रतः स्थिरत्वमात्मन्यभिमन्यते जडः ॥५०॥

अर्थ: मृत्यु से नष्ट किये हुए अपने आयु के बड़े-बड़े टुकड़े स्वरूप ये दिन सदा आगे आकर पड़ते हैं अर्थात् आयु के दिन प्रतिदिन क्षीण होते चले जाते हैं इस बात को देखता हुआ भी यह अज्ञानी जीव अपने को निश्चल अविनाशी मानता है यह बड़ा आश्चर्य है।


कालेन प्रलयं व्रजन्ति नियतं तेऽपीन्द्रचन्द्रादयः
का वार्तान्यजनस्य कीटसदृशोऽशक्तेरदीर्घायुषः।
तस्मान्मृत्युमुपागते प्रियतमे मोहं मुधा मा कृथाः
कालः क्रीडति नात्र येन सहसा तत्किञ्चिदन्विष्यताम् ॥५१॥

अर्थ: जब बड़ी-बड़ी ऋद्धि के धारी इन्द्र, चन्द्र, सूर्य आदिक भी अपने काल के आने पर मर जाते हैं तब कीट के समान निर्बल तथा थोड़ी आयु वाले अन्यजन की क्या बात ? अर्थात् वह तो अवश्य ही मरेगा इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि अपने प्रिय स्त्री, पुत्र आदि के मरने पर शोक न करके कोई ऐसा काम करो जिससे तुमको फिर न मरना पड़े।


संयोगो यदि विप्रयोगविधिना चेज्जन्म तन्मृत्युना
सम्पच्चेद्विपदा सुखं यदि तदा दुःखेन भाव्यं ध्रुवम्।
संसारेऽत्र मुहुर्मुहुर्विविधावस्थान्तरप्रोल्लसद्
वेषान्यत्वनटीकृताङ्गिनि सतः शोको न हर्षः क्वचित् ॥५२॥

अर्थ: जिस संसार में यह जीव बार-बार नाना प्रकार की जो दूसरी-दूसरी अवस्था उनमें नारकी, पशु, देव आदिक नाना वेषों को धारण कर नट के समान स्थित है उस संसार में यदि संयोग, वियोग के साथ लगा हुआ है तथा जन्म-मरण के साथ और संपत्ति, विपत्ति के साथ लगी हुई है और सुख, दुख के साथ लगा हुआ है तब विद्वानों को न तो किसी पदार्थ में शोक करना चाहिए, न हर्ष ही करना चाहिए।


लोकाश्चेतसि चिन्तयन्त्यनुदिनं कल्याणमेवात्मनः
कुर्यात्सा भवितव्यता गतवती तत्तत्र यद्रोचते।
मोहोल्लासवशादतिप्रसरतो हित्वा विकल्पान्बहून्
रागद्वेषविषोज्झितैरिति सदा सद्भिःसुखं स्थीयताम् ॥५३॥

अर्थ: मनुष्य सदा इस प्रकार का विचार करते रहते हैं कि सदा हमको कल्याण की प्राप्ति होवे किन्तु दैवयोग से जैसा होना होता है, होता वैसा ही है, अपना विचारा हुआ कुछ भी नहीं होता इसलिए सज्जनों को चाहिए कि वे मोह के वश से फैले हुए जो “सुख आदि की वाञ्छारूप’’ नाना प्रकार के खोटे विकल्प उनको नाश करके राग, द्वेषरूपी विष से रहित होकर अपने साम्य भावरूपी सुख में स्थित रहें तभी उनको कल्याण की प्राप्ति हो सकती है दूसरे प्रकार से उनको कल्याण की प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती।


लोका गृहप्रियतमासुतजीवितादि वाताहतध्वजपटाग्रचलं समस्तम्।
व्यामोहमत्र परिहृत्य धनादिमित्रे धर्मे मतिं कुरुत किं बहुभिर्वचोभिः ॥५४॥

अर्थ: और भी आचार्य उपदेश देते हैं कि हे भव्य जीवो ! ये घर, स्त्री, पुत्र, जीवन आदिक समस्त पदार्थ पवन से कंपाये हुए ध्वजा के अग्रभाग के समान चंचल हैं इसलिए अधिक कहाँ तक कहा जावे धन, स्त्री, मित्र आदिक में फैले हुए मोह को सर्वथा नाशकर धर्म में ही अपनी बुद्धि को लगाओ।


पुत्रादिशोकशिखिशान्तिकरी यतीन्द्रश्रीपद्मनन्दिवदनाम्बुधरप्रसूतिः।
सद्बोधसस्यजननी जयतादनित्यपञ्चाशदुन्नतधियाममृतैकवृष्टिः ॥५५॥

अर्थ: पुत्र आदि में फैली हुई शोकरूपी अग्नि को शान्त करने वाली तथा यतियों में उत्तम ऐसे जो पद्मनन्दी नामक यति उनका मुखरूपी जो मेघ उससे पैदा हुई तथा श्रेष्ठ बोधरूपी धान्य को पैदा करने वाली ऐसी यह अनित्यपञ्चाशत रूपी जल की वृष्टि सज्जनों के हृदय में सदा जयवन्त रहे।

४. एकत्वसप्तति

चिदानन्दैकसद्भावं परमात्मानमव्ययम् ।
प्रणमामि सदा शान्तं शान्तये सर्वकर्मणाम् ॥१॥

अर्थ: चैतन्यस्वरूप, आनन्दस्वरूप, अविनाशी और शान्त ऐसे परमात्मा को सर्व कर्मों की शान्ति के लिए मैं नमस्कार करता हूँ।


खादिपञ्चकनिर्मुक्तं कर्माष्टकविवर्जितम् ।
चिदात्मकं परं ज्योतिर्वन्दे देवेन्द्रपूजितम् ॥२॥

अर्थ: जो चैतन्यस्वरूप तेज पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल से सर्वथा भिन्न है तथा ज्ञानावरणादि कर्मों से रहित है और जिसका बड़े-बड़े देव तथा इन्द्र आदिक सदा पूजन करते हैं ऐसा वह चैतन्यस्वरूप ‘उत्कृष्ट तेज’ मेरी रक्षा करे अर्थात् उस चैतन्यस्वरूप तेज को मस्तक नवाकर मैं नमस्कार करता हूँ।


यदव्यक्त्तमबोधानां व्यक्तं सद्बोधचक्षुषाम् ।
सारं यत्सर्ववस्तूनां नमस्तस्मै चिदात्मने ॥३॥

अर्थ: जिस चैतन्यस्वरूप आत्मा को ज्ञानरहित अज्ञानी पुरुष अनुभव नहीं कर सकते हैं तथा अखंड ज्ञान के धारक ज्ञानी जिसका सदा अनुभव करते हैं और समस्त पदार्थों में जो सारभूत है ऐसे उस चैतन्यस्वरूप आत्मा के लिए मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।


चित्तत्वं तत्प्रतिप्राणिदेह एव व्यवस्थितम् ।
तमश्छन्ना न जानन्ति भ्रमन्ति च बहिर्बहिः ॥४॥

अर्थ: यद्यपि प्रत्येक प्राणी की देह में यह निर्मल चैतन्यरूपी तत्त्व विराजमान है तो भी जिन मनुष्यों की आत्मा अज्ञानान्धकार से ढँकी हुई है वे इसको कुछ भी नहीं जानते हैं तथा चैतन्य से भिन्न बाह्य पदार्थों में ही चैतन्य के भ्रम से भ्रान्त होते हैं।


भ्रमन्तोऽपि सदा शास्त्रजाले महति केचन।
न विदन्ति परं तत्त्वं दारुणीव हुताशनम्॥५॥

अर्थ: कई एक मनुष्य अनेक शास्त्रों का स्वाध्याय भी करते हैं तो भी तीव्र मोहनीयकर्म के उदय से भ्रान्त होकर लकड़ी में जिस प्रकार अग्नि नहीं मालूम होती उसी प्रकार चैतन्यस्वरूप आत्मा को अंशमात्र भी नहीं जानते।


केचित् केनापि कारुण्यात्कथ्यमानमपि स्फुटम्।
न मन्यन्ते न शृण्वन्ति महामोहमलीमसाः॥६॥

अर्थ: प्रबल मोहनीयकर्म से अज्ञानी हुए अनेक मनुष्य उत्तम पुरुषों से बताये हुए भी आत्मतत्त्व को न तो मानते ही हैं तथा न सुनते ही हैं।


भूरि धर्मात्मकं तत्त्वं दुःश्रुतेर्मन्दबुद्धयः।
जात्यन्धहस्तिरूपेण ज्ञात्वा नश्यन्ति केचन॥७॥

अर्थ: यद्यपि वस्तु का स्वरूप अनेकान्तरूप है तो भी अनेक जड़बुद्धि मनुष्य, जन्मांध जिस प्रकार हाथी के एक-एक भाग को हाथी समझ लेते हैं तथा नष्ट हो जाते हैं उसी प्रकार एकान्त मान कर ही नष्ट होते हैं।


केचित् किञ्चित्परिज्ञाय कुतश्चिद् गर्विताशयाः।
जगन्मन्दं प्रपश्यन्तो नाश्रयन्ति मनीषिणः॥८॥

अर्थ: कई एक मनुष्य कहीं से कुछ थोड़ी सी बात जानकर अपने को बड़ा विद्वान् मान लेते हैं तथा अपने सामने जगत् भर के विद्वानों को मूर्ख समझते हैं अतएव अहंकार से वे विद्वानों की संगति भी नहीं करना चाहते।


जन्तुमुद्धरते धर्मः पतन्तं जन्मसङ्कटे।
अन्यथा स कृतो भ्रान्त्या लोकैर्ग्राह्यः परीक्षितः॥९॥

अर्थ: संसार संकट में फँसे हुए प्राणियों का उद्धार करने वाला धर्म है किन्तु स्वार्थी दुष्टों ने उसको विपरीत ही कर दिया है अर्थात् उनका माना हुआ धर्म का स्वरूप संसार में केवल डुबोने वाला ही है इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि वे भलीभाँति परीक्षा कर धर्म को ग्रहण करे॥९॥


सर्वविद्वीतरागोक्तो धर्मः सूनृततां व्रजेत्।
प्रामाण्यतो यतः पुंसो वाचः प्रामाण्यमिष्यते॥१०॥

अर्थ: समस्त लोकालोक के पदार्थों के जानने वाले तथा वीतरागी मनुष्य का कहा हुआ ही धर्म प्रमाणिक होता है क्योंकि मनुष्य के प्रामाण्य से ही वचनों में प्रमाणता समझी जाती है इसलिए जब वीतराग तथा सर्वज्ञ प्रमाणिक पुरुष हैं तब उनका कहा हुआ धर्म भी प्रमाणिक ही है ऐसा समझना चाहिए।


बहिर्विषयसम्बन्धः सर्वः सर्वस्य सर्वदा।
अतस्तद्भिन्नचैतन्यबोधयोगौ तु दुर्लभौ॥११॥

अर्थ: समस्त बाह्य विषयों का सम्बन्ध तो सब जीवों के सदाकाल ही रहता है किन्तु बाह्य पदार्थों के सम्बन्ध से जुदा जो ज्ञानानन्द स्वरूप चैतन्य का ज्ञान तथा सम्बन्ध है वह अत्यन्त दुर्लभ है।


लब्धिपञ्चकसामग्रीविशेषात्पात्रतां गतः।
भव्यः सम्यग्दृगादीनां यः स मुक्तिपथेस्थितः॥१२॥

अर्थ: जिसको सिद्धि होने वाली है ऐसा जो भव्य, वह १. देशना, २. प्रायोग्य, ३. विशुद्धि, ४. क्षयोपशम तथा ५. करणलब्धि इस प्रकार इन पाँच लब्धि स्वरूप सामग्री के विशेष से सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र रूपी रत्नत्रय का पात्र बनता है अर्थात् रत्नत्रय को धारण करता है वही मोक्ष मात्र में स्थित है ऐसा समझना चाहिए।


सम्यग्दृग्बोधचारित्रत्रितयं मुक्ति कारणम्।
मुक्तावेव सुखं तेन तत्र यत्नो विधीयताम्॥१३॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र इन तीनों का समुदाय ही मुक्ति का कारण है और वास्तविक सुख की प्राप्ति मोक्ष में ही है इसलिए भव्य जीवों को उसी के लिए प्रयत्न करना चाहिए।


दर्शनं निश्चयः पुंसि बोधस्तद्बोध इष्यते।
स्थितिरत्रैव चारित्रमितियोगः शिवाश्रयः॥१४॥

अर्थ: आत्मा का निश्चय तो सम्यग्दर्शन है तथा आत्मा का ज्ञान सम्यग्ज्ञान है और आत्मा में निश्चल रीति से रहना सम्यक्चारित्र है तथा इन तीनों की जो एकता वही मोक्ष का कारण है।


एकमेव हि चैतन्यं शुद्धनिश्चयतोऽथवा।
कोऽवकाशो विकल्पानां तत्राखण्डैकवस्तुनि॥१५॥

अर्थ: अथवा शुद्ध निश्चयनय से एक चैतन्य ही मोक्ष का मार्ग है क्योंकि आत्मा एक अखंड पदार्थ है इसलिए उसमें सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र आदि भेदों का अवकाश नहीं है अर्थात् अखंड तथा एक आत्मा के सम्यग्दर्शन आदि टुकड़े नहीं हो सकते।


प्रमाणनयनिक्षेपा अर्वाचीने पदे स्थिताः।
केवले च पुनस्तस्मिंस्तदेकं प्रतिभासते॥१६॥

अर्थ: जब तक आत्मा शुद्ध नहीं हुआ है तभी तक इसमें प्रमाण तथा नय और निक्षेप भिन्न-भिन्न हैं ऐसे मालूम पड़ते हैं किन्तु जिस समय यह आत्मा शुद्ध हो जाता है उस समय इसमें केवल चैतन्यस्वरूप आत्मा ही प्रतिभासता है।


निश्चयैकदृशा नित्यं तदेवैकं चिदात्मकम्।
प्रपश्यामि गतभ्रान्तिर्व्यवहारदृशा परम्॥१७॥

अर्थ: शुद्धनिश्चयनय से यह आत्मा एक है, नित्य है तथा चैतन्यस्वरूप है ऐसा मैं अनुभव करने वाला अनुभव करता हूँ किन्तु व्यवहारनय से प्रमाणस्वरूप तथा नय और निक्षेपस्वरूप भी इस आत्मा को भलीभाँति देखता हूँ।


अजमेकं परं शान्तं सर्वोपाधिविवर्जितम्।
आत्मानमात्मना ज्ञात्वा तिष्ठेदात्मनि यः स्थिरः॥१८॥

स एवामृतमार्गस्थ स एवामृतमश्नुते।
स एवार्हन् जगन्नाथः स एव प्रभुरीश्वरः॥१९॥

अर्थ (श्लोक 18 से 19): जो पुरुष जन्मरहित तथा शान्ति स्वरूप और समस्त कर्मों से रहित अपने को, अपने ही से जानकर, अपने में ही निश्चल रीति से ठहरता है वही पुरुष मोक्ष को जाने वाला है तथा वही मनुष्य मोक्षसुख को प्राप्त होता है और वही अर्हन्त, जगन्नाथ और प्रभु, ईश्वर कहलाता है इसलिए भव्य जीवों को अपनी आत्मा में अवश्य निश्चल रीति से ठहरना चाहिए।


केवलज्ञानदृक्सौख्यस्वभावं तत्परं महः।
तत्र ज्ञाते न किं ज्ञातं दृष्टे दृष्टं श्रुते श्रुतम्॥२०॥

अर्थ: जो उत्कृष्ट आत्मस्वरूप तेज है वह केवलदर्शन तथा केवलज्ञान और अनंत सुखस्वरूप ही है इसलिए जिसने इस तेज को जान लिया, उसने सब कुछ जान लिया और जिसने इस तेज को देख लिया, उसने सब कुछ देख लिया तथा जिसने इस तेज को सुन लिया, उसने सब कुछ सुन लिया ऐसा समझना चाहिए।


इति ज्ञेयं तदेवैकं श्रवणीयं तदेव हि।
द्रष्टव्यञ्च तदेवैकं नान्यन्निश्चतो बुधैः॥२१॥

अर्थ: इसलिए भव्य जीवों को निश्चय से एक चैतन्यस्वरूप ही जानने योग्य है तथा वही एक सुनने योग्य है और वही देखने योग्य है किन्तु उससे भिन्न कोई भी वस्तु न तो जानने योग्य है तथा न सुनने योग्य है और न देखने ही योग्य है ऐसा समझना चाहिए।


गुरूपदेशतोऽभ्यासाद्वैराग्यादुपलभ्य यत्।
कृतकृत्यो भवेद्योगी तदेवैकं न चापरम्॥२२॥

अर्थ: गुरु के उपदेश से तथा शास्त्र के अभ्यास से और वैराग्य से जिसको पाकर योगीजन कृतकृत्य हो जाते हैं वह यही चैतन्यस्वरूप तेज है और कोई नहीं है।


तत्प्रति प्रीतिचित्तेन येन वार्तापि हि श्रुता।
निश्चितं स भवेद्भव्यो भाविनिर्वाणभाजनम्॥२३॥

अर्थ: जिस मनुष्य ने प्रसन्नचित्त से इस चैतन्यस्वरूप आत्मा की बात भी सुन ली है वह भव्य पुरुष होने वाली मुक्ति का निश्चय से पात्र होता है अर्थात् वह नियम से मोक्ष को जाता है इसलिए मोक्षाभिलाषियों को अवश्य ही इस चैतन्यस्वरूप आत्मा का अनुभव करना चाहिए।


जानीते यः परं ब्रह्म कर्मणः पृथगेकताम्।
गतं तद्गतबोधात्मा तत्स्वरूपं स गच्छति॥२४॥

अर्थ: जो मनुष्य शुद्धात्मा में लीन होकर कर्मों से भिन्न तथा एक ऐसे उस परब्रह्म परमात्मा को जानता है वह पुरुष परब्रह्म स्वरूप ही हो जाता है इसलिए भव्य जीवों को परमात्मा का अवश्य ध्यान करना चाहिए।


केनापि हि परेण स्यात्सम्बन्धो बंधकारणम्।
परैकत्वपदे शान्ते मुक्तये स्थितिरात्मनः॥२५॥

अर्थ: अन्य पदार्थों के साथ जो आत्मा का सम्बन्ध होता है उससे केवल बंध ही होता है तथा उसी आत्मा का जो उत्कृष्ट शान्त और एकतारूप स्थान में ठहरना है उससे मोक्ष ही होता है इसलिए मोक्षाभिलाषियों को पर पदार्थों से ममत्व छोड़कर स्व-स्वरूप में ही लीन होना चाहिए।


विकल्पोर्मिभरत्यक्तः शान्तः कैवल्यमाश्रितः।
कर्माभावे भवेदात्मा वाताभावे समुद्रवत्॥२६॥

अर्थ: पवन के थम जाने पर जिस प्रकार समुद्र लहरियों से रहित तथा क्षोभरहित, शांत हो जाता है उसी प्रकार जब इस आत्मा से सर्वथा कर्मों का सम्बन्ध छूट जाता है उस समय यह आत्मा भी समस्त प्रकार के विकल्पों से रहित तथा केवलज्ञान से सहित शान्त हो जाता है।


संयोगेन यदायातं मत्तस्तत्सकलं परम् ।
तत्परित्यागयोगेन मुक्तोऽहमिति मे मतिः ॥२७॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टि इस प्रकार का चिंतन करता रहता है कि जो वस्तु संयोग से उत्पन्न हुई है वे सब मुझसे जुदी है तथा मुझे इस बात का ज्ञान है कि उन संयोग से पैदा हुई समस्त वस्तुओं के त्याग से मैं मुक्त हूँ। मेरी आत्मा में किसी प्रकार के कर्म का सम्बन्ध नहीं है।


किं मे करिष्यतः क्रूरौ शुभाशुभनिशाचरौ ।
रागद्वेषपरित्यागमोहमन्त्रेण कीलितौ ॥२८॥

अर्थ: रागद्वेषरूपी प्रबल मंत्र से कीलित हुए तथा क्रूर ऐसे शुभ तथा अशुभ कर्मरूपी राक्षस मेरा क्या करेंगे ? कुछ भी नहीं कर सकते।


सम्बन्धेऽपि सति त्याज्यौ रागद्वेषौ महात्मभिः ।
विना तेनापि ये कुर्युस्ते कुर्युः किं न वातुलाः ॥२९॥

अर्थ: सज्जनों को चाहिए कि रागद्वेष के सम्बन्ध होने पर भी वे रागद्वेष का त्याग कर देवें किन्तु जो लोग सम्बन्ध के न होने पर भी रागद्वेष को करते हैं वे मनुष्य समस्त अनिष्टों को पैदा करते हैं।


मनोवाक्कायचेष्टाभिस्तद्विधं कर्म जृम्भते ।
उपास्यते तदेवैकं तेभ्यो१ भिन्नं मुमुक्षुभिः ॥३०॥

अर्थ: मन, वचन, काय की चेष्टा से, चेष्टानुसार कर्म वृद्धि को प्राप्त होता है इसलिए मोक्षाभिलाषी भव्य पुरुष, मन, वचन, काय से भिन्न एक चैतन्य मात्र आत्मा की ही उपासना करते हैं।


द्वैततो द्वैतमद्वैतादद्वैतं खलु जायते।
लोहाल्लोहमयं पात्रं हेम्नोहेममयं यथा॥३१॥

अर्थ: जिस प्रकार लोह से लोहमय ही पात्र की उत्पत्ति होती है तथा सुवर्ण से सुवर्णमय ही पात्र की उत्पत्ति होती है उसी प्रकार निश्चय से द्वैत से द्वैत ही होता है तथा अद्वैत से अद्वैत ही होता है।


निश्चयेन तदेकत्वमद्वैतममृतं परम्।
द्वितीयेन कृतं द्वैतं संसृतिर्व्यवहारतः॥३२॥

अर्थ: निश्चयनय से तो एकतारूप जो अद्वैत है वही मोक्ष है और व्यवहार नय से कर्मों का किया हुआ जो द्वैत है वह संसार है।


बंधमोक्षौ रतिद्वेषौ कर्मात्मनौ शुभाशुभौ।
इति द्वैताश्रिता बुद्धिरसिद्धिरभिधीयते॥३३॥

अर्थ: बंध और मोक्ष, राग और द्वेष, कर्म और आत्मा, शुभ और अशुभ इस प्रकार द्वैत से सहित जो बुद्धि है वह असिद्धि है अर्थात् निजानन्द शुद्ध अद्वैत स्वरूप को रोकने वाली है।


उदयोदीरणा सत्ता प्रबन्धः खलु कर्मणः।
बोधात्मधाम सर्वेभ्यस्तदेवैकं परं परम्॥३४॥

अर्थ: उदय, उदीरणा तथा सत्ता इत्यादि समस्त कर्मों की ही रचना है किन्तु आत्मा इस समस्त रचना से भिन्न है, उत्कृष्ट है तथा केवलज्ञान का धारी है।


क्रोधादिकर्मयोगेऽपि निर्विकारं परं महः।
विकारकारिभिर्मेघैर्न विकारि नभोभवेत्॥३५॥

अर्थ: काले, पीले, नीले घोड़ा के आकार, हाथी के आकार इत्यादि अनेक विकार सहित बादलों से जिस प्रकार अमूर्तिक आकाश विकृत नहीं होता उसी प्रकार यद्यपि आत्मा के साथ क्रोध आदि कर्मों का सम्बन्ध है तो भी आत्मा विकार रहित ही है।


नामापि हि परं तस्मान्निश्चयात्तदनामकम्।
जन्ममृत्य्वादि चाशेषं वपुर्धर्मं विदुर्बुधाः॥३६॥

अर्थ: निश्चयनय से आत्मा का कोई नाम नहीं है वह नाम रहित ही है और जो ये जन्म-मरण आदि धर्म हैं वे शरीर के ही धर्म हैं ऐसा बड़े-बड़े विद्वान् कहते हैं।


बोधेनापि युतिस्तस्य चैतन्यस्य तु कल्पना।
स च तच्च तयोरैक्यं निश्चयेन विभाव्यते॥३७॥

अर्थ: आत्मा ज्ञान से सहित है यह तो चैतन्यस्वरूप आत्मा में कल्पना ही है क्योंकि शुद्धनिश्चयनय से आत्मा और ज्ञान एक ही पदार्थ हैं ऐसा अनुभव गोचर है।


क्रियाकारकसम्बन्धप्रबन्धोज्झितमूर्ति यत्।
एवं ज्योतिस्तदेवैकं शरण्यं मोक्ष काङ्क्षिणाम्॥३८॥

अर्थ: जो चैतन्यरूपी तेज क्रिया और कारक के सम्बन्ध की रचना रहित है वही एक मोक्षाभिलाषी भव्यजीवों का परम शरण है।


तदेकं परमं ज्ञानं तदेकं शुचि दर्शनम्।
चारित्रं च तदेकं स्यात् तदेकं निर्मलं तपः॥३९॥

अर्थ: वह चैतन्यस्वरूप शुद्ध आत्मा ही तो ज्ञान है तथा वही दर्शन है और वही चारित्र है तथा वही तप है किन्तु उस शुद्धात्मा से भिन्न न कोई ज्ञान है तथा न कोई दर्शन है और न कोई चारित्र है तथा न कोई तप ही है इसलिए भव्य जीवों को आत्मा का ही ज्ञान, श्रद्धान, आचरण आदि करना चाहिए।


नमस्यञ्च तदेवैकं तदेवैकञ्च मंगलम्।
उत्तमं च तदेवैकं तदेव शरणं सताम्॥४०॥

अर्थ: वही एक चैतन्यस्वरूप आत्मा नमस्कार करने योग्य है तथा वही मंगलस्वरूप है और वही सर्व पदार्थों में श्रेष्ठ है तथा वही भव्यजीवों का शरण है।


आचारश्च तदेवैकं तदेवावश्यकक्रिया।
स्वाध्यायस्तु तदेवैकमप्रमत्तस्य योगिनः॥४१॥

अर्थ: प्रमाद रहित योगीश्वरों का जो चिदानन्द स्वरूप आत्मा का ध्यान है वही तो आचार है, वही आवश्यक क्रिया है, वही स्वाध्याय है किन्तु उससे भिन्न आचार आदि कोई वस्तु नहीं है।


गुणाः शीलानि सर्वाणि धर्मश्चात्यन्तनिर्मलः।
सम्भाव्यते परं ज्योतिस्तदेकमनुतिष्ठतः॥४२॥

अर्थ: जो पुरुष उस चैतन्यस्वरूप आत्मा का ध्यान करने वाला है वही पुरुष चौरासी लाख उत्तर गुणों का धारी है तथा वही अठारह हजार शील व्रतों का धारी है और उसी पुरुष के निर्मल धर्म हैं ऐसा निश्चय है।


तदेवैकं परं रत्नं सर्वशास्त्रमहोदधेः।
रमणीयेषु सर्वेषु तदेकं पुरतः स्थितम्॥४३॥

अर्थ: समस्त शास्त्ररूपी विस्तीर्ण समुद्र का उत्कृष्ट रत्न यह चैतन्यस्वरूप आत्मा ही है अर्थात् इसी रत्न की प्राप्ति के लिए शास्त्रों का अध्ययन किया जाता है तथा संसार में जितने भी मनोहर पदार्थ हैं उन सब पदार्थों में मनोहर तथा उत्कृष्ट पदार्थ यह चैतन्यस्वरूप आत्मा ही है इसलिए भव्य जीवों को इस चैतन्यस्वरूप आत्मा का ही अच्छी तरह से ध्यान करना चाहिए।


तदेवैकं परं तत्त्वं तदेवैकं परं पदम्।
भव्याराध्यं तदेवैकं तदेवैकं परं महः॥४४॥

अर्थ: वह चैतन्यस्वरूप आत्मा ही एक उत्तम तत्त्व है तथा वही एक उत्कृष्ट स्थान है और वही एक भव्य जीवों के आराधन करने योग्य है तथा वही एक अद्वितीय उत्तम तेज है।


शस्त्रं जन्मतरुच्छेदि तदेवैकं सतां मतम्।
योगिनां योगिनिष्ठानां तदेवैकं प्रयोजनम्॥४५॥

अर्थ: और वही चैतन्यस्वरूपी आत्मा जन्मरूपी वृक्ष के नाश करने के लिए शस्त्र के समान है अर्थात् चैतन्यस्वरूप आत्मा के भलीभाँति ध्यान के करने से सर्व जन्म-मरण आदि नष्ट हो जाते हैं तथा वही आत्मारूपी तेज भव्य जीवों को मान्य है और वही ध्यान योगियों का प्रयोजन है अर्थात् उसी की प्राप्ति के लिए योगी गण सदा प्रयत्न करते रहते हैं।


मुमुक्षूणां तदेवैकं मुक्तेः पन्था न चापरः।
आनन्दोऽपि न चान्यत्र तद्विहाय विभाव्यते॥४६॥

अर्थ: मोक्षाभिलाषियों के लिए चैतन्यस्वरूप आत्मा ही मोक्ष का मार्ग है आत्मा से अन्य कोई भी मोक्ष मार्ग नहीं है तथा आनंद भी आत्मा में ही है किन्तु उसके सिवाय और कहीं पर भी आनन्द नहीं प्रतीत होता इसलिए भव्य जीवों को इसी का ध्यान करना चाहिए।


संसारघोरघर्मेण सदा तप्तस्य देहिनः।
यन्त्रधारागृहं शान्तं तदेव हिमशीतलम्॥४७॥

अर्थ: संसाररूपी प्रबल ताप से निरंतर संतप्त प्राणियों को वह चैतन्यस्वरूप आत्मा ही शांत तथा बर्फ के समान ठंडा, फव्वारा सहित मकान है अर्थात् जिस प्रकार धूप से संतप्त मनुष्यों को फव्वारा सहित शीतल मकान में आराम मिलता है उसी प्रकार संसार के संताप से खिन्न जीवों को इस शांत आत्मा में लीन होने से ही आराम मिलता है इसलिये भव्य जीवों को सदा चैतन्यस्वरूप आत्मा का ही अनुभव करना चाहिए।


तदेवैकं परं दुर्गमगम्यं कर्मविद्विषाम्।
तदेवैतत्तिरस्कारकारि सारं निजं बलम्॥४८॥

अर्थ: तथा वही चैतन्यस्वरूप आत्मा एक ऐसा किला है कि जिसमें कर्मरूप बैरी कदापि प्रवेश नहीं कर सकते और उन कर्मरूपी शत्रुओं का अपमान करने वाला वही चैतन्यस्वरूप आत्मा एक उत्कृष्ट बल है।


तदेव महती विद्या स्फुरन्मन्त्रस्तदेव हि।
औषधं तदपि श्रेष्ठं जन्मव्याधिविनाशनम्॥४९॥

अर्थ: और वही चैतन्यस्वरूपी तेज प्रबल विद्या है तथा वही स्फुरायमान मंत्र है और समस्त जन्म जरा आदि को नाश करने वाली वही एक परम औषधि है।


अक्षयस्याक्षयानन्दमहाफलभरश्रियः ।
तदेवैकं परं बीजं निःश्रेयसलसत्तरोः॥५०॥

अर्थ: और उसी शुद्धात्मारूपी तेज से अविनाशी तथा अक्षय सुखरूपी उत्तम फल के देने वाले मोक्षरूपी मनोहर वृक्ष की उत्पत्ति होती है।


तदेवैकं परं विद्धि त्रैलोक्यगृहनायकम्।
येनैकेन विना शङ्के वसदप्येतदुद्वसम्॥५१॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि हे भव्यजीवो ! तीनलोकरूपी घर का स्वामी उसी चैतन्यस्वरूप तेज को तुम समझो क्योंकि मैं ऐसी शंका करता हूँ कि इस एक चैतन्यस्वरूप तेज के बिना यह तीनलोकरूपी घर भी वन के समान है।


शुद्धं यदेव चैतन्यं तदेवाहं न संशयः।
कल्पनयानयाप्येतद्दीनमानन्दमन्दिरम्॥५२॥

अर्थ: जो निराकार, निरंजन, शुद्ध, चिद्रूप है सो मैं ही हूँ इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है, इस प्रकार की कल्पना से भी वह आनन्दस्वरूप शुद्धात्मा रहित है।


स्पृहा मोक्षेऽपि मोहोत्था तन्निषेधाय जायते।
अन्यस्मै तत्कथं शान्ता स्पृहयन्ति मुमुक्षवः॥५३॥

अर्थ: मोह के होते ही इच्छा होती है इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि यदि मोक्ष के लिए भी मोह से पैदा हुई इच्छा हो जावे तो वही जब मोक्ष को रोकने वाली हो जाती है तब शान्त तथा मोक्षाभिलाषी मनुष्य अन्य पदार्थों के लिए कैसे इच्छा कर सकते हैं।


अहं चैतन्यमेवैकं नान्यत्किमपि जातुचित्।
सम्बन्धोऽपि न केनापि दृढपक्षो ममेदृशः॥५४॥

अर्थ: मैं एक चैतन्यस्वरूप ही हूँ चैतन्य से भिन्न नहीं हूँ और मेरा निश्चयनय से किसी दूसरे पदार्थ के साथ सम्बन्ध भी नहीं है यह मेरा प्रबल सिद्धान्त है।


शरीरादिबहिश्चिन्ताचक्रसम्पर्कवर्जितम् ।
विशुद्धात्मस्थितं चित्तं कुर्वन्नास्तेनिरन्तरम्॥५५॥

अर्थ: बाह्य शरीर आदि पदार्थों की चिन्ता छोड़कर, रागद्वेष आदि मलों से रहित तथा निर्मल अपनी आत्मा में ही चित्त को लगाते हैं।


एवं सति यदेवास्ति तदस्तु किमिहापरैः।
आसाद्यात्मन्निदं तत्त्वं शान्तो भव सुखी भव॥५६॥

अर्थ: इस प्रकार पूर्वोक्त रीति से आत्मा के चिंतन से जो होता है सो हो दूसरे-दूसरे विचारों से क्या प्रयोजन है। इस प्रकार के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त होकर अरे आत्मा! तू शान्त हो तथा सुखी हो इस प्रकार ज्ञान अपनी आत्मा को शिक्षा देता रहता है।


अपारजन्मसन्तानपथभ्रान्तिकृतश्रमम् ।
तत्त्वामृतमिदं पीत्वा नाशयन्तु मनीषिणः॥५७॥

अर्थ: आचार्य उपदेश देते हैं कि हे भव्यपुरुषो! इस कहे हुए चैतन्यामृत का पान करो तथा इस अपार संसार में अनन्त तिर्यञ्च, नरक आदि पर्यायों में भ्रमण करने से जो खेद हुआ है उसको शान्त करो।


अतिसूक्ष्ममतिस्थूलमेकं चानेकमेव यत्।
स्वसंवेद्यमवेद्यञ्च यदक्षरमनक्षरम् ॥५८॥

अनौपम्यमनिर्देश्यमप्रमेयमनाकुलम् ।
शून्यं पूर्णं च यन्नित्यमनित्यं च प्रचक्ष्यते ॥५९॥

निश्शरीरं निरालम्बं निश्शब्दं निरुपाधि यत्।
चिदात्मकं परंज्योतिरवाङ्मानसगोचरम् ॥६०॥

इत्यत्र गहनेऽत्यन्तदुर्लक्ष्ये परमात्मनि।
उच्यते यत्तदाकाशं प्रत्यालेख्यं विलिख्यते ॥६१॥

अर्थ (श्लोक 58 से 61): आचार्य कहते हैं कि चैतन्यरूपी तेज अत्यन्त सूक्ष्म भी है और अत्यन्त स्थूल भी है और एक भी है अनेक भी है, स्वसंवेद्य भी है, अवेद्य भी है, अक्षर भी है, अनक्षर भी है, उपमा रहित है, अवक्तव्य है, अप्रमेय है, आकुलता रहित है, शून्य भी है, पूर्ण भी है, नित्य भी है, अनित्य भी है, शरीर सहित है, आश्रय रहित है, शब्दरहित है, उपाधि रहित है तथा चैतन्यस्वरूप परम तेज का धारी है और न उसको वचन से ही कह सकते हैं तथा न उसका मन से चिंतन कर सकते हैं, इस प्रकार यह परमात्मा अगम्य तथा दृष्टि के अगोचर है इसलिए जिस प्रकार अमूर्तिक आकाश पर चित्र लिखना कठिन है उसी प्रकार परमात्मा का वर्णन करना भी अत्यन्त कठिन है।


आस्तां तत्र स्थितो यस्तु चिंतामात्रपरिग्रहः।
तस्यात्र जीवितं श्लाघ्यं देवैरपि स पूज्यते॥६२॥

अर्थ: जो पुरुष उस शुद्धात्मा में तिष्ठने वाला है वह तो दूर रहा किन्तु जो पुरुष इस शुद्धात्मा का चिंतन करने वाला है उसका भी जीवन इस संसार में अत्यन्त प्रशंसनीय है तथा उसकी बड़े-बड़े देव आकर पूजा, सेवा आदि करते हैं इसलिए भव्य जीवों को सदा शुद्धात्मा का ही ध्यान करना चाहिए।


सर्वविद्भिरसंसारैः सम्यग्ज्ञानविलोचनैः।
एतस्योपासनोपायः साम्यमेकमुदाहृतम्॥६३॥

अर्थ: समस्त पदार्थों के जानने वाले तथा कर्मों से रहित तथा केवलज्ञानरूपी नेत्र के धारी केवली भगवान् इस शुद्धात्मा की उपासना करने का उपाय समता ही है ऐसा कहते हैं।


साम्यं स्वास्थ्यं समाधिश्च योगश्चेतोनिरोधनम्।
शुद्धोपयोग इत्येते भवन्त्येकार्थवाचकाः॥६४॥

अर्थ: साम्य, स्वास्थ्य, समाधि, योग, चित्तनिरोध, शुद्धोपयोग, ये सर्व शब्द एक ही अर्थ के कहने वाले हैं अर्थात् इन शब्दों के नाम जुदे-जुदे हैं किन्तु अर्थ एक ही है।


नाकृतिर्नाक्षरं वर्णो नो विकल्पश्च कश्चन।
शुद्धचैतन्यमेवैकं यत्र तत्साम्यमुच्यते॥६५॥

अर्थ: जिसमें न कोई आकार है और न कोई अक्षर है और न कोई नीला आदि वर्ण है और न जिसमें कोई विकल्प है किन्तु केवल एक चैतन्य ही है वही साम्य है।


साम्यमेकं परं कार्यं साम्यं तत्त्वं परं स्मृतम्।
साम्यं सर्वोपदेशानामुपदेशो विमुक्तये॥६६॥

अर्थ: साम्य ही एक उत्कृष्ट कार्य है और साम्य ही एक उत्तम तत्त्व है तथा साम्य ही मुक्ति के लिए समस्त उत्तम उपदेशों में से उपदेश है।


साम्यं सद्बोधनिर्माणं शश्वदानन्दमन्दिरम्।
साम्यं शुद्धात्मनो रूपं द्वारं मोक्षैकसद्मनः॥६७॥

अर्थ: इस साम्य से ही भव्य जीवों को सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति होती है तथा इस साम्य से ही अविनाशी सुख मिलता है और यह साम्य ही शुद्धात्मा का स्वरूप है तथा यह साम्य ही मोक्ष रूपी मकान का द्वार है।


साम्यं निश्शेषशास्त्राणां सारमाहुर्विपश्चितः।
साम्यं कर्ममहादावदाहे दावानलायते॥६८॥

अर्थ: समस्त शास्त्रों का सारभूत यह साम्य ही है और यही साम्य समस्त कर्मरूपी वन के जलाने में दावानल के समान है ऐसा गणधर आदि देव कहते हैं।


साम्यं शरण्यमित्याहुर्योगिनां योगगोचरम्।
उपाधिरचिताशेषदोषक्षपणकारणम् ॥६९॥

अर्थ: और यह साम्य ही समस्त दुखों को दूर करने में समर्थ है तथा ध्यानी पुरुष ही इसका ध्यान करते हैं और यह साम्य ही आत्मा और कर्मों के सम्बन्ध से उत्पन्न हुए जो रागादि दोष उनको सर्वथा नष्ट करने वाला है इसलिए भव्य जीवों को सदा साम्य का ही मनन करना चाहिए।


निस्पृहायाणिमाद्यब्जखण्डे साम्यसरोजुषे।
हंसाय शुचये मुक्तिहंसीदत्तदृशे नमः॥७०॥

अर्थ: अणिमा, महिमा आदि रूप जो कमल खण्ड उसकी जिसको अंशमात्र भी इच्छा नहीं है तथा जो समतारूपी सरोवर में सदा प्रीतिपूर्वक रमण करने वाला है और जिसकी दृष्टि मोक्षरूपी हंसिनी में लगी हुई है और जो अत्यन्त पवित्र है ऐसे परमहंस शुद्धात्मा के लिए मेरा नमस्कार हो।


ज्ञानिनोमृतसंगाय मृत्युस्तापकरोऽपि सन्।
आमकुम्भस्य लोकेस्मिन् भवेत् पाकविधिर्यथा॥७१॥

अर्थ: जिस प्रकार मिट्टी के कच्चे घड़े के लिए पकाने की विधि एक प्रकार से ताप को ही उपजाने वाली है तो भी वह पाक विधि घड़े को अमृत (जल) का संगम कराने वाली होती है अर्थात् पक जाने पर ही घड़ा पानी भरने के योग्य होता है उसी प्रकार यद्यपि बहिरात्माओं को मृत्यु, दुख को देने वाली है तो भी ज्ञानियों के लिए वह अमृत (मोक्ष) के समागम के ही लिए होती हैं अर्थात् ज्ञानी पुरुष सदा मृत्यु के नाश के लिए ही प्रयत्न करते रहते हैं तथा चैतन्यस्वरूप से भिन्न ही मृत्यु को मानते हैं इसलिए मृत्यु के होने पर भी उनको दुख नहीं होता।


मानुष्यं सत्कुले जन्म लक्ष्मीर्बुद्धिः कृतज्ञता।
विवेकेन विना सर्वं सदप्येतन्न किञ्चन॥७२॥

अर्थ: जो मनुष्य विवेकी नहीं है उसका मनुष्यपना, उत्तम कुल में जन्म, धन, ज्ञान और कृतज्ञपना होकर भी निष्फल ही है इसलिए मनुष्यों को विवेकी अवश्य होना चाहिए।


चिदचिद् द्वे परे तत्त्वे विवेकस्तद्विवेचनम्।
उपादेयमुपादेयं हेयं हेयञ्च कुर्वतः॥७३॥

अर्थ: संसार में चेतन तथा अचेतन दो प्रकार के तत्त्व हैं उनमें ग्रहण करने योग्य को ग्रहण करने वाले तथा त्याग करने योग्य को त्याग करने वाले पुरुष का जो विचार है उसी को विवेक कहते हैं।


दुःखं किञ्चित्सुखं किञ्चिच्चित्ते भाति जडात्मनः।
संसारेऽत्र पुनर्नित्यं सर्वं दुःखं विवेकिनः॥७४॥

अर्थ: मूर्ख पुरुषों को तो इस संसार में कुछ सुख तथा कुछ दुख मालूम पड़ता है किन्तु जो हिताहित के जानने वाले विवेकी हैं उनको तो इस संसार में सब दुख ही दुख निरन्तर मालूम पड़ता है।


हेयञ्च कर्मरागादि तत्कार्यञ्च विवेकिनः।
उपादेयं परंज्योतिरूपयोगैकलक्षणम्॥७५॥

अर्थ: विवेकी पुरुष को ज्ञानावरणादि कर्मों का तथा उनके कार्यभूत रागादिकों का अवश्य ही त्याग कर देना चाहिए और ज्ञान, दर्शन स्वरूप इस उत्कृष्ट आत्मतेज को ही ग्रहण करना चाहिए। ज्ञानी मनुष्य इस बात का विचार करते रहते हैं।


यदेव चैतन्यमहं तदेव तदेव जानाति तदेव पश्यति।
तदेव चैकं परमस्ति निश्चयाद्गतोऽस्मि भावेन तदेकतां परम्॥७६॥

अर्थ: जो चैतन्य है सो मैं ही हूँ और वही चैतन्य पदार्थों को जानता है तथा देखता है और वही एक उत्कृष्ट है और निश्चयनय स्वभाव से मैं तथा चैतन्य अत्यन्त अभिन्न हूँ।


एकत्वसप्ततिरियं सुरसिन्धुरुच्चैः श्रीपद्मनन्दिहिमभूधरतः प्रसूता।
यो गाहते शिवपदाम्बुनिधिं प्रविष्टामेतां लभेत स नरः परमां विशुद्धिम्॥७७॥

अर्थ: यह एकत्वसप्ततिरूपी गंगा नदी अत्यन्त उन्नत ऐसे श्रीपद्मनन्दी नामक हिमालय पर्वत से पैदा हुई है तथा मोक्षपदरूपी समुद्र में जाकर मिली है इसलिए जो भव्य जीव उस नदी में स्नान करते हैं उनके समस्त मल नाश हो जाते हैं और वे अत्यन्त विशुद्ध हो जाते हैं।


संसारसागरसमुत्तरणैकसेतुमेनं सतां सदुपदेशमुपाश्रितानाम्।
कुर्यात्पदं मललवोऽपि किमन्तरङ्गे सम्यक् समाधिविधिसन्निधिनिस्तरङ्गे॥७८॥

अर्थ: जिन सज्जन पुरुषों ने संसार समुद्र से पार करने में पुल के समान इस उत्तम उपदेश का आश्रय किया है उन सज्जन पुरुषों के उत्तम आत्म ध्यान के करने से क्षोभ रहित अंतरंग में किसी प्रकार का रागादि मल नहीं रह सकता।


आत्मा भिन्नस्तदनुगतिमत्कर्म भिन्नं तयोर्या प्रत्यासत्तेर्भवति विकृतिः सापि भिन्ना तथैव।
कालक्षेत्रप्रमुखमपि यत्तच्च भिन्नं मतं मे भिन्नं भिन्नं निजगुणकलालङ्कृतं सर्वमेतत्॥७९॥

अर्थ: यह ज्ञानस्वरूप मेरा आत्मा भिन्न है और उसके पीछे चलने वाला कर्म भी भिन्न है तथा कर्म और आत्मा के सम्बन्ध से जो कुछ विकार हुआ है वह भी मुझसे भिन्न है और काल, क्षेत्र आदिक जो पदार्थ हैं वे भी मुझसे भिन्न हैं। इस प्रकार अपने-अपने गुण तथा अपनी-अपनी पर्यायों से सहित जितने पर पदार्थ हैं सर्व मुझसे भिन्न ही भिन्न हैं इस प्रकार ज्ञानी सदा विचार करता रहता है।


येऽभ्यासयन्ति कथयन्ति विचारयन्ति सम्भावयन्ति च मुहुर्मुहुरात्मतत्त्वम्।
ते मोक्षमक्षयमनूनमनन्तसौख्यं क्षिप्रं प्रयान्ति नवकेवललब्धिरूपम्॥८०॥

अर्थ: आचार्य उपदेश देते हैं कि जो भव्यजीव उस आत्म तत्त्व का बारंबार अभ्यास करते हैं और कथन करते हैं तथा विचार और अनुभव करते हैं वे भव्यजीव अविनाशी और महान् तथा अनन्तदर्शन, क्षायिकज्ञान और क्षायिकचारित्र आदि नौ केवललब्धि स्वरूप सुख के भण्डार ऐसे मोक्षपद को बात ही बात में पा लेते हैं इसलिए भव्यजीवों के सदा इस आत्मतत्त्व का चिंतन करना चाहिए।

५. यतिभावनाष्टक

आदाय व्रतमात्मतत्त्वममलं ज्ञात्वाथ गत्वा वनं
निश्शेषामपि मोहकर्मजनितां हित्वा विकल्पावलिम्।
ये तिष्ठन्ति मनोरुच्चिदचलैकत्वप्रमोदं गताः
निष्कम्पा गिरिवज्जयन्ति मुनयस्ते सर्वसङ्गोज्झिताः॥१॥

अर्थ: व्रत को ग्रहण कर, तथा निर्मल आत्मा के स्वरूप को जानकर और वन में जाकर तथा मोहकर्म से पैदा हुए समस्त विकल्पों को नष्टकर, समस्त प्रकार के परिग्रहों से रहित जो मुनिगण मनरूपी पवन से नहीं चलायमान ऐसे चैतन्य की एकता में हर्ष सहित हैं अर्थात् अपने आत्मध्यान में लीन हैं और पर्वत के समान निश्चल स्थित हैं वे मुनिगण सदा इस लोक में जयवन्त हैं।


चेतोवृत्तिनिरोधनेन करणग्रामं विधायोद्धसं
तत्संहृत्य गतागतं च मरुतौ धैर्यं समाश्रित्य च।
पर्यङ्केन मया शिवाय विधिवच्छून्यैकभूभृद्दरी-
मध्यस्थेन कदाचिदर्पितदृशा स्थातव्यमन्तर्मुखम्॥२॥

अर्थ: चित्त की वृत्ति को रोककर तथा इन्द्रियों को उजाड़कर (वश कर) और श्वासोच्छ्वास को रोककर तथा धीरता को धारण कर और पर्यङ्क आसन माड़कर (पालती मारकर) और आनन्दस्वरूप चैतन्य की तरफ दृष्टि लगाकर निर्जन पर्वत की गुफा में बैठकर मैं कब आत्मध्यान करूँगा ?


धूलीधूसरितं विमुक्तवसनं पर्यङ्कमुद्रागतं
शान्तं निर्वचनं निमीलितदृशं तत्त्वोपलम्भे सति।
उत्कीर्णं दृषदीव मां वनभुवि भ्रान्तो मृगाणां गणः
पश्यत्युद्गतविस्मयो यदि तदा मादृग्जनः पुण्यवान्॥३॥

अर्थ: निजस्वरूप की प्राप्ति होने पर धूलि से मलिन तथा वस्त्र रहित और पर्यंक मुद्रा सहित तथा शांत और वचन रहित तथा आँखों को बन्द किये हुए मुझे जिस समय वन में भ्रम सहित मृग आश्चर्य से देखेंगे उसी समय मेरे समान मनुष्य पुण्यवान् समझा जायेगा।


वासः शून्यमठे क्वचिन्निवसनं नित्यं ककुम्मण्डलं
संतोषो धनमुन्नतं प्रियतमा क्षान्तिस्तपो भोजनम्।
मैत्री सर्वशरीरिभिः सह सदा तत्त्वैकचिन्तासुखं
चेदास्ते न किमस्ति मे शमवतः कार्यं न किञ्चित् परैः॥४॥

अर्थ: यदि किसी शून्यमठ में मेरा निवासस्थान है तथा अविनाशी दिशाओं का समूह वस्त्र है और सन्तोष धन है तथा क्षमारूपी स्त्री है और तपरूपी भोजन है तथा समस्त प्राणियों के साथ मित्रता है और आत्मस्वरूप का चिंतन है तो मेरे सर्व ही वस्तु मौजूद है फिर मुझे दूसरी वस्तुओं से क्या प्रयोजन है ऐसा योगीश्वर सदा विचार करते रहते हैं।


लब्ध्वा जन्म कुले शुचौ वरवपुर्बुद्ध्वा श्रुतं पुण्यतो
वैराग्यञ्च करोति यः शुचितपो लोके स एकः कृती।
तेनैवोज्झितगौरवेण यदि वा ध्यानामृतं पीयते
प्रासादे कलशस्तदा मणिमयो हैमे समारोपितः॥५॥

अर्थ: जो मनुष्य इस संसार में उत्तम कुल में जन्म पाकर तथा निरोग और सुन्दर शरीर को प्राप्त कर और शास्त्र को जानकर वैराग्य को प्राप्त होकर पवित्र तप को करता है वह मनुष्य संसार भर में पुण्यवान समझा जाता है और वही तप करने वाला पुरुष यदि मद रहित होकर ध्यानामृत का आस्वादन करे तो समझना चाहिए कि उस मनुष्य ने सुवर्णमय घर के ऊपर मणिमय कलश की स्थापना की।


ग्रीष्मे भूधरमस्तकाश्रितशिलां मूलं तरोः प्रावृषि
प्रोधूते शिशिरे चतुष्पथपदं प्राप्ताः स्थितिं कुर्वते ।
ये तेषां यमिनां यथोक्ततपसां ध्यानप्रशान्तात्मनां
मार्गे सञ्चरतो मम प्रशमिनः कालः कदा यास्यति ॥६॥

अर्थ: जो योगीश्वर ग्रीष्मऋतु में पहाड़ों के अग्रभाग में स्थित शिला के ऊपर ध्यान रस में लीन होकर रहते हैं तथा वर्षाकाल में वृक्षों के मूल में बैठकर ध्यान करते हैं और शरदऋतु में चौड़े मैदान में बैठकर ध्यान लगाते हैं। उन शास्त्र के अनुसार तप के धारी तथा ध्यान से जिनकी आत्मा शांत हो गई हैं ऐसे योगीश्वरों के मार्ग में गमन करने के लिए मुझे भी कब वह समय मिलेगा।


भेदज्ञानविशेषसंहृतमनोवृत्तिः समाधिः परो
जायेताद्भुतधामधन्यशमिनां केषांचिदत्राचलः ।
वज्रे मूर्ध्नि पतत्यपि त्रिभुवने वह्निप्रदीप्तेऽपि वा
येषां नो विकृतिर्मनागपि भवेत्प्राणेषु नश्यत्स्वपि ॥७॥

अर्थ: और स्वपर के भेदज्ञान से जिस समाधि में मन की वृत्ति संकुचित है और जो आश्चर्यकारी है तथा उत्कृष्ट और अचल है ऐसी वह समाधि उन धन्य तथा साम्यभाव के धारक मुनियों के होती है जिस समाधि के होने पर मस्तक पर वज्र गिरने पर भी तथा तीनों लोक के जलने पर भी और निज प्राणों के नष्ट होने पर भी जिन मुनियों के मन को किसी प्रकार का विकार नहीं होता।


अन्तस्तत्त्वमुपाधिवर्जितमहं व्यापारवाच्यं परं
ज्योतिर्यैः कलितं श्रुतं च यतिभिस्ते सन्तु नः शान्तये ।
येषां तत्सदनं तदेव शयनं तत्सम्पदस्तत्सुखं
तद्वृत्तिस्तदपि प्रियं तदखिलश्रेष्ठार्थसंसाधकम् ॥८॥

अर्थ: जिसके साथ किसी प्रकार के कर्म का सम्बन्ध नहीं है तथा जो ‘अहम्’ इस शब्द से कहा जाता है ऐसे उत्कृष्ट ज्योति स्वरूप आत्म तत्त्व को जिन मुनीश्वरों ने जान लिया है तथा सुन लिया है और जिन योगीश्वरों के वह निज तत्त्व ही एक रहने का स्थान है और वही सोने का स्थान है तथा वही श्रेष्ठ संपदा है और वही सुख है तथा वही वृत्ति है और वही प्रिय है तथा वही निज तत्त्व जिन मुनियों को मनोवांछित पदार्थों का सिद्ध करने वाला है वे यतीश्वर मुझे शान्ति प्रदान करें।


पापारिक्षयकारि दातृ नृपतिस्वर्गापवर्गश्रियं
श्रीमत्पद्मनन्दिभिर्विरचितं चिच्चेतनानन्दिभिः ।
भक्त्या यो यतिभाव्राष्टकमिदं भव्यस्त्रिसन्ध्यं पठेत्
किं किं सिध्यति वाञ्छितं न भुवने तस्यात्र पुण्यात्मनः ॥९॥

अर्थ: जो यतिभाव्राष्टक समस्त पापरूपी बैरियों का नाश करने वाला है और राजलक्ष्मी तथा स्वर्ग, मोक्ष की लक्ष्मी का देने वाला है तथा जिसकी रचना चैतन्यस्वरूप तत्त्व में आनंद मानने वाले श्रीपद्मनन्दि मुनि ने की है ऐसे यतिभाव्राष्टक को जो भव्यजीव भक्ति पूर्वक तीनों काल पढ़ते हैं उन भाग्यशाली भव्य जीवों को संसार में क्या इष्ट पदार्थ की प्राप्ति नहीं होती ? अर्थात् सर्व इष्ट पदार्थ उनको सुलभ रीति से मिल जाते हैं।

६. उपासक संस्कार

आद्यो जिनो नृपःश्रेयान् व्रतदानादिपूरुषौ।
एतदन्योऽन्यसम्बन्धे धर्मस्थितिरभूदिह ॥१॥

अर्थ: आदि जिनेन्द्र श्री ऋषभनाथ और श्रेयांस नामक राजा ये दोनों महात्मा व्रततीर्थ तथा दानतीर्थ के प्रवर्तन में आदिपुरुष हैं और इस भरत क्षेत्र में इन दोनों के सम्बन्ध से ही धर्म की प्रवृत्ति हुई है।


सम्यग्दृग्बोधचारित्रत्रितयं धर्म उच्यते।
मुक्तेः पन्था स एव स्यात्प्रमाणपरिनिष्ठितः॥२॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र इन तीनों के समुदाय को धर्म कहते हैं तथा प्रमाण से निश्चित यह धर्म ही मोक्ष का मार्ग है।


रत्नत्रयात्मके मार्गे संचरन्ति न ये जनाः।
तेषां मोक्षपदं दूरं भवेद्दीर्घतरोभवः॥३॥

अर्थ: जो मनुष्य इस सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र स्वरूप मोक्षमार्ग में गमन नहीं करते हैं उनको कदापि मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती और उनके लिए संसार दीर्घतर हो जाता है अर्थात् उनका संसार कभी भी नहीं छूटता।


सम्पूर्णदेशभेदाभ्यां स च धर्मो द्विधा भवेत्।
आद्ये भेदे च निर्ग्रन्था द्वितीये गृहिणः स्थिताः॥४॥

अर्थ: और वह रत्नत्रयात्मक धर्म सर्वदेश तथा एकदेश के भेद से दो प्रकार का है उसमें सर्वदेश धर्म का तो निर्ग्रन्थ मुनि पालन करते हैं और एकदेश धर्म का गृहस्थ (श्रावक) पालन करते हैं।


सम्प्रत्यपि प्रवर्तेत धर्मस्तेनैव वर्त्मना।
तेन तेऽपि च गण्यन्ते गृहस्था धर्महेतवः॥५॥

अर्थ: इस कलिकाल में भी उस धर्म की उसी मार्ग से अर्थात् सर्वदेश तथा एक देश मार्ग से ही प्रवृत्ति है इसलिए उस धर्म के कारण, गृहस्थ भी गिने जाते हैं।


सम्प्रत्यत्र कलौ काले१ जिनगेहे मुनिस्थितिः।
धर्मश्च दानमित्येषां श्रावका मूलकारणम्॥६॥

अर्थ: और इस काल में श्रावकगण बड़े-बड़े जिनमन्दिर बनवाते हैं तथा आहार देकर मुनियों के शरीर की स्थिति में सहायक बनते हैं तथा सर्वदेश और एकदेशरूप धर्म की प्रवृत्ति करते हैं और दान देते हैं इसलिए इन सभी का मूल कारण श्रावक ही है अतः श्रावक धर्म भी अत्यन्त उत्कृष्ट है।


देवपूजा गुरूपास्तिः स्वाध्यायः संयमस्तपः।
दानञ्चेति गृहस्थानां षट् कर्माणि दिने दिने॥७॥

अर्थ: जिनेन्द्रदेव की पूजा और निर्ग्रन्थ गुरुओं की सेवा तथा स्वाध्याय और संयम तथा योग्यतानुसार तप और दान ये छह कर्म श्रावकों को प्रतिदिन करने योग्य हैं।


समता सर्वभूतेषु संयमे शुभभावना।
आर्त्तरौद्रपरित्यागस्तद्विद्धि सामायिकं व्रतम्॥८॥

अर्थ: समस्त प्राणियों में साम्यभाव रखना तथा संयम धारणा करने में अच्छी भावना रखना और आर्तध्यान तथा रौद्रध्यान का त्याग करना इसी का नाम सामायिक व्रत है।


सामायिकं न जायेत व्यसनम्लानचेतसः।
श्रावकेन ततः साक्षात्त्याज्यं व्यसनसप्तकम्॥९॥

अर्थ: जिन मनुष्यों का चित्त व्यसनों से मलिन हो रहा है उनसे कदापि यह सामायिक व्रत नहीं हो सकता इसलिए सामायिक के आकांक्षी श्रावकों को सातों व्यसनों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।


द्यूतमांससुरावेश्याखेटचौर्यपराङ्गनाः ।
महापापानि सप्तैव व्यसनानि त्यजेद् बुधः॥१०॥

अर्थ: जुआ, मांस, मद्य, वेश्या, शिकार, चोरी, परस्त्री ये सात व्यसन संसार में प्रबल पाप हैं इसलिए विद्वानों को चाहिए कि वे इनका सर्वथा त्याग कर देवें।


धर्मार्थिनोऽपि लोकस्य चेदस्ति व्यसनाश्रयः।
जायते न ततः सापि धर्मान्वेषणयोग्यता॥११॥

अर्थ: पुरुष धर्म की अभिलाषा करने वाला है यदि उसके भी ये व्यसन होवे तो उस पुरुष में धर्म धारण करने की योग्यता कदापि नहीं हो सकती अर्थात् वह धर्म की परीक्षा करने का पात्र ही नहीं हो सकता इसलिए धर्मार्थी पुरुषों को अवश्य ही व्यसनों का त्याग कर देना चाहिए।


सप्तैव नरकाणि स्युस्तैरेकैकं निरूपितम्।
आकर्षयन्नृणामेतद् व्यसनं स्वसमृद्धये॥१२॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि जिस प्रकार व्यसन सात हैं, उसी प्रकार नरक भी सात ही हैं इसलिए ऐसा मालूम होता है उन नरकों ने अपनी-अपनी वृद्धि के लिए मनुष्यों को खींचकर नरक में जाने के लिए एक-एक व्यसन को नियुक्त किया है।


धर्मशत्रुविनाशार्थं पापाख्यकुपतेरिह।
सप्ताङ्गं बलवद्राज्यं सप्तभिर्व्यसनैः कृतम्॥१३॥

अर्थ: और भी आचार्य कहते हैं कि धर्मरूपी बैरी के नाश के लिए पाप नामक दुष्ट राजा का सात व्यसनों से रचा हुआ यह सात हैं अंग जिसके ऐसा बलवान् राज्य है।


प्रपश्यन्ति जिनं भक्त्या पूजयन्ति स्तुवन्ति ये।
ते च दृश्याश्च पूज्याश्च स्तुत्याश्च भुवनत्रये॥१४॥

अर्थ: जो भव्यजीव जिनेन्द्र भगवान् को भक्ति पूर्वक देखते हैं तथा उनकी पूजा स्तुति करते हैं वे भव्य जीव तीनों लोक में दर्शनीय तथा पूजा के योग्य तथा स्तुति के योग्य होते हैं अर्थात् सर्वलोक उनको भक्ति से देखता है तथा उनकी पूजा स्तुति करता है।


ये जिनेन्द्रं न पश्यन्ति पूजयन्ति स्तुवन्ति न।
निष्फलं जीवितं तेषां तेषां धिक् च गृहाश्रमम्॥१५॥

अर्थ: किन्तु जो मनुष्य जिनेन्द्र भगवान् को भक्ति से नहीं देखते हैं और न उनकी भक्ति पूर्वक पूजा स्तुति ही करते हैं उन मनुष्यों का जीवन संसार में निष्फल है तथा उनके गृहस्थाश्रम के लिए भी धिक्कार है।


प्रातरुत्थाय कर्त्तव्यं देवतागुरुदर्शनम्।
भक्त्या तद्वन्दना कार्या धर्मश्रुतिरुपासकैः॥१६॥

पश्चादन्यानि कार्याणि कर्त्तव्यानि यतो बुधैः।
धर्मार्थकाममोक्षाणामादौ धर्मः प्रकीर्तितः॥१७॥

अर्थ (श्लोक 16 से 17): भव्य जीवों को प्रातःकाल उठकर जिनेन्द्रदेव तथा गुरु का दर्शन करना चाहिए और भक्ति पूर्वक उनकी वंदना स्तुति भी करनी चाहिए और धर्म का श्रवण भी करना चाहिए इनके पीछे अन्य गृह आदि सम्बन्धी कार्य करने योग्य है क्योंकि गणधर आदि महापुरुषों ने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चार पुरुषार्थों में धर्म का ही सबसे प्रथम निरूपण किया है तथा उसी को मुख्य माना है।


गुरोरेव प्रसादेन लभ्यते ज्ञानलोचनम्।
समस्तं दृश्यते येन हस्तरेखेव निस्तुषम्॥१८॥

अर्थ: जिस केवलज्ञानरूपी लोचन से समस्त पदार्थ हाथ की रेखा के समान प्रकट रीति से देखने में आते है ऐसा ज्ञानरूपी नेत्र निर्ग्रंथ गुरुओं की कृपा से ही प्राप्त होता है इसलिए ज्ञान के आकांक्षी मनुष्यों को भक्ति पूर्वक गुरुओं की सेवा, वंदना आदि करना चाहिए।


ये गुरुं नैव मन्यन्ते तदुपास्ति न कुर्वते।
अंधकारो भवेत्तेषामुदितेऽपि दिवाकरे॥१९॥

अर्थ: जो मनुष्य गुरुओं को नहीं मानते हैं और उनकी सेवा, वंदना नहीं करते हैं उन मनुष्यों के लिए सूर्य के उदय होने पर भी अंधकार ही है।


ये पठन्ति न सच्छास्त्रं सद्गुरुप्रकटीकृतम्।
तेऽन्धाः सचक्षुषोपीह सम्भाव्यन्ते मनीषिभिः॥२०॥

अर्थ: जो मनुष्य उत्तम और निष्कलंक गुरुओं से प्रकट किए हुए शास्त्र को नहीं पढ़ते हैं उन मनुष्यों को विद्वान् पुरुष नेत्र धारी होने पर भी अन्धे ही मानते हैं ।


मन्ये न प्रायशस्तेषां कर्णाश्च हृदयानि च।
यैरभ्याशे गुरोः शास्त्रं नश्रुतं नावधारितम्॥२१॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं जिन मनुष्यों ने गुरु के पास में रहकर न तो शास्त्र को सुना है तथा हृदय में धारण भी नहीं किया है उनके कान तथा मन नहीं हैं ऐसा प्रायः कर हम मानते हैं।


देशव्रतानुसारेण संयमोऽपि निषेव्यते।
गृहस्थैर्येन तेनैव जायते फलवद्व्रतम्॥२२॥

अर्थ: धर्मात्मा श्रावकों को एक देशव्रत के अनुसार संयम भी अवश्य पालना चाहिए जिससे उनका किया हुआ व्रत फलीभूत होवे।


त्याज्यं मांसं च मद्यं च मधूदम्बरपञ्चकम्।
अष्टौ मूलगुणाः प्रोक्ता गृहिणो दृष्टिपूर्वकाः॥२३॥

अर्थ: श्रावकों को मद्य, मांस, मधु का तथा पाँच उदुम्बरों का अवश्य त्याग कर देना चाहिए और सम्यग्दर्शनपूर्वक इन आठों का त्याग ही गृहस्थों के आठ मूलगुण हैं।


अणुव्रतानि पञ्चैव त्रिप्रकारं गुणव्रतम्।
शिक्षाव्रतानि चत्वारि द्वादशेति गृहिव्रते॥२४॥

अर्थ: पाँच प्रकार के अणुव्रत तथा तीन प्रकार के गुणव्रत और चार प्रकार के शिक्षाव्रत ये बारह व्रत गृहस्थों के हैं।


पर्वस्वथ यथाशक्ति भुक्तित्यागादिकं तपः।
वस्त्रपूतं पिवेत्तोयं रात्रिभोजनवर्जनम्॥२५॥

अर्थ: अष्टमी-चतुर्दशी को शक्ति के अनुसार उपवास आदि तप तथा छने हुए जल का पान और रात को भोजन का त्याग भी गृहस्थों को अवश्य करना चाहिए।


तं देशं तं नरं तत्स्वं तत्कर्माण्यपि नाश्रयेत्।
मलिनं दर्शनं येन येन च व्रतखण्डनम्॥२६॥॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टि श्रावक ऐसे देश को तथा ऐसे पुरुष को और ऐसे धन को तथा ऐसी क्रिया को कदापि आश्रयण नहीं करते जहाँ पर उनका सम्यग्दर्शन मलिन होवे तथा व्रतों का खंडन होवे।


भोगोपभोगसंख्यानं विधेयं विधिवत्सदा।
व्रतशून्या न कर्तव्या काचित्कालकला बुधैः॥२७॥

अर्थ: आचार्य उपदेश देते हैं कि श्रावकों को भोगोपभोग परिमाण व्रत सदा करना चाहिए और विद्वानों को एक क्षण भी बिना व्रत के नहीं रहना चाहिए।


रत्नत्रयाश्रयः कार्यस्तथा भव्यैरतन्द्रितैः।
जन्मान्तरेऽपि यच्छ्रद्धा यथा संवर्धते तराम्॥२८॥

अर्थ: आलस्यरहित होकर भव्य जीवों को उसी रीति से रत्नत्रय का आश्रय करना चाहिए जिससे दूसरे-दूसरे जन्मों में भी उनकी श्रद्धा बढ़ती ही चली जावे।


विनयश्च यथायोग्यं कर्तव्यः परमेष्ठिषु।
दृष्टिबोधचरित्रेषु तद्वत्सु समयाश्रितैः॥२९॥

अर्थ: जो जिनेन्द्र के सिद्धान्त के अनुयायी हैं उन भव्य जीवों को योग्यतानुसार, जो उत्कृष्टस्थान में रहने वाले हैं ऐसे परमेष्ठियों में विनय अवश्य करनी चाहिए तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र में और इनके धारण करने वाले महात्माओं में भी अवश्य विनय करना चाहिए।


दर्शनज्ञानचारित्रतपःप्रभृति सिध्यति।
विनयेनेति तं तेन मोक्षद्वारं प्रचक्षते॥३०॥

अर्थ: विनय से सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र तथा तप आदि की प्राप्ति होती है इसलिए उस विनय को गणधर आदि महापुरुष मोक्ष का द्वार कहते हैं अतः मोक्ष के अभिलाषी भव्यों को यह विनय अवश्य करनी चाहिए।


सत्पात्रेषु यथाशक्ति दानं देयं गृहस्थितैः।
दानहीना भवेत्तेषां निष्फलैव गृहस्थता॥३१॥

अर्थ: धर्मात्मा गृहस्थों को मुनि आदि उत्तम पात्रों में शक्ति के अनुकूल दान भी अवश्य देना चाहिए क्योंकि बिना दान के गृहस्थों का गृहस्थपना निष्फल ही है।


दानं ये न प्रयच्छन्ति निर्ग्रन्थेषु चतुर्विधम्।
पाशा एव गृहास्तेषां बन्धनायैव निर्मिताः॥३२॥

अर्थ: जो पुरुष निर्ग्रन्थ यतीश्वरों को आहार, औषधि, अभय तथा शास्त्र इस प्रकार चार प्रकार के दान को नहीं देते हैं उनके लिए घर, जाल के समान केवल बांधने के लिए ही बनाये गये हैं ऐसा मालूम होता है।


अभयाहारभैषज्यशास्त्रदाने हि यत्कृते।
ऋषीणां जायते सौख्यं गृही श्लाघ्यः कथं न सः॥३३॥

अर्थ: जिस गृहस्थ के अभयदान, आहारदान, औषधिदान तथा शास्त्रदान के करने पर यतीश्वरों को सुख होता है वह गृहस्थ क्यों नहीं प्रशंसा के योग्य है? अर्थात् उस गृहस्थ की सर्वलोक प्रशंसा करते हैं। इसलिए ऐसा उत्तमदान गृहस्थों को अवश्य देना चाहिए।


समर्थोऽपि न यो दद्याद्यतीनां दानमादरात्।
छिनत्ति स स्वयं मूढः परत्र सुखमात्मनः॥३४॥

अर्थ: समर्थ होकर भी जो पुरुष आदरपूर्वक यतीश्वरों को दान नहीं देता वह मूढ़ पुरुष आगामी जन्म में होने वाले अपने सुख को स्वयं नाश करता है।


दृष्ट्नावसमो ज्ञेयो दानहीनो गृहाश्रमः।
तदारूढो भवाम्भोधौ मज्जत्येव न संशयः॥३५॥

अर्थ: जो गृहस्थाश्रम दान से रहित है वह पत्थर की नाव के समान है तथा उस गृहस्थाश्रमरूपी पत्थर की नाव में बैठने वाला मनुष्य नियम से संसाररूपी समुद्र में डूबता है।


स्वमतस्थेषु वात्सल्यं स्वशक्त्या ये न कुर्वते।
बहुपापावृतात्मानस्ते धर्मस्य पराङ्मुखाः॥३६॥

अर्थ: जो मनुष्य साधर्मी सज्जनों में शक्ति के अनुसार प्रीति नहीं करते उन मनुष्यों की आत्मा प्रबल पाप से ढकी हुई है और वे धर्म से पराङ्मुख हैं अर्थात् धर्म के अभिलाषी नहीं हैं। इसलिए भव्य जीवों को साधर्मी मनुष्यों के साथ अवश्य प्रीति करनी चाहिए।


येषां जिनोपदेशेन कारुण्यामृतपूरिते।
चित्ते जीवदया नास्ति तेषां धर्मः कुतोभवेत्॥३७॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान् के उपदेश से, करुणा से पूरित भी जिन मनुष्यों के चित्तों में दया नहीं है उन मनुष्यों के धर्म कदापि नहीं हो सकता।


मूलं धर्मतरोराद्या व्रतानां धाम सम्पदाम्।
गुणानां निधिरित्यङ्घ्रिदया कार्या विवेकिभिः॥३८॥

अर्थ: धर्मरूपी वृक्ष की जड़ तथा समस्त व्रतों में मुख्य और सर्व संपदाओं का स्थान तथा गुणों का खजाना यह दया है इसलिए विवेकी मनुष्यों को यह दया अवश्य करनी चाहिए।


सर्वे जीवदयाधारा गुणास्तिष्ठति मानुषे।
सूत्राधाराः प्रसूनानां हाराणां च सरा इव॥३९॥

अर्थ: जिस प्रकार फूलों के हारों की लड़ी सूत्र के आश्रय से रहती हैं उसी प्रकार मनुष्य में समस्त गुण जीवदया के आधार से रहते हैं। इसलिए समस्त गुणों की स्थिति के अभिलाषी भव्य जीवों को यह दया अवश्य करनी चाहिए।


यतीनां श्रावकाणां च व्रतानि सकलान्यपि।
एकाऽहिंसाप्रसिद्ध्यर्थं कथितानि जिनेश्वरैः॥४०॥

अर्थ: जितने मुनियों के व्रत तथा श्रावकों के व्रत सर्वज्ञदेव ने कहे हैं वे सर्व अहिंसा की प्रसिद्धि के लिए ही कहे हैं किन्तु हिंसा का पोषण करने वाला उनमें कोई भी व्रत नहीं कहा गया है। इसलिए व्रती मनुष्यों को समस्त प्राणियों पर दया ही रखनी चाहिए।


जीवहिंसादिसंकल्पैरात्मन्यपि हि दूषिते।
पापं भवति जीवस्य न परं परपीडनात्॥४१॥

अर्थ: केवल अन्य प्राणियों को पीड़ा देने से ही पाप की उत्पत्ति नहीं होती कि “उस जीव को मारूँगा अथवा वह जीव मर जावे तो अच्छा हो” इत्यादि जीव हिंसा के संकल्पों से जिस समय आत्मा मलिन होता है उस समय भी पाप की उत्पत्ति होती है। इसलिए उत्तम मनुष्यों को जीव हिंसा का संकल्प भी नहीं करना चाहिए।


द्वादशापि सदा चिन्त्या अनुप्रेक्षा महात्मभिः।
तद्भावना भवत्येव कर्मणः क्षयकारणम्॥४२॥

अर्थ: उत्तम पुरुषों को बारह भावनाओं का सदा चिंतन करना चाहिए क्योंकि उन भावनाओं का चिंतन समस्त कर्मों का नाश करने वाला होता है।


अध्रुवाशरणे चैव भव एकत्वमेव च।
अन्यत्वमशुचित्वं च तथैवास्त्रवसंवरौ॥४३॥

निर्जरा च तथा लोको बोधिदुर्लभधर्मता।
द्वादशैता अनुप्रेक्षा भाषिता जिनपुङ्गवैः॥४४॥

अर्थ (श्लोक 43 से 44): १.अध्रुव, २. अशरण, ३. संसार, ४. एकत्व, ५. अन्यत्व, ६. अशुचित्व, ७. आस्रव, ८. संवर, ९. निर्जरा, १०. लोक, ११. बोधिदुर्लभ, १२. धर्म, ये बारह अनुप्रेक्षा जिनेन्द्रदेव ने कही हैं।


अनित्य भावना के स्वरूप का वर्णन


अध्रुवाणि समस्तानि शरीरादीनि देहिनाम्।
तन्नाशेऽपि न कर्तव्यः शोको दुष्कर्मकारणम्॥४५॥

अर्थ: प्राणियों के समस्त शरीर, धन-धान्य आदि पदार्थ विनाशीक हैं। इसलिए उनके नष्ट होने पर जीवों को कुछ भी शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि उस शोक से केवल खोटे कर्मों का बंध होता है।


अशरण भावना के स्वरूप का वर्णन


व्याघ्रेणाघ्रातकायस्य मृगशावस्य निर्जने।
यथा न शरणं जन्तोः संसारे न तथापदि॥४६॥

अर्थ: जिस मृग के बच्चे का शरीर व्याघ्र ने प्रबल रीति से पकड़ लिया है ऐसे मृग के बच्चे को जिस प्रकार निर्जन वन में कोई बचाने के लिए समर्थ नहीं है उसी प्रकार इस संसार में आपत्ति के आने पर जीव को भी कोई इन्द्र, अहमिन्द्र आदि नहीं बचा सकते। इसलिए भव्य जीवों को सिवाय धर्म के किसी को भी रक्षक नहीं समझना चाहिए।


संसार भावना का स्वरूप


यत्सुखं तत्सुखाभासं यद्दुःखं तत्सदाञ्जसा।
भवे लोक सुखं सत्यं मोक्ष एव स साध्यताम्॥४७॥

अर्थ: हे जीव संसार में जो सुख मालूम होता है वह सुख नहीं है सुखाभास है अर्थात् सुख के समान मालूम पड़ता है और जो दुख है सो सत्य है किन्तु वास्तविक सुख मोक्ष में ही है इसलिए तुझे मोक्ष की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए।


एकत्व भावना का स्वरूप


स्वजनो वा परो वापि नो कश्चित्परमार्थतः।
केवलं स्वार्जितं कर्म जीवेनैकेन भुज्यते॥४८॥

अर्थ: यदि निश्चय रीति से देखा जावे तो संसार में जीव का न तो कोई स्वजन है और न कोई परजन ही है तथा यह जीव अपने किए हुए कर्म के फल को अकेला ही भोगता है।


अन्यत्व भावना का स्वरूप


क्षीरनीरवदेकत्र स्थितयोर्देहदेहिनोः ।
भेदो यदि ततोऽन्येषु कलत्रादिषु का कथा॥४९॥

अर्थ: शरीर और आत्मा की स्थिति दूध तथा जल के समान मिली हुई है। यदि ये दोनों भी परस्पर में भिन्न हैं तो सर्वथा भिन्न स्त्री, पुत्र आदि तो अवश्य ही भिन्न हैं। इसलिए विद्वानों को शरीर, स्त्री, पुत्र आदि को अपना कदापि नहीं मानना चाहिए।


अशुचित्व भावना का वर्णन


तथाऽशुचिरयं कायः कृमिधातुमलान्वितः।
यथा तस्यैव सम्पर्कादन्यत्राप्यपवित्रता॥५०॥

अर्थ: कीड़ा, धातु, मल-मूत्र आदि अपवित्र पदार्थों से भरा हुआ यह शरीर इतना अपवित्र है कि उसके सम्बन्ध से दूसरी वस्तु भी अपवित्र हो जाती है।


आस्रवभावना का स्वरूप


जीवपोतो भवाम्भोधौ मिथ्यात्वादिकरन्ध्रवान्।
आस्रवति विनाशार्थं कर्माम्भः प्रचुरं भ्रमात्॥५१॥

अर्थ: इस संसाररूपी समुद्र में जिस समय यह जीवरूपी जहाज मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय, योगरूप छिद्रों से सहित होता है उस समय यह अपने विनाश के लिए अज्ञानता से प्रचुर कर्मरूपी जल को आस्रवरूप करता है।


संवर का स्वरूप


कर्मास्रवनिरोधोऽत्र संवरो भवति ध्रुवम्।
साक्षादेतदनुष्ठानं मनोवाक्कायसंवृतिः॥५२॥

अर्थ: आये हुए कर्मों का जो रुक जाना है वही निश्चय से संवर है तथा मन, वचन, काय का जो संवरण (स्वाधीन) करना है यही संवर का आचरण है।


निर्जरा के स्वरूप का वर्णन


निर्जरा शातनं प्रोक्ता पूर्वोपार्जितकर्मणाम्।
तपोभिर्बहुभिः सा स्याद्वैराग्याश्रितचेष्टितैः॥५३॥

अर्थ: पहले संचित हुए कर्मों का जो एकदेशरूप से नाश होना है वही निर्जरा है तथा वह निर्जरा संसार, देह आदि से वैराग्य कराने वाले अनशन, अवमौदर्यादि तप से होती है।


लोकानुप्रेक्षा का स्वरूप


लोकः सर्वोऽपि सर्वत्र सापायास्थितिरध्रुवः।
दुःखकारीति कर्तव्या मोक्ष एव मतिः सताम्॥५४॥

अर्थ: यह समस्त लोक विनाशीक और अनित्य है तथा नाना प्रकार के दुखों का करने वाला है ऐसा विचार कर उत्तम पुरुषों को सदा मोक्ष की ओर ही बुद्धि लगानी चाहिए।


बोधिदुर्लभ भावना का स्वरूप


रत्नत्रयपरिप्राप्तिर्बोधिः सातीवदुर्लभा।
लब्ध्वा कथं कथञ्चिच्चेत्कार्यो यत्नो महानिह॥५५॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्रस्वरूप रत्नत्रय की जो प्राप्ति है उसी का नाम बोधि है और इस बोधि की प्राप्ति संसार में अत्यन्त कठिन है यदि किसी रीति से उसकी प्राप्ति भी हो जावे तो उसकी रक्षा के लिए विद्वानों को प्रबल यत्न करना चाहिए।


धर्मानुप्रेक्षा का वर्णन


निजधर्मोयमत्यन्तं दुर्लभो भविनां मतः।
तथा ग्राह्यो यथा साक्षादामोक्षं सह गच्छति॥५६॥

अर्थ: संसार में प्राणियों को ज्ञानानंद स्वरूप निजधर्म का पाना अत्यन्त कठिन है इसलिए यह धर्म ऐसी रीति से ग्रहण करना चाहिए कि मोक्षपर्यंत यह साथ ही बना रहे।


दुःखग्राहगणाकीर्णे संसारक्षारसागरे।
धर्मपोतं परं प्राहुस्तारणार्थं मनीषिणः॥५७॥

अर्थ: नाना प्रकार के दुखरूपी नक्र मकर से व्याप्त इस संसाररूपी खारी समुद्र से पार करने वाला धर्मरूपी जहाज है ऐसा गणधर आदि महापुरुष कहते हैं। इसलिए संसार से तरने की इच्छा करने वाले भव्य जीवों को इस धर्मरूपी जहाज का आश्रय अवश्य लेना चाहिए।


अनुप्रेक्षा इमाःसद्भिः सर्वदा हृदये धृताः।
कुर्वते तत्परं पुण्यं हेतुर्यत्स्वर्गमोक्षयोः॥५८॥

अर्थ: जो सज्जन पुरुष बार-बार इन बारह भावनाओं का चिंतन करते हैं वे उस पुण्य का उपार्जन करते हैं जो पुण्य स्वर्ग तथा मोक्ष का कारण है। इसलिए स्वर्ग, मोक्ष के कारण स्वरूप पुण्य को चाहने वाले भव्य जीवों को सदा इन बारह भावनाओं का चिंतन करना चाहिए।


आद्योत्तमक्षमा यत्र यो धर्मो दशभेदभाक्।
श्रावकैरपि सेव्योऽसौ यथाशक्ति यथागमम्॥५९॥

अर्थ: उत्तमक्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य तथा ब्रह्मचर्य, इस प्रकार इन दस धर्मों का भी श्रावकों को शक्ति के अनुसार तथा शास्त्र के अनुसार पालन अवश्य करना चाहिए।


अन्तस्तत्त्वं विशुद्धात्मा बहिस्तत्त्वं दयाङ्गिषु।
द्वयोः सन्मीलने मोक्षस्तस्माद् द्वितयमाश्रयेत्॥६०॥

अर्थ: चिदानन्द चैतन्यस्वरूप आत्मा तो अंतस्तत्त्व (भीतरीतत्त्व) है तथा समस्त प्राणियों में जो दया है वह बाह्य तत्त्व है और इन दोनों तत्त्वों के मिलने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए मोक्षाभिलाषी भव्य जीवों को इन दोनों तत्त्वों का भलीभाँति आश्रय करना चाहिए।


कर्मेभ्यः कर्मकार्येभ्यः पृथग्भूतं चिदात्मकम्।
आत्मानं भावयेन्नित्यं नित्यानन्दपदप्रदम्॥६१॥

अर्थ: कर्मों से तथा कर्मों के कार्यों से सर्वथा भिन्न और चिदानन्द चैतन्यस्वरूप तथा अविनाशी और आनन्द स्वरूप स्थान को देने वाले आत्मा का ज्ञानी को सदा चिंतन करना चाहिए।


इत्युपासकसंस्कारः कृतः श्रीपद्मनन्दिना।
येषामेतदनुष्ठानं तेषां धर्मोऽतिनिर्मलः॥६२॥

अर्थ: इस प्रकार श्री पद्मनन्दि आचार्य ने इस उपासक संस्कार की (श्रावकाचार की) रचना की है जिन पुरुषों की प्रवृत्ति इस श्रावकाचार के अनुसार है उन्हीं को निर्मल धर्म की प्राप्ति होती है।

७. देशव्रतोद्योतन

बाह्याभ्यन्तरसङ्गवर्जनतया ध्यानेन शुक्लेन यः
कृत्वा कर्मचतुष्टयक्षयमगात्सर्वज्ञतां निश्चितम्।
तेनोक्तानि वचांसि धर्मकथने सत्यानि नान्यानि तत्
भ्राम्यत्यत्र मतिस्तु यस्य स महापापी न भव्योऽथवा ॥१॥

अर्थ: समस्त बाह्य तथा अभ्यंतर परिग्रह को छोड़कर और शुक्लध्यान से चार घातिया कर्मों को नाशकर जिसने सर्वज्ञपना प्राप्त कर लिया है उसी सर्वज्ञदेव के वचन, धर्म के निरूपण करने में सत्य हैं, किन्तु सर्वज्ञ से अन्य के वचन सत्य नहीं हैं ऐसा भलीभाँति जानकर भी जिस मनुष्य को सर्वज्ञदेव के वचनों में सन्देह है तो समझना चाहिए वह मनुष्य महापापी तथा अभव्य है।


एकोऽप्यत्र करोति यः स्थितिमतिप्रीतः शुचौ दर्शने
स श्लाघ्यः खलु दुःखितोऽप्युदयतो दुष्कर्मणः प्राणभृत्।
अन्यैः किं प्रचुरैरपि प्रमुदितैरत्यन्तदूरीकृत-
स्फीतानन्दभरप्रदामृतमयैर्मिथ्यापथेप्रस्थितैः ॥२॥

अर्थ: खोटे कर्म के उदय से दुःखित भी जो मनुष्य संतुष्ट होकर इस अत्यन्त पवित्र सम्यग्दर्शन में निश्चल स्थिति को करता है अर्थात् सम्यग्दर्शन को धारण करता है वह अकेला ही अत्यन्त प्रशंसा के योग्य समझा जाता है किन्तु जो अत्यन्त आनन्द के देने वाले सम्यग्दर्शन आदि रत्नत्रयरूपी मोक्षमार्ग से बाह्य है तथा वर्तमान काल में शुभकर्म के उदय से प्रसन्न हैं ऐसे मिथ्यामार्ग में गमन करने वाले मिथ्यादृष्टि मनुष्य यदि बहुत से भी होवे तो भी वे प्रशंसा के योग्य नहीं हैं।


बीजं मोक्षतरोर्दृशं भवतरोर्मिथ्यात्वमाहुर्जिनाः
प्राप्तायां दृशि तन्मुमुक्षुभिरलं यत्नो विधेयो बुधैः ।
संसारे बहुयोनिजालजटिले भ्राम्यन् कुकर्मावृतः
क्व प्राणी लभते महत्यपि गते काले हि तां तामिह ॥३॥

अर्थ: मोक्षरूपी वृक्ष का बीज तो सम्यग्दर्शन है तथा संसाररूपी वृक्ष का बीज मिथ्यात्व है ऐसा सर्वज्ञदेव ने कहा है इसलिए मोक्षाभिलाषी उत्तमपुरुषों को सम्यग्दर्शन के पाने पर उसकी रक्षा करने में अत्यन्त प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि नरक, तिर्यञ्च आदि नाना प्रकार की योनियों से व्याप्त इस संसार में अनादि काल से भ्रमण करता हुआ और खोटे कर्मों से युक्त यह प्राणी बहुत काल के व्यतीत होने पर भी इस सम्यग्दर्शन को कहाँ पा सकता है? अर्थात् सम्यग्दर्शन का पाना अत्यन्त दुर्लभ है।


सम्प्राप्तेऽत्र भवे कथं कथमपि द्राघीयसाऽनेहसा
मानुष्ये शुचिदर्शने च महता१ कार्यं तपो मोक्षदम्।
नो चेल्लोकनिषेधतोऽथ महतो मोहादशक्तेरथ
सम्पद्येत न तत्तदा गृहवतां षट्कर्मयोग्यं व्रतम्॥४॥

अर्थ: अनंत काल के बीत जाने पर इस संसार में बड़ी कठिनता से मनुष्य जन्म के मिलने पर तथा सम्यग्दर्शन के प्राप्त होने पर उत्तम पुरुषों को मोक्ष को देने वाला तप अवश्य करना चाहिए। यदि लोक निन्दा से अथवा प्रबल चारित्र मोहनीय कर्म के उदय से वा असमर्थपने से तप न हो सके तो गृहस्थों के देवपूजा, गुरुसेवा, स्वाध्याय आदि षट्कर्मों के योग्य व्रत तो अवश्य ही करना चाहिए।


दृङ् मूलव्रतमष्टधा तदनु च स्यात्पञ्चधाणुव्रतं
शीलाख्यं च गुणव्रतं त्रयमतः शिक्षाश्चतस्रः पराः।
रात्रौ भोजनवर्जनं शुचिपटात्पेयं पयः शक्तितः
मौनादिव्रतमप्यनुष्ठितमिदं पुण्याय भव्यात्मनाम्॥५॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनपूर्वक आठ मूलगुणों का पालना तथा अहिंसादि पाँच अणुव्रतों का धारण करना और दिग्व्रत आदि तीन गुणव्रत तथा देशावकाशिक आदि चार प्रकार के शिक्षाव्रत इस प्रकार इन सात शील व्रतों को पालना और रात में खाद्य, स्वाद्य आदि आहारों का त्याग करना और स्वच्छ कपड़े से छाने हुए जल का पीना तथा शक्ति के अनुकूल मौन आदि व्रतों का धारण, इस प्रकार ये श्रावकों के व्रत हैं तथा भलीभाँति आचरण किए हुए ये श्रावकों के व्रत भव्य जीवों को पुण्य करने वाले होते हैं। इसलिए धर्मात्मा श्रावकों को इन श्रावकों के व्रतों का अवश्य ही ध्यानपूर्वक पालन करना चाहिए।


हन्ति स्थावरदेहिनः स्वविषये सर्वांस्त्रसान् रक्षति
ब्रूते सत्यमचौर्यवृत्तिमबलां शुद्धां निजां सेवते१।
दिग्देशव्रतदण्डवर्जनमतः सामायिकं प्रोषधं
दानं भोगयुगं प्रमाणमुररीकुर्याद् गृहीति व्रती॥६॥

अर्थ: व्रती श्रावक अपने प्रयोजन के लिए स्थावरकाय के जीवों को मारता है तथा दो इन्द्रिय को आदि लेकर सैनी पचेंद्री पर्यंत समस्त त्रस जीवों की रक्षा करता है और सत्य बोलता है तथा अचौर्यव्रत का पालन करता है और स्वस्त्री का सेवन करता है तथा दिग्व्रत, देशव्रत, अनर्थदण्डव्रत का पालन करता है और सामायिक, प्रोषधोपवास तथा दान को करता है और भोगोपभोगपरिमाण नामक व्रत को स्वीकार करता है।


देवाराधनपूजनादिबहुषु व्यापारकार्येषु सत्-
पुण्योपार्जनहेतुषु प्रतिदिनं संजायमानेष्वपि।
संसारार्णवतारणे प्रवहणं सत्पात्रमुद्दिश्य यत्
तद्देशव्रतधारिणो धनवतो दानं प्रकृष्टो गुणः॥७॥

अर्थ: यद्यपि धनवान और धर्मात्मा श्रावकों के श्रेष्ठ पुण्य के संचय करने वाले जिनेन्द्रदेव की सेवा तथा पूजन, प्रतिष्ठा आदि प्रतिदिन अनेक उत्तम कार्य होते रहते हैं तथापि उन सब उत्तम कार्यों में संसार समुद्र से पार करने में जहाज के समान श्रेष्ठ मुनि आदि पात्रों को जो दान देना है वह उन धर्मात्मा श्रावकों का सबसे प्रधान गुण (कर्त्तव्य) है। इसलिए भव्य श्रावकों को सदा उत्तम आदि पात्रों का दान देना चाहिए।


सर्वो वाञ्छति सौख्यमेव तनुभृत्तन्मोक्ष एव स्फुटं
दृष्ट्यादित्रय एव सिध्यति स तन्निर्ग्रन्थ एव स्थितम्।
तद्वृत्तिर्वपुषोऽस्य वृत्तिरशनात्तद्दीयते श्रावकैः
काले क्लिष्टतरेऽपि मोक्षपदवी प्रायस्ततो वर्तते॥८॥

अर्थ: समस्त जीवों की अभिलाषा सदा यही रहा करती है कि हमको सुख मिले परन्तु यदि अनुभव किया जावे तो वास्तविक सुख मोक्ष में ही है और उस मोक्ष की प्राप्ति सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र स्वरूप रत्नत्रय के धारण करने से ही होती है और उस रत्नत्रय की प्राप्ति निर्ग्रन्थ अवस्था में ही होती है और निर्ग्रन्थ अवस्था शरीर के होने पर ही होती है तथा शरीर की स्थिति अन्न से रहती है और वह अन्न धर्मात्मा श्रावकों के द्वारा दिया जाता है। इसलिए इस दुःखमा काल में मोक्ष पदवी की प्रवृत्ति गृहस्थों के दिए हुए दान से ही होती है ऐसा जानकर धर्मात्मा श्रावकों को सदा सत्पात्रों के लिए दान देना चाहिए।


स्वेच्छाहारविहारजल्पनतया नीरुग्वपुर्जायते
साधूनां तु न सा ततस्तदपटु प्रायेण सम्भाव्यते।
कुर्यादौषधपथ्यवारिभिरिदं चारित्रभारक्षमं
यत्तस्मादिह वर्तते प्रशमिनां धर्मो गृहस्थोत्तमात्॥९॥

अर्थ: इच्छानुसार भोजन, भ्रमण तथा भाषण से शरीर रोग रहित रहता है परन्तु मुनियों के लिए न तो इच्छानुसार भोजन करने की ही आज्ञा है और न इच्छानुसार भ्रमण तथा भाषण की ही आज्ञा है। इसलिए उनका शरीर सदा अशक्त ही बना रहता है किन्तु धर्मात्मा श्रावक गण उत्तम दवा तथा पथ्य और निर्मल जल देकर मुनियों के शरीर को चारित्र के पालन करने के लिए समर्थ बनाते हैं। इसलिए मुनिधर्म की प्रवृत्ति भी उत्तम श्रावकों से ही होती है। अतः आत्मा के हित की अभिलाषा करने वाले भव्य जीवों को अवश्य ही मुनिधर्म की प्रवृत्ति के प्रधान कारण इस गृहस्थ धर्म को धारण करना चाहिए।


ज्ञानदान की महिमा का वर्णन


व्याख्या पुस्तकदानमुन्नतधियां पाठाय भव्यात्मनां
भक्त्या यत्क्रियते श्रुताश्रयमिदं दानं तदाहुर्बुधाः।
सिद्धेऽस्मिञ्जननान्तरेषु कतिषु त्रैलोक्यलोकोत्सव
श्रीकारिप्रकटीकृताखिलजगत्केवल्यभाजो जनाः ॥१०॥

अर्थ: सर्वज्ञदेव से कहे हुए शास्त्र का भक्ति पूर्वक जो व्याख्यान किया जाता है तथा विशाल बुद्धि वाले भव्य जीवों को पढ़ने के लिए जो पुस्तक दी जाती है उसको ज्ञानी पुरुष शास्त्र (ज्ञान) दान कहते हैं तथा भव्यों को इस ज्ञानदान की प्राप्ति के होने पर थोड़े ही भवों में, तीनों लोक के जीवों को उत्सव तथा लक्ष्मी के करने वाले और समस्त लोक के पदार्थों को हाथ की रेखा के समान देखने वाले, केवलज्ञान की उत्पत्ति होती है।


अभयदान का स्वरूप


सर्वेषामभयं प्रवृद्धकरुणैर्यद्दीयते प्राणिनां
दानं स्यादभयादि तेन रहितं दानत्रयं निष्फलम्।
आहारौषधशास्त्रदानविधिभिः क्षुद्रोगजाड्याद्वयं
यत्तत्पात्रजने विनश्यति ततो दानं तदेकं परम्॥११॥

अर्थ: विस्तीर्ण करुणा के धारी भव्य जीवों द्वारा जो समस्त प्राणियों के भय को छुटाकर उनकी रक्षा की जाती है उसको ज्ञानीजन अभयदान कहते हैं तथा उस अभयदान के बिना बाकी के तीनों दान सर्वथा निष्फल हैं अथवा आहार, औषध और शास्त्र इन तीनों दान के देने से क्षुधा के भय का तथा रोग के भय का और मूर्खता के भय का ही नाश होता है। इसलिए एक अभयदान ही समस्त दान में उत्कृष्ट दान है।


चारों दानों का फल


आहारात् सुखमौषधाद्-तितरां नीरोगता जायते
शास्त्रात् पात्रनिवेदितात् परभवे पाण्डित्यमत्यद्भुतम्।
एतत्सर्वगुणप्रभापरिकरः पुंसोऽभयाद्दानतः
पर्यन्ते पुनरुन्नतोन्नतपदप्राप्तिर्विमुक्तिस्ततः॥१२॥

अर्थ: उत्तम आदि पात्रों में आहार दान के देने से तो इन्द्र, धरणेन्द्र, चक्रवर्ती आदि के सुखों की प्राप्ति होती है तथा औषधदान के देने से परभव में अत्यन्त रूपवान तथा नीरोग शरीर मिलता है और शास्त्रदान के देने से अत्यन्त आश्चर्य को करने वाली विद्वत्ता की प्राप्ति होती है और अभयदान के देने से सुख तथा नीरोगपना आदि समस्त गुणों की प्राप्ति होती है। अन्त में उत्तमोत्तम चक्रवर्ती आदि पदों की प्राप्ति होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए उत्तमोत्तम सुख, नीरोगता आदि गुणों के अभिलाषी मनुष्यों को अवश्य ही चारों प्रकार का दान देना चाहिए।


दान से ही दान का व्यय किया जाये


कृत्वा कार्यशतानि पापबहुलान्याश्रित्य खेदं परं
भ्रान्त्वा वारिधिमेखलां वसुमतीं दुःखेन यच्चार्जितम्।
तत्पुत्रादपि जीवितादपि धनं प्रेयोऽस्य पन्था शुभो
दानं तेन च दीयतामिदमहो नान्येन तत्सद्गतिः॥१३॥

अर्थ: सैकड़ों पाप सहित कार्यों को करके तथा नाना प्रकार के दुखों को उठा करके और समुद्र, पर्वत, पृथ्वी पर भ्रमण करके बड़े कष्ट से धन का संचय किया जाता है तथा वह धन, पुत्र और अपने जीवन से भी प्यारा होता है। उस धन के खर्च करने का यदि मार्ग है तो यही है कि वह दान के काम में लाया जावे किन्तु इससे भिन्न उस धन के खर्च करने का कोई भी उत्तम मार्ग नहीं। इसलिए सज्जन पुरुषों को चाहिए कि वे दान मार्ग से ही धन का व्यय करें किन्तु दान से अतिरिक्त मार्ग में उस धन का उपयोग न करें।


दानेनैव गृहस्थता गुणवती लोकद्वयोद्योतिका
सैव स्यान्ननु तद्विना धनवतो लोकद्वयध्वन्सकृत्।
दुर्व्यापारशतेषु सत्सु गृहिणः पापं यदुत्पद्यते
तन्नाशाय शशाङ्कशुभ्रयशसे दानं न चान्यत्परम्॥१४॥

अर्थ: धनी मनुष्यों का गृहस्थपना दान से ही गुणों का करने वाला होता है और दान से ही दोनों लोकों का प्रकाश करने वाला होता है किन्तु बिना दान के वह गृहस्थपना दोनों लोकों का नाश करने वाला ही है क्योंकि गृहस्थों के सैकड़ों खोटे-खोटे व्यापारों के करने से सदा पाप की उत्पत्ति होती रहती है उस पाप के नाश के लिए तथा चन्द्रमा के समान यश की प्राप्ति के लिए यह एक पात्र दान ही है दूसरी कोई वस्तु नहीं है। इसलिए अपनी आत्मा के हित को चाहने वाले भव्यों को चाहिए कि वे पात्रदान से ही गृहस्थपने को तथा धन को सफल करें।


पात्राणामुपयोगि यत्किल धनं तद्धीमतां मन्यते
येनानन्तगुणं परत्र सुखदं व्यावर्तते तत्पुनः।
यद्भोगाय गतं पुनर्धनवतस्तन्नष्टमेव ध्रुवं
सर्वासामिति सम्पदां गृहवतां दानं प्रधानं फलम्॥१५॥

अर्थ: जो धन उत्तमादि पात्रों के उपयोग में आता है विद्वान् लोग उसी धन को अच्छा धन समझते हैं तथा वह पात्र में दिया हुआ धन परलोक में सुख का देने वाला होता है और अनन्तगुणा फलता है किन्तु जो धन नाना प्रकार के भोग विलासों में खर्च होता है वह धनवानों का धन सर्वथा नष्ट ही हो गया ऐसा समझना चाहिए क्योंकि गृहस्थों के सर्व सम्पदाओं का प्रधान फल एक दान ही है।


पुत्रे राज्यमशेषमर्थिषु धनं दत्त्वाभयं प्राणिषु
प्राप्ता नित्यसुखास्पदं सुतपसा मोक्षं पुरा पार्थिवाः।
मोक्षस्यापि भवेत्ततः प्रथमतो दानं निदानं बुधैः
शक्त्या देयमिदं सदातिचपले द्रव्ये तथा जीविते॥१६॥

अर्थ: भूतकाल में भी बड़े-बड़े राजा पुत्रों को राज्य देकर तथा याचक जनों को धन देकर और समस्त प्राणियों को अभयदान देकर अनशन आदि उत्तम तपों को आचरण कर अविनाशी सुख के स्थान मोक्ष को प्राप्त हुए हैं इसलिए मोक्ष का सबसे प्रथम कारण यह एक दान ही है अर्थात् दान से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। अतः विद्वानों को चाहिए कि धन तथा जीवन को जल के बबूले के समान अत्यन्त विनाशीक समझकर सर्वदा शक्ति के अनुसार उत्तम आदि पात्रों में दान दिया करें।


ये मोक्षं प्रति नोद्यताः सुनृभवे लब्धेऽपि दुर्बुद्धयः
ते तिष्ठन्ति गृहे न दानमिह चेत्तन्मोहपाशो दृढः।
मत्वेदं गृहिणा यथर्द्धि विविधं दानं सदा दीयतां
तत्संसारसरित्पतिप्रतरणे पोतायते निश्चितम्॥१७॥

अर्थ: अत्यन्त दुर्लभ इस मनुष्य भव को पाकर भी जो मनुष्य मोक्ष के लिए उद्यम नहीं करते हैं तथा घर में ही पड़े रहते हैं वे मनुष्य मूढ़ बुद्धि हैं और जिस घर में दान नहीं दिया जाता वह घर अत्यन्त कठिन मोह का जाल है। ऐसा भलीभाँति समझकर अपने धन के अनुसार भव्य जीवों को नाना प्रकार का दान अवश्य करना चाहिए क्योंकि यह उत्तम आदि पात्रों में दिया हुआ दान ही संसाररूपी समुद्र से पार करने में जहाज के समान है।


यैर्नित्यं न विलोक्यते जिनपतिर्न स्मर्यते नार्च्यते
न स्तूयेत न दीयते मुनिजने दानं च भक्त्या परम्।
सामर्थ्ये सति तद्गृहस्थाश्रमपदं पाषाणनावा समं
तत्रस्था भवसागरेऽतिविषमे मज्जन्ति नश्यन्ति च ॥१८॥

अर्थ: जो मनुष्य समर्थ होने पर भी निरन्तर न तो भगवान् का दर्शन ही करते हैं तथा न उनका स्मरण ही करते हैं और उनकी पूजा भी नहीं करते हैं तथा न उनका स्तवन करते हैं और न निर्ग्रन्थ मुनियों को भक्ति पूर्वक दान ही देते हैं उन मनुष्यों का वह गृहस्थाश्रमरूप स्थान पत्थर की नाव के समान है तथा उस गृहस्थाश्रम में रहने वाले गृहस्थ इस भयंकर संसाररूपी समुद्र में नियम से डूबते हैं और डूबकर नष्ट हो जाते हैं। इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि जो भव्य जीव गृहस्थाश्रम को तथा अपने जीवन और धन को पवित्र करना चाहते हैं उनको जिनेन्द्र देव की पूजा, स्तुति आदि कार्य तथा उत्तमादि पात्रों के लिए दान अवश्य ही देना चाहिए।


चिन्तारत्नसुरद्रुकामसुरभिस्पर्शोपलाद्या भुवि
ख्याता एव परोपकारकरणे दृष्टा न ते केनचित्।
तैरत्रोपकृतं न केषुचिदपि प्रायो न सम्भाव्यते
तत्कार्याणि पुनः सदैव विदधद्दाता परं दृश्यते॥१९॥

अर्थ: चिन्तामणि रत्न, कल्पवृक्ष, कामधेनु, पारस पत्थर आदिक पदार्थ संसार में परोपकारी हैं यह बात आज तक सुनी ही है किन्तु किसी ने अभी तक ये साक्षात् उपकार करते हुए देखे नहीं हैं। तथा उन्होंने किसी का उपकार किया है इस बात की भी संभावना नहीं की जाती परन्तु चिन्तामणि रत्न आदि के कार्य को करने वाला दाता (मनोवांछित दान देने वाला) अवश्य देखने में आता है। इसलिए चिन्तामणि रत्न, कल्पवृक्ष आदि उत्कृष्ट पदार्थ दाता ही हैं किन्तु इनसे भिन्न चिंतामणि आदिक कोई पदार्थ नहीं हैं।


यत्र श्रावकलोक एव वसति स्यात्तत्र चैत्यालयो
यस्मिन् सोऽस्ति च तत्र सन्ति यतयो धर्मश्च तैर्वर्तते।
धर्मे सत्यघसंचयो विघटते स्वर्गापवर्गाश्रयं
सौख्यं भावि नृणां ततो गुणवतां स्युः श्रावकाः सम्मताः॥२०॥

अर्थ: जिस नगर तथा देश में श्रावक लोग रहते हैं वहाँ पर जिन मंदिर होता है और जहाँ पर जिनमंदिर होता है वहाँ पर यतीश्वर निवास करते हैं और जहाँ पर यतीश्वरों का निवास होता है वहाँ पर धर्म की प्रवृत्ति रहती है तथा जहाँ पर धर्म की प्रवृत्ति रहती है वहाँ पर अनादिकाल से संचय किए हुए प्राणियों के पापों का नाश होता है तथा भाविकाल में स्वर्ग तथा मोक्ष के सुखों की प्राप्ति होती है इसलिए गुणवान मनुष्यों को धर्मात्मा श्रावकों का अवश्य आदर करना चाहिए।


काले दुःखमसंज्ञके जिनपतेर्धर्मे गते क्षीणतां
तुच्छे सामयिके जने बहुतेरे मिथ्यान्धकारे सति
चैत्ये चैत्यगृहे च भक्ति सहितो यः सोऽपि नो दृश्यते
यस्तत्कारयते यथाविधि पुनर्भव्यः स वन्द्यः सताम्॥२१॥

अर्थ: इस दुःखमा काल में जिनेन्द्र भगवान् के धर्म के क्षीण होने से तथा आत्मा के ध्यान करने वाले मुनिजनों की विरलता से और गाढ़ मिथ्यात्वरूपी अंधकार के फैल जाने से जो जिनेन्द्र भगवान् की प्रतिमा में तथा जिनमन्दिरों में भक्ति सहित थे तथा उनको भक्ति पूर्वक बनवाते थे वे मनुष्य इस समय देखने में नहीं आते हैं किन्तु जो भव्य जीव इस समय भी विधि के अनुसार उन जिनमन्दिर आदि कार्यों को करता है वह सज्जनों का वंद्य ही है अर्थात् समस्त उत्तम पुरुष उसकी निर्मल हृदय से स्तुति करते हैं।


बिम्बाङ्गुलोन्नतियवोन्नतिमेव भक्त्या ये कारयन्ति जिनसद्म जिनाकृतिं वा।
पुण्यं तदीयमिह वागपि नैव शक्ता स्तोतुं परस्य किमु कारयितुर्दृढस्य॥२२॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं जो भव्यजीव इस संसार में भक्ति पूर्वक यदि छोटे से छोटे बिम्ब (कुन्दुक) पत्ते के समान जिनमन्दिर तथा यव (जौ) के समान जिनप्रतिमा को भी बनावे तो उस मनुष्य को भी इतने पुण्य की प्राप्ति होती है कि जिसको और की तो क्या बात? साक्षात् सरस्वती भी वर्णन नहीं कर सकती किन्तु जो मनुष्य ऊँचे-ऊँचे जिनमन्दिर तथा जिनप्रतिमाओं का बनाने वाला है उसको तो फिर अगम्य पुण्य की ही प्राप्ति होती है।


यात्राभिःस्नपनैर्महोत्सवशतैः पूजाभिरुल्लोचकैः
नैवेद्यैर्बलिभिर्ध्वजैश्च कलशैस्तौर्यत्रिकैर्जागरैः।
घण्टाचामरदर्पणादिभिरपि प्रस्तार्य शोभां परां
भव्याःपुण्यमुपार्जयन्ति सततं सत्यत्र चैत्यालये॥२३॥

अर्थ: इस संसार में चैत्यालय के होने पर भव्य जीव यात्रा से कलशाभिषेकों से और सैकड़ों बड़े उत्सवों से और पूजा तथा चाँदनियों से और नैवेद्य से, बलि से तथा ध्वजाओं के आरोपण से, कलशारोहण से और अत्यन्त शब्दों के करने वाले बाजों से तथा घंटा, चँवर, दर्पण आदिक से उन चैत्यालयों की उत्कृष्ट शोभा को बढ़ाकर पुण्य का संचय कर लेते हैं इसलिए भव्य जीवों को चैत्यालय का निर्माण अवश्य ही कराना चाहिए।


ते चाणुव्रतधारिणोऽपि नियतं यान्त्येव देवालयं
तिष्ठन्त्येव महर्द्धिकामरपदं तत्रैव लब्ध्वा चिरम्।
अत्रागत्य पुनः कुलेऽति महति प्राप्य प्रकृष्टं शुभान्
मानुष्यं च विरागतां च सकलत्यागं च मुक्तास्ततः ॥२४॥

अर्थ: जो षट् आवश्यक पूर्वक अणुव्रत के धारण करने वाले श्रावक हैं वे नियम से स्वर्ग को जाते हैं तथा वहाँ पर महान् ऋद्धि के धारी देव होकर चिरकाल तक निवास करते हैं और पीछे वे इस मृत्युलोक में आकर शुभकर्म के योग से अत्यन्त उत्तम कुल में मनुष्य जन्म को पाकर तथा वैराग्य को धारण कर समस्त बाह्य तथा अभ्यंतर परिग्रह का नाशकर सीधे सिद्धालय को पधारते हैं तथा वहाँ पर अनन्त सुख के भोगने वाले होते हैं। इस प्रकार जब अणुव्रत आदि भी मुक्ति के कारण हैं तो भव्यों को चाहिए कि वे षट् आवश्यक पूर्वक अणुव्रतों को प्रयत्न से धारण करें।


पुंसोऽर्थेषु चतुर्षु निश्चलतरो मोक्षः परं सत्सुखः
शेषास्तद्विपरीतधर्मकलिता हेया मुमुक्षोरतः।
तस्मात्तत्पदसाधनत्वधरणो धर्मोऽपि नो सम्मतो
यो भोगादिनिमित्तमेव स पुनः पापं बुधैर्मन्यते॥२५॥

अर्थ: चारों पुरुषार्थों में मनुष्य के लिए अविनाशी तथा उत्तम सुख का भंडार केवल मोक्ष पुरुषार्थ है किन्तु मोक्ष के अतिरिक्त अर्थ, काम आदि पुरुषार्थ विपरीत धर्म के भजने वाले हैं इसलिए वे मोक्षाभिलाषी को सर्वथा त्यागने योग्य हैं तथा धर्म नामक पुरुषार्थ यदि मोक्ष का कारण होवे तो वह अवश्य ग्रहण करने योग्य है किन्तु यदि वही पुरुषार्थ नाना प्रकार के भोग विलासों का कारण होवे तो वह भी सर्वथा नहीं मानने योग्य है तथा ऐसे भोगविलास के कारण धर्म पुरुषार्थ को ज्ञानीजन पाप ही कहते हैं।


भव्यानामणुभिर्व्रतैररणुभिः साध्योऽत्र मोक्षः परं
नान्यत्किञ्चिदिहैव निश्चयनयाज्जीवः सुखी जायते।
सर्वं तु व्रतजातमीदृशधिया साफल्यमेत्यन्यथा
संसाराश्रयकारणं भवति यत्तद्दुःखमेव स्फुटम्॥२६॥

अर्थ: भव्यजीव अणुव्रत तथा महाव्रत को मोक्ष की प्राप्ति के लिए ही धारण करते हैं किन्तु उनके धारण करने से उनको अन्य कोई भी वस्तु साध्य नहीं है क्योंकि निश्चयनय से जीव को सुख की प्राप्ति मोक्ष में ही होती है तथा मोक्ष की प्राप्ति के लिए जो अणुव्रत, महाव्रत आदि व्रत आचरण किए जाते हैं वे सफल समझे जाते हैं किन्तु जो व्रत मोक्ष की प्राप्ति के लिए नहीं हैं संसार के ही कारण हैं वे दुख स्वरूप ही हैं यह भलिभाँति स्पष्ट है। इसलिए भव्य जीवों को मोक्ष के लिए ही व्रतों को धारण करना चाहिए।


यत्कल्याणपरम्परार्पणपरं भव्यात्मनां संसृतौ
पर्यन्ते यदनन्तसौख्यसदनं मोक्षं ददाति ध्रुवम्।
तज्जीयादतिदुर्लभं सुनरतामुख्यैर्गुणैः प्रापितं
श्रीमत्पद्मनन्दिभिर्विरचितं देशव्रतोद्योतनम्॥२७॥

अर्थ: जो देशव्रतोद्योतन संसार में भव्य जीवों को इन्द्र, चक्रवर्ती आदि समस्त कल्याणों का देने वाला है और सबसे अंत में अनन्त सुखों का भंडार जो मोक्ष उसका देने वाला है तथा जिसकी प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ जो मनुष्यपना आदि अनेक गुण उनसे होता है और जिसकी रचना श्री पद्मनन्दि नामक आचार्य ने ही की है ऐसा वह व्रतोद्योतन चिरकाल तक इस संसार में जयवंत रहे।

८. सिद्ध स्तुति

सूक्ष्मत्वादणुदर्शिनोऽवधिदृशः पश्यन्ति नो यान् परे
यत्संविन्महिमस्थितं त्रिभुवनं स्वच्छं भमेकं यथा।
सिद्धानामहप्रमेयमहसां तेषां लघुर्मानुषो
मूढात्मा किमु वच्मि तत्र यदि वा भक्त्या महत्या वशः॥१॥

अर्थ: परमाणु पर्यन्त सूक्ष्म पदार्थों को देखने वाले भी अवधि ज्ञानी पुरुष अत्यन्त सूक्ष्म जिन सिद्धों को नहीं देख सकते हैं तथा जिनकी ज्ञान की महिमा में ये तीनों लोक निर्मल नक्षत्र के समान स्थित मालूम पड़ते हैं और जो अपरिमित तेज के धारी हैं उन सिद्धों की स्तुति को मैं अत्यन्त छोटा मनुष्य तथा अज्ञानी किस प्रकार कर सकता हूँ ? अर्थात् मैं उनकी स्तुति करने में समर्थ नहीं हूँ तो भी प्रबल भक्ति से प्रेरित हुआ मैं उनकी स्तुति करता हूँ।


निःशेषामरशेखराश्रितमणिश्रेण्यर्चिताङ्घ्रिद्वया
देवास्ते ऽपि जिना यदुन्नतपदप्राप्त्यै यतन्ते तराम्।
सर्वेषामुपरि प्रवृद्धपरमज्ञानादिभिः क्षायिकैः
युक्ता न व्यभिचारिभिः प्रतिदिनं सिद्धान् नमामो वयम्॥२॥

अर्थ: समस्त प्रकार के देवों के मुकुटों में लगी हुई जो मणि उनसे जिनके चरणों के युग्म पूजित हैं ऐसे उत्कृष्टदेव तीर्थंकर भी जिस उच्चपद-सिद्धपद की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं ऐसे समस्त लोक के शिखर पर विराजमान तथा कलंक रहित अत्यन्त विस्तीर्ण ज्ञान आदि क्षायिक गुणों के धारी सिद्धों को प्रतिदिन हम नमस्कार करते हैं।


ये लोकाग्रविलम्बिनस्तदधिकं धर्मास्तिकायं विना
नो याताः सहजस्थिरामलमलसद्ग्बोधसन्मूर्तयः।
संप्राप्ताः कृतकृत्यतामसदृशाः सिद्धा जगन्मङ्गलं
नित्यानन्दसुधारसस्य च सदा पात्राणि ते पान्तु वः॥ ३॥

अर्थ: जो सिद्ध भगवान् लोक के अग्रभाग में विराजमान हैं तथा जो धर्मास्तिकाय की सहायता से लोक के अग्रभाग में गये हैं और जिनका स्वरूप स्वाभाविक तथा निश्चल जो निर्मल ज्ञान और दर्शन उससे शोभायमान है और जो कृतकृत्य है और जिनकी उपमा को कोई भी धारण नहीं कर सकता और जो समस्त जगत् का मंगल करने वाले हैं तथा जो अविनाशी आनन्दरूपी अमृत के पात्र हैं ऐसे सिद्ध भगवान् आपकी रक्षा करें अर्थात् ऐसे सिद्ध भगवान् के लिए मेरा सदा नमस्कार है।


ये जित्वा निजकर्मकर्कशरिपून् प्राप्ताः पदं शाश्वतं
येषां जन्मजरामृतिप्रभृतिभिः सीमापि नोल्लंघ्यते।
येष्वैश्वर्यमचिन्त्यमेकमसमज्ञानादिसंयोजितं
ते सन्तु त्रिजगच्छिखाग्रमणयः सिद्धा मम श्रेयसे॥४॥

अर्थ: जो सिद्ध महाराज अपने समस्त कठोर कर्मरूपी बैरियों को जीतकर अविनाशी सिद्धपद को प्राप्त हुए हैं और जन्म, जरा, मरण आदिक अठारह दोष जिनके पास भी नहीं फटकने पाते तथा जो अनन्तज्ञानादि से किए हुए अचिंत्य ऐश्वर्य के धारी हैं वे तीन जगत् के शिखामणि सिद्ध भगवान् मेरे कल्याण के लिए हों अर्थात् ऐसे सिद्धों को मैं नमस्कार करता हूँ।


सिद्धो१ बोधमिति स बोध उदितो ज्ञेयप्रमाणो भवद्
ज्ञेयं लोकमलोकमेव च वदत्यात्मेति सर्वस्थितः।
मूषायां मदनोज्झिते हि जठरे यादृङ् नभस्तादृशः
प्राक्कायात्किमपि प्रहीण इति वा सिद्धः सदानन्दति॥५॥

अर्थ: निष्कलंक वह शुद्धात्मा तो ज्ञान प्रमाण कहा गया है और वह ज्ञान ज्ञेय (पदार्थ) प्रमाण है तथा वे ज्ञेय लोकालोक प्रमाण हैं इसलिए इस युक्ति से तो आत्मा समस्त जगह पर मौजूद है अर्थात् व्यापक है किन्तु मनुष्याकार एक मोम को पुतली बनाकर तथा उसके ऊपर मिट्टी का लेप चढ़ाकर, और उस पुतली को तपाकर मोम निकल जाने के पीछे जो उस मूषा में पुरुषाकार आकाश रह जाता है उसी प्रकार सिद्धावस्था के प्रथम शरीर से कुछ कमती आत्म प्रदेशों के आकाश स्वरूप भी वह शुद्धात्मा है अर्थात् अव्यापक भी है इसलिए व्यापकत्व, अव्यापकत्व ऐसे दोनों धर्मों से संयुक्त सिद्ध परमेष्ठी सदा जयवंत हैं।


दृग्बोधौ परमौ तदावृतिहतेः सौख्यं च मोहक्षयात्
वीर्यं विघ्नविघाततोऽप्रतिहतं मूर्तिर्न नामक्षतेः।
आयुर्नाशवशान्न जन्ममरणे गोत्रे न गोत्रं विना
सिद्धानां न च वेदनीयविरहाद्दुःखं सुखं चाक्षजम्॥६॥

अर्थ: ज्ञानावरण तथा दर्शनावरण के नाश हो जाने से तो सिद्धों के अनन्त ज्ञान तथा अनन्त दर्शन हैं और मोहनीय कर्म के सर्वथा क्षय हो जाने के कारण उनको अनन्त सुख की प्राप्ति हुई है और वीर्यान्तराय कर्म के नाश हो जाने के कारण उनको अनन्त वीर्य की प्राप्ति हुई है तथा नाम कर्म के अभाव से उनकी कोई मूर्ति नहीं है और आयु कर्म के नाश हो जाने के कारण न उनके जन्म न मरण हैं तथा गोत्र कर्म का नाश हो गया है इसलिए उनको कोई गोत्र भी नहीं है और वेदनीय कर्म के नाश हो जाने के कारण सिद्धों के इन्द्रियजन्य सुख-दुख भी नहीं हैं।


यैर्दुःखानि समाप्नुवन्ति विधिवज्जानन्ति पश्यन्ति नो
वीर्यं नैव निजं भजन्त्यसुभृतो नित्यं स्थिताः संसृतौ।
कर्माणि प्रहतानि तानि महता योगेन यैस्ते सदा
सिद्धा नित्यचतुष्टयामृतसरिन्नाथा भवेयुर्न किम्॥७॥

अर्थ: संसार में जिन कर्मों की कृपा से संसारी जीव नाना प्रकार के दुखों को सहन करते हैं तथा वास्तविक रीति से पदार्थों के स्वरूप को न तो जानते हैं और न देखते ही हैं तथा जिन कर्मों की कृपा से जीव सामर्थ्य को भी नहीं प्राप्त करते हैं उन कर्मों को जिन्होंने दुर्धर्ष ध्यान के द्वारा जड़ से नष्ट कर दिया है वे सिद्ध भगवान् क्या अनन्त विज्ञान आदि अनन्त चतुष्टयरूपी अमृत नदी के स्वामी (समुद्र) अर्थात् अनन्त चतुष्टय के धारी नहीं हैं? अवश्य ही हैं।


एकाक्षाद्बहुकर्मसंवृतमतेर्द्व्यक्षादिजीवाः सुख-
ज्ञानाधिक्ययुता भवन्ति किमपि क्लेशोपशान्तेरिह।
ये सिद्धास्तु समस्तकर्मविषमध्वान्तप्रबन्धच्युताः
सद्बोधाः सुखिनश्च ते कथमहो न स्युस्त्रिलोकाधिपाः॥८॥

अर्थ: बहुत कर्मों से छिपा हुआ है ज्ञान जिनका ऐसे एकेन्द्री जीवों की अपेक्षा अब कुछ दुखों की शान्ति से दो इन्द्री आदिक जीव अधिक सुखी तथा अधिक ज्ञानवान हैं तो जो समस्त कर्मरूपी भयंकर अंधकार के सम्बन्ध से रहित हैं और जो तीनों लोकों के स्वामी हैं ऐसे सिद्ध भगवान् क्यों नहीं सबकी अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ ज्ञान के धारी तथा अधिक सुखी होंगे।


यः केनाप्यतिगाढगाढमभितो दुःखप्रदैः प्रग्रहैः
बद्धोऽन्यैश्च नरो रुषा घनतरैरापादमामस्तकम्।
एकस्मिन् शिथिलेऽपि तत्र मनुते सौख्यं स सिद्धाः पुनः
किं न स्युः सुखिनः सदा विरहिता बाह्यान्तरैर्बन्धनैः॥९॥

अर्थ: कोई मनुष्य किसी मनुष्य को, क्रोध से अत्यन्त दुख के देने वाले तथा कठिन बन्धनों से पैर से लगाकर मस्तक पर्यन्त चारों ओर से बांधे उस बन्धन की यदि एक भी रस्सी ढीली हो जावे तो वह बंधा हुआ भी जीव सुख मानता है फिर जो समस्त बाह्य तथा अभ्यन्तर परिग्रह के बन्धन से रहित हैं ऐसे सिद्ध भगवान् क्यों नहीं सुखी होंगे? अर्थात् अवश्य ही होंगे।


सर्वज्ञः कुरुते परं तनुभृतः प्राचुर्यतः कर्मणां
रेणूनां गणनं किलाधिवसतामेकं प्रदेशं घनम्।
इत्याशास्वखिलासु बद्धमहसो दुःखं न कस्माद् भवेत्
मुक्त्या यस्य तु सर्वतः किमिति नो जायेत सौख्यं परम् ॥१०॥

अर्थ: आत्मा के एक प्रदेश में सघन रीति से व्याप्त इतने अधिक परमाणु हैं कि उनकी गिनती सर्वज्ञ को छोड़कर दूसरा कोई नहीं कर सकता इस रीति से आत्मा के प्रदेश पर अनन्तानन्त परमाणु के चिपटने के कारण जिस आत्मा का तेज चारों ओर से रुक गया है अर्थात् न जो आत्मा भलीभाँति पदार्थों को जान ही सकता है और न देख ही सकता है ऐसे उस आत्मा को क्यों नहीं दुख होगा? अवश्य ही होगा। किन्तु जिसने समस्त कर्मों को जड़ से उखाड़ दिया है अर्थात् जिसकी आत्मा के प्रदेशों के साथ किसी भी कर्म का बन्धन नहीं है ऐसे सिद्ध भगवान् को तो अनन्त सुख क्यों नहीं होगा ? अवश्य ही होगा।


येषां कर्मनिदानजन्यविविधक्षुत्तृण्मुखा व्याधयः
तेषामन्नजलादिकौषधगणस्तच्छान्तये युज्यते।
सिद्धानान्तु न कर्म तत्कृतरुजो नातः किमन्नादिभिः
नित्यात्मोत्थसुखामृताम्बुधिगतास्तृप्तास्त एव ध्रुवम्॥११॥

अर्थ: जिन जीवों के कर्म के उदय से उत्पन्न हुए क्षुधा-तृषा आदिक रोग हैं उन जीवों को उन रोगों की शान्ति के लिए अन्न, जल आदि का आश्रय करना पड़ता है किन्तु सिद्ध भगवान् के तो कर्म ही नहीं है तथा कर्मों के अभाव से उनको अन्न, जल आदि का आश्रय भी नहीं करना पड़ता। इसलिए निश्चय से अविनाशी और आत्मा से ही उत्पन्न हुए ऐसे सुखरूपी अमृत समुद्र में मग्न सिद्ध ही अत्यन्त तृप्त है ऐसा समझना चाहिए।


सिद्धज्योतिरतीवनिर्मलतरज्ञानैकमूर्तिं स्फुरद्
वर्तिर्दीपमिवोपसेव्य लभते योगी स्थिरं तत्पदम्।
सद्बुद्ध्याथ विकल्पजालरहितस्तद्रूपतामापतं
तादृग्जायत एव देवविनुतस्त्रैलोक्यचूडामणिः॥१२॥

अर्थ: जिस प्रकार बत्ती स्फुरायमान दीपक के संग से दीपपने को प्राप्त हो जाती है उसी प्रकार अत्यन्त निर्मल जो ज्ञान उस ज्ञानस्वरूप स्फुरायमान है मूर्ति जिसकी ऐसी सिद्ध ज्योति की आराधना करने से मुनिगण भी उस स्थिर सिद्ध पद को प्राप्त हो जाते हैं अथवा समस्त प्रकार के विकल्पों से रहित होकर जो योगीश्वर श्रेष्ठ बुद्धि से उन सिद्धों के स्वरूप को प्राप्त होकर उनके स्वरूप का ध्यान करता है वह भी समस्त देवों में वंदनीय तथा तीन लोक का चूड़ामणि उन सिद्धों के समान हो जाता है।


यत्सूक्ष्मं च महच्च शून्यमपि यन्नो शून्यमुत्पद्यते
नश्यत्येव च नित्यमेव च तथा नास्त्येव चास्त्येव यत्।
एकं यद्यदनेकमेव तदपि प्राप्तं प्रतीतिं दृढां
सिद्धज्योतिरमूर्त्ति चित्सुखमयं केनापि तल्लभ्यते॥१३॥

अर्थ: जो सिद्ध ज्योति सूक्ष्म भी है और महान् भी है, शून्य भी है तथा शून्य नहीं भी है, विनाशीक भी है और नित्य भी है और है भी, नहीं भी है तथा एक भी है, अनेक भी है इस प्रकार अनेक धर्म को लिए हुए है तो भी स्याद्वाद से जिसकी प्रतीति दृढ़ है ऐसी अमूर्तिक तथा ज्ञान, सुख स्वरूप सिद्धों की ज्योति (तेज) को संसार में कोई मनुष्य ही प्राप्त कर सकता है, सब नहीं।


स्याच्छब्दामृतगर्भितागममहारत्नाकरस्नानतो
धौता यस्य मतिः स एव मनुते तत्त्वं विमुक्तात्मनः।
तत्तस्यैव तदेव याति सुमतेः साक्षादुपादेयतां
भेदेन स्वकृतेन तेन च विना स्वं रूपमेकं परम्॥१४॥

अर्थ: जिस पुरुष की बुद्धि स्याद्वादरूपी जल से भरे हुए विस्तीर्ण सागर में स्नान करने से निर्मल हो गई (धुल गई) है अर्थात् जो स्याद्वाद का जानकार है वही मनुष्य सिद्धों के स्वरूप को जानता है तथा वही बुद्धिमान् उन सिद्धों के स्वरूप को साक्षात् रीति से प्राप्त होता है अथवा अपने से किया हुआ जो भेद उसके दूर हो जाने पर अपना जो स्वरूप है वही सिद्धों का स्वरूप है अर्थात् जब तक आत्मा में मेरा-तेरा भेद रहता है तब तक तो आत्मा मलिन ही है किन्तु जिस समय यह भेदबुद्धि नष्ट हो जाती है उस समय मलिनता रहित होने के कारण अपनी आत्मा का स्वरूप ही सिद्धस्वरूप है। इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि वे स्याद्वाद के स्वरूप को भलीभाँति पहचान कर सिद्धों के स्वरूप को पहचानें।


दृष्टिस्तत्त्वविदः करोत्यविरतं शुद्धात्मरूपे स्थिता
शुद्धं तत्पदमेकमुलवणमतेरन्यत्र चान्यादृशम्।
स्वर्णात्तन्मयमेव वस्तु घटितं लोहाच्च मुक्त्यर्थिना
मुक्त्वा मोहविजृम्भितं ननु यथा शुद्धेन संचर्यताम् ॥१५॥

अर्थ: जिस प्रकार सोने से बना हुआ पात्र सुवर्ण स्वरूप ही होता है तथा लोह से बना हुआ पात्र लोहस्वरूप ही होता है उसी प्रकार शुद्ध आत्मस्वरूप में निश्चल रीति से ठहरी हुई तत्त्व ज्ञानी पुरुष की दृष्टि तो निर्मल देदीप्यमान जो एक अविनाशी मोक्षपद उसको प्राप्त कराती है और तत्त्वज्ञान रहित पुरुष की दृष्टि शुद्धात्म स्वरूप से अतिरिक्त स्थान में ठहरने के कारण मोक्ष से भिन्न जो नरक, तिर्यञ्च, निगोद आदि स्थान उन स्थानों को प्राप्त करती है। इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि मोक्ष के अभिलाषी मनुष्यों को मोह के उत्पन्न करने वाले मार्ग को छोड़कर निश्चय से शुद्धमार्ग से ही गमन करना चाहिए।


निर्दोषश्रुतचक्षुषा षडपि हि द्रव्याणि दृष्ट्वा सुधी-
रादत्ते विशदं स्वमन्यमिलितं स्वर्णं यथा धावकः।
यः कश्चित् किल निश्चिनोति रहितः शास्त्रेण तत्त्वं परं
सोऽन्धो रूपनिरूपणं हि कुरुते प्राप्तो मनः शून्यताम् ॥१६॥

अर्थ: जिस प्रकार सुनार अन्य धातुओं से मिले हुए भी सुवर्ण को नेत्रों से जुदा कर लेता है उसी प्रकार विद्वान् पुरुष निष्कलंकशास्त्ररूपी नेत्र से छहों द्रव्यों को भलीभाँति देखकर अन्य द्रव्यों से मिले हुए भी अपने निर्मल आत्मस्वरूप को जुदाकर ग्रहण करते हैं किन्तु जो मनुष्य शास्त्र के बिना देखे ही उत्कृष्ट तत्त्व का निश्चय करते हैं वे मन रहित तथा अंधे होकर रूप को देखना चाहते हैं ऐसा मालूम होता है।


यो हेयेतरबोधसंभृतमतिर्मुञ्चन् स हेयं परं
तत्त्वं स्वीकुरुते तदेव कथितं सिद्धत्वबीजं जिनैः।
नान्यो भ्रान्तिगतः स्वतोऽथ परतो हेये परेऽर्थेऽस्य तद्
दुष्प्रापं शुचि वर्त्म येन परमं तद्धाम संप्राप्यते॥१७॥

अर्थ: जिस मनुष्य को यह वस्तु त्यागने योग्य है तथा यह वस्तु ग्रहण करने योग्य है इस प्रकार का ज्ञान है वह मनुष्य त्यागने योग्य जो वस्तु है उसको छोड़कर ग्राह्यस्वरूप को ग्रहण करता है और वह ग्राह्यस्वरूप का स्वीकार ही सिद्धपने का कारण है ऐसा श्री जिनेन्द्रदेव ने कहा है तथा जो मनुष्य त्यागने योग्य अपने से भिन्न पदार्थों में अपने आप तथा पर के उपदेश से भ्रान्त (भ्रम सहित) है उस अज्ञानी को अत्यन्त निर्मल मार्ग की प्राप्ति नहीं हो सकती और जब निर्मल मार्ग की ही प्राप्ति नहीं हुई तो वह उत्कृष्ट मोक्षस्थान भी, उसको प्राप्त नहीं हो सकता।


साङ्गोपाङ्गमपि श्रुतं बहुतरं सिद्धत्वनिष्पत्तये
येऽन्यार्थं परिकल्पयन्ति खलु ते निर्वाणमार्गच्युताः।
मार्गं चिन्तयतोऽन्वयेन तमतिक्रम्यापरेण स्फुटं
निश्शेषंश्रुतमेति तत्र विपुले साक्षाद्विचारे सति॥१८॥

अर्थ: अंग तथा उपांग सहित जितना भी शास्त्र है वह समस्त सिद्धपनेकी प्राप्ति के लिए ही है किन्तु जो अज्ञानी मनुष्य उसको अन्य प्रयोजन के लिए कल्पना करते हैं वे निश्चय से मोक्षमार्ग से भ्रष्ट हैं अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूप मोक्षमार्ग का उनको अंशमात्र भी ज्ञान नहीं है क्योंकि विचारशील होने पर परंपरा से आये हुए द्रव्यश्रुत को छोड़कर यदि वह भावश्रुत से भी मार्ग का चिंतन करे तो भी उनको स्फुट रीति से समस्त शास्त्र की प्राप्ति होती है।


निश्शेषश्रुतसम्पदः शमनिधेराराधनायाः फलं
प्राप्तानां विषये सदैव सुखिनामल्पैव मुक्तात्मनाम्।
उक्ता भक्ति वशान्मयाप्यविदुषा या सापि गीः साम्प्रतं
निःश्रेणिर्भवतादनन्तसुखतद्धामारुरुक्षोर्मम ॥१९॥

अर्थ: जिन्होंने आराधना के फल को प्राप्त कर लिया है तथा जो सदा काल सुखी हैं ऐसे सिद्धों के विषय में जो मुझ अपंडित ने भक्ति के वश से थोड़ी सी वाणी कही है अर्थात् जो कुछ भक्ति पूर्वक उनकी थोड़ी सी स्तुति की है वह थोड़ी सी ही वाणी (स्तुति) समस्त शास्त्ररूपी संपदा के धारी तथा शमी मुझ अनन्त सुखमय मोक्ष रूपी महल पर चढ़ने की इच्छा करने वाले के लिए निःश्रेणी (सीढ़ी) के समान है।


विश्वं पश्यति वेत्ति शर्म लभते स्वोत्पन्नमात्यन्तिकं
नाशोत्पत्तियुतं तथाप्यविचलं मुक्त्यर्थिनां मानसे।
एकीभूतमिदं वसत्यविरतं संसारभारोज्झितं
शान्तं जीवघनं द्वितीयरहितं मुक्तात्मरूपं महः॥२०॥

अर्थ: यद्यपि जो सिद्धस्वरूप तेज समस्त लोक को देखता है तथा समस्त लोक को जानता है और सब से अंत में होने वाले आत्मिक सुख को प्राप्त है और उत्पाद-व्यय तथा ध्रौव्य से सहित है तो भी मोक्षाभिलाषी मनुष्यों के मन में वह संसार में भार स्वरूप जो जन्म मरणादि उनसे रहित शान्त तथा ज्ञानस्वरूप और अपने से भिन्न वस्तुओं के सम्बन्ध से रहित सदा एकरूप ही विराजमान है।


त्यक्त्वा न्यासनयप्रमाणविवृतीः सर्वं पुनः कारकं
सम्बन्धं च तथा त्वमित्यहमिति प्रायान् विकल्पानपि।
सर्वोपाधिविवर्जितात्मनि परं शुद्धैकबोधात्मनि
स्थित्वा सिद्धिमुपाश्रितो विजयते सिद्धः समृद्धो गुणैः ॥२१॥

अर्थ: नाम, स्थापना आदि निक्षेपों को छोड़कर तथा नैगम आदि नय को त्यागकर और प्रत्यक्ष, परोक्ष प्रमाण के व्यापार को छोड़कर और कर्ता, कर्म, करण आदि कारकों को छोड़कर तथा समस्त सम्बन्ध को, और तू, मैं इत्यादि समस्त विकल्पों को भी छोड़कर जो सिद्ध भगवान् समस्त प्रकार के कर्म आदि उपाधियों से रहित होकर तथा शुद्ध और ज्ञानानन्द स्वरूप आत्मा में लीन होकर मोक्ष को प्राप्त हुए हैं वे समस्त अनन्त विज्ञान आदि गुणों से सदा वृद्धि को प्राप्त, सिद्ध भगवान् सदा इस लोक में विशेष रीति से जयवंत हैं अर्थात् ऐसे सिद्ध भगवान् को मैं हाथ जोड़कर विशिष्ट रीति से नमस्कार करता हूँ।


तैरेव प्रतिपद्यतेऽत्र रमणीस्वर्णादिवस्तु प्रियं
तत्सिद्धैकमहः सदन्तरदृशा मन्दैर्न यैर्दृश्यते।
ये तत्तत्त्वरसप्रभिन्नहृदया-स्तेषामशेषं पुनः
साम्राज्यं तृणवद्वपुश्च परवद्भोगाश्च रोगा इव ॥२२॥

अर्थ: जिन मनुष्यों ने अंतरंग दृष्टि से उस अलौकिक सिद्धस्वरूप तेज को नहीं देखा है उन्हीं मूर्ख मनुष्यों को स्त्री, सुवर्ण आदिक पदार्थ प्रिय मालूम पड़ते हैं किन्तु जिन भव्य जीवों का हृदय उन सिद्धों के स्वरूप रूपी रस से भिद गया है वे भव्य जीव समस्त साम्राज्य को तृण के समान जानते हैं तथा शरीर को पर (बैरी) समझते हैं और उनको भोग, रोग के समान मालूम होते हैं।


वन्द्यास्ते गुणिन-स्त एव भुवने धन्यास्त एव ध्रुवं
सिद्धानां स्मृतिगोचरं रुचिवशान्नामापि यैर्नीयते।
ये ध्यायन्ति पुनः प्रशस्तमनसस्तान् दुर्गभूभृद्दरी-
मध्यस्थाः स्थिरनासिकाग्रिमदृशस्तेषां किमु ब्रूमहे ॥२३॥

अर्थ: जो मनुष्य प्रीतिपूर्वक सिद्धों के नाम का भी स्मरण करते हैं वे मनुष्य भी जब संसार में वंदन योग्य तथा गुणी और धन्य समझे जाते हैं तब जो मनुष्य पवित्र चित्त से किले, पर्वतों की गुफा के मध्य में बैठकर तथा नाक के अग्रभाग में दृष्टि लगाकर उन सिद्धों का ध्यान तथा उनके स्वरूप का मनन चिंतन करते हैं आचार्य कहते हैं उनकी हम क्या कहें? अर्थात् वे उनसे भी अधिक धन्य हैं। इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि वे उन सिद्धों के स्वरूप का भलीभाँति ध्यान करें यदि ध्यान न हो सके तो उनके नाम को अवश्य ही स्मरण करें।


यः सिद्धे परमात्मनि प्रविततज्ञानैकमूर्त्तौ किल
ज्ञानी निश्चयतः स एव सकलप्रज्ञावतामग्रणी।
तर्कव्याकरणादिशास्त्रसहितैः किं तत्र शून्यैर्यतो
यद्योगं विदधाति वेध्यविषये तद्बाणमावर्ण्यते ॥२४॥

अर्थ: विस्तीर्ण ज्ञान ही है एक स्वरूप जिनका ऐसे सिद्धों में जो पुरुष ज्ञानी है अर्थात् सिद्धों के स्वरूप का जो भलीभाँति जानने वाला है वास्तविक रीति से वही समस्त विद्वानों में मुख्य है ऐसा समझना चाहिए और यदि न्यायशास्त्र तथा व्याकरण आदि शास्त्रों के जानकार भी हुए तथा हृदय से शून्य ही रहे तो उनसे कोई प्रयोजन नहीं क्योंकि जो वेधने योग्य पदार्थ में निशान को करता है वही बाण कहलाता है।


सिद्धात्मा परमः परं प्रविलसद्बोधः प्रबुद्धात्मना
येनाज्ञायि स किं करोति बहुभिः शास्त्रैर्बहिर्वाचकैः।
यस्य प्रोद्गतरुचिरुज्जवलतनुर्भानुः करस्थो भवेत्
ध्वान्तध्वंसविधौ स किं मृगयते रत्नप्रदीपादिकान् ॥२५॥

अर्थ: प्रबुद्ध है आत्मा जिसकी ऐसे जिस भव्य जीव ने देदीप्यमान ज्ञान के धारी तथा सर्वोत्कृष्ट ऐसे सिद्ध भगवान् के स्वरूप को जान लिया है उस भव्य जीव को बाह्य शास्त्रों से क्या प्रयोजन है? अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं क्योंकि जिस मनुष्य के हाथ में जिसकी किरण उदित हो रही है ऐसा प्रकाशमान सूर्य मौजूद है वह मनुष्य अंधकार के नाश करने के लिए क्या रत्न तथा प्रदीप आदि पदार्थों का अन्वेषण करता है? कदापि नहीं।


सर्वत्र च्युतकर्मबन्धनतया सर्वत्र सद्दर्शनाः
सर्वत्राखिलवस्तुजातविषयव्यासक्तबोधत्विषः।
सर्वत्र स्फुरदुन्नतोन्नतसदानंदात्मका निश्चलाः
सर्वत्रैव निराकुलाः शिवसुखं सिद्धाः प्रयच्छन्तु नः॥२६॥

अर्थ: जिन सिद्धों के समस्त आत्म प्रदेशों से कर्म बंध छूट गया है तथा जिनके समस्त आत्म प्रदेशों में समीचीन दर्शन मौजूद है अर्थात् जो सम्यग्दर्शन के धारी हैं और समस्त पदार्थों के समूह को जानने वाली सम्यग्ज्ञानरूपी किरण जिनके समस्त आत्म प्रदेशों में व्याप्त है तथा जिनके सर्वत्र सर्वोत्कृष्ट चिदानंद स्वरूप तेज स्फुरायमान है और जो निश्चल तथा निराकुल है ऐसे सिद्ध भगवान् हमारे लिए मोक्षसुख को प्रदान करें।


आत्मोत्तुङ्गगृहं प्रसिद्धबहिराद्यात्मप्रभेदक्षणं
बह्वात्माध्यवसानसंगतलसत्सोपानशोभान्वितम् ।
तत्रात्मा विभुरात्मनात्मसुहृदो हस्तावलम्बी समा-
रुह्यानन्दकलत्रसंगतभुवं सिद्धः सदा मोदते॥२७॥

अर्थ: जहाँ पर बहिरात्मा तथा अंतरात्मा के भेद को वास्तविक रीति से देख सकते हैं और जो आत्मा का अध्यवसान (चिंतन) रूप जो मनोहर सीढ़ी उससे शोभायमान है ऐसा यह आत्मारूपी ऊँचा मकान है उस पर चढ़कर आत्मरूपी मित्र का अवलम्बी अर्थात् अपने को स्वयं आप ही आधार तथा चिदानंदस्वरूप स्त्री से सहित प्रभु आत्मा जो सिद्ध है सदा हर्ष संयुक्त निवास करता है।


सैवैका सुगतिस्तदेव च सुखं ते एव दृग्बोधने
सिद्धानामपरं यदस्ति सकलं तन्मे प्रियं नेतरत्।
इत्यालोच्य दृढं त एव च मया चित्ते धृताः सर्वदा
तद्रूपं परमं प्रयातु मनसा हित्वाभयं भीषणम्॥२८॥

अर्थ: जो सिद्धों की गति है वही तो एक सुगति है तथा जो उनका सुख है वही वास्तविक सुख है और वे सिद्ध ही सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञान हैं इसलिए ये तथा इनसे भिन्न और भी जो सिद्धों का स्वरूप है वह समस्त मुझे प्रिय है किन्तु इनसे अतिरिक्त और मुझे कुछ भी प्रिय नहीं है ऐसा मन में दृढ़ श्रद्धान करके मैंने सर्वकाल उन्हीं सिद्धों का ध्यान किया है। इसलिए मन से समस्त भयंकर संसार का भय छूटकर मुझे उत्कृष्ट उन्हीं सिद्धों के स्वरूप की प्राप्ति हो ऐसी आशा सहित हूँ।


ते सिद्धा परमेष्ठिनो न विषया वाचामतस्तान् प्रति
प्रायो वच्मि यदेव तत्खलु नभस्यालेख्यमालिख्यते।
तन्नामापि मुदे स्मृतं तत इतो भक्त्याथ वाचालित-
स्तेषां स्तोत्रमिदं तथापि कृतवानम्भोजनन्दी मुनिः ॥२९॥

अर्थ: इस अधिकार को समाप्त करते हुए आचार्य कहते हैं कि वे अलौकिक गुण के धारी भगवान् सिद्ध परमेष्ठी वचन के तो विषय ही नहीं हैं इसलिए मैं जो अनेक गुणों का स्तवन अथवा उनके विषय में कुछ वर्णन करना चाहता हूँ वह आकाश में चित्रकारी करता हूँ ऐसा मालूम होता है (अर्थात् जिस प्रकार आकाश में चित्रकारी करना कठिन बात है उसी प्रकार सिद्धपरमेष्ठी के विषय में भक्ति पूर्वक वर्णन करना अत्यन्त कठिन है) तो भी उन सिद्धों का स्मरण किया हुआ नाम भी हर्ष का करने वाला होता है। इस कारण भक्ति से वाचालित होकर मुझ पद्मनन्दि नामक मुनि ने यह उन सिद्धों की स्तुति की है।

९. आलोचना

यद्यानन्दनिधिं भवन्तममलं तत्त्वं मनो गाहते
त्वन्नामस्मृतिलक्षणो यदि महामन्त्रोऽस्त्यनन्तप्रभः।
यानं च त्रितयात्मके यदि भवेन्मार्गे भवद्दर्शिते
को लोकेऽत्र सतामभीष्टविषये विघ्नो जिनेश प्रभो॥१॥

अर्थ: हे जिनेश! हे प्रभो! सज्जनों का मन अंतरंग तथा बहिरंग मल से रहित होकर तत्त्वस्वरूप तथा वास्तविक आनन्द के निधान आपको अवगाहन (आश्रयण) करता है और यदि उनके मन में आपके नाम का स्मरणरूप अनंतप्रभा का धारी महामंत्र मौजूद है तथा आपसे प्रकट किए हुए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी मोक्षमार्ग में यदि उनका गमन है तो उन सज्जनों को अभीष्ट की प्राप्ति में किसी प्रकार का विघ्न नहीं आ सकता।


निस्सङ्गत्वमरागिताथ समता कर्मक्षयो बोधनं
विश्वव्यापि समं दृशा तदतुलानन्देन वीर्येण च।
ईदृग्देव तवैव संसृतिपरित्यागाय जातः क्रमः
शुद्धस्तेन सदा भवच्चरणयोः सेवा सतां सम्मता॥२॥

अर्थ: और भी आचार्य स्तुति करते हैं कि हे जिनेन्द्रदेव! संसार के त्याग के लिए परिग्रह रहितपना तथा रागरहितपना और समता तथा सर्वथा कर्मों का नाश और अनंतदर्शन, अनंत सुख और अनंतवीर्य के साथ समस्त लोकालोक को प्रकाश करने वाला केवलज्ञान ऐसा क्रम आपके ही हुआ था किन्तु आपसे भिन्न किसी देव के यह क्रम नहीं था इसलिए आप ही शुद्ध हैं तथा आपके चरणों की सेवा ही सज्जन पुरुषों को करने योग्य है।


यद्येतस्य दृढा मम स्थितिरभूत्त्वत्सेवया निश्चितं
त्रैलोक्येश बलीयसोऽपि हि कुतः संसारशत्रोर्जयम्।
प्राप्तस्यामृतवर्षहर्षजनकं सद्यन्त्रधारागृहं
पुंसः किं कुरुते शुचौ खरतरो मध्याह्नकालातपः॥३॥

अर्थ: हे तीनलोक के ईश यदि मेरे निश्चय से आपकी सेवा में दृढ़पना है तो मुझे अत्यन्त बलवान् भी संसाररूपी बैरी का जीतना कोई कठिन बात नहीं क्योंकि जिस मनुष्य ने जल के वर्षण से हर्ष को करने वाले उत्तम फव्वारा सहित घर को प्राप्त कर लिया है उस पुरुष का जेठ मास की अत्यन्त तीक्ष्ण भी दोपहर की धूप कुछ भी नहीं कर सकती।


यः कश्चिन्निपुणो जगत्त्रयगतानर्थानशेषांश्चिरं
सारासारविवेचनैकमनसा मीमांसते निस्तुषम्।
तस्य त्वं परमेक एव भगवन् सारो ह्यसारं परं
सर्वं मे भवदाश्रितस्य महती तेनाभवन्निर्वृतिः॥४॥

अर्थ: यह पदार्थ सार है और यह असार है इस प्रकार सारासार की परीक्षा में एकचित्त होकर जो कोई बुद्धिमान् मनुष्य तीनों लोकों के समस्त पदार्थों को बाधारहित गहरी दृष्टि से विचार करता है उस पुरुष की दृष्टि में हे भगवन्! आप ही एक सारभूत पदार्थ हैं और आपसे भिन्न समस्त पदार्थ असारभूत ही हैं अतः आपके आश्रय से ही मुझे परम संतोष हुआ है।


ज्ञानं दर्शनमप्यशेषविषयं सौख्यं तथात्यन्तिकं
वीर्यं च प्रभुता च निर्मलतरा रूपं स्वकीयं तव।
सम्यग्योगदृशा जिनेश्वर चिरात्तेनोपलब्धे त्वयि
ज्ञातं किं न विलोकितं न किमथ प्राप्तं न किं योगिभिः ॥५॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र! समस्त लोकालोक को एक साथ जानने वाला तो आपका ज्ञान है और समस्त लोकालोक को एक साथ देखने वाला आपका दर्शन है और आपके अनंत सुख और अनन्त बल हैं तथा प्रभुपना भी आपका अतिशय निर्मल है और शरीर भी आपका देदीप्यमान है इसलिए यदि योगीश्वरों ने समीचीन योगरूपी नेत्र से आपको प्राप्त कर लिया तो क्या उन्होंने न जान लिया? और क्या उन्होंने न देख लिया? तथा क्या उन्होंने न पा लिया?


त्वामेकं त्रिजगत्पतिं परमहं मन्ये जिनं स्वामिनं
त्वामेकं प्रणमामि चेतसि दधे सेवे स्तुवे सर्वदा।
त्वामेकं शरणं गतोऽस्मि बहुना प्रोक्तेन किञ्चिद्भवे-
दित्थं तद्भवतु प्रयोजनमतो नान्येन मे केनचित्॥६॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र ! आपको ही मैं तीन लोक का स्वामी मानता हूँ और आपको ही अष्टकर्मों का जीतने वाला तथा अपना स्वामी मानता हूँ और केवल आपको ही भक्ति पूर्वक नमस्कार करता हूँ और सदा आपका ही ध्यान करता हूँ तथा आपकी ही सेवा और स्तुति करता हूँ और केवल आपको ही मैं अपना शरण मानता हूँ अधिक कहने से क्या? यदि कुछ संसार में प्राप्त होवे तो यही होवे कि आपके सिवाय अन्य किसी से भी मेरा प्रयोजन न रहें।


पापं कारितवान्यदत्र कृतवानन्यैः कृतं साध्विति
भ्रान्त्याहं प्रतिपन्नवांश्च मनसा वाचा च कायेन च।
काले सम्प्रति यच्च भाविनि नवस्थानोद्गतं यत्पुन-
स्तन्मिथ्याखिलमस्तु मे जिनपते स्वं निन्दतस्ते पुरः॥७॥

अर्थ: हे जिनेश्वर ! भूतकाल में जो पाप मैंने भ्रम से, मन-वचन-काय-के द्वारा दूसरों से कराये हैं तथा स्वयं किए हैं और दूसरों को पाप करते हुए अच्छा कहा है तथा उसमें अपनी सम्मति दी है और वर्तमान में जो पाप मैं मन-वचन-काय के द्वारा दूसरों से कराता हूँ तथा स्वयं करता हूँ और अन्य को करते हुए भला कहता हूँ और भविष्यत्काल में जो मैं मन-वचन-काय से पाप कराऊँगा तथा स्वयं करूँगा और दूसरे को करते हुए अच्छा मानूँगा वे समस्त पाप आपके सामने अपनी निन्दा करने वाले मेरे सर्वथा मिथ्या हों।


लोकालोकमनन्तपर्यययुतं कालत्रयीगोचरं
त्वं जानासि जिनेन्द्र पश्यसि तरां शश्वत्समं सर्वतः।
स्वामिन् वेत्सि ममैकजन्मजनितं दोषं न किञ्चित्कुतो
हेतोस्ते पुरतः स वाच्य इति मे शुद्ध्यर्थमालोचितुम्॥८॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र! यदि तुम भूत, भविष्यत्, वर्तमान तीनों कालों के गोचर नाना पर्यायों सहित लोक तथा अलोक को चारों ओर से एक साथ जानते हो तथा देखते हो तो हे स्वामिन्! मेरे एक जन्म में होने वाले पापों को क्या तुम नहीं जानते हो? अर्थात् अवश्य ही जानते हो इसलिए अपनी स्वयं निंदा करता हुआ जो मैं आपके सामने अपने दोषों का कथन (आलोचन) करता हूँ सो केवल शुद्धि के लिए ही करता हूँ।


आश्रित्य व्यवहारमार्गमथ वा मूलोत्तराख्यान् गुणान्
साधोर्धारयतो मम स्मृतिपथप्रस्थायि यद्दूषणम्।
शुद्ध्यर्थं तदपि प्रभो तव पुरः सज्जोऽहमालोचितुं
निःशल्यं हृदयं विधेयमजडैर्भव्यैर्यतः सर्वथा॥९॥

अर्थ: व्यवहारनय को आश्रय करके और मूलगुण तथा उत्तरगुणों को धारण करने वाले मुझ मुनि को जिस दूषण का भलीभाँति स्मरण है उस दूषण की शुद्धि के अर्थ आलोचना करने के लिए हे प्रभो जिनेन्द्र! मैं आपके सामने सावधानी से बैठा हुआ हूँ क्योंकि ज्ञानवान् भव्य जीवों को सदा अपना मन माया-मिथ्या-निदान इन तीनों शल्यों से रहित ही रखना चाहिए।


सर्वोप्यत्र मुहुर्मुहुर्जिनपते लोकैरसंख्यैर्मित-
व्यक्ताव्यक्तविकल्पजालकलितः प्राणी भवेत्संसृतौ।
तत्तावद्धिरयं सदैव निचितो दोषैर्विकल्पानुगैः
प्रायश्चित्तमियत्कुतः श्रुतगतं शुद्धिर्भवत्सन्निधेः॥१०॥

अर्थ: हे भगवन्! इस संसार में समस्त जीव बारंबार असंख्यात लोक प्रमाण प्रकट तथा अप्रकट नाना प्रकार के विकल्पों से सहित हैं और जितने विकल्पों से सहित ये जीव हैं उतने ही नाना प्रकार के दुखों से सहित भी हैं किन्तु जितने विकल्प हैं उतने प्रायश्चित शास्त्र में नहीं हैं इसलिये उन समस्त असंख्यात लोकप्रमाण विकल्पों की शुद्धि आपके पास में ही होती है।


भावान्तःकरणेन्द्रियाणि विधिवत्संहृत्य बाह्याश्रया-
देकीकृत्य पुनस्त्वया सह शुचिज्ञानैकसन्मूर्तिना।
निःसङ्गः श्रुतसारसंगतमतिः शान्तो रहः प्राप्तवान्
यस्त्वां देव समीक्षते स लभते धन्यो भवत्सन्निधिम् ॥११॥

अर्थ: हे भगवन्! समस्त प्रकार के परिग्रहों से रहित और समस्त शास्त्रों का जानने वाला तथा क्रोधादि कषायों से रहित और एकान्तवासी जो भव्यजीव समस्त बाह्य पदार्थों से मन तथा इन्द्रियों को हटाकर तथा अखंड और निर्मल सम्यग्ज्ञानरूपी मूर्ति के धारी आपमें स्थिर कर आपको देखता है वह मनुष्य आपकी समीपता को प्राप्त होता है।


त्वामासाद्य पुराकृतेन महता पुण्येन पूज्यं प्रभुं
ब्रह्माद्यैरपि यत्पदं न सुलभं तल्लभ्यते निश्चितम्।
अर्हन्नाथ परं करोमि किमहं चेतो भवत्सन्निधा-
वद्यापि ध्रियमाणमप्यतितरामेतद्बहिर्धावति॥१२॥

अर्थ: पूर्वभव में कष्ट से संचय किए हुए बड़े भारी पुण्य से जिस मनुष्य ने हे भगवन्! तीन लोक के पूजनीक आपको पा लिया है उस मनुष्य को उस उत्तमपद की प्राप्ति होती है जिसको निश्चय से ब्रह्मा-विष्णु आदि भी नहीं पा सकते परन्तु हे अर्हज्जिनेन्द्र तथा हे नाथ! मैं क्या करूँ? आपके समीप में लगाया हुआ भी मेरा चित्त प्रबल रीति से बाह्य पदार्थों की ओर ही दौड़ता है।


संसारो बहुदुःखदः सुखपदं निर्वाणमेतत्कृते
त्यक्त्वार्थादि तपोवनं वयमितास्तत्रोज्झितः संशयः ।
एतस्मादपि दुष्करव्रतविधेर्नाद्यापि सिद्धिर्यतो
वातालीतरलीकृतं दलमिव भ्राम्यत्यदो मानसम् ॥१३॥

अर्थ: हे जिनेश! यह संसार तो नाना प्रकार के दुखों को देने वाला है और अवास्तविक सुख का स्थान है अथवा वास्तविक सुख का देने वाला मोक्ष है इसलिए उसी मोक्ष की प्राप्ति के लिए हमने समस्त धन-धान्य आदि परिग्रहों का त्याग किया और हम तपोवन को भी प्राप्त हुए तथा हमने समस्त प्रकार का संशय भी छोड़ दिया तथा अत्यन्त कठिन व्रत भी धारण किए किन्तु अभी तक उन कठिन व्रतों के धारण करने से भी सिद्धि की प्राप्ति नहीं हुई क्योंकि पवन के समूह से कंपाये हुये पत्ते के समान यह हमारा मन रातदिन बाह्य पदार्थों में भ्रमण करता रहता है॥१३॥


झम्पाः कुर्वदितस्ततः परिलसद्ग्राह्यार्थलाभाद्वद-
न्नित्यं व्याकुलतां परां गतवतः कार्यं विनाप्यात्मनः।
ग्रामं वासयदिन्द्रियं भवकृतो दूरं सुहृत् कर्मणः
क्षेमं तावदिहास्ति कुत्र यमिनो यावन्मनो जीवति॥१४॥

अर्थ: हे भगवन्! जो मन बाह्य पदार्थों को मनोहर मानकर उनकी प्राप्ति के लिए जहाँ-तहाँ भटकता है और जो ज्ञानस्वरूप भी आत्मा को बिना प्रयोजन सदा अत्यन्त व्याकुल करता रहता है तथा जो इन्द्रियरूपी गाँव को बसाने वाला है अर्थात् इस मन की कृपा से ही इन्द्रियों की विषयों में स्थिति होती है और जो संसार के पैदा करने वाले कर्मों का परम मित्र है अर्थात् आत्मारूपी घर में सदा कर्मों को लाता रहता है ऐसा मन जब तक जीवित रहता है तब तक मुनियों को कदापि कल्याण की प्राप्ति नहीं हो सकती।


नूनं मृत्युमुपैति यातममलं त्वां शुद्धबोधात्मकं
त्वत्तस्तेन बहिर्भ्रमत्यविरतं चेतो विकल्पाकुलम्।
स्वामिन् किं क्रियतेऽत्र मोहवशतो मृत्योर्न भीः कस्य तत्
सर्वानर्थपरंपराकृदहितो मोहः स मे वार्यताम् ॥१५॥

अर्थ: निर्मल तथा अखंड ज्ञानस्वरूप आपको पाकर मेरा मन मृत्यु को प्राप्त हो जाता है इसलिए हे जिनेन्द्र! नाना प्रकार के विकल्पों से युक्त मेरा चित्त आपसे बाह्य समस्त पदार्थों में ही निरन्तर घूमता फिरता है क्या किया जाये? क्योंकि मृत्यु से सर्व ही डरते हैं। अतः यह सविनय प्रार्थना है कि समस्त प्रकार के अनर्थों को करने वाला तथा अहितकारी इस मेरे मोह को नष्ट करो।


सर्वेषामपि कर्मणामतितरां मोहो बलीयानसौ
धत्ते चञ्चलतां बिभेति च मृतेस्तस्य प्रभावान्मनः।
नो चेज्जीवति को म्रियेत क इह द्रव्यत्वतः सर्वदा
नानात्वं जगतो जिनेन्द्र भवता दृष्टं परं पर्ययैः ॥१६॥

अर्थ: ज्ञानावरण आदि समस्त कर्मों के मध्य में मोह ही अत्यन्त बलवान् कर्म है और इसी मोह के प्रभाव से यह मन जहाँ-तहाँ चंचल होकर भ्रमण करता है और मरण से डरता है यदि यह मोह नहीं होवे तो निश्चयनय से न तो कोई जीवे और न कोई मरे क्योंकि आपने जो इस जगत् को अनेक प्रकार देखा है वह पर्यायार्थिकनय की अपेक्षा से ही देखा है द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से नहीं, इसलिए हे भगवन्! इस मेरे मोह को ही सर्वथा नष्ट कीजिये।


वातव्याप्तसमुद्रवारिलहरीसंघातवत्सर्वदा
सर्वत्रक्षणभङ्गुरं जगदिदं संचित्य चेतो मम
सम्प्राप्येतदशेषजन्मजनकव्यापारपारस्थितं
स्थातुं वाञ्छति निर्विकारपरमानन्दे त्वयि ब्रह्मणि॥१७॥

अर्थ: पवन से व्याप्त ऐसा जो समुद्र उसकी जो जल लहरी उनके समूह के समान सर्वकाल तथा सर्व क्षेत्रों में यह जगत् क्षण भर में विनाशीक है ऐसा भलीभाँति विचार कर यह मेरा मन इस समय हे जिनेन्द्र! समस्त संसार को उत्पन्न करने वाले जो व्यापार उनसे रहित होकर निर्विकार परमानन्दस्वरूप परब्रह्म जो आप हैं सो आपमें ही ठहरने की इच्छा करता है।


एनः स्यादशुभोपयोगत इतः प्राप्नोति दुःखं जनो
धर्मः स्याच्च शुभोपयोगत इतः सौख्यं किमप्याश्रयेत्।
द्वन्द्वं द्वन्द्वमिदं भवाश्रयतया शुद्धोपयोगात्पुनः
नित्यानन्दपदं तदत्र च भवानर्हन्नहं तत्र च ॥१८॥

अर्थ: जिस समय अशुभ उपयोग रहता है उस समय तो पाप की उत्पत्ति होती है तथा उस पाप से जीव नाना प्रकार के दुखों को प्राप्त होते हैं और जिस समय शुभ उपयोग रहता है उस समय धर्म (पुण्य) की उत्पत्ति होती है तथा धर्म से जीवों को सुख मिलता है और ये दोनों पाप-पुण्यरूपी द्वन्द्व संसार के ही कारण हैं अर्थात् इन दोनों से सदा संसार ही उत्पन्न होता रहता है किन्तु शुद्धोपयोग से अविनाशी तथा आनन्दस्वरूप पद की प्राप्ति होती है और हे जिनेन्द्र ! आप तो उस पद में निवास करते हैं तथा मैं शुद्धोपयोगरूपी पद में निवास करता हूँ।


यन्नान्तर्न बहिः स्थितं न च दिशि स्थूलं न सूक्ष्मं पुमान्
नैव स्त्री न नपुंसकं न गुरुतां प्राप्तं न यल्लाघवम्।
कर्मस्पर्शशरीरगन्धगणनाव्याहारवर्णोज्झितं
स्वच्छं ज्ञानदृगेकमूर्ति तदहं ज्योतिःपरं नापरम्॥१९॥

अर्थ: जो आत्मस्वरूप तेज न तो भीतर स्थित है और न बाहर स्थित है तथा न दिशा में ही स्थित है और न मोटा है न महीन है तथा आत्मारूपी तेज न तो पुल्लिंग है और न स्त्रीलिंग है तथा नपुंसकलिंग भी नहीं है और न भारी है और न हल्का है तथा जो तेज कर्म, स्पर्श, शरीर, गंध, संख्या, वचन, वर्ण से रहित है और जो निर्मल है तथा सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन स्वरूप है मूर्ति जिसकी ऐसा है उसी उत्कृष्ट तेजस्वरूप मैं हूँ किन्तु आत्मस्वरूप उत्कृष्ट तेज से भिन्न नहीं हूँ।


एतेनैव चिदुन्नतिक्षयकृता कार्यं विना वैरिणा
शश्वत्कर्मखलेन तिष्ठति कृतं नाथावयोरन्तरम्।
एषोऽहं स च ते पुरः परिगतो दुष्टोऽत्र निस्सार्यतां
सद्भावेतरनिग्रहो नयवतो धर्मः प्रभोरीदृशः॥२०॥

अर्थ: हे भगवन् ! चैतन्य की उन्नति को नाश करने वाले और बिना कारण ही सदा बैरी इस दुष्ट कर्म ने आपमें तथा मुझमें भेद डाल दिया है किन्तु कर्मशून्य अवस्था में जैसी आपकी आत्मा है वैसी ही मेरी आत्मा है तथा इस समय यह कर्म आपके सामने मौजूद है इसलिए इस दुष्ट को हटा दें क्योंकि नीतिवान् प्रभुओं का यही धर्म है कि वे सज्जनों की रक्षा करें तथा दुष्टों का नाश करें।


आधिव्याधिजरामृतप्रभृतयः सम्बन्धिनो वर्ष्मण
स्तद्भिन्नस्य ममात्मनो भगवतः किं कर्तुमीशा जडाः।
नानाकारविकारकारिण इमे साक्षान्नभोमण्डले
तिष्ठन्तोऽपि न कुर्वते जलमुचस्तत्र स्वरूपान्तरम्॥२१॥

अर्थ: हे भगवन्! नाना प्रकार के आकार तथा विकारों को करने वाले मेघ आकाश में रहते हुए भी जिस प्रकार आकाश के स्वरूप का कुछ भी हेर-फेर नहीं करते। उसी प्रकार आधि, व्याधि, जरा, मरण आदि भी मेरा कुछ नहीं कर सकते क्योंकि ये समस्त शरीर के विकार जड़ हैं तथा मेरी आत्मा ज्ञानवान् और शरीर से भिन्न है।


संसारातपदह्यमानवपुषा दुःखं मया स्थीयते
नित्यं नाथ यथा स्थलस्थितिमता मत्स्येन ताम्यन्मनः।
कारुण्यामृतसंगशीतलतरे त्वत्पादपङ्केरुहे
यावद्देव समर्पयामि हृदयं तावत्परं सौख्यवान्॥२२॥

अर्थ: हे भगवन्! जिस प्रकार जल से बाहर स्थल में बिना पानी के मछली तड़फड़ाती है उसी प्रकार संसाररूपी संताप से जिसका शरीर जल रहा है ऐसा मैं सदा दुःखित ही रहता हूँ किन्तु जब तक करुणारूपी जल के संग से जो अत्यन्त शीतल हैं ऐसे आपके चरण कमलों में मैं अपने मन को लगाता हूँ तब तक मैं अत्यन्त सुखी रहता हूँ।


साक्षग्राममिदं मनो भवति यद्बाह्यार्थसम्बन्धभाक्
तत्कर्म प्रविजृम्भते पृथगहं तस्मात्सदा सर्वथा।
चैतन्यात्तव तत्तथेति यदि वा तत्रापि तत्कारणं
शुद्धात्मन्मम निश्चयात्पुनरहि त्वय्येव देव स्थितिः॥ २३॥

अर्थ: हे भगवान् ! इन्द्रियों के समूह से सहित जो मेरा मन बाह्य पदार्थों से सम्बन्ध करता है उसी से नाना प्रकार के कर्म मेरी आत्मा के साथ आकर बंधते हैं किन्तु वास्तविक रीति से मैं उन कर्मों से सर्वकाल में तथा सर्वक्षेत्र में जुदा ही हूँ तथा आपके भी चैतन्य से भी सर्वथा वे कर्म जुदे ही हैं अथवा उस चैतन्य से कर्मों के भेद करने में आप ही कारण हैं इसलिए हे शुद्धात्मन् ! हे जिनेन्द्र ! निश्चय से मेरी स्थिति आप ही में है।


किं लोकेन किमाश्रयेण किमुत द्रव्येण कायेन किं
किं वाग्भिः किमुतेन्द्रियैः किमसुभिः किं तैर्विकल्पैरपि।
सर्वे पुद्गलपर्यया बत परे त्वत्तः प्रमत्तो भव-
न्नात्मन्नेभिरभिश्रयस्यतितरामालेन किं बन्धनम्॥२४॥

अर्थ: हे आत्मन् ! न तो मुझे लोक से काम है और न दूसरे के आश्रय से काम है तथा न तुझे द्रव्य से प्रयोजन है और न शरीर से प्रयोजन है तथा तुझे वचन और इन्द्रियों से भी कुछ काम नहीं और प्राणों से भी प्रयोजन नहीं तथा नाना प्रकार के विकल्पों से भी कुछ काम नहीं क्योंकि ये समस्त पुद्गल द्रव्य की ही पर्यायें हैं और तेरे से भिन्न हैं तो भी बड़े खेद की बात है कि तू इनको अपना मानकर आश्रय करता है सो क्या तू दृढ़ बंधन को प्राप्त नहीं होगा? अवश्य ही होगा।


धर्माधर्मनभांसि काल इति मे नैवाहितं कुर्वते
चत्वारोऽपि सहायतामुपगतास्तिष्ठन्ति गत्यादिषु।
एकः पुद्गल एव सन्निधिगतो नोकर्मकर्माकृति-
र्वैरी बन्धकृदेष सम्प्रति मया भेदासिना खण्डितः॥२५॥

अर्थ: धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, आकाशद्रव्य, कालद्रव्य ये चारों द्रव्य मेरे किसी प्रकार के अहित को नहीं करते हैं किन्तु ये चारों द्रव्य गति, स्थिति आदि कामों में सहकारी हैं इसलिए ये मेरे सहायी होकर ही रहते हैं। परन्तु नोकर्म (तीन शरीर, छह पर्याप्ति) तथा कर्म है स्वरूप जिसका ऐसा तथा समीप में रहने वाला और बंध का करने वाला एक पुद्गल ही मेरा बैरी है इसलिए उसी को इस समय मैंने भेदरूपी तलवार से खंड-खंड उड़ा दिये हैं।


रागद्वेषकृतैर्यथा परिणमेद्रूपान्तरैः पुद्गलो
नाकाशादिचतुष्टयं विरहितं मूर्त्या तथा प्राणिनाम्।
ताभ्यां कर्मघनं भवेदविरतं तस्मादियं संसृति-
स्तस्यां दुःखपरम्परेति विदुषां त्याज्यौ प्रयत्नेन तौ॥२६॥

अर्थ: जीवों के नाना प्रकार के रागद्वेष के करने वाले परिणामों से जिस प्रकार पुद्गलद्रव्य परिणमित होता है उसी प्रकार धर्म, अधर्म, आकाश तथा काल ये चार अमूर्तिक द्रव्य रागद्वेष के करने वाले परिणामों से परिणमित नहीं होते तथा उस राग-द्वेष के द्वारा प्रबल कर्मों की उत्पत्ति होती है और उस कर्म से संसार होता है तथा संसार में नाना प्रकार के दुख भोगने पड़ते हैं इसलिए कल्याण की अभिलाषा करने वाले सज्जनों को चाहिए कि वे राग तथा द्वेष को सर्वथा छोड़ दें।


किं बाह्येषु परेषु वस्तुषु मनः कृत्वा विकल्पान् बहून्
रागद्वेषमयान् मुधैव कुरुषे दुःखाय कर्माशुभम्।
आनन्दामृतसागरे यदि वसस्यासाद्य शुद्धात्मनि
स्फीतं तत्सुखमेकतामुपगतं त्वं यासि रे निश्चितम् ॥२७॥

अर्थ: हे मन ! बाह्य तथा तुझसे भिन्न जो स्त्री, पुत्र आदि पदार्थ हैं उनमें रागद्वेषस्वरूप अनेक प्रकार के विकल्पों को करके क्यों दुख के लिए तू व्यर्थ अशुभ कर्म को बांधता है। यदि तू आनंद रूपी जल के समुद्र में शुद्धात्मा को पाकर उसमें निवास करेगा, तो तू विस्तीर्ण निर्वाणरूपी सुख को अवश्य प्राप्त करेगा। इसलिए तुझे आनंद स्वरूप शुद्ध आत्मा में ही निवास करना चाहिए और उसी का ही ध्यान तथा मनन करना चाहिए।


इत्याध्याय१ हृदि स्थिरं जिन भवत्पादप्रसादात्सती
मध्यात्मैकतुलामयं जन इतः शुद्ध्यर्थमारोहति।
एवं कर्तुममी च दोषिणमितः कर्मारयो दुर्धराः
तिष्ठन्ति प्रसभं तदत्र भगवन् मध्यस्थसाक्षी भवान् ॥२८॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र ! आपके चरण कमलों की कृपा से पूर्वोक्त बातों को भलीभाँति मन में चिंतन कर जिस समय यह प्राणी शुद्धि के लिए अध्यात्मरूपी तुला (तखड़ी) पर चढ़ता है उस समय उसको दोषी बनाने के लिए कर्म रूपी भयंकर बैरी मौजूद हैं इसलिए हे भगवन् ! ऐसी दशा में आप ही मध्य में बैठकर साक्षी हैं।


द्वैतं संसृतिरेव निश्चयवशादद्वैतमेवामृतं
संक्षेपादुभयत्र जल्पितमिदं पर्यङ्ककाष्ठागतम्।
निर्गत्यादिपदाच्छनैः शबलितादन्यत्समालम्बते
यः सो ऽसंज्ञ इति स्फुटं व्यवहृतेर्ब्रह्मादिनामेति च॥२९॥

अर्थ: द्वैत सविकल्पक ध्यान तो वास्तविक रीति से संसार स्वरूप है तथा अद्वैत (निर्विकल्पक) ध्यान मोक्षस्वरूप है। यह संसार तथा मोक्ष में अंत दशा को प्राप्त संक्षेप से कथन है तथा जो मनुष्य इन दोनों में से आदि का जो द्वैतपद है उससे धीरे से हटकर अद्वैतपद को आलम्बन करता है वह पुरुष वास्तविक रीति से नाम रहित हो जाता है अथवा उसी पुरुष को व्यवहार नय से ब्रह्मा, धाता आदि नाम से पुकारते हैं।


चारित्रं यदभाणि केवलदृशो देव त्वया मुक्तये
पुंसा तत्खलु मादृशेन विषमे काले कलौ दुर्धरम्।
भक्तिर्या समभूदिह त्वयि दृढा पुण्यैः पुरोपार्जितैः
संसारार्णवतारणे जिन ततः सैवास्तु पोतो मम॥३०॥

अर्थ: हे जिनेन्द्रदेव ! जो आपने केवलज्ञानरूपी दृष्टि से मुक्ति के लिए चारित्र का वर्णन किया है उस चारित्र को इस भयंकर कलिकाल में मेरे समान मनुष्य बड़ी कठिनता से धारण कर सकता है किन्तु पूर्व काल में संचित जो पुण्य उससे जो मेरी आपमें दृढ़ भक्ति है वही, हे जिन ! मुझे संसाररूपी समुद्र से पार करने में जहाज के समान हो अर्थात् मुझे संसार समुद्र से वही भक्ति पार कर सकेगी।


इन्द्रत्वं च निगोदतां च बहुधा मध्ये तथा योनयः
संसारे भ्रमता चिरं यदखिलाः प्राप्ता मयाऽनन्तशः।
तन्नापूर्वमिहास्ति किञ्चिदपि मे हित्वा विमुक्तिप्रदां
सम्यग्दर्शनबोधवृत्तपदवीं तां देव पूर्णां कुरु॥३१॥

अर्थ: इस संसार में भ्रमणकर मैंने इन्द्रपना, निगोदपना और बीच में अन्य भी समस्त प्रकार की योनि अनंत बार प्राप्त की हैं इसलिए इन पदवियों में से कोई भी पदवी मेरे लिए अपूर्व नहीं है किन्तु मोक्षपद को देने वाली सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की पदवी अभी तक नहीं मिली है। इसलिए हे भगवन् ! यह प्रार्थना है कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की पदवी को ही पूर्ण करो।


श्रीवीरेण मम प्रसन्नमनसा तत्किञ्चिदुच्चैः पद-
प्राप्त्यर्थं परमोपदेशवचनं चित्ते समारोपितम्।
येनास्तामिदमेकभूतलगतं राज्यं क्षणध्वंसि यत्
त्रैलोक्यस्य च तन्न मे प्रियमिह श्रीमज्जिनेश प्रभो ॥३२॥

अर्थ: बाह्य तथा अभ्यंतर लक्ष्मी से शोभित ऐसे श्री वीरनाथ भगवान् ने अपने प्रसन्नचित्त से सबसे ऊँचे पद की प्राप्ति के लिए जो मेरे चित्त में उपदेश जमाया है अर्थात् उपदेश दिया है उस उपदेश के सामने क्षण भर में विनाशीक ऐसा पृथ्वी का राज्य मुझे प्रिय नहीं है यह बात तो दूर रही किन्तु हे प्रभो हे जिनेन्द्र! उस उपदेश के सामने तीन लोक का राज्य भी मुझे प्रिय नहीं है।


सूरेः पङ्कजनन्दिनः कृतमिमामालोचनामर्हता-
मग्रे यः पठति त्रिसन्ध्यममलश्रद्धानताङ्गो नरः।
योगीन्द्रैश्चिरकालरूढतपसा यत्नेन यन्मृग्यते
तत्प्राप्नोति परं पदं स मतिमानान्दसद्म ध्रुवम् ॥३३॥

अर्थ: श्रद्धा से जिसका शरीर नम्रीभूत है ऐसा जो मनुष्य श्रीपद्मनन्दि आचार्य द्वारा की गई आलोचना नाम की कृति को तीनों काल श्रीअर्हन्तदेव के सामने पढ़ता है वह बुद्धिमान मनुष्य उस पद को प्राप्त होता है जिस पद को चिरकाल पर्यन्त तपकर बड़े-बड़े मुनि घोर प्रयत्न करने पर प्राप्त करते हैं।

१०. सद्बोधचन्द्रोदय

यज्जानन्नपि बुद्धिमानपि गुरुः शक्तो न वक्तुं गिरा
प्रोक्तं चेन्न तथापि चेतसि नृणां सम्माति चाकाशवत्।
यत्र स्वानुभवस्थितेऽपि विरला लक्ष्यं लभन्ते चिरा-
त्तन्मोक्षैकनिबन्धनं विजयते चित्तत्त्वमत्यद्भुतम् ॥१॥

अर्थ: मोक्षरूपी सुख के देने वाले जिस आत्मतत्त्व को भलीभाँति जानता हुआ तथा बुद्धिमान् भी बृहस्पति वाणी से कुछ भी वर्णन नहीं कर सकता है यदि किसी रीति से वर्णन भी करे तो भी अत्यन्त विस्तीर्ण होने के कारण आकाश के समान मनुष्यों के हृदय में उसको समाविष्ट नहीं कर सकता है और स्वानुभव में स्थित होकर विरले ही प्राणी जिस आत्मतत्त्व को लक्ष्य में लाते हैं ऐसा वह अत्यन्त आश्चर्य का करने वाला आत्मतत्त्व सदा इस लोक में जयवन्त है।


नित्यानित्यतया महत्तनुतयानेकैकरूपत्ववत्
चित्तत्त्वं सदसत्तया च गहनं पूर्णं च शून्यं च यत्
तज्जीयादखिलश्रुताश्रयशुचिज्ञानप्रभाभासुरो
यस्मिन् वस्तुविचारमार्गचतुरो यः सोऽपि संमुह्यति ॥२॥

अर्थ: जो चैतन्यरूपी तत्त्व नित्य तथा अनित्यपने से और गुरु तथा लघुपने से तथा एकरूप और अनेकरूपपने से तथा सद्रूप और असद्रूपपने से अत्यन्त गहन है और जो पूर्ण तथा शून्य भी है ऐसा आत्मतत्त्व सदा इस लोक में जयवंत है जिस आत्मतत्त्व में समस्त शास्त्रों के अभ्यास से पाई हुई जो ज्ञान की प्रभा उससे देदीप्यमान तथा वास्तविक पदार्थों के विचार करने में चतुर मनुष्य भी मुग्ध हो जाता है अर्थात् उसको भी इस चैतन्य (आत्म) तत्त्व का पता नहीं लगने पाता।


सर्वस्मिन्नणिमादिपङ्कजवने रम्येऽपि हित्वा रतिं
यो दृष्टिं शुचिमुक्तिहंसवनितां प्रत्यादराद्दत्तवान्।
चेतोवृत्तिनिरोधलब्धपरमब्रह्मप्रमोदाम्बुभृत्-
सम्यक् साम्यसरोवरस्थितिजुषे हंसाय तस्मै नमः॥३॥

अर्थ: जो हंस अत्यन्त मनोहर अणिमा आदि स्वरूप कमल वन से अपनी प्रीति को हटाकर अत्यन्त पवित्र मोक्षरूपी हंसिनी में अपनी दृष्टि को देता हुआ ऐसे उस चित्त की वृत्ति के रोकने से प्राप्त हुआ जो परब्रह्म का उत्तम आनंद वही हुआ जल उससे भरा हुआ जो मनोहर समतारूपी सरोवर उसमें स्थिति करने वाले प्रिय हंस के लिये नमस्कार है।


सर्वभावविलये विभाति यत् सत्समाधिभरनिर्भररात्मनः।
चित्स्वरूपमभितः प्रकाशकं शर्मधाम नमताद्भुतं महः॥४॥

अर्थ: चारों तरफ से प्रकाशरूप तथा नाना प्रकार के कल्याणों को देने वाला और आश्चर्यकारी जो चैतन्यरूपी तेज समीचीन समाधि से जिनकी आत्मा व्याप्त है ऐसे महामुनियों के समस्त रागद्वेष आदि विभावों के नाश होने पर प्रकट होता है उस चैतन्यरूपी तेज के लिए नमस्कार होवे।


विश्ववस्तुविधृतिक्षमं लसज्जालमन्तपरिवर्जितं गिराम्।
अस्तमेत्यखिलमेकहेलया यत्र तज्जयति चिन्मयं महः ॥५॥

अर्थ: जो चैतन्यरूपी तेज समस्त पदार्थों को प्रकाशित करने वाला है और स्वयं प्रकाशस्वरूप है तथा अंत से रहित है और यदि समस्त वाणी युगपत् मिल जावें तो भी उसका वर्णन नहीं कर सकती हैं अर्थात् जो वाणी के अगोचर है ऐसा वह चैतन्यरूपी तेज सदा इस लोक में जयवंत है।


नो विकल्परहितं चिदात्मकं वस्तु जातु मनसोऽपि गोचरम्।
कर्मजाश्रितविकल्परूपिणः का कथा तु वपुषो जडात्मनः ॥६॥

अर्थ: समस्त प्रकार के विकल्पों से रहित जो चैतन्यरूपी तेज किसी भी रीति से मन के भी गोचर नहीं हो सकता, वह चैतन्यरूपी तेज कर्मों से पैदा हुए नाना प्रकार के विकल्प वही है रूप जिसका तथा जड़स्वरूप ऐसे शरीर के गोचर कब हो सकता है ? अर्थात् कदापि नहीं हो सकता।


चेतसो न वचसोऽपि गोचरस्तर्हि नास्ति भविता खपुष्पवत्।
शङ्कनीयमिदमत्र नो यतः स्वानुभूतिविषयस्ततोऽस्ति तत्॥७॥

अर्थ: यदि कोई मनुष्य इस बात की शंका करें कि चैतन्यरूपी तेज न तो मनके गोचर है और न वचन के गोचर है इसलिए आकाश के फूल के समान उसका नास्तित्व हो जायेगा तो आचार्य समाधान देते हैं कि ऐसी शंका कदापि नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह चैतन्यरूपी तत्त्व स्वानुभव से जाना जाता है इसलिए नास्तित्व न होकर उसका अस्तित्व ही है।


नूनमत्र परमात्मनि स्थितं स्वान्तमन्तमुपयाति तद्बहिः।
तं विहाय सततं भ्रमत्यदः को बिभेति मरणान्न भूतले॥८॥

अर्थ: जिस समय मन परमात्मा में स्थित होता है उस समय उस मन का नाश हो जाता है । लेकिन यदि वह मन उस परमात्मा को छोड़कर जहाँ-तहाँ बाहर भ्रमण करता है और पृथ्वीतल में मरण से कौन नहीं डरता है? अर्थात् सर्व ही डरते हैं।


तत्त्वमात्मगतमेव निश्चितं योऽन्यदेशनिहितं समीक्षते।
वस्तु मुष्टिविधृतं प्रयत्नतः कानने मृगयते स मूढधीः॥९॥

अर्थ: यदि निश्चय से देखा जावे तो चैतन्यरूपी तत्त्व आत्मा में है आत्मा से भिन्न किसी भी स्थान में नहीं है किन्तु जो मनुष्य आत्मा से भिन्न किसी दूसरे स्थान में चैतन्यरूपी तत्त्व रहता है ऐसा समझते हैं तथा जानते हैं वे मूढ़बुद्धि मनुष्य वैसा ही काम करते हैं जैसा कि मुट्ठी में रखी हुई वस्तु को वन में जाकर ढूंढ़ना।


तत्परः परमयोगसम्पदां पात्रमत्र न पुनर्बहिर्गतः।
नापरेण चलितो यथेप्सितः स्थानलाभविभवो विभाव्यते॥१०॥

अर्थ: यदि कोई मनुष्य, मार्ग तो दूसरा है परन्तु उसको छोड़कर दूसरे मार्ग से चले तो कदापि उसको अभीष्ट स्थान का लाभ नहीं हो सकता। किन्तु ठीक मार्ग पर चले तभी वह अपने अभीष्ट स्थान पर पहुँच सकता है। उसी प्रकार जो पुरुष आत्मा में आसक्त हैं वे ही मनुष्य उत्कृष्ट ध्यान के पात्र हैं, किन्तु जो मनुष्य आत्मा में आसक्त नहीं हैं, बाह्य पदार्थों में ही आसक्त हैं वे कदापि उत्कृष्ट ध्यान के पात्र नहीं और न हो ही सकते हैं इसलिए उत्कृष्ट ध्यान के प्रेमी उत्तम पुरुषों को आत्मा में अवश्य आसक्त रहना चाहिए।


साधु लक्ष्यमनवाप्य चिन्मये यत्र सुष्ठु गहने तपस्विनः।
अप्रतीतिभुवमाश्रिता जडा भान्ति नाट्यगतपात्रसन्निभाः॥११॥

अर्थ: अत्यन्त गहन ऐसे जिस चैतन्यरूपी तत्त्व में भलीभाँति लक्ष्य न देकर जो तपस्वी अज्ञानमयी भूमि के आश्रित हैं अर्थात् अज्ञानी बन रहे हैं वे तपस्वी जड़ हैं और वे नाटक के पात्र के समान शोभित होते हैं।


भूरिधर्मयुतमप्यबुद्धिमानन्धहस्तिविधिनावबुध्य यत्।
भ्राम्यति प्रचुरजन्मसंङ्कटे पातु वस्तदतिशायि चिन्महः॥१२॥

अर्थ: अज्ञानी पुरुष अंधहस्तिन्याय के समान अनेक धर्मों से सहित ऐसे चैतन्यतत्त्व को जानकर भी अनेक जन्म संकटों में भ्रमण करता है। ऐसा वह अत्यन्त अतिशय का भंडार चैतन्यरूपी तेज हमारी रक्षा करे।


कर्मबंधकलितोप्यबंधनो द्वेषरागमलिनोऽपि निर्मलः।
देहवानपि च देहवर्जितश्चित्रमेतदखिलं किलात्मनः॥१३॥

अर्थ: जो आत्मा कर्मों के बंधन से सहित होकर भी कर्म बंधन से रहित है तथा द्वेष और राग से मलिन होने पर भी जो निर्मल है और देहधारी होने पर भी जो देह से रहित है इसलिए आचार्य कहते हैं कि आत्मा का स्वरूप आश्चर्यकारी है।


निर्विनाशमपि नाशमाश्रितं शून्यमप्यतिशयेन सम्भृतम्।
एकमेव गतमप्यनेकतां तत्त्वमीदृगपि नो विरुद्ध्यते॥१४॥

अर्थ: जो अनेकान्तात्मक तत्त्व नाश रहित होने पर भी नाश से सहित है और शून्य होने पर भी संपूर्ण है (भरा हुआ है) तथा एक होने पर भी अनेक है। ऐसा होने पर भी उसमें किसी प्रकार का विरोध नहीं है।


विस्मृतार्थपरिमार्गणं यथा यस्तथा सहजचेतनाश्रितः।
स क्रमेण परमेकतां गतः स्वस्वरूपपदमाश्रयेद् ध्रुवम्॥१५॥

अर्थ: मूर्च्छित हुआ मनुष्य, जिस प्रकार सावधान होकर अपनी भूली हुई चीज को ढूँढ़ता है पीछे शान्त होकर अपने स्वरूप में स्थित होता है। उसी प्रकार जो मनुष्य अनादिकाल से भूले हुए अपने स्वाभाविक चैतन्य को आश्रय कर क्रम से साम्यभाव को धारण करता है वह मनुष्य निश्चय से आत्मस्वरूप को आश्रय करता है अर्थात् उसको आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है।


यद्यदेव मनसि स्थितं भवेत्तत्तदेव सहसा परित्यजेत्।
इत्युपाधिपरिहारपूर्णता सा यदा भवति तत्पदं तदा॥१६॥

अर्थ: जो-जो बात मन में होवे (अर्थात् जिस-जिस बात की मन में इच्छा होवे) उसी-उसी बात को सबसे पहले छोड़ देवें। इस प्रकार जिस समय में समस्त उपाधि का नाश हो जाता है उसी समय में आत्मस्वरूप की प्राप्ति हो जाती है।


संहृतेषु स्वमनोऽनिलेषु यद्भाति तत्त्वममलात्मनः परम्।
तद्गतं परमनिस्तरङ्गतामग्निरुग्र इह जन्मकानने॥१७॥

अर्थ: पाँचों इन्द्रियों के तथा मन के और श्वासोच्छ्वास के संकुचित होने पर जो आत्मा का निर्मल तथा उत्कृष्ट स्वरूप उदित होकर शोभित होता है ऐसा वह अत्यन्त निश्चल आत्मतत्त्व संसाररूपी वन के लिए भयंकर अग्नि के समान है।


मुक्त इत्यपि न कार्यमञ्जसा कर्मजालकलितोऽहमित्यपि।
निर्विकल्पपदवीमुपाश्रयन् संयमी हि लभते परं पदम्॥१८॥

अर्थ: मैं समस्त कर्मों से रहित मुक्त हूँ ऐसा भी संयमियों को नहीं मानना चाहिए तथा मैं समस्त कर्मों से सहित हूँ ऐसा भी नहीं मानना चाहिए क्योंकि निर्विकल्प पदवी को आश्रय करने वाला ही संयमी मोक्ष पद को प्राप्त होता है।


कर्मचाहमिति च द्वये सति द्वैतमेतदिह जन्मकारणम्।
एक इत्यपि मतिः सती न यत्साप्युपाधिरचिता तदङ्गभृत्॥१९॥

अर्थ: हे जीव! कर्म तथा मैं दो हूँ इस प्रकार का द्वैत भी जीवों को संसार का कारण है अर्थात् इस प्रकार के द्वैत से भी जीवों को नाना प्रकार के भवों में भ्रमण करना पड़ता है। तथा मैं एक हूँ यह भी बुद्धि ठीक नहीं क्योंकि उपर्युक्त दोनों प्रकार की बुद्धि उपाधिजन्य हैं।


संविशुद्धपरमात्मभावना संविशुद्धपदकारणं भवेत्।
सेतरेतरकृते सुवर्णतो लोहतश्च विकृतीस्तदाश्रिते ॥२०॥

अर्थ: जिस प्रकार सुवर्ण से सुवर्ण पात्र की उत्पत्ति होती है तथा लोह से लोहपात्र की उत्पत्ति होती है। उसी प्रकार शुद्ध परमात्मा की भावना करने से शुद्ध पद मोक्ष पद की प्राप्ति होती है तथा अशुद्ध भावना से अशुद्ध पद स्वर्ग-नरकादि पद की प्राप्ति होती है।


कर्मभिन्नमनिशं स्वतोऽखिलं पश्यतो विशदबोधचक्षुषा।
तत्कृतेऽपि परमार्थवेदिनो योगिनो न सुखदुःखकल्पना॥२१॥

अर्थ: समस्त कर्म मुझसे भिन्न हैं इस प्रकार निरंतर अपने दिव्य सम्यग्ज्ञान रूपी चक्षु से देखने वाले तथा परमात्मा को भली-भाँति जानने वाले योगी के कर्म से उत्पन्न सुख-दुख के होने पर भी सुख-दुख की कल्पना नहीं होती।


मानसस्य गतिरस्ति चेन्निरालम्ब एव पथि भास्वतो यथा।
योगिनो दृगवरोधकारकः सन्निधिर्न तमसां कदाचन॥२२॥

अर्थ: सूर्य के समान योगियों के मन की गति यदि निरालंब मार्ग में ही हो, तो कभी भी उनके सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान की प्रभा को रोकने वाले अंधकार की निकटता न होवे।


रुग्जरादिविकृतिर्न मेऽञ्जसा सा तनोरहमितः सदा पृथक्।
मीलितेऽपि सति खे विकारिता जायते न जलदैर्विकारिभिः॥२३॥

अर्थ: नाना प्रकार के विकारों से सहित मेघों के साथ सम्बन्ध होने पर भी जिस प्रकार आकाश में किसी प्रकार का विकार पैदा नहीं होता क्योंकि वे विकार मेघों के हैं। उसी प्रकार रोग, वृद्धावस्था आदि नाना प्रकार के विकार शरीर के विकार ही हैं मेरे (आत्मा के) विकार नहीं हैं क्योंकि शरीर से मैं सदा जुदा हूँ।


व्याधिनाङ्गमभिभूयते परं तद्गतोऽपि न पुनश्चिदात्मकः।
उच्छ्रितेन गृहमेव दह्यते वह्निना न गगनं तदाश्रितम्॥२४॥

अर्थ: यदि किसी कारण से मकान में अग्नि लग जावे तो उस अग्नि से मकान ही जलता है किन्तु उसके भीतर रहा हुआ आकाश नहीं जलता। उसी प्रकार शरीर में किसी कारण से व्याधि उत्पन्न हो जाये तो उस व्याधि से शरीर ही नष्ट होता है उसके भीतर रहे हुए आत्मा का नाश नहीं होता।


बोधरूपमखिलैरुपाधिभिर्वर्जितं किमपि यत्तदेव नः।
नान्यदल्पमपि तत्त्वमीदृशं मोक्षहेतुरिति योगनिश्चयः॥२५॥

अर्थ: समस्त प्रकार की रागद्वेष आदि उपाधियों से रहित तथा सम्यग्ज्ञान स्वरूप जो कोई वस्तु है वही हमारी है, किन्तु इससे भिन्न थोड़ी सी भी वस्तु हमारी नहीं है। इस प्रकार जो योग का निश्चय है वही मोक्ष का कारण है किन्तु इससे भिन्न योग का निश्चय मोक्ष का कारण नहीं।


योगतो हि लभते विबंधनं योगतो हि किल मुच्यते नरः।
योगवर्त्म विषमं गुरोर्गिरा बोध्यमेतदखिलं मुमुक्षुणा॥२६॥

अर्थ: ध्यान से ही तो मनुष्य बंधन को प्राप्त होता है तथा ध्यान से ही मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है। इस प्रकार यह ध्यान का मार्ग अत्यन्त कठिन है, किन्तु जो भव्यजीव मोक्ष के अभिलाषी हैं उनको यह समस्त ध्यान का मार्ग गुरु के उपदेश से समझना चाहिए।


शुद्धबोधमयमस्ति वस्तु यद्रामणीयकपदं तदेव नः।
स प्रमाद इह मोहजः क्वचित्कल्प्यते यदपरापि रम्यता॥२७॥

अर्थ: जो वस्तु शुद्धबोधस्वरूप है अर्थात् निर्मल सम्यग्ज्ञान स्वरूप है वही हमारा रमणीय स्थान है किन्तु जो मनुष्य निर्मल सम्यग्ज्ञान से अतिरिक्त भी रमणीयता है, इस बात को कहते हैं वह वास्तविक रमणीयता नहीं किन्तु वह मोहनीय कर्म से उत्पन्न हुआ प्रमाद ही है।


आत्मबोधशुचितीर्थमद्भुतं स्नानमत्र कुरुतोत्तमं बुधाः।
यन्न यात्यपरतीर्थकोटिभिः क्षालयत्यपि मलं तदन्तरम्॥२८॥

अर्थ: आचार्य उपदेश देते हैं कि हे भव्य पंडितो ! यदि तुम अपने पापों का नाश करना चाहते हो तो अत्यन्त पवित्र तथा आश्चर्य के करने वाले उत्तम इस आत्मज्ञान स्वरूपी तीर्थ में ही स्नान करो क्योंकि जो अंतरंग का मल अन्य करोड़ों तीर्थों में स्नान करने पर भी नष्ट नहीं होता है वह अंतरंग का मल इस आत्मज्ञान स्वरूप तीर्थ में एक समय स्नान करने पर ही नष्ट हो जाता है।


चित्तसमुद्रतटबद्धसेवया जायते किमु न रत्नसंचयः।
दुःखहेतुरमुतस्तु दुर्गतिः किं न विप्लवमुपैति योगिनः॥२९॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि जो पुरुष बड़े उत्साह के साथ चैतन्यरूपी समुद्र के तीर की भली-भाँति सेवा करते हैं क्या उनको सम्यग्दर्शन आदि रत्नों की प्राप्ति नहीं होती है? अवश्य ही होती है। तथा इस पाये हुए रत्न समूह से चैतन्यरूपी समुद्र की सेवा करने वाले मुनियों की क्या नाना प्रकार के दुखों को देने वाली नरक आदि खोटी गतियों का नाश नहीं होता? अवश्य ही होता है।


निश्चयावगमनस्थितित्रयं रत्नसंचितिरियं परात्मनि।
योगदृष्टिविषयीभवन्नसौ निश्चयेन पुनरेक एव हि॥३०॥

अर्थ: परमात्मा में जो निश्चय तथा ज्ञान और स्थिति हैं उन्हीं को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र कहते हैं। और केवली भगवान् की दृष्टि में ये तीनों निश्चयनय से आत्मस्वरूप ही हैं अर्थात् आत्मा से भिन्न सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र कोई पदार्थ नहीं है।


प्रेरिताः श्रुतगुणेन शेमुषीकार्मुकेण शरवद् दृगादयः।
बाह्यवेध्यविषये कृतश्रमाश्चिद्रणे प्रहतकर्मशत्रवः॥३१॥

अर्थ: जिस प्रकार संग्राम में प्रत्यंचा सहित धनुष से छोड़े हुए बाणों से समस्त बैरी नष्ट हो जाते हैं। उसी प्रकार चैतन्यरूपी संग्राम में शास्त्ररूपी प्रत्यंचा सहित बुद्धिरूपी धनुष से प्रेरित तथा बाह्य पदार्थों के वेधन करने में तत्पर जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूपी बाण हैं वे समस्त कर्मरूपी बैरियों को नष्ट करते हैं।


चित्तवाच्यकरणीयवर्जिता निश्चयेन मुनिवृत्तिरीदृशी।
अन्यथा भवति कर्मगौरवात् सा प्रमादपदवीमुपेयुषः॥३२॥

अर्थ: निश्चय करके मुनियों की जो प्रवृत्ति है वह मन-वचन-काय की प्रवृत्ति से रहित है, किन्तु वह मुनि यदि प्रमाद पदवी को प्राप्त हो जावे अर्थात् प्रमादी बन जावे तो कर्म की गुरुता से उसकी प्रवृत्ति विपरीत ही अर्थात् मन-वचन-काय से सहित ही हो जाती है।


सत्समाधिशशलाञ्छनोदयादुल्लसत्यमलबोधवारिधिः ।
योगिनोऽणुसदृशं विभाव्यते यत्र मग्नमखिलं चराचरम्॥३३॥

अर्थ: जिन योगियों के निर्मल ज्ञान में चर-अचर समस्त जगत् परमाणु के समान मालूम पड़ता है ऐसा वह योगियों का ज्ञानरूपी समुद्र, श्रेष्ठ समाधि रूप चन्द्रमा के उदय से वृद्धि को प्राप्त होता है।


कर्मशुष्कतृणराशिरुन्नतोऽप्युद्गते शुचिसमाधिमारुतात्।
भेदबोधदहने हृदि स्थिते योगिनो झटिति भस्मसाद्भवेत्॥३४॥

अर्थ: पवित्र समाधिरूपी पवन से उदय को प्राप्त, ऐसे भेदज्ञान रूपी अग्नि, योगी के हृदय में स्थित होने पर प्रबल भी कर्मरूपी सूखे तृणों का समूह शीघ्र ही भस्मीभूत हो जाता है।


चित्तमत्तकरिणा न चेद्धतो दुष्टबोधवनवह्निनाथवा।
योगकल्पतरुरेष निश्चितं वाञ्छितं फलति मोक्षसत्फलम्॥३५॥

अर्थ: यदि यह समाधिरूपी कल्पवृक्ष मन रूपी मतवाले हाथी से नष्ट न किया जाये और दुष्ट-ज्ञान (मिथ्याज्ञान) रूपी वनाग्नि से भस्म न किया जाये तो वह अवश्य ही वांछित मोक्ष रूपी श्रेष्ठ फल को देता है।


तावदेव मतिवाहिनी सदा धावति श्रुतगता पुरः पुरः।
यावदत्र परमात्मसंविदा भिद्यते न हृदयं मनीषिणः॥३६॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि जब तक चित्त परमात्मा के ज्ञान से भेद को प्राप्त नहीं होता है तभी तक बुद्धिमान् पुरुष की बुद्धि रूपी नदी सदा शास्त्रों में आगे-आगे दौड़ती चली जाती है।


यः कषायपवनैरचुम्बितो बोधवह्निरमलोल्लसद्दशः।
किं न मोहातिमिरं विखण्डयन् भासते जगति चित्रदीपकः॥३७॥

अर्थ: जिस चैतन्य रूपी दीपक का पवन ने स्पर्श नहीं किया है और जिसमें सम्यग्ज्ञान रूपी अग्नि मौजूद है तथा जिसकी दशा निर्मल और देदीप्यमान है ऐसा चैतन्य रूपी दीपक मोह रूपी अंधकार को नाश करता हुआ क्या जगत् में प्रकाशमान नहीं है? अवश्य ही है।


बाह्यशास्त्रगहने विहारिणी या मतिर्बहुविकल्पधारिणी।
चित्स्वरूपकुलसद्मनिर्गता सा सती न सदृशी कुयोषिता॥३८॥

अर्थ: जो बुद्धि अपने चैतन्यरूपी कुल-गृह उससे निकली हुई है अतएव जो बाह्य शास्त्र रूपी वन में विहार करने वाली है। और अनेक प्रकार के विकल्पों को धारण करने वाली है ऐसी वह बुद्धि उत्तम बुद्धि नहीं, किन्तु कुलटा स्त्री के समान निकृष्ट है।


यस्तुहेयमितरच्च भावयन्नाद्यतो हि परमाप्तुमीहते ।
तस्य बुद्धिरुपदेशतो गुरोराश्रयेत् स्वपदमेव निश्चलम्॥३९॥

अर्थ: जो भव्यजीव हेय तथा उपादेय पदार्थों का रात-दिन चिंतन करता है और उन दोनों में त्यागने योग्य पदार्थों को त्याग करता है। उस भव्य जीव की बुद्धि उत्तम गुरु के उपदेश से चैतन्य रूपी जो अविनाशी स्थिर पद है उसको प्राप्त होती है इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं।


सुप्त एष बहुमोहनिद्रया लंघितः स्वमवलादि पश्यति ।
जाग्रतोच्चवचसा गुरोर्गतं संगतं सकलमेव दृश्यते ॥४०॥

अर्थ: गाढ़ मोह रूपी निद्रा ने जिसके ऊपर अपना प्रभाव डाल रखा है अतएव जो मोह रूपी नींद में मग्न है वह मनुष्य अपने से भिन्न स्त्री पुत्र आदि को अपना मानता है, किन्तु जो मनुष्य जग रहा है उस मनुष्य को तो समस्त जगत् उत्तम गुरु के उपदेश से संयुक्त मात्र क्षणभंगुर ही मालूम पड़ता है।


जल्पितेन बहुना किमाश्रयेद् बुद्धिमानमलयोगसिद्धये ।
साम्यमेव सकलैरुपाधिभिः कर्मजालजनितैर्विवर्जितम्॥४१॥

अर्थ: आचार्यवर कहते हैं कि बहुत कहाँ तक कहा जाये जो पुरुष बुद्धिमान् हैं अर्थात् जिन पुरुषों को इस बात का भली-भाँति ज्ञान है कि यह पदार्थ त्यागने योग्य है और यह पदार्थ ग्रहण करने योग्य है उनको चाहिए कि वे निर्मल योग की सिद्धि के लिए नाना प्रकार के कर्मों से पैदा हुई जो नाना प्रकार की उपाधियाँ उनसे सर्वथा रहित साम्य-भाव का आश्रय करें।


नाममात्रकथया परात्मनः भूरिजन्मकृतपापसंक्षयः।
बोधवृत्तरुचयस्तु तद्गताः कुर्वते हि जगतां पतिं नरम्॥४२॥

अर्थ: परमात्मा के नाममात्र के कथन से ही अनेक जन्मों में संचय किया हुआ पापों का समूह पलभर में नष्ट हो जाता है और उस आत्मा में विद्यमान जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र रूपी रत्नत्रय है वह तो मनुष्य को जगत् का पति ही बना देता है अर्थात् परमात्म पद को प्राप्त करा देता है।


चित्स्वरूपपदलीनमानसो यः सदा स किल योगिनायकः।
जीवराशिरखिलश्चिदात्मको दर्शनीय इति चात्मसन्निभः॥४३॥

अर्थ: जिस योगी का चित्त चैतन्यरूप मोक्षपद में लगा हुआ है वही योगी समस्त योगियों में उत्तम योगी है अर्थात् योगियों का ईश्वर है और वही योगीश्वर समस्त चैतन्यस्वरूप प्राणियों को अपने समान देखता है।


अंतरङ्गबहिरङ्गयोगतः कार्यसिद्धिरखिलेति योगिना।
आसितव्यमनिशं प्रयत्नतः स्वं परं सदृशमेव पश्यता॥४४॥

अर्थ: समस्त प्रकार के कार्यों की सिद्धि अंतरंग तथा बहिरंग योग से होती है इसलिए जो योगी स्व को तथा पर को समान देखने वाला है उसको बड़े भारी प्रयत्न से रहना चाहिए।


लोक एष बहुभावभावितः स्वार्जितेन विविधेन कर्मणा।
पश्यतोऽस्य विकृतिर्जडात्मनः क्षोभमेति हृदयं न योगिनः॥४५॥

अर्थ: अपने आप पैदा किए हुए जो नाना प्रकार के कर्म उनसे यह लोक अनेक भावों से सहित है इसलिए इस जड़ स्वरूप संसार को देखते हुए भी योगी का मन कदापि क्षोभ को प्राप्त नहीं होता।


सुप्त एष बहुमोहनिद्रया दीर्घकालमविरामया जनः।
शास्त्रमेतदधिगम्य साम्प्रतं सुप्रबोध इह जायतामिति॥४६॥

अर्थ: जिसका अंत नहीं है ऐसी जो गाढ़ मोहरूपी निद्रा उससे यह लोक चिरकाल से सोया हुआ है अब इस शास्त्र को जानकर जाग्रत दशा को प्राप्त हो।


चित्स्वरूपगगने जयत्यसावेकदेशविषयापि रम्यता।
ईषदूद्गतवचःकरैः परैः पद्मनन्दिवदनेन्दुना कृता॥४७॥

अर्थ: पद्मनन्दि मुनि का जो मुख वही हुआ चन्द्रमा उससे कुछ उदय को प्राप्त ऐसी जो वचन रूपी उत्कृष्ट किरण उनसे की गई और स्वसंवेदन प्रत्यक्ष के गोचर ऐसी यह रम्यता चैतन्यत्व रूपी आकाश में चिरकाल तक जयवंत हो।


त्यक्ताशेषपरिग्रहः शमधनो गुप्तित्रयालंकृतः
शुद्धात्मानमुपाश्रितो भवति यो योगी निराशस्ततः।
मोक्षो हस्तगतोऽस्य निर्मलमतिरेतावत्तैव ध्रुवं
प्रत्यूहं कुरुते स्वभावविषमो मोहो न वैरी यदि॥४८॥

अर्थ: जिसने बाह्य तथा अभ्यंतर के भेद से समस्त परिग्रहों का नाश कर दिया है और जिसके शान्ति ही धन है तथा मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति इन तीन प्रकार की गुप्तियों से जो शोभित है और जिसको शुद्धात्मा की प्राप्ति हो गई है और जो निराश है अर्थात् जिसकी किसी भी पदार्थ में अंशमात्र भी इच्छा नहीं रही है ऐसा योगी होता है। इसीलिए निर्मल है बुद्धि जिसकी ऐसे उस योगी के यदि स्वभाव से ही कुटिल मोह रूपी बैरी उस मोक्ष की प्राप्ति में विघ्न न करता तो परिग्रह आदि के रहितपने आदि कारणों से ही मोक्ष निश्चय से हस्तगत हो जाता अर्थात् उसकी प्राप्ति बहुत शीघ्र हो जाती।


त्रैलोक्ये किमिहास्ति कोपि स सुरः किं वा नरः किं फणी
यस्माद्भीर्मम यामि कातरतया यस्याश्रयं चापदि।
उक्तं यत्परमेश्वरेण गुरुणा निश्शेषवाञ्छाभयं
भ्रान्तिक्लैशहरं हृदि स्फुरति चेच्चित्तत्त्वमत्यद्भुतम्॥४९॥

अर्थ: जो चैतन्य तत्त्व समस्त प्रकार के अभिलाषा, भय, भ्रम तथा दुखों को दूर करने वाला है और अत्यन्त आश्चर्य को करने वाला है ऐसा चैतन्य रूपी तत्त्व परमेश्वर श्रीगुरु द्वारा कहा गया, यदि मेरे हृदय में स्फुरायमान है, मौजूद है तो तीनों लोक में न तो कोई ऐसा देव है जिससे मुझे भय हो और न कोई ऐसा पुरुष तथा सर्प ही है जिससे मैं डरूँ और कातर होकर आपत्ति में किसी के सहारे जाऊँ।


तत्त्वज्ञानसुधार्णवं लहरिभिर्दूरं समुल्लासयन्
तृष्णापत्रविचित्रचित्तकमले संकोचमुद्रां दधत्।
सद्विद्याश्रितभव्यकैरवकुले कुर्वन् विकासश्रियं
योगीन्द्रोदयभूधरे विजयते सद्बोधचन्द्रोदयः॥५०॥

अर्थ: वह श्रेष्ठज्ञानी रूपी चन्द्रमा अथवा ‘सद्बोधचन्द्रोदय’ नामक अधिकार इस संसार में योगियों के जो इन्द्र अर्थात् बड़े-बड़े योगी वे ही हुए उदयाचल उनमें सदा जयवंत है जो सद्बोधचन्द्रोदय, तत्त्वज्ञानरूपी जो अमृतसमुद्र उसको कल्लोलों से दूर तक उछालने वाला है और तृष्णा रूपी ही हैं पत्र जिसमें ऐसे जो नाना प्रकार के चित्तरूपी कमल उनको संकुचित करने वाला है तथा श्रेष्ठज्ञान का आधारभूत जो भव्यजीवरूपी ‘कैरवकुल’ अर्थात् रात्रिविकासी कमलों का समूह उसका विकास करने वाला है।

११. निश्चयपञ्चाशत

दुर्लक्ष्यं जगति परं ज्योतिर्वाचां गणः कवीन्द्राणाम्।
जलमिव वज्रे यस्मिन्नलब्धमध्यो बहिर्लुठति॥१॥

अर्थ: जिस प्रकार जल हीरा नामक रत्न के अंदर प्रवेश नहीं करता है और बाहरी भाग में ही रहा आता है उसी प्रकार जिस चैतन्यस्वरूप ज्योति में बड़े-बड़े कवियों की वाणी भी प्रवेश नहीं कर सकती बाहरी भाग में ही रह जाती है। ऐसा वह चैतन्यरूपी तेज संसार में दुर्लक्ष्य है अर्थात् जिसको बड़ी कठिनाई से भी नहीं देख सकते। जो कुछ जीव सिद्ध हुए हैं वे जीव स्वपर भेदविज्ञान से ही सिद्ध हुए हैं और जो कुछ जीव बंधे हैं वे स्वपर भेदविज्ञान के अभाव से ही बंधे हैं। इसलिए सिद्ध बनने की इच्छा करने वाले भव्य जीवों को अवश्य ही भेदविज्ञान की ओर दृष्टि देनी चाहिए।


मनसोऽचिन्त्यं वाचामगोचरं यन्महस्तनोर्भिन्नम्।
स्वानुभवमात्रगम्यं चिद्रूपममूर्तमव्याद्वः ॥२॥

अर्थ: जिस चैतन्यरूपी तेज का मन से चिंतन नहीं कर सकते हैं और वाणी से भी वर्णन नहीं कर सकते हैं और जो शरीर से सर्वथा भिन्न है और केवल स्वानुभव से ही जाना जाता है ऐसा वह चैतन्यरूपी तेज आप लोगों की रक्षा करें।


वपुरादिपरित्यक्ते मज्जत्यानन्दसागरे मनसि।
प्रतिभाति यत्तदेकं जयति परं चिन्मयं ज्योतिः॥३॥

अर्थ: शरीर धन, धान्य आदि से रहित होने पर जिस समय चित्त आनन्दसागर में डूबता है उस समय जो तेज मालूम पड़ता है वह एक, तथा चैतन्यस्वरूपी उत्कृष्ट ज्योति इस संसार में जयवंत है।


स जयति गुरुर्गरीयान् यस्यामलवचनरश्मिभिर्झटिति ।
नश्यति तन्मोहतमो यद्विषयो दिनकरादीनाम्॥४॥

अर्थ: जिन गुरुओं के निर्मल वचनरूपी किरणों से जिसको सूर्य, चन्द्र आदि कभी नाश नहीं कर सकते ऐसा प्रबल मोहरूपी अंधकार बात ही बात में नष्ट हो जाता है ऐसे वे उत्तम गुरु सदा इस लोक में जयवंत हैं अर्थात् ऐसे गुरुओं को मैं नमस्कार करता हूँ।


आस्तां जरादिदुःखं सुखमपि विषयोद्भवं सतां दुःखम्।
तन्मन्यते सुखं यत्तन्मुक्तौ सा च दुःसाध्या॥५॥

अर्थ: संसार में जो जीवों को जरा-मरण आदिक दुख होते हैं वे तो दुख ही हैं इसलिए वे तो दूर ही रहे परन्तु विषयों से उत्पन्न हुए सुख को जो जीव सुख मानते हैं वह भी सुख नहीं हैं दुख ही हैं क्योंकि वास्तविक सुख तो मोक्ष में ही है और वह मोक्ष अत्यन्त दुःसाध्य है।


श्रुतपरिचितानुभूतं सर्वं सर्वस्य जन्मने सुचिरम्।
न तु मुक्तयेऽत्र सुलभा शुद्धात्मज्योतिरूपलब्धिः ॥६॥

अर्थ: जिनको चिरकाल से सुना है और जिनका परिचय तथा अनुभव किया है ऐसे समस्त काम, क्रोध, भोग, विकथा आदिक सर्व प्राणियों के जन्म के लिए हैं अर्थात् उनकी प्राप्ति सबको सुलभ रीति से हो सकती है किन्तु मुक्ति के लिए शुद्ध जो आत्मज्योति उसकी प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ है।


बोधोऽपि यत्र विरलो १वृत्तिवाचामगोचरो२ बाढम्।
अनुभूतिस्तत्र पुनर्दुर्लक्ष्यात्मनि परं गहनम्॥७॥

अर्थ: जिस आत्मा का ज्ञान भी अत्यन्त दुर्लभ है और जिसका वर्णन भी वाणी के अगोचर है अर्थात् वाणी से जिसका वर्णन नहीं कर सकते और जब उसका वाणी से वर्णन ही नहीं कर सकते तब उसका अनुभव तो अत्यन्त ही दुर्लक्ष्य है इसलिए आचार्य कहते हैं कि आत्मज्योति अत्यन्त गहन है।


व्यवहृतिरबोधजनबोधनाय कर्मक्षयाय शुद्धनयः।
स्वार्थं मुमुक्षुरहमिति वक्ष्ये तदाश्रितं किंचित्॥८॥

अर्थ: जीव अज्ञानी हैं। उनके समझाने के लिए तो व्यवहारनय है और शुद्ध नय कर्मों के नाश के लिए है, इसलिए आचार्य कहते हैं कि मोक्ष की इच्छा करने वाला ‘मैं’ अपने लिए शुद्ध नय का आश्रय कर कुछ कहता हूँ अर्थात् शुद्ध नय का वर्णन करता हूँ।


व्यवहारोऽभूतार्थो भूतार्थो देशितस्तु शुद्धनयः।
शुद्धनयमाश्रिता ये प्राप्नुवन्ति यतयः पदं परमम्॥९॥

अर्थ: व्यवहारनय तो असत्यार्थभूत कहा गया है और शुद्धनय सत्यार्थभूत कहा गया है और जो मुनि शुद्धनय के आश्रित हैं वे मुनि मोक्षपद को प्राप्त होते हैं।


तत्त्वं वागतिवर्ति व्यवहृतिमासाद्य जायते वाच्यम्।
गुणपर्ययादिविवृतेः प्रसरति तच्चापि शतशाखम्॥१०॥

अर्थ: निश्चयनय से तो तत्त्व वाणी के अगोचर है अर्थात् वचन से उसके स्वरूप का वर्णन नहीं कर सकते किन्तु वही तत्त्व व्यवहारनय की अपेक्षा से वाच्य है अर्थात् वचन से उसको कुछ कह सकते हैं और पीछे वह तत्त्व गुणपर्याय आदि के विवरण से सैकड़ों शाखा रूप में परिणत हो जाता है।


मुख्योपचारविवृतिं व्यवहारोपायतो यतः संतः।
ज्ञात्वा श्रयन्ति शुद्धं तत्त्वमिति व्यवहृतिः पूज्या॥११॥

अर्थ: मुख्य जो शुद्धनय उसमें उपचार से है विवरण जिसका ऐसा व्यवहारनय है उसकी सहायता से सज्जन पुरुष शुद्ध तत्त्व उसका अवलम्बन करते हैं इसलिए व्यवहारनय भी पूज्य है।


आत्मनि निश्चयबोधस्थितयो रत्नत्रयं भवक्षतये।
भूतार्थपथप्रस्थितबुद्धेरात्मैव तत्रितयम्॥१२॥

अर्थ: आत्मा में जो निश्चय बोध स्थितिरूप रत्नत्रय हैं अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूप रत्नत्रय है वह संसार के नाश के लिए होता है और वह रत्नत्रय कोई जुदा पदार्थ नहीं हैं, किन्तु जिन भव्यजीवों की बुद्धि भूतार्थमार्ग में स्थित है अर्थात् शुद्ध निश्चयनय को आश्रय करने वाली है उन भव्यजीवों की आत्मा ही सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र स्वरूप जो रत्नत्रय उस रत्नत्रयरूप है।


सम्यक्सुखबोधदृशां त्रितयमखण्डं परात्मनोरूपम्।
तत्तत्र तत्परो यः स एव तल्लब्धिकृतकृत्यः॥१३॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र ये तीनों आत्मा के अखंडरूप हैं इसलिए आचार्य कहते हैं कि जो पुरुष परमात्मा में लीन हैं अर्थात् परमात्मा के आराधक हैं उनको सम्यग्दर्शन आदि की प्राप्ति होती है और वे कृतकृत्य हो जाते हैं।


अग्नाविवोष्णभावः सम्यग्बोधेऽस्ति दर्शनं शुद्धम्।
ज्ञातं प्रतीतमाभ्यां सत्स्वास्थ्यं भवति चारित्रम्॥१४॥

अर्थ: जिस प्रकार अग्नि में उष्णता है उसी प्रकार से आत्मा में ज्ञान हैं इस प्रकार की दृढ़ प्रतीति है इसका नाम सम्यग्दर्शन है और आत्मा का जो भलीभाँति ज्ञान है उसको निश्चयज्ञान कहते हैं तथा सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान सहित आत्मा, उस आत्मा में समीचीन स्वस्थता उसको चारित्र कहते हैं।


विहिताभ्यासा बहिरर्थवेध्यसम्बन्धतो दृगादिशराः।
सफलाः शुद्धात्मरणे छिन्दितकर्मारिसंघाताः॥१५॥

अर्थ: बाह्य पदार्थ वे ही हुए बेध्य (निशान) उनके सम्बन्ध से किया गया है अभ्यास जिनका ऐसे जो सम्यग्दर्शन आदिक बाण हैं वे शुद्धात्मारूपी संग्राम में समस्त कर्मरूपी बैरियों को नाश करने में सफल होते हैं।


हिंसोज्झित एकाकी सर्वोपद्रवसहो वनस्थोऽपि।
तरुरिव नरो न सिध्यति सम्यग्बोधादृते जातु॥१६॥

अर्थ: समस्त प्रकार की हिंसाओं से रहित और अकेला तथा समस्त प्रकार के उपद्रवों को (विघ्नों को) सहन करने वाला मुनि वृक्ष के समान वन में स्थित भी सम्यग्ज्ञान के बिना कभी भी सिद्ध नहीं बन सकता।


अस्पृष्टमबद्धमनन्यमयुतमविशेषमभ्रमोपेतः ।
यः पश्यत्यात्मानं स पुमान् खलु शुद्धनयनिष्ठः॥१७॥

अर्थ: जो मनुष्य भ्रमरहित होकर आत्मा को अस्पृष्ट, अबद्ध, अनन्य, अयुत, अविशेष मानता है वही पुरुष शुद्धनय में स्थित है ऐसा समझना चाहिए।


“भेदविज्ञानतः सिद्धा सिद्धा ये किल केचन।
अस्यैवाभावतो बद्धा बद्धा ये किल केचन॥१८॥”

अर्थ: जिस प्रकार मनुष्य सुवर्ण से सुवर्णमय ही कढ़ाई को बनाता है और लोह से लोहमय कढ़ाई को ही बनाता है। उसी प्रकार जो मनुष्य शुद्धात्मा का ध्यान करता है उसको तो शुद्धात्मा की ही प्राप्ति होती है और जो मनुष्य अशुद्ध आत्मा का ध्यान करता है उसको अशुद्ध आत्मा की प्राप्ति होती है।


सानुष्ठानविशुद्धे दृग्बोधे जृम्भिते कुतो जन्म।
उदिते गभस्तिमालिनि किं न विनश्यति तमो नैशम्॥१९॥

अर्थ: जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर रात्रि का अंधकार नष्ट हो जाता है उसी प्रकार सम्यक्चारित्र से शुद्ध जिस समय सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान होते हैं उस समय जन्म कदापि नहीं हो सकता।


आत्मभुवि कर्मबीजाच्चित्तरुर्यत्फलं फलति जन्म।
मुक्त्यर्थिना स दाह्यो भेदज्ञानोग्रदावेन ॥२०॥

अर्थ: आत्मारूपी भूमि में कर्मरूपी बीज से उत्पन्न हुआ मनरूपी वृक्ष, संसाररूपी फल को फलता है इसलिए आचार्य कहते हैं कि जिनको जन्म से मुक्त होने की इच्छा है अर्थात् जो मुमुक्षु हैं उनको चाहिए कि वे भेदज्ञानरूपी जाज्वल्यमान अग्नि से उस चित्तरूपी वृक्ष को जलावें।


अमलात्मजलं समलं करोति मम कर्मकर्दमस्तदपि।
का भीतिः सति निश्चितभेदकरज्ञानकटकफले॥२१॥

अर्थ: यद्यपि कर्मरूपी कीचड़ अत्यन्त निर्मल भी मेरे आत्मारूपी जल को गंदा करते हैं तो भी मुझे कोई भय नहीं क्योंकि निश्चय से स्वपर के भेद को करने वाला ज्ञानरूपी कतक (फिटकरी) फल मेरे पास मौजूद है।


अन्योहमन्यमेतच्छरीरमपि किं पुनर्न बहिरर्थाः।
व्यभिचारी यत्र सुतस्तत्र किमरयः स्वकीयाः स्युः॥२२॥

अर्थ: मैं अन्य हूँ और यदि यह शरीर भी मुझसे अन्य है तो बाह्य जो स्त्री-पुत्र आदिक पदार्थ हैं वे तो मुझसे अवश्य ही भिन्न हैं क्योंकि यदि संसार में अपना पुत्र ही अनिष्ट का करने वाला हो जावे तो बैरी भी मेरे नहीं हो सकते अर्थात् वे तो अवश्य ही मेरे अनिष्ट के करने वाले होंगे।


व्याधिस्तुदति शरीरं न माममूर्तं विशुद्धबोधमयम्।
अग्निर्दहति कुटीरं न कुटीरासक्तमाकाशम्॥२३॥

अर्थ: यदि झोपड़ी में अग्नि लग जावे तो वह झोपड़े में लगी हुई अग्नि झोपड़े को ही जलाती है किन्तु उसके मध्य में रहे हुए आकाश को नहीं। उसी प्रकार जो शरीर में नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं वे रोग उस शरीर को ही नष्ट करते हैं किन्तु उस शरीर में रहे हुए निर्मल ज्ञानमय आत्मा को नष्ट नहीं करते।


वपुराश्रितमिदमखिलं क्षुधादिभिर्भवति किमपि यदसातम्।
नो निश्चयेन तन्मे यदहं बाधाविनिर्मुक्तः॥२४॥

अर्थ: भूख-प्यास आदि कारणों से जो दुख होता है वह समस्त दुख मेरे शरीर में ही होता है और निश्चयनय से वह शरीर मेरा नहीं है क्योंकि मैं समस्त प्रकार की बाधाओं से रहित हूँ।


नैवात्मनो विकारः क्रोधादिः किन्तु कर्मसम्बन्धात्।
स्फटिकमणेरिव रक्तत्वमाश्रितात्पुष्पतो रक्तात्॥२५॥

अर्थ: जिस प्रकार लाल फूल के आश्रय से स्फटिक मणि लाल हो जाती है उसी प्रकार आत्मा में कर्म के सम्बन्ध से क्रोध आदि विकार पैदा हो जाते हैं, किन्तु वे क्रोधादि विकार आत्मा के विकार नहीं हैं।


कुर्यात् कर्म विकल्पं किं मम तेनातिशुद्धरूपस्य।
मुखसंयोगजविकृतेर्न विकारी दर्पणो भवति॥२६॥

अर्थ: मुख के संयोग से उत्पन्न हुए विकार अर्थात् मलिन मुख के सम्बन्ध से जिस प्रकार दर्पण मलिन नहीं होता उसी प्रकार कर्म चाहे कितने ही विकल्प क्यों न करे किन्तु अत्यन्त शुद्धस्वरूप मुझ आत्मा का वे विकल्प कुछ नहीं कर सकते।


आस्तां बहिरुपधिश्चयस्तनुवचनविकल्पजालमप्यपरम्।
कर्मकृतत्वान्मत्तः कुतो विशुद्धस्य मम किञ्चित्॥२७॥

अर्थ: बाह्य स्त्री, पुत्र आदि उपाधि तो दूर रही किन्तु शरीर, वचन और विकल्प भी मुझसे भिन्न हैं क्योंकि शरीर, वचन और विकल्प भी कर्म से किए गये हैं। मैं विशुद्ध हूँ इसलिए मेरा कुछ भी नहीं है।


कर्म परं तत्कार्यं सुखमसुखं वा तदेव परमेव।
तस्मिन् हर्षविषादौ मोही विदधाति खलु नान्यः॥२८॥

अर्थ: कर्म भी भिन्न हैं और कर्मों के जो सुख-दुख आदि कार्य हैं, वे भी भिन्न हैं और उन कर्मों के सुख दुख आदि कार्यों में निश्चय से मोही जीव ही हर्ष-विषाद करता है अन्य नहीं।


कर्म न यथा स्वरूपं न तथा तत्कार्यकल्पनाजालम्।
तत्रात्ममतिविहीनो मुमुक्षुरात्मा सुखी भवति॥२९॥

अर्थ: जिस प्रकार कर्म आत्मा का स्वरूप नहीं हैं उसी प्रकार उस कर्म का जो सुख-दुख आदि कार्य, उनकी जो कल्पना, उनका समूह भी आत्मा का स्वरूप नहीं है इसलिए उन कर्मों में तथा कर्म के कार्य जो सुख-दुख आदिक हैं उनमें, जो मोक्ष की इच्छा करने वाला भव्यजीव आत्मबुद्धि से रहित है अर्थात् उनको अपना नहीं मानता है वही आत्मा (भव्यजीव) संसार में सुखी है।


कर्मकृतकार्यजाते कर्मैव विधौ तथा निषेधे च।
नाहमतिशुद्धबोधो विधूतविश्वोपधिर्नित्यम्॥३०॥

अर्थ: कर्म द्वारा किए हुए जो सुख-दुःखरूप कार्य उन कार्यों के विधान में तथा निषेध में कर्म ही है अर्थात् कर्म ही कर्ता है किन्तु अत्यन्त निर्मल ज्ञान का धारी मैं नहीं हूँ क्योंकि मैं सदा समस्त प्रकार के, कर्मों से पैदा हुई जो उपाधियाँ उनसे रहित हूँ।


बाह्यायामपि विकृतौ मोही जागर्ति सर्वदात्मेति।
किं नोपभुक्तहेमो हेम ग्रावाणमपि मनुते॥३१॥

अर्थ: जो मनुष्य धतूरे को खा लेता है उस मनुष्य को जिस प्रकार पत्थर भी सोना मालूम पड़ता है उसी प्रकार जो मनुष्य मोही है अर्थात् जिस मनुष्य को हिताहित का ज्ञान नहीं है वह मनुष्य बाह्य स्त्री, पुत्र आदि विकृति को आत्मा ही मानता है।


सति द्वितीये चिन्ता कर्म ततस्तेन वर्तते जन्म।
एकोऽस्मि सकलचिन्तारहितोऽस्मि मुमुक्षुरिति नियतम्॥३२॥

अर्थ: द्वितीय वस्तु के होते हुए तो चिंता होती है और चिंता से कर्मों का आगमन होता है और कर्मों से जन्म होता है। इसलिए निश्चय से मोक्ष की इच्छा करने वाला मैं अकेला हूँ तथा समस्त प्रकार की चिंताओं से रहित हूँ।


यादृश्यपि तादृश्यपि परतश्चिन्ता करोति खलु बन्धम्।
किं मम तया मुमुक्षोः परेण किं सर्वदैकस्य॥३३॥

अर्थ: चिंता जिस-जिस प्रकार की होती है उस-उस प्रकार की वह समस्त चिंता बंध को ही करने वाली होती है। मैं तो मोक्ष की इच्छा करने वाला हूँ इसलिए मुझे उस चिंता से क्या प्रयोजन है और मैं तो सदा एक हूँ इसलिए मुझे दूसरे पदार्थों से भी क्या प्रयोजन है।


मयि चेतः परजातं तच्च परं कर्मविकृतिहेतुरतः।
किं तेन निर्विकारः केवलमहममलबोधात्मा॥३४॥

अर्थ: मेरी आत्मा में जो मन है वह मुझसे भिन्न है क्योंकि वह परपदार्थ से उत्पन्न हुआ है और जिससे मन उत्पन्न हुआ है ऐसा वह कर्म भी मुझसे भिन्न है क्योंकि वह विकार का करने वाला है और मैं तो निश्चय से विकार रहित हूँ और निर्मलज्ञान का धारी हूँ।


त्याज्या सर्वा चिन्तेति बुद्धिराविष्करोति तत्तत्त्वम्।
चन्द्रोदयायते यच्चैतन्यमहोदधौ झटिति॥३५॥

अर्थ: समस्त प्रकार की चिंता त्यागने योग्य हैं जिस समय इस प्रकार की बुद्धि होती है उस समय वह बुद्धि उस तत्त्व को प्रकट करती है जो तत्त्व चैतन्यरूपी प्रबल समुद्र में शीघ्र ही चन्द्रमा के समान आचरण करता है।


चैतन्यमसम्पृक्तं कर्मविकारेण यत्तदेवाऽहम्।
तस्य च संसृतिजन्मप्रभृति न किंचित्कृतश्चिता॥३६॥

अर्थ: जो चैतन्य, कर्मों के विकारों से अलिप्त है, वही चैतन्य मैं हूँ और उस चैतन्य का संसार में जन्म-मरण आदिक कुछ भी नहीं है फिर किससे चिंता करनी चाहिए।


चित्तेन कर्मणा त्वं बद्धो यदि बध्यते तया तदतः।
प्रतिबन्धीकृतमात्मन् मोचयति त्वां न सन्देहः॥३७॥

अर्थ: अरे आत्मा तू इस मन की कृपा से कर्मों से बंधा हुआ है यदि तू इस मन को बांध ले अर्थात् मन को वश में कर ले तो इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं कि बंधा हुआ तू छूट जायेगा।


नृत्वतरोर्विषयसुखच्छायालाभेन किं मनःपान्थ।
भवदुःखक्षुत्पीडित तुष्टोऽसि गृहाण फलममृतम्॥३८॥

अर्थ: ‘‘संसार का दुःखरूप जो क्षुधा उससे दुःखित हुआ अरे मनरूपी बटोही’’ तू क्यों मनुष्यरूपी वृक्ष से विषयसुखरूपी छाया के लाभ से संतुष्ट है। अमृतफल को ग्रहण कर।


स्वान्तं ध्वान्तमशेषं दोषोज्झितमर्कबिम्बमिव मार्गे।
विनिहन्ति निरालम्बे संचरदनिशं मुनीशानाम्॥३९॥

अर्थ: समस्त दोषों से रहित सूर्य के प्रतिबिम्ब के समान मुनीश्वरों का मन निरालम्ब मार्ग में ही गमन करता है तथा निरालम्ब मार्ग में गमन करने के कारण वह समस्त अंधकार को दूरकर देता है।


संविच्छिखिना गलिते तनुमूषाकर्ममदनमयवपुषि।
स्वमिव स्वं चिद्रूपं पश्यन् योगी भवति सिद्धः॥४०॥

अर्थ: सम्यग्ज्ञानरूपी अग्नि, जिस समय शरीररूपी मूषा, उसमें कर्मरूपी मोममय शरीर, वह पिघल कर निकल जाता है उस समय जो योगी आकाश के समान अपने चैतन्यरूप को देखता है वही योगी सिद्ध होता है।


अहमेव चित्स्वरूपश्चिद्रूपस्याश्रयो मम स एव।
नान्यत्किमपि जडत्वात्प्रीतिः सदृशेषु कल्याणी ॥४१॥

अर्थ: मैं ही चैतन्यस्वरूप हूँ और मेरे चैतन्यस्वरूप का आश्रय वह चैतन्य ही है और चैतन्य से भिन्न वस्तु चैतन्यस्वरूप नहीं है और न चैतन्य से भिन्न वस्तु मेरे चैतन्य की आश्रय है क्योंकि वे जड़ हैं मेरी प्रीति उनमें नहीं हो सकती, प्रीति समान पदार्थों में ही कल्याण को करने वाली होती है।


स्वपर विभागावगमे जाते सम्यक् परे परित्यक्ते।
सहजबोधैकरूपे तिष्ठत्यात्मा स्वयं शुद्धः॥४२॥

अर्थ: जिस समय आत्मा में स्वपर के विभाग का ज्ञान हो जाता है और त्यागने योग्य जो वस्तु उनका त्याग हो जाता है उस समय स्वाभाविक निर्मल ज्ञान स्वरूप जो अपना रूप है उसमें आत्मा ठहरता है और पीछे स्वयं शुद्ध हो जाता है। चैतन्यरूपता और जड़रूपता को धारण करने वाले अर्थात् चेतन और जड़ जो आत्मा और शरीर हैं उनके, विभाग को करके (उनको जुदी-जुदी रीति से जानकर) और अच्छी तरह अंतरंग से, ज्ञान के तथा राग के विभाग को करके अर्थात् “ज्ञान आत्मा का धर्म है तथा राग शरीर का धर्म है इस बात को भलीभाँति जानकर” यह निर्मल भेदज्ञान उत्पन्न होता है। इस समय मोक्षाभिलाषी जो भव्यजीव हैं वे शुद्ध ज्ञान वही है, धन का समूह जिसके उसको अर्थात् आत्मा को प्राप्त होकर और परपदार्थों के सम्बन्ध से रहित होकर चिरकाल तक आनंद से रहो।


हेयोपादेयविभागभावना कथ्यमानमपि तत्त्वम्।
हेयोपादेयविभागभावनावर्जितं विद्धि॥४३॥

अर्थ: जो तत्त्व हेय तथा उपादेय की भावना से रहित कहा गया है वह तत्त्व भी निश्चय से हेय तथा उपादेय की भावना से रहित ही है ऐसा समझो।


प्रतिपद्यमानमपि च श्रुताद्विशुद्धं परात्मनस्तत्त्वम्।
उरीकरोतु चेतस्तदपि न तच्चेतसो गम्यम्॥४४॥

अर्थ: शास्त्र के द्वारा भलीभाँति कहे हुए भी अत्यन्त विशुद्ध परमात्म तत्त्व को चाहे मन, स्वीकार करे तो भी वह मन के गम्य नहीं है अर्थात् मन उसको नहीं जान सकता है।


अहमेकाक्यद्वैतं द्वैतमहं कर्मकलित इति बुद्धेः।
आद्यमनपायि मुक्तेतरद्विविकल्पं भवस्य परम्॥४५॥

अर्थ: मैं अकेला हूँ इस प्रकार की जो बुद्धि है वह तो अद्वैत बुद्धि है और कर्मों से सहित हूँ इस प्रकार की जो बुद्धि है, वह द्वैत बुद्धि है इन दोनों बुद्धियों में आदि की जो अविनाशी अद्वैत बुद्धि है, वह तो मोक्ष का कारण है और दूसरी जो द्वैत बुद्धि है वह संसार का कारण है।


बद्धो मुक्तोऽहमथ द्वैते सति जायते ननु द्वैतम्।
मोक्षायेत्युभयमनोविकल्परहितो भवति मुक्तः॥४६॥

अर्थ: मैं बँधा हुआ हूँ तथा मैं मुक्त हूँ इस प्रकार के द्वैत के होते हुए निश्चय से द्वैत होता है और इस प्रकार के दोनों विकल्पों से रहित जीव मुक्त होता है।


गतभाविभवद्भावाभावप्रतिभावभावितं चित्तम्।
अभ्यासाच्चिद्रूपं परमानन्दान्वितं कुरुते॥४७॥

अर्थ: भूत, भविष्यत्, वर्तमानकाल के जो पदार्थ, उनकी भावना से भाया हुआ जो चित्त है वह अभ्यास से चैतन्यरूप को परमानंद से सहित करता है।


बद्धं पश्यन् बद्धो मुक्तं मुक्तो भवेत् सदात्मानं।
याति यदीयेन पथा तदेव पुरमश्नुते पान्थः॥४८॥

अर्थ: जिस प्रकार जो पथिक जिस पुर के मार्ग से गमन करता है वह उसी पुर को प्राप्त होता है। उसी प्रकार जो जीव आत्मा को सदा बँधा हुआ देखता है वह कर्मों से बद्ध ही रहता है और जो पुरुष आत्मा को सदा कर्मों से रहित देखता है वह मुक्त ही होता है।


मा गा बहिरन्तर्वा साम्यसुधापानवर्द्धितानन्द।
आस्व यथैव तथैव च विकारपरिवर्जितः सततम्॥४९॥

अर्थ: समतारूपी जो अमृत उसके पीने से बढ़ा है आनंद जिसको ऐसा हे मन! तू बाहर तथा भीतर मत गमन कर और जिस रीति से तू समस्त प्रकार के विकारों से रहित है उसी प्रकार से रह।


तज्जयति यत्र लब्धे श्रुतभुवि मत्यापगातिधावन्ती।
व्यावृत्ता दूरदपि झटिति स्वस्थानमाश्रयति॥५०॥

अर्थ: जिस चैतन्यरूप तत्त्व के प्राप्त होने पर शास्त्ररूपी भूमि में अत्यन्त दौड़ती हुई बुद्धिरूपी नदी दूर से ही लौटकर शीघ्र ही अपने स्थान को प्राप्त हो जाती है ऐसा वह चैतन्यरूपी तत्त्व सदा इस लोक में जयवंत है।


तन्नमत गृहीताखिलकालत्रयजगतत्रयव्याप्ति।
यत्रास्तमेति सहसा सकलोऽपि हि वाक्परिस्पन्दः॥५१॥

अर्थ: ग्रहण की है तीनों कालों में तीनों जगत् की व्याप्ति जिसने तथा जिसके होते हुए समस्त वाणी का परिस्पन्द शीघ्र ही नष्ट हो जाता है उस चैतन्य को नमस्कार करो।


तन्नमत विनष्टाखिलविकल्पजालद्रुमाणि परिकलिते।
यत्र वहन्ति विदग्धा दग्धवनानीव हृदयानि॥५२॥

अर्थ: उस चैतन्यरूप को नमस्कार करो जिस चैतन्यरूप की प्राप्ति के होने पर मुनिगण के सर्वथा नष्ट हो गये हैं विकल्परूपी वृक्ष, ऐसे हृदयों को जले हुए वनों के मानिन्द धारण करते हैं।


बद्धो वा मुक्तो वा चिद्रूपो नयविचारविधिरेषः।
सर्वनयपक्षरहितो भवति हि साक्षात्समयसारः ॥५३॥

अर्थ: चैतन्यस्वरूप आत्मा कर्मों से बँधा हुआ है तथा कर्मों से रहित भी है यह नय- विचार की विधि है और समस्त नयों के पक्ष से रहित होने पर ही निश्चय से समयसार होता है।


एकस्य बद्धो न तथा परस्य चितिद्वयोर्द्वाविति पक्षपातौ।
यस्तत्त्ववेदी च्युतपक्षपातस्तस्यास्ति नित्यं खलु चिच्चिदेव॥५४॥

अर्थ: व्यवहारनय से तो आत्मा कर्मों से बंधा हुआ है और निश्चयनय से आत्मा मुक्त है । इस प्रकार इन दोनों प्रकार के आत्माओं में दोनों प्रकार के पक्षपात हैं जो मनुष्य वास्तविक तत्त्व का जानने वाला है और समस्त प्रकार के नयों के पक्षपातों से रहित है, उसका चैतन्य है सो निश्चय करके चैतन्य ही है। जिसमें नय, निक्षेप, प्रमिति आदिक किसी प्रकार के विकल्प नहीं है और जो उत्कृष्ट है तथा शांत है और शुद्धानुभव के गोचर है तथा एक है वह चैतन्यरूपी तेज मैं ही हूँ।


अलमलममतिजल्पैर्दुर्विकल्पैरनल्पैरयमिव परमार्थः सेव्यतां नित्यमेव।
स्वरसविसरपूर्णज्ञानविस्फूर्तिमात्रान्न खलु समयसारादुत्तरं किञ्चिदस्ति॥५५॥

अर्थ: अनेक प्रकार के खोटे विकल्पों और अन्तर्जल्प से रहित इस परमार्थ परमात्मा की सेवा करो और स्वरस का विस्तार जो केवलज्ञान से परिपूर्ण ऐसे समयसार से उत्कृष्ट और कोई वस्तु नहीं है। जिस चैतन्य तेज के जानने पर तो समस्त वस्तु जानी जाती है और देखने पर समस्त वस्तु देखी जाती हैं क्योंकि समस्त ज्ञेय ‘पदार्थ’ वे हैं विषय जिनके ऐसे जो दर्शन और ज्ञान हैं वे आत्मस्वरूप ही हैं आत्मा से भिन्न नहीं है।


नयनिक्षेपप्रमितिप्रभृतिविकल्पोज्झितं परं शान्तम्।
शुद्धानुभूतिगोचरमहमेकं धाम चिद्रूपम्॥५६॥

अर्थ: अत्यन्त मनोहर भी पदार्थ में कोई विचित्र तथा निश्चित प्रीति हो जाती है किन्तु जिस समय परमात्मा का दर्शन हो जाता है उस समय उन अन्य पदार्थों में प्रीति की समाप्ति हो जाती है।


उदयति न नयश्रीरस्तमेति प्रमाणं क्व चिदपि च न विद्मो याति निक्षेपचक्रम्।
किमपरमभिदध्मो धाम्नि सर्वंकषेऽस्मिन्ननुभवमुपयाते भाति न द्वैतमेव॥५७॥

अर्थ: सबको कसने वाले इस चैतन्यरूपी तेज के अनुभव होने पर द्रव्यार्थिक, पर्यायार्थिक नय भी उदय को प्राप्त नहीं होते तथा प्रत्यक्ष तथा परोक्ष प्रमाण अस्त हो जाते हैं और नाम, स्थापना, द्रव्य भावरूपी निक्षेप न जाने कहाँ चले जाते हैं और अधिक कहाँ तक कहा जावे द्वैत भी दृष्टिगोचर नहीं होते। यद्यपि कर्मों का सम्बन्ध सब प्राणियों के समान है तो भी बुद्धिमान् पुरुष के वह विद्यमान भी अविद्यमान के समान ही है जिस प्रकार तैरने में चतुर राहगीरों को बढ़ा हुआ नदी का प्रवाह।


ज्ञाते ज्ञातमशेषं दृष्टे दृष्टं च शुद्धचिद्रूपे।
निशेषबोध्यविषयौ दृग्बोधौ यत्र तद्विद्धौ॥५८॥

अर्थ: रोहण पर्वत की भूमि में चिरकाल से रत्न को ढूँढ़ने वाला मनुष्य दैवयोग से इष्ट रत्न को पाकर जिस प्रकार यह तत्त्व हेय है अथवा उपादेय है इस बात का विचार करता है उसी प्रकार जिस मनुष्य को वास्तविक तत्त्व की प्राप्ति हो गई है उसको भी यह तत्त्व हेय है अथवा उपादेय है ऐसा विचार करना चाहिए।


भावे मनोहरेऽपि च काचिन्नियता च जायते प्रीतिः ।
अपि सर्वाः परमात्मनि दृष्टे तु स्वयं समाप्यन्ते ॥५९॥

अर्थ: यद्यपि ज्ञानावरण आदि कर्मों से मेरी आत्मा संयुक्त है तो भी मैं श्रीगुरु के चरणारविंद की कृपा से सदा मुक्त हूँ और मैं अत्यन्त दरिद्री हूँ तो भी मैं श्रीगुरु के चरणों के प्रसाद से लक्ष्मी से सहित हूँ और मैं तप से दुःखित हूँ तो भी श्रीगुरु के चरणों की कृपा से मैं सदा सुखी ही हूँ अर्थात् मुझे किसी प्रकार का संसार में दुख नहीं है।


सन्नप्यसन्निव विदां जनसामान्योऽपि कर्मणो योगः ।
तरणपटूनामृद्धः पथिकानामिव सरित्पूरः ॥६०॥

अर्थ: जो कुछ मेरे कार्य मौजूद हैं अर्थात् जो कुछ कार्य मैं कर रहा हूँ वह कर्म की कृपा से कर रहा हूँ ज्ञान से कुछ भी कार्य नहीं क्योंकि नट के खींचे हुए यंत्र के सूत्र से ही पुतली नाचती है।


मृगयमाणेन सुचिरं रोहणभुवि रत्नमीप्सितं प्राप्य।
हेयाहेयश्रुतिरपि विलोक्यते लब्धतत्त्वेन॥६१॥

अर्थ: श्री पद्मनन्दी आचार्य को आश्रित तथा अपनी भक्ति से प्रकट किया है वस्तु का गुण जिन्होंने, ऐसे कई एक शब्दों द्वारा इस ‘निश्चयपञ्चाशत’ की रचना की गई है।


कर्मकलितोपि मुक्तः सश्रीको दुर्गतोप्यहमतीव।
तपसा दुःख्यपि च सुखी श्रीगुरुपादप्रसादेन॥६२॥

अर्थ: समस्त प्रकार की इच्छाओं को दूर करने वाला यदि चैतन्यरूपी तत्त्व मेरे मन में मौजूद है तो राज-लक्ष्मी तो तृण के समान है। इसलिए मैं उसके विषय में तो क्या, इन्द्र की संपदा भी मेरे लिए किसी काम की नहीं।


बोधादस्ति न किञ्चित्कार्यं यद् दृश्यते मलात्तन्मे।
आकृष्टयंत्रसूत्राद्दारुनरः स्फुरति नटकानाम्॥६३॥


निश्चयपंचाशत्पद्मनन्दिनं सूरिमा श्रिभिः कैश्चित्।
शब्दैः स्वभक्ति सूचितवस्तुगुणैर्विरचितेयमिति॥६४॥


तृणं नृपश्रीः किमु वच्मि तस्यां न कार्यमाखण्डलसम्पदोऽपि।
तत्त्वं परं चेतसि चेन्ममास्ति अशेषवाञ्छाविलयैकरूपं ॥६५॥

१२. ब्रह्मचर्यरक्षावर्ती

भ्रूक्षेपेण जयंति ये रिपुकुलं लोकाधिपाः केचन
द्राक्तेषामपि येन वक्षसि दृढं रोपः समारोपितः।
सोऽपि प्रोद्गतविक्रमः स्मरभटः शान्तात्मभिर्लीलया
यैः शस्त्रग्रहवर्जितैरपि जित-स्तेभ्यो यतिभ्यो नमः ॥१॥

अर्थ: संसार में कई एक ऐसे भी राजा हैं जो कि अपनी भ्रुकुटी के विक्षेप मात्र से ही बैरियों के समूह को जीत लेते हैं उन राजाओं के भी हृदय में शीघ्र ही जिस कामदेव रूपी योद्धा ने दृढ़ता से बाण को समारोपित कर दिया है ऐसे अत्यन्त पराक्रमी भी उस कामदेवरूपी सुभट को समस्त प्रकार के शस्त्र से रहित तथा जिनकी आत्मा क्रोधादि कषायों के नाश होने से शांत हो गई हैं ऐसे यतियों ने बात ही बात में जीत लिया है उन यतियों के लिए नमस्कार है अर्थात् वे यतीश्वर मेरी रक्षा करें।


आत्मा ब्रह्मविविक्तबोधनिलयो यत्तत्र चर्यं परं
स्वांगासंगविवर्जितैकमनसस्तद् ब्रह्मचर्यं मुनेः।
एवं सत्यबलाः स्वमातृभगिनीपुत्रीसमाः प्रेक्षते
वृद्धाद्या विजितेन्द्रियो यदि तदा स ब्रह्मचारी भवेत् ॥२॥

अर्थ: अपने शरीर में जो आसक्ति, उससे रहित है एक मन जिसका अर्थात् जिस मुनि के मन में शरीर विषयक कुछ भी आसक्ति नहीं है ऐसे मुनि की जो समस्त पदार्थों से भिन्न तथा ज्ञानस्वरूप आत्मा है वही ब्रह्म है और परब्रह्म में जो चर्या है अर्थात् एकाग्रता है वही ब्रह्मचर्य है और ऐसे होने पर जो वृद्ध आदिक स्त्रियाँ हैं उनको अपनी माता, बहिन, पुत्री के समान देखता है उस समय वह ब्रह्मचारी होता है।


स्वप्ने स्यादतिचारिता यदि तदा तत्रापि शास्त्रोदितं
प्रायश्चित्तविधिं करोति रजनीभागानुगत्या मुनिः।
रागोद्रेकतया दुराशयतया सा गौरवात्कर्मणः
तस्य स्याद्यदि जाग्रतोपि हि पुनस्तस्यां महच्छेदनम्॥३॥

अर्थ: यदि किसी कारण से स्वप्न में मुनि को अतिचार लग जावे तो मुनि रात्रि का विभागकर शास्त्र में कहे हुए प्रायश्चित्त को करते हैं और यदि जाग्रत अवस्था में राग के उद्रेक से अथवा खोटे आशय से वा कर्म की गुरुता से यदि मुनि को अतिचार लग जावे तो उस अतिचारिता में वे बड़ा भारी संशोधन करते हैं।


नित्यं खादति हस्तिसूकरपलं सिंहो बली तद्रति-
वर्षेणैकदिने शिलाकणचरे पारावते सा सदा।
न ब्रह्मव्रतमेति नाशमथवा स्यान्नैव भुक्तेर्गुणा-
त्तद्रक्षां दृढ एक एव कुरुते साधोर्मनःसंयमः॥४॥

अर्थ: भोजन के गुण से अर्थात् भोजन के करने से ब्रह्मचर्यव्रत नष्ट होता है तथा भोजन के न करने से ब्रह्मचर्यव्रत पलता है यह बात नहीं है क्योंकि अत्यन्त बलवान् सिंह, हाथी तथा सूअर के मांस को खाता है किन्तु वर्ष में वह एक ही समय रति को करता है तथा कबूतर सदा पत्थर के टुकड़े खाता है तो भी वह सदा रति करता रहता है किन्तु ब्रह्मचर्य का पालन (रक्षा) एक मात्र साधु का दृढ़ मन का संयम है वही करता है।


चेतः संयमनं यथावदवनं मूलव्रतानां मतं
शेषाणां च यथाबलं प्रभवतां बाह्यं मुनेर्ज्ञानिनः।
तज्जन्यं पुनरांतरं समरसीभावेन चिच्चेतसो
नित्यानंदविधायिकार्यजनकं सर्वत्र हेतुर्द्वयम्॥५॥

अर्थ: ज्ञानी मुनि के यथाशक्ति होने वाले जो मूलगुण तथा उत्तरगुण हैं उनको यथायोग्य जो रक्षण करना है वह तो बाह्य मन का संयम है तथा उस बाह्य मन के संयम से उत्पन्न हुआ और सदा आनंद के करने वाले कार्य को पैदा करने वाला चैतन्य तथा मन के समरसी भाव से, जो मन का संयम होता है वह अंतरंग मन का संयम है तथा सब जगह यह दोनों प्रकार का संयम कारण है।


चेतोभ्रांतिकरी नरस्य मदिरापीतिर्यथा स्त्री तथा
तत्संगेन कुतो मुनेर्व्रतविधिः स्तोकोऽपि सम्भाव्यते।
तस्मात्संसृतिपातभीतमतिभिः प्राप्तैस्तपोभूमिकां
कर्तव्यो व्रतिभिः समस्तयुवतित्यागे प्रयत्नो महान्॥६॥

अर्थ: जिस प्रकार मदिरा का पान मनुष्य को भ्रांति का करने वाला होता है उसी प्रकार स्त्री भी मनुष्य के चित्त को भ्रांति की करने वाली होती है इसलिए उस स्त्री की संगति से मुनि के थोड़े भी व्रत के आचरण की संभावना नहीं हो सकती। इसलिए आचार्य कहते हैं कि जिन मुनियों की मति संसार में भ्रमण करने से भयभीत है और जो मुनि तप की भूमिका को प्राप्त हो गये हैं उनको समस्त स्त्रियों के त्याग में बड़ा भारी प्रयत्न करना चाहिए।


मुक्तेर्द्वारि दृढार्गला भवतरोः सेकेऽङ्गना सारिणी
मोहव्याधविनिर्मिता नरमृगस्याबंधने वागुरा।
यत्संगेन सतामपि प्रसरति प्राणातिपातादि तत्
तद्वार्तापि यतेर्यतित्वहतये कुर्यान्न किं सा पुनः॥७॥

अर्थ: यह स्त्री, मुक्ति के द्वार को रोकने के लिए मजबूत अर्गला है और संसाररूपी वृक्ष को सींचने के लिए नाली है तथा मनुष्यरूपी मृगों के बाँधने के लिए मोहरूपी व्याध द्वारा बनाया हुआ जाल है क्योंकि जिस स्त्री के संग से सज्जनों का भी जीवन नष्ट हो जाता है और जिस स्त्री की बात भी मुनियों के मुनिपने के नाश के लिए होती है वह स्त्री संसार में और क्या-क्या नहीं कर सकती? अर्थात् समस्त प्रकार के अनिष्टों को कर सकती है।


तावत्पूज्यपदस्थितिः परिलसत्तावद्यशो जृंभते
तावच्छुभ्रतरा गुणाः शुचिमनस्तावत्तपो निर्मलम्।
तावद्धर्मकथापि राजति यतेस्तावत्स दृश्यो भवेत्
यावन्न स्मरकारि हारि युवते रागान्मुखं वीक्षते॥८॥

अर्थ: जब तक यति, प्रीति से काम के उद्दीपन करने वाले तथा मनोहर स्त्री के मुख को नहीं देखता तभी तक यह यति पूज्य पद में अर्थात् उत्तम पद में स्थित रहता है और तभी तक उस यति का शोभायमान यश वृद्धि को प्राप्त होता रहता है तथा तभी तक उसके गुण निष्कलंक रहते हैं और तभी तक उस यतीश्वर का मन पवित्र बना रहता है तथा उसी समय तक उसका निर्मल तप रहता है तथा उसी समय तक उसकी धर्मकथा शोभित रहती है और तभी तक वह देखने योग्य बना रहता है किन्तु स्त्री के मुख देखते ही ये कोई बातें नहीं रहती। इसलिए यतियों को स्त्री का मुख कदापि नहीं देखना चाहिए।


तेजोहानिमपूततां व्रतहतिं पापं प्रपातं पथो
मुक्ते रागितयांगनास्मृतिरपि क्लेशं करोति ध्रुवं।
तत्सानिध्यविलोकनप्रतिवचः स्पर्शादयः कुर्वते
किं नानर्थपरंपरामिति यतेस्त्याज्यावला दूरतः॥९॥

अर्थ: जिस स्त्री का, राग से स्मरण भी तेज की हानि को करता है तथा अपवित्रता को करता है और व्रतों के नाश को करता है तथा पाप की उत्पत्ति करता है और मोक्ष के मार्ग से मनुष्यों को गिराता है और निश्चय से नाना प्रकार के क्लेशों को करता है। तब उस स्त्री के समीप में रहना तथा उसका देखना और उसके साथ वचनालाप और उसके स्पर्श आदिक किस-किस अनर्थ को नहीं करते ? अर्थात् सर्व ही अनर्थों को करते हैं इसलिए ऐसी स्त्री यतियों को दूर से ही त्यागने योग्य है।


वेश्या स्याद्धनतस्तदस्ति न यतेश्चेदस्ति सा स्यात्कुतो
नात्मीया युवतिर्यतित्वमभवत्तत्त्यागतो यत्पुरा।
पुंसोऽन्यस्य च योषिता यदि रतिश्छिन्नो नृपात्तत्पतेः
स्यादापज्जननद्वयक्षयकरी त्याज्यैव योषा यतेः ॥१०॥

अर्थ: यदि मुनि वेश्या के लोलुपी बने तो वेश्या उनको मिल नहीं सकती क्योंकि वेश्या अधिक धन होने पर ही प्राप्त होती है और वह धन यति के पास है नहीं, यदि कदाचित् धन भी होवे तो वेश्या उसको मिल नहीं सकती और अपनी स्त्री की भी यति को प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि पहले उस स्त्री के त्याग से ही यतिपना हुआ है और यदि दूसरे पुरुष की स्त्री के साथ यति रति करें तो वे राजा से छेदन आदिक दंड को प्राप्त होते हैं तथा उस स्त्री के पति के द्वारा भी बहुत से कष्टों को पाते हैं। इसलिए यतियों को दोनों जन्मों को नाश करने वाली स्त्री का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।


दारा एव गृहं न चेष्टकचितं तत्तैर्गृहस्थो भवेत्
तत्त्यागे यतिरादधाति नियतं सद्ब्रह्मचर्यं परम्।
वैकल्यं किल तत्र चेत्तदपरं सर्वं विनष्टं व्रतं
पुंसस्तेन विना तदा तदुभयभ्रष्टत्वमापद्यते॥११॥

अर्थ: स्त्री का नाम ही घर है किन्तु ईंटों से व्याप्त घर नहीं कहलाता इसलिए उन स्त्रियों से ही मनुष्य गृहस्थ होता है और उस स्त्री के सर्वथा त्याग से ही यति उत्कृष्ट तथा श्रेष्ठ ब्रह्मचर्य को निश्चय से धारण करते हैं। यदि उस ब्रह्मचर्य में किसी कारण से विकलता हो जावे तो दूसरे-दूसरे समस्त व्रत नष्ट हो जाते हैं और उस समय उस ब्रह्मचर्य के बिना यति के व्रतीपना तथा गृहस्थपना दोनों नष्ट हो जाते हैं।


सम्प्द्येत दिनद्वयं यदि सुखं नो भोजनादेस्तदा
स्त्रीणामप्यतिरूपगर्वितधियामंगं शवांगायते।
लावण्याद्यपि तत्र चंचलमिति श्लिष्टं च तत्तद्दृशां
दृष्ट्वा कुंकुमकज्जलादिरचनां मा गच्छ मोहं मुने॥१२॥

अर्थ: रूप से अत्यन्त घमंड युक्त है बुद्धि जिनकी ऐसी स्त्रियों को यदि दो दिन भी भोजनादि से सुख न मिले अर्थात् यदि वे दो दिन भी नहीं खाये तो उनका शरीर मुर्दे के शरीर के समान मालूम पड़ता है। और उन स्त्रियों के शरीर में मौजूद जो लावण्य है वह भी चंचल है अर्थात् क्षणभर में विनाशीक है इसलिए हे मुनि! उन स्त्रियों के शरीर में केसर, काजल आदि की रचना को देखकर मोहित मत हो।


रम्भास्तम्भमृणालहेमशशभृन्नीलोत्पलाद्यैः पुरा
यस्य स्त्रीवपुषः पुरः परिगतैः प्राप्ता प्रतिष्ठा न हि।
तत्पर्यंतदशां गतं विधिवशात्क्षिप्तं क्षतं पक्षिभिः
भीतैश्छादितनासिकैः पितृवने दृष्टं लघु त्यज्यते॥१३॥

अर्थ: जिस स्त्री के शरीर के आगे प्राप्त ऐसे केलों का स्तंभ, कमल का तंतु, बर्फ, चन्द्रमा, और नीलकमल आदिकों ने भी पहले प्रतिष्ठा नहीं पाई थी वही स्त्री का शरीर जिस समय मृत शरीर बन जाता है और जब वह श्मशान भूमि में फेंक दिया जाता है और जिस समय पक्षी उसके टुकड़े- टुकड़े कर देते हैं उस समय वह देखा हुआ शरीर, भयभीत तथा जिनकी नाक ढकी हुई है ऐसे मनुष्यों के द्वारा शीघ्र ही छोड़ दिया जाता है।


अङ्गं यद्यपि योषितां प्रविलसत्तारुण्यलावण्यवद्
भूषावत्तदपि प्रमोदजनकं मूढात्मनां नो सताम्।
उच्छूनैर्बहुभिः शवैरतितरां कीर्णं श्मशानस्थलं
लब्ध्वा तुष्यति कृष्णकाकनिकरो नो राजहंसव्रजः॥१४॥

अर्थ: यद्यपि स्त्रियों का शरीर मनोहर यौवन अवस्था तथा लावण्य से सहित भी है और अनेक प्रकार के भूषणों से भूषित है तो भी वह मूढ़बुद्धि पुरुषों को ही आनंद का देने वाला है किन्तु सज्जन पुरुषों को आनंद का देने वाला नहीं। जिस प्रकार सड़े हुए मुर्दों से व्याप्त श्मशान भूमि को प्राप्त होकर काले कौओं का समूह ही संतुष्ट होता है, राजहंसों का समूह संतुष्ट नहीं होता।


यूकाधाम कचाः कपाल मजिनाच्छन्नं मुखं योषितां
तच्छिद्रे नयने कुचौ पलभरौ बाहू तते कीकसे।
तुंदं मूत्रमलादिसद्म जघनं प्रस्यन्दि वर्चोगृहं
पादस्थूणमिदं किमत्र महतां रागाय संभाव्यते॥१५॥

अर्थ: स्त्रियों के बाल तो जूँओं के स्थान हैं और मुख तथा कपाल चामकर वेष्टित हैं और दोनों नेत्र उसके छेद हैं तथा स्तन मांस से भरे हुए हैं और दोनों भुजा विस्तृत हड्डियाँ हैं और स्त्रियों का पेट मूत्र तथा मल का घर है और जघन बहती हुई विष्टा का घर है और स्त्रियों के चरण स्थूण के समान हैं इसलिए नहीं मालूम सज्जनों को स्त्रियों की कौन-सी चीज राग के लिए होती है।


कार्याकार्यविचारशून्यमनसो लोकस्य किं ब्रूमहे
यो रागांधतयादरेण वनितावक्त्रस्य लालां पिबेत्।
श्लाघ्यास्ते कवयः शशांकवदिति प्रव्यक्तवागडंबरै
श्चर्मानद्धकपालमेतदपि यैरग्रे सतां वर्ण्यते॥१६॥

अर्थ: राग से अंधा होकर जो लोग बड़े आदर से स्त्री के मुख की लार का पान करता है। ग्रन्थकार कहते हैं कि कार्य तथा अकार्य के विचार से रहित है मन जिसका ऐसे उस लोक के विषय में हम क्या कहें? और वे कवि भी सराहना करने योग्य हैं जो कवि सज्जनों के सामने चाम से ढका हुआ है कपाल जिसका ऐसे भी स्त्री के मुख को, अपने प्रबल वाणी के आडंबर से चन्द्रमा के समान कहते हैं।


एष स्त्री - विषये विनापि हि परप्रोक्तोपदेशं भृशं
रागांधो मदनोदयादनुचितं किं किं न कुर्याज्जनः।
अप्येतत्परमार्थबोधविकलः प्रौढं करोति स्फुरत्
शृङ्गारं प्रविधाय काव्यमसकृल्लोकस्य कश्चित्कविः॥१७॥

अर्थ: राग से अंधा यह लोक पर के दिये हुए उपदेश के बिना ही काम के उदय से अर्थात् कामी होकर क्या-क्या अनुचित काम नहीं करता है अर्थात् सब ही अनुचित काम को करता है इतने पर भी जिसको अंशमात्र भी परमार्थ का ज्ञान नहीं ऐसा कोई कवि जिसमें भलीभाँति शृंगार का वर्णन किया गया है ऐसे काव्य को बनाकर और भी निरंतर लोगों को चतुर (स्त्रियों के सेवन में प्रौढ़) करता रहता है।


दारार्थादिपरिग्रहः कृतगृहव्यापारसारोऽपि सन्
देवः सोऽपि गृही नरः परधनस्त्रीनिस्पृहः सर्वदा।
यस्य स्त्री नतु सर्वथा न च धनं रत्नत्रयालंकृतो
देवानाम्पि देव एव स मुनिः केनात्र नो मन्यते॥१८॥

अर्थ: जिस पुरुष के स्त्री का परिग्रह मौजूद है और धन का परिग्रह मौजूद है तथा जिसने समस्त गृह सम्बन्धी व्यापार को कर लिया है ऐसा गृहस्थ भी मनुष्य, यदि पर धन तथा परस्त्री में निस्पृह है तो वह भी जब देव कहा जाता है तब जिस मुनि के न तो स्त्री है और न सर्वथा धन ही है और जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र स्वरूप रत्नत्रय से शोभित है वह तो देवों का भी देव है ही और उस मुनि की सब ही प्रतिष्ठा करते हैं।


कामिन्यादि विनात्र दुःखहतये स्वीकुर्वते तच्च ये
लोकास्तत्र सुखं पराश्रिततया तद्दुःखमेव ध्रुवम्।
हित्वा तद्विषयोत्थमंतविरसं स्तोकं यदाध्यात्मिकं
तत्तत्त्वैकदृशां सुखं निरुपमं नित्यं निजं नीरजम् ॥१९॥

अर्थ: स्त्री आदि के बिना संसार में दुख होता है यह समझकर लोग दुख के दूर करने के लिए स्त्री आदि को स्वीकार करते हैं परन्तु स्त्री आदिक में जो सुख है सो पराधीनता के कारण दुख ही है । इसलिए अंत में विरस तथा थोड़ा जो विषय से उत्पन्न सुख है उसको छोड़कर जो तत्त्वज्ञानियों का आत्म सम्बन्धी सुख है वही सुख, उपमा रहित तथा सदा काल रहने वाला और अपना तथा निर्दोष है ऐसा समझना चाहिए।


सौभाग्यादिगुणप्रमोदसदनैः पुण्यैर्युतास्ते हृदि
स्त्रीणां ये सुचिरं वसंति विलसत्तारुण्यपुण्यश्रियाम्।
ज्योतिर्बोधमयं तदंतरदृशा कायात्पृथक् पश्यतां
येषां ता न तु जातु तेऽपि कृतिनस्तेभ्यो नमःकुर्वते ॥२०॥

अर्थ: वे मनुष्य सौभाग्य आदि गुण तथा आनंद के स्थानभूत पुण्य उनसे सहित हैं जो मनुष्य मनोहर यौवनावस्था उससे पवित्र है शोभा जिनकी, ऐसी स्त्रियों के मन में चिरकाल तक निवास करते हैं और वे पुण्यवान् पुरुष भी, जो मुनि अपनी प्रसिद्ध अंतर्दृष्टि से सम्यग्ज्ञानमय तेज को शरीर से जुदा देखने वाले हैं और जिनके पास स्त्री फटकने तक भी नहीं पाती ऐसे मुनीश्वरों को नमस्कार करते हैं।


दुष्प्रापं बहुदुःखराशिरशुचि स्तोकायुरल्पज्ञता
ज्ञातान्तं प्रतिदिनं जराहतमतिः प्रायो नरत्वं भवे।
अस्मिन्नेव तपस्ततः शिवपदं तत्रैव साक्षात्सुखं
सौख्यार्थीति विचिंत्य चेतसि तपः कुर्यान्नरो निर्मलम् ॥२१॥

अर्थ: जिस नर भव में बहुत दुखों का समूह है और जिसमें अपवित्र तथा थोड़ी आयु है और जिसमें थोड़ा ज्ञान है तथा जिसमें अंत के दिन का निश्चय नहीं है ‘‘अर्थात् कब मरण होगा यह बात मालूम नहीं है’’ और जिस नर भव में बुद्धि वृद्धावस्था से नष्ट है ऐसा इस संसार में यह नर भव है किन्तु तप की प्राप्ति इसी नर भव में ही होती है और उस तप से मोक्षपद की प्राप्ति होती है तथा उस मोक्षपद में साक्षात् सुख मिलता है। इसलिए ग्रन्थकार कहते हैं कि ऐसा भलीभाँति चित्त में विचार कर जो मनुष्य उत्तम सुख की प्राप्ति के अभिलाषी हैं उनको अवश्य ही निर्मल तप करना चाहिए।


उक्तेयं मुनिपद्मनन्दिभिषजा द्वाभ्यां युतायाः शुभा
सद्वृत्तौषधिविंशतेरुचितवागर्थाम्भसा वर्तिता।
निर्ग्रन्थैः परलोकदर्शनकृते प्रोद्यत्तपोवर्द्धकै-
श्चेतश्चक्षुरनंगरोगशमनी वर्तिः सदा सेव्यताम् ॥२२॥

अर्थ: श्रीपद्मनंदि नामक वैद्य द्वारा, उचित जो वचन और अर्थ वही हुआ जल उस से दो श्लोकों से सहित तथा श्रेष्ठ छन्दरूप ही हैं औषधि जिसमें ऐसी जो विंशति उससे ‘‘अर्थात् बाईस श्लोकों से’’ यह शुभ सलायी (ब्रह्मचर्यरक्षावर्ती) बनाई है इसलिए जो समस्त प्रकार के परिग्रहों से रहित निर्ग्रंथ हैं और उन्नत तप वर्धमान है अर्थात् जो अत्यन्त तपस्वी हैं उनके मनरूपी नेत्र में स्थित जो कामरूपी रोग, उसको शांत करने वाली यह सलायी परलोक के दर्शन के लिए अवश्य ही सेवनीय है।

१३. ऋषभस्तोत्र

जय उसह णाहिणंदण तिहुवणणिलयेकदीव तित्थयर।
जय सयलजीववच्छल णिम्मलगुणरयणणिहि णाह ॥१॥

अर्थ: श्रीमन् नाभिराजा के पुत्र तथा ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक और अधोलोकरूपी घर उसके लिए दीपक तथा धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति करने वाले, हे ऋषभदेव भगवन्! तुम सदा इस लोक में जयवंत रहो तथा समस्त जीवों पर वात्सल्य को धारण करने वाले और निर्मल गुण वे ही हुए रत्न उनके आकर (खजाना) ऐसे हे नाथ! तुम सदा इस लोक में जयवंत रहो। जो मनुष्य जिनेन्द्र भगवान् की फूलों से पूजा करता है वह मनुष्य परभव में मंद हास्य सहित ऐसी जो देवांगना उनके नेत्रों से पूजित होता है। और जो मनुष्य एक बार भी जिनेन्द्र को वंदता है वह मनुष्य रात-दिन तीनों लोक में वंदनीय होता है अर्थात् तीनों लोक आकर उसकी वंदना करता है। तथा जो मनुष्य एक बार भी जिनेन्द्र भगवान् की स्तुति करता है परलोक में बड़े-बड़े इंद्र उसकी स्तुति करते हैं। और जो मनुष्य एक बार भी जिनेन्द्र भगवान् का ध्यान करता है वह समस्त कर्मों से रहित हो जाता है तथा बड़े-बड़े योगीश्वर भी उस मनुष्य का ध्यान करते हैं। इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि वे भगवान् की पूजा, वंदना, स्तुति तथा ध्यान सर्वदा किया करें।


सयलसुरासुरमणिमउडकिरणकव्वुरियपायपीठ तुमं।
धण्णा पेच्छंति थुणंति जवंति झायंति जिणणाह ॥२॥

अर्थ: समस्त सुर तथा असुर उनके चित्र-विचित्र मणियों से सहित मुकुट, उनकी किरणें उनसे कर्वुरित अर्थात् चित्र-विचित्र है सिंहासन जिनका ऐसे हे जिननाथ! जो मनुष्य आपको देखते हैं और आपकी स्तुति करते हैं तथा आपका जप और ध्यान करते हैं वे मनुष्य धन्य हैं।


यःपुष्पैर्जिनमर्चति स्मितसुरस्त्रीलोचनैः सोर्च्यते
यस्तं वंदति एकशस्त्रिजगतां सोऽहर्निशं वन्द्यते।
यस्तं स्तौति परत्र वृत्तदमनस्तोमेन संस्तूयते,
यस्तं ध्यायति बलुप्तकर्मनिधनः स ध्यायते योगिभिः॥३॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र ! हे भगवन् ! यदि हम आपको चर्मचक्षु से भी देख लें तो भी हमें इतना भारी हर्ष होता है कि वह हर्ष तीनों लोकों में नहीं समाता। फिर यदि आपको हम ज्ञानरूपी नेत्र से देखें तब तो हम कह ही नहीं सकते कि हमको कितना आनंद होगा ?


तं जिण णाणमणंतं विसईकयसयलवत्थुवित्थारं।
जो थुणइ सो पयासइ समुद्दकहमवडसालुरो॥४॥
त्वां जिन ज्ञानमनंतं विषयीकृतसकलवस्तुविस्तारं।
यः स्तौति स प्रकाशयति समुद्रकथामवटसालूरः॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र ! जो पुरुष, नहीं है अंत जिसका तथा जिसने समस्त वस्तुओं के विस्तार को विषय कर लिया है ऐसे ज्ञानस्वरूप आपकी स्तुति करता है वह कुएँ का मेंढक समुद्र की कथा का वर्णन करता है।


अम्हारिसाण तुह गोत्तकित्तणेण वि जिणेस संचरइ।
आयेसम्मग्गंती पुरओ हियेइच्छिया लच्छी॥५॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र ! हे प्रभो ! आपके नाम के कीर्तन मात्र से ही हम सरीखे मनुष्यों के आगे आज्ञा को माँगती हुई मनोवांछित लक्ष्मी गमन करती है।


जासि सिरी तइ संते तुव अवयणमित्तिये णट्ठा।
संके जणियाणाट्ठा दिट्ठा सव्वट्ठसिद्धा वि॥६॥

अर्थ: हे सर्वज्ञ ! हे जिनेश ! जिस समय आप सर्वार्थसिद्धि विमान में थे उस समय जैसी उस विमान की शोभा थी वह शोभा आपके इस पृथ्वीतल पर उतरने पर आपके वियोग से उत्पन्न हुए दुख से नष्ट हो गई ऐसा मैं (ग्रन्थकार) शंका (अनुमान) करता हूँ।


णाहिघरे वसुहारा पडणं जं सुइर महितहो अरणी।
आसि णहाहि जिणेसर तेण धरा वसुमय़ी जाया॥७॥
नाभिगृहे वसुधारापतनं यत् सुचिरं महीमवतरणात्
आसीन् नभसो जिनेश्वर तेन धरा वसुमती जाता।

अर्थ: हे जिनेश्वर ! जिस समय आप इस पृथ्वी तल पर उतरे थे उस समय जो नाभिराजा के घर में बहुत काल तक धन की वर्षा आकाश से हुई थी, उसी से हे प्रभो ! यह पृथ्वी वसुमती हुई है।


सच्चियसुरणवियपया मरुएवी पहु ठिऊसि जं गब्भे।
पुरऊपट्टो वज्झइ मज्झे से पुत्तवत्तीणं॥८॥
शचीसुरनमितपदा मरुदेवी प्रभो स्थितोऽसि यद्गर्भे
पुरतः पट्टो बध्यते मध्ये तस्याः पुत्रवतीनाम्।

अर्थ: हे प्रभो ! हे जिनेन्द्र ! आप मरुदेवी माता के गर्भ में स्थित हुए थे इसीलिए मरुदेवी माता के चरण इन्द्राणी तथा देवों से नमस्कार किए गये हैं और जितनी पुत्रवती स्त्रियाँ थीं उन सबमें मरुदेवी का ही पद सबसे प्रथम रहा।


अंकत्थे तइ दिट्ठे जंतेण सुरालयं सुरिंदेण।
अणिमेसत्तबहुत्तं सयलं णयणाणपडिवण्णं॥९॥
अंकस्थे त्वयि दृष्टे गच्छता सुरालयं सुरेन्द्रेण
अनिमेषत्वबहुत्वं सफलं नयनानां प्रतिपन्नम्।

अर्थ: हे जिनेन्द्र ! सुमेरु पर जाते हुए इन्द्र की गोद में स्थित आपका दर्शन होने पर उसने अपने नेत्रों की निर्निमेषता (झपकने का अभाव) और अधिकता (सहस्र संख्या) को सफल समझा।


तित्थत्तणमावण्णो मेरु तुह जम्मण्हाणजलजोए।
तत्तस्स सूरपमुहा पयाहिणं जिण कुणंति सया॥१०॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेन्द्र ! जिस समय आपका जन्म स्नान मेरु के ऊपर हुआ था उस समय उस स्नान के जल के सम्बन्ध से मेरु तीर्थपने को प्राप्त हुआ था अर्थात् तीर्थ बना था और इसीलिए हे जिनेन्द्र ! उस मेरु पर्वत की सूर्य, चन्द्रमा आदिक सदा प्रदक्षिणा करते रहते हैं।


मेरुसिरे पडणुच्छलि - यणीरताडणपणट्ठदेवाणं।
तं वित्तं तुह ण्हाणं तह जह णहमासियं किण्णं॥११॥

अर्थ: जन्माभिषेक के समय मेरुपर्वत के शिखर पर नीचे गिरकर ऊपर उछलते हुए जल के अभिघात से कुछ खेद को प्राप्त हुए देवों के द्वारा आपका यह जन्माभिषेक इस प्रकार से सम्पन्न हुआ कि जिससे आकाश उन देवों और जल से व्याप्त हो गया।


णाह तुह जम्म ण्हाणे हरिणो मेरुम्मि णच्चमाणस्स।
वेल्लिरभुवाहि भग्गा तह अज्जवि भंगुरा मेहा॥१२॥

अर्थ: हे प्रभो! आपके जन्म स्नान के समय जिस समय अपनी लंबी भुजाओं को फैलाकर इंद्र ने नृत्य किया था। उन लंबी भुजाओं से जो मेघ भग्न हुए थे वे मेघ इस समय भी क्षणभंगुर ही हैं।


जाण बहुएहि वित्ती जाया कप्पदुमेहि तेहि विणा।
एक्केण वि ताण तए पयाण परिकप्पिया णाह ॥१३॥

अर्थ: हे नाथ! हे प्रभो! जिन प्रजाओं की आजीविका बहुत से कल्पवृक्षों से होती थी उन कल्पवृक्षों के अभाव में उन प्रजाओं की आजीविका आप अकेले ने ही की।


पहुणा तए सणाहा धरासि ती ए कहण्णहो वूढो।
णवघणसमयसमुल्लसियस्सासच्छम्मेण रोमंचो॥१४॥

अर्थ: हे भगवन् ! उस समय पृथ्वी आप जैसे प्रभु को पाकर सनाथ हुई थी। यदि ऐसा न हुआ होता तो फिर वह नवीन वर्षाकाल के समय प्रकट हुए धान्यांकुरों के छल से रोमांच को कैसे धारण कर सकती थी।


विज्जु व्व घणे रंगे दिट्ठपणिट्ठा पणच्चिरी अमरी।
जइया तइया वि तये रायसिरी तारिसी दिट्ठा॥१५॥
विद्युदिव घने रंगे दृष्टप्रणष्टा प्रनृत्यती अमरी
यदा तदापि त्वया राज्यश्रीः तादृशी दृष्टा।

अर्थ: हे वीतराग ! जिस प्रकार मेघ में बिजली दिख कर नष्ट हो जाती है उसी प्रकार आपने जिस समय नृत्य करती हुई नीलांजना नाम की देवांगना को पहले देखकर पीछे नष्ट हुई देखी उसी समय आपने राज्य लक्ष्मी को भी वैसा ही देखा अर्थात् उसको भी आपने चंचल समझ लिया।


वरेग्गदिणे सहसा वसुहा जुण्णं तिणव्व जं मुक्का।
देव तए सा अज्ज वि विलवह सरिजलरवा वरइ ॥१६॥
वैराग्यदिने सहसा वसुधा जीर्णतृणमिव यत् मुक्ता।
देव त्वया सा अद्यापि विलपति सरिज्जलमिषेण वराकी॥

अर्थ: हे जिनेश ! हे प्रभो ! जिस दिन आपको वैराग्य हुआ था उस दिन आपने यह पृथ्वी पुराने तृण के समान छोड़ दी थी। वह दीन पृथ्वी इस समय भी नदी के ब्याज से विलाप कर रही है।


अइसोइओ सि तइया काउस्सग्गट्ठिओ तुमं णाह।
धम्मिककघरारंभे उज्झीकय मूलखंभो व्व॥१७॥

अर्थ: हे भगवन् ! हे प्रभो ! जिस समय आप कायोत्सर्ग सहित विराजमान थे उस समय धर्मरूपी घर के निर्माण में उन्नत मूलखंभ के समान आप अत्यन्त शोभित होते थे।


हिययत्थझाणसिहिओज्झमाणसहसासरीरधूमोव्व ।
सोहइ जिण तुह सीसे महुअरकुलसं णिहो केसभरो॥१८॥

अर्थ: हे प्रभो ! हे जिनेन्द्र ! भौंरों के समूह के समान काला जो आपके मस्तक पर बालों का समूह है वह हृदय में स्थित ध्यानरूपी अग्नि उससे शीघ्र जलाया हुआ जो शरीर, उसके धूआँ के समान शोभित होता है ऐसा मालूम पड़ता है।


कम्मकलंकचउक्के णट्ठेणिम्मलसमाहिभूईए।
तुह णाणदप्पणे च्चिय लोयालोयं पडिफ्फालियं ॥१९॥

अर्थ: हे जिनेश ! हे प्रभो ! निर्मल समाधि के प्रभाव से चार घातिया कर्मों के नाश होने पर आपके सम्यग्ज्ञानरूपी दर्पण में यह लोक तथा अलोक प्रतिबिम्बित हुआ था।


आवरणाईणि तए समूलमुम्मूलियाइ दठ्ठूण।
कम्मचउक्केण मु१अं व णाह भीएण सेसेण॥२०॥
आवरणादीनि त्वया खमूलमुन्मूलितानि दृष्ट्वा।
कर्मचतुष्केण मृतवत् नाथ भीतेन शेषेण॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेन्द्र! जिस समय आपने जड़सहित ज्ञानावरणादि घातिया कर्मों का सर्वथा नाश कर दिया था उस समय उन सर्वथा नष्ट ज्ञानावरणादि कर्मों को देखकर शेष के जो चार अघातिया कर्म रहे, वे भय से आपकी आत्मा में मरे हुए के समान रह गये थे।


णाणामणिणिम्माणे देव ठिओ सहसि२ समवसरणम्मि।
उवरिव्व सणिविट्ठो जियाण जोईण सव्वाणं॥२१॥
नानामणिनिर्माणे देव स्थितः शोभते समवसरणे।
उपरि इव सन्निविष्टः यावतां योगिनां सर्वेषाम्।

अर्थ: हे जिनेश! हे प्रभो! जिस समवसरण की रचना चित्र-विचित्र मणियों से की गई थी ऐसे समवसरण में जितने मुनि थे उन समस्त मुनियों के ऊपर विराजमान आप अत्यन्त शोभा को प्राप्त होते थे।


लोउत्तरा वि सा समवसरणसोहा जिणेस तुह पाये।
लहिऊण लहइ महिमं रविणो णलिणि व्व कुसुमट्ठा ॥२२॥
लोकोत्तरापि सा समवसरणशोभा जिनेश तव पादौ।
लब्ध्वा लभते महिमानं रवेः नलिनीव कुसुमस्था॥

अर्थ: हे भगवन्! हे प्रभो! जिस प्रकार पुष्पों से व्याप्त कमलिनी सूर्य के किरणों को पाकर और भी अधिक महिमा को प्राप्त होती है। उसी प्रकार यद्यपि समवसरण की शोभा स्वभाव से ही लोकोत्तर होती है तो भी हे जिनेन्द्र! आपके चरण कमलों को पाकर वह और भी अत्यन्त महिमा को धारण करती है।


णिट्ठोसो अकलंको अजडो चंदो व्व सह सितं तह वि।
सीहासणायलत्थो जिणंद कयकुवलयाणंदो॥२३॥
निर्दोषः अकलंकः अजडः चन्द्रवत् शोभते तथापि।
सिंहासनाचलस्थः जिनेन्द्र कृतकुवलयानंदः॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र! हे प्रभो! आप यद्यपि निर्दोष तथा अकलंक और अजड़ (अज्ञानता से रहित) है तो भी अचल सिंहासन में स्थित तथा किया है कुवलय को आनंदित जिन्होंने ऐसे आप चन्द्रमा के समान शोभित होते हैं।


अच्छंतुं१ ताव इयरा फुरियविवेया णमंतसिरसिहरा।
होइ असोहो रुक्खो वि णाह तुह संणिहाणत्थो॥२४॥
आस्तां तावत् इतरा स्फुरितविवेका नम्रशिरः शिखराः।
भवति अशोक वृक्षः अपि नाथ तव सन्निधानस्थः॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि हे प्रभो ! हे जिनेन्द्र ! जिन भव्य जीवों के ज्ञान की ज्योति स्फुरायमान है और जो आपको मस्तक झुकाकर नमस्कार करते हैं वे तो दूर ही रहे किन्तु हे भगवन् ! आपके समीप रहा हुआ जड़ वृक्ष भी अशोक हो जाता है।


छत्तत्तयमालंवियणिम्मलमुत्ताहलच्छलातुज्झ।
जणलोयणेसु वरिसइ अमयं पि व णाह बिंदूहिं ॥२५॥

अर्थ: हे भगवन् ! हे नाथ ! आपके जो ये तीनों छत्र हैं वे लटकते हुए जो निर्मल मुक्ताफल उनके ब्याज से मनुष्यों की आँखों में बिंदुओं से अमृत की वर्षा करते हैं ऐसा मालूम होता है।


कयलोयलोयणुप्वलहरिसाह सुरेसहत्थचलियाह।
तुह देव सरहससहरकिरणकयाइ व्व चमराइ॥२६॥

अर्थ: जिन चमरों के देखने से समस्त लोक के नेत्ररूपी कमलों को हर्ष होता है और जिनको बड़े-बड़े इंद्र ढोरते हैं ऐसे हे जिनेन्द्र ! आपके चमर शरदऋतु के चन्द्रमा की किरणों से बनाये गये हैं। ऐसा मालूम होता है।


विहलीकयपंचसरो पंचसरो जिण तुमम्मि काऊण।
अमरकयपुप्फविट्ठिच्छलइव वहु मुअइ कुसुमसरो॥२७॥
विफलीकृतपंचशरः पंचशरो जिन त्वयि कृत्वा।
अमरकृतपुष्पवृष्टिच्छलाद् इव बहून् मुंचति कुसुमशरान्॥

अर्थ: हे भगवन्! हे जिनेन्द्र! जिस कामदेव के, आपके सामने पाँचों बाण विफल हो गये हैं ऐसा कामदेव, देवों के द्वारा जो आपके ऊपर पुष्पों की वर्षा हुई, उसके ब्याज से पुष्पों के बाणों का त्यागकर रहा है, ऐसा मालूम होता है।


एस जिणो परमप्पा णाणोण्णाणं सुणेह मा वयणं।
तुह दुंदुही रसंतो कहइ व तिययस्स मिलियस्स॥२८॥
एष जिनः परमात्मा नान्योऽन्येषां शृणुत मावचनम्।
तव दुंदुभिःरसन् कथयति इव त्रिजगतः मिलितस्य॥

अर्थ: हे भगवन्! बजती हुई जो आपकी दुंदुभि (नगाड़ा) वह तीनों लोकों को इकट्ठा कर यह बात कहती है कि हे लोगो ! यदि वास्तविक परमात्मा हैं तो भगवान् आदिनाथ ही हैं किन्तु इनसे भिन्न परमात्मा कोई भी नहीं है। इसलिए तुम इनसे अतिरिक्त दूसरे का उपदेश मत सुनो इन्हीं भगवान् के उपदेश को सुनो।


रविणो संतावेयरं ससिणो उण जडुयाअरं देव।
संतावजडत्तहरं तुम्हच्चिय पहु पहावलयं॥२९॥
रवेः संतापकरं शशिनःपुनः जडताकरं देव।
संतापजडत्वहरं तवार्चित प्रभो प्रभावलयम्॥

अर्थ: हे जिनेश! हे प्रभो! सूर्य का प्रभासमूह तो मनुष्यों को संताप का करने वाला है तथा चन्द्रमा का प्रभासमूह जड़ता का करने वाला है किन्तु हे पूज्यवर! आपका प्रभासमूह तो संताप तथा जड़ता दोनों को नाश करने वाला है।


मंदरमहिज्जमाणांबुरासिणिघोससण्णिहा तुज्झ।
वाणी सुहा ण अण्णा संसारविसस्स णासयरी॥३०॥
मंदरमथ्यमानाम्बुराशिनिर्घोषसन्निभा तव।
वाणी शुभा संसारविषस्य नाशकरी॥

अर्थ: हे भगवन्! हे जिनेश! मंदराचल से मंथन किया गया जो समुद्र उसका जो निर्घोष (बड़ा भारी शब्द) उसके समान जो आपकी वाणी है वह शुभ है किन्तु अन्य वाणी शुभ नहीं है तथा आप की वाणी ही संसाररूपी विष को नाश करने वाली है किन्तु और दूसरी वाणी संसाररूपी विष को नाश करने वाली नहीं है।


पत्ताण सारणिं पिव तुज्झ गिरं सा गई जडाणं पि।
जो मोक्खतरुट्ठाणे असरिसफलकारणं होई॥३१॥
प्राप्तानां सारिणीमिव तव गिरं सा गतिः जडानामपि।
या मोक्षतरुस्थाने असदृशफल कारणं भवति।

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेश! जो अज्ञानी जीव आपकी वाणी को प्राप्त कर लेते हैं उन अज्ञानी जीवों की भी वह गति होती है जो गति मोक्षरूपी वृक्ष के स्थान में अत्युत्तम फल की कारण होती है।


पोयं पिव तुह पवयणम्मि सल्लीणफुडमहो कयजडोहं।
हेलाएच्चिय जीवा तरंति भवसायरमणंतं॥३२॥
पोत इव तव प्रवचने सल्लीना स्फुटमहो कृतजलौघम्।
हेलयार्चित जीवाः तरंति भवसागरमनंतं॥

अर्थ: जिन मनुष्यों के पास जहाज मौजूद है वे मनुष्य जिस प्रकार उस जहाज में बैठकर जिसमें बहुत सा जल का समूह विद्यमान है ऐसे समुद्र को बात ही बात में तर जाते हैं। उसी प्रकार हे पूज्य! हे जिनेश! जो मनुष्य आपके वचन में लीन हैं अर्थात् जिन मनुष्यों को आपके वचन के ऊपर श्रद्धान है बड़े आश्चर्य की बात है कि वे मनुष्य भी पल मात्र में जिसका अंत नहीं है ऐसे संसाररूपी सागर को तर जाते हैं।


तुह वयणं चिय साहइ णूणमणेयंतवायवियडपहं
तह हिययपईप१अरं सव्वत्तणमप्पणो णाह॥३३॥
तव वचनमेव साधयति नूनमनेकांतवादविकटपथम्।
तथा हृदयप्रदीपकरं सर्वज्ञत्वमात्मनो नाथ।

अर्थ: हे जिनेन्द्र! हे प्रभो! आपके वचन ही निश्चय से अनेकांतवादरूपी जो विकट मार्ग है उसको सिद्ध करते हैं तथा हे नाथ! यह जो आपका सर्वज्ञपना है वह समस्त मनुष्यों के हृदयों को प्रकाश करने वाला है।


विप्पडिवज्जइ जो तुह गिराए मइसुइबलेण केवलिणो।
वरदिट्ठिदिट्ठणहजंतप१क्खगणणेवि सो अंधो॥३४॥

अर्थ: हे भगवन्! जो मनुष्य मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञान के ही बल से आप केवली के वचन में विवाद करता है वह मनुष्य उस प्रकार का काम करता है कि अच्छी दृष्टि वाले मनुष्य द्वारा देखे हुए जो आकाश में जाते हुए पक्षी उनकी गणना में जिस प्रकार अंधा संशय करता है।


भिण्णाण परणयाणं एक्केक्कमसंगयाणया तुज्झ।
पावंति जयम्मि जयं मज्झम्मि रिऊण किं चित्तं॥३५॥

अर्थ: हे भगवन्! हे प्रभो! आपके नय, परस्पर में नहीं सम्बन्ध रखने वाले तथा भिन्न, ऐसे पर वादियों के नयरूपी बैरियों के मध्य में तीनों जगत् में विजय को प्राप्त होते हैं। इसमें कोई भी आश्चर्य नहीं।


अण्णस्स जाए जीहा कस्स सयाणस्स वण्णणे तुज्झ।
जच्छ जिण तेवि जाया सुरगुरुपमुहा कई कुंठा॥३६॥

अर्थ: हे जिनेश! हे प्रभो! ऐसा संसार में कौन सा पुरुष समर्थ है कि जिसकी जिह्वा उत्तम ज्ञान के धारक आपके वर्णन करने में समर्थ हो ? क्योंकि बृहस्पति आदिक जो उत्तम कवि हैं वे भी आपके वर्णन करने में मंद बुद्धि हैं।


सो मोहत्थेणरहिओ पयासिओ पहु सुपहो तए वइया।
१तेणाज्ज वि रयणजुआ णिव्विग्घं जंति णिव्वाणं ॥३७॥

अर्थ: हे प्रभुओं के प्रभु जिनेन्द्र! आपने उस समय मोहरूपी चोर से रहित उत्तम मार्ग का प्रकाशन किया था इसलिए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र के धारी भव्यजीव इस समय भी उस मार्ग से, बिना ही क्लेश के मोक्ष को चले जाते हैं।


उम्मुद्दियम्मि तम्मि हु मोक्खणिहाणे गुणणिहाण तए।
केहिं ण जु णतिणाइ व इयरणिहाणाइ भुवणम्मि॥३८॥

अर्थ: हे भगवन्! हे गुणनिधान! जिस समय आपने मोक्ष रूपी खजाने को खोल दिया था उस समय ऐसे कौन से भव्यजीव नहीं हैं जिन्होंने जीर्ण तृण के समान दूसरे-दूसरे राज्य आदि निधानों को नहीं छोड़ दिया।


मोहमहाफणिडक्को जणो विरायं तुमं पमुत्तूण।
इयरणाए कह पहु विचेयणो चेयणं लहइ ॥३९॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेश! जो पुरुष मोहरूपी प्रबल सर्प से काटा गया है अर्थात् जो अत्यन्त मोही है वह मनुष्य समस्त प्रकार के रोगों से रहित वीतराग आपको छोड़कर आपसे भिन्न जो कुदेव हैं उनकी आज्ञा से कैसे चेतना को प्राप्त कर सकता है? अर्थात् वह कैसे ज्ञानी बन सकता है?


भवसायरम्मि धम्मो धरइ पडंतं जणं तुहच्चेव।
सवरस्स व परमारणकारणमियराण जिणणाहा॥४०॥
भवसागरे धर्मो धरति पतंतं जनं तवैव।
शवरस्येव परमारणकारणमितरेषां जिननाथ॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेश! संसाररूपी समुद्र में गिरते हुए जीवों को आपका धर्म ही धारण करता है किन्तु हे जिनेन्द्र! आपसे भिन्न जितने भी धर्म हैं वे भील के धनुष के समान दूसरों के मारने में ही कारण हैं।


अण्णो को तुह पुरउ वग्गइ गुरुयत्तणं पयासंतो।
जम्मि तइ परमियत्तं केसणहाणंपि जिण जायं ॥४१॥
अन्यः कः तव पुरतो वल्गति गुरुत्वं प्रकाशयन्।
यस्मिंस्त्वयि प्रमाणत्वं केशनखानामपि जिन जातम्॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेन्द्र! जब आपके केश तथा नख भी परिमित हैं अर्थात् बढ़ते-घटते नहीं, तब ऐसा कौन है जो आपके सामने अपनी गुरुता को प्रकाशित करता हुआ बोलने की सामर्थ्य रखता हो।


सोहइ शरीरं तुह पहु तिहुयणजणणयणबिंबविच्छुरियं
पडिसमयमच्चियं चारुतरलनीलुप्पलेहिं व ॥४२॥
शोभते शरीरं तव प्रभो त्रिभुवनजननयनबिंबविच्छुरितं।
प्रतिसमयमर्चितं चारुतरलनीलोत्पलैरिव॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेन्द्र! तीनों लोक के जीवों के नेत्र उनका जो प्रतिबिंब उनसे चित्र-विचित्र आपका शरीर ऐसा मालूम पड़ता है मानों सुंदर तथा चंचल नीलकमलों से प्रति समय पूजित ही है क्या ?


अहमहमिआये णिवडंति णाह छूहियालिणोव्व हरिचक्खू।
तुज्झ च्चिय णहपहसरमज्झट्ठियचलणकमलेसु ॥४३॥

अर्थ: हे जिनेश! हे प्रभो! आपके पूजित जो नख उनकी जो प्रभा (कांति) वही हुआ सरोवर उसके मध्य में स्थित जो चरण कमल उनमें भूखे भ्रमरों के समान इन्द्रों के नेत्र अहम् अहम् (मैं-मैं) इस रीति से गिरते हैं।


कणयकमलाणमुवरिं सेवातुहविबुहकप्पियाण तुह।
अहियसिरीणं तत्तो जुत्तं चरणाण संचरणं ॥४४॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र! हे प्रभो! आपके चरण अत्यन्त उत्तम शोभा से संयुक्त हैं इसलिए उनका, भक्ति वश देवों द्वारा रचित जो सुवर्ण कमल उनके ऊपर गमन करना युक्त ही है।


सइहरिकयकण्णसुहो गिज्जइ अमरेहि तुज्झ जसो सग्गो।
मण्णे तं सोउमणो हरिणो हरिणंकसल्लीणे॥४५॥

अर्थ: हे भगवन् ! हे जिनेन्द्र ! जिसके सुनने से इंद्र तथा इंद्राणी के कानों को सुख होता है ऐसे आपके यश को सदा स्वर्गों में देवता लोग गाया करते हैं। इसलिए ऐसा मालूम होता है कि उसी के सुनने के लिए मृग चन्द्रमा में जाकर लीन हो गया।


अलियं कमले कमला कमकमले तुह जिणिंद सा वसइ।
णहकिरणणिहेण घडंति णयजणे से कडक्खछडा॥४६॥

अर्थ: हे प्रभो ! हे जिनेश ! लक्ष्मी कमल में रहती है। यह बात सर्वथा असत्य है क्योंकि वह लक्ष्मी आपके चरण कमलों में रहती है क्योंकि जो भव्यजीव आपको शिर झुकाकर नमस्कार करते हैं उन भव्यजीवों के ऊपर नखों की किरणों के बहाने से उस लक्ष्मी का कटाक्षपात प्रतीत होता है।


जे कयकुवलयहरिसे तुमम्मि विद्देसिणो स ताणं पि।
दोसो ससिम्मि वा आहयाण जह वाहियावरणं ॥४७॥
ये कृतकुवलयहर्षे त्वयि विद्वेषिणः स तेषामपि।
दोषः शशिनि इव आहतानां यथा बाह्यावरणम्॥

अर्थ: चन्द्रमा तो सदा पृथ्वी को (रात्रि विकासी कमलों को) आनंद का ही देने वाला है किन्तु जो मनुष्य रोग ग्रस्त हैं वे चन्द्रमा से घृणा करते हैं सो जिस प्रकार उस घृणा के करने में उनके बाह्य आवरण का (उनके रोग का) ही दोष है चन्द्रमा का दोष नहीं। उसी प्रकार हे जिनेन्द्र ! आप तो समस्त भूमंडल को आनंद के करने वाले हैं यदि ऐसा होने पर भी कोई मूर्ख आपसे विद्वेष करे तो वह उसी का दोष है। इसमें आपका कोई भी दोष नहीं है।


को इहहि उव्वरंति जिण जयसंहरणमरणवणसिहिणो।
तुह पयथुइणिज्झरणीवारणमिणमो ण जइ होंति॥४८॥
क इहहि उद्धरति जिन जगत्संहरणमरणवनशिखिनः
तव पादस्तुतिनिर्झरिणीवारणमिदं न यदि भवति।

अर्थ: हे भगवन् ! हे प्रभो ! आपके चरणों की स्तुति, वही हुई नदी उससे यदि वारण बुझाना नहीं होता तो समस्त जगत् को संहार करने वाली ऐसी जो मरणरूपी वन की अग्नि उससे कैसे उद्धार होता ?


करजुयलकमलमउले भालतत्थे तुह पुरो कए वसइ।
सग्गापवग्गकमला थुणंति तं तेण सप्पुरिसा॥४९॥
करयुगलकमलमुकुले भालस्थे तव पुरतः कृते वसति।
स्वर्गापवर्गकमला कुर्वन्ति तत् तेन सत्पुरुषाः॥

अर्थ: हे भगवन् ! हे जिनेन्द्र ! जिस समय भव्यजीव आपके सामने दोनों हाथरूपी कमलों को मुकुलितकर अर्थात् जोड़कर मस्तक पर रखते हैं उस समय उनको स्वर्ग तथा मोक्ष लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इसीलिए उत्तम पुरुष हाथ जोड़कर मस्तक पर रखते हैं।


वियलाइ मोहणधूली तुह पुरओ मोहठगपरिट्ठविया।
पणवियसीसाओ तओ पणवियसीसा वुहा होंति ॥५०॥

अर्थ: हे भगवन्! हे प्रभो! जो भव्यजीव आपको मस्तक झुकाकर नमस्कार करते हैं उनकी मोहरूपी ठग से स्थापित मोहनरूपी धूली आपके सामने बात ही बात में नष्ट हो जाती है। इसीलिए विद्वान् पुरुष आपको नमस्कार करते हैं।


बंभप्पमुहा सण्णा सव्वा तुह जे भणंति अण्णस्स।
ससिजोण्हा खज्जोए जडेहि जोडिज्जये तेहिं॥५१॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेन्द्र! ब्रह्मा, विष्णु आदिक जो संज्ञा सुनने में आती हैं वे आपकी ही हैं अर्थात् आप ही ब्रह्मा हैं तथा आप ही विष्णु हैं तथा बुद्ध आदिक भी आप ही हैं किन्तु जो मनुष्य ब्रह्मा, विष्णु आदि संज्ञा दूसरों की मानते हैं वे मूढ़ मनुष्य चन्द्रमा की चांदनी का खद्योत (जुगुनू) के साथ सम्बन्ध करते हैं ऐसा मालूम होता है।


बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चितबुद्धिबोधात्त्वं शंकरोऽसि भुवनत्रयशंकरत्वात्।
धातासि धीर शिवमार्गविधेर्विधानाद्व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि॥५२॥

अर्थ: हे आदीश्वर भगवन् ! आपके ज्ञान की बड़े-बड़े देव आकर पूजन करते हैं इसलिए आप ही बुद्ध हो किन्तु आपसे भिन्न दूसरा कोई भी बुद्ध नहीं तथा आप ही तीनों लोकों के कल्याण करने वाले हैं इसलिए आप ही शंकर हो किन्तु आपसे भिन्न कोई भी शंकर (महादेव) नहीं है और हे धीर ! मोक्षमार्ग की विधि के रचना करने वाले आप ही हैं इसलिए आप ही विधाता (ब्रह्मा) हैं किन्तु आपसे भिन्न कोई भी व्यक्ति ब्रह्मा नहीं है और आप प्रकट रीति से समस्त पुरुषों में उत्तम हैं इसलिए आप ही पुरुषोत्तम (विष्णु) हैं किन्तु आपसे भिन्न कोई भी व्यक्ति पुरुषोत्तम नहीं है। हे भगवन् ! हे जिनेश ! आप ही तो मोक्ष के मार्ग हैं तथा समस्त प्राणियों के आप ही शरण हैं और समस्त जन्म-जरा-मरण आदि रोगों के नाश करने वाले आप ही बिना कारण के वैद्य हैं।


त्वामव्ययं विभुमचिंत्यमसंख्यमाद्यं ब्रह्माणमीश्वरमनंतमनंगकेतुम्।
योगीश्वरं विदितयोगमनेकमेकं ज्ञानस्वरूपममलं प्रवदंति सन्तः॥५३॥

अर्थ: हे भगवन् ! आप नाश से रहित हैं तथा विभु हैं अर्थात् आपका ज्ञान सर्व जगह पर व्यापक है और आप अचिन्त्य हैं अर्थात् आपका भलीभाँति कोई चिंतन नहीं कर सकता है और आप असंख्य हैं तथा आप सबके आदि में हुए हैं और आप ब्रह्मा हैं तथा ईश्वर हैं और अंत से रहित हैं तथा आप कामदेव स्वरूप हैं और समस्त योगियों के ईश्वर हैं तथा आप प्रसिद्ध ध्यानी हैं और आप अपने गुणों की अपेक्षा व्यवहारनय से अनेक हैं तथा परम शुद्ध निश्चयनय की अपेक्षा एक हैं और आप ज्ञानस्वरूप हैं तथा निर्मल हैं ऐसा उत्तम पुरुष कहते हैं। हे प्रभो! हे जिनेन्द्र! बड़े कष्टों से आपको प्राप्त होकर योगी लोग कृतकृत्य हो जाते हैं अर्थात् संसार में उन को दूसरा कोई भी काम बाकी नहीं रहता। इसलिए आपसे भिन्न कोई भी परमपद (मोक्षपद) का कारण दूसरा नहीं है।


तं चेव मोक्खपयवी तं चिय सरणं जणस्स सव्वस्स।
तं णिक्कारणविद्धो जाइजरामरणवाहिहरो ॥५४॥
त्वं चैव मोक्षपदवी त्वं चैव शरणं जनस्य सर्वस्य।
त्वं निष्कारणवैद्यः जातिजरामरणव्याधिहरः॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेश! आप सूक्ष्म तो इतने हैं कि परमाणु पर्यंत पदार्थों को प्रत्यक्ष करने वाले भी आपको देख नहीं सकते तथा गुरु आप इतने हैं कि सम्यग्ज्ञान स्वरूप आपमें यह समस्त पदार्थ समूह समाया हुआ है अर्थात् आपका ज्ञान आकाश से भी अनंतगुणा है। इसलिए आकाशादि समस्त पदार्थ आपके ज्ञान में झलक रहे हैं।


किच्छहि समुवलद्धे कयकिच्चा जम्मि जोइणो होंति।
तं परमकारणं जिण ण तुमाहिंतो परोअत्थि॥५५॥
कृच्छ्रात्समुपलब्धे कृतकृत्या यस्मिन् योगिनो भवंति।
तत्परमपदकारणं जिन न त्वत्तः परोऽस्ति॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेन्द्र! समस्त वस्तुओं के समूह में जो मनुष्य हेय तथा उपादेय को देखने वाला है उस पुरुष की दृष्टि में परमात्मा आप ही सार हैं और आपसे भिन्न जितने पदार्थ हैं वे समस्त सूखे तृण के समान असार हैं।


सुहमोसि तह ण दीससि जह पहु परमाणुपेच्छियेहिंपि।
१गुरवो तह बोहमए जह तइ सव्वंपि सम्मायं॥५६॥
सूक्ष्मोऽसि तथा न दृश्यसे परमाणुप्रेक्षिभिरपि।
गरिष्टस्तथा बोधमये यथा त्वयि सर्वमपि सम्मातम्॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेश! जिस आकाश के गर्भ में ये तीनों भुवन परमाणु की लीला को धारण करते हैं अर्थात् परमाणु के समान मालूम पड़ते हैं वह आकाश भी आपके ज्ञान के मध्य में परमाणु के समान मालूम पड़ता है ऐसी महिमा आपके ज्ञान में ही मौजूद है किन्तु आपसे भिन्न और किसी भी देव के ज्ञान में ऐसी महिमा नहीं है।


णिस्सेसवत्थुसत्थे हेयमहेयं निरूवमाणस्स।
तं परमप्पा सारो सेसमसारं पलालं वा॥५७॥
निश्शेषवस्तुसार्थे हेयमहेयं विरूप्यमाणस्य।
त्वं परमात्मा सारः शेषमसारं पलालं वा॥

अर्थ: हे तीनभुवन के स्तुति के पात्र! संसार में सरस्वती आपकी स्तुति करती है यदि वह भी आपके गुणों के अंत को नहीं प्राप्त कर सकती है तब अन्य जो मूर्ख पुरुष है वह यदि आपके गुणों की स्तुति करे तो वह कैसे आपके गुणों का अंत पा सकता है?


धरइ परमाणुलीलं जं गब्भे तिहुयणंपि तंपि णह।
अंतो णाणस्स तुह इयरस्स न एरसी महिमा॥५८॥

अर्थ: हे त्रिभुवनगुरो ! हे जिनेन्द्र ! आपके गुणों के समूहरूपी आकाश में गमन करने वाली तथा दूर तक गई हुई ऐसी किसकी वाणीरूपी पक्षिणी है ? जो अंत को प्राप्त हो जावे।


भुवणत्थुय थुणइ जइ जए सरस्सई संतयं तुहं तहवि।
ण गुणंतं लहइ तहिं को तरइ जडो जणो अण्णो॥५९॥

अर्थ: हे गुणागार प्रभो ! आपके स्तोत्र करने में इन्द्र भी असमर्थ हैं और महादेव तथा शेषनाग भी अशक्त हैं उस आपके स्तोत्र करने में मैं अल्पबुद्धि कवि क्या चीज हूँ ? इसलिए मैंने भी जो आपका स्तोत्र किया है, उसको क्षमा कीजिये।


खयरिव्व संचरंती तिहुयणगुरु तुह गुणोहगयणम्मि।
दूरंपि गया सुइरं कस्स गिरा पत्तपेरंता॥६०॥

अर्थ: हे जिनेश ! हे प्रभो ! आप भव्यरूपी कमलों को आनंद के देने वाले तथा तेज के निधान और निर्दोष सूर्य के समान हैं। इसलिए मोहरूपी अंधकार के नाश करने के लिए आपके चरण सदा प्रसन्न रहें।


जत्थअसक्को सक्को अणीसरो ईसरो फणीसोवि।
तुह थोत्ते तत्थ कई अहममई तं खमिज्जासु॥६१॥


तं भव्वपोमणंदी तेयणिही सूरोव्व णिद्दोसो।
मोहंधयारहरणे तुह पाया मम पसीयंत्तु॥६२॥

१४. श्रीमज्जिनवरस्तोत्र

दिट्ठे तुमम्मि जिणवर सहलीहूआइ मज्झ णयणाइं।
चित्तं गत्तं च लहू अमिएण व सिंचियं जायं॥१॥
दृष्टे त्वयि जिनवर सफलीभूतानि मम नयनानि।
चित्तं गात्रं च लघु अमृतेन वै सिंचितं जातम्॥

अर्थ: हे जिनेश! हे प्रभो! आपको देखने से मेरे नेत्र सफल होते हैं तथा मेरा मन और मेरा शरीर ऐसा मालूम होता है कि मानो अमृत से ही शीघ्र सींचा गया हो।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर दिट्ठिहरासेसमोहतिमिरेण।
तह णट्ठं जह दिट्ठं जहदिट्ठियं तं मए तच्चं ॥२॥
दृष्टे त्वयि जिनवर दृष्टिहरनिखिलमोहतिमिरेण।
तथा नष्टं यथा दृष्टं यथास्थितं तन्मया तत्त्वम्॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र! आपके देखने पर, जो सर्वथा दृष्टि को रोकने वाला था ऐसा मोहरूपी अंधकार इस रीति से नष्ट हो गया कि मैंने जैसा वस्तु का स्वरूप था वैसा देख लिया।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर परमाणंदेण पूरियं हिययं।
मज्झ तहा जह मग्गे मोक्खं पिव पत्तमप्पाणं ॥३॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र ! हे प्रभो ! आपके देखने से परमानन्द से भरे हुए मैं अपने मन को ऐसा मानता हूँ मानो मैं ही मोक्ष को साक्षात् प्राप्त हो गया हूँ।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर णट्ठं चिय मणिययं महापावं।
रविउग्गमे णिसाए ठाइ तमो कित्तियं कालं॥४॥

अर्थ: हे जिनवर ! आपके देखने पर प्रबल पाप नष्ट हो गया ऐसा मुझे मालूम हुआ सो ठीक ही है क्योंकि सूर्य के उदय होने पर रात्रि का अंधकार कितने काल तक रह सकता है ?


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर सिज्झइ सो कोवि पुण्णपब्भारो।
होइ जणो जेण पहु इह-परलोयत्थसिद्धीणं॥५॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र ! आपके देखने से ऐसे किसी उत्तम पुण्यों के समूह की प्राप्ति होती है कि जिसकी कृपा से यह जन इस लोक तथा परलोक दोनों लोक की सिद्धियों का स्वामी हो जाता है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर मण्णे तं अप्पणो सुकयलाहम्।
होही सो जेणासरिससुहणिही अक्खओ मोक्खो ॥६॥
दृष्टे त्वयि जिनवर मन्ये तमात्मनः सुकृतलाभम्।
भविष्यति येनासदृशसुखनिधिः अक्षयो मोक्षः॥

अर्थ: हे जिनेश! हे प्रभो! आपके देखने से उस पुण्य लाभ को मानता हूँ जिस पुण्य लाभ से असाधारण सुख की निधि तथा अविनाशी ऐसे मोक्ष पद की प्राप्ति होती है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर संतोसो मज्झ तह परो जाओ।
इंदविहवोपि जणइ ण १तण्हालेसंपि जह हियए॥७॥
दृष्टे त्वयि जिनवर संतोषो मम तथा परो जातः।
इन्द्रविभवोऽपि जनयति न तृष्णालेशमपि यथा हृदये॥

अर्थ: हे स्वामिन्! हे जिनेन्द्र! आपके देखने से मुझे ऐसा उत्तम संतोष हुआ है कि जिस संतोष के सामने इन्द्र का ऐश्वर्य भी मेरे हृदय में तृष्णा के लेश को भी उत्पन्न नहीं करता है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर वियारपडिवज्जिए परमसंते।
जस्स ण हिट्ठी दिट्ठी तस्स ण णियजम्मविच्छेओ॥८॥
दृष्टे त्वयि जिनवर विकारपरिवर्जिते परमशान्ते।
यस्य न हृष्टा दृष्टिः तस्य न निजजन्मविच्छेदः॥

अर्थ: समस्त प्रकार के विकारों से रहित तथा परम शांत ऐसे आपको देखकर हे जिनेन्द्र! जिस मनुष्य की दृष्टि को आनंद नहीं होता उस मनुष्य के स्वीय जन्मों का नाश भी नहीं होता।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर जम्मह कज्जंतराउलं हिययं।
कइयावि होइ पुव्वाजियस्स कम्मस्स सो दोसो॥९॥
दृष्टे त्वयि जिनवर यन्मम कार्यान्तराकुलं हृदयं।
कदापि भवति पूर्वार्जितस्य कर्मणः स दोषः॥

अर्थ: हे प्रभो ! हे जिनेन्द्र ! आपको देखकर भी, जो कभी-कभी मेरा मन दूसरे-दूसरे कार्यों से आकुलित हो जाता है उसमें मेरे पूर्वोपार्जित कर्म का ही दोष है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर अच्छउ जम्मंतरं ममेहावि
सहसा सुहेहि घडियं दुक्खेहि पलाइयं दूरं॥१०॥
दृष्टे त्वयि जिनवर आस्तां जन्मांतरं ममेहापि।
सहसा सुखैर्घटितं दुःखैश्च पलायितं दूरम्॥

अर्थ: हे जिनवर प्रभो ! आपके दर्शन से मेरे दूसरे जन्मों की तो बात दूर ही रही किन्तु इस जन्म में भी मुझे नाना प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है और मेरे समस्त पाप दूर भाग जाते हैं।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर वज्झइ पट्टो दिणम्मि अज्जयणे।
सहलत्तणेण मज्झे सव्वदिणाणंपि सेसाणं॥११॥
दृष्टे त्वयि जिनवर वध्यते पट्टो दिनेऽद्यतने।
सफलत्वेन मध्ये सर्वदिनानामपि शेषाणाम्॥

अर्थ: हे प्रभो जिनवर ! आपके दर्शनों के होने के कारण समस्त दिनों में आज का दिन उत्तम तथा सफल है ऐसा जानकर पट्ट बंधन किया।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर भवणमिणं तुज्झ महमहग्धतरं।
सव्वाणंपि सिरीणं संकेयघरं व पडिहाइ॥१२॥
दृष्टे त्वयि जिनवर भवनमिदं तव महार्घ्यतरम्।
सर्वासामपि श्रीणां संकेतगृहमिव प्रतिभाति॥

अर्थ: हे प्रभो जिनेश्वर ! आपके देखने से, यह जो बहुमूल्य आपका मंदिर है वह मेरे लिए समस्त प्रकार की लक्ष्मी के संकेत घर के समान है ऐसा मुझे मालूम पड़ता है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर भत्तिजलोल्लं समासियं छेत्तं।
जंतं पुलयमिसा पुण्णवीयांकुरियमिव सोहइ॥१३॥
दृष्टे त्वयि जिनवर भक्ति जलौघेन समाश्रितं क्षेत्रम्।
यत्तत्पुलकमिषात् पुण्यबीजमंकुरितमिव शोभते॥

अर्थ: हे प्रभो ! हे जिनेन्द्र ! आपके देखने से जो मेरा क्षेत्र (शरीर) भक्तिरूपी जल से समाश्रित हुआ (सींचा गया) वह शरीर रोमांचों के बहाने से ऐसा शोभित होता है मानों अंकुर स्वरूप से परिणत पुण्य बीज ही है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर समयामयरसायरे गहीरम्मि।
रायाइदोसकलुसे देवे को मण्णए सयाणे॥१४॥
दृष्टे त्वयि जिनवर समयामृतसागरे गंभीरे।
रागादिदोषकलुषे देवे को मन्यते सज्ञानः॥

अर्थ: हे प्रभो ! हे जिनेन्द्र ! सिद्धान्तरूपी अमृत के गंभीर समुद्र, आपके देखने पर ऐसा कौन-सा ज्ञानी होगा जो रागादि दोषों से जिनकी आत्मा मलिन हो रही है ऐसे देवों को मानेगा ?


दिड्ढे तुमम्मि जिणवर मोक्खो अड्ढुल्लहोवि संपड्डइ।
मिच्छत्तमलकलंकी मणो ण जइ होइ पुरिसस्स॥१५॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेश! यदि मनुष्य का मन मिथ्यात्वरूपी कलंक से कलंकित नहीं हुआ हो तो वह पुरुष आपके दर्शन से अत्यन्त दुर्लभ भी मोक्ष को भलीभाँति प्राप्त कर लेता है।


दिड्ढे तुमम्मि जिणवर चम्ममएणाच्छिणावि तं पुण्णं।
जं जणह पुरो केवलदंसणणाणाइ णयणाईं॥१६॥

अर्थ: हे प्रभो! जो मनुष्य आपको चर्मचक्षु से देख लेता है उस मनुष्य को जब उस चर्म के नेत्र से देखते ही इतने पुण्य की प्राप्ति होती है कि वह आगे केवलदर्शन तथा केवलज्ञान को भी प्राप्त कर लेता है अर्थात् वह पुरुष चार घातिया कर्मों को नाशकर केवली बन जाता है तब जो पुरुष आपको दिव्य नेत्र से देखता है उसको क्या-क्या फल की प्राप्ति न होगी अर्थात् दिव्यदृष्टि से आपको देखने वाला मनुष्य तो अवश्य ही अचिंत्य फल को प्राप्त करता है। इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं।


दिड्ढे तुमम्मि जिणवर सुकयत्थो मण्णई ण जेणाप्पा।
सो बहुअ बुड्डणुब्बुड्डणाइ भवसायरे काही॥१७॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेश! जिस मनुष्य ने आपको देखकर भी अपनी आत्मा को कृतकृत्य नहीं माना वह मनुष्य नियम से संसाररूपी समुद्र में मज्जन तथा उन्मज्जन को करेगा अर्थात् जिस प्रकार मनुष्य समुद्र में उछलता तथा डूबता है उसी प्रकार वह मनुष्य बहुत काल तक संसार में जन्म-मरण करता हुआ भ्रमण करेगा।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर णिच्छयदिट्ठीय होइ जं किंपि।
ण गिराइ गोयरं तं साणुभवत्थंपि किं भणिमो॥१८॥
दृष्टे त्वयि जिनवर निश्चयदृष्ट्या भवति यत्किमपि।
न गिरां गोचरं तत् स्वानुभवस्थमपि किं भणामः॥

अर्थ: हे प्रभो ! हे जिनेश ! वास्तविक दृष्टि से आपके देखने पर जो कुछ हमको (आनंद) होता है वह यद्यपि हमारे मन में स्थित है तो भी वह वचन के अगोचर ही है इसलिए हम उसके विषय में क्या कहें ?।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर दट्ठव्वावधिविसेसरूवम्मि।
दंसणसुद्धायगयं दाणिं मम णत्थि सव्वत्थ॥१९॥
दृष्टे त्वयि जिनवर दृष्टव्यावधिविशेषरूपे
दर्शनशुद्ध्या गतमिदानीं मम नास्ति सर्वार्थः।

अर्थ: हे प्रभो जिनेन्द्र ! देखने योग्य पदार्थों की सीमा के विशेष स्वरूप अर्थात् केवलज्ञान स्वरूप आपके देखने पर मैं दर्शनविशुद्धि को प्राप्त हुआ और इस समय जितने बाह्य पदार्थ हैं वे मेरे नहीं हैं।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर अहियं सुहिया समुज्जला होइ।
जणदिट्ठी को पेच्छइ तद्दंसणसुहयरं सूरं॥२०॥
दृष्टे त्वयि जिनवर अधिकं सुखिता समुज्ज्वला भवति।
जनदृष्टिः कः प्रेक्षते तद्दर्शनसुखकरं सूरम्।

अर्थ: हे भगवन् ! आपको देखकर मनुष्यों की दृष्टि अधिक सुखी तथा अत्यन्त निर्मल होती है इसलिए दर्शन को सुख के करने वाले सूर्य को कौन देखता है? अर्थात् कोई नहीं।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर बुहम्मि दोसोज्झियम्मि वीरम्मि।
कस्स किल रमइ दिट्ठी जडम्मि दोसायरे खत्थे॥२१॥
दृष्टे त्वयि जिनवर बुद्धे दोषोज्झिते वीरे।
कस्य किल रमते दृष्टिः जडे दोषाकरे खस्थे॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र! ज्ञानवान् समस्त दोषों से रहित और वीर ऐसे आपको देखकर ऐसा कौन मनुष्य है जिसकी दृष्टि जड़ तथा दोषाकर और आकाश में रहने वाले ऐसे चन्द्रमा में प्रीति को करें।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर चिंतामणिकामधेणुकप्पतरू।
खज्जोयव्व पहाये मज्झ मणे णिप्पहा जाया॥२२॥
दृष्टे त्वयि जिनवर चिन्तामणिकामधेनुकल्पतरवः
खद्योता इव प्रभाते मम मनसि निष्प्रभा जाताः।

अर्थ: हे प्रभो जिनेन्द्र! आपके देखने पर जिस प्रकार सुबह के समय में पट बीजना (खद्योत) प्रभा रहित हो जाता है उसी प्रकार चिंतामणि, कामधेनु और कल्पवृक्ष भी मेरे मन में प्रभा रहित हो गये।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर रहसरसो मह मणम्मि जो जाओ।
आणंदासुमिसा सो तत्तो णीहरइ बहिरंतो॥२३॥
दृष्टे त्वयि जिनवर रहस्यरसो मम मनसि यो जातः।
आनन्दाश्रुमिषात् स ततो निस्सरति बहिरंतः॥

अर्थ: हे जिनेश! आपके देखने से जो मेरे मन में रहस्य रस (प्रेमरस) उत्पन्न हुआ है वह प्रेमरस आनंदाश्रुओं के ब्याज से भीतर से बाहर निकलता है ऐसा मालूम होता है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर कल्लाणपरंपरा पुरो पुरिसे।
संचरइ अणाहूयावि ससहरे किरणा मालव्व॥२४॥

अर्थ: हे प्रभो जिनेन्द्र! जिस प्रकार चन्द्रमा में किरणों की माला (पंक्ति) आगे गमन करती है उसी प्रकार आपके दर्शन से पुरुषों के सामने बिना बुलाये भी कल्याणों की परंपरा आगे गमन करती है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर दिसवल्लीओ फलंति सव्वाओ।
इट्ठं अहुल्लिया वि हु वरिसइ सुण्णंपि रयणेहिं ॥२५॥

अर्थ: हे प्रभो जिनेश्वर! आपके दर्शन के बिना पुष्पित भी समस्त दश दिशारूपी लता इष्ट पदार्थों को देती है तथा रत्नों से रहित भी आकाश रत्नों की वृष्टि करता है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर भव्वो भयवज्जिओ हवे णवरं।
गणणिंदच्चिय जायइ जोण्हापसरे सरे कुमुअं॥२६॥

अर्थ: जिस प्रकार चाँदनी के फैलने पर सरोवर में रात्रि विकाशी कमल शीघ्र ही प्रफुल्लित हो जाते हैं उसी प्रकार हे जिनेश! आपके केवल दर्शन से ही भव्यजीव समस्त प्रकार के भयों से रहित तथा मोहरूपी निद्रा से रहित सुखी हो जाते हैं।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर हिययेण महा-सुहं समुल्लसियं।
सरिणाहेणिव सहसा उग्गमिए पुण्णमाइंदे॥२७॥
दृष्टे त्वयि जिनवर हृदयेन महासुखं समुल्लसितम्।
सरिन्नाथेनेव सहसा उद्गमिते पूर्णमाचंद्रे।

अर्थ: हे जिनेश! हे प्रभो! जिस प्रकार चन्द्रमा के उदय होने पर समुद्र शीघ्र ही उल्लास को प्राप्त होता है उसी प्रकार आपके दर्शन से भी मेरे हृदय में अत्यन्त प्रसन्नता होती है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर दोहिमि चक्खूहिं तह सुही अहियं।
हियये जह सहसाच्छो होहित्ति मणोरहो जाओ ॥२८॥
दृष्टे त्वयि जिनवर द्वाभ्यां चक्षुभ्यां तथा सुखी अधिकं।
हृदये यथा सहस्राक्षो भविष्यति इति मनोरथो जातः॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेश! आपको देखकर मैं हृदय में इतना अधिक सुखी हुआ मानो बहुत शीघ्र मेरे प्रयोजन सिद्ध होंगे ऐसा मेरा मनोरथ ही सिद्ध हुआ।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर भवोवि मित्तत्तणं गओ एसो।
एयम्मि ठियस्स जओ जायं तुम्ह दंसणं मज्झ॥२९॥
दृष्टे त्वयि जिनवर भवोऽपि मित्रत्वं गत एषः।
एतस्मिन् स्थितस्य यतः जातं तव दर्शनं मम॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेश! आपके दर्शन से यह जन्म भी मेरा परम मित्र बन गया क्योंकि इस जन्म में रहने वाले मुझे आपका दर्शन हुआ है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर भव्वाणं भूरिभत्तिजुत्ताणं ।
सव्वाओ सिद्धीओ होंति पुरो एक्क-लीलाए ॥३०॥

अर्थ: हे प्रभो! हे भगवन्! गाढ़ जो भक्ति उस भक्ति से सहित जो भव्यजीव हैं उनको आपके दर्शन से बात ही बात में समस्त प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर सुहगइसंसाहणेक्क-वीयम्मि ।
कंठगयजीवियस्सवि धीरं संपज्जए परमं ॥३१॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेन्द्र! शुभ गति की सिद्धि में एक असाधारण कारण ऐसे आपके दर्शन से जिस प्राणी के प्राण कंठ में आ गये हैं अर्थात् जो तत्काल मरने वाला है ऐसे उस प्राणी को उत्तम धीरता आ जाती है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर कमम्मि सिद्धे ण किं पुरा सिद्धं ।
सिद्धियरं को णाणी महइ ण तुम्ह दंसणं तम्हा ॥३२॥
दृष्टे त्वयि जिनवर क्रमे सिद्धे न किं पुरा सिद्धम्।
सिद्धिकरं को ज्ञानी इच्छति न तव दर्शनं तस्मात्॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेश! आपके दर्शन से, आपके चरण कमलों की सिद्धि होने पर ऐसी कौन-सी वस्तु बाकी रही जो मुझे न मिली हो ? अर्थात् समस्त पदार्थों की सिद्धि हुई इसलिए ऐसा कौन-सा ज्ञानी है जो आपके दर्शनों की इच्छा न रखता हो ? अर्थात् समस्त ज्ञानी पुरुष आपके दर्शनों की इच्छा रखते हैं।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर पोम्मकयं दंसणत्थुई तुज्झ।
जो पहु पढ़इ तियालं भवजालं सो समोसरइ ॥३३॥
दृष्टे त्वयि जिनवर पद्मनंदीकृतां दर्शनस्तुति तव।
यः प्रभो पठति त्रिकालं भवजालं स स्फोटयति॥

अर्थ: हे प्रभो जिनेश! जो भव्यजीव पद्मनंदि नाम के आचार्य द्वारा की गई आपकी दर्शन स्तुति को तीनों काल पढ़ता है वह भव्यजीव संसाररूपी जाल का सर्वथा नाश कर देता है।


दिट्ठे तुमम्मि जिणवर भणियमिणं जणियजणमणाणंदं।
भव्वेहि पढ़ज्जंतं णंदउ सुयरं धरापीठे ॥३४॥
दृष्टे त्वयि जिनवर भणितमिदं जनितजनमनआनंदम्।
भव्यैः पठ्यमानं तत् नंदतु सुचिरं धरापीठे ॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेन्द्र! आपको देखकर कहा हुआ तथा समस्त भव्यजनों के मनों को आनंद का देने वाला और भव्य जीवों द्वारा पठ्यमान अर्थात् जिसका सदा भव्यजीव पाठ करते रहते हैं ऐसा यह आपका दर्शन स्तोत्र सदा इस पृथ्वी पर वृद्धि को प्राप्त हो॥३३॥

१५. श्रुतदेवता स्तुति

जयत्यशेषामरमौलिलालितं सरस्वति त्वत्पदपंकजद्वयम्।
हृदि स्थितं यज्जनजाड्यनाशनं रजोविमुक्तं श्रयतीत्यपूर्वताम् ॥१॥

अर्थ: समस्त प्रकार के जो देव उनके मुकुट उनसे लालित अर्थात् जिनको समस्त देव मस्तक नवाकर नमस्कार करते हैं ऐसी हे सरस्वति माता ! आपके दोनों चरणकमल सदा इस लोक में जयवंत हैं जो चरण कमल मन में तिष्ठते हुए मनुष्यों की समस्त प्रकार की जड़ताओं के नाश करने वाले और रज से रहित अपूर्वता को आश्रय करते हैं।


अपेक्षते यन्न दिनं न यामिनीं न चांतरं नैव बहिश्च भारति।
न तापकृज्जाड्यकरं न तन्महः स्तुवे भवत्याः सकलप्रकाशकम्॥२॥

अर्थ: हे सरस्वति ! जो आपका तेज न तो दिन की अपेक्षा करता है और न रात्रि की अपेक्षा करता है और न भीतर की अपेक्षा करता है और न बाहर की अपेक्षा करता है और जो तेज न जीवों को संताप देने वाला है और न जड़ता का करने वाला है तथा जो समस्त प्रकार के पदार्थों का प्रकाश करने वाला है। आचार्य कहते हैं कि इस प्रकार के सरस्वती के तेज को मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ अर्थात् ऐसा सरस्वती का आश्चर्य का करने वाला तेज मेरी रक्षा करे।


तव स्तवे यत्कविरस्मि साम्पतं भवत्प्रसादादिव लब्धपाटवः।
सवित्रि गंगासरितेऽर्घदायको भवामि तत्तज्जलपूरिताञ्जलिः॥३॥

अर्थ: हे सरस्वति माता! आपकी कृपा से ही प्राप्त किया है चातुर्य जिसने ऐसा मैं इस समय आपकी स्तुति करने में कवि हुआ हूँ, उससे ऐसा मालूम होता है कि गंगा नदी के जल से पूरित (भरी हुई) है अंजुली जिसकी ऐसा मैं गंगा नदी के लिए ही अर्घ देने वाला हुआ हूँ।


श्रुतादिकेवल्यपि तावकीं श्रियं स्तुवन्नशक्तोऽहमिति प्रपद्यते।
जयेति वर्णद्वयमेव मादृशा वदन्ति यद्देवि तदेव साहसम्॥४॥

अर्थ: हे सरस्वति माता! आपकी शोभा की स्तुति करता हुआ श्रुत है आदि में जिसके ऐसा केवली भी अर्थात् श्रुतकेवली भी जब ‘‘मैं सरस्वती की शोभा की स्तुति करने में असमर्थ हूँ’’ ऐसा अपने को मानता है तब मुझ सरीखे मनुष्यों की तो क्या बात है ? अर्थात् मुझ सरीखे मनुष्य तो आपकी स्तुति कर ही नहीं सकते किन्तु हे देवि! जो मुझ सरीखे मनुष्य आपके लिए ‘जय’ इन दो वर्णों को भी बोलते हैं वही मेरे सरीखे मनुष्यों का एक बड़ा भारी साहस है ऐसा समझना चाहिए।


त्वमत्र लोकत्रयसद्मनि स्थिता प्रदीपिका बोधमयी सरस्वती।
तदन्तरस्थाखिलवस्तुसंचयं जनाः प्रपश्यन्ति सदृष्टयोप्यतः ॥५॥

अर्थ: हे सरस्वति माता ! आप तीन लोक रूपी घर में स्थित सम्यग्ज्ञानमय उत्कृष्ट दीपक हैं जिस दीपक की कृपा से सम्यग्दृष्टि जीव उन तीनों लोकों के भीतर रहने वाले जीवाजीवादि पदार्थों को भली-भाँति देखते हैं।


नभःसमं वर्त्म तवातिनिर्मलं पृथु प्रयातं विबुधैर्न कैरिह।
तथापि देवि प्रतिभासते तराँ यदेतदक्षुण्णमिव क्षणेन तत्॥६॥

अर्थ: हे देवि ! आपका जो मार्ग है वह आकाश के समान अत्यन्त निर्मल है और अत्यन्त विस्तीर्ण है उस मार्ग में ऐसे कौन से विबुध हैं जो नहीं गये हों अर्थात् सब ही गये हैं, किन्तु वह मार्ग क्षण भर में ऐसा मालूम होता है कि अक्षुण्ण ही है अर्थात् कोई भी उस मार्ग से नहीं गया है।


तदस्तु तावत्कवितादिकं नृणां तव प्रभावात्कृतलोकविस्मयम्।
भवेत्तदप्याशु पदं यदिष्यते तपोभिरुग्रैर्मुनिभिर्महात्मभिः॥७॥

अर्थ: हे माता सरस्वति ! समस्त लोक को आश्चर्य के करने वाले कविता आदिक गुण मनुष्यों को आपकी कृपा से हों इसमें किसी प्रकार का आश्चर्य नहीं हैं, किन्तु हे माता ! जिस पद को बड़े-बड़े मुनि कठिन-कठिन तप करके प्राप्त करने की इच्छा करते हैं वह पद भी आपकी कृपा से बात ही बात में प्राप्त हो जाता है।


भवत्कला यत्र न वाणि मानुषे न वेत्ति शास्त्रं स चिरं पठन्नपि।
मनागपि प्रीतियुतेन चक्षुषा यमीक्षसे कैर्न गुणैः स भूष्यते॥८॥

अर्थ: हे सरस्वति ! हे माता ! जिस मनुष्य में आपकी कला नहीं अर्थात् जो मनुष्य आपका कृपा पात्र नहीं है वह चिरकाल तक पढ़ता हुआ भी शास्त्र को नहीं जानता है किन्तु जिसको आप थोड़ा भी स्नेह सहित नेत्र से देख लेती हो अर्थात् जो मनुष्य थोड़ा भी आपकी कृपा का पात्र बन जाता है वह मनुष्य संसार में किन-किन गुणों से विभूषित नहीं होता है ? अर्थात् बिना ही प्रयत्न के वह केवल आपकी कृपा से समस्त गुणों का भंडार हो जाता है।


स सर्ववित्पश्यति वेत्ति चाखिलं न वा भवत्या रहितोऽपि बुध्यते।
तदत्र तस्यापि जगत्त्रयप्रभोस्त्वमेव देवि प्रतिपत्तिकारणम्॥९॥

अर्थ: संसार में जो केवली भगवान् समस्त पदार्थों को भली-भाँति देखते हैं तथा समस्त पदार्थों को भली-भाँति जानते हैं वे भी आपकी ही कृपा से हे देवि ! जानते तथा देखते हैं किन्तु आपकी कृपा के बिना न वे जानते हैं और न देखते ही हैं। इसलिए हे माता ! इस संसार में तीनों जगत् के प्रभु उन केवली के ज्ञान तथा दर्शन में भी आप ही कारण हैं।


चिरादति क्लेशशतैर्भावाम्बुधौ परिभ्रमन् भूरि नरत्वमश्नुते।
तनूभृदेतत्पुरुषार्थसाधनं त्वया विना देवि पुनः प्रणश्यति॥१०॥

अर्थ: चिरकाल से इस संसाररूपी समुद्र में भ्रमण करता हुआ यह जीव, सैकड़ों क्लेशों से इस मनुष्य जन्म को पाता है तथा वह मनुष्य भव ही समस्त पुरुषार्थों का साधन है किन्तु हे देवि ! आपके बिना यह पाया हुआ भी मनुष्य भव नष्ट ही हो जाता है।


कदाचिदम्ब त्वदनुग्रहं विना श्रुते ह्यधीतेऽपि न तत्त्वनिश्चयः।
ततः कुतः पुंसि भवेद्विवेकता त्वया विमुक्तस्य तु जन्म निष्फलम्॥११॥

अर्थ: हे माता! आपके अनुग्रह के बिना शास्त्र के भली प्रकार अध्ययन करने पर भी वास्तविक तत्त्व का निश्चय नहीं होता है और वास्तविक तत्त्व के निश्चय न होने के कारण मनुष्य में हिताहित का विवेक भी नहीं हो सकता है। इसलिए हे देवि! आपके अनुग्रह से रहित जो पुरुष है उसका मनुष्य जन्म पाना निष्फल ही है।


विधाय मातः प्रथमं त्वदाश्रयं श्रयन्ति तन्मोक्षपदं महर्षयः।
प्रदीपमाश्रित्य गृहे तमस्तते यदीप्सितं वस्तु लभेत मानवः॥१२॥

अर्थ: जिस प्रकार मनुष्य, जो घर अंधकार से व्याप्त है ऐसे घर में दीपक के आश्रय से इष्ट वस्तु को प्राप्त कर लेता है। उसी प्रकार हे माता! बड़े-बड़े ऋषि पहले आपका आश्रय करते हैं पीछे सर्वोत्कृष्ट उस प्रसिद्ध मोक्ष स्थान को वे पाते हैं।


त्वयि प्रभूतानि पदानि देहिनां पदं तदेकं तदपि प्रयच्छसि।
समस्तशुक्लापि सुवर्णविग्रहा त्वमत्र मात: कृतचित्रचेष्टिता ॥१३॥

अर्थ: हे माता! यद्यपि तुझमें अनेक पद हैं तो भी तू जीवों को एक ही पद देती है तथा यद्यपि तू चौतरफा शुक्ल है तो भी तू सुवर्णविग्रहा (सुवर्ण के समान शरीर को धारण करने वाली) है। इसलिए तू इस संसार में आश्चर्यकारी चेष्टा को धारण करने वाली है।


समुद्रघोषाकृतिरर्हति प्रभौ यदा त्वमुत्कर्षमुपागता भृशम्।
अशेषभाषात्मतया त्वया तदा कृतं न केषां हृदि मातरद्भुतम्॥१४॥

अर्थ: हे माता सरस्वति! जिस समय तू भगवान् अर्हत् में अत्यन्त उत्कर्ष को प्राप्त हुई थी अर्थात् जिस समय समवसरण में तू भगवान् अर्हत् के मुख से दिव्यध्वनि रूप में प्रकट हुई थी उस समय तेरी ध्वनि समुद्र के समान धीर तथा गंभीर थी और उस समय तू अनेक भाषा स्वरूप थी। इसलिए किसके मन में तूने उस समय आश्चर्य नहीं किया था अर्थात् तुझको सुनकर समस्त जीव आश्चर्य करते थे।


स चक्षुरप्येष जनस्त्वया विना यदंध एवेति विभाव्यते बुधैः।
तदस्य लोकत्रितयस्य लोचनं सरस्वति त्वं परमार्थदर्शने॥१५॥

अर्थ: हे माता सरस्वति! आपके बिना नेत्रों सहित भी इस पुरुष को विद्वान् लोग अंधा ही समझते हैं। इसलिए हे सरस्वति! इन तीनों लोकों के वास्तविक दर्शन में आप ही नेत्र हैं।


गिरा नरप्राणितमेति सारतां कवित्ववक्तृत्वगुणे च सा च गीः।
इदं द्वयं दुर्लभमेव ते पुनः प्रसादलेशादपि जायते नृणाम्॥१६॥

अर्थ: मनुष्य का जो जीवन है वह वाणी से सफल समझा जाता है और कवित्व तथा वक्तृत्व गुण के होने पर वाणी सारभूत समझी जाती है किन्तु इस संसार में कविपना तथा वक्तापना दोनों ही दुर्लभ हैं परन्तु आपके तो थोड़े से ही प्रसाद (अनुग्रह) से यह दोनों गुण बात-ही-बात में प्राप्त हो जाते हैं।


नृणां भवत्सन्निधिसंस्कृतं श्रवो विहाय नान्यद्धितमक्षयं च तत्।
भवेद्विवेकार्थमिदं परं पुनर्विमूढतार्थं विषयं स्वमर्पयत्॥१७॥

अर्थ: हे माता सरस्वति! जिस कान का आपके समीप में संस्कार किया गया है अर्थात् जो कान आपके सहवास से शुद्ध एवं पवित्र किया गया है वही कान हित का करने वाला तथा अविनाशी है किन्तु उससे भिन्न कान न हितकारी है और न अविनाशी है और आपके सहवास से पवित्र ही कान मनुष्यों को विवेक के लिए होता है किन्तु उससे भिन्न अपने विषयों की ओर झुकता हुआ कान विवेक के लिए नहीं होता। किन्तु विशेषता से मूढ़ता के लिए ही होता है।


कृत्वापि ताल्वोष्ठपुटादिभिर्नृणां त्वमादिपर्यन्तविवर्जितस्थितिः।
इतित्वयापीदृशधर्मयुक्तया स सर्वथैकान्तविधिर्विचूर्णितः॥१८॥

अर्थ: हे माता सरस्वति! यद्यपि तू मनुष्यों के तालु तथा ओष्ठ पुटों से की गई है तो भी तेरी स्थिति आदि तथा अंत से रहित ही है अतः इस प्रकार के धर्मों से संयुक्त हे सरस्वति! तूने सर्वथा एकान्त मार्ग का नाश कर दिया ऐसा भलीभाँति प्रतीत होता है।


अपि प्रयाता वशमेकजन्मनि द्युधेनुचिंतामणिकल्पपादपाः।
फलंति हि त्वं पुनरत्र १चापरे भवे कथं तैरुपमीयसे बुधैः ॥१९॥

अर्थ: हे सरस्वति माता ! किसी रीति से वश को प्राप्त ऐसे कामधेनु, चिंतामणि तथा कल्पवृक्ष एक ही भव में मनुष्यों को इष्ट फल के देने वाले होते हैं किन्तु आप इस भव में तथा परभव में (दोनों भवों में) मनुष्यों के इष्ट फलों को देने वाली हो इसलिए आपको कामधेनु, आदि की उपमा कभी भी नहीं दी जा सकती है।


अगोचरो वासरकृन्निशाकृतो र्जनस्य यच्चेतसि वर्तते तमः।
विभिद्यते वागधिदेवते त्वया त्वमुत्तमज्योतिरिति प्रगीयसे ॥२०॥

अर्थ: हे वागधिदेवते ! हे सरस्वति ! जो अंधकार सूर्य तथा चन्द्रमा के भी गोचर नहीं है अर्थात् न जिस अंधकार को सूर्य देख सकता है और न चन्द्रमा देख सकता है ऐसा मनुष्यों के चित्त में अंधकार विद्यमान है उस अंधकार को तू नाश करती है। इसलिए संसार में तू ही उत्तम ज्योति है ऐसा (विद्वान् मनुष्य) तेरा गुणगान करते हैं।


जिनेश्वरस्वच्छसरःसरोजिनी त्वमंगपूर्वादिसरोजराजिता।
गणेशहंसव्रजसेविता सदा करोषि केषां न मुदं परामिह ॥२१॥

अर्थ: हे माता सरस्वति ! तू जिनेश्वररूपी निर्मल सरोवर उसकी तो कमलिनी है और ग्यारह अंग चौदह पूर्वरूपी जो कमल उनसे शोभित है और गणधररूपी जो हंसों का समूह उससे सेवित है। इसलिए तू इस संसार में किसको उत्तम हर्ष को करने वाली नहीं है ?


परात्मतत्त्वप्रतिपत्तिपूर्वकं परं पदं यत्र सति प्रसिद्ध्यति।
कियत्ततस्ते स्फुरतः प्रभावतो नृपत्वसौभाग्यवरांगनादिकम्॥२२॥

अर्थ: हे माता सरस्वति ! जब आपकी कृपा से परमात्मतत्त्व का जो ज्ञान उस ज्ञान पूर्वक परमपद (मोक्ष पद) की सिद्धि हो जाती है तब आपके देदीप्यमान प्रभाव के सामने राजापना, सौभाग्य तथा उत्तम स्त्री आदि की प्राप्ति क्या चीज है?


त्वदङ्घ्रिपद्मद्वयभक्ति भाविते तृतीयमुन्मीलति बोधलोचनम्।
गिरामधीशे सह केवलेन यत्समाश्रितं स्पर्धमिवेक्षतेऽखिलम् ॥२३॥

अर्थ: हे माता सरस्वति ! जो भव्य जीव मनुष्य आपके दोनों चरण कमलों की भक्ति तथा सेवा करता है उस मनुष्य के तीसरा सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्र प्रकट होता है जो सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्र केवलज्ञान के साथ ईर्ष्या करके ही मानो समस्त पदार्थों को देखता जानता है ऐसा मालूम पड़ता है ।


त्वमेव तीर्थं शुचिबोधवारिमत्समस्तलोकत्रयशुद्धिकारणम्।
त्वमेव चानंदसमुद्रवर्धने मृगांकमूर्तिः परमार्थदर्शिनाम्॥२४॥

अर्थ: हे माता सरस्वति! सम्यग्ज्ञानरूपी जल से भरा हुआ तथा समस्त लोकों की शुद्धि का कारण तू ही तो पवित्र तीर्थ है तथा जो पुरुष परमार्थ को देखने वाले हैं उन मनुष्यों के आनंदरूपी समुद्र के बढ़ाने में तू ही चन्द्रमा है।


त्वयादिबोधः खलु संस्कृतो व्रजेत्परेषु बोधेष्वखिलेषु हेतुतां।
त्वमक्षि पुंसामति दूरदर्शने त्वमेव संसारतरोः कुठारिका॥२५॥

अर्थ: हे भगवति सरस्वति ! तेरे द्वारा अत्यन्त पवित्र किया हुआ मतिज्ञान ही बाकी के बचे हुए समस्त श्रुत, मनःपर्यय आदि ज्ञानों में कारण है और अत्यन्त दूर देखने में तू ही मनुष्य का नेत्र है और संसाररूपी वृक्ष के काटने के लिए तू ही कुठार है।


यथाविधानं त्वमनुस्मृता सती गुरूपदेशोयमवर्णभेदतः।
न ताः श्रियस्ते न गुणा न तत्पदं प्रयच्छसि प्राणभृते न यच्छुभे॥२६॥

अर्थ: हे शुभे! हे सरस्वति! यह गुरु का उपदेश है कि जो पुरुष शास्त्रानुसार अकार से लेकर अंत तक आपका स्मरण करने वाला है उस पुरुष के न तो कोई ऐसी लक्ष्मी है जिसको आप न देवे और न कोई उत्तम गुण तथा उत्तम पद ही है जो कि आपकी कृपा से वह जीव न पा सके।


अनेकजन्मार्जितपापपर्वतो विवेकवज्रेण स येन भिद्यते।
भवद्वपुःशास्त्रघनान्निरेति तत्सदर्थवाक्यामृतभारमेदुरात्॥२७॥

अर्थ: हे माता! हे सरस्वति! अनेक भवों में संचय किया हुआ जो पापरूपी पर्वत है वह जिस विवेकरूपी वज्र के द्वारा तोड़ा जाता है वह विवेकरूपी वज्र श्रेष्ठ अर्थ तथा वाक्यरूपी जल उसका जो भार उससे वृद्धि को प्राप्त ऐसा आपका शरीरस्वरूप जो शास्त्र वही हुआ मेघ उससे निकला है।


तमांसि तेजांसि विजित्य वाङ्मयं प्रकाशयद्यत्परमं महन्महः।
न लुप्यते तैर्न च तैः प्रकाश्यते स्वतः प्रकाशात्मकमेव नंदतु॥२८॥

अर्थ: हे सरस्वति! अंधकार तथा अन्य तेजों को जीतकर प्रकाश करता हुआ तथा सर्वोत्कृष्ट तेरी वाणीस्वरूप तेज इस लोक में जयवंत प्रवर्ते हो क्योंकि जो तेज न तो अंधकार से नाश होता है और न किसी दूसरे तेज से प्रकाशित होता है किन्तु स्वतः प्रकाशास्वरूप ही है।


तव प्रसादः कवितां करोत्यतः कथं जडस्तत्र घटेत मादृशः।
प्रसीद यत्रापि मयि स्वनन्दने न जातु माता विगुणेपि निष्ठुरा॥२९॥

अर्थ: हे सरस्वति! हे माता! तेरा प्रसाद ही कविता का करने वाला है इसलिए मेरे (ग्रन्थकर्ता के) समान वज्रमूर्ख उस कविता के करने में कैसे चेष्टा को कर सकता है? अतः इस कविता के करने में तू मुझ पर प्रसन्न हो क्योंकि यदि अपना पुत्र निर्गुणी भी होवे तो भी माता उसके ऊपर कठोर नहीं बनती।


इमामधीते श्रुतदेवतास्तुतिं कृतिं पुमान् यो मुनिपद्मनंदिनः।
स याति पारं कवितादिसद्गुणप्रबंधसिन्धोः क्रमतो भवस्य च॥३०॥

अर्थ: जो पुरुष मुनिवर श्रीपद्मनंदि द्वारा की गई इस श्रुतदेवता की स्तुतिरूपी कृति को पढ़ता है वह पुरुष कविता आदिक जो उत्तम गुण उनका जो प्रबंधरूपी समुद्र उसके पार को प्राप्त हो जाता है तथा क्रम से संसाररूपी समुद्र के पार को भी प्राप्त हो जाता है।


कुंठास्तेऽपि बृहस्पतिप्रभृतयो यस्मिन् भवन्ति ध्रुवं,
तस्मिन् देवि तव स्तुतिव्यतिकरे मंदा नराः के वयम्।
तद्वाक्चापलमेतदश्रुतवतामस्माकमम्ब त्वया,
क्षन्तव्यं मुखरत्वकारणमसौ येनातिभक्ति ग्रहः॥३१॥

अर्थ: हे देवि ! हे सरस्वति ! जिस आपके स्तवन के करने में बड़े-बड़े विद्वान् बृहस्पति आदिक भी निश्चय से कुंठ अर्थात् मंदबुद्धि हो जाते हैं तब आपके स्तवन के करने में हम सरीखे मंदबुद्धियों की तो बात ही क्या है? अर्थात् हम तो आपकी स्तुति कर ही नहीं सकते किन्तु थोड़े शास्त्र के जानकार हमारी यह (स्तुति नहीं) वाणी की चपलता है। इसलिए हे मात:! इस हमारे बाबदूकपने (मंदबुद्धि - अज्ञानता) को क्षमा कीजिये क्योंकि आपमें हमारी अत्यन्त भक्ति है।