१६. चतुर्विंशतितीर्थंकरस्तोत्र स्वयंभूस्तोत्र
स्वयंभुवा येन समुद्धृतं जगज्जडत्वकूपे पतितं प्रमादतः।
परात्मतत्त्वप्रतिपादनोल्लसद्वचोगुणैरादिजिनः स सेव्यताम्॥१॥
अर्थ: जो जगत् प्रमाद के वश होकर अज्ञानरूपी कुँए में पड़ा था उस जगत् को जिस स्वयंभू (अपने आप होने वाले) श्री आदिनाथ भगवान ने पर तथा आत्मा के स्वरूप को कहने वाले मनोहर अपने वचनरूपी गुणों से उस अज्ञानरूपी कुँए से बाहर निकाला उन आदिनाथ भगवान की भो भव्य जीवो! आप सेवा करो।
अजितनाथ भगवान् की स्तुति
भवारिरेको न परोऽस्ति देहिनां सुहृच्च रत्नत्रयमेकमेव हि।
स दुर्जयो येन जिनस्तदाश्रयात्ततोऽजितान्मे जिनतोऽस्तु सत्सुखम्॥२॥
अर्थ: जीवों का संसार ही एक बैरी है और दूसरा कोई भी बैरी नहीं है तथा मित्र सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय ही हैं और कोई दूसरा मित्र नहीं है और वह संसाररूपी बैरी अत्यन्त दुर्जय है किन्तु जिन अजितनाथ भगवान् ने उस सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्ररूपी मित्र की सहायता से उस संसाररूपी भयंकर बैरी को सर्वथा जीत लिया है उन अजितनाथ भगवान से मुझे श्रेष्ठ सुख मिले ऐसी मेरी प्रार्थना है।
संभवनाथ भगवान की स्तुति
पुनातु नः संभवतीर्थकृज्जिनः पुनः पुनः संभवदुःखदुःखिताः।
तदर्त्तिनाशाय विमुक्तिवर्त्मनः प्रकाशकं यं शरणं प्रपेदिरे॥३॥
अर्थ: बारंबार संसार के दुखों से दुःखित जो प्राणी समस्त संसार के दुखों के नाश के लिए मोक्ष के मार्ग को प्रकाश करने वाले ऐसे जिस श्री संभवनाथ की शरण को प्राप्त हुए ऐसे श्री संभवनाथ जिनेन्द्र हमारी रक्षा करें अर्थात् ऐसे श्री संभवनाथ भगवान् को हम नमस्कार करते हैं।
अभिनंदननाथ भगवान की स्तुति
निजैर्गुणैरप्रतिमैर्महानजो न तु त्रिलोकीजनतार्चनेन यः।
यतो हि विश्वं लघु तं विमुक्तये नमामि साक्षादभिनंदनं जिनम्॥४॥
अर्थ: जो अभिनंदननाथ भगवान् तीनों लोक के जनों से पूजित हैं इसलिए बड़े नहीं हैं किन्तु दूसरे जीवों में नहीं पाये जाये ऐसे जो स्वकीय गुण हैं उनमें बड़े हैं और जो जन्म से रहित हैं तथा जिनसे समस्त लोक छोटा है अर्थात् जो सांसारिक सुखों को तुच्छ समझते हैं अथवा जिनके ज्ञान के सामने यह लोक बहुत छोटी चीज है, ऐसे जीवों को समस्त प्रकार के आनंद के देने वाले श्री अभिनंदन जिनेन्द्र को मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।
सुमतिनाथ भगवान् की स्तुति
नयप्रमाणादिविधान१ संघटं प्रकाशितं तत्त्वमतीव निर्मलम्।
यतस्त्वया तत्सुमतेऽत्र तावकं तदन्वयं नाम नमोस्तु ते जिन॥५॥
अर्थ: हे सुमतिनाथ जिनेन्द्र! जिसमें प्रमाण तथा नयों का भलीभाँति संघट है और जो अत्यन्त निर्मल है ऐसा तत्त्व आपने प्रकाशित किया है। इसलिए हे जिनेश! आपका नाम सार्थक है तथा आपके लिए नमस्कार हो।
पद्मप्रभ भगवान् की स्तुति
रराज पद्मप्रभतीर्थकृत्सदस्येष्वशेषलोकत्रयलोकमध्यगः।
नभस्युडुव्रातयुतः शशी यथा वचोऽमृतैर्वर्षति यः स२पातु वः॥६॥
अर्थ: आकाश में चन्द्रमा जिस प्रकार नक्षत्रों से शोभित होता है तथा जीवों को आनंदामृत का वर्षण करता है उसी प्रकार जो पद्मप्रभ भगवान् तीनों लोकों के जो समस्त जीव उनके मध्यभाग में शोभित होते थे तथा जो अपने वचनरूपी अमृत को वर्षने वाले थे। ऐसे वे श्री पद्मप्रभ भगवान् हमारी रक्षा करें अर्थात् ऐसे पद्मप्रभ भगवान् को हम नमस्कार करते हैं।
सुपार्श्वनाथ भगवान् की स्तुति
नरामराहीश्वरपीडने जयी धृतायुधो धीरमना ३झषध्वजः।
विनापि शस्त्रैर्ननु येन निर्जितो जिनं सुपार्श्वं प्रणमामि सर्वदा॥७॥
अर्थ: जो कामदेव नरेन्द्र, देवेन्द्र, फणीन्द्र को भी दुख का देने वाला है और जो शस्त्रों का धारी है तथा जिसका मन अत्यन्त धीर है और जिसकी मीन की ध्वजा है ऐसा भी कामदेव जिस सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्र ने, बिना ही शस्त्र के पलभर में जीत लिया उन सुपार्श्व भगवान् को मैं सर्वदा मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।
चन्द्रप्रभ भगवान् की स्तुति
शशिप्रभो वागमृतांशुभिः शशी परं कदाचिन्न कलंकसंगतः।
न वापि दोषाकरतां ययौ यतिर्जयत्यसौ संसृतिपाप१नाशनः॥८॥
अर्थ: जो चन्द्रप्रभ भगवान् वाणीरूपी अमृत की किरणों से यद्यपि चन्द्रमा हैं परन्तु कभी भी कलंक से युक्त नहीं हैं और न कभी दोषाकर को ही प्राप्त हुए हैं तथा समस्त संसार के पापों के नाश करने वाले हैं, ऐसे यति चन्द्रप्रभ भगवान् सदा इस लोक में जयवंत हैं।
पुष्पदंत भगवान् की स्तुति
यदीयपादद्वितयप्रणामतः पतत्यधो मोहनधूलिरंगिनाम्।
शिरोगता मोहठकप्रयोगतः स पुष्पदंतः सततं प्रणम्यते॥९॥
अर्थ: मोहरूपी ठग द्वारा प्राणियों के सिरों में स्थापित मोहन धूलि उन पुष्पदंत भगवान् के दोनों चरण कमलों के प्रणाम से ही पलभर में नीचे गिर पड़ती है उन पुष्पदंत भगवान् को हम सदा प्रणाम करते हैं।
शीतलनाथ भगवान् की स्तुति
सतां यदीयं वचनं सुशीतलं यदेव चन्द्रादपि चन्दनादपि।
तदत्र लोके भवतापहारि यत् प्रणम्यते किं न स शीतलो जिनः॥१०॥
अर्थ: जिन शीतलनाथ भगवान् के वचन सज्जनों को चन्द्रमा तथा चंदन से भी अधिक शीतल जान पड़ते हैं और जो वचन समस्त संसार ताप के नाश करने वाले हैं, ऐसे शीतलनाथ भगवान् क्या नमस्कार के पात्र नहीं हैं ? अवश्य ही हैं।
श्रेयांसनाथ भगवान् की स्तुति
जगत्त्रये श्रेय इतो ह्ययादिति प्रसिद्धनामा जिन एष वन्द्यते।
यतो जनानां बहुभक्ति शालिनां भवंति सर्वे सफला मनोरथाः॥११॥
अर्थ: तीनों लोक में समस्त कल्याणों की प्राप्ति श्री श्रेयांसनाथ भगवान् से होती है, इसलिए ये जिनेन्द्र, श्रेयोनाथ इस नाम से प्रसिद्ध हैं तथा जो भव्यजीव इन श्रेयांसनाथ भगवान् में गाढ़भक्ति से सहित हैं उन भव्य जीवों के इन्हीं भगवान् की कृपा से समस्त मनोरथ सिद्ध होते हैं।
वासुपूज्य भगवान् की स्तुति
पादाब्जयुग्मे तव वासुपूज्य तज्जनस्य पुण्यं प्रणतस्य तद्भवेत्।
यतो न सा श्रीरिह हि त्रिविष्टपे न तत्सुखं यन्न पुरः प्रधावति॥१२॥
अर्थ: हे वासुपूज्य जिनेश! जो भव्यजीव आपके दोनों चरण कमलों को नमस्कार करने वाला है उस भव्यजीव को इस संसार में उस अपूर्व पुण्य की प्राप्ति होती है कि जिस पुण्य की कृपा से इन तीनों लोकों में न तो कोई ऐसी लक्ष्मी है जो आगे दौड़कर न आती हो और न कोई ऐसा सुख है जो न मिलता हो।
विमलनाथ भगवान् की स्तुति
मलैर्विमुक्तो विमलो न कैर्जिनो यथार्थनामा भुवने नमस्कृतः।
तदस्य नामस्मृतिरप्यसंशयं करोति वैमल्यमघात्मनामपि॥१३॥
अर्थ: इस संसार में ऐसा कौन होगा ? जिसने समस्त मलों से रहित तथा सार्थक नाम को धारण करने वाले जिनेन्द्र श्रीविमलनाथ को नमस्कार न किया हो अर्थात् समस्त ही जीव श्रीविमलनाथ भगवान् को नमस्कार करते हैं। इसीलिए श्रीविमलनाथ भगवान् के नाम का स्मरण ही पापी मनुष्यों को भी अत्यन्त विमल बना देता है।
अनंतनाथ भगवान् की स्तुति
अनंतबोधादिचतुष्टयात्मकं दधाम्यनंतं हृदि तद्गुणाशया।
भवेद्यदर्थी ननु तेन सेव्यते तदन्वितो भूरितृषेव सत्सरः॥१४॥
अर्थ: अनंत विज्ञानादि स्वरूप श्रीअनंतनाथ भगवान् को मैं उनके गुणों की आशा से अपने हृदय में धारण करता हूँ क्योंकि संसार में यह बात प्रत्यक्षगोचर है कि जो पुरुष जिस गुण की प्राप्ति का इच्छुक होता है वह मनुष्य उसकी ही सेवा करता है जिस प्रकार अत्यन्त प्यासा मनुष्य अपनी प्यास की शांति के लिए उत्तम (स्वच्छ जल से भरे हुए) सरोवर की सेवा करता है।
धर्मनाथ भगवान् की स्तुति
नमोस्तु धर्माय जिनाय मुक्तये सुधर्मतीर्थप्रविधायिने सदा।
यमाश्रितो भव्यजनोऽतिदुर्लभां लभेत कल्याणपरम्परां पराम्॥१५॥
अर्थ: जिस धर्मनाथ भगवान् को आश्रय कर भव्यजीव अत्यन्त दुर्लभ सर्वोत्कृष्ट कल्याणों की परंपरा को प्राप्त होते हैं उन श्रेष्ठ धर्मरूपी तीर्थ के प्रवर्तनेवाले तथा अष्टकर्मों के जीतने वाले श्रीधर्मनाथ भगवान् को मैं मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वदा नमस्कार करता हूँ।
शांतिनाथ भगवान् की स्तुति
विधाय कर्मक्षयमात्मशांतिकृज्जगत्सु यः शांतिकरस्ततोऽभवत्।
इति स्वमन्यं प्रति शांतिकारणं नमामि शांतिं जिनमुन्नतश्रियम्॥१६॥
अर्थ: जो शांतिनाथ भगवान् अपनी आत्मा की शांति करने वाले कर्मों के क्षय को करके समस्त जगत् में शांति के करने वाले होते हुए ऐसे स्व तथा पर को शांति के करने वाले और अंतरंग तथा बहिरंग दोनों प्रकार की लक्ष्मी के स्वामी सोलहवें तीर्थंकर श्रीशांतिनाथ भगवान् को मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ अर्थात् शांति के देने वाले श्रीशांतिनाथ भगवान् मुझे भी शांति प्रदान करें।
कुंथुनाथ भगवान् की स्तुति
दयांगिनां चिद्द्वितयं विमुक्तये परिग्रहद्वन्द्वविमोचनेन तत्।
विशुद्धमासीदिह यस्य मादृशां स कुंथुनाथोऽस्तु भवप्रशांतये॥१७॥
अर्थ: बाह्य तथा अभ्यंतर के भेद से समस्त प्रकार के परिग्रहों के छोड़ने के कारण जिन कुंथुनाथ भगवान् के समस्त प्राणियों पर दया और चैतन्य ये दोनों विशुद्ध हो गये वे श्री कुंथुनाथ भगवान्, मेरे समान मनुष्यों को संसार की शांति के लिए हों।
अरनाथ भगवान् की स्तुति
विभांति यस्यांघ्रिनखा नमत्सुरस्फुरच्छिरोरत्नमहोऽधिकप्रभाः।
जगद्गृहे पापतमोविनाशना इव प्रदीपाः स जिनो जयत्यरः॥१८॥
अर्थ: नमस्कार करते हुए जो देवता उनके मस्तकों पर मुकुटों में लगे हुए देदीप्यमान रत्न उनकी जो कान्ति उससे भी है अधिक प्रभा जिनकी, ऐसे जिन अरनाथ जिनेन्द्र के चरणों के नख, संसाररूपी घर में पापरूपी अंधकार को नाश करने वाले दीपकों के समान शोभित होते हैं वे अरनाथ भगवान् इस लोक में जयवंत हैं।
मल्लिनाथ भगवान् की स्तुति
सुहृत्सुखी स्यादहितः सुदुःखितः स्वतोप्युदासीनतमादपि प्रभोः।
यतः स जीयाज्जिनमल्लिरेकतां गतो जगद्विस्मयकारिचेष्टितः॥१९॥
अर्थ: यद्यपि मल्लिनाथ भगवान् स्वयं उदासीन हैं तो भी जिन मल्लिनाथ प्रभु से उनके स्नेही भक्त सुख पाते हैं तथा उनके शत्रु दुख पाते हैं। इसलिए ऐसे वे आत्मस्वरूप में लीन तथा समस्त जगत् को आश्चर्य करने वाली चेष्टा को धारण करने वाले श्रीमल्लिनाथ भगवान् सदा इस लोक में जयवंत हों।
मुनिसुव्रतनाथ भगवान् की स्तुति
विहाय नूनं तृणवत्स्वसम्पदं मुनिर्व्रतैर्योऽभवदत्र सुव्रतः।
जगाम तद्धाम विरामवर्जितं सुबोधदृङ्मे स जिनः प्रसीदतु॥२०॥
अर्थ: जो मुनिसुव्रतनाथ मुनि, समस्त पदार्थों को निश्चय से तृण के समान छोड़कर व्रतों को धारण करने से ‘मुनिसुव्रत’ नाम को धारण करते हुए और जो नाश से रहित (अविनाशी) मोक्षपद को प्राप्त हुए तथा जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान के धारी हैं ऐसे वे मुनिसुव्रतनाथ भगवान् मेरे ऊपर प्रसन्न हों।
नमिनाथ भगवान् की स्तुति
परम्परायत्ततयातिदुर्बलं चलं स्वसौख्यं यदसौख्यमेव तत्।
अदः प्रमुच्यात्मसुखे कृतादरो नमिर्जिनो यः स ममास्तु मुक्तये॥२१॥
अर्थ: जो नमिनाथ भगवान् पराधीनता से प्राप्त तथा पर (भिन्न) और अत्यन्त दुर्बल तथा चंचल ऐसा इन्द्रियों से उत्पन्न हुआ सुख, दुःखस्वरूप ही है ऐसा समझकर तथा इन्द्रिय सम्बन्धी सुख को छोड़कर आत्मसम्बन्धी सुख में आदर करते हुए वे श्रीनमिनाथ भगवान् मुझे मुक्ति के लिए हों।
नेमिनाथ भगवान् की स्तुति
अरिष्टसंकर्तनचक्रनेमितामुपागतो भव्यजनेषु यो जिनः।
अरिष्टनेमिर्जगतीतिविश्रुतः स ऊर्जयन्ते जयतादिनः शिवम्॥२२॥
अर्थ: जो भगवान् भव्यजनों के अशुभकर्मों को नाश करने में चक्र की धारापने को प्राप्त हैं इसीलिए जो संसार में ‘अरिष्टनेमि’ इस नाम से प्रसिद्ध हैं तथा जो गिरनार पर्वत से मोक्ष को पधारे वे अरिष्टनेमि भगवान् सदा इस लोक में जयवंत रहें।
पार्श्वनाथ भगवान् की स्तुति
यदूर्ध्वदेशे नभसि क्षणादहिप्रभोः फणारत्नकरैः प्रधावितम्।
पदातिभिर्वा कमठाहतेःकृते करोतु पार्श्वः स जिनो ममामृतम्॥२३॥
अर्थ: जिन पार्श्वनाथ भगवान् के मस्तक पर आकाश में कमठासुर को मारने के लिए शेषनाग के फणों में लगे हुए जो रत्न उनकी किरणें, पदाति (सेना) के समान धावा करती हुई मालूम पड़ती थी, वे पार्श्वनाथ भगवान् मेरे लिए मोक्ष को दें।
वर्धमान भगवान् की स्तुति
त्रिलोकलोकेश्वरतां गतोऽपि यः स्वकीयकायेऽपि तथापि निःस्पृहः।
स वर्धमानोऽन्त्यजिनो नताय मे ददातु मोक्षं मुनिपद्मनंदिने॥२४॥
अर्थ: जो वर्धमान स्वामी तीनलोक के ईश्वर होने पर भी अपने शरीर में भी निस्पृह (इच्छा रहित) रहे। वे अंतिम जिनेन्द्र वर्धमान स्वामी नमस्कार करते हुए मुझ पद्मनंदि मुनि के लिए मोक्ष प्रदान करें।