पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका (आचार्य पद्मनन्दि), हिन्दी अनुवाद सहित | Padmanandi Panchvinshatika (Acharya Padmanandi)

१६. चतुर्विंशतितीर्थंकरस्तोत्र स्वयंभूस्तोत्र

स्वयंभुवा येन समुद्धृतं जगज्जडत्वकूपे पतितं प्रमादतः।
परात्मतत्त्वप्रतिपादनोल्लसद्वचोगुणैरादिजिनः स सेव्यताम्॥१॥

अर्थ: जो जगत् प्रमाद के वश होकर अज्ञानरूपी कुँए में पड़ा था उस जगत् को जिस स्वयंभू (अपने आप होने वाले) श्री आदिनाथ भगवान ने पर तथा आत्मा के स्वरूप को कहने वाले मनोहर अपने वचनरूपी गुणों से उस अज्ञानरूपी कुँए से बाहर निकाला उन आदिनाथ भगवान की भो भव्य जीवो! आप सेवा करो।


अजितनाथ भगवान् की स्तुति


भवारिरेको न परोऽस्ति देहिनां सुहृच्च रत्नत्रयमेकमेव हि।
स दुर्जयो येन जिनस्तदाश्रयात्ततोऽजितान्मे जिनतोऽस्तु सत्सुखम्॥२॥

अर्थ: जीवों का संसार ही एक बैरी है और दूसरा कोई भी बैरी नहीं है तथा मित्र सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय ही हैं और कोई दूसरा मित्र नहीं है और वह संसाररूपी बैरी अत्यन्त दुर्जय है किन्तु जिन अजितनाथ भगवान् ने उस सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्ररूपी मित्र की सहायता से उस संसाररूपी भयंकर बैरी को सर्वथा जीत लिया है उन अजितनाथ भगवान से मुझे श्रेष्ठ सुख मिले ऐसी मेरी प्रार्थना है।


संभवनाथ भगवान की स्तुति


पुनातु नः संभवतीर्थकृज्जिनः पुनः पुनः संभवदुःखदुःखिताः।
तदर्त्तिनाशाय विमुक्तिवर्त्मनः प्रकाशकं यं शरणं प्रपेदिरे॥३॥

अर्थ: बारंबार संसार के दुखों से दुःखित जो प्राणी समस्त संसार के दुखों के नाश के लिए मोक्ष के मार्ग को प्रकाश करने वाले ऐसे जिस श्री संभवनाथ की शरण को प्राप्त हुए ऐसे श्री संभवनाथ जिनेन्द्र हमारी रक्षा करें अर्थात् ऐसे श्री संभवनाथ भगवान् को हम नमस्कार करते हैं।


अभिनंदननाथ भगवान की स्तुति


निजैर्गुणैरप्रतिमैर्महानजो न तु त्रिलोकीजनतार्चनेन यः।
यतो हि विश्वं लघु तं विमुक्तये नमामि साक्षादभिनंदनं जिनम्॥४॥

अर्थ: जो अभिनंदननाथ भगवान् तीनों लोक के जनों से पूजित हैं इसलिए बड़े नहीं हैं किन्तु दूसरे जीवों में नहीं पाये जाये ऐसे जो स्वकीय गुण हैं उनमें बड़े हैं और जो जन्म से रहित हैं तथा जिनसे समस्त लोक छोटा है अर्थात् जो सांसारिक सुखों को तुच्छ समझते हैं अथवा जिनके ज्ञान के सामने यह लोक बहुत छोटी चीज है, ऐसे जीवों को समस्त प्रकार के आनंद के देने वाले श्री अभिनंदन जिनेन्द्र को मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।


सुमतिनाथ भगवान् की स्तुति


नयप्रमाणादिविधान१ संघटं प्रकाशितं तत्त्वमतीव निर्मलम्।
यतस्त्वया तत्सुमतेऽत्र तावकं तदन्वयं नाम नमोस्तु ते जिन॥५॥

अर्थ: हे सुमतिनाथ जिनेन्द्र! जिसमें प्रमाण तथा नयों का भलीभाँति संघट है और जो अत्यन्त निर्मल है ऐसा तत्त्व आपने प्रकाशित किया है। इसलिए हे जिनेश! आपका नाम सार्थक है तथा आपके लिए नमस्कार हो।


पद्मप्रभ भगवान् की स्तुति


रराज पद्मप्रभतीर्थकृत्सदस्येष्वशेषलोकत्रयलोकमध्यगः।
नभस्युडुव्रातयुतः शशी यथा वचोऽमृतैर्वर्षति यः स२पातु वः॥६॥

अर्थ: आकाश में चन्द्रमा जिस प्रकार नक्षत्रों से शोभित होता है तथा जीवों को आनंदामृत का वर्षण करता है उसी प्रकार जो पद्मप्रभ भगवान् तीनों लोकों के जो समस्त जीव उनके मध्यभाग में शोभित होते थे तथा जो अपने वचनरूपी अमृत को वर्षने वाले थे। ऐसे वे श्री पद्मप्रभ भगवान् हमारी रक्षा करें अर्थात् ऐसे पद्मप्रभ भगवान् को हम नमस्कार करते हैं।


सुपार्श्वनाथ भगवान् की स्तुति


नरामराहीश्वरपीडने जयी धृतायुधो धीरमना ३झषध्वजः।
विनापि शस्त्रैर्ननु येन निर्जितो जिनं सुपार्श्वं प्रणमामि सर्वदा॥७॥

अर्थ: जो कामदेव नरेन्द्र, देवेन्द्र, फणीन्द्र को भी दुख का देने वाला है और जो शस्त्रों का धारी है तथा जिसका मन अत्यन्त धीर है और जिसकी मीन की ध्वजा है ऐसा भी कामदेव जिस सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्र ने, बिना ही शस्त्र के पलभर में जीत लिया उन सुपार्श्व भगवान् को मैं सर्वदा मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।


चन्द्रप्रभ भगवान् की स्तुति


शशिप्रभो वागमृतांशुभिः शशी परं कदाचिन्न कलंकसंगतः।
न वापि दोषाकरतां ययौ यतिर्जयत्यसौ संसृतिपाप१नाशनः॥८॥

अर्थ: जो चन्द्रप्रभ भगवान् वाणीरूपी अमृत की किरणों से यद्यपि चन्द्रमा हैं परन्तु कभी भी कलंक से युक्त नहीं हैं और न कभी दोषाकर को ही प्राप्त हुए हैं तथा समस्त संसार के पापों के नाश करने वाले हैं, ऐसे यति चन्द्रप्रभ भगवान् सदा इस लोक में जयवंत हैं।


पुष्पदंत भगवान् की स्तुति


यदीयपादद्वितयप्रणामतः पतत्यधो मोहनधूलिरंगिनाम्।
शिरोगता मोहठकप्रयोगतः स पुष्पदंतः सततं प्रणम्यते॥९॥

अर्थ: मोहरूपी ठग द्वारा प्राणियों के सिरों में स्थापित मोहन धूलि उन पुष्पदंत भगवान् के दोनों चरण कमलों के प्रणाम से ही पलभर में नीचे गिर पड़ती है उन पुष्पदंत भगवान् को हम सदा प्रणाम करते हैं।


शीतलनाथ भगवान् की स्तुति


सतां यदीयं वचनं सुशीतलं यदेव चन्द्रादपि चन्दनादपि।
तदत्र लोके भवतापहारि यत् प्रणम्यते किं न स शीतलो जिनः॥१०॥

अर्थ: जिन शीतलनाथ भगवान् के वचन सज्जनों को चन्द्रमा तथा चंदन से भी अधिक शीतल जान पड़ते हैं और जो वचन समस्त संसार ताप के नाश करने वाले हैं, ऐसे शीतलनाथ भगवान् क्या नमस्कार के पात्र नहीं हैं ? अवश्य ही हैं।


श्रेयांसनाथ भगवान् की स्तुति


जगत्त्रये श्रेय इतो ह्ययादिति प्रसिद्धनामा जिन एष वन्द्यते।
यतो जनानां बहुभक्ति शालिनां भवंति सर्वे सफला मनोरथाः॥११॥

अर्थ: तीनों लोक में समस्त कल्याणों की प्राप्ति श्री श्रेयांसनाथ भगवान् से होती है, इसलिए ये जिनेन्द्र, श्रेयोनाथ इस नाम से प्रसिद्ध हैं तथा जो भव्यजीव इन श्रेयांसनाथ भगवान् में गाढ़भक्ति से सहित हैं उन भव्य जीवों के इन्हीं भगवान् की कृपा से समस्त मनोरथ सिद्ध होते हैं।


वासुपूज्य भगवान् की स्तुति


पादाब्जयुग्मे तव वासुपूज्य तज्जनस्य पुण्यं प्रणतस्य तद्भवेत्।
यतो न सा श्रीरिह हि त्रिविष्टपे न तत्सुखं यन्न पुरः प्रधावति॥१२॥

अर्थ: हे वासुपूज्य जिनेश! जो भव्यजीव आपके दोनों चरण कमलों को नमस्कार करने वाला है उस भव्यजीव को इस संसार में उस अपूर्व पुण्य की प्राप्ति होती है कि जिस पुण्य की कृपा से इन तीनों लोकों में न तो कोई ऐसी लक्ष्मी है जो आगे दौड़कर न आती हो और न कोई ऐसा सुख है जो न मिलता हो।


विमलनाथ भगवान् की स्तुति


मलैर्विमुक्तो विमलो न कैर्जिनो यथार्थनामा भुवने नमस्कृतः।
तदस्य नामस्मृतिरप्यसंशयं करोति वैमल्यमघात्मनामपि॥१३॥

अर्थ: इस संसार में ऐसा कौन होगा ? जिसने समस्त मलों से रहित तथा सार्थक नाम को धारण करने वाले जिनेन्द्र श्रीविमलनाथ को नमस्कार न किया हो अर्थात् समस्त ही जीव श्रीविमलनाथ भगवान् को नमस्कार करते हैं। इसीलिए श्रीविमलनाथ भगवान् के नाम का स्मरण ही पापी मनुष्यों को भी अत्यन्त विमल बना देता है।


अनंतनाथ भगवान् की स्तुति


अनंतबोधादिचतुष्टयात्मकं दधाम्यनंतं हृदि तद्गुणाशया।
भवेद्यदर्थी ननु तेन सेव्यते तदन्वितो भूरितृषेव सत्सरः॥१४॥

अर्थ: अनंत विज्ञानादि स्वरूप श्रीअनंतनाथ भगवान् को मैं उनके गुणों की आशा से अपने हृदय में धारण करता हूँ क्योंकि संसार में यह बात प्रत्यक्षगोचर है कि जो पुरुष जिस गुण की प्राप्ति का इच्छुक होता है वह मनुष्य उसकी ही सेवा करता है जिस प्रकार अत्यन्त प्यासा मनुष्य अपनी प्यास की शांति के लिए उत्तम (स्वच्छ जल से भरे हुए) सरोवर की सेवा करता है।


धर्मनाथ भगवान् की स्तुति


नमोस्तु धर्माय जिनाय मुक्तये सुधर्मतीर्थप्रविधायिने सदा।
यमाश्रितो भव्यजनोऽतिदुर्लभां लभेत कल्याणपरम्परां पराम्॥१५॥

अर्थ: जिस धर्मनाथ भगवान् को आश्रय कर भव्यजीव अत्यन्त दुर्लभ सर्वोत्कृष्ट कल्याणों की परंपरा को प्राप्त होते हैं उन श्रेष्ठ धर्मरूपी तीर्थ के प्रवर्तनेवाले तथा अष्टकर्मों के जीतने वाले श्रीधर्मनाथ भगवान् को मैं मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वदा नमस्कार करता हूँ।


शांतिनाथ भगवान् की स्तुति


विधाय कर्मक्षयमात्मशांतिकृज्जगत्सु यः शांतिकरस्ततोऽभवत्।
इति स्वमन्यं प्रति शांतिकारणं नमामि शांतिं जिनमुन्नतश्रियम्॥१६॥

अर्थ: जो शांतिनाथ भगवान् अपनी आत्मा की शांति करने वाले कर्मों के क्षय को करके समस्त जगत् में शांति के करने वाले होते हुए ऐसे स्व तथा पर को शांति के करने वाले और अंतरंग तथा बहिरंग दोनों प्रकार की लक्ष्मी के स्वामी सोलहवें तीर्थंकर श्रीशांतिनाथ भगवान् को मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ अर्थात् शांति के देने वाले श्रीशांतिनाथ भगवान् मुझे भी शांति प्रदान करें।


कुंथुनाथ भगवान् की स्तुति


दयांगिनां चिद्द्वितयं विमुक्तये परिग्रहद्वन्द्वविमोचनेन तत्।
विशुद्धमासीदिह यस्य मादृशां स कुंथुनाथोऽस्तु भवप्रशांतये॥१७॥

अर्थ: बाह्य तथा अभ्यंतर के भेद से समस्त प्रकार के परिग्रहों के छोड़ने के कारण जिन कुंथुनाथ भगवान् के समस्त प्राणियों पर दया और चैतन्य ये दोनों विशुद्ध हो गये वे श्री कुंथुनाथ भगवान्, मेरे समान मनुष्यों को संसार की शांति के लिए हों।


अरनाथ भगवान् की स्तुति


विभांति यस्यांघ्रिनखा नमत्सुरस्फुरच्छिरोरत्नमहोऽधिकप्रभाः।
जगद्गृहे पापतमोविनाशना इव प्रदीपाः स जिनो जयत्यरः॥१८॥

अर्थ: नमस्कार करते हुए जो देवता उनके मस्तकों पर मुकुटों में लगे हुए देदीप्यमान रत्न उनकी जो कान्ति उससे भी है अधिक प्रभा जिनकी, ऐसे जिन अरनाथ जिनेन्द्र के चरणों के नख, संसाररूपी घर में पापरूपी अंधकार को नाश करने वाले दीपकों के समान शोभित होते हैं वे अरनाथ भगवान् इस लोक में जयवंत हैं।


मल्लिनाथ भगवान् की स्तुति


सुहृत्सुखी स्यादहितः सुदुःखितः स्वतोप्युदासीनतमादपि प्रभोः।
यतः स जीयाज्जिनमल्लिरेकतां गतो जगद्विस्मयकारिचेष्टितः॥१९॥

अर्थ: यद्यपि मल्लिनाथ भगवान् स्वयं उदासीन हैं तो भी जिन मल्लिनाथ प्रभु से उनके स्नेही भक्त सुख पाते हैं तथा उनके शत्रु दुख पाते हैं। इसलिए ऐसे वे आत्मस्वरूप में लीन तथा समस्त जगत् को आश्चर्य करने वाली चेष्टा को धारण करने वाले श्रीमल्लिनाथ भगवान् सदा इस लोक में जयवंत हों।


मुनिसुव्रतनाथ भगवान् की स्तुति


विहाय नूनं तृणवत्स्वसम्पदं मुनिर्व्रतैर्योऽभवदत्र सुव्रतः।
जगाम तद्धाम विरामवर्जितं सुबोधदृङ्मे स जिनः प्रसीदतु॥२०॥

अर्थ: जो मुनिसुव्रतनाथ मुनि, समस्त पदार्थों को निश्चय से तृण के समान छोड़कर व्रतों को धारण करने से ‘मुनिसुव्रत’ नाम को धारण करते हुए और जो नाश से रहित (अविनाशी) मोक्षपद को प्राप्त हुए तथा जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान के धारी हैं ऐसे वे मुनिसुव्रतनाथ भगवान् मेरे ऊपर प्रसन्न हों।


नमिनाथ भगवान् की स्तुति


परम्परायत्ततयातिदुर्बलं चलं स्वसौख्यं यदसौख्यमेव तत्।
अदः प्रमुच्यात्मसुखे कृतादरो नमिर्जिनो यः स ममास्तु मुक्तये॥२१॥

अर्थ: जो नमिनाथ भगवान् पराधीनता से प्राप्त तथा पर (भिन्न) और अत्यन्त दुर्बल तथा चंचल ऐसा इन्द्रियों से उत्पन्न हुआ सुख, दुःखस्वरूप ही है ऐसा समझकर तथा इन्द्रिय सम्बन्धी सुख को छोड़कर आत्मसम्बन्धी सुख में आदर करते हुए वे श्रीनमिनाथ भगवान् मुझे मुक्ति के लिए हों।


नेमिनाथ भगवान् की स्तुति


अरिष्टसंकर्तनचक्रनेमितामुपागतो भव्यजनेषु यो जिनः।
अरिष्टनेमिर्जगतीतिविश्रुतः स ऊर्जयन्ते जयतादिनः शिवम्॥२२॥

अर्थ: जो भगवान् भव्यजनों के अशुभकर्मों को नाश करने में चक्र की धारापने को प्राप्त हैं इसीलिए जो संसार में ‘अरिष्टनेमि’ इस नाम से प्रसिद्ध हैं तथा जो गिरनार पर्वत से मोक्ष को पधारे वे अरिष्टनेमि भगवान् सदा इस लोक में जयवंत रहें।


पार्श्वनाथ भगवान् की स्तुति


यदूर्ध्वदेशे नभसि क्षणादहिप्रभोः फणारत्नकरैः प्रधावितम्।
पदातिभिर्वा कमठाहतेःकृते करोतु पार्श्वः स जिनो ममामृतम्॥२३॥

अर्थ: जिन पार्श्वनाथ भगवान् के मस्तक पर आकाश में कमठासुर को मारने के लिए शेषनाग के फणों में लगे हुए जो रत्न उनकी किरणें, पदाति (सेना) के समान धावा करती हुई मालूम पड़ती थी, वे पार्श्वनाथ भगवान् मेरे लिए मोक्ष को दें।


वर्धमान भगवान् की स्तुति


त्रिलोकलोकेश्वरतां गतोऽपि यः स्वकीयकायेऽपि तथापि निःस्पृहः।
स वर्धमानोऽन्त्यजिनो नताय मे ददातु मोक्षं मुनिपद्मनंदिने॥२४॥

अर्थ: जो वर्धमान स्वामी तीनलोक के ईश्वर होने पर भी अपने शरीर में भी निस्पृह (इच्छा रहित) रहे। वे अंतिम जिनेन्द्र वर्धमान स्वामी नमस्कार करते हुए मुझ पद्मनंदि मुनि के लिए मोक्ष प्रदान करें।

१७. सुप्रभातष्टक स्तोत्र

निःशेषावरणद्वयस्थिति - निशाप्रान्तेन्तरायक्षयो
द्योते मोहकृते गते च सहसा निद्राभरे दूरतः।
सम्यग्ज्ञानदृगक्षियुग्ममभितो विस्फारितं यत्र-
तल्लब्धं यैरिह सुप्रभातमचलं तेभ्यो यतिभ्यो नमः ॥१॥

अर्थ: दोनों जो निश्शेषावरण अर्थात् ज्ञानावरण और दर्शनावरण उनकी जो स्थिति वही हुई रात्रि उसके अंत होने पर तथा अंतराय कर्म के क्षय से प्रकाश होने पर और मोहनीय कर्म के द्वारा किए हुए निद्रा के भार को शीघ्र ही दूर होने पर जिस सुप्रभात में सम्यग्ज्ञान तथा सम्यग्दर्शनरूप दोनों नेत्र उन्मीलित हुए (खुले) उस अचल सुप्रभात को जिन यतियों ने प्राप्त कर लिया है उन यतियों के लिए नमस्कार है।


यत्तच्चक्रसुखप्रदं यदमलं ज्ञानप्रभाभासुरं
लोकालोकपदप्रकाशनविधिप्रौढं प्रकृष्टं सकृत्।
उद्भूते सति यत्र जीवितमिव प्राप्तं परं प्राणिभिः
त्रैलोक्याधिपतेर्जिनस्य सततं तत्सुप्रभातं स्तुवे॥२॥

अर्थ: तीनों लोकों के स्वामी श्री जिनेन्द्र भगवान् के उस सुप्रभात स्तोत्र को नमस्कार करता हूँ कि जो जिनेन्द्र भगवान् का सुप्रभात समस्त जीवों को सुख का देने वाला है और समस्त प्रकार के मलों से रहित होने के कारण अमल है और ज्ञान की जो प्रभा उससे देदीप्यमान है तथा समस्त लोकालोक को प्रकाश करने वाला है और जो अत्यन्त महान् है और जिसके एकबार ही उदित होने पर समस्त प्राणियों को ऐसा मालूम पड़ता है कि हमको उत्कृष्ट जीवन की प्राप्ति हो जाती है अर्थात् वे अपना जीवन धन्य समझते हैं।


एकान्तोद्धतवादिकौशिकशतैर्नष्टं भयादाकुलै-
र्जातं यत्र विशुद्धखेचरनुतिव्याहारकोलाहलम्।
यत्सद्धर्मविधिप्रवर्तनकरं तत्सुप्रभातं परं
मन्येऽर्हत्परमेष्ठिनो निरुपमं संसारसंतापहृत्॥३॥

अर्थ: जिन अर्हत् भगवान् के उपमा रहित सुप्रभात के होने पर भयभीत होकर एकान्त सिद्धान्त से मत्त ऐसे सैकड़ों वादीरूपी कौशिक (बाल उल्लू) नष्ट हो गये और अत्यन्त शुद्ध जो विद्याधरों की स्तुति उसका जो शब्द उसका कोलाहल होता हुआ और जो सुप्रभात उत्तमधर्म की प्रवृत्ति का करने वाला है वह अर्हत् भगवान् का सुप्रभात (केवलज्ञान) समस्त संसार के संतापों को दूर करने वाला है ऐसा मैं मानता हूँ।


सानंदं सुरसुन्दरीभिरहितः शक्रैर्यदा गीयते
प्रातः प्रातरधीश्वरं यदतुलं वैतालिकैः पठ्यते।
यच्चाश्रावि नभश्चरैश्च फणिभिः कन्याजनाद्गायत
स्तद्वन्दे जिनसुप्रभातमखिलं त्रैलोक्यहर्षप्रदम्॥४॥

अर्थ: जिन जिनेन्द्र भगवान् के समस्त सुप्रभात स्तोत्र का आनंद युक्त देवांगना तथा इंद्र गान करते हैं तथा उपमा रहित स्तोत्र को विद्याधर तथा नागेन्द्र सुनते भी हैं उन तीनों लोकों को हर्ष के देने वाले भगवान् के सुप्रभात स्तोत्र को मैं शिर नवाकर नमस्कार करता हूँ।


उद्द्योते सति यत्र नश्यति तरां लोकेऽन्धचौरश्चिरं
दोषेशोंतरतीत यत्र मलिनो मंदप्रभो जायते।
यत्रानीतितमस्ततेर्विघटनाज्जाता दिशो निर्मला
वंद्यं नंदतु शाश्वतं जिनपतेस्तत्सुप्रभातं परम्॥५॥

अर्थ: जिन जिनेन्द्र भगवान् के सुप्रभात के प्रकाशमान होने पर संसार में पापरूपी चोर सर्वथा नष्ट हो जाते हैं तथा मनरूपी चन्द्रमा मलिन मंदप्रभ (फीका) हो जाता है और अनीतिरूपी अंधकार के सर्वथा नाश हो जाने के कारण समस्त दिशायें स्वच्छ हो जाती हैं तथा जो भगवान् का सुप्रभात उत्कृष्ट है तथा सदा काल रहने वाला है और वंदनीक है ऐसा वह जिनेन्द्र भगवान् का सुप्रभात सदा इस लोक में जयवंत प्रवर्ते।


मार्गं यत्प्रकटीकरोति हरते दोषानुषंगस्थितिं
लोकानां विदधाति दृष्टिमचिरादर्थवलोकक्षमाम्।
कामासक्तधियामपि कृशयति प्रीतिं प्रियायामिति
प्रातस्तुल्यतयापि कोऽपि महिमापूर्वः प्रभातोऽर्हताम्॥६॥

अर्थ: जो अर्हत् भगवान् का सुप्रभात मार्ग प्रकट करता है और समस्त दोषों के संग से होने वाली स्थिति को नष्ट करता है तथा लोगों की दृष्टियों को शीघ्र ही पदार्थों के देखने में समर्थ बनाता है और जिन मनुष्यों की बुद्धि काम में आसक्त है अर्थात् जो पुरुष कामी हैं उनकी स्त्री विषयक प्रीति को नष्ट करता है। इसलिए यद्यपि अर्हत् देव का प्रभात प्रातःकाल के समान मालूम पड़ता है तो भी यह प्रातःकाल से वचनागोचर अपूर्व महिमा का धारी है ऐसा जान पड़ता है।


यद्भानोरपि गोचरं न गतवच्चित्ते स्थितं तत्तमो
भव्यानां दलयत्तथा कुवलये कुर्याद्विकासश्रियम्।
तेजः सौख्यहतेरकर्तृ सदिदं नक्तंचराणामपि
क्षेमं वो विदधातु जैनमसमं श्री सुप्रभात सदा॥७॥

अर्थ: जो अंधकार सूर्य के भी गोचर (विषयभूत) नहीं है ऐसे इस भव्यजीवों के चित्तों में विद्यमान भी अंधकार को जो जिनेन्द्र का सुप्रभात नष्ट करने वाला है तथा भूमंडल में जो जिनेन्द्र का सुप्रभात विकास की शोभा को धारण करता है (अर्थात् पृथ्वीमंडल में विकसित होता है) और जो जिनेन्द्र का सुप्रभात रात्रि में गमन करने वाले जीवों के तेज तथा सुख के नाश को नहीं करता है ऐसा यह समीचीन तथा उपमा रहित जिनेन्द्र भगवान् का सुप्रभात सदा आप लोगों के कल्याण को करे।


भव्याम्भोरुहनन्दिकेवलरविः प्राप्नोति यत्रोदयं
दुष्कर्मोदयनिद्रया परिहृतं जागर्ति सर्वं जगत्।
नित्यं यैः परिपठ्यते जिनपतेरेतत्प्रभाताष्टकं
तेषामाशु विनाशमेति दुरितं धर्मः सुखं वर्धते॥८॥

अर्थ: जिन श्री जिनेन्द्रदेव के सुप्रभात में भव्यरूपी कमलों को आनंद का देने वाला केवलज्ञानरूपी सूर्य उदय को प्राप्त होता है और जिन भगवान् के सुप्रभात में समस्त जगत् खोटे कर्मों से पैदा हुई जो निद्रा उससे रहित होकर प्रबोध अवस्था को प्राप्त होता है आचार्यवर कहते हैं कि जिनेन्द्र भगवान् के इस प्रकार के उत्तम प्रभाताष्टक को जो भव्यजीव नित्य पढ़ते हैं उन भव्यजीवों के समस्त पापों का नाश हो जाता है और उनके धर्म की वृद्धि होती है तथा सुख की भी वृद्धि होती है।

१८. श्री शांतिनाथ स्तोत्र

त्रैलोक्याधिपतित्वसूचनपरं लोकेश्वरैरुद्धृतं
यस्योपर्य्युपरीन्दुमण्डलनिभं छत्रत्रयं राजते।
अश्रांतोद्गतकेवलोज्जवलरुचा निर्भर्त्सितार्कप्रभं
सोऽस्मान् पातु निरञ्जनो जिनपतिः श्रीशांतिनाथः सदा॥१॥

अर्थ: जिन श्री शांतिनाथ भगवान् के मस्तक के ऊपर तीनों लोक के स्वामीपने के प्रकट करने में तत्पर तथा देवेन्द्रों द्वारा आरोपित चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब के समान तीन छत्र शोभित होते हैं और निरंतर उदय को प्राप्त ऐसा जो केवलज्ञान उसकी जो निर्मल कांति उससे जिनने सूर्य की प्रभा को भी शोभाहीन (लज्जित) कर दिया है और जो समस्त पापों से रहित हैं ऐसे वे श्री शांतिनाथ जिनेन्द्र सदा हम लोगों की रक्षा करें।


देवः सर्वविदेष एव परमो नान्यस्त्रिलोकीपतिः
संत्यस्यैव समस्ततत्त्वविषया वाचः सतां सम्मताः।
एतद्घोषयतीव यस्य विबुधैरास्फालितो दुन्दुभिः
सोस्मान् पातु निरंजनो जिनपतिः श्री शांतिनाथः सदा ॥२॥

अर्थ: देवताओं से ताड़ित (बजाई हुई) जिन श्री शांतिनाथ भगवान् की दुन्दुभि (नगाड़ा) संसार में मानों इस बात को प्रकट कर रही है कि समस्त पदार्थों को जानने वाले तथा उत्कृष्ट और तीनों लोकों के पति यदि हैं तो शांतिनाथ भगवान् ही हैं किन्तु इनसे भिन्न न कोई समस्त पदार्थों का जानने वाला है और न उत्कृष्ट तथा तीनों लोकों का पति ही है तथा समस्त तत्त्वों का वर्णन करने वाले इन्हीं (भगवान्) के वचन सज्जनों को मान्य हैं किन्तु इनसे भिन्न किसी के वचन मान्य नहीं हैं ऐसे वे समस्त कर्मों से रहित श्री शांतिनाथ भगवान् सदा हमारी रक्षा करें।


दिव्यस्त्रीमुखपङ्कजैकमुकरप्रोल्लासिनानामणि
स्फारीभूतविचित्ररश्मिरचितान्नाम्रेन्द्रायुधैः।
सच्चित्रीकृतवातवर्त्मनि लसत्सिंहासने यः स्थितः
सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपतिः श्रीशांतिनाथःसदा॥३॥

अर्थ: श्री शांतिनाथ भगवान्, देवांगनाओं के मुख कमल वे ही हुए एक दर्पण उनमें देदीप्यमान जो नाना प्रकार के रत्न उनकी जो चारों ओर फैली हुई किरणें उनसे बनाये हुए, जो इन्द्र धनुष, उनसे चित्र-विचित्र जो आकाश, उसमें देदीप्यमान सिंहासन में विराजमान होते हुए ऐसे वे समस्त पापों से रहित श्री शांतिनाथ भगवान् सदा हमारी रक्षा करें।


गंधाकृष्टमधुव्रतव्रजरुतैर्व्यापारिता कुर्वती
स्तोत्राणीव दिवःसुरैः सुमनसां वृष्टिर्यदग्रेऽभवत्।
सेवायातसमस्तविष्टपपतिस्तुत्याश्रयस्पर्धया,
सोऽस्मान् पातु निरंजनो जिनपतिः श्रीशांतिनाथो जिनः॥४॥

अर्थ: जिन श्री शांतिनाथ भगवान् के आगे आकाश में देवों द्वारा की हुई फूलों की वर्षा इस प्रकार से होती हुई मानो सेवा में आये हुए जो समस्त लोक के स्वामी देवेन्द्रादिक उनकी स्तुति से उत्पन्न हुई ईर्ष्या से, सुगंध से खिंचे हुए भ्रमर समूह उनके शब्दों से स्तोत्रों को ही कर रही हो। इसलिए इस प्रकार समस्त पापों से रहित श्री शांतिनाथ भगवान् हमारी रक्षा करो।


खद्योतौ किमुतानलस्य कणिके शुभ्राभ्रलेशावथ
सूर्याचंद्रमसाविति प्रगुणितौ लोकाक्षियुग्मैःसुरैः ।
तर्क्यंते हि यदग्रतोऽतिविशदं तद्यस्यभामण्डलं
सोऽस्मान्पातु निरंजनो जिनपतिः श्री शांतिनाथः सदा॥५॥

अर्थ: जिन श्री शांतिनाथ भगवान् के भामंडल के आगे सूर्य तथा चन्द्रमा को लोगों के नेत्र तथा देव ऐसा मानते थे कि, क्या ये सूर्य चन्द्रमा दो खद्योत (जुगनू) हैं अथवा अग्नि के दो फुलिंगे हैं वा सफेद मेघ के ये दो टुकड़े हैं ऐसा जिन शांतिनाथ भगवान् का भामंडल था। ऐसे वे समस्त पापों से रहित श्री शांतिनाथ भगवान हमारी रक्षा करें।


यस्याशोकतरोर्विनिद्रसुमनोगुच्छप्रसक्तैः क्वणद्
भृङ्गैर्भक्तियुतः प्रभोरहरहर्गायन्निवास्ते यशः ।
शुभ्रं साभिनयो मरुच्चललतापर्यन्तपाणिश्रिया
सोऽस्मान्पातु निरंजनो जिनपतिः श्रीशांतिनाथः सदा॥६॥

अर्थ: जिन श्री शांतिनाथ भगवान् का भक्ति सहित अशोक वृक्ष खिले हुए फूल उनके जो गुच्छे उन पर बैठे हुए जो शब्द करते हुए भ्रमर उनसे प्रभू के निर्मल यश का गान कर रहा है ऐसा मालूम होता है और पवन से कंपित जो लता उनके जो अग्रभाग वे ही हुए हाथ उनसे ऐसा जान पड़ता है मानों नृत्य ही कर रहा हो ऐसे वे समस्त पापों से रहित श्री शांतिनाथ भगवान् हमारी रक्षा करें।


विस्तीर्णाखिलवस्तुतत्त्वकथनापारप्रवाहोज्ज्वला
निःशेषार्थिनिषेवितातिशिशिरा शैलादिवोत्तुंगतः ।
प्रोद्भूता हि सरस्वती सुरनुता विश्वं पुनाना यतः
सोऽस्मान्यातु निरञ्जनो जिनपतिः श्री शांतिनाथःसदा॥७॥

अर्थ: जो अत्यन्त विस्तीर्ण है तथा समस्त तत्त्वों का जो कथन वही हुआ प्रवाह उससे उज्ज्वल है और जिनकी समस्त अर्थिजन (याचक) सेवा करते हैं और जो अत्यन्त शीतल है तथा जिनकी समस्त देव स्तुति करते हैं और जो समस्त जगत् को पवित्र करने वाली है ऐसी सरस्वती (गंगा) अत्यन्त ऊँचे पर्वत के समान जिन श्री शांतिनाथ भगवान् से प्रकट हुई है ऐसे वे समस्त पापों से रहित श्री शांतिनाथ भगवान् हमारी रक्षा करें।


लीलोद्वेल्लितबाहुकंकणरणत्कारप्रहृष्टैः सुरै
श्चंचच्चन्द्रमरीचिसंचयसमाकारैश्चलच्चामरैः ।
नित्यं यः परिवीज्यते त्रिजगतां नाथस्तथाप्यस्पृहः
सोऽस्मान्यातु निरंजनो जिनपतिः श्रीशांतिनाथः सदा ॥८॥

अर्थ: जिन शांतिनाथ भगवान् के ऊपर लीला से कंपित जो भुजा उनमें पहने हुए कंकण उनका जो रणत्कार शब्द उनसे अत्यन्त हर्षित ऐसे देव, देदीप्यमान जो चन्द्रमा उसकी किरणें, उनका जो समूह उसके समान रूप को धारण करने वाले चंचल चमरों को ढोरते हैं और जो तीनों लोक के नाथ हैं और जो निरीह हैं अर्थात् समस्त पदार्थों में इच्छा से रहित हैं ऐसे वे समस्त पापों से रहित श्री शांतिनाथ भगवान् सदा हमारी रक्षा करें अर्थात् ऐसे श्री शांतिनाथ भगवान् को नमस्कार है।


निश्शेषश्रुतबोध वृद्धमतिभिः प्राज्यैरुदारैरपि
स्तोत्रैर्यस्य गुणार्णवस्य हरिभिः पारो नहि प्राप्यते।
भव्यांभोरुहनंदिकेवलरविर्भक्त्या मयापि स्तुतः
सोऽस्मान्यातु निरंजनो जिनपतिःश्रीशांतिनाथः सदा॥९॥

अर्थ: समस्त शास्त्रों के ज्ञान से जिनकी बुद्धि अत्यन्त विशाल हैं ऐसे इन्द्र भी अत्यन्त उत्कृष्ट तथा बड़े-बड़े स्तोत्रों से जिन शांतिनाथ के गुणरूपी समुद्र का पार नहीं पा सकते ऐसे उन भव्यरूपी कमलों को अथवा भव्य पद्मनंदि को आनंद के करने वाले केवलज्ञानरूपी सूर्य के धारी श्री शांतिनाथ भगवान् की मैंने स्तुति की है इसलिए समस्त पापों से रहित श्री शांतिनाथ भगवान् हमारी रक्षा करें।

१९. श्री जिनपूजाष्टक

जातिर्जरामरणमित्यनलत्रयस्य जीवाश्रितस्य बहुतापकृतो यथावत्।
विध्यापनाय जिनपादयुगाग्रभूमौ धारात्रयं प्रवरवारिकृतं क्षिपामि॥१॥

अर्थ: जीवों के आश्रित अर्थात् जीवों में होने वाली तथा अत्यन्त संताप को देने वाली ऐसी जन्म, जरा और मरण ये तीन प्रकार की अग्नि हैं उन तीनों प्रकार की अग्नियों को यथावत् बुझाने के लिए श्री जिनेन्द्र भगवान् के दोनों चरणों के अग्रभाग की भूमि में उत्तम जल से बनाई हुई तीन धाराओं का मैं क्षेप करता हूँ।


यद्वद्वचोजिनपतेर्भवतापहारि नाहं सुशीतलमपीह भवामि तद्वत्।
कर्पूरचंदनमितीव मयार्पितं सत् त्वत्पादपंकजसमाश्रयणं करोति॥२॥

अर्थ: जिस प्रकार भगवान् के वचन समस्त संसार के संताप को हरण करने वाले हैं उसी प्रकार अत्यन्त शीतल भी मैं चंदन संसार के संतापों का हरण करने वाला नहीं हूँ। इसीलिए ऐसा समझकर मेरे द्वारा चढ़ाया हुआ यह कपूर मिला हुआ चंदन हे भगवन्! आपके चरण कमलों के आश्रय को करता है।


राजत्यसौ शुचितराक्षतपुंजराजिर्दत्ताधिकृत्य जिनमक्षतमक्षधूर्तैः।
वीरस्य नेतरजनस्य तु वीरपट्टो बद्धः शिरस्यतितरां श्रियमातनोति॥३॥

अर्थ: इन्द्रियरूपी धूर्त, उससे नहीं नष्ट किए गये, ऐसे जो जिनेन्द्र भगवान् हैं उनको आश्रय कर दी गई अत्यन्त निर्मल अक्षतों के पुंजों की पंक्ति है वह अत्यन्त शोभित होती है सो ठीक ही है क्योंकि जो मनुष्य अत्यन्त शूरवीर हैं उसके मस्तक पर बंधा हुआ ही वीरपट्ट शोभा को प्राप्त होता है डरपोक के मस्तक पर बंधा हुआ शोभा को प्राप्त नहीं होता।


साक्षादपुष्पशर एष जिनस्तदेनं संपूजयामि शुचिपुष्पशरैर्मनोज्ञैः।
नान्यं तदाश्रयतया किल यन्न यत्र तत्तत्र रम्यमधिकां कुरुते च लक्ष्मीम्॥४॥

अर्थ: ये जिनेन्द्र भगवान् साक्षात् अपुष्पशर हैं अर्थात् मदन से रहित हैं। इसीलिए मैं इन जिनेन्द्र भगवान् का अत्यन्त मनोहर ऐसे फूलों के हारों से पूजन करता हूँ किन्तु भगवान् से जो अन्य हैं वे मदन से रहित नहीं हैं सहित ही हैं, इसलिए फूलों के हारों से उसकी पूजा नहीं करता, क्योंकि जो चीज जहाँ पर होती है वह वहाँ पर मनोहर समझी जाती है। वह वहाँ पर अत्यन्त शोभा को प्राप्त होती है जो जहाँ पर मनोहर वस्तु नहीं होती वह वहाँ पर अत्यन्त लक्ष्मी को ही धारण कर सकती है।


देवोऽयमिन्द्रियबलं प्रलयं करोति नैवेद्यमिन्द्रियबलप्रदखाद्यमेतत्।
चित्रं तथापि पुरतः स्थितमर्हतोऽस्य शोभां बिभर्ति जगतो नयनोत्सवाय॥५॥

अर्थ: यह श्री जिनेन्द्र देव तो समस्त इन्द्रियों के बल को नष्ट करते हैं और यह नैवेद्य इन्द्रियों के बल को बढ़ाने वाला है तथा खाने योग्य है तो भी श्री अर्हत भगवान् के सामने चढ़ाया हुआ यह नैवेद्य समस्त जगत् के नेत्रों के उत्सव के लिए शोभा को धारण करता है यह आश्चर्य है।


आरातिकं तरलवन्हिशिखं विभाति स्वच्छे जिनस्य वपुषि प्रतिबिम्बितं सत्।
ध्यानानलो मृगयमाण इवावशिष्टं दग्धुं परिभ्रमति कर्मचयं प्रचंडः॥६॥

अर्थ: चंचल है अग्नि की शिखा जिसमें ऐसी तथा श्री जिनेन्द्र भगवान् के स्वच्छ शरीर में प्रतिबिम्बित हुई आरती ऐसी मालूम होती है मानो प्रचंड ध्यानरूपी अग्नि बचे हुए कर्मों को भस्म करने के लिए जहाँ-तहाँ ढूँढ़ती हुई भ्रमण करती है।


कस्तूरिका-रसमयीरिव पत्रवल्लीः कुर्वन् मुखेषु चलनैरिव दिग्वधूनाम्।
हर्षादिव प्रभुजिनाश्रयणेन वात प्रेङ्खद्वपुर्नटति पश्यत धूपधूमः॥७॥

अर्थ: दिशारूपी स्त्रियों के मुख में कस्तूरी के रस से बनाई हुई पत्र रचना के समान पत्र रचना को करता हुआ प्रभु श्री जिनेन्द्रदेव के आश्रय से पवन से कंपित है शरीर जिसका ऐसा धूप का धुआँ हर्ष से मानों नृत्य ही कर रहा है ऐसा मालूम होता है।


उच्चैः फलाय परमामृतसंज्ञकाय नानाफलैर्जिनपतिं परिपूजयामि।
तद्भक्तिरेव सकलानि फलानि दत्ते मोहेन तत्तदपि याचत एव लोकः॥८॥

अर्थ: सबसे ऊँचे तथा उत्तम अमृत है संज्ञा जिसकी ऐसे उस फल के लिए अर्थात् मोक्ष फल के लिए मैं श्री जिनेन्द्र भगवान् की भाँतिभाँति के फलों से पूजा करता हूँ यद्यपि श्री जिनेन्द्र भगवान् की भक्ति ही समस्त फलों को देने वाली है तो भी लोक, मोह से फलों की याचना करता ही है।


पूजाविधिं विधिवदत्र विधाय देवे स्तोत्रं च संमदरसाश्रितचित्तवृत्तिः।
पुष्पाञ्जलिं विमलकेवललोचनाय यच्छामि सर्वजनशांतिकराय तस्मै॥९॥

अर्थ: श्रेष्ठ जो हर्ष वही हुआ रस उससे आश्रित है चित्त की वृत्ति जिसकी ऐसा मैं (पूजक) शास्त्रानुसार भगवान् की भलीभाँति पूजा करके तथा भलीभाँति स्तोत्र को पढ़ करके निर्मल केवल ज्ञानरूपी नेत्र के धारण करने वाले और समस्त जीवों को शांति के देने वाले उन श्री जिनेन्द्र भगवान् के लिए पुष्पों की अंजलि को समर्पण करता हूँ ॥पुष्पांजलिः॥


श्रीपद्मनंदितगुणौघ न कार्यमस्ति पूजादिना यदपि ते कृतकृत्यतायाः।
स्वश्रेयसे तदपि तत्कुरुते जनोऽर्हन् कार्या कृषिः फलकृते न तु भूपकृत्यै॥१०॥

अर्थ: श्री पद्मनंदि आचार्य द्वारा गान किया गया है गुणों का समूह जिनका ऐसे हे अर्हन्! हे वीतराग! यद्यपि आप कृतकृत्य हैं इसलिए उस कृतकृत्यपनेरूप हेतु से आपको पूजा आदिक से कुछ भी कार्य नहीं है तो भी लोक अपने कल्याण के लिए ही आपकी पूजा करते हैं क्योंकि खेती अपने कल्याणों की प्राप्ति के लिए ही की जाती है किन्तु राजा के काम के लिए नहीं की जाती।

२०. करुणाष्टक

त्रिभुवनगुरो जिनेश्वर परमानन्दैककारण कुरुष्व।
मयि किंकरेऽत्र करुणां यथा तथा जायते मुक्तिः॥१॥

अर्थ: हे तीनों लोकों के गुरु, हे कर्मों को जीतने वाले महात्माओं के स्वामी और हे उत्कृष्ट मोक्षरूपी आनंद के देने वाले जिनेन्द्र मुझ दास पर ऐसी दया कीजिए, जिससे कि मेरा मोक्ष हो जावे अर्थात् समस्त पाप कर्मों से मैं सर्वथा छूट जाऊँ।


निर्विण्णोऽहं नितरामर्हन् बहुदुःखया भवस्थित्या।
अपुनर्भवाय भवहर कुरु करुणामत्र मयि दीने॥२॥

अर्थ: हे समस्त घातिया कर्मों को जीतने वाले अर्हंत भगवान्, अनेक प्रकार के दुखों को देने वाली ऐसी जो संसार की स्थिति है उससे मैं सर्वथा खिन्न हूँ। इसलिए हे संसार के नाश करने वाले जिनेन्द्र ! इस संसार में मुझ दीन पर ऐसी दया कीजिये जिससे मुझे फिर से जन्म न धारण करना पड़े अर्थात् मैं मुक्त हो जाऊँ।


उद्धर मां पतितमतो विषमाद्भवकूपतः कृपां कृत्वा।
अर्हन्नलमुद्धरणे त्वमसीति पुनः पुनर्वच्मि ॥३॥

अर्थ: हे प्रभो ! मैं इस भयंकर संसाररूपी कुएँ में पड़ा हुआ हूँ इसलिए मेरे ऊपर दया करके मुझे इस संसाररूपी भयंकर कुएँ से बाहर निकालिए क्योंकि हे अर्हन् ! हे भगवन् ! इस कुएँ से मुझे निकालने में आप ही समर्थ हैं ऐसा मैं बारम्बार आपकी सेवा में निवेदन करता हूँ।


त्वं कारुणिकः स्वामी त्वमेव शरणं जिनेश तेनाहम्।
मोहरिपुदलितमानः फूत्कारं तव पुरः कुर्वे ॥४॥

अर्थ: हे जिनेश ! हे प्रभो ! यदि संसार में कोई दयावान् हैं तो आप ही हैं और भव्य जीवों के शरण हैं तो आप ही हैं। इसलिए मोहरूपी बैरी ने जिसका मान (अभिमान) नष्ट कर दिया है ऐसा मैं आपके सामने ही फूत्कार को करता हूँ अर्थात् फुक्का मार-मार कर रोता हूँ।


ग्रामपतेरपि करुणा परेण केनाप्युपद्रुते पुंसि।
जगतां प्रभो न किं तव जिन मयि खलकर्मभिः प्रहते॥५॥

अर्थ: जो मनुष्य जिस गाँव का अध्यक्ष (मुखिया) है यदि उस गाँव में किसी मनुष्य पर कोई अन्य मनुष्य आकर उपद्रव करें अर्थात् उसको दुख देवें तो वह ग्राम का मुखिया भी जब उस दुःखित मनुष्य पर करुणा करता है तो हे जिनेन्द्र ! आप तो तीनों लोक के प्रभू हैं और मुझे अत्यन्त दुष्ट कर्मों ने सता रखा है तो क्या आप मेरे ऊपर करुणा न करेंगे ? अवश्य ही दया करेंगे।


अपहर मम जन्म दयां कृत्वेत्येकत्र वचसि वक्तव्ये।
तेनातिदग्ध, इति मे देव बभूव प्रलापित्वम् ॥६॥

अर्थ: हे प्रभो! सबका मूलभूत एक ही शब्द कह देना चाहिए। वह एक शब्द यही है कि कृपाकर आप मेरे जन्म को (संसार को) सर्वथा नष्ट करें क्योंकि मैं इस जन्म से अत्यन्त दुःखित हूँ। इसीलिए यह मेरा आपके सामने प्रलाप हुआ है अर्थात् मैं विलख-विलख कर रो रहा हूँ।


तव जिन चरणाब्जयुगं करुणामृतसंगशीतलं यावत्।
संसारातपतप्तः करोमि हृदि तावदेव सुखी॥७॥

अर्थ: हे प्रभो! हे जिनेन्द्र! संसाररूपी आतप से संतप्त हुआ मैं जब तक दयारूपी जल के संग से अत्यन्त शीतल ऐसे आपके दोनों चरण कमलों को हृदय में धारण करता हूँ तभी तक मैं सुखी हूँ।


जगदेकशरण भगवन्नसमश्रीपद्मनन्दितगुणौघ।
किं बहुना कुरु करुणामत्र जने शरणमापन्ने॥८॥

अर्थ: हे समस्त जगत् के एक शरण, हे भगवन्! आप से अतिरिक्त जनों में नहीं पाये जाये, ऐसे श्री पद्मनन्दि नामक आचार्य द्वारा गान किए गुणों के समूह को धारण करने वाले हे जिनेश! हे प्रभो! अब मैं विशेष कहाँ तक कहूँ बस यही प्रार्थना है कि इस, शरण में आये हुए मुझपर आप इस संसार में दया करें।

२१. क्रियाकाण्डचूलिका

सम्यग्दर्शन - बोधवृत्त - समताशीलक्षमाद्यैर्घनैः
संकेताश्रयवज्जनेश्वर भवान् सर्वैर्गुणैराश्रितः ।
मन्ये त्वय्यवकाशलब्धिरहितैः सर्वत्र लोके वयं
संग्राह्या इति गर्वितैः परिहृतो दोषैरशेषैरपि ॥१॥

अर्थ: हे प्रभो ! हे जिनेश ! निविड जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र, समता, शील और क्षमा आदिक समस्त गुण हैं। उन्होंने संकेत के घर के समान आपका आश्रय किया है। इसीलिए आपमें जिन्होंने स्थान को नहीं पाया है और जो समस्त लोक में हम संग्राह्य (ग्रहण करने योग्य) हैं इस प्रकार के अभिमान से संयुक्त हैं ऐसे समस्त दोषों ने, आपको छोड़ दिया है, ऐसा मालूम होता है।


यस्त्वामनंतगुणमेकविभुं त्रिलोक्याः स्तौति प्रभूतकवितागुणगर्वितात्मा।
आरोहति द्रुमशिरः स नरो नभोऽन्तं गन्तुं जिनेन्द्र मति विभ्रमतो बुधोऽपि ॥२॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र ! आप तो अनन्तगुणों के भंडार हैं और तीनों लोक के एक स्वामी हैं ऐसा समझकर भी यदि प्रचुर जो कविता का गुण उससे जिसकी आत्मा अत्यन्त गर्व से सहित है अर्थात् जो कविता चातुर्य का बड़ा भारी अभिमानी है-ऐसा कोई मनुष्य आपकी स्तुति करे तो समझ लेना चाहिए कि वह बुद्धिमान् भी मनुष्य अपनी बुद्धि के भ्रम से (मूर्खता से) आकाश के अंत को प्राप्त होने के लिए वृक्ष की चोटी पर चढ़ता है ऐसा निस्संदेह मालूम होता है।


शक्नोति कर्तुमिह कः स्तवनं समस्तविद्याधिपस्य भवतो विबुधार्चिताङ्घ्रेः।
तत्रापि तज्जिनपते कुरुते जनो यत्तच्चित्तमध्यगतभक्तिनिवेदनाय॥३॥

अर्थ: हे प्रभो! आप समस्त विद्याओं के स्वामी हैं और आपके चरणों की बड़े-बड़े देव अथवा बड़े-बड़े पंडित आकर पूजन करते हैं। इसलिए संसार में आपकी स्तुति करने के लिए कोई भी समर्थ नहीं है तो भी हे जिनेन्द्र! जो लोग आपकी स्तुति करते हैं वे केवल अपने चित्त में प्राप्त जो भक्ति उसके निवेदन करने के लिए ही करते हैं और दूसरा कोई भी कारण नहीं है।


नामापि देव भवतः स्मृतिगोचरत्वं वाग्गोचरत्वमथ येन सुभक्ति भाजा।
नीतं लभेत स नरो निखिलार्थसिद्धिं साध्वी स्तुतिर्भवतु मा किल कात्र चिंता॥४॥

अर्थ: हे जिनेन्द्र! हे प्रभो! जो आपका भक्त मनुष्य आपके नाम को भी स्मरण करता है अथवा आपके नाम को वचन द्वारा कहता भी है उस मनुष्य को भी संसार में समस्त प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है तब आपकी उत्तम रीति से स्तुति हो अथवा ना हो कोई भी चिंता नहीं।


एतावतैव मम पूर्यत एव देव सेवां करोमि भवतश्चरणद्वयस्य।
अत्रैव जन्मनि परत्र च सर्वकालं न त्वामितः परमहं जिन याचयामि॥५॥

अर्थ: हे जिनेश! इस भव में तथा परभव में मैं आपके दोनों चरणों की सदा काल सेवा करता रहूँ यही मुझे प्राप्ति होवे किन्तु मैं इससे अधिक आपसे कुछ भी नहीं माँगता।


सर्वांगमावगमतः खलु तत्त्वबोधो मोक्षाय वृत्तमपि सम्प्रति दुर्घटं नः।
जाड्यात्तथा कुतनुतस्त्वयि भक्तिरेव देवास्ति सैव भवतु क्रमतस्तदर्थम्॥६॥

अर्थ: समस्त प्रकार के शास्त्रों के ज्ञान से निश्चय से तत्त्वों का ज्ञान होता है और उन्हीं शास्त्रों से मोक्ष के लिए सम्यक्चारित्र की भी प्राप्ति होती है किन्तु इस पंचमकाल में हमारे लिए वे दोनों मूर्खता के कारण तथा दुर्गंध मय शरीर के कारण अत्यन्त दुर्घट हैं अर्थात् सहसा प्राप्त नहीं हो सकते इसलिए मुझमें जो आपकी भक्ति है वही क्रम से मोक्ष के लिए होवे ऐसी प्रार्थना है।


हरति हरतु वृद्धं वार्धकं कायकान्तिं दधति दधतु दूरं मंदतामिन्द्रियाणि।
भवति भवतु दुःखं जायतां वा विनाशः परमिह जिननाथे भक्तिरेका ममास्तु॥७॥

अर्थ: वृद्धावस्था समस्त शरीर की कांति को नष्ट करती है सो करे तथा समस्त इन्द्रियाँ बहुत काल तक मंद हो जाती हैं सो होवें और संसार में दुख होता है सो भी हो, तथा विनाशभी हो किन्तु जिनेन्द्र भगवान् में जो मेरी भक्ति है वह सदा रहे ऐसी प्रार्थना है।


अस्तु त्रयं मम सुदर्शनबोधवृत्तसम्बन्धि यांतु च समस्तदुरीहितानि।
याचे न किञ्चिदपरं भगवन् भवन्तं नाप्राप्तमस्ति किमपीह यतस्त्रिलोक्याम्॥८॥

अर्थ: हे प्रभो ! इस संसार में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूपी जो त्रयी है वह मेरे होवे तथा मेरे समस्त पाप नष्ट हो जावें बस यही मैं आपसे याचना करता हूँ किन्तु इससे भिन्न दूसरी वस्तु, मैं नहीं माँगता क्योंकि संसार में इनसे भिन्न ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो मुझे प्राप्त न हो गई हो।


धन्योऽस्मि पुण्यनिलयोऽस्मि निराकुलोऽस्मि शांतोस्मि नष्टविपदस्मि विदस्मि देव।
श्रीमज्जिनेन्द्र भवतोऽङ्घ्रियुगं शरण्यं प्राप्तोस्मि चेदहमतीन्द्रियसौख्यकारि॥९॥

अर्थ: हे श्री जिनेन्द्र ! जो सुख अतीन्द्रिय है अर्थात् इन्द्रियों से नहीं हो सकता है उस सुख को करने वाले यदि मुझे संसार में आपके दोनों चरण प्राप्त हो गये तो हे देव ! मैं अपने को धन्य हूँ, पुण्यवान् हूँ, समस्त प्रकार की आकुलताओं से रहित हूँ, शांत हूँ तथा सब प्रकार की आपत्तियों से भी रहित हूँ और ज्ञानी हूँ ऐसा भलीभाँति समझता हूँ।


रत्नत्रये तपसि पंक्तिविधौ च धर्मे मूलोत्तरेषु च गुणेष्वथ गुप्तिकार्ये।
दर्पात् प्रमादात् उतागसि मे प्रवृत्ते मिथ्यास्तु नाथ जिनदेव तव प्रसादात्॥१०॥

अर्थ: हे प्रभो जिनेश ! सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय में, तप में, दश प्रकार के धर्म में तथा मूलगुण और उत्तर गुणों में और तीन प्रकार की गुप्तियों में जो कुछ अभिमान से अथवा प्रमाद से मुझे अपराध लगा हो सो हे जिनदेव ! हे नाथ ! आपके प्रसाद से वह मेरा अपराध सर्वथा मिथ्या हो ऐसी प्रार्थना है।


मनोवचोऽङ्गैः कृतमङ्गिपीडनं प्रमोदितं कारितमत्र यन्मया।
प्रमादतो दर्पत एतदाश्रयं तदस्तु मिथ्या जिन दुष्कृतं मम॥११॥

अर्थ: हे प्रभो ! हे जिनेन्द्र ! प्रमाद से अथवा अभिमान से जो मैंने मन-वचन-काय से जीवों को पीड़ा दी है अथवा दूसरों से मैंने दिलवाई है वा जीवों को पीड़ा देने वाले दूसरे जीवों को मैंने अच्छा कहा है इनसे पैदा हुआ वह समस्त पाप मेरा मिथ्या हो।


चिंतादुष्परिणामसंततिवशादुन्मार्गगाया गिरः
कायात्संवृतिवर्जितादनुचितं कर्मार्जितं यन्मया।
तन्नाशं व्रजतु प्रभो जिनपते त्वत्पादपद्मस्मृते
रेषा मोक्षफलप्रदा किल कथं नास्मिन् समर्था भवेत्॥१२॥

अर्थ: हे प्रभो ! हे जिनेन्द्र ! चिंता से खोटे परिणामों की संतति से तथा खोटे मार्ग में गमन करने वाली वाणी से और संवर रहित शरीर से जो मैंने नाना प्रकार के कर्मों का उपार्जन किया है वे समस्त कर्म आपके चरण कमलों के स्पर्श से सर्वथा नाश को प्राप्त होवें क्योंकि आपके दोनों चरण कमलों की जो स्मृति है वह निश्चय से मोक्ष फल को देने वाली है इसलिए वह पाप कर्मों के नाश करने में क्यों नहीं समर्थ होगी?


वाणी प्रमाणमिह सर्वविदस्त्रिलोकीसद्मन्यसौ प्रवरदीपशिखासमाना ।
स्याद्वादकांतिकलिता नृसुराहिवंद्या कालत्रये प्रकटिताखिलवस्तुतत्त्वा ॥१३॥

अर्थ: जो सर्वज्ञ देव की वाणी स्याद्वादरूपी कांति से संयुक्त है और जिसकी मनुष्य, देव, नागकुमार सब ही स्तुति करते हैं तथा जो तीनों कालों में रहने वाले समस्त तत्त्वों को प्रकट करने वाली है अतएव जो तीन लोकरूपी घर में उत्कृष्ट दीपक की शिखा के समान है वही वाणी प्रमाण है।


क्षमस्व तद्वाणि तज्जिनपतिश्रुतादिस्तुतौ यदूनमभवन्मनोवचनकायवैकल्यतः ।
अनेकभवसंभवैर्जडिमकारणैः कर्मभिः कुतोत्र किल मादृशे जननि तादृशं पाटवम् ॥१४॥

अर्थ: हे माता सरस्वती ! मन, वचन, काय की विकलता से जिनेन्द्र भगवान् की स्तुति में अथवा शास्त्र की स्तुति में जो कुछ (मुझसे) हीनता हुई है उसको क्षमा करो क्योंकि अनेक भवों में उत्पन्न हुए तथा जड़ता के कारण जो कर्म हैं उनसे मेरे समान मनुष्य में जिनेन्द्र की तथा शास्त्र आदि की भलीभाँति स्तुति करने में कहाँ से इतनी चतुरता आ सकती है ?।


पल्लवोयं क्रियाकांडकल्पशाखाग्रसंगतः।
जीयादशेषभव्यानां प्रार्थितार्थफलप्रदः॥१५॥

अर्थ: समस्त भव्य जीवों को अभिलषित फलों का देने वाला ऐसा यह क्रियाकांडरूपी कल्पवृक्ष की शाखा में लगा हुआ क्रियाकांड चूलिकाधिकाररूपी जो पल्लव है वह सदा इस लोक में जयवंत रहो।


क्रियाकांडसंबंधिनी चूलिकेयं नरैः पठ्यते यैस्त्रिसन्ध्यं च तेषाम्।
वपुर्भारती चित्तवैकल्यतो या न पूर्णा क्रिया सापि पूर्णत्वमेति॥१६॥

अर्थ: जो भव्यजीव इस क्रियाकांड संबंधीनी चूलिका को तीनों काल (प्रातःकाल, मध्याह्नकाल तथा सायंकाल) पढ़ता है तथा पढ़ेगा उस भव्य जीव की जो क्रिया मन-वचन-काय की विकलता से पूर्ण नहीं हुई है वह शीघ्र ही पूर्ण हो जाती है।


जिनेश्वर नमस्तु ते त्रिभुवनैकचूडामणे गतोऽस्मि शरणं विभो भवभिया भवंतं प्रति।
तदार्तिहृतये बुधैरकथि तत्त्वमेतन्मया श्रितं सुदृढचेतसा भवहरस्त्वमेवात्र यत्॥१७॥

अर्थ: हे तीन भुवन के चूडामणि जिनेन्द्र! आपके लिए नमस्कार हो। संसार के भय से भीत होकर मैं आपकी शरण को प्राप्त हुआ हूँ। विद्वान् लोगों ने जो संसार की पीड़ा के नाश करने के लिए तत्त्व कहा है उसका मैंने दृढ़चित्त से आश्रय कर लिया है अर्थात् अपने अंतरंग में धारण कर लिया है क्योंकि इस संसार में आप ही समस्त संसार के नाश करने वाले हो।


अर्हन् समाश्रितसमस्तनरामरादिभव्याब्जनन्दिवचनांशुरवेस्तवाग्रे।
मौखर्यमेतदबुधेन मया कृतं यत् तद्भूरिभक्तिरभसस्थितमानसेन॥१८॥

अर्थ: हे अर्हन्! सभा में बैठे हुए जो समस्त मनुष्य तथा देव आदिक भव्यजीव वे ही हुए कमल उनको आनंद के देने वाले हैं वचनरूपी किरण जिनके ऐसे आप जिनदेव सूर्य के सामने जो मुझ अपंडित ने वाचालता प्रकट की है वह अत्यन्त गाढ़ भक्ति उसमें स्थित मन से ही की है।

२२. एकत्वभावना

स्वानुभूत्यैव यद्गम्यं रम्यं यच्चात्मवेदिनाम्।
जल्पे तत्परमज्योतिरवाङ्मानसगोचरम्॥१॥

अर्थ: जो परमतेज स्वानुभव से ही जाना जाता है और जो पुरुष आत्मस्वरूप के जानने वाले हैं उनको मनोहर मालूम पड़ता है और जो तेज न वचन के गोचर है और न मन का विषय भूत है उस परम तेज का मैं वर्णन करता हूँ। जितने भी जीव संसार में मौजूद हैं उन सबने प्रायः काम, भोग सम्बन्धी कथा तो सुनी है तथा उसका परिचय और अनुभव भी किया है इसलिए काम, भोग सम्बन्धी कथा उनके लिए सुलभ है, किन्तु एकत्वविभक्त आत्मा का उनको कभी भी ज्ञान नहीं हुआ है इसलिए केवल उसकी प्राप्ति सुलभ नहीं है। इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि वे एकत्वविभक्त आत्मा की प्राप्ति के लिए उद्योग करें।


एकत्वैकपदप्राप्तमात्मतत्त्वमवैति यः।
आराध्यते स एवान्यैस्तस्याराध्यो न विद्यते॥२॥

अर्थ: जो भव्यजीव एकत्व स्वरूप को प्राप्त ऐसे आत्म तत्त्व को जानता है उस पुरुष की अन्य लोग पूजा आराधना करते हैं किन्तु उसका आराध्य कोई नहीं अर्थात् वह किसी को नहीं पूजता।


एकत्वज्ञो बहुभ्योऽपि कर्मभ्यो न बिभेति सः।
योगी सुनौगतोऽम्भोधिजलेभ्य इव धीरधीः॥३॥

अर्थ: जिस प्रकार धीर बुद्धि पुरुष उत्तम नाव में बैठा हुआ समुद्र के जल से भय नहीं करता है उसी प्रकार जो योगी एकत्व स्वरूप का जानने वाला है वह बहुत भी कर्मों से अंशमात्र भी भय नहीं करता है।


चैतन्यैकत्वसंवित्तिर्दुर्लभा सैव मोक्षदा।
लब्धा कथं कथञ्चिच्चेच्चिन्तनीया मुहुर्मुहुः॥४॥

अर्थ: चैतन्य के एकत्व का जो ज्ञान है वह अत्यन्त दुर्लभ है और वह ज्ञान ही मोक्ष का देने वाला है। इसलिए यदि किसी रीति से उस चैतन्य का ज्ञान हो जावे तो बारम्बार उस ज्ञान का चिंतन करना चाहिए।


सुदपरिचिदाणुभूदा सव्वस्सवि कामभोगबंधकहा।
एयत्तस्सुवलंभो णवरि ण सुलहो विभत्तस्स ॥५॥

अर्थ: साक्षात् यदि सुख है तो मोक्ष में ही है और उस सुख को मोक्षाभिलाषी ही सिद्ध कर सकते हैं। इस संसार में साक्षात् सुख नहीं है और जो है भी वह निश्चय से सुख नहीं दुख ही है।


किञ्चित्संसारसंबंधि बंधुरं नेति निश्चयात्।
गुरूपदेशतोऽस्माकं निःश्रेयसपदं प्रियम्॥६॥

अर्थ: संसार सम्बन्धी कोई भी वस्तु निश्चय से हमको प्रिय नहीं है किन्तु श्रीगुरु के उपदेश से हमको मोक्षपद ही प्रिय है।


मोहोदयविषाक्रान्तमपि स्वर्गसुखं चलम्।
का कथाऽपरसौख्यानामलं भवसुखेन मे॥७॥

अर्थ: मोह का उदय वही हुआ विष उससे व्याप्त यदि स्वर्ग सुख भी संसार में विनाशीक है तब स्वर्ग से भिन्न जितने भी सुख हैं उनकी क्या कथा है अर्थात् वे तो अवश्य ही विनाशीक हैं। इसलिए मुझे संसार सम्बन्धी सुख नहीं चाहिए।


लक्ष्यीकृत्य सदात्मानं शुद्धबोधमयं मुनिः।
आस्ते यः सुमतिश्चात्र सोप्यमुत्र चरन्नपि॥८॥

अर्थ: श्रेष्ठ बुद्धि का धारक जो मुनि इस भव में निर्मल सम्यग्ज्ञान स्वरूप तथा श्रेष्ठ आत्मा को लक्ष्य कर रहता है वह परभव में गया हुआ भी इसी प्रकार आत्मा को लक्ष्य कर रहता है।


वीतरागपथे स्वस्थः प्रस्थितो मुनिपुंगवः।
तस्य मुक्ति सुखप्राप्तेः कः प्रत्यूहो जगत्त्रये॥९॥

अर्थ: अपने आत्मस्वरूप में तिष्ठने वाले जिस उत्तम मुनि ने वीतराग मार्ग में गमन किया है उस मुनि को मोक्ष की प्राप्ति में तीनों लोक में कोई भी विघ्न नहीं है।


इत्येकाग्रमना नित्यं भावयन् भावनापदम्।
मोक्षलक्ष्मीकटाक्षालिमालापद्मश्च जायते॥१०॥

अर्थ: जो मुनि इस प्रकार एक चित्त हो कर सदा ऐसी भावना करता रहता है वह मुनि मोक्ष रूपी लक्ष्मी उसके जो कटाक्ष वे ही हुए अलि माला (भ्रमर समूह) उसके लिए कमल के समान होता है।


एतद्धर्मफलं धर्मः स चेदस्ति ममामलः।
आपद्यपि कुतश्चिंता मृत्योरपि कुतो भयम्॥११॥

अर्थ: इस मनुष्य भव का फल धर्म है यदि मेरे वह निर्मल धर्म मौजूद हैं तो आपत्ति के आने पर भी मुझे चिंता नहीं और न मुझे मरण से ही भय है।

२३. परमार्थविंशतिः

मोहद्वेषरतिश्रिता विकृतयो दृष्टाः श्रुताः सेविताः
बारम्बारमनंतकालविचरत्सर्वाङ्गिभिः संसृतौ।
अद्वैतं पुनरात्मनो भगवतो १दुर्लक्ष्यमेकं परं
बीजं मोक्षतरोरिदं विजयते भव्यात्मभिर्वंदितम्॥१॥

अर्थ: संसार में अनंतकाल से भ्रमण करते हुए प्राणियों ने मोह, द्वेष, राग के आश्रित जो विकार हैं उनको देखा है, सुना है तथा उनको अनुभव भी किया है किन्तु भगवान् आत्मा के अद्वैत को न देखा है और न सुना है तथा उसका अनुभव भी नहीं किया है। इसलिए कठिन रीति से देखने योग्य तथा एक और उत्कृष्ट तथा भव्य जीवों से सदा वंदित ऐसा यह भगवान् आत्मा का अद्वैत इस लोक में जयवंत है। इस पुरुष के रूप, रस, गंध आदिक तथा राग, द्वेष, मोह आदिक जितने भी भाव हैं समस्त भिन्न हैं। इसलिए जो पुरुष अंतरंग तत्त्व का देखने वाला है उसके दृष्टिगोचर ये कोई भाव नहीं होते किन्तु उसके दृष्टिगोचर वह प्रधान तेज ही होता है।


अंतर्बाह्यविकल्पजालरहितां शुद्धैकचिद्रूपिणीं
वन्दे तां परमात्मनः प्रणयिनीं कृत्यान्तगां स्वस्थताम्।
यत्रानंतचतुष्टयामृतसरित्यात्मानमन्तर्गतं
न प्राप्नोति जरादिदुस्सहशिखो जन्मोग्रदावानलः॥२॥

अर्थ: जो स्वस्थता अंतरंग तथा बहिरंग दोनों प्रकार के विकल्पों से रहित है तथा शुद्ध एक चैतन्यस्वरूप को धारण करने वाली है और परमात्मा से प्रीति कराने वाली है तथा कृतकृत्य है ऐसी उस स्वस्थता को नमस्कार करता हूँ क्योंकि जिस अनंत विज्ञानादि चतुष्टय स्वस्थता रूपी अमृत नदी के मध्य में रहे हुए आत्मा को वृद्धावस्था आदि दुस्सह ज्वालाओं को धारण करने वाली जन्म रूपी भयंकर अग्नि प्राप्त ही नहीं हो सकती।


एकत्वस्थितये मतिर्यदनिशं संजायते मे तया-
प्यानंदः परमात्मसंन्निधिगतः किञ्चित्समुन्मीलति ।
किंचित्कालमवाप्य सैव सकलैः शीलैर्गुणैराश्रितां
तामानंदकलां विशालविलसद्बोधां करिष्यत्यसौ॥३॥

अर्थ: जो निरंतर मेरी बुद्धि एकत्व स्थिति की ओर जाती है उससे भी मुझे परमात्मा सम्बन्धी कुछ-कुछ आनंद उत्पन्न होता है यदि वही बुद्धि कुछ काल तक समस्त शील आदि उत्तम गुणों से सहित होकर रहेगी तो अवश्य ही विशाल तथा देदीप्यमान है ज्ञान जिसमें, ऐसी उस आनंद की कला को प्राप्त करेगी।


केनाप्यस्ति न कार्यमाश्रितवता मित्रेण चान्येन वा
प्रेमाङ्गेऽपि न मेऽस्ति सम्प्रति सुखी तिष्ठाम्यहं केवलः।
संयोगेन यदत्र कष्टमभवत्संसारचक्रे चिरं
निर्विण्णः खलु तेन तेन नितरामेकाकिता रोचते॥४॥

अर्थ: मेरे आश्रित जो मित्र हैं न तो मुझे उनसे कुछ काम है और न मुझे दूसरे से भी काम है और मुझे अपने शरीर में भी प्रेम नहीं इस समय मैं अकेला ही सुखी हूँ क्योंकि मुझे संसाररूपी चक्र से, मित्र आदि के संयोग से कष्ट हुआ था इसलिए मैं निश्चय से उदासीन हूँ और मुझे अब एकान्त स्थान ही प्रिय है।


यो जानाति स एव पश्यति सदा चिद्रूपतां न त्यजेत्
सोऽहं नापरमस्ति किंचिदपि मे तत्त्वं सदेतत् परम्।
यच्चान्यत्तदशेषकर्मजनितं क्रोधादिकायादि वा
श्रुत्वा शास्त्रशतानि सम्प्रति मनस्येतच्छ्रुतं वर्तते॥५॥

अर्थ: जो जानता है वही सदा देखता है और जो चैतन्यस्वरूप को नहीं छोड़ता है वह मैं ही हूँ तथा अन्य पदार्थ मेरा कुछ भी नहीं है और यही समीचीन तत्त्व है। अन्य जो क्रोधादिक तथा शरीर आदिक हैं वे समस्त कर्मों से उत्पन्न हुए हैं इसलिए सैकड़ों शास्त्रों को सुनकर मन में यही सिद्धान्त स्थित है।


हीनं संहननं परीषहसहं नाभूदिदं साम्प्रतं
काले दुःखमसंज्ञकेऽत्र यदपि प्रायो न तीव्रं तपः।
कश्चिन्नातिशयस्तथापि यदसावार्तं हि दुष्कर्मणा
मंतः शुद्धचिदात्मगुप्तमनसः सर्वं परं तेन किम्॥६॥

अर्थ: दुःखम है नाम जिसका ऐसे इस पंचमकाल में संहनन हीन होता है इसीलिए इस समय वह संहनन परीषहों का सहने वाला भी नहीं होता है और प्रायः करके तीव्र तप भी नहीं हो सकता है तथा किसी प्रकार का अतिशय भी नहीं होता और मैं दुष्कर्मों से पीड़ित हूँ इसलिए अंतरंग में शुद्ध जो चैतन्यस्वरूप उससे गुप्त मन के धारी मुझसे समस्त पदार्थ पर हैं मुझे उन पर पदार्थों से क्या प्रयोजन है?


सद्द्बोधमयं विहाय परमानंदस्वरूपं परं
ज्योतिर्नान्यदहं विचित्रविलसत्कर्मैकतायामपि।
काष्र्ण्ये कृष्णपदार्थसन्निधिवशाज्जाते मणौ स्फाटिके
यत्तस्मात्पृथगेव स द्वयकृतो लोके विकारो भवेत्॥७॥

अर्थ: नाना प्रकार के विद्यमान जो कर्म उनकी एकता होने पर भी मैं सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान स्वरूप और परमानंदस्वरूप तथा उत्कृष्ट तेज के धारी आत्मा को छोड़कर भिन्न नहीं हूँ अर्थात् आत्मस्वरूप ही हूँ क्योंकि काले पदार्थ के सम्बन्ध से स्फटिकमणि के काले होने पर भी वह कृष्णता उससे भिन्न ही है और विकार जो संसार में होता है वह दो पदार्थों द्वारा किया हुआ ही होता है।


वर्णाद्या वा रागमोहादयो वा भिन्ना भावा सर्व एवास्य पुंसः।
तेनैवान्तस्तत्त्वतः पश्यतोऽमी नो दृष्टाः स्यु दृष्टमेकं परं स्यात् ॥८॥

अर्थ: यति का किसी दूसरे पदार्थ के साथ जो संयोग होता है वह एक प्रकार की आपत्ति है और उसी यति का श्रीमानों के साथ संगम हो जावे तो बड़ी भारी आपत्ति है और जो पुरुष लक्ष्मी के मद्रूपी मदिरा से मत्त हो रहे हैं और जिनके मुख ऊँचे हैं ऐसे राजाओं के साथ सम्बन्ध हो जावे तो वह सम्बन्ध मोक्षाभिलाषी के चित्त में मरण से भी अधिक दुख का देने वाला है।


स्निग्धा मा मुनयो भवंतु गृहिणो यच्छन्तु मा भोजनं
मा किञ्चिद्घनमस्तु मा वपुरिदं रुग्वर्जितं जायताम्।
नग्नं मामवलोक्य निन्दतु जनस्तत्रापि खेदो न मे
नित्यानंदपदप्रदं गुरुवचो जागर्ति चेच्चेतसि॥९॥

अर्थ: सदा आनंद स्थान को देने वाला ऐसा श्रीगुरु का वचन यदि मेरे चित्त में प्रकाशमान है तो चाहे मुनिगण मेरे ऊपर प्रीति मति करो और भले ही गृहस्थ लोग मुझे भोजन मत दो और मेरे पास धन भी चाहे कुछ न हो और मेरा शरीर भी भले ही रोग से रहित मत हो और लोग मुझे नग्न देखकर चाहे मेरी निन्दा भी करे तो भी मुझे किसी प्रकार का खेद नहीं।


दुःखव्यालसमाकुले भववने हिंसादिदोषद्रुमे
नित्यं दुर्गतिपल्लिपातिकुपथे भ्राम्यन्ति सर्वेऽङ्गिनः।
तन्मध्ये सुगुरुप्रकाशितपथे प्रारब्धयानो जनो
यात्यानंदकरं परं स्थिरतरं निर्वाणमेकं पदम्॥१०॥

अर्थ: जो संसाररूपी वन नाना प्रकार के दुखरूपी हस्ती अथवा अजगर उनसे व्याप्त है और जिसमें हिंसा, असत्य, चोरी आदिक दोष रूपी वृक्ष मौजूद हैं और जो संसाररूपी वन दुर्गतिरूपी भीलों के स्थान और जो खोटे मार्ग उनसे सहित है ऐसे संसाररूपी वन में सदा समस्त जीव भ्रमण करते रहते हैं किन्तु उसी संसाररूपी वन में उत्तम गुरुओं द्वारा प्रकाशित मार्ग में जो मनुष्य गमन करने वाला है वह मनुष्य समस्त प्रकार के आनंद को करने वाले और उत्कृष्ट, निश्चल और अनुपम ऐसे निर्वाण स्थान को अर्थात् मोक्ष स्थान को प्राप्त होता है।


यत्सातं यदसातमङ्गिषु भवेत्तत्कर्मकार्यं तत-
स्तत्कर्मैव तदन्यदात्मन इदं जानन्ति ये योगिनः।
ईदृग्भेदविभावनाश्रितधियां तेषां कुतोऽहं सुखी
दुःखी चेति विकल्पकल्मषकला कुर्यात्पदं चेतसि॥११॥

अर्थ: जीवों में जो सुख तथा दुख हैं वे समस्त कर्मों के कार्य हैं इसलिए कर्म ही हैं और ये कर्म आत्मा से भिन्न हैं इस बात को जो योगीश्वर जानते हैं, इस प्रकार की भेद भावना के भाने वाले योगीश्वरों के मन में, मैं सुखी हूँ और मैं दुखी हूँ इस प्रकार विकल्प सम्बन्धी जरा सी भी मलिनता स्थान को कैसे प्राप्त कर सकती है?


देवं तत्प्रतिमां गुरुं मुनिजनं शास्त्रादि मन्यामहे
सर्वं भक्ति परा वयं व्यवहृतौ मार्गे स्थिता निश्चयात्।
अस्माकं पुनरेकताश्रयणतो व्यक्तीभवच्चिद्गुण-
स्फारीभूतमतिप्रबंधमहसामात्मैव तत्त्वं परम्॥१२॥

अर्थ: जब तक हम व्यवहार मार्ग में स्थित हैं तभी तक हम भक्ति में तत्पर होकर देव को, देव की प्रतिमा को, गुरु को, मुनिजनों को तथा सर्व शास्त्र आदि को मानते हैं किन्तु निश्चयनय से तो एकत्व के आश्रय से प्रकट हुआ जो चैतन्यरूपी गुण उससे प्रगल्भ जो बुद्धि उस बुद्धि सम्बन्धी तेज के धारी हमारे केवल एक आत्मा ही उत्कृष्ट तत्त्व है किन्तु इससे भिन्न कोई भी तत्त्व नहीं है।


वर्षं हर्षमपाकरोतु तुदतु स्फीता हिमानी तनुं
घर्मः शर्महरोस्तु दंशमशकं क्लेशाय सम्पद्यताम्।
अन्यैर्वा बहुभिः परीषहभटैरारभ्यतां मे मृति-
र्मोक्षं प्रत्युपदेशनिश्चलमतेनात्रापि किञ्चिद्भयम्॥१३॥

अर्थ: चाहे वर्षा मेरे हर्ष को नष्ट करे और बढ़ा हुआ जो बर्फ का समूह वह भले ही मेरे शरीर को पीड़ा दे और सूर्य का आतप भी मेरे कल्याणों का नाश करने वाला हो और डांस मच्छर भी मुझे दुख देवे तथा और भी जो बचे हुए परीषहरूपी सुभट हैं उनसे भी भले ही मेरा मरण हो जाए तो भी मुझे इनमें किसी से कुछ भी भय नहीं है क्योंकि मेरी बुद्धि मोक्ष के प्रति जो उपदेश उससे निश्चल है।


चक्षुर्मुख्यहृषीककर्षकमयो ग्रामो मृतो मन्यते
चेद्रूपादिकृषिक्षमां बलवता बोधारिणा त्याजितः।
तच्चिन्तां न च सोऽपि सम्प्रति करोत्यात्मा प्रभुःशक्तिमान्
यत्किञ्चिद्भवतात्र तेन च भवोऽप्यालोक्यते नष्टवत् ॥१४॥

अर्थ: आत्मा सर्वशक्तिशाली प्रभु है। इसलिए यह यद्यपि सम्यग्ज्ञान का बैरी जो ज्ञानावरण कर्म (अथवा मोह) है उनमें नेत्र है प्रधान जिसमें ऐसी जो इन्द्रियाँ उन इन्द्रियरूपी किसानों से बना हुआ (इन्द्रियरूपी किसानस्वरूप) जो ग्राम उसको मरा हुआ मानता है तथा उन इन्द्रियरूपी किसानों की जो रूपादि खेती उसकी जो जमीन उससे रहित भी मानता है तो भी उन इन्द्रियों की तथा इन्द्रियों के विषयों की कुछ भी चिंता नहीं करता क्योंकि वह समझता है कि जो कुछ होने वाला है, वह तो होगा ही। इसलिए वह समस्त जगत् को सर्वथा नष्ट-सा ही समझता है।


कर्मक्षत्युपशांतिकारणवशात्सद्देशनाया गुरो-
रात्मैकत्वविशुद्धबोधनिलयो निश्शेषसंगोज्झितः।
शश्वत्तद्गतभावनाश्रितमना लोके वसन् संयमी
नावद्येन स लिप्यतेब्जदलवत्तोयेन पद्माकरे॥१५॥

अर्थ: कर्मों के क्षय से तथा कर्मों के उपशम से अथवा गुरु के उत्तम उपदेश से जो संयमी आत्मा के एकत्व से निर्मल ज्ञान का स्थान है तथा समस्त प्रकार के परिग्रहों से रहित है और निरन्तर जिसका मन आत्म सम्बन्धी भावना से सहित है ऐसा वह संयमी संसार में रहता हुआ भी जिस प्रकार सरोवर में कमल का पत्ता जलसे लिप्त नहीं होता उसी प्रकार अंश मात्र भी पापों से लिप्त नहीं होता।


गुर्वाङ्घ्रिद्वयदत्तमुक्ति पदवीप्राप्त्यर्थिनिर्ग्रंथता-
जातानन्दवशान्ममेन्द्रियसुखं दुःखं मनो मन्यते।
सुस्वादुःप्रतिभासते किल खलस्तावत्समासादितो
यावन्नो सितशर्करातिमधुरा सन्तर्पिणी लभ्यते॥१६॥

अर्थ: गुरु के जो दोनों चरण उनसे दी हुई जो मोक्ष पदवी उसकी प्राप्ति के लिए जो निर्ग्रंथता उससे उत्पन्न हुआ जो आनंद उससे मेरा मन इन्द्रियों से उत्पन्न हुआ जो सुख है वह दुखी ही है ऐसा मानता है सो ठीक ही है क्योंकि जब तक स्वच्छ तथा अत्यन्त मधुर और तृप्ति करने वाली शर्करा (शक्कर) की प्राप्ति नहीं होती तभी तक खल अत्यन्त मिष्ट मालूम पड़ती है।


निर्ग्रन्थत्वमुदा ममोज्वलतरध्यानाश्रितस्फीतया
दुर्ध्यानाक्षसुखं पुनः स्मृतिपथप्रस्थाय्यपि स्यात्कुतः।
निर्गत्योद्गतवातबोधितशिखिज्वालाकरालाद्गृहा-
च्छीतां प्राप्य च वापिकां विशति कस्तत्रैव धीमान्नरः ॥१७॥

अर्थ: अत्यन्त निर्मल जो ध्यान उसके आश्रय से अत्यन्त वृद्धिंगत निर्ग्रंथता से पैदा हुआ यदि हर्ष मेरे मौजूद है तो मुझे खोटे ध्यान से उत्पन्न हुआ जो इन्द्रिय सम्बन्धी सुख उसका कैसे स्मरण हो सकता है? क्योंकि ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष है जो चलती हुई पवन उससे जाज्वल्यमान जो अग्नि की ज्वाला उससे अत्यन्त भयंकर ऐसे घर से निकलकर और अत्यन्त शीत ऐसी बावड़ी को पाकर फिर उसी जाज्वल्यमान अग्नि से भयंकर घर में प्रवेश करेगा?


जायेतोद्गतमोहतोऽभिलषिता मोक्षेपि सा सिद्धिहृत्
तद्भूतात्परिग्रहो भवति किं कापि स्पृहालुर्मुनिः।
इत्यालोचनसंगतैकमनसा शुद्धात्मसम्बन्धिना
तत्त्वज्ञानपरायणेन सततं स्थातव्यमग्राहिणा ॥१८॥

अर्थ: यदि उत्पन्न हुए मोह से मोक्ष में भी अभिलाषा की जाये तो वह इच्छा मोक्ष को नाश करने वाली ही होती है। इसलिए जो शुद्ध निश्चयनय का आश्रय करने वाला है वह कहीं भी, कैसी भी इच्छा नहीं करता इसलिए जिस मुनि का मन आलोचना से सहित है और जो शुद्ध आत्मा से सम्बन्ध रखने वाला है और तत्त्वों के ज्ञान में दत्तचित्त है उस मुनि को चाहिए कि वह समस्त प्रकार के परिग्रहों से रहित ही रहे।


जायंते विरसा रसा विघटते गोष्ठीकथाकौतुकं
शीर्यन्ते विषयास्तथा विरमति प्रीतिः शरीरेऽपि च।
जोषं वागपि धारयत्यविरतानन्दात्मशुद्धात्मन-
श्चिन्तायामपि यातुमिच्छति समं दोषैर्मनः पंचताम्॥१९॥

अर्थ: सदा आनन्दस्वरूप जो शुद्धात्मा उसके चिंतन होने पर रस जो हैं सो विरस हो जाते हैं और गोष्ठी में जो कथा का कौतूहल है वह नष्ट हो जाता है और समस्त विषय नष्ट हो जाते हैं तथा शरीर में भी अंशमात्र भी प्रीति नहीं रहती और वाणी भी मौन का अवलम्बन कर लेती है और समस्त दोषों के साथ मन भी नष्ट हो जाता है।


तत्त्वं वागतिवर्ति शुद्धनयतो यत्सर्वपक्षच्युतं
तद्वाच्यं व्यवहारमार्गपतितं शिष्यार्पणे जायते।
प्रागल्भ्यं न तथापि तत्र विवृतौ बोधो न तादृग्विधः
तेनायं ननु मादृशो जडमतिर्मौनाश्रितस्तिष्ठति॥२०॥

अर्थ: शुद्ध निश्चयनय से तो तत्त्व वचन के अगोचर है तथा समस्त प्रकार के पक्षों से (अपेक्षाओं से) रहित है किन्तु व्यवहार मार्ग में आया हुआ वह तत्त्व शिष्यों के बोध के लिए वाच्य (वचन के द्वारा कहने योग्य) होता है तो भी (ग्रन्थकार कहते हैं) कि उस तत्त्व के व्याख्यान के करने में न तो मुझमें भलीभाँति प्रौढ़ता है और न मुझमें उसके वर्णन करने योग्य ज्ञान ही है इसलिए मेरे समान जड़ बुद्धि पुरुष मौन को ही धारण कर लेता है।

२४. शरीराष्टक

दुर्गन्धाशुचिधातुभित्तिकलितं संछादितं चर्मणा
विण्मूत्रादिभृतं क्षुधादिविलसद्दुःखाखुभिश्छिद्रितम्।
क्लिष्टं कायकुटीरकं स्वयमपि प्राप्तं जरावह्निना
चेदेतत्तदपि स्थिरं शुचितरं मूढो जनो मन्यते ॥१॥

अर्थ: यह शरीररूपी झोपड़ा दुर्गंध तथा अपवित्र वीर्य आदि धातुरूपी भीतों से बना हुआ है और चाम से ढँका हुआ है तथा विष्टा, मूत्र आदि से भी भरा हुआ है और इसमें क्षुधा आदिक बलवान् दुखरूपी चूहों ने छेदकर रखे हैं और यह अत्यन्त क्लिष्ट है और इसके चारों ओर जरा रूपी अग्नि मौजूद है तो भी मूर्ख जीव इसको स्थिर तथा अत्यन्त पवित्र मानता है यह बड़े आश्चर्य की बात है।


दुर्गन्धं कृमिकीटजालकलितं नित्यं स्रवद्दूरसं
शौचस्नानविधानवारिविहितप्रक्षालनं रुग्भृतम्।
मानुष्यं वपुराहुरुन्नतधियो नाडीव्रणं भेषजं
तत्रान्नं वसनानि पट्टकमहो तत्रापि रागी जनः ॥२॥

अर्थ: दुर्गन्ध मय तथा लट और कीड़ाओं के समूह कर व्याप्त और जिसमें चारों ओर से रक्त, पीब आदि बह रहे हैं और जिसका प्रक्षालन पवित्र जल से किया जाता है और जो नाना प्रकार के रोगों से व्याप्त है और जिसमें औषधि अन्न और वस्त्ररूपी पट्टी है ऐसे मनुष्य के शरीर को उच्च बुद्धि के धारक मनुष्य नाड़ीव्रण (घाव) कहते हैं तो भी बड़े आश्चर्य की बात है ऐसे निकृष्ट शरीर में भी जीव रागी बनते हैं।


नृणामशेषाणि सदैव सर्वथा वपूंषि सर्वाशुचिभाञ्जि निश्चितम्।
ततः क एतेषु बुधः प्रपद्यते शुचित्वमम्बुप्लुतिचंदनादिभिः॥३॥

अर्थ: मनुष्यों के समस्त शरीर सदा काल सब प्रकार से अपवित्र हैं ऐसा भलीभाँति निश्चित है इसलिए संसार में ऐसा कौन-सा बुद्धिमान् पुरुष होगा जो इस शरीर को स्नान से तथा चंदन से पवित्र करने का प्रयत्न करेगा।


तिक्तेक्ष्वाकुफलोपमं वपुरिदं नैवोपभोग्यं नृणां
स्याच्चेन्मोहकुजन्मरन्ध्ररहितं शुष्कं तपोघर्मतः।
नांतं गौरवितं तदा भवनदीतरे क्षमं जायते
तत्तत्त्र नियोजितं वरमथासारं सदा सर्वथा॥४॥

अर्थ: मनुष्यों का शरीर कड़वी तूमड़ी के समान है इसलिए वह सर्वथा उपयोग करने के योग्य नहीं है। यदि यही शरीर मोह तथा खोटे जन्मरूपी छिद्रों से रहित होवे और तपरूपी धूप से सूखा हुआ होवे और अंतरंग में अभिमान से सहित न होवे तो यह संसाररूपी नदी से पार करने में समर्थ हो सकता है। इसलिए उस शरीर में उत्कृष्ट चंदन आदि लगाना सदा सर्वथा असार ही है।


भवतु भवतु यादृक् तादृगेतद्वपुर्मे हृदि गुरुवचनं चेदस्ति तत्त्वदर्शि ।
त्वरितमसमसारानंदकंदायमाना भवति यदनुभावादक्षया मोक्षलक्ष्मीः ॥५॥

अर्थ: वस्तु के वास्तविक स्वरूप का दिखाने वाला यदि गुरु का वचन मेरे मन में विद्यमान है तो यह मेरा शरीर जैसा रहे वैसा रहे कोई चिंता नहीं क्योंकि मन में विद्यमान उस श्रीगुरु के वचन के अनुभव से ही बात ही बात में असाधारण सर्वोत्तम आनंद को देने वाली तथा अविनाशी मोक्षरूपी लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।


पर्यन्ते कृमयोऽथ वह्निवशतो भस्मैव मत्स्यादनात्
विष्ठा स्यादथवा वपुः परिणतिस्तस्येदृशी जायते।
नित्यं नैव रसायनादिभिरपि क्षय्येव यत्तत्कृते
कः पापं कुरुते बुधोऽत्र भविता कष्टा यतो दुर्गतिः॥६॥

अर्थ: जिस शरीर की अवस्था ऐसी होती है कि अंत समय में तो लटें पड़ जाती हैं अथवा अग्नि से भस्म हो जाता है और मछली आदिकों के खाने से विष्टारूप में परिणत हो जाता है। नित्य नहीं है तथा अनेक प्रकार की रसायन आदिक खाने पर भी नष्ट हो जाता है। उस शरीर के लिए ऐसा संसार में कौन बुद्धिमान् पुरुष होगा जो पाप करेगा जिस पाप से आगे अनेक प्रकार के दुःखों को देने वाली दुर्गति होवेगी।


संसारस्तनुयोग एष विषयो दुःखान्यतो देहिनो
वह्नेर्लोहसमाश्रितस्य घनतो घातो यथा निष्ठुरात्।
त्याज्या तेन तनुर्मुमुक्षुभिरियं युक्त्या महत्या तया
नो भूयोपि ययात्मनो भवकृते तत्सन्निधिर्जायते ॥७॥

अर्थ: जिस प्रकार लोह के आश्रित अग्नि को अत्यन्त कठिन घन से घात (चोट) सहने पड़ते हैं उसी प्रकार शरीर के सम्बन्ध से यह संसार होता है और संसार से जीवों को अनेक प्रकार के दुख भोगने पड़ते हैं। इसलिए जो भव्यजीव मुमुक्षु हैं अर्थात् मोक्ष के अभिलाषी हैं उनको किसी बड़ी भारी युक्ति के साथ इस शरीर का त्याग कर देना चाहिए कि जिससे पुनः इस आत्मा को संसार में भ्रमण कराने के लिए इस शरीर का सम्बन्ध न होवे।


रक्षापोषविधौ जनोस्य वपुषः सर्वः सदैवोद्यतः
कालादिष्टजरा करोत्यनुदिनं तज्जर्जरं चानयोः।
स्पर्द्धामाश्रितयोर्द्वयोर्विजयनी सैका जरा जायते
साक्षात्कालपुरस्सरा यदि तदा कास्था स्थिरत्वे नृणाम् ॥८॥

अर्थ: यह मनुष्य तो इस शरीर की रक्षा करने में तथा पोषण करने में सदा लगा रहता है परन्तु काल की आज्ञाकारिणी दासी यह वृद्धावस्था सदा उस शरीर को जर्जरित अर्थात् छिन्न-भिन्न करती रहती है और आपस में ईर्ष्या, द्वेष करने वाले ऐसे इन जन्म-मरणों के मध्य में काल है आगे जिसके ऐसी सबको जीतने वाली यह वृद्धावस्था मौजूद है तो यह शरीर सदा काल रहेगा ऐसा मनुष्यों को क्या दृढ़ विश्वास है।

२५. स्नानाष्टक

सन्माल्यादि यदीयसन्निधिवशादस्पृश्यतामाश्रयेद्
विण्मूत्रादिभृतं रसादिघटितं बीभत्सु यत्पूति च।
आत्मानं मलिनं करोत्यपि शुचिं सर्वाशुचीनामिदं
संकेतैकगृहं नृणां वपुरपां स्नानात् कथं शुद्ध्यति ॥१॥

अर्थ: जिस शरीर के सम्बन्ध मात्र से ही उत्तम सुगंधित पुष्पों की बनी हुई माला भी स्पर्श करने योग्य नहीं रहती है। जो शरीर विष्टा, मूत्र आदिक से चौतरफा भरा हुआ है, अनेक प्रकार के रस आदिकों से बना हुआ है, अत्यन्त भय का करने वाला है तथा दुर्गंध से व्याप्त है और जो शरीर अत्यन्त पवित्र भी आत्मा को मलिन कर देता है, समस्त संसार में जितने भी अपवित्र पदार्थ हैं उनका संकेत घर है, ऐसा यह मनुष्यों का शरीर जल के स्नान से कैसे शुद्ध हो सकता है?


आत्मातीव शुचिःस्वभावत इति स्नानं वृथास्मिन् परे
कायश्चाशुचिरेव तेन शुचितामभ्येति नो जातुचित्।
स्नानस्योभयथेत्यभूद्विफलता ये कुर्वते तत्पुनः
तेषां भूजल कीटकोटिहननात्पापाय रागाय च॥२॥

अर्थ: आत्मा तो स्वभाव से अत्यन्त पवित्र है। इसलिए इस आत्मा के पवित्र करने के लिए स्नान करना व्यर्थ ही है और शरीर सर्वथा अपवित्र ही है। यह कदापि पवित्र हो नहीं सकता इसलिए इस शरीर के पवित्र करने के लिए भी वह स्नान बिना प्रयोजन का ही है अतः दोनों प्रकार से स्नान विफल ही है ऐसा सिद्ध हुआ। इसलिए ऐसा निश्चय होने पर भी जो पुरुष स्नान को करते हैं उन मनुष्यों द्वारा किया हुआ वह स्नान करोड़ों पृथ्वी काय के तथा जल काय के जीवों के नाश होने से पाप तथा राग के लिए ही होता है।


चित्ते प्राग्भवकोटिसंचितरजः संबंधिताविर्भवन्-
मिथ्यात्वादिमलव्यपायजनकः स्नानं विवेकः सताम्।
अन्यद्वारिकृतं तु जन्तुनिकरव्यापादनात्पापकृत्
नो धर्मो न पवित्रता खलु ततः काये स्वभावाशुचौ ॥३॥

अर्थ: पूर्व भवों में उपार्जन किए हुए जो करोड़ों पाप उनके सम्बन्ध से प्रकट हुए जो मिथ्यात्वादिक मल उनके नाश को करने वाला सज्जनों के चित्त में जो विवेक है वही स्नान है किन्तु इससे भिन्न जो जल से किया हुआ स्नान है वह अनेक जीवों के विध्वंस करने वाला होने से पाप का ही करने वाला है क्योंकि स्वभाव से ही अपवित्र इस शरीर में न तो स्नान से ही पवित्रता हो सकती है और न धर्म ही हो सकता है।


सम्यग्बोधविशुद्धवारिणि लसत्सद्दर्शनोर्मिव्रजे
नित्यानंदविशेषशैत्यसुभगे निःशेषपापद्रुहि।
सत्तीर्थे परमात्मनामनि सदा स्नानं कुरुध्वं बुधाः
शुद्ध्यर्थं किमु धावत त्रिपथगामालाप्रयासाकुलः॥४॥

अर्थ: भो भव्य जीवो! जिसमें सम्यग्ज्ञानरूपी अत्यन्त निर्मल जल मौजूद है तथा जिसमें देदीप्यमान अनेक तरंगें विद्यमान हैं और सदा आनंद को देने वाली उत्तम शीतलता से मनोहर है। जो समस्त पापों का नाश करने वाला है ऐसे इस परमात्मा नामक उत्तम तीर्थ में ही सदा स्नान करो। अनेक प्रकार के प्रयत्नों से व्याकुल होकर क्यों शुद्धता के लिए प्रयाग आदिक तीर्थों में, गंगा आदिक नदियों पर भटकते फिरते हो ?


नो दृष्टः शुचितत्त्वनिश्चयनदो न ज्ञानरत्नाकरः
पापैः क्वापि न दृश्यते च समतानामातिशुद्धा नदी।
तेनैतानि विहाय पापहरणे सत्यानि तीर्थानि ते
तीर्थाभाससुरापगादिषु जडा मज्जंति तुष्यंति च ॥५॥

अर्थ: मूर्ख लोगों ने अपने पापों तथा दुर्भाग्यों की कृपा से न तो पवित्र निश्चयरूपी तालाब को देखा है और न ज्ञानरूपी समुद्र पर भी उनकी नजर पड़ी है तथा कहीं पर उन्होंने समतारूपी शुद्ध नदी को भी नहीं देखा है। इसीलिए वे मूर्ख पुरुष पापों के सर्वथा नाश करने वाले इन पवित्र तीर्थों को छोड़कर जो वास्तविक तीर्थ नहीं हैं तीर्थाभास अर्थात् तीर्थों के समान मालूम पड़ते हैं ऐसे गंगा आदि तीर्थों में स्नान करते हैं और स्नान करके अपने को अत्यन्त संतुष्ट मानते हैं।


नो तीर्थं न जलं तदस्ति भुवने नान्यत्किमप्यस्ति तत्
निश्शेषाशुचि येन मानववपुः साक्षादिदं शुद्ध्यति।
आधिव्याधिजरामृतिप्रभृतिभिर्व्याप्तं सदा तत्पुनः
शश्वत्तापकरं यथास्य वपुषो नामाप्यसह्यं सताम् ॥६॥

अर्थ: यह मनुष्यों का शरीर अत्यन्त अपवित्र है तथा सदा आधि, व्याधि, जरा, मरण आदिक उपाधियों से व्याप्त है और सदा ताप का करने वाला है तथा सज्जन पुरुष इसका नाम श्रवण भी नहीं कर सकते ऐसा यह मनुष्यों का शरीर है। इसलिए इस शरीर के शुद्ध करने में न तो कोई उत्तम तीर्थ इस संसार में है और न कोई इसकी साक्षात् शुद्धि का करने वाला जल है तथा इनसे भिन्न और भी वस्तु कोई ऐसी नहीं है जो इस शरीर को वास्तविक रीति से शुद्ध कर सके।


सर्वैस्तीर्थजलैरपि प्रतिदिनं स्नातं न शुद्धं भवेत्
कर्पूरादिविलेपनैरपि सदा लिप्तं च दुर्गन्धभृत्।
यत्नेनापि च रक्षितं क्षयपथप्रस्थायि दुःखप्रदं
यत्तस्माद्वपुषः किमन्यदशुभं कष्टं च किं प्राणिनाम्॥७॥

अर्थ: संसार में जितने प्रयाग आदि तीर्थ हैं तथा जितनी उन तीर्थों में गंगा आदिक विशाल-विशाल नदियां हैं। यदि उन सब नदियों के जल से धोया भी जावे तो भी यह शरीर शुद्ध नहीं हो सकता। तथा अत्यन्त सुगन्धित कपूर आदि पदार्थों से भी यदि इसके ऊपर लेप किया जावे तो भी यह सुगन्धयुक्त नहीं होता। किन्तु उलटा दुर्गन्धयुक्त ही हो जाता है और इसकी अनेक प्रकार से रक्षा की जाये तो भी यह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है तथा यह शरीर नाना प्रकार के दुखों को देने वाला है। इसलिए जीवों को इस शरीर से अधिक न तो कोई अशुभ है तथा कष्ट का देने वाला भी कोई नहीं है।


भव्या भूरिभवार्जितोदितमहादृङ्मोहसर्पोल्लसन्
मिथ्याबोधविषप्रसंगविकला मंदीभवद्दृष्टयः ।
श्रीमत्पद्मनंदिवक्त्रशशिभृद्बिंबप्रसूतं परं
पीत्वा कर्णपुटैर्भवंतु सुखिनः स्नानाष्टकाख्यामृतम् ॥८॥

अर्थ: अनेक भवों में जिसका उपार्जन किया गया है ऐसा जो प्रबल दर्शनमोहरूपी महा सर्प उसके काटने से तमाम शरीर में फैला हुआ जो मिथ्यात्वरूपी विष उसके सम्बन्ध से जो अत्यन्त दु:खित हैं तथा जिनका सम्यग्दर्शन मंद हो गया है ऐसे जो मनुष्य हैं वे श्रीमान् पद्मनंदि आचार्य के मुख रूपी चन्द्रमा से निकला हुआ जो यह स्नानाष्टकरूपी अमृत है उसको अपने कानों से पीकर सुखी होवें।

२६. ब्रह्मचर्याष्टक

भवविवर्धनमेव यतो भवेदधिकदुःखकरं चिरमङ्गिनाम्।
इति निजांगनयापि न तन्मतं मतिमतां सुरतं किमतोन्यथा॥१॥

अर्थ: जिस मैथुन के करने से संसार की ही वृद्धि होती है तथा जो मैथुन समस्त जीवों को अत्यन्त दुख का देने वाला है इसलिए सज्जन पुरुषों ने उसको अपनी स्त्री के साथ करना भी ठीक नहीं माना है वे सज्जन दूसरी स्त्रियों से अथवा अन्य प्रकार से उसको कैसे अच्छा मान सकते हैं ?


पशव एव रते रतमानसा इति बुधैः पशुकर्म तदुच्यते।
अभिधया ननु सार्थकयानया पशुगतिः पुरतोस्य फलं भवेत्॥२॥

अर्थ: जो मनुष्य मैथुन करने के अत्यन्त अभिलाषी हैं वे साक्षात् पशु ही हैं क्योंकि जो वास्तविक रीति से पदार्थों के गुण-दोषों को विचारने वाले हैं ऐसे बुद्धिमानों ने इस मैथुन को पशु कर्म कहा है सो इस मैथुन को पशु कर्म कहना सर्वथा ठीक ही है क्योंकि मैथुन करने वाले मनुष्यों को मैथुन कर्म से आगे पशुगति ही होती है।


यदि भवेदबलासु रतिः शुभा किल निजासु सतामिह सर्वथा।
किमिति पर्वसु सा परिवर्जिता किमिति वा तपसे सततं बुधैः॥३॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि सज्जन पुरुषों को यदि अपनी स्त्रियों के साथ मैथुन कर्म करना शुभ होता तथा उत्तम फल का देने वाला होता तो वे अष्टमी, चतुर्दशी आदि पर्वों में अपनी स्त्री का त्याग क्यों कर देते तथा तप के समय भी उन अपनी स्त्रियों को विद्वान् लोग क्यों छोड़ देते।


रतिपतेरुदयान्रयोषितोरशुचिनोर्वपुषोः परिघट्टनात्।
अशुचि सुष्ठुतरं तदितो भवेत्सुखलवे विदुषः कथमादरः॥४॥

अर्थ: जिस समय काम की उत्पत्ति होती है उस समय काम की उत्पत्ति से अत्यन्त अपवित्र दोनों शरीरों का आपस में परिघट्टन अर्थात् रगड़ना होता है तथा उस परिघट्टन से अत्यन्त अपवित्र फल की प्राप्ति होती है। इसलिए थोड़े से सुख की प्राप्ति के लिए विद्वान् लोग कैसे उस मैथुन में आदर कर सकते हैं? कभी भी नहीं कर सकते।


अशुचिनि प्रसभं रतकर्मणि प्रतिशरीरं रतिर्यदपि स्थिता।
चिदरिमोहविजृंभणदूषणादियमहो भवतीति निषेधिता ॥५॥

अर्थ: काम के वशीभूत होकर बलात्कार से अत्यन्त अपवित्र मैथुन कर्म के होने पर कामी स्त्री, पुरुषों के शरीर में उत्पन्न हुई यह काम सम्बन्धी प्रीति चैतन्य का बैरी जो मोह उसके फैलाव के दूषण से होती है। इसलिए यह काम की प्रीति सर्वथा निषिद्ध मानी गई है।


निरवशेषयमद्रुमखण्डने शितकुठारहतिर्ननु मैथुनम्।
सततमात्महितं शुभमिच्छता परिहृतिर्विधिनास्य विधीयते ॥६॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि यह मैथुन कर्म समस्त संयमरूपी वृक्ष के खंडन करने में तीक्ष्ण कुठार की धारा के समान है। इसलिए जो मनुष्य निर्मल अपनी आत्मा के हित के करने वाले हैं वे इसका सर्वथा त्याग कर देते हैं।


मधु यथा पिवतो विकृतिस्तथा वृजिनकर्मभृतः सुरते मतिः।
न पुनरेतदभीष्टमिहाङ्गिनां न च परत्र यदायतिदुःखदम्॥७॥

अर्थ: जिस प्रकार मदिरा पीने वाले पुरुष को विकार होते हैं, उसी प्रकार जो पुरुष पापी हैं, उसकी सदा रति करने में इच्छा रहती है किन्तु यह मद्य जीवों को किसी प्रकार के हित का करने वाला नहीं है तथा दूसरे भव में भी यह अनेक प्रकार के दुखों को देने वाला है।


रतिनिषेधविधौ यततां भवेच्चपलतां प्रविहाय मनः सदा।
विषयसौख्यमिदं विषसन्निभं कुशलमस्ति न भुक्तवतस्तव॥८॥

अर्थ: आचार्य महाराज उपदेश देते हैं कि जो मनुष्य अपना हित चाहते हैं उनको इस रीति से अपने मन को अच्छी तरह शिक्षा देनी चाहिए कि हे मन तू चपलता को छोड़कर रह तथा रति के निषेध करने में प्रयत्न कर क्योंकि यह विषय सौख्य, विष के समान है और इस विषय सुख को भोगने वाले तेरी किसी प्रकार से कुशल नहीं है।


युवतिसंगतिवर्जनमष्टकं प्रति मुमुक्षुजनं भणितं मया।
सुरतरागसमुद्रगता जनाः कुरुत मा क्रुधमत्र मुनौ मयि॥९॥

अर्थ: जो मनुष्य मुमुक्षु हैं मोक्ष की प्राप्ति के अभिलाषी हैं उन्हीं मनुष्यों के लिए यह मैंने युवति स्त्रियों के संग को निषेध करने वाला अष्टक का अर्थात् ब्रह्मचर्याष्टक का वर्णन किया है किन्तु जो मनुष्य रागरूपी समुद्र में डूबे हुए हैं वे मुझ (पद्मनंदी) मुनि के ऊपर क्रोध न करें।