नित्य बोधनी जिनवाणी, तत्त्व बोधनी जिनवाणी | nitya bodhani jinavani tattva bodhani jinavani

तर्जः हूँ स्वतंत्र निश्चल निष्काम…

नित्य बोधनी जिनवाणी, तत्त्व बोधनी जिनवाणी।

आनंदमयी जिनवाणी, मुक्ति प्रदायी जिनवाणी।। टेक ।।

ज्ञेयों में से ज्ञान न आवे, विषयों से कोई सुख नहिं पावे ।
संयोगों से हो नहीं प्रभुता, व्यर्थ मूढ़ हो बाहर भ्रमता ।। 1 ।।

करो निरन्तर ज्ञानाभ्यास, छोड़ो मिथ्या पर की आस।
मोह-अंधेरा दूर भगाओ, भेद-विज्ञान कला प्रकटाओ।। 2।।

सब पर भाव हेय पहिचानो, उपादेय शुद्धातम जानो।
स्वानुभूति कर मंगलकारी, होओ निश्चय शिवमगचारी ।। 3 ।।

रागादिक दुर्भाव नशाओ, हो निर्ग्रन्थ निजातम ध्याओ।
कर्म-कलंक सहज नश जावें, स्वयं सिद्ध प्रभुता प्रगटावे ।।4।।

भक्ति भाव से शीश नवाओ, जिनवाणी सब पढ़ो-पढ़ाओ ।
ऐसा अवसर चूक न जाना, करो भव्य आतम कल्याणा ।। 5 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५८ से १५९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’