तर्ज : निरखी-निरखी…
नित्य उद्योत रूप शुद्धातम, स्वानुभूति के गम्य रे।
इन्द्रिय वचन विकल्प अगोचर, केवल अनुभव गम्य रे। ।टेक।।
भाव रूप है चित्स्वभाव है, केवल जाननहार रे।
जाननहार जनाय सहज ही, आनन्द अपरम्पार रे ।।1।।
क्षायिक भाव से पूज्य अहो ! ध्रुव ज्ञायक भाव अविकार रे।
पंचम भाव परम पारिणामिक, पंचमगति आधार रे।।2।।
नित्य निरंजन प्रभु परमेश्वर, नय पक्षों के पार रे।
शक्तिमान विभु निर्विकल्प है, सुख सागर का ज्वार रे ।।3।।
समयसार है,नियमसार है, जिन प्रवचन का सार रे।
सहज भाव्य है, सहज प्राप्य है, सहज भाव सुखकार रे।।4।।
पूर्ण स्वयं में, तृप्त स्वयं में, तुष्ट स्वयं में स्वयं रे।
मग्न स्वयं कृतकृत्य स्वयं ही, मुक्त स्वयं में स्वयं रे।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’