नित सहज पावन, पतित पावन ज्ञानधन आनन्दमय
नित सहज पावन, पतित पावन ज्ञानधन आनन्दमय ।
रागादि भावों से पृथक, शाश्वत प्रभु चैतन्यमय ।।टेक।।
है दर्शनीय महान् मंगल रूप निज शुद्धात्मा ।
उदयादि से निरपेक्ष, निष्क्रिय सहज ही परमात्मा ।।1।।
पर्यायों से व्यतिरिक्त ज्ञायक, ध्रुवपने विलसाय है ।
होता उपासित सहज ही परमात्मा कहलाय है ।।2।।
परमात्मा की शरण को जो प्राप्त अशरण नहीं कहीं ।
निज आत्मा की शरण बिन जग में शरण कोई नहीं ।।3।।
सर्वोत्कृष्ट प्रभु लख, आनन्द रस बरसा रहा ।
आनंदमय जीवन हुआ, करना कहीं कुछ भी रहा ।।4।।
भाऊँ सहज ध्याऊँ सहज ही सहज आनन्दित रहूँ ।
अनुबन्ध अब कुछ भी नहीं, निर्मुक्त, निज ज्ञाता रहूँ ।।5।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ९०