नित जयवन्तो ध्रुव ज्ञायक प्रभु, परम भाव अविकार रे | Nit Jayavanto Dhruv Jnayak Prabhu Param Bhav Avikar Re

तर्ज-लखी-लखी…

नित जयवन्तो ध्रुव ज्ञायक प्रभु, परम भाव अविकार रे।

सहज ही भाऊँ सहज ही ध्याऊँ, समयसार सुखकार रे।।टेक।।

करना कुछ भी नहीं दीखता, जानूं जाननहार रे।
सुखसागर में नित्य नहाऊँ, वर्ते तृप्ति अपार रे।।1।।

होवे सहज स्वतंत्र परिणमन, रहूँ सहज निर्भार रे।
मिला परम प्रभु अंतर में ही, महिमा अपरम्पार रे।।2।।

ज्ञान सुधारस अविरल पीता, रहूँ अमर अविकार रे।
भेद न वर्ते, खेद न वर्ते, तिष्ठूं मुक्ति मँझार रे।।3।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’