नित जयवंत प्रभु दर्शाती, जिनवाणी जयवंत रहे ।।टेक ।।
निज अक्षय वैभव दर्शाती, निज शाश्वत प्रभुता दर्शाती ।
आनन्दमय ज्ञायक दर्शाती, जिनवाणी जयवंत रहे ।।1।।
सब संसार असार दिखाती, सारभूत समयसार दिखाती।
साँचा मुक्तिमार्ग दिखाती, जिनवाणी जयवंत रहे ।।2।।
नवतत्त्वों का स्वांग दिखाती, भिन्न सहज चिद्रूप दिखाती।
ज्ञानमात्र शिवरूप दिखाती, जिनवाणी जयवंत रहे ।।3।।
अन्तर द्रव्य दृष्टि प्रकटाती, अनेकांतमय ज्योति जगाती।
परम अहिंसा ध्वज फहराती, जिनवाणी जयवंत रहे ।।4।।
सत्य शील सन्तोष जगाती, अविनाशी सुख शांति दिखाती ।
भाव नमन हो सहज नमन हो, जिनवाणी जयवंत रहे ।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ १७१