निरविकलप जोति प्रकाश रही
निरविकलप जोति प्रकाश रही
ना घट अन्तर ना घट बाहिर, वचननिसौं किनहू न कही ॥ निर. ॥ १ ॥
जीभ आँख बिन चाखी देखी, हाथनिसौं किनहू न गही ॥ निर. ॥२॥
‘द्यानत’ निज-सर-पदम-भ्रमर है, समता जोरें साधु लही ॥ निर. ॥ ३ ॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ३२
अर्थ
सर्वविकल्परहित, निर्विकल्प मुद्रा से ज्योति का उजास फैल रहा है।
वह न हृदय में है और न बाहर है। वह बचनों द्वारा कहा नहीं जा सकता, अवर्णनीय है।
उस निर्विकल्प ज्योति को इन्द्रियों से अनुभव नहीं किया जा सकता अर्थात् जिह्वा से जिसका स्वाद चखा नहीं जा सकता, नेत्रों से देखा नहीं जा सकत्ता है, उसको न कभी हाथ से छूआ और न ग्रहण किया जा सकता।
द्यानतराय कहते हैं कि साधुजन समता धारणकर ऐसी भव्य निर्विकल्प ज्योति को अपने आत्मारूपी सरोवर में खिले कमलपुंज पर मँडराता हुआ भंवरा होकर प्राप्त करते हैं।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 115।
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