निरुपचार शुद्ध रत्नत्रय ही | nirupachara shuddha ratnatraya hi

तर्ज : आतम स्वभाव …

निरुपचार शुद्ध रत्नत्रय ही,
साँचा मुक्तिमार्ग रे।

नियमसार सुखकार है ।। टेक ।।

नियमसार बिन जीवन निष्फल,
शांति नहीं मिलती इक भी पल।
भ्रमता नित संसार रे।। 1।।

द्रव्य आनंदमय, गुण भी आनंदमय,
पर्याय भी हुई, सहजानंद मय।
आनंद
अपरम्पार रे।। 2।।

स्वच्छन्द जीवन तो, पशु से भी बदतर,
निज को दुःखमय, पर को भी दुःखकर।
ज्ञानी कहें धिक्कार रे ।। 3।।

महाभाग्य श्रावक कुल पाया,
सम्यक् तत्त्वोपदेश सुहाया।
धरूँ नियम अविकार रे ।। 4।।

कारण नियम शुद्ध चेतना परिणाम,
कार्य नियम दृग-ज्ञान अनुष्ठान।
आत्मामय अवधार रे ।। 5।।

निज को न जाना, बहु यत्न कीने,
व्यवहार रत्नत्रय भी जीव ने।
धरो अनन्ता बार रे ।। 6।।

अब पहिचानो शुद्ध चिद्रूप को,
पक्षातिक्रान्त सु आत्म स्वरूप को ।
होऊँ भव से पार रे।। 7।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८१ से १८२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’