निर्ग्रन्थ पद की भावना भाऊँ | nirgrantha pada ki bhavana bhau n

निर्ग्रन्थ पद की भावना भाऊँ।

जिनवर वाणी हृदय समानी, शुद्धातम पद ध्याऊँ-ध्याऊँ ॥ टेक ॥
मिला नहीं मिल भी नहीं सकता, सुख पर में नहीं चित्त भ्रमाऊँ।
सुख सागर उछले अन्तर में, हो निमग्न निज में रम जाऊँ ॥ 1 ॥

परिग्रह सकल क्लेशमय तजकर, सहज रूप निर्ग्रन्थ हो जाऊँ।
गुरु चरणों में मुनि दीक्षा ले, निर्मल आतम ध्यान लगाऊँ ॥ 2 ॥

साम्य भाव धर घोर परीषह, उपसर्गों में नहीं घबराऊँ।
आधि-व्याधि-उपाधि रहित मैं, परम समाधि सहज ही पाऊँ ॥ 3 ॥

निजानंद रस वेदूँ अनुपम, निश्चय आवागमन मिटाऊँ ।
सहज सिद्ध पद की प्रभुता हो, मैं तो जाननहार रहाऊँ ॥ 4 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १९२ से १९३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’