तर्जः जैन मंदिर हमको लागे प्यारा…
निर्ग्रन्थ मार्ग मोहि लागे प्यारा ॥ टेक ॥
रहित अडम्बर सहज दिगम्बर, यथाजात शोभे अविकारा।
जहाँ नहीं प्रतिबन्ध है कोई, निर्बन्ध आराधन सुखकारा॥ 1 ॥
चाह मिटी चिंता सब छूटी, आरम्भ-परिग्रह सकल विडारा।
प्रचुर स्वसंवेदन जहँ वर्ते, होवे आनंद अपरम्पारा ॥ 2 ॥
एकाकी निर्भय निस्पृह हो, साधूँ निज पद तिहुँ जग सारा।
वीतरागता बढ़ती जावे, सर्व विभाव कार्य निरवारा॥ ३॥
परम जितेन्द्रिय हो वीरज सति, ब्रह्मचर्य निर्दोष सुधारा।
धनि दिन ऐसो मारग पाऊँ, होऊँ भव सागर से पारा॥ 4 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८५ से १८६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’