निर्ग्रन्थ जीवन, सहज शांत जीवन ।
निर्द्वन्द्व निर्विकल्प, निरपेक्ष जीवन ॥ टेक ॥
ज्ञान-वैराग्य शल्य न कोई ।
साम्य भाव वर्ते विषमता न होई ॥
आप तिरें अरु पर को तारें।
प्रचुर स्व-संवेदनमय जीवन ॥ 1॥
स्वाश्रित हैं निर्भार गुप्त स्वयं में।
निष्पाप निश्चिंत निर्मुक्त स्वयं में ॥
एकाकी पावन अहो ! मन भावन।
निर्भय निशंकित है आदर्श जीवन॥ 2 ॥
नहीं कामना है, नहीं याचना है।
नहीं दीनता कुछ परम शूरता है ॥
अहो क्रूरता बिन सहज सिंह वृत्ति।
परम स्वाभिमानी है धन्य मुनि जीवन ॥ ३॥
नहीं कुछ परिग्रह, नहीं कुछ अडम्बर।
यथाजात मुद्रा सहज हैं दिगम्बर ॥
साध्य एक मुक्ति, ध्येय ध्रुव आत्मा।
आराधनामय सहज रूप जीवन ॥ 4 ॥
हो ऐसा जीवन यही भावना है।
इन्द्रिय सुखों की न कुछ चाहना है ॥
अहो ! आत्मामय शुद्ध रत्नत्रय ।
सहज पूर्ण हो पाऊँ मुक्ति का जीवन ॥ 5॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १९४ से १९५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’