निर्ग्रन्थ गुरुवर कब दर्श पाऊँ, निर्ग्रन्थ पद मैं कब प्रगटाऊँ ॥ टेक ॥
भली भाँति मैंने पहिचाना, तत्त्व यही है धर्म यही है।
सहज स्वाभाविक रूप मनोहर, मुक्ति का साँचा मार्ग यही है ॥
आरम्भ-परिग्रह तज वन को जाऊँ ॥ १॥
जग में अलौकिक अन्यत्र दुर्लभ, संयम का आदर्श मुनिवर में देखा।
विषयों से निरपेक्ष सहज अतीन्द्रिय, समता का आनंद गुरुवर में देखा ॥
ऐसा ही वैराग्य कब मैं भी पाऊँ ॥ 2॥
निज में ही संतुष्ट निज में ही निमग्न, भोगों की आशा भी जिनको नहीं है।
ज्ञान-ध्यान-तप लीन रहें नित, कुछ भी तो परवाह जिनको नहीं है॥
शांत मूर्ति लख उत्सव मनाऊँ ॥ 3 ॥
घोर परीषह उपसर्गों में मेरू सी, निष्कम्पता अरु अचलता।
अन्तर में वर्ते बाहर में दर्शे, सहज स्वाभाविक आनंदमय समता ॥
ऐसा ही जीवन कब मैं भी पाऊँ ॥ 4 ॥
सर्व जगत् के निरपेक्ष बान्धव, सहज सभी से निरपेक्ष रहते ॥
भव्यों को मुक्तिमार्ग दिखाते, आप अकर्त्ता निर्मुक्त रहते ॥
प्रचुर स्वसंवेदन कब मैं भी पाऊँ ॥ 5॥
मुनिराज से गुण मुनिराज में ही, धन्य दशा है धन्य स्वरूप ।
नित अविकारी आतम विहारी, दर्शाते चैतन्य स्वरूप ॥
उनके ही संग में असंग रहाऊँ ॥ ६॥
संतों की महिमा है वचन अगोचर, इन्द्रादिक भी मुनि गुण गायें।
द्वारापेक्षण चक्री करते, भक्ति भाव से शीश नवायें ॥
गुरु चरणों बलि-बलि जाऊँ ॥ ७॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८३ से १८४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’