निर्ग्रन्थ मार्ग अपनाया, प्रभु सहजमार्ग अपनाया | Nirgranth Marg Apanay Prabhu Sahajamarg Apanay

निर्ग्रन्थ मार्ग अपनाया, प्रभु सहजमार्ग अपनाया।

भोगों का अतिविषम मार्ग तज, योगमार्ग अपनाया।।

सत्यपंथ निर्ग्रन्थ दिगम्बर, आनंद उर न समाया।।टेक।।

अरे मोहवश व्यर्थ भटकता, भव-भव में भरमाया।
महाभाग्य से अहो जिनेश्वर, दर्श आपका पाया।।
बोध हुआ निजपद का जिनवर, चिर-मिथ्यात्व नशाया।।1।।

भोगों के तो नाम मात्र से भी, प्रभु मन घबड़ाया।
बाह्य विभूति लगे धूल सम, निज वैभव दिखलाया।।
आत्मख्याति की हुई लालसा, और न कछू सुहाया।।2।।

हो ऐसा पुरूषार्थ अलौकिक, चरणों शीस नवाया।
होय प्रगट निर्ग्रन्थ अवस्था, यही रूप मोहि भाया।।
हो प्रभावना इसी मार्ग की, दृढ़ संकल्प जगाया।।3।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’