निर्ग्रन्थ महामुनिराज, आज मैंने सपने में देखे।
सपने में देखे, प्रत्यक्ष से देखे ।।टेक ।।
शैल शिला पर अचल विराजे
ध्यान लीन महाराज, आज मैंने… ।।1।।
मुद्रा शान्त दिगम्बर सोहे
तारण तरण जिहाज, आज मैंने… ।।2।।
धर्ममूर्ति निर्द्वन्द निराकुल
विज्ञानघन ऋषिराज, आज मैंने… ।।३ ।।
ज्योतिपुंज निष्काम निरामय
आतम गुण भंडार, आज मैंने… ।।4।।
वन के पशु पक्षी भी बैठे
इकटक रहे निहार, आज मैंने… ।।5।।
तब ही जन समूह तहँ आया
चरणों शीश नवाय, आज मैंने… ।।6।।
भक्ति-भावना 147
सहज भाव से सब ही बैठे
शान्ति सुधा बरसाय, आज मैंने… ।।7 ।।
टूटा ध्यान मुनीश्वर का तब
धर्मामृत छलकाय, आज मैंने… ।।8।।
ज्ञायक भाव की महिमा सुनकर
महातृप्ति उपजाय, आज मैंने…।।9।।
कितने ही तो मुनिव्रत धारें
आनंद उर न समाय, आज मैंने… । ।10।।
कोई अणुव्रत, कोई मूलगुण
कोई नियम धराय, आज मैंने… ।।11।।
धन्य हुआ कृतकृत्य हुआ मैं
निर्ग्रन्थ भावना भाय, आज मैंने… ।।12।।
साँचा होवे मेरा सपना
निर्ग्रन्थ पद प्रगटाय, आज मैंने… ।।13।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २०७ से २०९