निर्ग्रन्थ दशा कब पाऊँ।
निर्ग्रन्थ रूप प्रगटाऊँ ।। टेक ।।
देहादिक से भिन्न ज्ञानमय,
ज्ञायक रूप लखाऊँ ।।1।।
निजानंद निज में ही वेढूं,
निज में तृप्त रहाऊँ।।2।।
हो चर्या निर्दोष निराकुल,
सहज विरक्त रहाऊँ।।3।।
पर में इष्ट-अनिष्ट कल्पना,
नहीं कदाचित् लाऊँ । ।4।।
एकाकी निर्जन वन माँही,
निज शुद्धातम ध्याऊँ । ।5।।
घोर परीषह उपसर्गों में,
समता भाव धराऊँ । ।6।।
नहीं कुछ चिन्ता, नहीं हो वांछा,
नित निर्द्वन्द रहाऊँ।।7।।
रहूँ सहज ही दृष्टा ज्ञाता,
कर्म कलंक नशाऊँ ।।8।।
अपनी अक्षय प्रभुता प्रगटे,
आवागमन मिटाऊँ ।।9।।
सादि अनंत समाधि सुख में,
रहूँ परमपद पाऊँ।।10।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २०९ से २१०