तर्ज : तेरी पावन प्रतिमा देख…
निर्दोष तत्त्व की दृष्टि धरूँ ।
निर्दोष मार्ग में गमन करूँ ।।
निर्दोष मार्ग निर्ग्रन्थ मार्ग ।
निर्ग्रन्थ मार्ग में अब विचरूँ ।। टेक ।।
निर्मोह रहूँ अन्तर्मुख हो।
नहीं इष्ट-अनिष्ट कल्पना हो।।
कुछ क्षोभ न हो, प्रभु राग न हो।
निर्द्वन्द्व निराकुल सहज रहूँ ।। 1 ।।
नहीं चिन्तन पूरव भोगों का।
आगामी की कुछ चाह न हो।।
स्वाभाविक उदासीनता हो ।
नित निजानन्द रस पान करूँ ।। 2 ।।
नहीं परिग्रह हो, नहीं आरम्भ हो ।
तन से भी सहज विरक्ति हो ।।
प्रभु परम अहिंसक जीवन हो।
नित ज्ञान-ध्यान-तप लीन रहूँ ।। 3 ।।
परम भाव की सहज भावना।
जग में धर्म प्रभावना हो ।।
हो निष्कषाय परिणति स्वामी ।
नित निर्विकार निष्पाप रहूँ ।। 4।।
भय, लालच में नहीं फँसू कहीं।
निस्पृहता का नित भाव रहे ।।
निर्मद निर्मल निष्काम रहूँ ।
निज आराधन में मग्न रहूँ ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २१७ से २१८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’