निर्भार रहो निर्भार रहो, बस केवल जाननहार रहो ।
निर्द्वन्द्व निराकुल शांत रहो, निज में ही निज से तृप्त रहो ।।टेक।।
मत मिथ्या कर्त्ता बुद्धि करो, परिणमन सहज ही होता है ।
स्वाधीन परिणमें द्रव्य सभी, है नियम नियामक अन्य न हो ।।1।।
रे! आयु कर्म अनुसार सभी का जीवन-मरण दिखाता है ।
नहीं आयु किसी को कोई दे, हैं झूठे अध्यवसान अहो ।।2।।
रे! पुण्य-पाप अनुसार सभी के सामग्री होती दिखती ।
मैं कर्त्ता हरता दाता हूँ अभिमान अरे! मिथ्या ही हो ।।3।।
रे! मोही बँधते कर्मों से, निर्मोही मुक्त स्वयं से हो ।
समवाय सहज एकत्रित हों, क्यों पर चिंता से त्रस्त रहो ।।4।।
होनी ही होती है भाई, अनहोनी कभी न होती है ।
अब ज्ञान दृष्टि से देख देख, निरपेक्ष रहो कृतकृत्य रहो ।।5।।
हो चिदानंद ध्रुव एक रूप, पर भाव शून्य आपूर्ण स्वयं ।
निर्मुक्त प्रभु अनुभवन करो, बस सतत स्वयं में लीन रहो ।।6।।
अटको नहीं शास्त्र की चर्चा में, अटको नहीं बौद्धिक चिंतन में ।
पक्षातिक्रान्त हो निर्विकल्प निर्बन्ध रहो, नित सुखी रहो ।।7।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ १३३