निरपेक्ष रहो, निरपेक्ष रहो, निज से ही निज में तृप्त रहो ॥ टेक ॥
निरपेक्ष शक्तियाँ वस्तु की, निरपेक्ष परिणमन वस्तु का।
नहीं रखो अपेक्षा कुछ पर से, आराधन में ही मग्न रहो ॥ 1 ॥
पर से कुछ भी नहिं होता है, पर के बिन कुछ नहीं रुकता है।
स्वाधीन परिणमन वस्तु का, श्रद्धान अटल ऐसा ही हो ॥ 2 ॥
जैसा मुख वैसा ही दर्पण में, सहजपने प्रतिभासित हो ॥
हमको भी वैसा ही मिलता, जैसा व्यवहार स्वयं का हो ॥ 3 ॥
रे कूप में जैसी ध्वनि करता, प्रतिध्वनि भी वैसी आती है।
भूमि में जैसा बोता है, वैसा ही सहज अंकुरित हो ॥ 4 ॥
अच्छा सोचो, अच्छा बोलो, तब तुम भी अच्छा पाओगे।
रे! बुरे विचारों का दुष्फल तो, जग में सदा बुरा ही हो ॥ 5 ॥
आसक्त रहे जो जड़ तन में, वह पुनः पुनः तन धरता है।
जो तन-मन से न्यारा ध्यावे, वह मुक्त सर्व कर्मों से हो ॥ 6 ॥
पर-आश्रय से जो दुखी रहे, वह भव-भव में दुःख पाता है।
जो भेदज्ञान को भाता है, उसको स्वाश्रय से ही सुख हो ॥ 7 ॥
आत्मन् ! उत्तम अवसर आया, निज को समझो दुर्मोह तजो।
अपना सर्वस्व है अपने में, अपने में ही संतुष्ट रहो ॥ 8 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३४० से ३४१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’