निरपेक्ष त्याग बिन भावविशुद्धि अरे असम्भव रे।
भावविशुद्धि बिना साधना अरे असम्भव रे ।।टेक ।।
लेकर नाम साधना का तुम व्यर्थ नहीं भरमाओ।
करो भेदविज्ञान सहज, अरु अंतर्दृष्टि लाओ।।
द्रव्यदृष्टि के बिना मुक्ति का मार्ग असम्भव रे ।।1।।
शान्तचित्त हो सहजभाव से, वस्तुस्वरूप विचारो।
धैर्यपूर्वक स्वाश्रय से ही, निजपरिणाम सम्हारो ।।
साम्यभाव के बिना शान्ति सुख, अरे असम्भव रे।।2।।
कर्मोदय की सर्वव्यवस्था, सहजपने स्वीकारो।
इष्ट-अनिष्ट कल्पना छोड़ो, रागद्वेष परिहारो ।।
इच्छा के अनुकूल परिणमन, सर्व असम्भव रे।।3।।
नहिं कुछ बोलो नहिं कुछ सोचो, ज्ञाता सहज रहो।
तोड़ो पर संबंध श्रृंखला, अब निर्बन्ध रहो ।।
मौन रहे बिन मुक्ति साधना, अरे असम्भव रे।।4।।
मार्ग अहो निर्ग्रन्थों का यह, तुम निर्ग्रन्थ रहो।
उपसर्गों अरु परिषहों को, सहते हुए बढ़ो ।।
संवर सहित निर्जरा के बिन, मुक्ति असम्भव रे।।5।।
अहंकार ममकार छोड़ तुम, निज में ही रम जाओ।
पर में सुख की छोड़ कल्पना, निज में ही रम जाओ ।।
अन्तर में ही तृप्ति हुए बिन, त्याग असम्भव रे।।6।।
महाभाग्य जिनशासन पाया, नित निष्काम रहो।
शंका त्यागो निर्भय वर्तो, सदा प्रसन्न रहो।।
ब्रह्मभावमय मंगलचर्या तभी सुसम्भव रे।।7।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’