निरखी-निरखी मनहर मूरति | nirakhi nirakhi manahara murati

निरखी-निरखी मनहर मूरति,

तोरी हो जिनन्दा ।
खोई-खोई आतम निज निधि,
पाई हो जिनन्दा ॥ टेक ॥
मोह दुःख का घर है मैने,
आज सरासर देखा है, - 2
आतम-धन के आगे झूठा,
जग का सारा लेखा है, - 2
मैं अपने में घुल-मिल जाऊँ,
तो पाऊँ जिनन्दा ॥1 ॥

तू भवनाशी मैं भववासी,
भवसागर से तिरना है, - 2
शुद्धस्वरूपी तुझ-सा-बनकर,
शिवरमणी को वरना है, - 2
मैं अपने में ही रम जाऊँ,
वर पाऊँ जिनन्दा ॥2॥

नादानी में अब लो लों मैंने,
पर को अपना माना है, - 2
काया की माया में भूला,
तुझको नहिं पहिचाना है, - 2
अब भूलों पर रोता ये मन
मोरा हो जिनंदा ॥3 ॥


स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२२), पृष्ठ २१
स्रोत: जैन विधि विधान (सं. पण्डित अभयकुमार जैन, अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन), पृष्ठ ७५