निरखत जिनचन्द्र-वदन स्व-पद सुरुचि आई ॥ टेक ॥
प्रगटी निज-आन की पिछान ज्ञान-भान की।
कला उद्योत होत काम-जामनी पलाई ॥ निरखत ॥1 ॥
शाश्वत् आनन्द स्वाद पायो विनस्यो विषाद ।
आन में अनिष्ट-इष्ट कल्पना नसाई ॥ निरखत ॥2॥
साधी निज साध की समाधि मोह-व्याधि की।
उपाधि को विराधि कै आराधना सुहाई ॥ निरखत ॥3 ॥
धन दिन छिन आज सुगुनि चिन्ते जिनराज अबै ।
सुधरो सब काज ‘दौल’ अचल रिद्धि पाई ॥ निरखत ॥4॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ५४
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अर्थ
अर्थ-अहो आज मुझे जिनेन्द्र भगवान के मुखरूपी चन्द्रमा को देखकर अपने पद की सच्ची रुचि जागृत हो गयी है। जिनेन्द्र भगवान के मुख को देखने से आज मुझे स्व और पर की पहचान प्रकट हो गई है, मेरे अन्दर ज्ञानरूपी सूर्य की कलाओं का प्रकाश हो गया है, और कामरूपी रात्रि भाग गयी है। जिनेन्द्र भगवान के दर्शन से आज मुझे शाश्वत आनन्द का स्वाद प्राप्त हुआ है और मेरा सम्पूर्ण दुःख नष्ट हो गया है; तथा आज मेरी अन्य पदार्थों में इष्टानिष्ट की कल्पना भी नष्ट हो गयी है। जिनेन्द्र भगवान के दर्शन से आज मुझे आत्मसाधना की हेतुभूत समाधि की सिद्धि हुई है, मेरी मोहरूपी व्याधि का विनाश हुआ है और मुझे सर्व उपाधि की त्यागरूप आराधना अच्छी लगने लगी है।’ कविवर दौलतगम कहते हैं कि अहो, आज का यह दिन ओर यह क्षण बहुत धन्य है जो कि इस समय मैंने जिनराज के उत्तम गुणों का चिन्तवन किया। इससे मुझे आज ऐसी अचल ऋद्धि प्राप्त हो गयी है कि मेरे समस्त कार्य सिद्ध हो गये हैं-मैं कृतकृत्य हो गया है।
शब्दार्थ: पद्यान्तर-1 स्व-पद-सुरुचि। अर्थात् स्व और पर का सच्चा ज्ञान। 2 सिद्धि।
स्रोत: दौलत विलास।
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