निरख सखि ऋषिनको ईश यह ऋषभ जिन | Nirakh Sakhi Rishinako Ish Yah Rishabh Jin

निरख सखि ऋषिनको ईश यह ऋषभ जिन

निरख सखि ऋषिनको ईश यह ऋषभ जिन,
परखिके स्वपर परसोंज छारी ।
नैन नासाग्र धरि मैन विनसायकर,
मौनजुत स्वास दिशि सुरभिकारी ।।निरख.।।

धराऽसम क्षांतियुत नरामरखचरनुत,
वियुतरागादिमद दुरितहारी ।
जास क्रमपास भ्रमनाश पंचास्य मृग,
वासकरि प्रीतिकी रीति धारी ।।१।। निरख. ।।

ध्यानदवमाहि विधिदारु प्रजराहिं सिर,
केशशुभ जिमि धुआँ दिशि विथारी ।
फँसे जगपंक जनरंक तिन काढने,
किधौं जगनाह यह बांह सारी ।।२।। निरख. ।।

तप्त हाटकवरन वसन विन आभरन,
खरे थिर ज्यौं शिखर मेरुकारी ।
‘दौलको’ दैन शिवधौल जगमौल जे,
तिन्हैं कर जोर वन्दन हमारी ।।३।। निरख. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ७३ से ७४

अर्थ

हे सखी! मुनियों के नाथ - ऋषभ जिनेश्वर को देखो, उनके दर्शन करो जिनने स्व-पर का भेद समझकर पर परिणतियों को त्याग दिया है। नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिरकर कामदेव का, कामनाओं का नाशकर मौन धारण किया हैँ। जिनके श्वास से दिशाएँ सुगंधित हो रही हैं।

पृथ्वी के समान क्षमाशील, जिनके चरणों में मनुष्य, देव और विद्याधर नत हो रहे हैं, वे राग, द्वेष, मद आदि से रहित पापों का हरण करनेवाले हैं।

जिनके चरणों के समीप जाने से भ्रम का नाश होता है; सिंह और मृग भी जाति-विरोध छोड़‌कर प्रेम से रहने लगे हैं। मुनियों के स्वामी उन ऋषभ जिनेश्वर के दर्शन करो। जिन्होंने ध्यानाग्नि में कर्मरूपी ईंधन को जला दिया है। उनके केश (सिर के बाल) ऐसे सुशोभित हो रहे हैं कि मानो ध्यानाग्नि का धुआँ उठकर चारों दिशाओं में फैल रहा हो। वह धुआँ ऐसा लग रहा है मानो इस जगतरूपी कीचड़ में फैसे निःसहाय जन को बाहर निकालने के लिए जगत के नाथ ने अपनी बाहें पसारी हों। तपे हुए स्वर्ण के समान, वस्त्र व आभूषणरहित नग्न दिगम्बर वेष में जो मेरु के समान स्थिर होकर खड़े हैं। वे जगत के मुकुट दौलतराम को निर्मल मोक्ष के दाता हैं, मोक्ष देनेवाले हैं। उनको हाथ जोड़कर हम वन्दना करते हैं।

शब्दार्थ: सोंज = विचार, परिणति; क्षांति = क्षमा; मैन = काम; खचर = विद्याधरः वियुक्त = रहितः दुरित = पाप; क्रम = चरण; पंचास्य = सिंह; विधिदारु = कर्मरूपी ईंधन; निथारी = विस्तारी; हाटक = स्वर्ग; धौल = धवल, स्वच्छ = सफेद।

स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पद 47।

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