निपट अयाना, तैं आपा नहीं जाना, नाहक भरम भुलाना बे | Nipat Ayana Tain Apa Nahin Jana Nahak Bharam Bhulana Be

निपट अयाना, तैं आपा नहीं जाना, नाहक भरम भुलाना बे

निपट अयाना, तैं आपा नहीं जाना, नाहक भरम भुलाना बे ।।टेक।।

पीय अनादि मोहमद मोह्यो, परपदमें निज माना बे ।।
चेतन चिह्न भिन्न जड़तासों ज्ञानदरशरस-साना बे ।
तनमें छिप्यो लिप्यो न तदपि ज्यों, जलमें कजदल माना बे ।।२।।

सकलभाव निज निज परनतिमय, कोई न होय बिराना बे ।
तू दुखिया परकृत्य मानि ज्यौं, नभताड़न-श्रम ठाना बे ।।३।।

अजगनमें हरि भूल अपनपो, भयो दीन हैराना बे ।
‘दौल’ सुगुरुधुनि सुनि निजमें निज, पाय लह्यो सुखथाना बे ।।४।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १७६

अर्थ

हे निपट अज्ञानी जीव ! तूने अपने स्वरूप को नहीं जाना इसलिए व्यर्थ में हो भ्रम के कारण तू अपने आपको भूला हुआ है। भुला रहा है। अनादिकाल से मोहरूपी शाब को पीकर तू मय नरे में बहक रह है और पर में/अन्य में अर्थात् पुद्गल देह में ही अपनापन मान रहा है।

चेतन चिह्न भिन्न जड़तासों ज्ञानदरशरस-साना बे।

तू चेतन है, जड़ता से पुद्गल से भिन्न है। तू दर्शन और ज्ञान स्वभाववाला है, उनसे युक्त है। तू देह में रहता है, देह में छिपा हुआ है, परन्तु तू देहस्वरूप नहीं है। जैसे जल में कमलपत्र अलग रहता है, वैसे ही तू देह में लिप्त नहीं है, देह से भिन्न है।

सकलभाव निज निज परनतिमय, कोई न होय बिराना बे।

सारे भावों की परिणति अपनी-अपनी है; कोई भी भाव अन्य द्रव्य का नहीं होता। किंतु तू पर की क्रिया को अपना समझकर आकाश को पीटने के समान निरर्थक ही परिश्रम कर रहा है।

स्रोत: दौलत भजन सौरभ।

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