निज स्वभाव को जो दर्शावे, मुक्तिमार्ग निर्दोष दिखावे।
मोहादिक के नाशनहारे, वीतरागता-पोषक धारे ।। 1।।
श्री जिनशास्त्र परम उपकारी, पढ़ो-पढ़ावो मंगलकारी।
द्वादश अंग महान् सु जानो, आतम अनुभव सार पिछानो ।। 2 ।।
प्रथमं करणं चरणं द्रव्यं, चहुँ अनुयोग बने अति भव्य।
भेदज्ञान अनुभव चित लावें, रागादिक फिर दूर भगावें ।। 3 ।।
निज में ही निश्चल रम जावें, शीघ्रहिं सिद्ध दशा प्रगटावें ।
श्रुत आराधन सब सुखदाता, हुआ अकर्त्ता सहजहिं ज्ञाता ।। 4 ।।
शुद्ध स्वरूप लह्यो अविकारी, अक्षय प्रभुता सहज निहारी।
जग की अब परवाह नहीं है, पर भावों की चाह नहीं है ।। 5 ।।
परम तृप्ति निज में ही पाई, किम्-अधिकं नहीं द्वैत दिखाई।
भेद-भ्रान्ति नहीं अब उपजावे, सहजहिं जाननहार जनावे ।। 6 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५५ से १५६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’