तर्जः जिन गुण गाओ हर्षाओ …
निज निधि पाई प्रभु सुखदायी ।। टेक ।।
नाथ आपका दर्शन पाकर, मुझको मेरी सुधि आयी।
तृप्त हुआ संतुष्ट हुआ अति जब दृष्टि निज में आयी ।। 1 ।।
स्वयं सिद्ध निज भाव निरखकर, निर्भयता उर प्रगटायी।
जन्म-मरण का भय न रहा कुछ, अविनाशी प्रभुता पायी ।। 2 ।।
हो निस्पृह निर्ग्रन्थ जिनेश्वर, ध्याऊँ पद आनंददायी ।
शुक्लध्यान प्रगटे अविकारी, कर्मबंध सब विनशायी ।। 3 ।।
यही भाव कछु और न चाहूँ, लीन रहूँ अपने माँही।
अहो ! परम उपकारी जिनवर, होय नमन मंगलदायी ।। 4 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ५२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’