निज के गुण निज में हैं चेतन, तू पर में क्यों भरमाता है ।।टेक।।
पर से दृष्टि को फेर जरा, मिल जाय गुणों का सिन्धु भरा ।
निज में खोजा उनको जिसने, पाया है शिवपद को उसने ।।
शिव पद मिलता है निज में ही रे क्यों निज को ठुकराता है ।।1।।
जो गुण स्वभाव है सिद्धों में, वह ही तेरे में छिपा हुआ ।
है रंग रहित अनुपम वे तो, तू राग रंग में रंगा हुआ ।।
तज राग-द्वेष क्रोधादि सभी, जिनके कारण दुःख पाता है ।।2।।
कर्तापन से हो विमुख सदा, मिथ्यात्व भाव को दूर भगा ।
प्रगटा सम्यग्दृग, ज्ञान-चरित, निज सुख का फिर आस्वाद नया ।।
ये ही सच्चे सुख के कारण, तू क्यों इनकों विसराता है ।।3।।
पुरुषार्थ किया निज में जिसने, केवल पद को पाया क्षण में ।
सब तोड़ जगत् के द्वन्द-फन्द, निज से निज को ध्याया निज में ।।
है ज्ञाता-दृष्टा भाव तेरा, क्यों राग-द्वेष कर जाता है ।।4।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ८०