निज ज्ञायक ही आनन्दधाम | nija j nayaka hi anandadhama

निज ज्ञायक ही आनन्दधाम,

गुरु ऐसे दृष्टिधारी हैं।
सहजानन्द में ही तृप्त होय,
अस्थिर जग प्रीति विसारी है।। 1 ।।

तीन कषाय चौकड़ी नाशी,
यथाजात मुद्रा धारी।
विषयाशा आरम्भ परिग्रह,
रहित ज्ञानमय अविकारी ।। 2 ।।

सब परभावों से भिन्न सदा,
शुद्धातम अनुभव करते हैं।
किंचित् करुणा जब आती है,
ज्ञायक महिमा दर्शाते हैं ।। 3 ।।

पावन पुरुषार्थ प्रकट होवे,
यह धन्य दशा कब प्रगटाऊँ।
तोड़ सकल जग द्वन्द-फन्द,
गुरु सम निज गुरुता को ध्याऊँ।।4।।

जिन उपसर्गों की मात्र कल्पना से,
अज्ञानी
घबराते ।
उपसर्ग नहीं मेरे ऊपर,
यों समझ सौम्यता दिखलाते ।।5।।

वे दुष्ट मूढ़जन थक जावें,
नहिं किंचित् तुम्हें चिगा पाते।
कितने ही अंत में द्वेष त्याग,
तुम चरणों में ही झुक जाते ।। 6 ।।

चक्री इन्द्रादि चरण पूजें,
बहु ऋद्धि-सिद्धियाँ प्रगट हुई ।
पर धन्य-धन्य निर्ग्रन्थ गुरु,
उनमें नहीं परिणति भ्रमित हुई ।।7।।

चैतन्य ऋद्धि में मग्न हुए,
किंचित् परवाह नहीं जग की।
मुक्ति की भी वांछा न करें,
बस महिमा जागी निजपद की ।।8 ।।

निर्दोष मूलगुण अट्ठाईस,
बाहर परिणति में होते हैं।
उनको भी तुष सम ही समझें,
अक्षय पद अनुभव करते हैं।।9।।

वे वंदनीय आदर्श परम,
समतामय जिनका जीवन है।
समतामय ज्ञायक दृष्टि धर,
चरणों में शत-शत वंदन है।। 10 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २३२ से २३४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’