निज ज्ञायक प्रभु मत भूलो जिया। ।टेक ।।
संयोगों का नहीं ठिकाना, इनमें ही मत फूलो जिया।
संयोगी भाव महा दुःखदायी, इनमें ही नहीं झूलो जिया ।।1।।
भूल प्रभु को भव-भव भटके, अवसर आज है समझो जिया।
निज का आनन्द निज में पाओ, व्यर्थ न बाहर भटको जिया ।।2।।
निज के आश्रय से मुक्ति हो, निश्चय उर में मानो जिया।
तोरि सकल जग द्वन्द फंद अब, निज में ही रम जाओ जिया ।। 3 ।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’