निज घर नाहिं पिछान्यारे
(राग उझाज जोगीरासा)
निज घर नाहिं पिछान्यारे, मोह उदय होने तैं मिथ्या भर्म भुलानारे ॥टेर ॥
तू तो नित्य अनादि अरूपी सिद्ध समानारे ।
पुद्गल जड़ में राचि भयो तू मूर्ख प्रधानारे ॥१॥
तन धन जोबन पुत्र वधू आदिक निज मानारे ।
यह सब जाय रहन के नांही समझ सयानारे ॥२॥
बालपने लड़कन संग जोबन त्रिया जवानारे ।
वृद्ध भयो सब सुधि गई अब धर्म भुलानारे ॥३ ॥
गई गई अब राख रही तू समझ सियानारे ।
बुद्धमहाचन्द विचारिके निज पद नित्य रमानारे ॥४॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन १५ (विभिन्न कवियों के भजन)