तर्ज : मेरे मन मन्दिर में …
निहारो अन्तर में भगवान्, निहारो निज शाश्वत भगवान्।।टेक ।।
रागादिक दोषों से न्यारा, अनुपम अक्षय गुण भंडारा।
अकृत्रिम सहज चतुष्टयवान।।1।।
जिसका दर्शन सम्यग्दर्शन, परमानन्दमय आतमदर्शन ।
सहज ही हो भव का अवसान।।2।।
जिसका अनुभव ज्ञान है सम्यक्, जिसमें थिरता चारित सम्यक् ।
ये ही सर्व सुखों की खान।।3।।
जिसके आश्रय से योगीजन, सहज जीतते हैं चंचल मन।
अविरल धरते निर्मल ध्यान।।4।।
आत्म भावना नित मंगलमय, सर्व विकल्पों का करती क्षय।
प्रगटे अक्षय आत्म निधान।।5।।
हेय भाव का त्याग कराओ, पाने योग्य स्वयं में पाओ।
प्रभु सम पाओ पद निर्वाण।।6।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’