नेमिनाथजी की विनती | Neminathaji Ki Vinati

नेमिनाथजी की विनती

नेमिनाथजी की विनती

त्रिभुवनगुरु स्वामी जी, करुणानिधि नामी जी ।
सुनि अंतरजामी, मेरी बीनतीजी ।।१।।

मैं दास तुम्हारा जी, दुखिया बहु भारा जी ।
दुख मेटनहारा, तुम जादोंपती जी ।।२।।

भरम्यो संसारा जी, चिर विपति-भँडारा जी ।
कहिं सार न सारे, चहुँगति डोलियो जी ।।३।।

दुख मेरु समाना जी, सुख सरसों दाना जी ।
अब जान धरि ज्ञान, तराजू तोलिया जी ।।४।।

थावर तन पाया जी, त्रस नाम धराया जी ।
कृमि कुंथु कहाया, मरि भँवरा हुवा जी ।।५।।

पशुकाया सारी जी, नाना विधि धारी जी ।
जलचारी थलचारी, उड़न पखेरु हुवा जी ।।६।।

नरकनके माहीं जी, दुख ओर न काहीं जी ।
अति घोर जहाँ है, सरिता खार की जी ।।७।।

पुनि असुर संघारै जी, निज वैर विचारैं जी ।
मिलि बांधैं अर मारैं, निरदय नारकी जी ।।८।।

मानुष अवतारै जी, रह्यो गरभमँझारै जी ।
रटि रोयो जैनमत, वारैं मैं घनों जी ।।९।।

जोवन तन रोगी जी, कै विरहवियोगी जी ।
फिर भोगी बहुविधि, बिरधपनाकी वेदना जी ।।१०।।

सुरपदवी पाई जी, रंभा उर लाई जी ।
तहाँ देखि पराई, संपति झूरियो जी ।।११।।

माला मुरझानी जी, तब आरति ठानी जी ।
तिथि पूरन जानी, मरत विसूरियो जी ।।१२।।

यों दुख भवकेरा जी, भुगतो बहुतेरा जी ।
प्रभु! मेरे कहतै, पार न है कहीं जी ।।१३।।

मिथ्यामदमाता जी, चाही नित साता जी ।
सुखदाता जगत्राता, तुम जाने नहीं जी ।।१४।।

प्रभु भागनि पाये जी, गुन श्रवन सुहाये जी ।
तकि आयो अब सेवककी, विपदा हरो जी ।।१५।।

भववास बसेरा जी, फिरि होय न मेरा जी ।
सुख पावै जन तेरा, स्वामी! सो करो जी ।।१६।।

तुम शरनसहाई जी, तुम सज्जनभाई जी ।
तुम माई तुम्हीं बाप, दया मुझ लीजिये जी ।।१७।।

‘भूधर’ कर जोरै जी, ठाड़ो प्रभु ओरै जी ।
निजदास निहारो, निरभय कीजिये जी ।।१८।।

बिरधपना - वृद्धावस्था । झूरना = दु:खी होना । विसूरिया = शोक संतप्त होना, रोना ।


Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ २२ से २४