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उन्हें रागी से बैरागी बनाने का खयाल आया।
कृष्ण जी को कौतूहल के रचाने का खयाल आया,
नेमि भगवन की ताकत आजमाने का खयाल आया।
देख ताकत श्री नेमि की, राज जानने का खयाल आया,
उनकी शादी में पशु-बंधन कराने का खयाल आया।।1।।
सोच कर उसी दम वो जूनागढ़ से टीका साथ ले आये,
हो जिससे मुद्दा पूरा वो सारा हाल कह आये।
कमी मेहमान-नवाजी में कोई रहने नहीं पाये,
इधर होने लगीं तैयारियाँ और कृष्ण घर आये,
इधर श्री नेमि को दूल्हा बनाने का खयाल आया।।2।।
सावन का महीना, श्री नेमि धरो सिर मोर,
घर घर सखियाँ मंगल गावें, छज्जे नाचे मोर।
हरे हर गुबरा अंगना लिपाओ, माणिक मोती से चौक पुरायो,
अनहद बाजे बाज रहे, ध्वनि छाय रही चहुँ ओर।।3।।
चली बारात तो दर्शन को दर्शक टूटे पड़ते थे,
चलने की खुशी में रथ के घोड़े छूटे पड़ते थे।
लताओं से चरण में फूल झुक-झुक टूटे पड़ते थे,
हवा ठंडी थी और खुशबू के गुंचे फूटे पड़ते थे,
प्रकृति को भी किस्मत आजमाने का खयाल आया।।4।।
सजे थे साज घोड़ों पर और तीरंदाज बैठे थे,
हाथियों पर जो मेहमान थे, बा-अंदाज बैठे थे।
उधर जूनागढ़ में बाराती खुशी के साथ आ पहुँचे,
इधर तोरण पे पशु बोले, हमारे नाथ आ पहुँचे,
उन्हें अपनी कहानी के सुनाने का खयाल आया।।5।।
नौं भव की प्रीत मेरी, दसमें की कामना, जाने सखी कब होगा नेम जी का आवना।
तमन्ना थी राजुल के वो रात आई, सखी वो रात आई,
सुबह होते भगवन की बारात आई, प्रेम बरसात आई।
फजर होते भगवन की बारात आई, प्रेम बरसात आई,
करने लगे तोरण पे पशु अपनी प्रार्थना।।6।।
आपके साये में भगवन सभी तो शाद होते हैं,
बताओ किसलिए हम मुफ्त में बरबाद होते हैं।
चरण जिस जा में आपके सभी आबाद होते हैं,
बताओ नाथ क्यों हम बेजुबां बरबाद होते हैं,
ये सुन श्री नेमि को बंधन छुड़ाने का खयाल आया।।7।।
ये सुनते ही राजुल को बहुत रोका न वो ठहरी,
यूँ कहती जाती थी कि चारों गतियों में बहुत ठहरी।
कभी इस घर में जा ठहरी, कभी उस घर में जा ठहरी,
मगर ‘माणिक’ वो अब श्री नेमि के चरणों में जा ठहरी,
उन्हें अब अपनी बिगड़ी के बनाने का खयाल आया।।8।।
रचयिता : माणिकलाल जी
स्वर : पण्डित श्री मांगीलाल जी, कोलारस
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स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।
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