नेमि पिया! राजुल पुकारे तोरा नाम | Nemi Piya! Rajul Pukare Tora Naam

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नेमि पिया! राजुल पुकारे तोरा नाम।
नौ भव की प्रीत मेरी हुई बदनाम।।

आए गिर को गए सुनके पशुओं का क्रंदन,
राजुल को डाल गए उलझन में उलझन।
मैं भी अब जपूँ निज आतम राम।।1।।

कजरा लगाऊँ न बिंदिया लगाऊँगी,
माँगों में सिंदूर अब ना भराऊँगी।
मेहंदी और माहुर से क्या मुझको काम।।2।।

पीछी मँगा दो, कमंडल भी ला दो,
माता जी! चल के मोहे दीक्षा दिला दो।
वन में रहूँगी, महलों से क्या काम।।3।।

कहे माता राजुल, ये ज़िद क्यों पड़ी है?
नेमी से क्या तेरी भाँवर पड़ी है?
नेमी से लड़के यहाँ अच्छे तमाम।।4।।

किसी और को कंत अब ना कहूँगी,
उनकी रही, उनके मारग चलूँगी।
मुझको तो अब अपने आतम से काम।।5।।

रचयिता : अज्ञात
स्वर : पण्डित श्री मांगीलाल जी, कोलारस

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स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।