नीतिवाक्यामृत (आचार्य सोमदेवसूरि), हिन्दी अनुवाद सहित | Neetivakyamrit (Acharya Somadeva Suri)

नीतिवाक्यामृत (आचार्य सोमदेवसूरि), हिन्दी अनुवाद सहित

रचयिता: आचार्य सोमदेवसूरि
हिन्दी अनुवाद: पं॰ सुन्दरलाल शास्त्री
प्रकाशक: जैन विद्यापीठ, सागर (म॰ प्र॰)
संस्करण: २०१७ (आवृत्ति ११००)

राजनीति का ग्रन्थ: राजा, मन्त्री, कोष और शासन-संचालन के सिद्धान्तों के साथ धर्म, अर्थ और काम का विवेचन, ३२ समुद्देशों में।

Neetivakyamrit by Acharya Somadeva Suri: a Sanskrit treatise on polity and statecraft in 32 samuddeshas, with Hindi translation by Pt. Sundarlal Shastri.


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१. धर्मसमुद्देश:

सोमं सोमसमाकारं सोमाभं सोमसंभवम्।
सोमदेवं मुनिं नत्वा नीतिवाक्यामृतं ब्रुवे ॥१॥

अर्थ: अक्षयकीर्तिमान्, चन्द्रमा के सदृश कान्तियुक्त, अन्तरङ्ग लक्ष्मी (अनन्तदर्शन, अनन्तज्ञान, अनन्तसुख और अनन्तवीर्यरूप आत्मिकलक्ष्मी) और बहिरङ्गलक्ष्मी (समवसरण विभूति आदि) से अलंकृत, सोमवंश (चन्द्रवंश) में उत्पन्न होने वाले और त्रिकालवर्ती अनन्तानन्त पदार्थों को हस्त में रखे हुए आँवले की तरह प्रत्यक्ष जानने वाले (सर्वज्ञ) ऐसे श्री चन्द्रप्रभ तीर्थंकर को नमस्कार करके मैं नीतिवाक्यामृत शास्त्र का प्रतिपादन करता हूँ। जिन सत्कर्त्तव्यों के अनुष्ठान से स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है उसे धर्म कहते हैं। समन्तभद्राचार्य ने१ भी कहा है कि जो प्राणियों को सांसारिक दुःखों से छुड़ाकर उत्तम सुख (मोक्ष) में धरता है, उसे धर्म कहते हैं।


अथ धर्मार्थकामफलाय राज्याय नमः ।

अर्थ: मैं उस राज्य को आदर की दृष्टि से देखता हूँ जो प्रजा को धर्म, अर्थ और काम इन तीन पुरुषार्थों को उत्पन्न करने में समर्थ है।


यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ॥२॥

अर्थ (सूत्र 1 से 3): आप्त के स्वरूप को जानने में प्रवीण शास्त्रकारों ने कहा है कि जो सर्वज्ञ, सर्वलोक का ईश्वर-संसार रूपी दुःख समुद्र से उद्धार करने वाला, क्षुधा और तृषा आदि १८ दोषों से रहित (वीतरागी) एवं समस्त प्राणियों को मोक्षमार्ग का प्रत्यक्ष उपदेश देने वाला है उन ऋषभादि तीर्थङ्करों को आप्त (सच्चा ईश्वर) कहते हैं ॥२॥ जो शास्त्र मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों में प्रवृत्ति कराने में समर्थ हो तथा हेय (छोड़ने योग्य) और उपादेय (ग्रहण करने योग्य) का ज्ञान कराकर त्रिकालवर्ती पदार्थों का यथार्थबोध कराने में प्रवीण हो उसे आगम कहते हैं ॥३॥ जिस प्रकार लोक में माता और पिता की शुद्धि (पिंडशुद्धि) होने पर उन के पुत्र में शुद्धि देखी जाती हैं उसी प्रकार आप्त की विशुद्धि (वीतरागता और सर्वज्ञता आदि) होने पर ही उस के कहे हुए आगम में विशुद्धता-प्रामाणिकता होती है अतः जो तीर्थङ्करों द्वारा निरूपण किया गया हो उसे आगम कहा है ॥४॥ जिस में अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक का तथा नरक और तिर्यञ्च आदि चारों गतियों का कथन किया गया है उसे करणानुयोग कहते हैं ॥२॥ “मेरा यह सदाचार (अहिंसा और सत्य आदि व्रत) है और उसकी रक्षा का क्रमिक विधान यह है” इस प्रकार चरित्रनिष्ठ आत्मा चरणानुयोग के आश्रित होती हैं। जीव, अजीव, धर्म अधर्म, बन्ध और मोक्षतत्त्व का यथार्थज्ञान होना द्रव्यानुयोगशास्त्र का फल है ॥४॥ वह सम्यग्ज्ञान पवित्र मन वाले मनुष्य को हितकारक और अहितकारक पदार्थों का दिग्दर्शन कराता है। यह हित की प्राप्ति और अहित के परिहार में कारण होता है इसलिए वह जन्म से अन्धे पुरुष को लाठी के सदृश है ॥२॥ मतिज्ञान (इन्द्रियों से उत्पन्न होने वाला ज्ञान) देखे हुए पदार्थों में उत्पन्न होता है। श्रुतज्ञान देखे हुए तथा बिना देखे हुए (अतीन्द्रिय सूक्ष्म धर्माधर्मादि) पदार्थों में भी उत्पन्न होता है। अतएव यदि मनुष्यों का चित्त ईर्ष्याभाव से दूषित नहीं है तो उन्हें तत्त्वज्ञान की प्राप्ति कठिन नहीं है ॥३॥ बाधा रहित वस्तु में भी जो बुद्धि विपरीत हो जाती है उस में ज्ञाता का ही दोष है वस्तु का नहीं। जैसे मन्द दृष्टि मनुष्य को एक चन्द्रमा में जो दो चन्द्रमा का भ्रम होता है वह उस दृष्टि का ही दोष है चन्द्रमा का नहीं ॥४॥ जिस मनुष्य में सम्यग्दर्शन नहीं है उसका शास्त्र ज्ञान केवल उस के मुख की खुजली को दूर करता है-अर्थात् वाद-विवाद करने में ही समर्थ होता है; क्योंकि उसमें आत्मदृष्टि नहीं होती एवं जिसमें ज्ञान नहीं है उसका चरित्र धारण करना विधवा स्त्री के आभूषण धारण करने के समान निरर्थक है ॥५॥ जो दूध जमा देने से दही हो चुका है, वह फिर दूध नहीं हो सकता उसी प्रकार जो आत्मा तत्त्वज्ञान से विशुद्ध हो चुकी है वह पुनः पापों से लिप्त नहीं होती ॥६॥ शरीर अत्यन्त मलिन है और आत्मा अत्यन्त विशुद्ध है इसलिए विवेकी मनुष्य को इसे शरीर से पृथक् और नित्य चिंतवन करना चाहिए ॥७॥ जिसकी वाणी व्याकरण, साहित्य, इतिहास और आगमों को पढ़कर विशुद्ध नहीं हुई एवं जिसने नीतिशास्त्रों को पढ़कर अपनी बुद्धि को परिष्कृत और विशुद्ध नहीं बनाया वह केवल दूसरों के सहारे रहकर क्लेश उठाता है और अन्धे के समान है ॥८॥ अब मद्यत्याग का विवेचन करते हैं- मद्य पीने से शराबी के समस्त काम और क्रोधादि दोष उत्पन्न होते हैं और उसकी बुद्धि पर अज्ञान का परदा पड़ जाता है एवं यह मद्यपान समस्त पापों में अग्रेसर-प्रधान है ॥२॥ इससे हित और अहित का विवेक नष्ट हो जाता है इसलिए शराबी लोग संसाररूपी जंगल में भटकाने वाले कौन-कौन से पाप नहीं करते ? अर्थात् सभी प्रकार के पाप करते हैं ॥३॥ शराब पीने से यदुवंशी राजा लोग और जुआ खेलने से पांडव लोग नष्ट हुए यह कथानक समस्त लोक में प्रसिद्ध है ॥४॥ महुआ, गुड़ और पानी के मिश्रण से बनाई हुई शराब में निश्चय से अनेक जीव उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते रहते हैं तथा शराब रूप हो जाते हैं। पश्चात् वह शराब समय पाकर शराबियों के मन को मूर्च्छित कर देती है ॥५॥ शराब की एक बिन्दु में इतनी जीव राशि विद्यमान है कि यदि उसके जीव स्थूल होकर संचार करने लगें तो निस्सन्देह समस्त लोक को पूर्ण कर सकते हैं ॥६॥ मद्यपान शराबी के मन को मूर्च्छित करता है और दुर्गति का कारण है; इसलिए सज्जन पुरुषों को इसका सदैव त्याग कर देना चाहिए ॥७॥ जो लोग अहिंसाधर्म के माहात्म्य से लोक में सुखसामग्री का उपभोग करते हैं तथापि वे उससे द्वेष करते हैं। यह उनका बड़ा अज्ञान है। क्योंकि कौन बुद्धिमान पुरुष इच्छित वस्तु को देने वाले कल्पवृक्ष से द्वेष करता है ? अर्थात् नहीं करता ॥२॥ यदि बुद्धिमान पुरुष थोड़ा-सा क्लेश उठाकर अपने लिए अच्छी तरह सुखी देखना चाहता है तो उसका कर्तव्य हैं कि जिस प्रकार के व्यवहार (मारना विश्वासघात करना आदि) वह अपने लिए बुरा समझता है वैसे व्यवहार दूसरों के साथ न करे ॥३॥ जो विवेकी पुरुष दूसरों का उपघात (हिंसा) न करके अपनी सुखसामग्री का उपभोग करना चाहता है वह इस लोक में सुख भोगता हुआ जन्मान्तर में भी सुखी होता है ॥४॥ जिस प्रकार समस्त प्राणियों को अपना जीवन प्यारा है उसी प्रकार दूसरों को भी अपना जीवन प्यारा है। अतः बुद्धिमान पुरुष को जीव हिंसा छोड़ देनी चाहिए ॥५॥ बुद्धिमान पुरुष शराबी और मांस भक्षी मनुष्यों के गृह में भोजन और पान न करे एवं उसके साथ मंत्रणा (सलाह) भी न करे ॥६॥ जो मनुष्य अव्रतियों-(मांस आदि का त्याग न करने वाले) से भोजनादि कार्यों में संसर्ग रखता है उसकी इस लोक में निन्दा होती है और परलोक में भी उसे कटुफल भोगना पड़ते हैं ॥७॥ व्रती पुरुषों को मशक वगैरह चमड़े की चीजों में रक्खा हुआ पानी, चमड़े की कुप्पियों में रक्खा हुआ घी और तेल का भी उपयोग करना सदा के लिए छोड़ देना चाहिए एवं वह अव्रती कन्याओं से विवाह आदि संसर्ग न करे ॥८॥ आत्मकल्याण के इच्छुक मनुष्यों को बौद्ध, सांख्य और चार्वाक आदि की युक्ति शून्य मान्यता पर ध्यान न देते हुए सदा के लिए मांस भक्षण का त्याग करना चाहिए ॥९॥ जिसके मध्यभाग में छोटे-छोटे मक्खियों के बच्चे भिन्न रहे हैं ऐसे शहद के छत्ते में वर्तमान मक्खियों के अण्डों के खंडों से युक्त मधु बहेलियों और चिड़ीमारों के लिए प्राणों के समान प्रिय कैसे हो गया ? यह आश्चर्य की बात है ॥२॥ पीपल, गूलर, पाकर, बड़ और ऊमर इन पाँच उदुम्बर फलों में स्थूल त्रस जीव उड़ते हुए दिखाई देते हैं तथा अनेक सूक्ष्म जीव भी आगमप्रमाण से सिद्ध पाये जाते हैं; इसलिए नैतिक पुरुष इनका यावज्जीवन त्याग करें ॥३॥ उनमें हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पाँच पापों के एकदेश त्याग को अणुव्रत कहते हैं ॥२॥ प्रशस्त कार्यों (अहिंसा आदि) में प्रवृत्ति करना और अप्रशस्त कार्यों (हिंसा आदि) का त्याग करना उसे व्रत कहा गया है ॥३॥ हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पाप क्रियाओं में प्रवृत्ति करने से इस लोक में भयानक दुःख और परलोक में दुर्गति के दुःख भागने पड़ते हैं ॥४॥ काम और क्रोधादि कषायों के वश होकर प्राणियों के प्राणों का घात करना या उन्हें मानसिक पीड़ा पहुँचाना हिंसा है। इसके विपरीत रागद्वेष और मोह आदि कषायों को त्यागकर प्राणियों की रक्षा करना और यत्नाचाररूप प्रवृत्ति करना अहिंसा हैं ॥५॥ जो मनुष्य देवताओं की पूजा, अतिथिसत्कार, पितृकर्म एवं उच्चाटन और मारण आदि के मन्त्रों के लिए तथा औषधि के सेवन में और भयों से बचने के लिए किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करता उसका वह अहिंसा नामक अणुव्रत है ॥६॥ दयालु पुरुष आसन, शय्या, मार्ग, अन्न और जो कुछ भी दूसरे पदार्थ हैं उन्हें सेवन करता हुआ भी बिना देखे शोधे सेवन न करे ॥७॥ गृह के कार्य (कूटना और पीसना आदि) देखभाल कर करने चाहिए और समस्त तरल पदार्थ (दूध, घी, तेल और जलादि) कपड़े से छानकर उपयोग में लाने चाहिए ॥८॥ विवेकी मनुष्य अहिंसाव्रत की रक्षा के लिए और मूलगुणों की विशुद्धि के लिए इस लोक और परलोक में दुःख देने वाले रात्रिभोजन का त्याग करे ॥९॥ ऐसा सत्य भी नहीं बोलना चाहिए जिससे दूसरे प्राणियों को और उसे भयानक आपत्तियों का सामना करना पड़े ॥२॥ सत्यवादी को सौम्य प्रकृतियुक्त, सदाचारी, हितैषी, प्रियवादी, परोपकारी और दयालु होना चाहिए ॥३॥ मंत्रभेद (दूसरों के निश्चित अभिप्राय को प्रकाशित करना) परनिन्दा, चुगली करना, झूठे दस्तावेज आदि लिखाना और झूठी गवाही देना इन दुर्गुणों को छोड़ना चाहिए क्योंकि इससे सत्यव्रत नष्ट होता है ॥४॥ जिस वाणी से गुरु आदि प्रमुदित होते हैं वह मिथ्या होने पर भी मिथ्या (झूठी) नहीं समझी जाती ॥५॥ सत्यवादी आत्मप्रशंसा और परनिन्दा का त्यागकर दूसरों के विद्यमान गुणों का घात न करता हुआ अपने अविद्यमान गुणों को न कहे ॥६॥ क्योंकि परनिन्दा और आत्मश्लाघा से मनुष्य को नीचगोत्र और उसका त्याग करने से उच्चगोत्र का बंध होता है ॥७॥ जो व्यक्ति दूसरों के साथ सद्व्यवहार करता है उसे स्वयं वैसा ही व्यवहार प्राप्त होता है; अतएव नैतिक मनुष्य को प्राणीमात्र के साथ कभी भी दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए ॥८॥ जो मनुष्य दूसरे प्राणियों में अज्ञानांधकार का प्रसार करते हैं वे स्वयं अपनी धमनियों में उसके प्रवाह का सिंचन करते हैं ॥९॥ कुटुम्बियों की मृत्यु हो जाने पर उनका धन बिना दिया हुआ भी ग्राह्य है। इसके विपरीत जो लोग जीवित कुटुम्बियों के धन को लोभवश बिना दिया हुआ ग्रहण करते हैं उनका अचौर्याणुव्रत नष्ट हो जाता है ॥२॥ खजाना और खदान का धन राजा को छोड़कर अन्य का नहीं हो सकता; क्योंकि लोक में जिस धन का कोई स्वामी नहीं होता उसका स्वामी राजा ही समझा जाता है ॥३॥ मनुष्यों का स्वयं कमाया हुआ धन भी जब संदिग्ध (यह मेरा है अथवा दूसरे का है? इस प्रकार संदेहयुक्त) हो जाता है तब उसकी दूसरों का समझना चाहिए। अतः अचौर्याणुव्रती पुरुष को अपने कुटुम्ब के धन को छोड़कर दूसरे के धन को बिना दिया हुआ ग्रहण नहीं करना चाहिए ॥४॥ इसी प्रकार उसे मन्दिर, जल, वन और पहाड़ आदि में पड़े हुए दूसरों के धन को ग्रहण नहीं करना चाहिए ॥५॥ नापने और तोलने के बाँटों को कमती या बढ़ती रखना, चोरी करने का उपाय बताना, चोरों के द्वारा लाई हुई वस्तु का ग्रहण करना और लड़ाई-झगड़ा करके धन का संग्रह करना इनसे अचौर्याणुव्रत नष्ट होता है ॥६॥ जिनका अचौर्याणुव्रत विशुद्ध है उन्हें रत्न, रत्नाङ्ग, स्त्रीरत्न और रत्नजड़ित वस्त्रादिविभूतियाँ बिना चिंतन किये प्राप्त होती हैं ॥७॥ जो लोग तृष्णा से मलिन बुद्धि युक्त होकर दूसरों की चोरी करते हैं उन्हें ऐहिक और पारलौकिककष्ट होते हैं ॥८॥ ब्रह्मचर्याणुव्रत की रक्षा की जाने पर अहिंसा और सत्य आदि गुण वृद्धि को प्राप्त होते हैं इसलिए इसे अध्यात्म विद्या विशारदों ने ब्रह्मचर्य कहा है ॥२॥ ब्रह्मचारी को कामोद्दीपक चरित्र, रस और कामोद्दीपक शास्त्रों (कामसूत्र प्रभृति) से अपनी आत्मा में कामविकार की उत्पत्ति नहीं होने देना चाहिए ॥३॥ जिस प्रकार हवन करने योग्य द्रव्यों (घी और धूप आदि) से अग्नि सन्तुष्ट नहीं होती एवं बहुत जल से समुद्र सन्तुष्ट नहीं होता उसी प्रकार यह पुरुष भी सांसारिक भोगों (स्त्री आदि) से संतुष्ट नहीं होता ॥४॥ स्त्री आदि पंचेन्द्रियों के विषय विष फल के समान तत्काल में पुरुषों को मीठे मालूम पड़ते हैं परन्तु अन्त में विपत्तिरूपी फलों को देते हैं; इसलिए सज्जनों की इनमें क्यों आसक्ति होनी चाहिए ? अर्थात् नहीं होनी चाहिए ॥५॥ अनन्तवीर्य को धारण करने वाला यह मनुष्य अत्यन्त कामसेवन से नपुंसक हो जाता है ॥६॥ जब तक यह कामरूपी अग्नि मनुष्य के चित्तरूपी ईंधन में प्रदीप्त होती है तब तक उसमें स्वाध्याय, धर्मध्यान और धार्मिक क्रियाएँ किस प्रकार उत्पन्न हो सकती हैं ? नहीं हो सकतीं ॥७॥ इसलिए कामतत्परता को छोड़कर न्याय प्राप्त भोगों को भोजन के समान शारीरिक दाह की शान्ति के हेतु और खोटे ध्यान को नष्ट करने के लिए सेवन करना चाहिए ॥८॥ परस्त्री के यहाँ आना-जाना, कामसेवन के निश्चित अंगों को छोड़कर दूसरे अंगों से क्रीड़ा करना, दूसरों का विवाह करना, कामसेवन में तीव्र लालसा रखना और विटत्व ये पाँच ब्रह्मचर्य को नष्ट करते हैं ॥९॥ क्षेत्र, धान्य, धन, गृह, कुप्य (तांबा आदि धातु), शय्या, आसन, द्विपद, चतुष्पद (पशु) और भांड ये दश प्रकार के बाह्य परिग्रह हैं ॥२॥ मिथ्यात्व, स्त्रीवेद, पुंवेद, नपुंसकवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, क्रोध, मान, माया और लोभ यह १४ प्रकार का अंतरंग परिग्रह है ॥३॥ जो लोग धन के लिए अपनी बुद्धि को प्रेरित करते हैं उनके मनोरथ निष्फल होते हैं; क्योंकि निरर्थक कार्यों में प्रवृत्त हुई बुद्धि फलार्थी पुरुषों की कामना को पूर्ण करने वाली नहीं होती ॥४॥ जबकि साथ उत्पन्न हुआ यह शरीर भी नित्य रहने वाला नहीं है तब महापुरुषों को धन, बच्चे और स्त्रियों में नित्य रहने की श्रद्धा क्यों करनी चाहिए ? अर्थात् नहीं करनी चाहिए ॥५॥ जो मनुष्य दानपुण्यादि धर्म के लिए और न्याय प्राप्त भोगों के भोगने के लिए धन नहीं कमाता वह धनाढ्य होकर के भी दरिद्र है, मनुष्य होकर के भी अधम कोटि का मनुष्य है ॥७॥ जो लोग प्राप्त धन में अभिमान नहीं करते तथा धन की प्राप्ति में वाञ्छा नहीं करते वे दोनों लोकों में लक्ष्मी के स्वामी होते हैं ॥८॥ जिनका मन बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रहों में मूर्च्छा रहित है वे अगण्य पुण्य राशि से युक्त होकर सर्वत्र सुख प्राप्त करते हैं ॥९॥ गुणव्रती श्रावक “दशों दिशाओं में से अमुक दिशा में और समस्त देशों में से प्रतिनियत देश में ही मेरा गमन होगा’’ ऐसा क्रमशः दिग्व्रत और देशव्रत में नियम करता है ॥२॥ इस प्रकार दिशा और देश का नियम करने वाले का चित्त अवधि से बाहर के पदार्थों में हिंसा, लोभ और उपभोग आदि का त्याग होने के कारण काबू में हो जाता है ॥३॥ उक्त व्रत की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने वाले व्रती श्रावक को परलोक में आज्ञा और ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं ॥४॥ मयूर, मुर्गा, बाज, बिलाव, सर्प, नेवला, विष, काँटे, शस्त्र, अग्नि, चाबुक, जाल और रस्सी इन हिंसक प्राणियों के पालने का और कष्टदायक चीजों के रखने का पापयुक्त उपदेश देना, खोटा ध्यान करना, हिंसाप्रधान क्रीड़ा करना, निरर्थक कार्य करना, दूसरों को कष्ट देना, चुगली करना, शोक करना और दूसरों को रुलाना एवं इसी प्रकार के दूसरे कार्य जो कि प्राणियों का वध, बंधन और संरोध करने वाले हैं उनका करना, कषायों की वृद्धि करने से अनर्थदंड कहा गया है ॥१-३॥ अपने आचार को उत्तम बनाने की बुद्धियुक्त देशव्रती श्रावक निर्दयी जीवों का पालन न करें एवं परशु और कृपाण आदि हिंसा के उपकरणों को न देवे ॥४॥ व्रती श्रावक इसके माहात्म्य से अवश्य ही समस्त प्राणियों की मित्रता और उनके स्वामित्व को प्राप्त होता है ॥५॥ खोटा उपदेश देकर दूसरों को धोखा देना, निरर्थक आरंभ और प्राणहिंसा में प्रवृत्ति करना, घोड़ों आदि पर अधिक बोझा लादना और अधिक कष्ट देना ये पाँच कार्य अनर्थदंडविरतिव्रत को नष्ट करते हैं ॥६॥ आत्मा की उन्नति चाहने वाले श्रावकों को ईश्वर भक्ति का उपदेश ‘समय’ कहलाता है एवं उसमें निर्धारित क्रियाकाण्ड (प्रस्तावना और पुराकर्म आदि) को शास्त्रकारों ने ‘सामायिक’ कहा है ॥२॥ लोक में साक्षात् ईश्वर-तीर्थंकर के न होने पर भी उनकी मूर्ति की पूजा पुण्यबंध के लिए होती है। क्या गरुड़ की मूर्ति सर्प के विष की मारण शक्ति को नष्ट नहीं करती ? अवश्य करती है ॥३॥ जो व्यक्ति देवपूजा और साधुओं की सेवा न करके गृहस्थ होता हुआ भोजन करता है वह उत्कृष्ट अज्ञानांधकार का भक्षण करता है ॥४॥ उपवास के दिन उसे स्नान, गंध, अंगसंस्कार, वस्त्राभूषण और स्त्री में आसक्ति न करके समस्त पाप क्रियाओं का त्यागकर चारित्र पालन करने में तत्पर रहना चाहिए ॥२॥ क्योंकि जो पुरुष बहुत आरम्भ में प्रवृत्ति करता है उसका कायक्लेश हाथी के स्नान की तरह निष्फल है ॥३॥ कायक्लेश (उपवासादि) के बिना आत्मा की विशुद्धि नहीं होती। क्या लोक में सुवर्णपाषाण की विशुद्धि के लिए अग्नि को छोड़कर अन्य कोई साधन है? अर्थात् नहीं है ॥४॥ जो पुण्यशाली पुरुष अपने चित्त को चरित्र पालन द्वारा पवित्र बनाता है उसने अपने कर कमलों में चिन्तामणि रत्न प्राप्त कर लिया और दुःखरूपी वृक्ष को जलाने के लिए दावानल अग्नि प्राप्त कर ली ॥५॥ धार्मिक मनुष्य को अपने चित्त की तृष्णा की निवृत्ति के लिए उनका परिमाण करना चाहिए और प्राप्त और योग्य भोगोपभोग सामग्री के सेवन का नियम समय की मर्यादा से कर लेना चाहिए ॥२॥ यावज्जीवन और परिमितकाल पर्यन्त त्याग को क्रम से यम और नियम कहते हैं ॥३॥ इस व्रत को पालन करने वाले पुरुष को इस लोक में लक्ष्मी और परलोक में स्वर्गश्री प्राप्त होती है और पश्चात् मुक्तिश्री भी दूर नहीं रहती ॥४॥


अब ३ गुणव्रतों का निरूपण करते हैं / अब अनर्थदंडव्रत का निरूपण करते हैं / अब चार शिक्षाव्रतों का निरूपण करते हैं / अब प्रोषधोपवास का निरूपण करते हैं


अधर्मः पुनरेतद्विपरीतफलः ॥२॥

अर्थ: जो दुष्कर्म (मिथ्यात्व, अज्ञान और असंयम-मद्यपानादि) प्राणियों को स्वर्ग और मोक्ष से विपरीत फल-नरक और तिर्यंच गति के भयानक दुःख उत्पन्न करते हैं उन्हें अधर्म कहा है।


आत्मवत् परत्र कुशलवृत्तिचिन्तनं शक्तितस्त्यागतपसी च धर्माधिगमोपायाः ॥३॥

अर्थ: अपने समान दूसरे प्राणियों का हित चिंतन करना, शक्तिपूर्वक पात्रों को दान देना और शक्तिपूर्वक तपश्चर्या (समस्त इन्द्रियों तथा मन की लालसा को रोकना) करना ये धर्म प्राप्ति के उपाय हैं-इनके अनुष्ठान करने से विवेकी मनुष्य का जीवन आदर्श और धार्मिक हो जाता है ॥३॥ नीतिकार शुक्र ने१ लिखा है कि विवेकी मनुष्य को अपने धन के अनुसार दान करना चाहिए जिससे उसके कुटुम्ब को पीड़ा न होने पावे ॥१॥ जो मूर्ख मनुष्य कुटुम्ब को पीड़ा पहुँचाकर शक्ति से बाहर दान करता है उसे धर्म नहीं कहा जा सकता किन्तु वह पाप है; क्योंकि उससे दान करने वाले को अपना देश छोड़ना पड़ता है ॥२॥ यथाशक्ति तप करने के विषय में गुरु नाम का विद्वान् लिखता है कि “जो मनुष्य अपने शरीर को कष्ट पहुँचाकर व्रतों का पालन करता है उसकी आत्मा सन्तुष्ट नहीं होती। इसलिए उसे आत्म सन्तोष के अनुकूल तपश्चर्या करनी चाहिए’ ॥३॥


सर्वसत्वेषु हि समता सर्वाचरणानां परमं चरणम् ॥४॥

अर्थ: समस्त प्राणियों में समताभाव रखना-उनकी रक्षा करना यह सभी सत्कर्तव्यों में सर्वश्रेष्ठ सत्कर्तव्य है। शास्त्रकारों ने लिखा है कि संसार में जितने भी दान, शील, जप और तप आदि पुण्य कार्य हैं उन सबमें समता (अहिंसा-प्राणिरक्षा) का स्थान सर्वश्रेष्ठ है; क्योंकि दयारूपी नदी के किनारे अन्य सर्वधर्म (दान और शीलादि) तृण और घास की तरह उत्पन्न होते हैं, इसलिए उसके सूख जाने पर अन्य धर्म किस प्रकार सुरक्षित रह सकते हैं ? नहीं रह सकते३। यशस्तिलक में४ लिखा है कि जीवदया को एक ओर रक्खा जावे और धर्म के सभी अवान्तर भेदों को दूसरी ओर स्थापित किया जावे, उनमें खेती के फल की अपेक्षा चिन्तामणिरत्न के फल की तरह जीवदया का ही विशेष फल होगा। जिस प्रकार चिन्तामणिरत्न मन में चिंतन किये हुए अभिलषित पदार्थ को देने में समर्थ होने के कारण खेती के फल (धान्यादि) की अपेक्षा पुष्कल फल देता है उसी प्रकार अहिंसा धर्म भी अन्य धर्म के अवान्तर भेदों की अपेक्षा विशेष फल (स्वर्गश्री और मुक्तिश्री के सुख) देता है ॥१॥ पूर्व में भी कहा जा चुका है कि अहिंसा धर्म के प्रभाव से मनुष्य दीर्घजीवी, भाग्यशाली, लक्ष्मीवान सुन्दर और कीर्तिमान होता है५ ॥२॥ अतः विवेकी पुरुष को सबसे पहले पूर्वोक्त मानसिक, वाचनिक और कायिक असंयम-


न खलु भूतद्रु हां कापि क्रिया प्रसूते श्रेयांसि ॥५॥

अर्थ: प्राणियों की हिंसा करने वाले-निर्दयी पुरुषों की कोई भी पुण्य क्रिया कल्याणों को उत्पन्न नहीं करती-निर्दयी पुरुष कितनी भी शुभ-क्रियाएँ करते हों तथापि उनसे उनका कल्याण नहीं हो सकता ॥५॥


परत्राजिघांसुमनसां व्रतरिक्तमपि चित्तं स्वर्गाय जायते॥ ६॥

अर्थ: दूसरे प्राणियों की रक्षा करने वाले (दयालु) पुरुषों का चित्त व्रतरहित होकर के भी स्वर्ग के सुखों को उत्पन्न करने में समर्थ होता है-जो धार्मिक पुरुष प्राणियों की रक्षा करने में तत्पर रहते हैं वे दूसरे व्रत और नियम वगैरह न भी पालते हों तो भी उन्हें स्वर्ग के मनोज्ञ सुख प्राप्त होते हैं ॥६॥


स खलु त्यागो देशत्यागाय यस्मिन् कृते भवत्यात्मनो दौःस्थ्यम् ॥७॥

अर्थ: जिस दान के करने से दाता के समस्त कुटुम्बीजन दरिद्र होकर दुःखी हो जाते हैं वह दान उसको देश त्याग कराने के लिए है।


स खल्वर्थी परिपन्थी यः परस्य दौःस्थित्यं जानन्नप्यभिलषत्यर्थम् ॥८॥

अर्थ: जो याचक दूसरे की दरिद्रता को जानता हुआ भी उससे याचना करता है-अपने लिए धनादि माँगता है वह उसका निश्चय से शत्रु है; क्योंकि उस याचक से उस दरिद्र दाता को पीड़ा होती है, इसलिए वह भिक्षुक उस दरिद्र व्यक्ति का शत्रु हुआ।


तद्व्रतमाचरितव्यं यत्र न संशयतुलामारोहतः शरीरमनसी ॥९॥

अर्थ: नैतिक पुरुष को ऐसे व्रत नियम करने चाहिए जिनसे उसके शरीर और मन क्लेशित न हों।


ऐहिकामुष्मिकफलार्थमर्थव्ययस्त्यागः ॥१०॥

अर्थ: इस लोक और परलोक संबंधी सुखों की प्राप्ति के लिए पात्रों को धनादिक का देना त्याग धर्म है।


भस्मनि हुतमिवापात्रेष्वर्थव्ययः ॥११॥

अर्थ: अपात्र-(नीति और धर्म से शून्य) व्यक्ति को दान देना भस्म (राख) में हवन करने के समान निष्फल है ॥११॥


पात्रं च त्रिविधं धर्मपात्रं कार्यपात्रं कामपात्रं चेति ॥१२॥

अर्थ: पात्रों (दान देने योग्य) के ३ भेद हैं-धर्मपात्र, कार्यपात्र और कामपात्र।


एवं कीर्तिपात्रमपीति केचित् ॥१३॥

अर्थ: कुछ नीतिकारों ने उक्त पात्रों के सिवाय कीर्तिपात्र (जिसको दान देने पर दाता की संसार में कीर्ति हो) को भी दान देने योग्य पात्र बताया है ॥१३॥


किं तया कीर्त्या या आश्रितान्न विभर्ति, प्रतिरुणद्धि वा धर्मं भागीरथी-श्री-
पर्वतवद्भावानामन्यदेव प्रसिद्धेः कारणं न पुनस्त्यागः यतो न खलु गृहीतारो
व्यापिनः सनातनाश्च ॥१४॥

अर्थ: मनुष्य की उस कीर्ति से क्या लाभ है ? अर्थात् कोई लाभ नहीं है-वह निन्य है, जो अपने आश्रितों-अधीन में रहने वाले कुटुम्बियों तथा सेवकजनों का पालन नहीं करती और धर्म को रोकती है-नष्ट करती है। आशय यह है कि जो मनुष्य अपने अधीन रहने वालों का पालन पोषण तथा धर्म की रक्षा नहीं करता और ऊपरी नीति-विरुद्ध बातों में धन की बर्बादी करके कीर्ति भाजन बनता है उसकी वह कीर्ति निन्य समझनी चाहिए-अर्थात् वह अपकीर्ति है। संसार में गंगा, लक्ष्मी और पार्वती (पर्वत सम्बन्धी स्थान विशेष) की तरह पदार्थों की प्रसिद्धि का कारण दूसरा ही है सामान्य त्याग नहीं; क्योंकि दान लेने वाले पात्र लोग अत्यन्त प्रसिद्ध और सदा रहने वाले नहीं होते।


स खलु कस्यापि माभूदर्थो यत्रासंविभागः शरणागतानाम् ॥१५॥

अर्थ: जिस धन के द्वारा शरण में आये हुए आश्रितों का भरण पोषण नहीं किया जाता उस कृपण का धन व्यर्थ है ॥१५॥


अर्थिषु संविभागः स्वयमुपभोगश्चार्थस्य हि द्वे फले,
नास्त्यौचित्यमेकान्तलुब्धस्य ॥१६॥

अर्थ: सम्पत्ति के दो ही फल हैं। (१) पात्रों को दान देना और (२) स्वयं उपभोग करना। अतएव नैतिक पुरुष को निरन्तर लोभ करना उचित नहीं ॥१६॥


दानप्रियवचनाभ्यामन्यस्य हि सन्तोषोत्पादनमौचित्यम् ॥१७॥

अर्थ: दान और प्रिय वचनों के द्वारा दूसरों को सन्तुष्ट करना यह नैतिक मनुष्य का उचित सत्कर्त्तव्य है ॥१७॥


स खलु लुब्धो यः सत्सु विनियोगादात्मना सह जन्मान्तरेषु नयत्यर्थम् ॥१८॥

अर्थ: जो मनुष्य सज्जनों को दान देकर अपने साथ परलोक में धन ले जाता है, वही निश्चय से सच्चा लोभी है।


अदातुः प्रियालापोऽन्यस्य लाभस्यान्तरायः ॥१९ ॥

अर्थ: जो व्यक्ति याचक को कुछ नहीं देता केवल उससे मीठे वचन बोलता है वह उसे दूसरे स्थान में भिक्षा मिलने में विघ्न उपस्थित करता है; क्योंकि वह बेचारा उसके आश्वासन में फँसकर दूसरी जगह भिक्षा लेने नहीं जा सकता ॥१९॥


सदैव दुःस्थितानां को नाम बन्धुः ॥२०॥

अर्थ: सदा दरिद्र रहने वाले पुरुषों का लोक में कौन बन्धु है ? अर्थात् कोई नहीं।


नित्यमर्थ्यमानात् का नाम नोद्विजते ॥२१॥

अर्थ: सदा माँगने वाले याचक से कौन नहीं ऊब जाता ? सभी ऊब जाते हैं ॥२१॥


इन्द्रियमनसोर्नियमानुष्ठानं तपः ॥२२॥

अर्थ: पाँच इन्द्रिय (स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र) और मन को वश में करना या बढ़ती हुई लालसाओं को रोकना तप है ॥२२॥


विहिताचरणं निषिद्धपरिवर्जनं च नियमः ॥२३॥

अर्थ: सत्यार्थशास्त्र निरूपित सत्कर्त्तव्यों (अहिंसा और सत्य आदि) का पालन और शास्त्रनिषिद्ध दुष्कर्मों (हिंसा और मिथ्याभाषण आदि) का त्याग करना नियम है ॥२३॥


विधिनिषेधावैतिह्यायत्तौ ॥२४॥

अर्थ: विधि-कर्तव्य में प्रवृत्ति और निषेध-अकर्तव्य से निवृत्ति ये दोनों सत्यार्थ आगम (शास्त्र) के अधीन हैं अर्थात् यथार्थ वक्ता के कहे हुए आगम में जिन कर्तव्यों के करने का विधान बताया है विवेकी मनुष्य को उनमें प्रवृत्ति करनी चाहिए और उक्त आगम में जिनके करने का निषेध किया गया है उन्हें त्यागना चाहिए।


तत्खलु सद्भिः श्रद्धेयमैतिह्यं यत्र न प्रमाणवाधा पूर्वापरविरोधो वा ॥२५॥

अर्थ: जिसमें किसी भी प्रमाण से बाधा और पूर्वापर विरोध न पाया जाता हो, वही आगम शिष्टपुरुषों के द्वारा श्रद्धा करने योग्य-प्रमाण मानने योग्य है।


हस्तिस्नानमिव सर्वमनुष्ठानमनियमितेन्द्रियमनोवृत्तीनाम् ॥२६॥

अर्थ: जिनकी इन्द्रियाँ और मन काबू में नहीं हैं उनके समस्त सत्कार्य-दान, जप, तप और संयमादि हाथी के स्नान की तरह निष्फल हैं। जिस प्रकार हाथी स्नान करके पुनः अपने शरीर पर धूलि डाल लेता है अतएव उसका स्नान करना व्यर्थ है उसी प्रकार जो मनुष्य जितेन्द्रिय नहीं हैं उनके समस्त सत्कार्य व्यर्थ हैं; क्योंकि वे चंचलचित्त के कारण पुनः कुकार्यों के गर्त में गिर जाते हैं। ॥२६॥


दुर्भागाभरणमिव देहखेदावहमेव ज्ञानं स्वयमनाचरतः ॥२७॥

अर्थ: जो अनेक शास्त्रों का ज्ञाता विद्वान् हो करके भी शास्त्रविहित सदाचार-अहिंसा और सत्य भाषण आदि में प्रवृत्ति नहीं करता, उसका प्रचुरज्ञान विधवा स्त्री के आभूषण धारण करने के समान शारीरिक क्लेश को उत्पन्न करने वाला-व्यर्थ है। अर्थात् जिस प्रकार विधवा स्त्री का पति के बिना आभूषण धारण करना व्यर्थ है, उसी प्रकार नैतिक और धार्मिक सत्कर्तव्यों से पराङ्मुख रहने वाले विद्वान् का ज्ञान भी निष्फल है ॥२७॥


सुलभः खलु कथक इव परस्य धर्मोपदेशे लोकः ॥२८॥

अर्थ: दूसरों को धर्मोपदेश देने में कुशल पुरुष कथावाचकों के समान सुलभ हैं। जिस प्रकार स्वयं धार्मिक अनुष्ठान न करने वाले कथावाचक बहुत सरलता से मिलते हैं, उसी प्रकार स्वयं धार्मिक कर्तव्यों का पालन न करने वाले और केवल दूसरों को धर्मोपदेश देने वाले भी बहुत सरलता से मिलते हैं ॥२८॥


प्रत्यहं किमपि नियमेन प्रयच्छतस्तपस्यतो वा भवन्त्यवश्यं महीयांसः परे
लोकाः ॥२९॥

अर्थ: “जो धार्मिक पुरुष प्रत्येक दिन नियम से कुछ भी यथाशक्ति पात्रदान और तपश्चर्या करता है, उसे परलोक में स्वर्ग की उत्तमोत्तम सम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं’’ ॥२९॥


कालेन संचीयमानः परमाणुरपि जायते मेरुः ॥३०॥

अर्थ: तिलतुषमात्र-थोड़ी भी वस्तु (धर्म, विद्या और धनादि) प्रतिदिन चिरकाल तक संचयवृद्धि की जाने से सुमेरु पर्वत के समान महान् हो जाती है ॥३०॥


धर्मश्रुतधनानां प्रतिदिनं लवोऽपि संगृह्यमाणो भवति समुद्रादप्यधिकः ॥३१॥

अर्थ: धर्म, विद्या और धन का प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा भी संग्रह करने से समय पाकर ये समुद्र से भी अधिक हो जाते हैं ॥३१॥


धर्माय नित्यमनाश्रयमाणानामात्मवंचनं भवति४ ॥३२॥

अर्थ: जो व्यक्ति धर्म का आचरण नहीं करते वे अपनी आत्मा को ठगते हैं।


कस्य नामैकदैव सम्पद्यते पुण्यराशिः ॥३३॥

अर्थ: किसको एक ही समय में प्रचुर पुण्य समूह प्राप्त होता है ? नहीं होता ।


अनाचरतो मनोरथाः स्वप्नराज्यसमाः ॥३४ ॥३

अर्थ: उद्योगशून्य पुरुष के मनोरथ (मन में चितवन की हुई सुख की कामनाएँ) स्वप्न में राज्य मिलने के समान व्यर्थ होते हैं । जिस प्रकार स्वप्न में राज्य की प्राप्ति निरर्थक है उसी प्रकार उद्योग शून्य आलसी मनुष्य की सुख प्राप्ति की कामनाएँ भी व्यर्थ होती हैं ।


धर्मफलमनुभवतोऽप्य धर्मानुष्ठानमनात्मज्ञस्य ॥३५॥

अर्थ: जो मनुष्य धर्म के फल (मनुष्यजन्म, उच्चकुल, धनादि वैभव, दीर्घायु, विद्वत्ता और निरोगिता आदि) का उपभोग करता हुआ भी पापों में प्रवृत्ति करता है वह मूर्ख है।


कः सुधीर्भेषजमिवात्महितं धर्मं परोपरोधादनुतिष्ठति ॥३६॥

अर्थ: कौन बुद्धिमान पुरुष औषधि के समान अपनी आत्मा का कल्याण करने वाले धर्म का पालन दूसरों के आग्रह से करेगा ? नहीं करेगा।


धर्मानुष्ठाने भवत्यप्रार्थितमपि प्रातिलोम्य लोकस्य ॥३७॥

अर्थ: धर्मानुष्ठान करते समय मनुष्यों को अनिच्छित (बिना चाहे) विघ्न उपस्थित हो जाते हैं ॥३७॥


अधर्मकर्मणि को नाम नोपाध्यायः पुरश्चारी वा ॥३८॥

अर्थ: पाप कार्य में प्रवृत्ति करने वाले को कौन उपदेश देने वाला अथवा अग्रसर-अगुआ नहीं होता ? सभी होते हैं ॥३८॥


कण्ठगतैरपि प्राणै र्नाशुभं कर्म समाचरणीयं कुशलमतिभिः । ॥३८॥

अर्थ: बुद्धिमान पुरुषों को प्राणों के कण्ठगत-मरणोन्मुख होने पर भी पाप कार्य में प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिए, पुनः स्वस्थ अवस्था का तो कहना ही क्या है? अर्थात् विवेकी पुरुष स्वस्थ अवस्था में पापों में किस प्रकार प्रवृत्ति कर सकते हैं ? नहीं कर सकते ॥३९॥


स्वव्यसनतर्पणाय धूर्तैर्दुरीहितवृत्तयः क्रियन्ते श्रीमन्तः ॥४०॥

अर्थ: धूर्त लोग (ठग) अपने व्यसनों-खोटी आदतों की पूर्ति करने के लिए अथवा अपनी आपत्ति दूर करने के लिए धनाढ्यों को पाप मार्ग में प्रवृत्ति कराते हैं।


खलसंगेन किं नाम न भवत्यनिष्टम् ॥४१॥

अर्थ: दुष्टों की संगति से मनुष्य को कौन-कौन से कष्ट या पाप नहीं होते ? सभी होते हैं ॥४१॥


अग्निरिव स्वाश्रयमेव दहन्ति दुर्जनाः ॥४२॥

अर्थ: दुष्ट लोग अग्नि के समान अपने आश्रय-कुटुम्ब को भी नष्ट कर देते हैं। पुनः अन्य शिष्ट पुरुषों का तो कहना ही क्या है ? अर्थात् उन्हें अवश्य ही नष्ट करते हैं।


वनगज इव तदात्वसुखलुब्धः को नाम न भवत्यास्पदमापदाम् ? ॥४३॥

अर्थ: परस्त्रीसेवन के सुख का लोभी कौन पुरुष जंगली हाथी के समान आपत्तियों का स्थान नहीं होता ? अर्थात् सभी होते हैं।


धर्मातिक्रमाद्धनं परेऽनुभवन्ति, स्वयं तु परं पापस्य भाजनं सिंह इव
सिन्धुरवधात्॥४४॥

अर्थ: धर्म-न्याय का उल्लंघन करके संचित किये हुए धन को कुटुम्बीजन ही खाते हैं और कमाने वाला केवल पाप का ही भागी होता है। जैसे शेर हाथी का शिकार करता है उससे शृगाल वगैरह को ही भोजन मिलता है उसे कोई लाभ नहीं होता, वह केवल पाप का ही संचय करता है ॥४४॥


बीजभोजिनः कुटुम्बिन इव नास्त्यधार्मिकस्यायतयां किमपि शुभम्॥ ४५॥

अर्थ: बीज खाने वाले कुटुम्ब युक्त किसान की तरह पापी मनुष्य का उत्तरकाल-भविष्य में कुछ भी कल्याण नहीं होता। जिस प्रकार किसान यदि अपने खेत में बोने लायक संचित बीज राशि को खा जावे तो उसका भविष्य में कल्याण नहीं होता, क्योंकि बीजों के बिना उसके अन्न उत्पन्न नहीं होगा उसी प्रकार पापी भी सुख के कारण धर्म से विमुख रहता है अतएव उसका भी भविष्य में कल्याण नहीं हो सकता॥ ४५॥


यः कामार्थावुपहत्य धर्ममेवोपास्ते स पक्वक्षेत्रं परित्यज्यारण्यं कृषति॥ ४६॥

अर्थ: जो व्यक्ति काम-न्याय प्राप्त कामिनी आदि भोगोपभोग सामग्री और अर्थ-धनादि सम्पत्ति या उसके साधन कृषि और व्यापार आदि को छोड़कर केवल धर्म का ही सतत सेवन करता है वह पके हुए काटने योग्य धान्यादि के खेत को छोड़कर जंगल को जोतता है।


स खलु सुधीर्योऽमुत्र सुखाविरोधेन सुखमनुभवति॥ ४७॥

अर्थ: निश्चय से वही मनुष्य बुद्धिमान है जो पारलौकिक सुख का घात न करता हुआ सुखों का अनुभव करता है-न्याय प्राप्त भोगों को भोगता है।


इदमीह परमाश्चर्यं यदन्यायसुखलवादिहामुत्रचानवधिर्दुःखानुबन्धः॥ ४८॥

अर्थ: अन्याय के सुखलेश से मनुष्यों को ऐहिक और पारलौकिक निस्सीम-सीमारहित अनन्त दुःख भोगने पड़ते हैं परन्तु मूर्खों को इस का ज्ञान नहीं होता यह संसार में बड़े आश्चर्य की बात है।


सुखदुःखादिभिः प्राणिनामुत्कर्षापकर्षौ धर्माधर्मयोर्लिङ्गम् ॥४९॥

अर्थ: संसार में प्राणियों की सुख सामग्री-धनादि वैभव और विद्वत्ता आदि से उन्नति और दुःखसामग्री-दरिद्रता और मूर्खता आदि से अवनति देखी जाती है, वही उन्नति और अवनति उनके पूर्वजन्म में किये हुए धर्म और अधर्म का बोध कराती है अर्थात् लोक में प्राणियों की सुखसामग्री उनके पूर्वजन्मकृत धर्म का और दुःखसामग्री अधर्म का निश्चय कराती हैं।


किमपि हि तद्वस्तु नास्ति यत्र नैश्वर्यमदृष्टाधिष्ठातुः ॥५०॥

अर्थ: निश्चय से संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसे भाग्यशाली प्राप्त न कर सकता है।

(२) अर्थसमुद्देशः

यतः सर्वप्रयोजनसिद्धिः सोऽर्थः ॥१॥

अर्थ: जिससे मनुष्यों के सभी प्रयोजन-लौकिक और पारलौकिक सुख आदि कार्य सिद्ध हों उसे अर्थ-धन कहते हैं।


सोऽर्थस्य भाजनं योऽर्थानुबन्धेनार्थमनुभवति॥२॥

अर्थ: जो मनुष्य सदा सम्पत्तिशास्त्र के सिद्धान्त के अनुसार-अर्थानुबन्ध-(व्यापारादि साधनों से अविद्यमान धन का संचय, संचित की रक्षा और रक्षित की वृद्धि करना) से धन का अनुभव करता है उसके संचय आदि में प्रवृत्ति करता है वह उस का पात्र-स्थान होता है-धनाढ्य हो जाता है।


अलब्धलाभो लब्धपरिरक्षणं रक्षितपरिवर्द्धनं चार्थानुबन्धः ॥ ३ ॥

अर्थ: व्यापार और राज्यशासन आदि में किये जानेवाले साम, दाम, दंड और भेद आदि उपायों से अविद्यमान धन का कमाना और प्राप्त किये हुए धन की रक्षा करना (पात्रदानपूर्वक कौटुम्बिक निर्वाह करना, परोपकार करते हुए निरर्थक धन को बर्बाद न करना, आमदनी के अनुकूल खर्च करना और चोरों से बचाना आदि) और रक्षा किये हुए धन की ब्याज आदि से वृद्धि करना यह अर्थानुबन्ध है।


तीर्थमर्थैनासंभावयन् मधुच्छत्रमिव सर्वात्मना विनश्यति॥ ४॥

अर्थ: जो लोभी पुरुष अपने धन से तीर्थों-पात्रों का सत्कार नहीं करता-उन्हें दान नहीं देता उस का धन शहद के छत्ते के समान बिल्कुल नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार शहद की मक्खियाँ चिरकाल तक पुष्पों से शहद इकट्ठा करती हैं और भौरों को नहीं खाने देतीं, इसलिए उन का शहद भील लोग छत्ते को तोड़कर ले जाते हैं उसी प्रकार लोभी के धन को भी चोर और राजा वगैरह छीन लेते हैं।


धर्मसमवायिनः कार्यसमवायिनश्च पुरुषास्तीर्थम्॥ ५॥

अर्थ: धार्मिक कार्यों में सहायक-त्यागी व्रती और विद्वान् पुरुषों और व्यवहारिक कार्यों में सहायक सेवकजनों को तीर्थ कहते हैं।


तादात्विक-मूलहर-कदर्येषु नासुलभः प्रत्यवायः॥ ६॥

अर्थ: तादात्विक (जो व्यक्ति बिना सोचे समझे आमदनी से भी अधिक धन खर्च करता है) मूलहर (पैतृक सम्पत्ति को उड़ाने वाला और बिल्कुल न कमाने वाला) और कदर्य (लोभी) इन तीनों प्रकार के मनुष्यों का धन नष्ट हो जाता है ॥६॥


यः किमप्यसंचिन्त्योत्पन्नमर्थं व्ययति स तादात्विकः ॥७॥

अर्थ: जो मनुष्य कुछ भी विचार न कर के कमाए हुए धन का अपव्यय-निष्प्रयोजन खर्च करता है उसे ‘तादात्विक’ कहते हैं अर्थात् जो यह नहीं सोचता कि मेरी इतनी आय है अतएव मुझे आवश्यक प्रयोजनीभूत और आमदनी के अनुकूल खर्च करना चाहिए परन्तु बिना सोचे समझे आमदनी से अधिक धन का अपव्यय करता है उसे तादात्विक कहते हैं ॥७॥


यः पितृपैतामहमर्थमन्यायेन भक्षयति स मूलहरः ॥८॥

अर्थ: जो व्यक्ति अपने पिता और पितामह (पिता के पिता) की सम्पत्ति को अन्याय (जुआ और वेश्यासेवन आदि) से भक्षण करता है-खर्च करता है और नवीन धन बिल्कुल नहीं कमाता उसे ‘मूलहर’ कहते हैं। ॥८॥


यो भृत्यात्मपीडाभ्यामर्थं संचिनोति स कदर्यः ॥९॥

अर्थ: जो व्यक्ति सेवकों तथा अपने को कष्ट पहुँचाकर धन का संचय करता है उसे कदर्य-लोभी कहते हैं।


तादात्विकमूलहरयोरायत्यां नास्ति कल्याणम् ॥१०॥

अर्थ: तादात्विक और मूलहर मनुष्यों का भविष्य में कल्याण नहीं होता।


कदर्यस्यार्थसंग्रहो राजदायादतस्कराणामन्यतमस्य निधिः ॥११॥

अर्थ: लोभी का संचित धन राजा, कुटुम्बी और चोर इन में से किसी एक का है।

(३) कामसमुद्देशः

आभिमानिकरसानुविद्धा यतः सर्वेन्द्रियप्रीतिः स कामः ॥१॥

अर्थ: जिससे समस्त इन्द्रियों (स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र और मन) में बाधारहित प्रीति उत्पन्न होती है उसे काम कहते हैं।


धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत ततः २ सुखी स्यात् ॥२॥

अर्थ: नैतिक व्यक्ति धर्म और अर्थ की अनुकूलतापूर्वक-सुरक्षा करता हुआ कामसेवन करे उससे सुखी होता है, अन्यथा नहीं ॥१॥


समं वा त्रिवर्गं सेवेत ॥३॥

अर्थ: अथवा नैतिक व्यक्ति धर्म, अर्थ और काम इन तीनों पुरुषार्थों को समय का समान विभाग करके सेवन करे।


एकोह्यत्यासेवितो धर्मार्थकामानामात्मानमितरौ च पीडयति ॥४॥

अर्थ: जो मनुष्य धर्म, अर्थ और काम इन तीनों पुरुषार्थों में से केवल एक को ही निरन्तर सेवन करता है और दूसरे को छोड़ देता है वह केवल उसी पुरुषार्थ की वृद्धि करता है और दूसरे पुरुषार्थों को नष्ट कर डालता है।


परार्थं भारवाहिन इवात्मसुखं निरुन्धानस्य धनोपार्जनम् ॥५॥

अर्थ: जो मनुष्य अपने सुख को छोड़कर-अत्यन्त कष्टों को सहकर धनसंचय करता है वह दूसरों के भार को ढोने वाले मनुष्य या पशु की तरह केवल दुःखी ही रहता है अर्थात् जिस प्रकार कोई मनुष्य या पशु दूसरों के भार-धान्यादि बोझ को धारण कर ले जाता है किन्तु उसे कोई लाभ नहीं होता; क्योंकि वह उसे अपने उपयोग (भक्षण आदि) में नहीं लाता, उसी प्रकार अनेक कष्टों को सहन करके धन कमाने वाला मनुष्य भी दूसरों के लिए कष्ट सहता है परन्तु उस सम्पत्ति का स्वयं उपभोग नहीं करता, अतएव उसे कोई सुख नहीं होता।


इन्द्रियमनःप्रसादनफला हि विभूतयः ॥६॥

अर्थ: समस्त इन्द्रियों (स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र) तथा मन को प्रसन्न करना सुखी करना यही सम्पत्तियों का फल है। अर्थात् जिस सम्पत्ति से धनिक व्यक्तियों की सभी इन्द्रियों और मन में आह्लाद-सुख उत्पन्न हो वही सम्पत्ति है।


नाजितेन्द्रियाणां काऽपि कार्यसिद्धिरस्ति ॥७॥

अर्थ: जिनकी इन्द्रियाँ वश (काबू) में नहीं हैं उन्हें किसी भी कार्य में थोड़ी भी सफलता नहीं मिलती-उनके कोई भी सत्कार्य सिद्ध नहीं हो सकते।


इष्टेऽर्थेऽनासक्तिर्विरुद्धे चाप्रवृत्तिरिन्द्रियजयः ॥८॥

अर्थ: इष्टपदार्थ-प्रियवस्तु (कमनीय कान्ता आदि) में आसक्ति न करने वाले और विरुद्ध शिष्टाचार और प्रकृति से प्रतिकूल वस्तु में प्रवृत्त न होने वाले व्यक्ति को जितेन्द्रिय कहते हैं।


अर्थशास्त्राध्ययनं वा ॥९॥

अर्थ: मनुष्य को इन्द्रियों के जय करने के लिए नीतिशास्त्र का अध्ययन करना चाहिए। अथवा नीतिशास्त्र का अध्ययन ही इन्द्रियाँ का जय-वश में करना है।


कारणे कार्योपचारात् ॥१०॥

अर्थ: कारण में कार्य का उपचार (मुख्यता न होने पर भी किसी प्रयोजन या निमित्त के वश वस्तु में मुख्य की कल्पना करना) करने से नीतिशास्त्र के अध्ययन को ही ‘इन्द्रियजय’ कहा गया है।


योऽनङ्गेनापि जीयते स कथं पुष्टाङ्गनरातीन् जयेत् ॥११॥

अर्थ: जो व्यक्ति काम से जीता जाता है-काम के वशीभूत है वह राज्य के अंगों-स्वामी, अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष और सेना आदि से शक्तिशाली शत्रुओं पर किस प्रकार विजय प्राप्त कर सकता है ? नहीं कर सकता।


कामासक्तस्य नास्ति चिकित्सितम् ॥१२॥

अर्थ: कामी पुरुष को सन्मार्ग पर लाने के लिए लोक में कोई औषधि (काम को छुड़ाने वाला हितोपाय) नहीं है; क्योंकि वह हितैषियों के हितकारक उपदेश को अवहेलना-तिरस्कार या उपेक्षा करता हैं ॥१२॥


न तस्य धनं धर्मः शरीरं वा यस्यास्ति स्त्रीष्वत्यासक्तिः ॥१३॥

अर्थ: स्त्रियों में अत्यन्त आसक्ति करने वाले पुरुष का धन, धर्म और शरीर नष्ट हो जाता है।


विरुद्धकामवृत्तिः समृद्धोऽपि न चिरं नन्दति ॥१४॥

अर्थ: जो मनुष्य नीतिशास्त्र से विरुद्ध कामसेवन में प्रवृत्त होता है-परस्त्री और वेश्यासेवन आदि अन्याय के भोगों में प्रवृत्ति करता है वह पूर्व में धनाढ्य होने पर भी पश्चात् चिरकाल तक धनाढ्य नहीं हो सकता-सदा दरिद्रता के कारण दुःखी रहता है।


धर्मार्थकामानां युगपत्समवाये पूर्वः पूर्वो गरीयान् ॥१५॥

अर्थ: एककाल में कर्तव्यरूप से प्राप्त हुए धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थों में से पूर्व का पुरुषार्थ ही श्रेष्ठ है।


कालासहत्वे पुनरर्थ एव ॥१६॥

अर्थ: समय (जीविकोपयोगी व्यापार आदि का काल) का सहन न होने से दूसरे धर्म और कामपुरुषार्थ की अपेक्षा अर्थपुरुषार्थ (न्याय से जीविकोपयोगी व्यापार और कृषि आदि साधनों द्वारा धन का संचय करना) का अनुष्ठान करना ही श्रेष्ठ है।


धर्म कामयोरर्थमूलत्वात् ॥१७॥

अर्थ: धर्म और काम पुरुषार्थ का मूल कारण अर्थ है अर्थात् बिना अर्थ (धन) के धर्म और कामपुरुषार्थ प्राप्त नहीं हो सकते ॥१७॥

(४) अरिषड्वर्ग-समुद्देशः

अयुक्तितः प्रणीताः काम-क्रोध-लोभ-मद-मान-हर्षाः
क्षितीशानामन्तरङ्गोऽरिषड्वर्गः ॥१॥

अर्थ: अन्याय से किये गये काम, क्रोध, लोभ, मद, मान और हर्ष ये राजाओं के ६ अंतरंग शत्रुसमूह हैं ॥१॥


परपरिगृहीतास्वनूढासु च स्त्रीषु दुरभिसन्धिः कामः ॥२॥

अर्थ: परस्त्रियों, वेश्याओं और कन्याओं से विषयभोग करना यह कामशत्रु प्राणियों को महादुःखदायक है।


अविचार्य परस्यात्मनो वापायहेतुः क्रोधः ॥३॥

अर्थ: जो व्यक्ति अपनी और शत्रु की शक्ति को न जानकर क्रोध करता है, वह क्रोध उसके विनाश का कारण है।


दानार्हेषु स्वधनाप्रदानं परधनग्रहणं वा लोभः ॥४॥

अर्थ: दान करने योग्य धर्मपात्र और कार्यपात्र आदि को धन न देना तथा चोरी, छलकपट और विश्वासघात आदि अन्यायों से दूसरों की संपत्ति को ग्रहण (हड़प) करना लोभ है॥ ४॥


दुरभिनिवेशामोक्षो यथोक्ताग्रहणं वा मानः ॥५॥

अर्थ: शिष्टाचार से विरुद्ध प्रवृत्ति को न छोड़ना-पापकार्यों में प्रवृत्ति करना तथा आप्त-हितैषी पुरुषों की शास्त्रविहित बात को न मानना इसे मान कहते हैं॥५॥


कुलबलैश्वर्यरूपविद्यादिभिरात्माहंकारकरणं परप्रकर्षनिबन्धनं वा मदः ॥६॥

अर्थ: जो अपने कुल, बल, ऐश्वर्य, रूप और विद्या आदि के द्वारा अहंकार (मद) करना, अथवा दूसरों की वृद्धि-बढ़ती को रोकना, उसे मद कहते हैं॥ ६॥


निर्निमित्तमन्यस्य दुःखोत्पादनेन स्वस्यार्थसंचयेन वा मनःप्रतिरञ्जनो हर्षः ॥७॥

अर्थ: बिना प्रयोजन दूसरों को कष्ट पहुँचाकर मन में प्रसन्न होना या इष्ट वस्तु-धनादि की प्राप्ति होने पर मानसिक प्रसन्नता का होना हर्ष है।

(५) विद्यावृद्ध-समुद्देशः

योऽनुकूलप्रतिकूलयोरिन्द्रयमस्थानं स राजा ॥१॥

अर्थ: जो अनुकूल चलने वालों (राजकीय आज्ञा मानने वालों) की इन्द्र के समान रक्षा करता है तथा प्रतिकूल चलने वालों-अपराधियों को यमराज के समान सजा देता है उसे राजा कहते हैं ॥१॥


राज्ञो हि दुष्टनिग्रहः शिष्टपरिपालनं च धर्मः॥ २॥

अर्थ: पापियों-अपराधियों को सजा देना और सज्जन पुरुषों की रक्षा करना, राजा का धर्म है ॥२॥


न पुनः शिरोमुण्डनं जटाधारणादिकम्॥ ३॥

अर्थ: शिर मुड़ाना और जटाओं का धारण करना आदि राजा का धर्म नहीं।


राज्ञः पृथ्वीपालनोचितं कर्म राज्यं ॥४॥

अर्थ: राजा का पृथ्वी की रक्षा के योग्य कर्म-षाड्गुण्य (संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभाव) को राज्य कहते हैं।


वर्णाश्रमवती धान्यहिरण्यपशुकुप्यवृष्टिप्रदानफला च पृथ्वी ॥५॥

अर्थ: वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र और आश्रमों-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति से युक्त तथा धान्य, सुवर्ण, पशु और ताँबा लोहा आदि धातुओं को प्रचुर मात्रा में देने वाली पृथिवी को राज्य कहते हैं परन्तु जिसमें ये बातें न पाई जावें वह राज्य नहीं।


ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राश्च वर्णाः२॥ ६॥

अर्थ: वर्ण चार हैं-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।


ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो यतिरित्याश्रमाः ॥७॥

अर्थ: ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति ये चार आश्रम हैं ॥७॥


स उपकुर्वाणको ब्रह्मचारी यो वेदमधीत्य स्नायात् ॥८॥

अर्थ: जो वेद-अहिंसाधर्म का निरूपण करने वाले-निर्दोष शास्त्र-पढ़कर विवाह संस्कार करता है उसे उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी कहते हैं ॥८॥


स्नानं विवाहदीक्षाभिषेकः ॥९॥

अर्थ: विवाह संस्कार रूप दीक्षा से अभिषिक्त होना स्नान है॥९॥


स नैष्ठिको ब्रह्मचारी यस्य प्राणान्तिकमदारकर्म ॥१०॥

अर्थ: जो जीवन पर्यन्त विवाह न करके कामवासना से विरक्त रहता है उसे नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहते हैं।


य उत्पन्नः पुनीते वंशं स पुत्रः ॥११॥

अर्थ: जो उत्पन्न होकर नैतिक सदाचाररूप प्रवृत्ति से अपने कुल को पवित्र करता है वही सच्चा पुत्र है।


कृतोद्वाहः ऋतुप्रदाता कृतपदः ॥१२॥

अर्थ: जो विवाहित होकर केवल सन्तान की प्राप्ति के लिए ऋतुकाल-चतुर्थ दिन में स्नान करने के पश्चात् रात्रि-में स्त्री का उपभोग करता है उसे ‘कृतपद’ ब्रह्मचारी कहते हैं ।॥१२॥


अपुत्रः ब्रह्मचारी पितृणामृणभाजनम् ॥१३॥

अर्थ: नैष्ठिक ब्रह्मचारी-बालब्रह्मचारी-को छोड़कर दूसरे ब्रह्मचारी पुत्र के बिना अपने पिताओं के ऋणी रहते हैं।


अनध्ययनो ब्रह्मणः ॥१४॥

अर्थ: जो मनुष्य शास्त्र का अध्ययन नहीं करता वह आदिब्रह्मा-ऋषभदेव तीर्थंकर का ऋणी है।


अयजनो देवानाम् ॥१५॥

अर्थ: जो मनुष्य देवों-ऋषभादि महावीरपर्यन्त चौबीस तीर्थंकरों-की भक्ति-पूजा-नहीं करता वह उनका ऋणी है।


अहन्तकरो मनुष्याणाम् ॥१६॥

अर्थ: दूसरों को शोक उत्पन्न न करने वाला मनुष्यों का ऋणी है-अर्थात् जिस की मृत्यु हो जाने पर भी जनता को किञ्चिन्मात्र-थोड़ा-सा भी-शोक उत्पन्न न हो वह मनुष्य जाति का ऋणी है। अथवा इस सूत्र का यह अर्थ भी हो सकता है कि जो मनुष्य दूसरों को दुःखी देखकर ‘हन्त’ इस प्रकार खेद सूचक शब्द प्रकट नहीं करता-दूसरों के दुःख में संवेदना प्रकट नहीं करता-वह मनुष्यों का ऋणी है।


आत्मा वै पुत्रो नैष्ठिकस्य ॥१७॥

अर्थ: नैष्ठिक ब्रह्मचारी का आत्मा ही पुत्र समझा जाता है।


अयमात्मात्मानमात्मनि संदधानः परां पूततां सम्पद्यते ॥१८॥

अर्थ: यह नैष्ठिक ब्रह्मचारी-आत्मा के द्वारा आत्मा को आत्मस्वरूप में प्रत्यक्ष करता हुआ अत्यन्त विशुद्धि को प्राप्त करता है ॥१८॥ जो व्यक्ति शास्त्रविहित नित्य अनुष्ठान-सत्कर्तव्य (१. इज्या-तीर्थंकर और महर्षियों की पूजाभक्ति, २. वार्ता-न्यायवृत्ति से असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन जीविकोपयोगी कार्यों को करना, ३. दत्ति-दयादत्ति, पात्रदत्ति, समदत्ति और अन्वयद्ति, ४. स्वाध्याय निर्दोष शास्त्रों का अध्ययन मनन आदि, ५ संयम-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और तृष्णा का त्याग, इन व्रतों का पालन करना तथा ६ तप-अनशन आदि तप करना) और नैमित्तिक अनुष्ठान (वीर जयन्ती आदि निमित्त को लेकर किये जाने वाले धार्मिक प्रभावना आदि सत्कार्य) का पालन करता है उसे गृहस्थ कहा है ॥१८॥ प्रत्येक दिन करने योग्य हैं ॥१॥ जो मानव क्षमा रूप स्त्री में आसक्त, सम्यग्ज्ञान और अतिथियों-पात्रों- में अनुरागयुक्त और जितेन्द्रिय है उसे गृहस्थ कहते हैं॥ २॥ निष्कर्ष-ऐहिक और पारलौकिक सुख चाहने वाले गृहस्थ व्यक्ति को उक्त नित्य और नैमित्तिक सत्कर्त्तव्यों के पालन करने में सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए ॥१६॥


ब्रह्मदेवपित्रतिथिभूतयज्ञा हि नित्यमनुष्ठानम्॥२०॥

अर्थ: ब्रह्मयज्ञ-ब्रह्मर्षिगणधरों की पूजा, देवयज्ञ-ऋषभादि महावीरपर्यन्त तीर्थंकर देवों का स्नपन, पूजन, स्तुति, जप और ध्यान आदि, पितृयज्ञ-माता पिता की आज्ञा का पालन और उनकी सेवा शुश्रूषा आदि, अतिथियज्ञ-अतिथि सत्कार और भूतयज्ञ-प्राणीमात्र की सेवा करना ये गृहस्थ के नित्य करने योग्य सत्कार्य हैं ॥। २०॥


दर्शपौर्णमास्याद्याश्रयं नैमित्तिकम् ॥२१॥

अर्थ: अमावस्या और पूर्णमासी आदि शुभतिथियों में किये जाने वाले धार्मिक उत्सव आदि प्रशस्त कार्यों को नैमित्तिक अनुष्ठान कहते हैं।


वैवाहिकः शालीनो यायावरोऽघोरो गृहस्थाः ॥२२॥

अर्थ: गृहस्थ चार प्रकार के हैं-वैवाहिक, शालीन, यायावर और अघोर ॥२२॥


यः खलु यथाविधि जनपदमाहारं संसारव्यवहारं च परित्यज्य सकलत्रोऽकलत्रो
वा वने प्रतिष्ठते स वानप्रस्थः ॥२३॥

अर्थ: जो शास्त्र की आज्ञा के अनुसार लौकिक आहार-नागरिक या ग्रामीण पुरुषों का अन्न आदि का तथा सांसारिक व्यवहार-गाय, भैंस पुत्र और पौत्रादि-का त्याग करके स्त्रीसहित या स्त्रीरहित होकर वन को प्रस्थान करता है उसे वानप्रस्थ कहते हैं।


वालिखिल्य औदम्बरी वैश्वानराः सद्यःप्रक्षाल्यकश्चेति वानप्रस्थाः ॥२४॥

अर्थ: वानप्रस्थ चार प्रकार के हैं:- वालिखिल्य, औदम्बरी, वैश्वानर और सद्यःप्रक्षाल्यक । जो प्राचीन गार्हपत्य अग्नि को त्यागकर केवल अरणी-समिधविशेष-को साथ ले जाकर बिना स्त्री के वन को प्रस्थान करता है वह वन में रहने वाला ‘वालिखिल्य’ है ॥१॥ जो स्त्री सहित वन में रहकर पाँचों अग्नियों से विधिपूर्वक पाँच यज्ञ-पितृयज्ञ, देवयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, अतिथियज्ञ और ऋषियज्ञ- करता है उसे विद्वानों ने ‘औदुम्बर’ कहा है ॥२॥ जो यज्ञपूर्वक त्रिकाल स्नान करता है और अतिथियों की पूजा करके-उन्हें खिलाकर-कंदमूल और फलों का भक्षण करता है वह ‘वैश्वानर’ कहा गया है ॥३॥ जो केवल खाने मात्र को धान्य विशेष और घृत का संग्रह करता है और अग्नि की पूजा करता है उसे ‘सद्यःप्रक्षालक’ कहते हैं ॥२४॥


यो देह मात्रारामः सम्यग्विद्यानौलाभेन तृष्णासरित्तरणाय योगाय यतते
यतिः॥२५॥

अर्थ: जो शरीर मात्र से अपनी आत्मा को सन्तुष्ट रखता है-शरीर के सिवाय दूसरे बहिरङ्ग-धन-धान्यादि और अंतरंग-काम-क्रोधादि-परिग्रह का त्याग किए हुए है एवं सम्यग्ज्ञानरूपी नौका की प्राप्ति से तृष्णारूपी नदी को पार करने के लिए ध्यान करने का प्रयत्न करता है उसे ‘यति’ कहते हैं। कृष्यादि आरंभ और बहिरङ्ग (धन-धान्यादि) एवं अन्तरंग-क्रोधादि-परिग्रह का त्यागी होकर ज्ञान, ध्यान और तपश्चर्या में लीन रहता है उसे यति-तपस्वी-कहते हैं ॥१॥ इसी के जितेन्द्रिय, क्षपणक, आशाम्बर, नग्न, ऋषि, यति, तपस्वी और अनगार आदि अपने गुणनष्पन्न-सार्थक-नाम यशस्तिलक में आचार्यश्री ने व्यक्त किये हैं परन्तु विस्तार के भय से हम उनका संकलन करना नहीं चाहते ॥२५॥


कुटीचरवह्वोदकहंसपरमहंसा यतयः ॥२६॥

अर्थ: यति-साधु-चार प्रकार के होते हैं-कुटीचर, वह्वोदक, हंस और परमहंस। जो त्रिदण्डी (ऐसे दंड विशेष को धारण करने वाला जिसमें चोटी और जनेऊ बँधे हुए हों अथवा न भी बँधे हों), शिर पर केवल चोटी रखने वाला, यज्ञोपवीत-जनेऊ-का धारक, झोपड़ी में रहने वाला और जो एकबार पुत्र के मकान पर स्नान करता हो तथा झोपड़ी में निवास करता हो उसे ‘कुटीचर’ कहते हैं ॥१॥ जो झोपड़ी में रहकर गोचरीवृत्ति से आहार करता हो और विष्णु की जाप जप ने में तत्पर हो उसे ‘वह्वोदक’ कहते हैं ॥२॥ जो गाँवों में एक रात और शहरों में तीन रात तक निवास करता हो और धूप और अग्नि से शून्य ब्राह्मणों के मकानों में जाकर थाली आदि में या हस्तपुट में स्थापित किये हुए आहार को ग्रहण करता हो एवं जिसे शरीर और इन्द्रियादि प्रकृति से भिन्न पुरुष तत्त्व-आत्मतत्त्व-का बोध उत्पन्न हुआ हो उसे ‘हंस’ समझना चाहिए ॥३॥ जो अपनी इच्छा से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों का गोचरीवृत्ति से आहार ग्रहण करता हो, दंड विशेष का धारक, समस्त कृषि और व्यापार आदि आरंभ का त्यागी और वृक्षों के मूल में बैठकर भिक्षा द्वारा लाये हुए आहार को ग्रहण करता हो उसे ‘परमहंस’ कहते हैं ॥२६॥


राज्यस्य मूलं क्रमो विक्रमश्च॥२७॥

अर्थ: पैतृक-वंश परम्परा से चला आया राज्य या सदाचार और विक्रम-सैन्य और खजाने की शक्ति-ये दोनों गुण राज्यरूपी वृक्ष के मूल हैं-इन दोनों गुणों से राज्य की श्रीवृद्धि होती है।


आचारसम्पत्तिः क्रमसम्पत्तिं करोति ॥२८॥

अर्थ: सदाचारलक्ष्मी वंशपरम्परा से या पुरुषार्थ से प्राप्त हुई राज्यलक्ष्मी को चिरस्थायी बनाने में कारण है। विनय-अभिमान न करने से पराक्रम सुशोभित होता है।


क्रमविक्रमयोरन्यतरपरिग्रहेण राज्यस्य दुष्करः परिणामः२ ॥३०॥

अर्थ: राजा क्रम (सदाचार और राजनैतिक ज्ञान) और पराक्रम सैनिक शक्ति-इनमें से केवल एक ही गुण प्राप्त करता है उसका राज्य चिरस्थायी नहीं रहता-नष्ट हो जाता है।


क्रमविक्रमयोरधिष्ठानं बुद्धिमानाहार्यबुद्धिर्वा॥ ३१॥

अर्थ: वही राजा राजनीति और पराक्रम का स्थान हो सकता है जो स्वयं राजनैतिक ज्ञानवान हो अथवा जो अमात्य के द्वारा बताये हुए राजनीति के सिद्धान्तों का पालन करने वाला हो।


यो विद्याविनीतमतिः स बुद्धिमान्॥ ३२॥

अर्थ: जिसने नीतिशास्त्रों के अध्ययन से राजनीतिज्ञान और नम्रता प्राप्त की है उसे बुद्धिमान कहते हैं।


सिंहस्येव केवलं पौरुषावलम्बिनो न चिरं कुशलम्॥ ३३॥

अर्थ: जो राजा नीतिशास्त्र के ज्ञान से शून्य है और केवल शूरवीरता ही दिखाता है उसका सिंह की तरह चिरकाल तक कल्याण नहीं होता-अर्थात् जिस प्रकार आक्रमण करने वाला सिंह मार डाला जाता हे उसी प्रकार नीतिज्ञान से शून्य और केवल तीक्ष्ण दंड देने वाला राजा भी दुष्ट समझ कर मार दिया जाता है।


अशस्त्रः शूर इवाशास्त्रः प्रज्ञावानपि भवति विद्विषां वशः२॥ ३४॥

अर्थ: जिस प्रकार बहादुर मनुष्य भी हथियारों के बिना शत्रुओं से पराजित कर दिया जाता है उसी प्रकार बुद्धिमान मनुष्य भी नीतिशास्त्र के ज्ञान के बिना शत्रुओं के वश हो जाता है-उनके द्वारा पराजित कर दिया जाता है।


अलोचनगोचरे ह्यर्थे शास्त्रं तृतीयं लोचनं पुरुषाणाम् ॥३५॥

अर्थ: जो पदार्थ या प्रयोजन नेत्रों से प्रतीत नहीं होता उसको प्रकाश करने के लिए शास्त्र मनुष्यों का तीसरा नेत्र है।


अनधीतशास्त्रश्चक्षुष्मानपि पुमानन्ध एव ॥३६॥

अर्थ: जिस पुरुष ने शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया वह चक्षु सहित होकर के भी अन्धा ही है अर्थात् जिस प्रकार अन्धे मनुष्य को साम ने रक्खे हुए इष्ट और अनिष्ट पदार्थ का ज्ञान नहीं हो सकता उसी प्रकार शास्त्रों के ज्ञान से शून्य-मूर्ख मनुष्य-को भी धर्म और अधर्म-कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य-का ज्ञान नहीं हो सकता ॥३६॥


न ह्यज्ञानादपरः२ पशुरस्ति ॥३७॥

अर्थ: संसार में मूर्ख को छोड़कर दूसरा कोई पशु नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार पशु घास आदि भक्षण करके मलमूत्रादि क्षेपण करता है और धर्म-अधर्म-कर्तव्य-अकर्तव्य- को नहीं जानता उसी प्रकार मूर्ख मनुष्य भी खान-पानादि क्रिया करके मलमूत्रादि क्षेपण करता है और धर्म-अधर्म-कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य-को नहीं जानता ।


वरमराजकं भुवनं न तु मूर्खो राजा॥ ३८॥

अर्थ: पृथ्‍वी पर राजा का न होना किसी प्रकार अच्छा कहा जा सकता है परन्तु उसमें मूर्ख राजा का होना अच्छा नहीं कहा जा सकता।


असंस्कारं रत्नमिव सुजातमपि राजपुत्रं न नायकपदायामनन्ति साधवः ॥३९॥

अर्थ: जो राजपुत्र कुलीन होने पर भी संस्कारों-नीतिशास्त्र का अध्ययन और सदाचार आदि सद्‌गुणों-से रहित है उसे राजनीति के विद्वान् शिष्ट पुरुष संस्कारहीन-(सान) पर न चढ़ाये हुए-रत्न के समान युवराज-पद पर आरूढ़ होने के योग्य नहीं मानते।


न दुर्विनीताद्राज्ञः प्रजानां विनाशादपरोऽस्त्युत्पातः ॥४०॥

अर्थ: दुष्ट राजा से प्रजा का विनाश ही होता है, उसे छोड़कर दूसरा कोई उपद्रव नहीं हो सकता।


यो युक्तायुक्तयोरविवेकी विपर्यस्तमतिर्वा स दुर्विनीतः ॥४१॥

अर्थ: जो योग्य और अयोग्य पदार्थों के विषय में ज्ञानशून्य है अर्थात् योग्य को योग्य और अयोग्य को अयोग्य न समझ कर अयोग्य पुरुषों को दान और सम्मानादि से प्रसन्न करता है और योग्य व्यक्तियों का अपमान करता है तथा विपरीत बुद्धि से युक्त है अर्थात् शिष्ट पुरुषों के सदाचार की अवहेलना करके पाप कर्मों में प्रवृत्ति करता है उसे दुष्ट कहते हैं ॥४१॥


यत्र सद्गिराधीयमाना गुणा संक्रामन्ति तद्द्रव्यं ॥४२॥

अर्थ: जिस पुरुष द्रव्य में राजनीतिज्ञ विद्वान् शिष्ट पुरुषों के द्वारा नीति, आचार सम्पत्ति और शूरता आदि प्रजापालन में उपयोगी सद्गुण सिखाये जाकर स्थिर हो गये हों-जो इन सद्गुणों से अलंकृत हो गया हो-वह पुरुष राजा होने के योग्य है ॥४२॥


यतो द्रव्याद्रव्यप्रकृतिरपि कश्चित् पुरुषः सङ्कीर्णगजवत् ॥४३॥

अर्थ: जब मनुष्य द्रव्य प्रकृति-राज्यपद के योग्य राजनैतिक ज्ञान और आचार सम्पत्ति आदि सद्गुणों- से अद्रव्यप्रकृति-उक्त सद्गुणों को त्याग कर मूर्खता, अनाचार और कायरता आदि दोषों-को प्राप्त हो जाता है तब वह पागल हाथी की तरह राज्यपद के योग्य नहीं रहता-अर्थात् जिस प्रकार पागल हाथी जनसाधारण को भयंकर होता है उसी प्रकार जब मनुष्य में राजनैतिक ज्ञान, आचार सम्पत्ति और शूरवीरता आदि गुण नष्ट होकर उनके स्थान में मूर्खता अनाचार और कायरता आदि दोष घर कर जाते हैं, तब वह पागल हाथी की तरह भयंकर हो जाने से राज्यपद के योग्य नहीं रहता॥४३॥


द्रव्यं हि क्रियां विनयति नाद्रव्यं ॥४४॥

अर्थ: द्रव्य-गुणों से अलंकृत योग्य पुरुष-राज्यपद को प्राप्त कर सकता है निर्गुण-मूर्ख-नहीं।


शुश्रूषा-श्रवण-ग्रहण-धारणाविज्ञानोहापोह तत्त्वाभिनिवेशा बुद्धिगुणाः ॥४५॥

अर्थ: शुश्रूषा-शास्त्र और शिष्ट पुरुषों के हितकारक उपदेश को सुनने की इच्छा, श्रवण-हितकारक उपदेश को सुनना, ग्रहण-शास्त्र के विषय को ग्रहण करना, धारण-अधिक समय तक शास्त्रादि के विषय को याद रखना, विज्ञान-संशय; विपर्यय और अनध्यवसायरूप मिथ्याज्ञान से रहित पदार्थ का यथार्थ निश्चय करना, ऊह-व्याप्तिज्ञान अर्थात् निश्चय किये हुए धूमादि हेतुरूप पदार्थों के ज्ञान से अग्नि आदि साध्यरूप पदार्थों का ज्ञान करना, अपोह-शिष्ट पुरुषों के उपदेश तथा प्रबल युक्तियों से प्रकृति, ऋतु और शिष्टाचार से विरुद्ध पदार्थों में अपनी हानि या नाश का निश्चय करके उनका त्याग करना और तत्त्वाभिनिवेश उक्त विज्ञान और ऊहापोह आदि से हितकारक पदार्थ का दृढ़ निश्चय करना-ये आठ बुद्धि के गुण हैं ॥४५॥


श्रोतुमिच्छा शुश्रूषा ॥४६॥

अर्थ: शास्त्र या महापुरुषों के हितकारक उपदेश को श्रवण करने की इच्छा करना यह ‘शुश्रूषा’ है ॥४६॥


श्रवणमाकर्णनम् ॥४७॥

अर्थ: हितकारक बात को सुनना यह ‘श्रवण’ है ॥४७॥


ग्रहणं शास्त्रार्थोपादानं ॥४८॥

अर्थ: शास्त्र आदि के हितकारक विषय को ग्रहण करना ‘ग्रहण’ है ॥४८॥


धारणमविस्मरणम् ॥४९॥

अर्थ: शास्त्र आदि के विषय को ऐसा याद रखना जिससे कि बहुत समय तक भूल न सके इसे ‘धारण’ गुण कहते हैं ॥४९॥


मोहसन्देहविपर्यास्यव्युदासेन ज्ञानं विज्ञानम् ॥५०॥

अर्थ: मोह-अनिश्चय, सन्देह (संशय अर्थात् एक पदार्थ में दो प्रकार का ज्ञान होना जैसे स्थाणु-ठूँठ- में वह ठूँठ है ? या पुरुष है? इस प्रकार अनेक कोटि का ज्ञान होना) और विपरीत ज्ञान इन मिथ्याज्ञानों से रहित यथार्थ ज्ञान होना इसे ‘विज्ञान’ कहते हैं ॥५०॥


विज्ञातमर्थमवलम्ब्यान्येषु व्याप्या तथाविधवितर्कणमूहः ॥५१॥

अर्थ: निश्चय किये हुए पदार्थों-धूम आदि हेतुरूप वस्तुओं-के आधार से-उनका ज्ञान होने से दूसरे पदार्थों (जिनका पूर्व निश्चित धूमादि साधनों के साथ अविनाभाव संबंध है ऐसे अग्नि आदि साध्यरूप वस्तुओं) का उसी प्रकार निश्चय करना उसे ‘ऊह’ कहते हैं ॥५१॥


उक्तियुक्तिभ्यां विरुद्धार्थात् प्रत्यवायसंभावनया व्यावर्तनमपोहः ॥५२॥

अर्थ: महापुरुषों के उपदेश और प्रबल युक्तियों द्वारा प्रकृति, ऋतु और शिष्टाचार से विरुद्ध पदार्थों-अनिष्ट भोजन और परस्त्रीसेवन आदि विषयों-में अपनी हानि या नाश की संभावना-निश्चय-करके उनका त्याग करना यह ‘अपोह’ नाम का बुद्धि गुण है।


अथवा ज्ञानसामान्यमूहो ज्ञानविशेषोऽपोहः ॥५३॥

अर्थ: अथवा किसी पदार्थ के सामान्य ज्ञान को ऊह और विशेषज्ञान को अपोह कहते हैं, उदाहरण में जल को देखकर “यह जल है” इस प्रकार के साधारण ज्ञान को ‘ऊह’ और इससे प्यास बुझती है इस प्रकार का विशेष ज्ञान होना ‘अपोह’ है ॥५३॥


विज्ञानोहापोहानुगमविशुद्धमिदमित्थमेवेति निश्चयस्तत्त्वाभिनिवेशः॥ ५४॥

अर्थ: उक्त विज्ञान, ऊह और अपोह आदि के संबंध से विशुद्ध हुए “यह ऐसा ही है अन्य प्रकार नहीं है? इस प्रकार के दृढ़ निश्चय को ‘तत्त्वाभिनिवेश’ कहते हैं ॥५४॥


याः समधिगम्यात्मनो हितमवैत्यहितं चापोहति ता विद्याः ॥५५॥

अर्थ: मनुष्य जिन्हें जानकर अपनी आत्मा को हित-सुख और उसके मार्ग की प्राप्ति तथा अहित दुःख और उसके कारणों का परिहार-त्याग करता है उन्हें विद्याएँ कहते हैं। निष्कर्ष-जो सुख की प्राप्ति और दुःखों के परिहार करने में समर्थ है उसे सत्यार्थ विद्या समझनी चाहिए और जिसमें उक्त गुण नहीं है वह अविद्या है ॥५५॥ भागुरि विद्वान् ने भी उक्त बात का समर्थन किया है कि “जो विद्वान् विद्या को पढ़कर अपनी आत्मा को सुख में प्रवृत्त और दुःखों से निवृत्त करता है उसकी वे विद्याएँ हैं और इससे विपरीत जो विद्याएँ हैं वे केवल कष्ट देने वाली मानी गई हैं ॥१॥”


आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिरिति चतस्रो राजविद्याः ॥५६॥

अर्थ: राजविद्याएँ चार हैं, आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति। आन्वीक्षिकी-जिसमें अध्यात्मतत्त्व-आत्मतत्त्व तथा उसके पूर्वजन्म और अपर जन्म आदि की अकाट्य युक्तियों द्वारा सिद्धि की गई हो उसे ‘आन्वीक्षिकी’ विद्या कहते हैं इसे दर्शनशास्त्र-न्यायशास्त्र भी कहते हैं। त्रयी-(चरणानुयोग शास्त्र) जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति इन चार आश्रमों के कर्तव्यों का निर्देश किया गया हो एवं धर्म और अधर्म का स्वरूप वर्णन किया गया हो उसे ‘त्रयी’ विद्या कहते हैं इसका दूसरा नाम ‘आचारशास्त्र’ भी है। वार्ता:-जिस लौकिक शास्त्र में प्रजाजन के जीविकोपयोगी (जीवन निर्वाह के साधन-असि-खड्ग धारण करना, मषि-लेखन कला, कृषि-खेती करना, विद्या, वाणिज्य-व्यापार और शिल्प-चित्रकला-कर्तव्यों का विवेचन किया गया हो उसे ‘वार्ता’ विद्या कहते हैं। दण्डनीति:-जिसमें प्रजाजनों की रक्षा के लिए दुष्टों-प्रजापीड़क आततायियों-के निग्रह (दण्ड देने) का विधान हो उसे ‘दण्डनीति’ कहते हैं। इस प्रकार आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति ये चार राजविद्याएँ हैं ॥५६॥


अधीयानो ह्यान्वीक्षिकीं कार्याकार्याणां बलाबलं हेतुभिर्विचारयति, व्यसनेषु न विषीदति, नाभ्युदयेन विकार्यते समधिगच्छति प्रज्ञावाक्यवैशारद्यम् ॥५७॥

अर्थ: आन्वीक्षिकी विद्या-दर्शनशास्त्र-का वेत्ता विद्वान् प्रबल युक्तियों के द्वारा कर्त्तव्य (अहिंसा और ब्रह्मचर्य आदि) को प्रधान या हितकारक और अकर्त्तव्य (मद्यपान और परकलत्र सेवन आदि) को अप्रधान-सुख को उत्पन्न करने की शक्ति से रहित-अर्थात् अहितकारक निश्चय करता है एवं विपत्ति में विषाद-खेद-और सम्पत्ति में विकार-मद और हर्ष-नहीं करता तथा सोचने विचारने और बोलने में चतुराई प्राप्त करता है ॥५७॥


त्रयीं पठन् वर्णाश्रमाचारेष्वतीव प्रगल्भते, जानाति च समस्तामपि
धर्माधर्मस्थितिम् ॥५८॥

अर्थ: त्रयी विद्या-चरणानुयोग शास्त्र-का वेत्ता विद्वान् वर्ण (ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि) और आश्रमों (ब्रह्मचारी और गृहस्थ आदि) के ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ होता है तथा समस्त धर्म-अधर्म अर्थात् कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य की मर्यादा को भलीभाँति जानता है ॥५८॥


युक्तितः प्रवर्तयन् वार्तां सर्वमपि जीवलोकमभिनन्दयति लभते च स्वयं सर्वानपि
कामान् ॥५९॥

अर्थ: लोक में वार्ता विद्या-कृषि आदि की शिक्षा-की समुचित प्रवृत्ति-प्रचार-कराने वाला राजा प्रजा को सुखी बनाता है तथा स्वयं भी समस्त अभिलषित भौतिक सुखों को प्राप्त करता है॥५९॥


यम इवापराधिषु दण्डप्रणयनेन विद्यमाने राज्ञि न प्रजाः स्वमर्यादामतिक्रामन्ति
प्रसीदन्ति च त्रिवर्गफलाः विभूतयः ॥६०॥

अर्थ: राजा को यमराज के समान कठोर होकर अपराधियों को दंडविधान करते रहने पर प्रजा के लोग अपनी-अपनी मर्यादा (कर्त्तव्य-पालन की सीमा) को उल्लंघन नहीं करते-अर्थात् अपने २ वर्णाश्रम धर्म पर आरूढ़ होकर दुष्कृत्यों में प्रवृत्ति नहीं करते, अतः उसे धर्म, अर्थ और काम इन तीनों पुरुषार्थों को उत्पन्न करने वाली विभूतियाँ प्राप्त होती हैं ॥६०॥


सांख्यं योगो लोकायतिकं चान्वीक्षिकी बौद्धार्हतोः श्रुतेः प्रतिपक्षत्वात्
(नान्वीक्षिकीत्वम्) इति नैकानि मतानि ॥ ६१॥

अर्थ: सांख्य, योग और चार्वाकदर्शन-नास्तिकदर्शन-ये आन्वीक्षिकी-अध्यात्म विद्याएँ हैं अर्थात् अध्यात्मविद्या-प्रतिपादक दर्शन हैं। बौद्ध और आर्हद्दर्शन-जैनदर्शन-वेदविरोधी होने के कारण अध्यात्म विद्याएँ नहीं हैं, इस प्रकार अन्य नीतिकारों की मान्यताएँ हैं।


प्रकृतिपुरुषज्ञो हि राजा सत्वमवलम्बते रजःफलं चापलं१ च परिहरति
तमोभिर्नाभिभूयते२ ॥६२॥

अर्थ: प्रकृति-शरीर और इन्द्रियादिक स्थूल तथा ज्ञानावरणादि कर्मरूप सूक्ष्म प्रकृति और पुरुष आत्मतत्त्व-के स्वरूप को जानने वाला-भेदज्ञानी-राजा सात्विक-प्रकृति को धारण कर रजोगुण से होने वाली चपलता-काम और क्रोधादि विकारों से होने वाली उच्छृंखलता (नीति-विरुद्धप्रवृत्ति) का त्याग कर देता है और तामसिक भावों-अज्ञानादि भावों-से पराजित नहीं होता।


आन्वीक्षिक्यध्यात्मविषये, त्रयी-वेदयज्ञादिषु, वार्ता कृषिकर्मादिका, दण्डनीतिः
शिष्टपालन दुष्टनिग्रहः३ ॥६३॥

अर्थ: आन्वीक्षिकी-दर्शनशास्त्र-आत्मतत्त्व का, त्रयी-वेद (अहिंसा धर्म के प्रतिपादक द्वादशाङ्ग शास्त्र) और यज्ञादि-ईश्वरभक्ति, पूजन, हवन, जप आदि अहिंसामय क्रियाकाण्ड आदि-की, वार्ता-असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प आदि जीविकोपयोगी कर्त्तव्यों का और दण्डनीतिविद्या शिष्टों की रक्षा और दुष्टों का निग्रहरूप राजधर्म का निरूपण करती है।


चेतयते च विद्यावृद्धसेवायाम्॥ ६४॥

अर्थ: आन्वीक्षिकी विद्या में निपुण मनुष्य विद्याओं के अभ्यास और बहुश्रुत विद्वान् पुरुषों की सेवा में प्रवृत्त होता है ॥६४॥


अजातविद्यावृद्धसंयोगो हि राजा निरङ्कुशो गज इव सद्यो विनश्यति॥६५॥

अर्थ: जो राजा न तो विद्याओं का अभ्यास करता है और न विद्वानों की संगति करता है वह निश्चय से उन्मार्गगामी होकर बिना अंकुश के हाथी के समान शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।


अनधीयानोऽपि विशिष्टजनसंसर्गात् परां व्युत्पत्तिमवाप्नोति ॥६६॥

अर्थ: विद्याओं का अभ्यास न करने वाला-मूर्ख मनुष्य-भी विशिष्ट पुरुषों-विद्वानों-की संगति से उत्तमज्ञान को प्राप्त कर लेता है-विद्वान् हो जाता है।


अन्यैव काचित् खलु छायोपजलतरूणाम् ॥६७॥

अर्थ: जिस प्रकार जल के समीप वर्तमान वृक्षों की छाया निश्चय से कुछ अपूर्व-विलक्षण (शीतल और सुखदायक) ही हो जाती है उसी प्रकार विद्वानों के समीप वर्तमान पुरुषों की कान्ति भी अपूर्व-विलक्षण-हो जाती है-अर्थात् वे भी विद्वान् होकर सुशोभित होने लगते हैं।


वंशवृत्तविद्याभिजनविशुद्धा हि राज्ञामुपाध्यायाः ॥६८॥

अर्थ: जो वंश परम्परा से विशुद्ध हों-जिन के पूर्वज-पिता आदि-राजवंश के गुरु रह चुके हों-तथा सदाचार (अहिंसा, सत्य और अचौर्य आदि चरित्र-धर्म)विद्या-राजनैतिक तथा धार्मिक आदि विविध विषयों का ज्ञान-और कुलीनता-उच्चकुल में उत्पन्न होकर सत्कर्त्तव्यों का पालन-इन सद्गुणों से अलंकृत हो वे ही विद्वान् निश्चय से राजाओं के गुरु हो सकते हैं ॥६८॥


शिष्टानां नीचैराचरन्नरपतिरिहलोके स्वर्गे च महीयते ॥६९॥

अर्थ: जो राजा शिष्टपुरुषों के साथ नम्रता का व्यवहार करता है वह इस लोक में और स्वर्ग में पूजा जाता है ॥६९॥


राजा हि परमं दैवतं नासौ कस्मैचित् प्रणमत्यन्यत्र गुरुजनेभ्यः ॥७०॥

अर्थ: राजा अत्यन्त भाग्यशाली होता है, इसलिए यह पूज्यजनों (देव, गुरु, धर्म और माता-पिता आदि) के सिवाय किसी को नमस्कार नहीं करता।


वरमज्ञानं नाशिष्टजनसेवया विद्या ॥७१॥

अर्थ: मनुष्य को मूर्ख रहना अच्छा है परन्तु दुष्टपुरुष की सेवा करके विद्या प्राप्त करना अच्छा नहीं है ॥७१॥


अलं तेनामृतेन यत्रास्ति विषसंसर्गः ॥७२॥

अर्थ: जिसमें जहर मिला हुआ हो उस अमृत से क्या लाभ है ? कोई लाभ नहीं।


गुरुजनशीलमनुसरन्ति प्रायेण शिष्याः ॥७३॥

अर्थ: शिष्य लोग बहुधा अपने गुरुजनों के शील-आचार-विचार-का अनुसरण करते हैं अर्थात् यदि शिक्षक नैतिक, सदाचारी और विचारवान होता है तो उसका शिष्य भी उसके अनुकूल प्रवृत्ति करने वाला-नैतिक सदाचारी और विचारवान हो जाता है। परन्तु यदि वह नीतिविरुद्ध प्रवृत्ति करने वाला, दुराचारी और मूर्ख होगा तो उसका शिष्य भी वैसा-दुराचारी आदि-होगा।


नवेषु मृद्भाजनेषु लग्नः संस्कारो ब्रह्मणाप्यन्यथा कर्तुं न शक्यते ॥७४॥

अर्थ: जिस प्रकार नवीन मिट्टी के बर्तनों में किया हुआ संस्कार-रचना-ब्रह्मा के द्वारा भी बदला नहीं जा सकता उसी प्रकार बच्चों के कोमल हृदयों में किया गया संस्कार भी बदला नहीं जा सकता।


अन्ध इव वरं परप्रणेयो राजा न ज्ञानलवदुर्विदग्धः ॥७५॥

अर्थ: जो राजा जन्मान्ध-जन्म से अन्धे पुरुष-के समान मूर्ख है परन्तु यदि वह दूसरे मन्त्री और अमात्य आदि द्वारा कर्तव्य मार्ग-सन्धि, विग्रह यान और आसन आदि षाड्गुण्य-में प्रेरित किया जाता है तो ऐसे राजा का होना किसी प्रकार अच्छा है। परन्तु जो थोड़े से राजनैतिक-ज्ञान को प्राप्त कर दुराग्रही-हठी-है-अर्थात् सुयोग्य मन्त्री और अमात्य आदि की समुचित सलाह को नहीं मानता उसका राजा होना अच्छा नहीं है-हठी राजा से राज्य को क्षति होने के सिवाय कोई लाभ नहीं।


नीलीरक्ते वस्त्र इव को नाम दुर्विदग्धे राज्ञि रागान्तरमाधत्ते ॥७६॥

अर्थ: मूर्ख और दुराग्रही-हठी-राजा के अभिप्राय को नीले रंग से रंगे हुए वस्त्र के समान कौन बदलने में समर्थ हो सकता है ? कोई नहीं।


यथार्थवादो विदुषां श्रेयस्करो यदि न राजा गुणप्रद्वेषी ॥७७॥

अर्थ: यदि राजा गुणों से द्वेष नहीं रखता-गुणग्राही है, तो उसके समक्ष यथार्थ वचन बोलना-तत्काल अप्रिय होने पर भी भविष्य में कल्याणकारक वचन बोलना-विद्वानों के लिए कल्याणकारक है, अन्यथा नहीं।


वरमात्मनो मरणं नाहितोपदेशः स्वामिषु ॥७८॥

अर्थ: शिष्ट पुरुष को एक बार मर जाना उत्तम है परन्तु उसे अपने स्वामी के प्रति अहितकारक मार्ग का उपदेश देना अच्छा नहीं ॥७८॥

(६) आन्वीक्षिकी-समुद्देशः

आत्ममनोमरुत्तत्वसमतायोगलक्षणो ह्यध्यात्मयोगः ॥१॥

अर्थ: आत्मा, मन, शरीर में वर्तमान प्राण वायु-कुम्भक (प्राणायाम की शक्ति से शरीर के मध्य में प्रविष्ट की जाने वाली घटाकार-वायु), पूरक (उक्त विधि से पूर्ण शरीर में प्रविष्ट की जाने वाली हवा) और रेचक (उक्त विधि से शरीर से बाहर की जाने वाली वायु) तथा पृथिवी, जल, अग्नि और वायु आदि तत्त्वों की समान और दृढ़ निश्चलता-स्थिरता-को अध्यात्मयोग-आत्मध्यान (धर्मध्यान) कहते हैं। के बराबर और मनरूपी भ्रमर को प्रमुदित करने वाला ऐसे कमल का चिंतन करे। तत्पश्चात् उस कमल के मध्य में सुमेरूपर्वत के समान पीतरंग की कान्ति से व्याप्त ऐसी कर्णिका का ध्यान करे। पुनः उसमें शरत्कालीन चन्द्र के समान शुभ्र और ऊँचे सिंहासन का चिंतन कर उसमें आत्मद्रव्य को सुखपूर्वक विराजमान, शान्त और क्षोभरहित, राग, द्वेष और मोह आदि समस्त पाप कलङ्क को क्षय करने में समर्थ और संसार में उत्पन्न हुए ज्ञानावरण आदि कर्म समूह को नष्ट करने में प्रयत्नशील चितवन करे।
इति पार्थिवी धारणा।
आग्नेयी धारणा में निश्चल अभ्यास से नाभिमंडल में सोलह उन्नत पत्तों वाले एक मनोहर कमल का और उसकी कर्णिका में महामंत्र (ह्रीँ)का, तथा उक्त सोलह पत्तों पर अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं और अः इन सोलह अक्षरों का ध्यान करे।
पश्चात् हृदय में आठ पांखुड़ी वाले एक ऐसे कमल का ध्यान करे, जो अधोमुख-उल्टा (औंधा) और जिस पर ज्ञानावरण और दर्शनावरण आदि ८ कर्म स्थित हों।
पश्चात् पूर्व चिन्तित नाभिस्थ कमल की कर्णिका के महामंत्र की रेफ से मन्द-मन्द निकलती हुई धुएँ की शिखा का और उससे निकलती हुई प्रवाह रूप स्फुलिङ्गों की पंक्ति का पश्चात् उससे निकलती हुई ज्वाला की लपटों का चिंतवन करे। इसके अनन्तर उस ज्वाला (अग्नि) के समूह से अपने हृदयस्थ कमल और उसमें स्थित कर्म-राशि को जलाता हुआ चिंतवन करे। इस प्रकार आठों कर्म जल जाते हैं। यह ध्यान की ही सामर्थ्य है।
पश्चात् शरीर के बाह्य ऐसी त्रिकोण वह्नि (अग्नि) का चिंतन करे जो कि ज्वालाओं के समूह से प्रज्वलित बड़वानल के समान, अग्निबीजाक्षर ‘र’ से व्याप्त वा अन्त में साथियाँ के चिह्न से चिह्नित, ऊर्ध्व मण्डल से उत्पन्न, धूमरहित और सुवर्ण के समान कान्ति युक्त हो। इस प्रकार धगधगायमान फै लती हुई लपटों के समूह से देदीप्यमान बाहर का अग्निपुर अंतरंग की मंत्राग्नि को दग्ध करता है।
तत्पश्चात् यह अग्निमंडल उस नाभिस्थ कमल आदि को भस्मीभूत करके दाह्य-जलाने योग्य पदार्थ- का अभाव होने के कारण स्वयं शान्त हो जाता है।
इति आग्नेयी धारणा।
मारुती-धारणा में ध्यान करने वाले संयमी पुरुष को आकाश में पूर्ण होकर संचार करने वाले, महावेगयुक्त, महाबलवान, देवों की सेना को चलायमान और सुमेरुपर्वत को कम्पित करने वाला, मेघों के समूह को बिखेरने वाला, समुद्र को लुब्ध करने वाला दशों दिशाओं में संचार करने वाले, लोक के मध्य में संचार करता हुआ और संसार में व्याप्त ऐसे वायुमंडल का चिंतवन करे। तत्पश्चात् उस वायुमंडल के द्वारा कर्मों के दग्ध होने से उत्पन्न हुई भस्म को उड़ाता हुआ ध्यान करे।


अध्यात्मज्ञो हि राजा सहज-शारीरिक-मानसागन्तुभिर्दोषैर्न बाध्यते ॥२॥

अर्थ: जो राजा अध्यात्म-विद्या का विद्वान् होता है वह सहज (कषाय और अज्ञान से उत्पन्न होने वाले राजसिक और तामसिक दुःख), शारीरिक (बुखार-गलगण्डादि बीमारियों से होने वाली पीड़ा), मानसिक (परकलत्र आदि की लालसा से होने वाले कष्ट) एवं आगन्तुक दुःखों (भविष्य में होने वाले-अतिवृष्टि, अनावृष्टि और शत्रुकृत अपकार आदि कारणों से होने वाले दुःख) से पीड़ित नहीं होता॥ २॥


इन्द्रियाणि मनो विषया ज्ञानं भोगायतनमित्यात्मारामः । ३॥

अर्थ: इन्द्रियाँ-स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र-मन, विषय (स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द) ज्ञान और शरीर ये सब आत्मा की क्रीड़ा के स्थान हैं॥ ३॥


यत्राहमित्यनुपचरितप्रत्ययः स आत्मा ॥४॥

अर्थ: जिस पदार्थ में मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ और मैं इच्छावान हूँ’’ आदि वास्तविक प्रत्यय-ज्ञान हो वही आत्मा है अर्थात् ‘‘मैं सुखी हूँ या मैं दुःखी हूँ’’ इस प्रकार के ज्ञान के द्वारा जो प्रत्येक प्राणी को स्वसंवेदन प्रत्यक्ष द्वारा जाना जावे वही शरीर इन्द्रिय और मन से पृथक्, चैतन्यात्मक और अनादिनिधन आत्मद्रव्य है।


असत्यात्मनः प्रेत्यभावे विदुषां विफलं खलु सर्वमनुष्ठानम् ॥ ५॥

अर्थ: यदि आत्मद्रव्य का पुनर्जन्म-परलोक (स्वर्गादि) में गमन न माना जावे तो संसार में विद्वानों की जो पारलौकिक धार्मिक-कर्त्तव्यों (प्राणि रक्षा, दान, तप और जपादि) में प्रवृत्ति होती है वह व्यर्थ-निष्फल-होगी, क्योंकि आत्मा का परलोक-गमन न मानने से उन्हें आगे जन्म में उक्त पारलौकिक अनुष्ठानों का स्वर्ग आदि सुखरूप फल प्राप्त न होगा। अतएव विद्वानों की पारलौकिक-दान-पुण्य आदि धार्मिक अनुष्ठानों में प्रवृत्ति आत्मद्रव्य के परलोक-गमन को सिद्ध करती है॥ ५॥


यतः स्मृतिः प्रत्यवमर्षणमूहापोहनं शिक्षालापक्रियाग्रहणं च भवति तन्मनः ॥६॥

अर्थ: जिससे प्राणी को स्मरण (मैंने अमुक कार्य किया था और अमुक कार्य करूंगा इत्यादि स्मृतिज्ञान) व्याप्ति-ज्ञान (उदाहरणार्थ-जैसे जिस-जिस मनुष्य में व्यवहार कुशलता होती है उस-उस में अवश्य बुद्धिमत्ता होती है जैसे अमुक व्यक्ति एवं जिस-जिस में बुद्धिमत्ता नहीं होती उसमें व्यवहार कुशलता भी नहीं होती जैसे अमुक मूर्ख व्यक्ति। इस प्रकार साधन के होने पर साध्य का होना और साध्य की गैर मौजूदगी में साधन का न होना इसे व्याप्ति ज्ञान कहते हैं), ऊह-(संदेह युक्त पदार्थ का विचार), अपोह (संदिग्ध पदार्थ का निश्चय), किसी के द्वारा दी जाने वाली शिक्षा का ग्रहण और किसी से की हुई बातचीत का ध्यान से सुनना ये सब ज्ञान होते हों उसे ‘मन’ कहते हैं॥६॥


आत्मनो विषयानुभवनद्वाराणीन्द्रियाणि ॥७॥

अर्थ: यह आत्मा जिनकी सहायता से विषयों-स्पर्श, रस और गन्धादि-का सेवन करता है उन्हें इन्द्रियाँ कहते हैं ॥७॥


शब्दस्पर्शरूपगन्धा हि विषयाः ॥८॥

अर्थ: शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्ध ये इन्द्रियों के विषय हैं॥ ८॥


समाधीन्द्रियद्वारेण विप्रकृष्टसन्निकृष्टावबोधो ज्ञानं ॥९॥

अर्थ: ध्यान और इन्द्रियों के द्वारा क्रमशः परोक्ष (देश, काल और स्वभाव से सूक्ष्म-पदार्थ-जैसे सुमेरु, राम-रावण तथा परमाणु वगैरह पदार्थ जो इन्द्रियों द्वारा नहीं जाने जा सकते) और प्रत्यक्ष वस्तुओं समीपवर्ती पदार्थों-के जानने को ‘ज्ञान’ कहते हैं।


सुखं प्रीतिः ३ ॥१०॥

अर्थ: जिससे आत्मा, मन और इन्द्रियों को आनन्द हो उसे ‘सुख’ कहते हैं ॥१०॥


तत्सुखमप्यसुखं यत्र नास्ति मनोनिवृत्तिः ॥११॥

अर्थ: जिस पदार्थ-पुत्र-कलत्रादि-में मन संतुष्ट न हो किन्तु उल्टा वैराग्य उत्पन्न हो वह सुख भी दुःख समझना चाहिए ॥११॥


अभ्यासाभिमानसंप्रत्ययविषयाः सुखस्य कारणानि ॥१२॥

अर्थ: अभ्यास (शास्त्रों को अध्ययन और शास्त्र विहित कर्तव्यों के पालन में परिश्रम करना), अभिमान (समाज से अथवा राजा-आदि के द्वारा आदर-सम्मान का मिलना), संप्रत्यय (व्यवहारज्ञान से अपनी इन्द्रियादिक की सामर्थ्य से वाद्य (वीणा आदि) आदि के शब्दों में प्रिय और अप्रिय-का निर्णय करना) और विषय-(इन्द्रिय और मन को संतुष्ट करने वाले विषयों की प्राप्ति) ये चार सुख के कारण हैं ॥१२॥


क्रियातिशयविपाकहेतुरभ्यासः ॥१३॥

अर्थ: विद्या की प्राप्ति आदि कार्यों में सहायक परिश्रम करना यह अभ्यास है ॥१३॥


प्रश्रयसत्कारादिलाभेनात्मनो यदुत्कृष्टत्वसंभावनमभिमानः ॥१४॥

अर्थ: शिष्ट मनुष्य को सज्जनों के मध्य में उनके द्वारा जो विनय या सम्मान-सामाजिक या राजकीय आदर और धन्यवाद आदि प्रशंसावाचक शब्द मिलते हैं जिन से वह अपने को सुखी समझता है उसे ‘अभिमान’ कहते हैं ॥१४॥


अतद्गुणे वस्तुनि तद्गुणत्वेनाभिनिवेशः सम्प्रत्ययः ॥१५॥

अर्थ: निर्गुण पदार्थ में नैतिक चातुर्य से परीक्षा करके उसमें गुण की प्रतिष्ठा करना संप्रत्यय है ॥१५॥


इन्द्रियमनस्तर्पणो भावो विषयः ॥१६॥

अर्थ: जिस वस्तु से इन्द्रियाँ और मन संतुष्ट हों उसे विषय कहते हैं ॥१६॥


दुःखमप्रीतिः ॥१७॥

अर्थ: जिस वस्तु के देखने पर अप्रीति (संतोष न हो-वैराग्य हो) हो वही दुःख है ॥१७॥


तद्दुःखमपि न दुःखं यत्र न संक्लिश्यते मनः ॥१८॥

अर्थ: जिस वस्तु के देखने पर मन को संक्लेश-कष्ट-न हो वह वस्तु दुःखद हो करके भी सुखकर है ॥१८॥


दुःखं चतुर्विधं सहजं दोषजमागन्तुकमन्तरंगं चेति ॥१९॥

अर्थ: दुःख चार प्रकार के होते हैं-सहज, दोषज आगन्तुक और अन्तरङ्गज ॥१९॥


सहजं क्षुत्तृषामनोभूभवं चेति ॥२०॥

अर्थ: भूख-प्यास सम्बन्धी तथा मानसिक भूमि में पैदा होने वाले (काम-क्रोधादि विकारों से उत्पन्न परस्त्री-सेवन आदि की अभिलाषा और उसका चिंतन आदि से उत्पन्न हुए) दुःखों को ‘सहज’ दुःख कहते हैं॥२०॥


दोषजं वातपित्तकफवैषम्यसम्भूतं ॥२१॥

अर्थ: प्रकृति-ऋतु के विरुद्ध आहार विहार करने से जो वात, पित्त और कफ कुपित-विकृत-होते हैं उससे होने वाले बुखार-गलगण्डादिरूप शारीरिक रोगों को ‘दोषज’ दुःख कहा गया है॥ २१॥


आगन्तुकं वर्षातपादिजनितं ॥२२॥

अर्थ: अतिवृष्टि, अनावृष्टि और आतप (गर्मी) आदि आकस्मिक-घटनाओं से उत्पन्न होने वाले दुःखों-दुर्भिक्ष (अकाल) आदि सम्बन्धी पीड़ाओं को ‘आगन्तुक’ दुःख कहा गया है ॥२२॥


यच्चिन्त्यते दरिद्रैर्न्यक्कारजं ॥२३॥

अर्थ: दरिद्र-निर्धन-मनुष्यों से अनुभव किये जाने वाले और तिरस्कार आदि से उत्पन्न हुए दुःख-बध-बंधन और कारावास-जेलखाना-आदि की सजा से उत्पन्न हुए कष्टों को ‘न्यक्कारज’ दुःख कहते हैं अर्थात् दरिद्र लोग चोरी वगैरह अपराध करने से जो राजदंड-जेलखाने की सजा आदि-भोगते हैं, उनके उन दुःख-बध-बंधन आदि कष्टों-को न्यक्कारज-तिरस्कार से उत्पन्न-दुःख कहा गया है ॥२३॥


न्यक्कारावज्ञेच्छाविधातादिसमुत्थमन्तरङ्गजम् ॥२४॥

अर्थ: धिक्कार, अनादर और इच्छाविघात-अभिलषित वस्तु न मिलना-आदि से होने वाले दुःखों को ‘अन्तरंगज’ दुःख कहा गया है ॥२४॥


न तस्यैहिकमामुष्मिकं च फलमस्ति यः क्लेशायासाभ्यां भवति
विप्लवप्रकृतिः ॥२५॥

अर्थ: जिसकी बुद्धि निरन्तर दुःख और खेद के द्वारा नष्ट हो गई है उस मनुष्य को ऐहिक और पारलौकिक सुख प्राप्त नहीं हो सकते॥ २५॥


स किंपुरुषो यस्य महाभियोगे सुवंशधनुष इव नाधिकं जायते बलम्२ ॥ २६॥

अर्थ: जिस मनुष्य में उत्तम बाँस वाले धनुष के समान युद्ध आदि आपत्तिकाल आने पर अधिक पौरुष-वीरता शक्ति-का संचार नहीं होता वह निन्द्य पुरुष है अर्थात् जिस प्रकार उत्तम-बाँस वाले धनुष में बाण-स्थापन-काल में अधिक दृढ़ता-मजबूती-आ जाती है उसी प्रकार कुलीन पुरुष में भी आपत्तिकाल में अधिक वीरता-शक्ति का संचार हो जाता है। एवं जिस प्रकार खराब बाँस वाला धनुष बाण-स्थापन-काल में टूट जाता है या शिथिल हो जाता है उसी प्रकार कायर व्यक्ति भी युद्धादि आपत्तिकाल में कायरता धारण कर लेता है उसमें वीरता नहीं रहती॥ २६॥


आगामिक्रियाहेतुरभिलाषो वेच्छा४॥२७॥

अर्थ: जो भविष्य में होने वाले कार्य में हेतु है उसे अभिलाषा या इच्छा कहते हैं ॥२७॥


आत्मनः प्रत्यवायेभ्यः प्रत्यावर्तनहेतुर्द्वेषोऽनभिलाषो वा ॥२८॥

अर्थ: आत्मा से होने वाले दोषों को नाश करने के दो उपाय हैं। (१) अपनी निन्दा करना (२) भविष्य में उनके करने की इच्छा न करना।


हिताहितप्राप्तिपरिहारहेतुरुत्साहः ॥२९॥

अर्थ: जिस कर्तव्य के करने में हित-अभीष्ट-की प्राप्ति तथा अहित-अनिष्ट-का त्याग होता है उसे उत्साह कहते हैं ॥२६॥


प्रयत्नः परनिमित्तको भावः॥ ३०॥

अर्थ: ‘‘मुझे इसका अमुक कार्य अवश्य करना चाहिए’’ इस प्रकार दूसरों की भलाई के लिए की जाने वाली चित्त की निश्चित प्रवृत्ति को प्रयत्न कहते हैं ॥३०॥


सातिशयलाभः संस्कारः॥ ३१॥

अर्थ: सज्जन पुरुषों तथा राजा-आदि के द्वारा किये गये सम्मान से जो मनुष्य की प्रतिष्ठा होती है उसे ‘संस्कार’ कहते हैं ॥३१॥


अनेककर्माभ्यासवासनावशात् सद्योजातादीनां स्तन्यपिपासादिकं येन क्रियत इति
संस्कारः१ ॥३२॥

अर्थ: इस प्राणी ने आयुष्य कर्म के आधीन होकर पूर्व जन्मों में अनेक बार दुग्धपानादि में प्रवृत्ति की थी, उससे इसकी आत्मा में दुग्धपानादि विषय का धारणारूप संस्कार उत्पन्न हो गया था। उस संस्कार की वासना के वश से जो स्मरण-यह दुग्धपान मेरा इष्ट साधन है इस प्रकार का स्मृतिज्ञान-उत्पन्न होता है वही संस्कार से उत्पन्न हुआ स्मरण उत्पन्न हुए बच्चों को दुग्धपान आदि में प्रवृत्त करता है॥ ३२॥


भोगायतनं शरीरम्॥ ३३॥

अर्थ: जो शुभ-अशुभ भोगों का स्थान है वह शरीर है॥ ३३॥


ऐहिकव्यवहारप्रसाधनपरं लोकायतिकम्॥ ३४॥

अर्थ: जो केवल इस लोक सम्बन्धी कार्यों-मद्यपान और मांसभक्षण आदि का निरूपण करता है उसे नास्तिक-दर्शन कहते हैं।


लोकायतज्ञो हि राजा राष्ट्रकण्टकानुच्छेदयति ॥३५॥

अर्थ: जो राजा नास्तिक-दर्शन को भली-भाँति जानता है वह निश्चय से राष्ट्रकण्टकों-प्रजा को पीड़ित करने वाले जार-चोर आदि दुष्टों-को जड़-मूल से नष्ट कर देता है।


न खल्वेकान्ततो यतीनामप्यनवद्यास्ति क्रिया ॥३६॥

अर्थ: जितेन्द्रिय साधु महापुरुषों के भी कर्त्तव्य-अहिंसा और सत्य आदि-सर्वथा निर्दोष नहीं होते-उनके कर्त्तव्यों में भी कुछ न कुछ दोष पाया जाता है, पुनः साधारण पुरुषों के कर्त्तव्यों का तो कहना ही क्या है? अर्थात् उनके कर्त्तव्यों में दोष-त्रुटि-होना साधारण बात है ॥३६॥


एकान्तेन कारुण्यपरः करतलगतमप्यर्थं रक्षितुं न क्षमः ॥३७॥

अर्थ: जो मनुष्य सदा केवल दया का बर्ताव करता है वह अपने हाथ में रखे हुए धन को भी बचा ने में समर्थ नहीं हो सकता ॥३७॥


प्रशमैकचित्तं को नाम न परिभवति ? ॥३८॥

अर्थ: सदा शान्तचित्त रहने वाले मनुष्य का लोक में कौन पराभव-सताना और अनादर करना-नहीं करता ? अर्थात् सभी लोग उसका अनादर करते हैं ॥३८॥


अपराधकारिषु प्रशमो यतीनां भूषणं न महीपतीनाम् ॥३९॥

अर्थ: अपराधियों-प्रजा-पीड़क दुष्टों-पर क्षमा धारण करना-उन्हें दंड न देना-यह साधु पुरुषों का भूषण-शोभा देने वाला- है, न कि राजाओं का। अतः दुष्टों का निग्रह करना-अपराध के अनुकूल दंड देना-राजा का मुख्य कर्तव्य है ॥३६॥


धिक् तं पुरुषं यस्यात्मशक्त्या न स्तः कोपप्रसादौ ॥४०॥

अर्थ: जो मनुष्य अपनी शक्ति से क्रोध और प्रसन्नता नहीं करता उसको धिक्कार है-वह निंदा के योग्य है ॥४०॥


स जीवन्नपि मृत एव यो न विक्रामति प्रतिकूलेषु ॥४१॥

अर्थ: जो व्यक्ति शत्रुओं में पराक्रम नहीं करता-उनका निग्रह नहीं करता-वह जीवित होता हुआ भी निश्चय से मरे हुए के समान हैं ॥४१॥


भस्मनीवं निस्तेजसि को नाम निःशङ्कः पदं न कुर्यात् ॥४२॥

अर्थ: आश्चर्य है कि भस्म-राख-के समान तेज-शून्य-पराक्रम-हीन (सैनिक और खजाने की शक्ति से रहित) राजा को कौन मनुष्य निडर होकर पराजित करने तत्पर नहीं होता ? अर्थात् सभी लोग उसे पराजित करने तत्पर रहते हैं।


तत् पापमपि न पापं यत्र महान् धर्मानुबंधः ॥४३॥

अर्थ: जिस कार्य-दुष्टनिग्रह-आदि- के करने में महान् धर्म-प्रजा का संरक्षण-आदि की प्राप्ति होती है वह बाह्य से पापरूप होकर के भी पाप नहीं समझा जाता किन्तु धर्म ही समझा जाता है।॥४३॥


अन्यथा पुनर्नरकाय राज्यम् ॥४४॥

अर्थ: जो राजा दुष्टों का निग्रह नहीं करता उसका राज्य उसे नरक ले जाता है।


बन्धान्तो नियोगः॥ ४५॥

अर्थ: राज्याधिकार अन्त में बन्धन का कष्ट देता है ॥४५॥


विपदन्ता खलमैत्री॥ ४६॥

अर्थ: दुष्टों की संगति अन्त में दुःख देने वाली है ॥४६॥


मरणान्तः स्त्रीषु विश्वासः॥ ४७॥

अर्थ: स्त्रियों में विश्वास करने से अन्त में मृत्यु होती है ॥४७॥

(७) त्रयी-समुद्देशः

चत्वारो वेदाः, शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिरिति षडङ्गा-
नीतिहासपुराण-मीमांसा-न्याय-धर्मशास्त्रमिति चतुर्दशविद्यास्थानानि त्रयी ॥१॥

अर्थ: चार वेद हैं-प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग। उक्त वेदों के निम्न प्रकार ६ अंग हैं-इन छह अंगों के ज्ञान से उक्त चारों प्रकार के वेदों का ज्ञान हो सकता है।
१. शिक्षा २. कल्प ३. व्याकरण ४. निरुक्त ५. छन्द और ६. ज्योतिष।
१. शिक्षा-स्वर और व्यञ्जनादि वर्णों का शुद्ध उच्चारण और शुद्ध लेखन को बताने वाली विद्या को ‘शिक्षा’ कहते हैं।
२. कल्प-धार्मिक आचार-विचार या क्रियाकाण्डों गर्भाधान आदि संस्कारों के निरूपण करने वाले शास्त्र को ‘कल्प’ कहते हैं।
३. व्याकरण-जिससे भाषा का शुद्ध लिखना, पढ़ना और बोलने का बोध हो।
४. निरुक्त-यौगिक, रूढ़ि और योगरूढ़ि शब्दों के प्रकृति और प्रत्यय-आदि का विश्लेषण करके प्राकरणिक द्रव्यपर्यायात्मक या अनेक धर्मात्मक पदार्थ के निरूपण करने वाले शास्त्र को ‘निरुक्त’ कहते हैं।
५. छन्द-पद्यों-वर्णवृत्त और मात्रवृत्त छन्दों-के लक्ष्य और लक्षण के निर्देश करने वाले शास्त्र को ‘छन्दशास्त्र’ कहते हैं।
६. ज्योतिष-ग्रहों की गति और उससे विश्व के ऊपर होने वाले शुभ और अशुभ फलों को तथा प्रत्येक कार्य के सम्पादन के योग्य शुभ समय को बताने वाली विद्या को ज्योतिर्विद्या कहते हैं। इस प्रकार ये ६ वेदाङ्ग हैं।
इतिहास, पुराण, मीमांसा (विभिन्न और मौलिक सिद्धान्त बोधक वाक्यों पर शास्त्राविरुद्ध युक्तियों द्वारा विचार करके समीकरण करने वाली विद्या), न्याय (प्रमाण और नयों का विवेचन करने वाला शास्त्र) और धर्मशास्त्र (अहिंसा धर्म के पूर्ण तथा व्यवहारिक रूप को विवेचन करने वाला उपासकाध्ययन शास्त्र) उक्त १४ चौदह विद्यास्थानों को ‘त्रयीविद्या कहते हैं ॥१॥


त्रयीतः खलु वर्णाश्रमाणां धर्माधर्मव्यवस्था ॥२॥

अर्थ: त्रयी-विद्या से समस्त वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तथा आश्रमों-ब्रह्मचारी गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति-में वर्तमान मनुष्यों के धर्म-अधर्म-कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य-का ज्ञान होता है ॥२॥


स्वपक्षानुरागप्रवृत्त्या सर्वे समवायिनो लोकव्यवहारेष्वधिक्रियन्ते॥ ३॥

अर्थ: समस्त वर्ण और आश्रमों में विभक्त प्रजा के लोग इस त्रयी-विद्या के द्वारा अपने-अपने सत्कर्त्तव्यों में प्रीतिपूर्वक प्रवृत्ति करने से नैतिक आचार-विचारों के परिपालन में प्रवृत्त किये जाते हैं ॥३॥


धर्मशास्त्राणि स्मृतयो वेदार्थसंग्रहाद्वेदा एव ॥४॥

अर्थ: धर्मशास्त्र-सिद्धान्तग्रन्थ और स्मृतियाँ-आचारशास्त्र-इन सब में उक्त द्वादशाङ्गरूप वेदों के पदार्थों का संकलन किया गया है; अतएव द्वादशाङ्ग श्रुत की तरह वे भी प्रमाणीभूत-सत्य-हैं ॥४॥


अध्ययनं यजनं दानं च विप्रक्षत्रियवैश्यानां समानो धर्मः ॥५॥

अर्थ: शास्त्रों का पढ़ना, देव, गुरु और धर्म की भक्ति, स्तुति और पूजा तथा पात्रदान करना ये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के समान धर्म-समान-कर्त्तव्य हैं॥ ५॥


त्रयो वर्णाः द्विजातयः ॥६॥

अर्थ: ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीनों वर्ण द्विजाति कहे जाते हैं।


अध्यापनं याजनं प्रतिग्रहो ब्राह्मणानामेव ॥७॥

अर्थ: ब्राह्मणों का ही धर्म-जीविकोपयोगी कर्तव्य-शास्त्रों का पढ़ाना, पूजा कराना और दान ग्रहण करना है ॥७॥


भूतसंरक्षणं शस्त्राजीवनं सत्पुरुषोपकारो दीनोद्धरणं रणेऽपलायनं चेति
क्षत्रियाणाम् ॥८॥

अर्थ: प्राणियों की रक्षा करना, शस्त्र धारण करके जीवन-निर्वाह करना, शिष्ट पुरुषों की भलाई करना, अनाथ-अन्धे, लूले-लंगड़े और रोगी आदि दीन पुरुषों-का उद्धार करना और युद्ध से न भागना ये क्षत्रियों के कर्त्तव्य हैं।


वार्ताजीवनमावेशिकपूजनं सत्रप्रपापुण्यारामदयादानादिनिर्माणं च
विशां ॥९॥

अर्थ: वैश्यों का धर्म-खेती, पशुओं की रक्षा, व्यापार द्वारा जीवन-निर्वाह करना, निष्कपट भाव से ईश्वर की पूजा करना, सदा अन्न-वितरण करने के स्थान-सदावर्त्त-पानी पिलाने के स्थान-प्याऊ-बनवाना, अन्य पुण्य-कार्य-शिक्षा मन्दिर, कन्या-विद्यालय और विधवाश्रम आदि-बनाना, जनता के विहार के लिए बगीचे बनवाना और प्राणियों की रक्षा के लिए दानशालाएँ आदि स्थापित करना है।


त्रिवर्णोपजीवनं कारुकुशीलवकर्म पुण्यपुटवाहनं च शूद्राणां ॥१०॥

अर्थ: शूद्रों का अपना धर्म-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा-शुश्रूषा करना, शिल्पकला-चित्र कला आदि, गीत, नृत्य और वादित्र-गाना, नाचना और बजाना और भाट-चारण आदि का कार्य करना एवं भिक्षुकों की सेवा करना है ॥२०॥


सकृत् परिणयनव्यवहाराः सच्छूद्राः ॥११॥

अर्थ: जिन के यहाँ कन्याओं का एकबार ही विवाह होता है-पुनर्विवाह नहीं होता-वे सत्-प्रशस्त (उत्तम) शूद्र कहे गये हैं।


आचारानवद्यत्वं शुचिरुपस्करः शरीरी च विशुद्धिः ।
करोति शूद्रमपि देवद्विजतपस्विपरिकर्मसु योग्यम् ॥१२॥

अर्थ: सदाचार का निर्दोष पालन-मद्यपान और मांस-भक्षणादि को त्यागकर अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और परिग्रहपरिमाण इन पाँचों व्रतों का एकदेश-अणुव्रत रूप से-पालन करना, गृह के बर्तन और वस्त्रादिकों की शुद्धि-स्वच्छता और शारीरिक-शुद्धि-अहिंसा आदि व्रतों का पालनरूप प्रायश्चित्त विधि से शरीर को विशुद्ध करना ये सद्गुण प्रशस्त शूद्र को भी ईश्वर भक्ति तथा द्विज-ब्राह्मण और तपस्वियों की सेवा के योग्य बना देते हैं।


आनृशंस्यममृषाभाषित्वं परस्वनिवृत्तिरिच्छानियमः प्रतिलोमाविवाहो निषिद्धासु
च स्त्रीषु ब्रह्मचर्यमिति सर्वेषां समानो धर्मः ॥१३॥

अर्थ: समस्त प्राणियों पर दया करना, सत्यभाषण, अचौर्य, इच्छाओं को रोकना, स्वजाति में गोत्र को टालकर विवाह संबंध और परस्त्रियों में ब्रह्मचर्य-मातृ-भगिनी-भाव यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों का समान धर्म है ॥१३॥


आदित्यावलोकनवत् धर्मः खलु सर्वसाधारणो विशेषानुष्ठाने तु नियमः ॥१४॥

अर्थ: पूर्वोक्त साधारण धर्म-अहिंसा, सत्य और अचौर्य-आदि-सूर्य के देखने की तरह समस्त वर्णों का समान है-जिस प्रकार सूर्य का दर्शन सभी वर्णों के लोग करते हैं, उसी प्रकार उक्त धर्म भी सभी वर्णों के मनुष्यों को समान रूप से पालन करना चाहिए, परन्तु प्रत्येक वर्ण और आश्रम के विशेष कर्त्तव्य भिन्न-भिन्न कहे गये हैं।


निजागमोक्तमनुष्ठानं यतीनां स्वो धर्मः ॥१५॥

अर्थ: अपने शास्त्र-आचारशास्त्र-में कहे हुए कर्त्तव्यों का पालन करना मुनियों का अपना धर्म है ॥१५॥


स्वधर्मव्यतिक्रमेण यतीनां स्वागमोक्तं प्रायश्चित्तम् ॥१६॥

अर्थ: यदि मुनि लोग अपने कर्त्तव्य से च्युत हों तो उन्हें अपने आगम-प्रायश्चित्त-शास्त्र में कहा हुआ प्रायश्चित्त कर लेना चाहिए ॥१६॥


यो यस्य देवस्य भवेच्छ्रद्धावान् स तं देव प्रतिष्ठापयेत् ॥१७॥

अर्थ: जो मनुष्य जिस देव में श्रद्धायुक्त है उसे उसकी प्रतिष्ठा-उपासना-करनी चाहिए? ।


अभक्त्या पूजोपचारः सद्यः शापाय ॥१८॥

अर्थ: श्रद्धा के बिना की हुई ईश्वर-भक्ति तत्काल अनिष्ट करने वाली होती है।


वर्णाश्रमाणां स्वाचारप्रच्यवने त्रयीतो विशुद्धिः ॥१९॥

अर्थ: जब ब्राह्मण-आदि वर्णों के तथा ब्रह्मचारी और गृही-आदि आश्रमों के मनुष्य अपने-अपने धर्मकर्तव्य-से विचलित होने लगें तो उनको अपने-अपने धर्मशास्त्र-आचारशास्त्र-सम्बन्धी प्रायश्चित्त विधान द्वारा अपनी विशुद्धि कर लेनी चाहिए ॥१६॥


स्वधर्माऽसंकरः प्रजानां राजानं त्रिवर्गेणोपसन्धत्ते१ ॥२०॥

अर्थ: जिस राज्य में अपने धर्म का संकर एक वर्ण वाले मनुष्यों के धर्म में दूसरे वर्ण वाले मनुष्यों के धर्म का मिश्रण (मिलावट) नहीं होता अर्थात् समस्त ब्राह्मणादि वर्णों के मनुष्य अपने-अपने धर्म का पालन स्वतन्त्र रीति से करते हैं, वहाँ राजा और प्रजा के लोग धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थों से अलंकृत होते हैं ॥२०॥


स किं राजा यो न रक्षति प्रजाः ॥२१॥

अर्थ: जो अपनी प्रजा की रक्षा-पालन नहीं करता, वह राजा निंद्य है।


स्वधर्ममतिक्रामतां सर्वेषां पार्थिवो गुरुः ॥२२॥

अर्थ: यदि ब्राह्मण-आदि वर्ण और ब्रह्मचारी आदि आश्रम के सब लोग अपने-अपने धर्म का उल्लंघन करने लगें उस समय उनको रोकने के लिए राजा ही समर्थ होता है ॥२२॥


परिपालको हि राजा सर्वेषां धर्मषष्ठांशमवाप्नोति ॥२३॥

अर्थ: जो राजा समस्त वर्णाश्रम-धर्म की रक्षा करता है वह उस धर्म के छठे भाग के फल को प्राप्त होता है ॥२३॥


यदाह वैवस्वतो मनुः
“उञ्छषड्भागप्रदानेन वनस्था अपि तपस्विनो राजानं सम्भावयन्ति ॥२४॥

तस्यैव तद्भूयात् यस्तान् गोपायती” इति॥ २५॥

अर्थ (सूत्र 24 से 25): वैवस्वतमनु हिन्दू धर्म का शास्त्रकार-ने कहा है कि वनवासी तपस्वी लोग भी जो कि स्वामी हित एवं निर्जन पर्वत-आदि प्रदेशों में वर्तमान धान्यादि के कणों से अपना जीवन-निर्वाह करते हैं, राजा को अपने द्वारा संचित धान्य-कणों का छठवाँ भाग देकर अपने द्वारा किये हुए तप के छठवें भाग से उसकी उन्नति की कामना करते हैं, एवं अपनी क्रिया के अनुष्ठान के समय यह संकल्प करते हैं कि “जो राजा तपस्वियों की रक्षा करता है उसको ही हमारे द्वारा आचरण किया हुआ तप या उसका फल प्राप्त होवे”।


तदमंगलमपि नामंगलं यत्रास्यात्मनो भक्तिः ॥२६॥

अर्थ: जिस पदार्थ में जिसे प्रेम होता है, वह अनिष्ट-अमंगलीक (अशुभ) होने पर भी उसके लिए इष्ट-मंगलीक है।


संन्यस्ताग्निपरिग्रहानुपासीत ॥२७॥

अर्थ: मनुष्य को साधु महात्माओं एवं विद्वान् गृहस्थाचार्यों की उपासना-सेवा करनी चाहिए।


स्नात्वा प्राग्देवोपासनान्न कंचन स्पृशेत् ॥२८॥

अर्थ: मनुष्य को स्नान करके ईश्वर भक्ति करनी चाहिए, उसके पहले उसे किसी अस्पृश्य-न छूने लायक-वस्तु का स्पर्श नहीं करना चाहिए ॥२८॥


देवागारे गतः सर्वान् यतीनात्मसम्बन्धिनीर्जरतीःपश्येत् ॥२९॥

अर्थ: मनुष्यों को मन्दिर में जाकर ईश्वरभक्ति के पश्चात् समस्त साधुजनों और वयोवृद्ध कुलस्त्रियों को यथायोग्य नमस्कार करना चाहिए ॥२९॥


देवाकारोपेतः पाषाणोऽपि नावमन्येत तत्किं पुनर्मनुष्यः ? राजशासनस्य
मृत्तिकायामिव लिंगिषु को नाम विचारो यतः स्वयं मलिनो खलः प्रवर्धयत्येव क्षीरं
धेनूनां, न खलु परेषामाचारः स्वस्य पुण्यमारभते किन्तु मनोविशुद्धिः ॥३०॥

अर्थ: ईश्वर के आकार को प्राप्त हुआ पाषाण-प्रतिष्ठित देवमूर्ति-भी जब तिरस्कार करने योग्य नहीं है तो क्या मनुष्य तिरस्कार करने योग्य है ? अर्थात् नहीं है।


दानादिप्रकृतिः प्रायेण ब्राह्मणानाम् ॥३१॥

अर्थ: ब्राह्मणों का स्वभाव प्रायः करके दान की अपेक्षा करना, ईश्वर-आदि की पूजन करना और पढ़ना-पढ़ाना आदि का होता है। अथवा दान-शुद्धि, दया और दाक्षिण्य-आदि करने का होता है।


बलात्कारस्वभावः क्षत्रियाणाम् ॥३२॥

अर्थ: क्षत्रियों का स्वभाव दूसरों पर बलात्कार करने का होता है ॥३२॥


निसर्गतः शाठ्यं किरातानाम्१ ॥३३॥

अर्थ: किरातों-वणिकों की प्रकृति स्वभाव से छल-कपट करने की होती है ॥३३॥


ऋजुवक्रशीलता सहजा कृषीवलानाम् ३४॥

अर्थ: किसानों तथा शूद्रों के सरलता और कुटिलता स्वाभाविक ही होती है ॥३४॥


दानावसानः कोपो ब्राह्मणानाम् ॥३५॥

अर्थ: ब्राह्मणों का क्रोध दानपर्यन्त रहता है-दान मिलने से शान्त हो जाता है।


प्रणामावसानः कोपो गुरुणाम् ॥३६॥

अर्थ: गुरुजनों का क्रोध प्रणाम करने पर्यन्त रहता है, परन्तु प्रणाम करने के पश्चात् नष्ट हो जाता हे ॥३६॥


प्राणावसानः कोपः क्षत्रियाणाम् ॥३७॥

अर्थ: क्षत्रियों का क्रोध मरण पर्यन्त-चिरकाल तक रहता है। अथवा उनका क्रोध प्राणों को नष्ट करने वाला होता है।


प्रियवचनावसानः कोपो वणिग्जनानाम्१ ॥३८॥

अर्थ: वणिकों का क्रोध प्रियभाषण पर्यन्त होता है-ये लोग मीठे वचनों द्वारा क्रोध को त्यागकर संतुष्ट हो जाते हैं ॥३८॥


वैश्यानां समुद्धारकप्रदानेन कोपोपशमः३ ॥३९॥

अर्थ: जमींदार वैश्यों का क्रोध उनका कर्जा चुका देने से शांत हो जाता है ॥३६॥


निश्चलैः परिचितैश्च सह व्यवहारो वणिजां निधिः५ ॥४०॥

अर्थ: वैश्य लोग उन्हीं के साथ कर्जा देने का व्यवहार करते हैं, जिनके पास मकान और खेत आदि होते हैं और जो एक जगह स्थायी रीति से रहते हैं एवं जिनकी आमदनी और खर्च-आदि से परिचित होते हैं। ऐसा करने से-विश्वस्तों को कर्जा देने से-भविष्य में कोई खतरा (धन-डूबने की शंका) नहीं रहता किन्तु उनसे उन्हें प्रचुर धन मिलता है ॥४०॥


दण्डभयोपधिभिर्वशीकरणं नीचजात्यानाम् ॥४१॥

अर्थ: नीच पुरुषों का वशीकरण मंत्र दंड का भय ही है ॥४१॥

८. वार्ता-समुद्देशः

कृषिः पशुपालनं वणिज्या च वार्ता वैश्यानाम् ॥१॥

अर्थ: खेती, पशुपालन और व्यापार करना यह वैश्यों की जीविका-जीवन-निर्वाह का साधन है।


वार्तासमृद्धौ सर्वाः समृद्धयो राज्ञः ॥२॥

अर्थ: जिस राजा के राज्य में वार्ता-कृषि, पशुपालन और व्यापार-आदि प्रजा के जीविकोपयोगी साधनों की उन्नति होती है, वहाँ पर उसे समस्त विभूतियाँ (हाथी-घोड़े और सुवर्ण आदि) प्राप्त होती हैं ॥२॥


तस्य खलु संसारसुखं यस्य कृषिर्धेनवः शाकवाटः सद्मन्युदपानं च ॥३॥

अर्थ: जिस गृहस्थ के यहाँ खेती, गाय-भैंसे, शाक-तरकारी के लिए सुन्दर बगीचा और मकान में मीठे पानी से परिपूर्ण-भरा हुआ कुँआ है उसे सांसारिक सुख प्राप्त होता है ॥३॥


विसाध्यराज्ञस्तंत्रपोषणे नियोगिनामुत्सवो महान् कोशक्षयः ॥४॥

अर्थ: जो राजा सैनिकों के भरण-पोषण करने के लिए खेती की फसल के मौके पर धान्यादि का संग्रह नहीं करता, उसके राजकीय कर्मचारी-मंत्री आदि-को विशेष आनन्द होता है-ये लोग धान्यादि खरीदकर उसे बहुत तेजभाव का बताकर गोलमाल करके बहुत धन हड़प कर जाते है तथा राजा का विशाल खजाना नष्ट हो जाता है।


नित्यं हिरण्यव्ययेन मेरुरपि क्षीयते ॥५॥

अर्थ: जो हमेशा संचित धन खर्च करता रहता है परन्तु नया धन बिल्कुल नहीं कमाता, उसका विशाल खजाना भी धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है। खजाना तो दूर रहे परन्तु विशाल सुमेरु पर्वत में से भी हमेशा सुवर्ण निकाले जाने पर वह भी नष्ट हो जाता है फिर राज-कोष का तो कहना ही क्या है ? अर्थात् वह तो निश्चित ही नष्ट हो जाता है ॥५॥


तत्र सदैव दुर्भिक्षं यत्र राजा विसाधयति ॥६॥

अर्थ: जो राजा अपने राज्य में धान्य संग्रह नहीं करता और अधिक व्यय करता है, उसके यहाँ सदा अकाल रहा करता है, क्योंकि उसे अपनी विशाल सेना के भरण-पोषण करने के लिए अधिक अन्न की आवश्यकता हुआ करती है; इसलिए जब वह राज्य में से धान्य खरीद लेता है, तब उसकी प्रजा को अकाल का दुःख भोगना पड़ता है।


समुद्रस्य पिपासायां कुतो जगति जलानि ? ॥७॥

अर्थ: समुद्र के प्यासे रहने पर संसार में जल किस प्रकार पाया जा सकते हैं ? नहीं पाया जा सकते ।


स्वयं जीवधनमपश्यतो महती हानिर्मनस्तापश्च क्षुत्पिपासाऽप्रतिकारात् पापं
च३ ॥८॥

अर्थ: गाय-भैंस-आदि जीविकोपयोगी धन की देख-रेख न करने वाले पुरुष को महान् आर्थिक-क्षति-हानि उठानी पड़ती है एवं उनके मर जाने से उसे अधिक मानसिक पीड़ा होती है तथा उन्हें भूखे-प्यासे रखने से महान् पाप-बंध होता है। अथवा राजनीति के प्रकरण में गाय-भैंस-आदि जीवन-निर्वाह में उपयोगी सम्पत्ति की रक्षा न करने वाले राजा को बड़ी आर्थिक क्षति-धन की हानि-उठानी पड़ती है एवं उनके असमय में काल-कवलित होने-मर जाने से उसको मानसिक-कष्ट होता है, क्योंकि गो-धन के अभाव हो जाने से राष्ट्र की कृषि और व्यापार आदि जीविका नष्टप्राय हो जाती है। जिसके फलस्वरूप प्रजा की भूख-प्यास को दूर करने के उपाय-कृषि व्यापार-आदि नष्ट हो जाने से उसे महान् पाप-बंध होता है।


वृद्ध-बाल-व्याधित-क्षीणान् पशून् बान्धवानिव पोषयेत् ॥९॥

अर्थ: मनुष्य को अनाथ, माता-पिता से रहित, रोगी और कमजोर पशुओं की अपने बँधुओं की तरह रक्षा करनी चाहिए ॥६॥


अतिभारो महान् मार्गश्च पशुनामकाले मरणकारणम् ॥१०॥

अर्थ: अधिक बोझ लादने से और अधिक मार्ग चलाने से पशुओं की अकाल मृत्यु हो जाती है ॥१०॥


शुल्कवृद्धिर्बलात् पण्यग्रहणं च देशान्तरभाण्डानाम्प्रवेशे हेतुः ॥११॥

अर्थ: जिस राज्य में दूसरे देश की चीजों पर ज्यादा कर-टेक्स-लगाया जाता हो तथा जहाँ के राज-कर्मचारीगण जबर्दस्ती थोड़ा मूल्य देकर व्यापारियों से वस्तुएँ छीन लेते हों, उस राज्य में अन्य देशों से माल-आना बन्द हो जाता है ॥९१॥


काष्ठपात्र्यामेकदैव पदार्थो रध्यते ॥१२॥

अर्थ: लकड़ी की हाँडी में एक ही बार पदार्थ पकाया जा सकता है दूसरी बार नहीं; क्योंकि फिर वह नष्ट हो जाती है।


तुलामानयोरव्यवस्था व्यवहारं दूषयति ॥१३॥

अर्थ: जिस राज्य में तराजू, तोलने के बाँट (गुञ्जादि) और नापने के पात्र-द्रोणादि-यथोचित (ठीक) नहीं रखे जाते-जहाँ पर वणिक जन दूसरों से वस्तु खरीदने के लिए अपनी तराजू और बाँटों को बड़े और देते समय छोटे करते हैं, वहाँ पर शिष्ट पुरुषों का व्यवहार-खरीदना-बेचना-नष्ट हो जाता है।


वणिग्जनकृतोऽर्थः स्थितानागन्तुकांश्च पीडयति ॥१४॥

अर्थ: जिसके राज्य में व्यापारीगण वस्तुओं-अन्न-वस्त्रादि-का मूल्य स्वेच्छापूर्वक बढ़ाकर धन-संचय करते हैं, इससे वहाँ की प्रजा को और बाहर से आये हुए लोगों को कष्ट होता है-दरिद्र हो जाने से दुःख होता है।


देश-काल-भांडापेक्षया वा सर्वार्घो भवेत् ॥१५॥

अर्थ: समस्त वस्तुओं-अन्न, वस्त्र और सुवर्ण-आदि पदार्थों-का मूल्य देश, काल और पदार्थों के ज्ञान की अपेक्षा से होना चाहिए।


पण्यतुलामानवृद्धौ राजा स्वयं जागृयात् ॥१६॥

अर्थ: राजा को उन व्यापारियों की जाँच-पड़ताल करनी चाहिए, जो कि बहुमूल्य वाली वस्तुओं में अल्प मूल्यवाली वस्तुओं की मिलावट करते हों, दो प्रकार की तराजुएँ रखते हों तथा नापने-तोलने के बाँटों आदि (प्रस्थ और गुञ्जादि) में कमी-वेशी करते हों।


न वणिग्भ्यः सन्ति परे पश्यतोहराः ॥१७॥

अर्थ: वणिक लोगों को छोड़कर दूसरे कोई प्रत्यक्ष चोर नहीं हैं।


स्पर्द्धया मूल्यवृद्धिर्भाण्डेषु राज्ञो यथोचितं मूल्यं विक्रेतुः ॥१८॥

अर्थ: यदि व्यापारी लोग परस्पर की ईर्ष्या-वश वस्तुओं का मूल्य बढ़ा देवें-अपनी वस्तुओं को अधिक तेजभाव से बेचने लगें-उस समय राजा का कर्तव्य है कि वह उस बढ़ाये हुए मूल्य को व्यापारी-वर्ग से छीन लेवे और व्यापारियों को केवल उचित मूल्य ही देवे ॥१८॥


अल्पद्रव्येण महाभाण्डं गृह्णतो मूल्याविनाशेन तद्भाण्डं राज्ञः ॥१९॥

अर्थ: यदि किसी व्यापारी ने-किसी की बहुमूल्य वस्तु-सुवर्ण आदि को धोखा देकर थोड़े मूल्य में खरीद ली हो, तो राजा को खरीदने वाले की वह-बहुमूल्य वस्तु जब्त कर लेनी चाहिए परन्तु बेचने वाले को उतना अल्पमूल्य जितना उसे खरीददार ने दिया था दे देना चाहिए ॥१६॥


अन्यायोपेक्षा सर्वं विनाशयति ॥२०॥

अर्थ: जो राजा राष्ट्र में होने वाले अन्यायों की उपेक्षा करता है-अन्याय करने वाले चोर-आदि को यथोचित दंड नहीं देता-उसका समस्त राज्य नष्ट हो जाता है ॥२०॥


चौर-चरट-मन्नप-धमन-
राजवल्लभ्राटविकतलाराक्षशालिकनियोगिग्रामकूटवार्द्धुषिका हि राष्ट्रस्य
कण्टकाः ॥२१॥

अर्थ: चोर, देश से बाहर निकाले हुए अपराधी, खेतों को या मकान वगैरह की नाप करने वाले, व्यापारियों की वस्तु का मूल्य निश्चय करने वाले, राजा के प्रेमपात्र, जंगल में रहने वाले भील वगैरह या जंगल की रक्षा में नियुक्त किये गये अधिकारी, स्थान की रक्षा में नियुक्त किये गये कोतवाल या पुलिस वगैरह, जुआरी या सेनापति, राज्य के अधिकारी वर्ग, पटवारी, बलवान् पुरुष तथा अन्न-संग्रह करके अकाल दुर्भिक्ष की कामना करने वाले व्यापारी लोग ये राष्ट्र के कण्टक-शत्रु हैं।


प्रतापवति राज्ञि निष्ठुरे सति न भवन्ति राष्ट्रकण्टकाः ॥२२॥

अर्थ: जिस देश में राजा प्रतापी (पुण्यशाली, राजनीतिविद्या में कुशल और तेजस्वी) तथा कठोरशासन करने वाला होता है, उसके राज्य में राष्ट्रकण्टक-प्रजा को पीड़ित करने वाले अन्यायी चौर वगैरह नहीं होते॥ २२॥


अन्यायवृद्धितो वार्द्धुषिकास्तंत्रं देशं च नाशयन्ति ॥२३॥

अर्थ: पूर्वोक्त राष्ट्र कण्टकों में से अन्न का संग्रह करके दुर्भिक्ष-अकाल-पैदा करने वाले व्यापारी लोग देश में अन्याय की वृद्धि करते हैं, इससे वे राष्ट्र के समस्त तंत्र-व्यवहार या चतुष्पद-आदि (गाय भैंस वगैरह पशुओं-आदि) तथा समस्त देश को नष्ट कर देते हैं।


कार्याकार्ययोर्नास्ति दाक्षिण्यं वार्द्धुषिकानाम् ॥२४॥

अर्थ: वार्द्धषिकों-लोभवश राष्ट्र का अन्न-संग्रह करके दुर्भिक्ष पैदा करने वाले व्यापारियों-के कर्तव्य-अकर्तव्य में लज्जा नहीं होती अथवा उनमें सरलता नहीं होती-वे कुटिल प्रकृति वाले होते हैं।


अप्रियम्प्यौषधं पीयते ॥२५॥

अर्थ: शारीरिक स्वास्थ्य-रक्षा के लिए विवेकी मनुष्यों के द्वारा कड़वी औषधि भी-कड़वे क्वाथ (काढ़े) आदि भी पी जाती है, पुनः मीठी औषधि के बारे में तो कहना ही क्या है? अर्थात् वह तो अवश्य सेवन की जाती है।


अहिदष्टा स्वाङ्गुलिरपि च्छिद्यते॥ २६॥

अर्थ: वह अंगुलि भी जिसमें सर्प के द्वारा डसी-काटी-जाने से जहर चढ़ गया है, शेष शरीर की रक्षा के लिए काट दी जाती है।

९. दण्डनीति-समुद्देशः

चिकित्सागम इव दोषविशुद्धिहेतुर्दण्डः ॥१॥

अर्थ: जिस प्रकार आयुर्वेद-शास्त्र के अनुकूल औषधि-सेवन से रोगी के समस्त विकृत दोष-वात, पित्त और कफादि का विकार एवं उससे होने वाले बुखार-गलगण्डादि समस्त रोग-विशुद्ध-शान्त (नष्ट) हो जाते हैं, उसी प्रकार अपराधियों को दण्ड देने से उनके समस्त अपराध (विशुद्ध) नष्ट हो जाते हैं।


यथादोषं दण्डप्रणयनं दण्डनीतिः॥२॥

अर्थ: अपराधी को उसके अपराध के अनुकूल दण्ड देना दण्डनीति है-जिस व्यक्ति ने जैसा अपराध किया है, उसे उसके अनुकूल दण्ड देना यही दण्डनीति है। उदाहरण में-जैसे जुर्माना-योग्य अपराधी को उसके अपराधानुकूल जुर्माना करना न्यायोचित दण्डनीति है और इसके विपरीत कारावास-जेलखाने- की कड़ी सजा अन्याययुक्त-तीक्ष्ण दण्ड है इत्यादि।


प्रजापालनाय राज्ञा दण्डः प्रणीयते न धनार्थम् ॥३॥

अर्थ: राजा के द्वारा प्रजा की रक्षा करने के लिए अपराधियों को दण्डविधान किया जाता है, धन-प्राप्ति के लिए नहीं।


स किं राजा वैद्यो वा यः स्वजीवनाय प्रजासु दोषमन्वेषयति ॥४॥

अर्थ: जो राजा अपने निर्वाह के लिए प्रजाजनों में दोषों-अपराधों-का अन्वेषण करता है-धन के लोभ से साधारण अपराधों में भी अधिक जुर्माना-आदि करता है, वह राजा नहीं किन्तु प्रजा का शत्रु है एवं जो वैद्य अपने निर्वाह के लिए जनता के रोगों का अन्वेषण करता है-रोगों को बढ़ाने वाली औषधियाँ देता है-वह वैद्य नहीं किन्तु शत्रु है॥ ४॥


दण्ड-द्यूत-मृत-विस्मृत-चौर-पारदारिक-प्रजाविप्लवजानि द्रव्याणि न राजा
स्वयमुपयुञ्जीत ॥५॥

अर्थ: राजा को अपराधियों के जुर्मने से आए हुए, जुंआ में जीते हुए, लड़ाई में मारे हुए, नदी, तालाब और रास्ता आदि में मनुष्यों के द्वारा भूले हुए धन का और चोरों के धन का तथा पति-पुत्रादि कुटुम्बी से रहित अनाथ स्त्री का धन या रक्षक-हीन कन्या का धन और गदर वगैरह के कारण जनता के द्वारा छूटे हुए धनों का स्वयं उपभोग नहीं करना चाहिए।


दुष्प्रणीतो हि दण्डः कामक्रोधाभ्यामज्ञानाद्वा सर्वविद्वेषं करोति ॥६॥

अर्थ: जो राजा अज्ञानतापूर्वक काम और क्रोध के वशीभूत होकर दण्डनीति-शास्त्र की मर्यादा-अपराध के अनुकूल पात्रादि का विचार करके दण्ड देने-का उल्लंघन करके अनुचित ढंग से दण्ड देता है उससे समस्त प्रजा के लोग द्वेष करने लगते हैं ॥६॥


अप्रणीतो हि दण्डो मात्स्यन्यायमुत्पादयति, वलीवानवलं ग्रसति इति
मात्स्यन्यायः ॥७॥

अर्थ: यदि अपराधियों को दण्ड-प्रयोग सर्वथा रोक दिया जाय, तो प्रजा में मात्स्यन्याय-बड़ी मछली के द्वारा छोटी मछली का खाया जाना-उत्पन्न हो जायगा। अर्थात् जिस प्रकार बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है उसी प्रकार बलवान् पुरुष निर्बलों को कष्ट पहुँचाने में तत्पर हो जावेगा।

(१०) मंत्रि-समुद्देशः

मंत्रि-पुरोहित-सेनापतीनां यो युक्तमुक्तं करोति स आहार्यबुद्धिः ॥१॥

अर्थ: जो राजा मंत्री, पुरोहित और सेनापति के कहे हुए धार्मिक एवं आर्थिक सिद्धान्तों का पालन करता है, उसे आहार्यबुद्धि-युक्त कहते हैं।


असुगन्धमपि सूत्रं कुसुमसंयोगात् किन्नोरोहति देवशिरसि ? ॥२॥

अर्थ: पुष्पमाला के आकार को प्राप्त हुए तंतु सुगन्धि-रहित होने पर भी पुष्पों की संगति-संयोग से क्या देवताओं के शिर पर धारण नहीं किये जाते ? अवश्य किये जाते हैं।


महद्भिः पुरुषैः प्रतिष्ठितोऽश्मापि भवति देवः किं पुनर्मनुष्यः ॥३॥

अर्थ: अचेतन और प्रतिमा की आकृति-युक्त पाषाण भी विद्वानों के द्वारा प्रतिष्ठित होने से देव हो जाता है-देव की तरह पूजा जाता है। तब “सचेतन पुरुष का महापुरुषों की संगति से उन्नत हो जाना” इसे तो कहना ही क्या है ? अर्थात् अवश्य उन्नत हो जाता है ॥३॥


तथा चानुश्रूयते विष्णुगुप्तानुग्रहादनधिकृतोऽपि किल चन्द्रगुप्त
साम्राज्यपदमवापेति ॥४॥

अर्थ: इतिहास बताता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य (सम्राट् नन्द का पुत्र) ने स्वयं राज्य का अधिकारी न होने पर भी विष्णुगुप्त-चाणक्य नाम के विद्वान् के अनुग्रह से साम्राज्य पद को प्राप्त किया ॥४॥


ब्राह्मणक्षत्रियविशामेकतमं
स्वदेशजमाचाराभिजनविशुद्धमव्यसनिनमव्यभिचारिणमधीता
खिलव्यवहारतंत्रमस्त्रज्ञमशेषोपाधिविशुद्धं च मंत्रिणं कुर्वीत ॥५॥

अर्थ: बुद्धिमान राजा या प्रजा को निम्नप्रकार के गुणों से विभूषित प्रधान मंत्री नियुक्त करना चाहिए। जो द्विज-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों में से एक हो किन्तु शूद्र न हो, अपने देश आर्यावर्त का निवासी हो, किन्तु विदेश का रहने वाला न हो, सदाचारी अर्थात् दुष्कर्मों में प्रवृत्ति करने वाला न हो। किन्तु पवित्र आचरण वाला हो। जो कुलीन हो-जिसके माता और पिता का पक्ष (वंश) विशुद्ध हो (जो कि विवाहित समान वर्ण वाले माता-पिता से उत्पन्न हो)। जो जुआ खेलना, मद्यपान करना और परस्त्रीसेवन आदि व्यसनों से दूर हो। जो द्रोह करने वाला न हो-जो दूसरे राजा से मिला हुआ न होकर केवल अपने स्वामी में ही श्रद्धालुयुक्त हो। व्यवहार विद्या में निपुण-नीतिज्ञ (जिसने समस्त व्यवहार शास्त्रों-नीतिशास्त्रों के रहस्य का अध्ययन किया हो) युद्ध विद्या में निपुण तथा शत्रु-चेष्टा की परीक्षा में निपुण हो अथवा समस्त प्रकार के छल-कपट से रहित हो अर्थात् दूसरे के कपट को जानने वाला होने पर भी स्वयं कपट करने वाला न हो।


समस्तपक्षपातेषु स्वदेशपक्षपातो महान् ॥६॥

अर्थ: समस्त पक्षपातों में अपने देश का पक्षपात प्रधान माना गया है।


विषनिषेक इव दुराचारः सर्वान् गुणान् दूषयति ॥७॥

अर्थ: दुराचार-खोटा आचरण (कुत्सित और निंद्य कर्मों में प्रवृत्ति) विष-भक्षण की तरह समस्त गुणों का नाश कर देता है, अर्थात् जिस प्रकार विष का भक्षण जीवन नष्ट कर देता है उसी प्रकार दुराचार भी विद्या, कला और नीतिमत्ता आदि मानवोचित गुणों को अथवा राज्य की वृद्धि और रक्षा करने वाले संधि और विग्रह आदि षाड्गुण्य को नष्ट कर देता है।


दुष्परिजनो मोहेन कुतोऽप्यपकृत्य न जुगुप्सते ॥८॥

अर्थ: नीच कुलवाला मंत्री राजा से द्रोह करके भी मोह के कारण किसी से भी लज्जा नहीं करता।


सव्यसनसचिवो राजारूढ़व्यालगज इव नासुलभोऽपायः ॥९॥

अर्थ: जिस राजा का मंत्री जुआ, मद्यपान और परकलत्रसेवन-आदि व्यसनों में फँसा हुआ है, वह राजा पागल हाथी पर चढ़े हुए मनुष्य की तरह शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥६॥


किं तेन केनापि यो विपदि नोपतिष्ठते ॥१०॥

अर्थ: उस मंत्री, मित्र या सेवक से क्या लाभ है ? जो विपत्ति के समय अपने स्वामी या मित्र की सहायता नहीं करता किन्तु उल्टा उससे द्रोह करता है, चाहे वह कितना ही विद्वान् और व्यवहार कुशल ही क्यों न हो।


भोज्येऽसम्मततोऽपि हि सुलभो लोकः ॥११॥

अर्थ: यह निश्चित है कि भोजन की वेला में बिना बुलाये आने वाले लोग बहुत हैं। अर्थात्-सुख के समय सभी लोग सहायक हो जाते हैं किंतु दुःख में कोई सहायक नहीं होता। अतएव विपत्ति में सहायता करने वाला पुरुष राजमंत्री पद के योग्य है अन्य नहीं ॥११॥


किं तस्य भक्त्या यो न वेत्ति स्वामिनो हितोपायमहितप्रतीकारं वा ॥१२॥

अर्थ: जो मंत्री अपने स्वामी को उन्नति के उपाय (कोष-वृद्धि-आदि) और दुःखों का प्रतीकार-शत्रु का नाश-आदि-को नहीं जानता, किन्तु केवल भक्ति मात्र दिखाता है ‘‘उस मंत्री की केवल भक्ति से क्या लाभ है ? कोई लाभ नहीं ॥१२॥


किं तेन सहायेनास्त्रज्ञेन मंत्रिणा यस्यात्मरक्षणेऽप्यस्त्रं न प्रभवति३ ॥१३॥

अर्थ: जिसका शस्त्र-खड्ग और धनुष-आदि-अपनी रक्षा करने में भी समर्थ नहीं है ऐसे शस्त्र विद्या में प्रवीण सहायक मंत्री से राजा का क्या लाभ हो सकता है ? कोई लाभ नहीं हो सकता।


धर्मार्थकामभयेषु व्याजेन परचित्तपरीक्षणमुपधा४ ॥१४॥

अर्थ: शत्रु के धर्म, अर्थ, काम और भय की जानकारी के लिए-अमुक शत्रुभूत राजा धार्मिक है ? अथवा अधार्मिक है ? उसके खजाने में प्रचुर सम्पत्ति है, अथवा नहीं ? वह कामान्ध है ? अथवा जितेन्द्रिय ? बहादुर है ? या डरपोक ? इत्यादि ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से गुप्तचरों के द्वारा छल से शत्रु-चेष्टा की परीक्षा करना, यह ‘उपधा’ या ‘उपाधि’ नाम का राज-मंत्री का प्रधान सद्गुण है।


अकुलीनेषु नास्त्यपवादाद्भयम् ॥१५॥

अर्थ: नीच कुल वाले मंत्री आदि अपनी अपकीर्ति-लोक में होने वाली निन्दा-से नहीं डरते।


अलर्कविषवत् कालं प्राप्य विकुर्वते विजातयः ॥१६॥

अर्थ: नीचकुल वाले राजमंत्री वगैरह पुरुष कालान्तर में (राजा के ऊपर आपत्ति आने पर) पागल कुत्ते के विष की तरह विरुद्ध हो जाते हैं।


तदमृतस्य विषत्वं यः कुलीनेषु दोषसम्भवः ॥१७॥

अर्थ: कुलीन पुरुषों में विश्वासघात-आदि दोषों का होना अमृत का विष होने के समान है। अर्थात् जिस प्रकार अमृत विष नहीं हो सकता, उसी प्रकार उच्च कुल वालों में भी विश्वासघात आदि दोष नहीं हो सकते ॥१७॥


घटप्रदीपवत्तज्ज्ञानं मंत्रिणो यत्र न परप्रतिबोधः ॥१८॥

अर्थ: जिस ज्ञान के द्वारा दूसरों को समझा कर सन्मार्ग पर न लगाया जावे, वह मंत्री या विद्वान् का ज्ञान घट में रखे हुए दीपक के समान व्यर्थ है अर्थात् जिस प्रकार उजालकर घड़े में स्थापित किया हुआ दीपक केवल घड़े को ही प्रकाशित करता है, परन्तु बाह्य देश में रहने वाले पदार्थों को प्रकाशित नहीं करता, इसलिए वह व्यर्थ समझा जाता है, उसी प्रकार मंत्री अपने राजा को और विद्वान् पुरुष दूसरों को समझाने की कला में यदि प्रवीण नहीं है, तो उसका ज्ञान निरर्थक है ॥१८॥


तेषु शस्त्रमिव शास्त्रमपि निष्फलं येषां प्रतिपक्षदर्शनाद्भयमन्वयन्ति
चेतांसि ॥१९॥

अर्थ: जिन वीर पुरुषों के चित्त शत्रुओं को देखकर भयभीत होते हैं उनका शस्त्र-धारण जिस प्रकार व्यर्थ है, उसी प्रकार जिन विद्वान् पुरुषों के मन वादियों-विरुद्ध सिद्धान्त का समर्थन करने वाले पुरुषों- को देखकर भयभीत होते हैं, उनका शास्त्रज्ञान भी निरर्थक है ॥१९॥


तच्छस्त्रं शास्त्रं वात्मपरिभवाय यन्न हन्ति परेषां प्रसरं१ ॥२०॥

अर्थ: जिस वीर पुरुष का शस्त्र शत्रुओं के बढ़ते हुए वेग-आक्रमण-को नष्ट नहीं करता, उसका शस्त्र-धारण करना उसके पराभव-पराजय (हार) के लिए है। एवं जिस विद्वान् पुरुष का शास्त्रज्ञान वादियों के बढ़ते हुए वेग को नहीं रोकता, उसका शास्त्रज्ञान भी उसके पराजय का कारण होता है।


न हि गली वलीवर्दो भारकर्मणि केनापि युज्यते ॥२१॥

अर्थ: कोई भी विद्वान् पुरुष गाय के बछड़े को बोझा ढोने में नहीं लगाता।


मंत्रपूर्वः सर्वोऽप्यारंभः क्षितिपतीनाम् ॥२२॥

अर्थ: राजाओं को अपने समस्त कार्यों (संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभाव) का प्रारम्भ मंत्रपूर्वक-सुयोग्य मंत्रियों के साथ निश्चय करके करना चाहिए।


अनुपलब्धस्य ज्ञानं, उपलब्धस्य निश्चयः, निश्चितस्य बलाधानं, अर्थस्य द्वैधस्य संशयच्छेदनं, एकदेशलब्धस्याशेषोपलब्धिरिति मंत्रसाध्यमेतत् ॥२३॥

अर्थ: सन्धि व विग्रह-आदि में उपयोगी एवं अज्ञात-बिना जाने हुए-या अप्राप्त (बिना प्राप्त किये हुए) शत्रु-सैन्य वगैरह कार्य का जानना या प्राप्त करना। जाने हुए कार्य का निश्चय करना अथवा प्राप्त किये हुए को स्थिर करना। निश्चित कार्य को दृढ़ करना या किसी कार्य में संदेह उत्पन्न होने पर उसका निवारण करना। उदाहरण में शत्रुभूत राजा के देश से आये हुए पहले गुप्तचर ने शत्रुसैन्य-आदि के बारे में कुछ और कहा तथा दूसरे ने उससे विपरीत कह दिया ऐसे अवसर पर तीसरे विश्वासपात्र गुप्तचर को भेजकर उक्त संशय का निवारण करना अथवा अमुक शत्रुभूत राजा से सन्धि करना चाहिए? अथवा विग्रह-आदि करना चाहिए ? इस प्रकार का संशय उत्पन्न होने पर प्रबल प्रमाणों से उसको निवारण करना और एक देश प्राप्त किये हुए भूमि आदि पदार्थों को पूर्ण प्राप्त करना अथवा एक देश जाने हुए कार्य के शेष भाग को भी जान लेना ये सब कार्य राजा को मंत्र-मंत्री आदि की सलाह से सिद्ध करना चाहिए। अथवा उक्त मंत्र से इन सब कार्यों की सिद्धि होती है।


अकृतारम्भमारब्धस्याप्यनुष्ठानमनुष्ठितविशेषं विनियोगसम्पदं च ये कुर्युस्ते
मंत्रिणः ॥२४॥

अर्थ: जो बिना प्रारम्भ किये हुए कार्यों का प्रारम्भ करें, प्रारम्भ किये हुए कार्यों को पूरा करें और जो कार्य पूरे हो चुके हों उनमें कुछ विशेषता लावें तथा अपने अधिकार का उचित स्थान में प्रभाव दिखावें उन्हें मंत्री कहते हैं ॥२४॥


कर्मणामारम्भोपायः पुरुषद्रव्यसंपद्देशकालविभागो विनिपातप्रतीकारः
कार्यसिद्धिश्चेति पंचांगो मंत्रः ॥२५॥

अर्थ: मंत्र के पाँच अंग होते हैं। १. कार्य के प्रारम्भ करने का उपाय, २. पुरुष और द्रव्यसम्पत्ति, ३. देश और काल का विभाग, ४. विनिपात-प्रतीकार और ५ कार्यसिद्धि। अमुक देश और काल प्रतिकूल है। इसका विभाग (विचार) करना मंत्र का तीसरा अंग है, अथवा अपने देश में देश (दुर्ग आदि के बनाने के लिए जनपद के बीच का देश) और काल-सुभिक्ष-दुर्भिक्ष तथा वर्षा एवं दूसरे के देश में सन्धि-आदि करने पर कोई उपजाऊ प्रदेश और काल-आक्रमण करने या न करने का समय कहलाता है, इनका विचार करना यह देश-काल विभाग नाम का तीसरा मन्त्राङ्ग कहलाता है। किसी विद्वान् ने कहा है “कि जिस प्रकार नदी की मछली जमीन पर प्राप्त होने से नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार राजा भी खोटे देश को प्राप्त होकर नष्ट हो जाता हैं ॥१॥” जिस प्रकार कौआ रात्रि के समय और उल्लू दिन के समय घूमता हुआ नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार राजा भी वर्षा-काल-आदि खोटे समय को प्राप्त होकर नष्ट हो जाता है। अर्थात्-वर्षा-ऋतु-आदि कुसमय में लड़ाई करने वाला राजा भी अपनी सेना को निस्सन्देह कष्ट में डाल देता है ॥२॥ ४. विनिपात प्रतीकार-आई हुई आपत्तियों के नाश का उपाय चिंतन करना। जैसे अपने दुर्ग-आदि पर आने वाले या आये हुये विघ्नों का प्रतीकार करना यह मंत्र का “विनिपात प्रतिकार” नामक चौथा अंग हैं। किसी विद्वान् ने कहा है कि जो मनुष्य आपत्ति पड़ने पर मोह (अज्ञान) को प्राप्त नहीं होता और यथाशक्ति उद्योग करता है, वह उस आपत्ति को नष्ट कर देता हैं ॥१॥” ५. कार्यसिद्धि-उन्नति, अवनति और सम-अवस्था यह तीन प्रकार को कार्य-सिद्ध हैं। जिन सामादि उपायों से विजिगीषु राजा अपनी उन्नति, शत्रु की अवनति या दोनों को सम-अवस्था को प्राप्त हो, यह कार्य सिद्धि नाम का पाँचवाँ मंत्राङ्ग हैं। किसी विद्वान् ने कहा है “कि जो मनुष्य साम, दाम, दंड व भेद उपायों से कार्य-सिद्धि चिंतन करता हैं और कहीं पर उससे विरक्त नहीं होता, उसका कार्य निश्चय से सिद्ध हो जाता हैं ॥१॥ निष्कर्ष-विजिगीषु राजा को समस्त मंत्री-मंडल से या एक से या दो से उक्त पंचाङ्ग मंत्र का विचार वा तदनुकूल प्रवृत्ति करनी चाहिए ॥२५॥


आकाशे प्रतिशब्दवति चाश्रये मंत्रं न कुर्यात् ॥२६॥

अर्थ: जो स्थान चारों तरफ से खुला हुआ हो ऐसे स्थान पर तथा पर्वत व गुफा आदि स्थानों में जहाँ पर प्रतिध्वनि निकलती हो, राजा और मंत्री आदि को मंत्रणा नहीं करनी चाहिए ॥२६॥


मुखविकारकराभिनयाभ्यां प्रतिध्वानेन वा मनःस्थमप्यर्थमभ्यूहन्ति
विचक्षणाः ॥२७॥

अर्थ: चतुर लोग मंत्रणा करने वालों के मुख के विकार से हस्तादि के संचालन से तथा प्रतिध्वनिरूप शब्द से मन में रहने वाले गुप्त अभिप्राय को जान लेते हैं।


आकार्यसिद्धेरक्षितव्यो मंत्रः ॥२८॥

अर्थ: जब तक कार्य सिद्ध न हो जावे तब तक विवेकी पुरुष को अपने मंत्र की रक्षा करनी चाहिए। अर्थात्-उसे प्रकाशित नहीं करना चाहिए, अन्यथा कार्य सिद्ध नहीं हो पाता ॥२८॥


दिवा नक्तं वाऽपरीक्ष्य मंत्रयमाणस्याभिमतः प्रच्छन्नो वा भिनत्ति मंत्रम् ॥२९॥

अर्थ: जो व्यक्ति दिन या रात्रि में मन्त्रणा करने योग्य स्थान की परीक्षा किये बिना ही मंत्र करता है उसका गुप्त मंत्र प्रकाशित हो जाता है, क्योंकि छिपा हुआ आत्मीय पुरुष उसे सुनकर प्रकाशित कर देता है ॥२६॥


श्रूयते किल रजन्यां वटवृक्षे प्रच्छन्नो वररुचिर-प्र-शि-खेति पिशाचेभ्यो
वृत्तान्तमुपश्रुत्य चतुरक्षराद्यैः पादैः श्लोकमेकं चकारेति ॥३०॥

अर्थ: इतिहास प्रमाण में वृद्धपुरुषों के मुख से सुना जाता है कि एक समय पिशाच लोग हिरण्यगुप्त संबंधी वृत्तान्त की गुप्त मंत्रणा कर रहे थे, उसे रात्रि में वटवृक्ष के नीचे छिपे हुए वररुचि नाम के मनुष्य (राज मंत्री) ने सुन लिया था; अतएव उस ने हिरण्यगुप्त के द्वारा कहे हुए श्लोक के प्रत्येक पाद संबंधी एक-एक अक्षरों से अर्थात्-चारों पादों के चार अक्षरों-(अ-प्र-शि-ख) से पूर्ण (चारों पाद) श्लोक की रचना कर ली।


न तैः सह मंत्रं कुर्यात् येषां पक्षीयेष्वपकुर्यात् ॥३१॥

अर्थ: राजा ने जिनके बंधु-आदि कुटुम्बियों का अपकार-अनिष्ट (बध-बंधनादि) किया है, उसे उन विरोधियों के साथ मंत्र-गुप्त सलाह नहीं करनी चाहिए, क्योंकि विरोधियों के साथ मंत्रणा करने से उसके भेद का भय रहता है-मंत्र प्रकाशित हो जाता है ॥३१॥


अनायुक्तो मंत्रकाले न तिष्ठेत् ॥३२॥

अर्थ: अर्थात् कोई भी व्यक्ति राजा की आज्ञा के बिना मंत्रणा के समय बिना बुलाया हुआ उस स्थान पर न ठहरे अर्थात् जो पुरुष राजा की आज्ञा के अनुसार विचार करने के लिए बुलाये गये हों, वे ही वहाँ जावें, अन्य (बिना बुलाये हुए) व्यक्ति न जावें।


तथा च श्रूयते शुकसारिकाभ्यामन्यैश्च तिर्यग्भिर्मन्त्रभेदः कृतः ॥३३॥

अर्थ: वृद्ध पुरुषों से सुना जाता है कि पहले कभी तोता मैना ने तथा दूसरे पशुओं ने राजा की गुप्त मंत्रणा को प्रकाशित कर दिया था। -


मंत्रभेदादुत्पन्नं व्यसनं दुष्प्रतिविधेयं स्यात् ॥३४॥

अर्थ: गुप्त मंत्रणा के प्रकाशित हो जाने से राजा को जो संकट पैदा होता है वह कठिनाई से भी नष्ट नहीं हो सकता।


इङ्गितमाकारो मदः प्रमादो निद्रा च मंत्रभेदकारणानि ॥३५॥

अर्थ: गुप्तमंत्र का भेद निम्न प्रकार पाँच बातों से होता है, अतएव उनसे सदा सावधान रहना चाहिए (१) इङ्गित (गुप्त मंत्रणा करने वाले की मुख चेष्टा), (२) शरीर की सौम्य या रौद्र-भयंकर आकृति (३) शराब पीना (४) प्रमाद-असावधानी करना और (५) निद्रा ॥३५॥


इङ्गितमन्यथावृत्तिः ॥ ३६॥

अर्थ: गुप्त अभिप्राय को अभिव्यक्त (प्रकाश) करने वाली शरीर की चेष्टा ‘इङ्गित’ है। अथवा स्वाभाविक क्रियाओं से भिन्न क्रियाओं के करने को इङ्गित (चेष्टा) कहते हैं ॥३६॥


कोपप्रसादजनिताशरीरी विकृतिराकारः ॥३७॥

अर्थ: क्रोध से होने वाली भयंकर आकृति व प्रसन्नता से होने वाली सौम्य-आकृति को ‘आकार’ कहते हैं। अथवा क्रोध से होने वाली मुख की म्लानता एवं प्रसाद से होने वाली मुख की प्रसन्नता को ‘आकार’ कहते हैं। ३७॥


पानस्त्रीसंगादिजनितो हर्षो मदः ॥३८॥

प्रमादो गोत्रस्खलनादिहेतुः ॥३९॥

अन्यथा चिकीर्षतोऽन्यथावृत्तिर्वा प्रमादः ॥४०॥

निद्रान्तरितो [निद्रितः] ॥४१॥

अर्थ (सूत्र 38 से 41): मद्यपान व स्त्रीसंभोग से होने वाले हर्ष को ‘मद’ कहते हैं ॥३८॥ अपने या दूसरों के नाम को भूल जाना या उसका अन्यथा कहना आदि में कारण असावधानी को ‘प्रमाद’ कहते हैं ॥३९॥ इसी प्रकार करने योग्य इच्छित कार्य को छोड़कर दूसरे कार्य को करने लगना ऐसी असावधानतारूप प्रवृत्ति को भी ‘प्रमाद’ कहा गया है ॥४०॥ गाढ़ नींद में व्याप्त होने को ‘निद्रा’ कहा है ॥४१॥


उद्धृतमन्त्रो न दीर्घसूत्रः स्यात् ॥४२॥

अर्थ: विजिगीषु विचार निश्चित हो जाने पर उसे शीघ्र ही कार्यरूप में परिणत करने का यत्न करे, इसमें उसे आलस्य नहीं करना चाहिए। सारांश यह है कि मंत्र में विलम्ब करने से उसके फूटने का भय रहता है जिससे कार्य-सिद्धि नहीं हो पाती। अतः उसे शीघ्र ही कार्यरूप में परिणत करना चाहिए ॥४२॥


अननुष्ठाने छात्रवत् किं मंत्रेण ॥४३॥

अर्थ: विजिगीषु को कर्तव्य-पालन के बिना केवल निश्चित विचार से आलसी विद्यार्थी की तरह कोई लाभ नहीं होता-कार्य-सिद्धि नहीं होती। जिस प्रकार आलसी शिष्य गुरु से मंत्र सीख लेता है, किन्तु तदनुकूल जप वगैरह का आचरण नहीं करता, अतः उसका मंत्र सीखना निष्फल है, उसी प्रकार विजिगीषु भी यदि मंत्रणा के अनुकूल कर्तव्य में प्रवृत्त नहीं होता तो उसकी मंत्रणा भी व्यर्थ है ॥४३॥


न ह्यौषधिपरिज्ञानादेव व्याधिप्रशमः ॥४४॥

अर्थ: केवल औषधि के ज्ञानमात्र से रोग की शांति नहीं हो सकती। सारांश यह है कि जिस प्रकार केवल औषध के जान लेने मात्र से व्याधियों का नाश नहीं होता। किन्तु उसके सेवन से ही होता है, उसी प्रकार विचार-मात्र से सन्धि व विग्रह आदि कार्य सिद्ध नहीं हो सकते, किन्तु मंत्रणा के अनुकूल प्रवृत्ति करने से कार्य सिद्ध होते हैं ॥४४॥


नास्त्यविवेकात् परः प्राणिनां शत्रुः ॥४५॥

अर्थ: संसार में नीतिशास्त्र के अज्ञान को छोड़कर प्राणियों का कोई दूसरा शत्रु नहीं है। क्योंकि नैतिक अज्ञान ही मनुष्य को शत्रु से वध-बंधनादि कष्ट दिलाता है अथवा उससे सभी कार्य नष्ट हो जाते हैं ॥४५॥


आत्मसाध्यमन्येन कारयन्नौषधमूल्यादिव व्याधिं चिकित्सति ॥४६॥

अर्थ: जो मनुष्य स्वयं करने योग्य कार्य को दूसरों से कराता है, वह केवल औषधि के मूल्यज्ञान से ही रोग का परिहार-नाश चाहता है अर्थात् जिस प्रकार केवल दवाई की कीमत समझ लेने मात्र से बीमारी नष्ट नहीं होती, उसी प्रकार स्वयं करने योग्य कार्य को दूसरों से कराने से वह कार्य सिद्ध नहीं होता ॥४६॥


यो यत्प्रतिबद्धः स तेन सहोदयव्ययी ॥४७॥

अर्थ: जो सेवक जिस स्वामी के आश्रित है वह अपने स्वामी की उन्नति से उन्नतिशील और अवनति से अवनतिशील होता है। सारांश यह है कि संसार में सेवक के ऊपर उसके स्वामी को आर्थिक-हानि और लाभ का प्रभाव पड़ता है ॥४७॥


स्वामिनाधिष्ठितो मेषोऽपि सिंहायते ॥४८॥

अर्थ: साधारण (कमजोर) मेढ़ा भी अपने स्वामी से अधिष्ठित हुआ शेर के समान आचरण करता है-बलवान् हो जाता है, फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या है। सारांश यह कि साधारण सेवक भी अपने स्वामी की सहायता को प्राप्त कर वीर हो जाता है ॥४७॥


मंत्रकाले विगृह्य विवादः स्वैरालापश्च न कर्त्तव्यः ॥४९॥

अर्थ: मंत्रियों को मंत्रणा के समय परस्पर में कलह करके वाद-विवाद और स्वच्छन्द बातचीत (हँसी-मजाक आदि) न करनी चाहिए। सारांश यह है कि कलह करने से वैर-विरोध और स्वच्छन्दयुक्ति- अनुभव शून्य-वार्तालाप से अनादर होता है, अतएव मंत्रियों को मंत्र की वेला में उक्त बातें नहीं करनी चाहिए ॥४६॥


अविरुद्धैरस्वैरैर्विहितो मंत्रो लघुनोपायेन महतः कार्यस्य सिद्धिर्मंत्रफलम् ॥५०॥

अर्थ: परस्पर वैर-विरोध न करने वाले-प्रेम और सहानुभूति रखनेवाले और हंसी-मजाक आदि स्वच्छन्द (युक्ति व अनुभव-शून्य) वार्तालाप न करने वाले (सावधान) मंत्रियों के द्वारा जो मंत्रणा की जाती है, उससे थोड़े से उपाय से उपयोगी महान् कार्य की सिद्धि होती है और यही (अल्प उपाय से महान् कार्यसिद्धि करना) मंत्र का फल या माहात्म्य है। सारांश यह कि थोड़े उपाय से थोड़ा कार्य और महान् उपाय से महान् कार्य सिद्ध होना, यह मंत्रशक्ति का फल नहीं है, क्योंकि वह तो मंत्रणा के बिना भी हो सकता है, परन्तु थोड़े से उपाय द्वारा महान् कार्य की सिद्धि होना यही मंत्रशक्ति का माहात्म्य हैं ॥५०॥


न खलु तथा हस्तेनोत्थाप्यते ग्रावा यथा दारुणा ॥५१॥

अर्थ: जिस प्रकार पृथ्वी में गड़ी हुई विशाल पत्थर की चट्टान तिरछी लकड़ी के यन्त्र विशेष से शीघ्र ही थोड़े परिश्रम से उठाई जा सकती है (स्थान से हटाई जाती है-), उस प्रकार हाथों से महान् परिश्रम करने पर भी नहीं उठाई जा सकती। इसी प्रकार मंत्र शक्ति से महान् कार्य भी, थोड़े परिश्रम से सिद्ध हो जाते हैं, बिना मंत्रणा के कदापि सिद्ध नहीं हो सकते ॥५१॥


स मंत्री शत्रुर्यो नृपेच्छयाऽकार्यमपि कार्यरूपतयाऽनुशास्ति ॥५२॥

अर्थ: जो मंत्री राजा की इच्छा से-उसकी आज्ञा के अनुसार चलने के उद्देश्य से-उसको अकर्त्तव्य का कर्त्तव्यरूप से उपदेश देता है, वह राजा का शत्रु है। सारांश यह है कि अकर्त्तव्य में प्रवृत्त होने से राजा की अत्यन्त हानि होती है, इसलिए अकर्त्तव्य का उपदेश देने वाले मंत्री को शत्रु, कहा गया है ॥५२॥


वरं स्वामिनो दुःखं न पुनरकार्योपदेशेन तद्विनाशः ॥५३॥

अर्थ: मंत्री को राजा के लिए दुःख देना उत्तम है-अर्थात् यदि वह भविष्य में हितकारक किन्तु तत्काल अप्रिय लगने वाले ऐसे कठोर वचन बोलकर राजा को दुःखी करता है तो उत्तम है, परन्तु अकर्त्तव्य का उपदेश देकर राजा का नाश करना अच्छा नहीं-अर्थात् तत्काल प्रिय लगने वाले, किन्तु भविष्य में हानिकारक वचन बोलकर अकार्य का उपदेश देकर उसका नाश करना अच्छा नहीं ॥५३॥


पीयूषमपिबतो बालस्य किं न क्रियते कपोलहननं ॥५४॥

अर्थ: जब बच्चा माता के स्तनों का दूध नहीं पीता, तब क्या वह उसके गालों में थप्पड़ लगाकर उसे दूध नहीं पिलाती ? अवश्य पिलाती है। सारांश यह है कि जिस प्रकार माता बच्चे के हित के लिए उससे तात्कालिक कठोर और भविष्य में हितकारक व्यवहार करती है, उसी प्रकार मंत्री को भी राजा की भलाई के लिए भविष्य में हितकारक और तत्काल में कठोर व्यवहार करना चाहिए ॥५४॥


मंत्रिणो राजद्वितीयहृदयत्वान्न केनचित् सह संसर्गं कुर्युः ॥५५॥

अर्थ: मंत्री लोग राजा के दूसरे हृदय रूप होते हैं-राजारूप ही होते हैं, इसलिए उन्हें किसी के साथ स्नेहादि सम्बन्ध न रखना चाहिए ॥५५॥


राज्ञोऽनुग्रहविग्रहावेव मंत्रिणामनुग्रहविग्रहौ ॥५६॥

अर्थ: राजा की सुख-सम्पत्ति ही मंत्रियों की सुख-सम्पत्ति है एवं राजा के कष्ट मंत्रियों के कष्ट समझे जाते हैं अथवा राजा जिस पुरुष का निग्रह (दंड देना) और अनुग्रह करता है, वह मंत्रियों के द्वारा किया हुआ ही समझना चाहिए अर्थात् मंत्रियों को पृथक रूप से उस पुरुष का निग्रह या अनुग्रह नहीं करना चाहिए। अन्यथा (यदि मंत्री लोग, राजा की अवज्ञा करके उस पुरुष का अलग से निग्रह या अनुग्रह करेंगे) “ये मेरे राज्याधिकार को छीनना चाहते हैं। ऐसा समझ राजा उस पर विश्वास नहीं करेगा ॥५६॥


स दैवस्यापराधो न मंत्रिणां यत् सुघटितमपि कार्यं न घटते ॥५७॥

अर्थ: जो मंत्री राजकार्य में सावधान होते हैं, तथापि उनके द्वारा अच्छी तरह मंत्रणापूर्वक किया हुआ भी कार्य जब सिद्ध नहीं होता, उसमें उनका कोई दोष नहीं, किन्तु राजा के पूर्वजन्म संबंधी भाग्य का ही दोष समझना चाहिए ॥५७॥


स खलु नो राजा यो मंत्रिणोऽतिक्रम्य वर्तते ॥५८॥

अर्थ: जो राजा मंत्रियों की बात को उल्लंघन करता है-न उनकी बात सुनता है और न आचरण करता है, वह राजा नहीं रह सकता-उसका राज्य क्रमागत होने पर भी नष्ट हो जाता है ॥५८॥


सुविवेचितान्मंत्राद्भवत्येव कार्यसिद्धिर्यदि स्वामिनो न दुराग्रहः स्यात् ॥५९॥

अर्थ: यदि राजा दुराग्रही-हठी न हो तो अच्छी तरह विचारपूर्वक किये हुए मंत्र से अवश्य कार्य-सिद्धि होती है। सारांश यह है कि जब मंत्रिमंडल अपनी सैनिक शक्ति को दृढ़ और शत्रु की सैनिक शक्ति क्षीण देखता है, एवं देश काल का विचार करके सन्धि-विग्रहादि कार्य प्रारम्भ करता है, तब उसकी अवश्य विजय होती है, परन्तु ऐसे अवसर पर राजा की अनुमति होनी चाहिए, उसे दुराग्रही नहीं होना चाहिए ॥५६॥


अविक्रमतो राज्यं वणिकखड्गयष्टिरिव ॥६०॥

अर्थ: जो राजा पराक्रम-रहित है उसका राज्य वणिक-व्यापारी सेठ के खड्ग के समान व्यर्थ है अर्थात् जिस प्रकार प्रहार-क्रिया में कुशलता न रखने वाले सेठ का खड्ग व्यर्थ है, उसी प्रकार पराक्रम से शून्य राजा का राज्य भी व्यर्थ है, क्योंकि उसे पराक्रमी पुरुष जीत लेते हैं ॥६०॥’’


नीति-सदाचार प्रवृत्ति से लाभ


नीतिर्यथावस्थितमर्थमुपलम्भयति ॥६१॥

अर्थ: नीतिशास्त्र का ज्ञान मनुष्य को करने योग्य कार्य के स्वरूप को बोध करा देता है ॥६१॥


हित-प्राप्ति और अहित-त्याग का उपाय


हिताहितप्राप्तिपरिहारौ पुरुषकारायत्तौ ॥६२॥

अर्थ: हितकारक-सुख देने वाली-वस्तु की प्राप्ति करना और अहित-दुःख देने वाली-वस्तुओं को छोड़ना यह आत्मशक्ति-पुरुषार्थ के अधीन है। सारांश यह है कि जो वस्तु हितकारक होने पर भी दुर्लभ होती है उसे नैतिक मनुष्य पुरुषार्थ-आत्मशक्ति-से प्राप्त कर लेता है। एवं जो वस्तु तत्काल में लाभदायक होने पर भी अहित-फलकाल में दुःखदायक-होती है, उसे वह जितेन्द्रिय होकर-अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके-आत्मशक्ति से छोड़ देता है ॥६२॥


मनुष्य-कर्तव्य


अकालसहं कार्यमद्यस्वीनं न कुर्यात् ॥६३॥

अर्थ: जो कार्य विलम्ब करने योग्य नहीं है-शीघ्र करने योग्य है-उसके करने में विलम्ब (देरी) न करना चाहिए ॥६३॥


कालातिक्रमान्नखच्छेद्यमपि कार्यं भवति कुठारच्छेद्यं ॥६४॥

अर्थ: समय चूक जाने पर नख के द्वारा काटने योग्य-सरलता से किया जाने वाला-कार्य भी कुल्हाड़े से काटने योग्य अत्यन्त कठिन हो जाता है। सारांश यह है कि जो कार्य समय पर किया जाता है वह थोड़े परिश्रम से सिद्ध सफल हो जाता है, परन्तु समय चूक जाने पर उसमें महान् परिश्रम करना पड़ता है ॥६४॥


को नाम सचेतनः सुखसाध्यं कार्यं कृच्छ्रसाध्यमसाध्यं वा कुर्यात् ॥६५॥

अर्थ: कौन ऐसा बुद्धिमान पुरुष होगा ? जो कि सुख से सिद्ध होने योग्य-सरल (थोड़े परिश्रम से सिद्ध होने योग्य) कार्य को दुःख से सिद्ध होने योग्य (कठिन) या असाध्य (बिल्कुल न सिद्ध होने योग्य) करेगा ? कोई भी नहीं करेगा ॥६५॥


एको मंत्री न कर्त्तव्यः ॥ ६६॥

एको हि मन्त्री निरवग्रहश्चरति मुह्यति च कार्येषु कृच्छ्रेषु॥ ६७॥

अर्थ (सूत्र 66 से 67): राजा को केवल एक मंत्री नहीं रखना चाहिए, क्योंकि अकेला मंत्री स्वतन्त्र होने से निरंकुश हो जाता है; इसलिए वह अपनी इच्छा के अनुसार राजा का विरोधी होकर प्रत्येक कार्य को कर डालता है और कठिनता से निश्चय करने योग्य कार्यों में मोह-अज्ञान को प्राप्त हो जाता है।


द्वावपि मंत्रिणौ न कार्यौ॥ ६८॥

द्वौ मंत्रिणौ संहतौ राज्यं विनाशयतः॥ ६९॥

अर्थ (सूत्र 68 से 69): राजा दो मंत्रियों को भी सलाह के लिए न रक्खे; क्योंकि दोनों मंत्री आपस में मिलकर राज्य को नष्ट कर डालते हैं ॥६८-६९॥


निगृहीतौ तौ तं विनाशयतः ॥७०॥

अर्थ: यदि दोनों मंत्रियों का निग्रह किया जाता है, तो वे मिलकर राजा को नष्ट कर देते हैं ॥७०॥


त्रयः पंच सप्त वा मन्त्रिणस्तैः कार्याः ॥७१॥

अर्थ: राजाओं को तीन, पाँच या सात मंत्री नियुक्त करने चाहिए। सारांश यह है कि विषम संख्या वाले मंत्रिमंडल का परस्पर में एक मत होना कठिन है; इसलिए वे राज्य के विरुद्ध षड्यन्त्र-बगावत वगैरह-करने में असमर्थ रहते हैं; अतः राजा को तीन, पाँच या सात मंत्री रखने का निर्देश किया गया हैं ॥७१॥


विषमपुरुषसमूहे दुर्लभमैकमत्यं ॥७२॥

अर्थ: यदि राजा परस्पर में ईर्ष्या करने वाले मंत्रि-मण्डल को नियुक्त करे, तो उसकी किसी योग्य राजकीय काय में एक सम्मति होना कठिन है ॥७२॥


बहवो मंत्रिणः परस्परं स्वमतीरुत्कर्षयन्ति ॥७३॥

अर्थ: परस्पर में ईर्ष्या रखने वाले बहुत से मंत्री राजा के समक्ष अपनी-अपनी बुद्धि का महत्त्व प्रकट करके अपना-अपना मत पुष्ट करते हैं। सारांश यह है कि ईर्ष्यालु बहुत से मंत्री अपना-अपना मत पुष्ट करने में प्रयत्नशील होते हैं, इससे राज-कार्य में हानि होती है ॥७३॥


स्वच्छन्दाश्च न विजृम्भन्ते ॥७४॥

अर्थ: स्वेच्छाचारी मंत्री आपस की उचित सलाह नहीं मानते ॥७४॥


यद्बहुगुणमनपायबहुलं भवति तत्कार्यमनुष्ठेयम् ॥७५॥

अर्थ: राजा या विवेकी मनुष्य को सम्पत्ति और कीर्ति-लाभ-आदि बहुत गुणों से युक्त (श्रेष्ठ) तथा विनाश-रहित-नित्य व कल्याणकारक कार्य करना चाहिए ॥७५॥


तदेव भुज्यते यदेव परिणमति ॥७६॥

अर्थ: जिसका परिपाक (पचना) अच्छी तरह से हो सके, वही प्रकृति-ऋतु के अनुकूल भोजन करना उचित है। सारांश यह है कि नैतिक मनुष्य को पचने वाले (निरन्तर विशुद्ध, पुण्य, यशस्य और न्याययुक्त तथा भविष्य में कल्याण-कारक) सत् कार्य करना चाहिए। उसे न पचने वाले समाज दंड और राज-दंडादि द्वारा अपकीर्ति को फैलाने वाले अन्याय-युक्त असत् कार्यों से सदा दूर रहना चाहिए। इसी प्रकार राजा को भी राज्य की श्रीवृद्धि में उपयोगी संधि और विग्रह-आदि कार्य इस प्रकार विशुद्ध मंत्रणा पूर्वक करना चाहिए, जिससे उसका भविष्य उज्ज्वल-श्रेयस्कर हो। उसे भविष्य में होने वाली राज्य-वृत्ति संबंधी कार्यों से सदा दूर रहना चाहिए ॥७६॥


यथोक्तगुणसमवायिन्येकस्मिन् युगले वा मंत्रिणि न कोऽपि दोषः ॥७७॥

अर्थ: यदि मंत्री में पूर्वोक्त गुण (पाँच में सूत्र में कहे हुए द्विज, स्वदेशवासी, सदाचारी, कुलीन और व्यसनों से रहित-आदि सद्गुण) विद्यमान हों तो एक या दो मंत्रियों की भी नियुक्ति करने से राजा की हानि नहीं हो सकती। सारांश यह है कि पूर्व में आचार्यश्री ने एक या दो मंत्रियों के रखने का निषेध किया था, परन्तु अब यथार्थ सिद्धान्त प्रगट करते हैं कि पूर्वोक्त गुणों से विभूषित एक या दो मंत्रियों के रखने में भी राजा की कोई हानि नहीं हो सकती ॥७७॥


न हि महानप्यन्धसमुदायो रूपमुपलभेत ॥७८॥

अर्थ: बहुत से भी अन्धों का समूह रूप को नहीं जान सकता। सारांश यह है कि जिस प्रकार बहुत-सा अन्ध-समुदाय हरित-पीतादि रूप को नहीं जान सकता, उसी प्रकार पूर्वोक्त गुणों से शून्य व मूर्ख मंत्रि-मंडल भी राज्य-वृद्धि के उपायों का यथार्थ निश्चय नहीं कर सकता। अतएव नीतिज्ञ राजा को मूर्ख मंत्रि-मंडल नहीं रखना चाहिए ॥७८॥ दोनों बैल यदि अधिक बलिष्ठ हों, तो क्या वे दोनों महान् बोझा ढोने के लिए गाड़ी वगैरह में नहीं जोते जाते ? अवश्य जोते जाते हैं। सारांश यह है कि उसी प्रकार दो मन्त्री भी यदि पूर्वोक्त गुणों से अलंकृत हों, तो वे भी राज्य-भार को वहन करने में समर्थ हो सकते हैं; अतएव उक्त गुणों से युक्त दो मन्त्रियों के रखने में कोई हानि नहीं है ॥७९॥


बहुसहाये राज्ञि प्रसीदन्ति सर्व एव मनोरथाः ॥८०॥

अर्थ: जिस राजा के बहुत से सहायक (राज्य में सहायता देने वाले भिन्न-भिन्न विभागों के भिन्न-भिन्न प्रधानमन्त्री आदि) होते हैं, उसे समस्त अभिलषित पदार्थों की प्राप्ति होती है ॥८०॥


एको हि पुरुषः केषु नाम कार्येष्वात्मानं विभजते ॥८१॥

अर्थ: अकेला आदमी अपने को किन-किन कार्यों में नियुक्त कर सकता है ? नहीं कर सकता। सारांश यह है कि राजकीय बहुत से कार्य होते हैं, उन्हें अकेला मन्त्री किस प्रकार सम्पन्न कर सकता है ? नहीं कर सकता, अतएव अलग-अलग विभागों के लिए बहुत से मंत्री-आदि सहायक होने चाहिए ॥८१॥


किमेकशाखस्य शाखिनो महती भवतिच्छाया ॥८२॥

अर्थ: क्या केवल एक शाखा वाले वृक्ष से अधिक छाया हो सकती है ? नहीं हो सकती, उसी प्रकार अकेले मन्त्री से राज्य के महान् कार्य सिद्ध नहीं हो सकते ॥८२॥


कार्यकाले दुर्लभः पुरुषसमुदायः ॥८३॥

अर्थ: आपत्तिकाल आने पर कार्य करने वाले सहायक पुरुषों का मिलना दुर्लभ होता है। अतएव नैतिक व्यक्ति या राजा कार्य में सहायक पुरुषों को पहले से ही संग्रह करे। सारांश यह है कि यद्यपि भविष्य में आने वाली आपत्ति से बचाव करने के लिए पहले से सहायक पुरुषों के रखने में अधिक धनराशि का व्यय होता है, तथापि नैतिक पुरुष उसकी परवाह न करे। क्योंकि धन-व्यय की अपेक्षा सहायक पुरुषों के संग्रह को नीतिनिष्ठों ने अधिक महत्त्व दिया है और इसी कारण विजिगीषु राजा लोग भविष्य में होने वाले शत्रुओं के हमले आदि से राष्ट्र को सुरक्षित रखने के लिए विशाल सैनिक-संगठन करने में प्रचुर धनराशि के व्यय की ओर ध्यान नहीं देते। क्योंकि आपत्तिकाल आने पर उसी समय सहायक पुरुषों का मिलना कठिन होता है ॥८३॥


दीप्ते गृहे कीदृशं कूपखननम् ॥८४॥

अर्थ: मकान में आग लग जाने पर उसे बुझाने को तत्काल पानी के लिए कुआं खोदना क्या उचित है ? नहीं। सारांश यह है कि जिस प्रकार मकान में लगी हुई आग को बुझाने के लिए उसी समय कुआं खोदना व्यर्थ है, उसी प्रकार आपत्ति आने पर उसे दूर करने के लिए सहायक-संग्रह व्यर्थ है ॥८४॥


न धनं पुरुषसंग्रहाद्बहु मन्तव्यं ।८५॥

अर्थ: सहायक पुरुषों के संग्रह की अपेक्षा धन को उत्कृष्ट नहीं समझना चाहिए। इसलिए धनाभिलाषी एवं विजिगीषु राजाओं को सहायक पुरुषों का संग्रह करना चाहिए ॥८५॥


सत्क्षेत्रे बीजमिव पुरुषेषूपप्तं कार्यं शतशः फलति ॥८६॥

अर्थ: उत्तम उपजाऊ खेत में बोए हुए बीज की तरह सत्पुरुषों (सहायक कार्यपुरुष-मंत्री, सेनापति और अर्थ-सचिव-आदि) को दिया हुआ धन निस्सन्देह अनेक फल देता है-अनेक आर्थिक लाभ-वगैरह प्रयोजनों को सिद्ध करता है। सारांश यह है कि जिस प्रकार उपजाऊ पृथिवी में बोए गये धान्यादि के बीज प्रचुर धान्य-राशि को उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार मंत्री, अमात्य, पुरोहित और सेनापति-आदि सहायक पुरुषों को दिया हुआ धन भी प्रचुर धन-राशि को उत्पन्न करता हैं; अतएव विजिगीषु राजा या नैतिक पुरुष सहायक सत्पुरुषों के संग्रह की अपेक्षा धन को अधिक न समझे ॥८६॥


बुद्धावर्थे युद्धे च ये सहायास्ते कार्यपुरुषाः ॥८७॥

अर्थ: बुद्धि, धन और युद्ध में जो सहायक होते हैं वे कार्यपुरुष हैं। सारांश यह है कि राजाओं को राजनैतिक बुद्धि प्रदान करने वाले प्रधान मंत्री और पुरोहित आदि, सम्पत्ति में सहायक अर्थ-सचिव वगैरह और युद्ध में सहायक सेना सचिव-आदि इनको ‘कार्यपुरुष’ कहते हैं, अन्य को नहीं ॥८७॥


खादनवारायां को नाम न सहायः ॥८८॥

अर्थ: भोजन के समय कौन सहायक नहीं होता ? सभी सहायक होते हैं। सारांश यह है कि सम्पत्ति के समय सभी पुरुष सहायक हो जाते हैं, परन्तु जब मनुष्य के ऊपर आपत्ति पड़ती है तब कोई सहायता नहीं करता; इसीलिए आपत्ति आने के पूर्व ही सहायक पुरुषों का संग्रह कर लेना श्रेष्ठ है॥८८॥


श्राद्ध इवाश्रोत्रियस्य न मंत्रे मूर्खस्याधिकारोऽस्ति ॥८९॥

अर्थ: जो मनुष्य धार्मिक क्रियाकांडों का विद्वान् नहीं है, उसको जिस प्रकार श्राद्धक्रिया (श्रद्धा से किया जाने वाला दान पुण्य) कराने का अधिकार नहीं है, उसी प्रकार राजनीति-ज्ञान से शून्य-मूर्ख-मंत्री को भी मंत्रणा (उचित सलाह) का अधिकार नहीं है ॥८९॥


किं नामान्धः पश्येत् ॥९०॥

अर्थ: क्या अंधा मनुष्य कुछ देख सकता है ? नहीं देख सकता। सारांश यह है कि उसी प्रकार अंधे के समान मूर्ख मन्त्री भी मंत्र का निश्चय नहीं कर सकता ॥६०॥


किमन्थेनाकृष्यमाणोऽन्धः समं पन्थानं प्रतिपद्यते ॥९१॥

अर्थ: यदि अंधे मनुष्य को दूसरा अंधा ले जाता है, तो भी क्या वह सममार्ग (गड्ढे और कंकड़-पत्थरों से रहित एक से रास्ते) को देख सकता है ? नहीं देख सकता। सारांश यह है कि उसी प्रकार यदि मूर्ख राजा भी मूर्ख मंत्री की सहायता से संधि-विग्रहादि राजकार्यों को मन्त्रणा करे, तो क्या वह उसके फल (विजयलक्ष्मी व अर्थ-लाभ-आदि) प्राप्त कर सकता है ? नहीं कर सकता॥६१॥


तदन्धवर्तकीयं काकतालीयं वा यन्मूर्खमन्त्रात् कार्यसिद्धिः ॥९२॥

अर्थ: मूर्ख मंत्री की मंत्रणा-सलाह से भी कभी किसी समय कार्य-सिद्धि हो जाती है, परन्तु वह अन्धे के हाथ आई हुई बटेर-चिड़िया विशेष-की न्याय के समान अथवा काकतालीय न्याय (ताड़ वृक्ष के नीचे से उड़कर जाने वाले कौए को उसी समय उस वृक्ष से गिरने वाले ताड़फल की प्राप्तिरूप न्याय) के समान सार्वकालिक-सदा होने वाली और निश्चित नहीं होती। अर्थात्-जिस प्रकार अन्धे के हाथों में कभी किसी समय भाग्योदय से बटेर पक्षी अचानक आ जाता है परन्तु उसका मिलना सदा व निश्चित नहीं है। अथवा जिस प्रकार ताड़वृक्ष के नीचे से उड़कर जानेवाले कौए के मुख में उसी समय उस वृक्ष से गिरने वाले ताड़फल का प्राप्त होना, कभी उसके भाग्योदय से हो जाता है, परन्तु सार्वकालिक व निश्चित नहीं है, उसी प्रकार राजा को भी भाग्योदय से, मूर्ख मन्त्री की मंत्रणा से कार्यसिद्धि हो जाती है, परन्तु वह सदा और निश्चित नहीं होती।


स घुणाक्षरन्यायो यन्मूर्खेषु मंत्रपरिज्ञानम् ॥९३॥

अर्थ: मूर्ख मनुष्य को मंत्रणा का ज्ञान घुणाक्षरन्याय के समान कदाचित् हो जाता है, परन्तु निश्चित नहीं है।


अनालोकं लोचनमिवाशास्त्रं मनः कियत् पश्येत् ॥९४॥

अर्थ: शास्त्रज्ञान से शून्य जड़ात्मक मन ज्योति-रहित नेत्र के समान कितना कर्त्तव्य-बोध कर सकता है ? नहीं कर सकता। सारांश यह है कि जिस प्रकार अन्धा पुरुष ज्योति-हीन नेत्रों के द्वारा घट-पटादि पदार्थों को नहीं देख सकता, उसी प्रकार जिस मनुष्य का मन शास्त्र ज्ञान के संस्कार से शून्य है, वह भी समुचित कर्तव्य का निश्चय नहीं कर सकता॥९४॥


स्वामिप्रसादः सम्पदं जनयति न पुनराभिजात्यं पांडित्यं वा ॥९५॥

अर्थ: स्वामी की प्रसन्नता सम्पत्ति को पैदा करती है, कुलीनता व विद्वत्ता नहीं। अर्थात्-आश्रित मनुष्य कितना ही विद्वान् और उच्च कुल का क्यों न हो, परन्तु यदि उससे उसका स्वामी प्रसन्न नहीं है, तो उसे कदाऽपि धन प्राप्त नहीं हो सकता ॥९५॥


हरकण्ठलग्नोऽपि कालकूटः काल एव॥९६॥

अर्थ: शिवजी के श्वेत कण्ठ में लगा हुआ भी विष, विष ही है अर्थात् वह अपने नाशकारक स्वभाव को नहीं छोड़ सकता अथवा कृष्ण से श्वेत नहीं हो सकता। सारांश यह है कि जिस प्रकार विष शिवजी के अत्यन्त श्वेत कंठ के आश्रय से अपने प्राण-घातक स्वभाव को नहीं छोड़ सकता, उसी प्रकार वज्रमूर्ख मनुष्य भी राज-मंत्री आदि ऊँचे पदों पर अधिष्ठित होने पर भी अपने मूर्खता-पूर्ण स्वभाव को नहीं छोड़ सकता॥ ६६॥


स्ववधाय कृत्योत्थापनमिव मूर्खेषु राज्येभारारोपणम् ॥९७॥

अर्थ: जो राजा मूर्ख मंत्रियों को राज्य-भार समर्पण करता है, वह अपने नाश के लिए की गई मंत्रसिद्धि के समान अपना नाशकर डालता है। सारांश यह है कि जिस प्रकार कोई मनुष्य अपने शत्रु-वध करने के उद्देश्य से मंत्रविशेष सिद्ध करता है, उसके सिद्ध हो जाने पर शत्रु-वध करने के लिए एक पिशाच प्रगट होता है, परन्तु यदि शत्रु, जप, होम और दानादि करने से विशेष बलवान् होता है, तब वह पिशाच शत्रु को न मारकर उल्टा मंत्रसिद्धि करने वाले को मार डालता है, उसी प्रकार राजा भी मूर्ख मंत्री को राज्यभार सौंपने से अपना नाश कर डालता है॥९७॥


अकार्यवेदिनः किं बहुना शास्त्रेण ॥९८॥

अर्थ: जो मनुष्य कर्त्तव्य (हित-प्राप्ति व अहित-परिहार) को नहीं जानता-चतुर नहीं है, उसका बहुत शास्त्रों का अभ्यास व्यर्थ है ॥९८॥


गुणहीनं धनुः पिंजनादपि कष्टम् ॥९९॥

अर्थ: जिस प्रकार डोरी-शून्य धनुष को शत्रु पर प्रहार करने के लिए चढ़ाना व्यर्थ है, उसी प्रकार जो मनुष्य नैतिकज्ञान, सदाचार और वीरता-प्रभृति गुणों से शून्य (मूर्ख) है, उसको केवल श्वांस लेने मात्र से क्या लाभ है ? कोई लाभ नहीं-उसका जन्म निरर्थक है ॥६६॥


चक्षुष इव मंत्रिणोऽपि यथार्थदर्शनमेवात्मगौरवहेतुः ॥१००॥

अर्थ: जिस प्रकार नेत्र की सूक्ष्मदृष्टि उसके महत्त्व-प्रशंसा का कारण होती है, उसी प्रकार राज-मंत्री की भी यथार्थदृष्टि (सन्धि-विग्रह-आदि कार्य-साधक मंत्र का यथार्थज्ञान) उसको राजा द्वारा गौरव प्राप्त करने में कारण होती है ॥१००॥


शस्त्राधिकारिणो न मंत्राधिकारिणः स्युः ॥१०१॥

अर्थ: शस्त्र-संचालन करने वाले-केवल वीरता प्रकट करने वाले-क्षत्रिय लोग मंत्रणा करने के पात्र नहीं हैं ॥१०१॥


क्षत्रियस्य परिहरतोऽप्यायात्युपरि भंडनं ॥१०२॥

अर्थ: क्षत्रिय को रोकने पर भी केवल कलह करना ही सूझता है, अतः उसे मंत्री नहीं बनाना चाहिए ॥१०२॥


शस्त्रोपजीविनां कलहमन्तरेण भक्तमपि भुक्तं न जीर्यति ॥१०३॥

अर्थ: शस्त्रों से जीविका करने वाले (क्षत्रियों) को लड़ाई किये बिना खाया हुआ भोजन भी नहीं पचता; अतः क्षत्रिय लोग मंत्री पद के योग्य नहीं ॥१०३॥


मंत्राधिकारः स्वामिप्रसादः शस्त्रोपजीवनं चेत्येकैकमपि पुरुषमुत्सेकयति किं
पुनर्न समुदायः ॥१०४॥

अर्थ: मंत्री-पद की प्राप्ति, राजा की प्रसन्नता व शस्त्रों से जीविका करना (क्षत्रियपन) इनमें से प्राप्त हुई एक-एक वस्तु भी मनुष्य को उन्मत्त-अभिमानी बना देती है, पुनः क्या उक्त तीनों वस्तुओं का समुदाय उन्मत्त नहीं बनाता ? अवश्य बनाता है ॥१०४॥


नालम्पटोऽधिकारी ॥१०५॥

अर्थ: जो मनुष्य निःस्पृह (धनादि की चाह नहीं रखने वाला) होता है, वह अधिकारी (मंत्री-आदि कर्मचारी) नहीं हो सकता। सारांश यह है कि अमात्य-आदि कर्मचारी अवश्य धनादि की लालसा रखेगा ॥१०५॥


मन्त्रिणोऽर्थग्रहणलालसायां मतौ न राज्ञः कार्यमर्थो वा ॥१०६॥

अर्थ: जिसके मंत्री की बुद्धि धन-ग्रहण करने में लम्पट-आसक्त होती है, उस राजा का न तो कोई कार्य ही सिद्ध होता है और न उसके पास धन ही रह सकता है ॥१०६॥


वरणार्थं प्रेषित इव यदि कन्यां परिणयति तदा वरयितुस्तप एव शरणम् ॥१०७॥

अर्थ: जब कोई मनुष्य किसी की कन्या के साथ विवाह करने के उद्देश्य से कन्या को देखने के लिए अपने संबंधी (मामा, बंधु, चाचा और दूत-आदि) को भेजता है और वह वहाँ जाकर स्वयं उस कन्या के साथ यदि अपना विवाह कर लेता है, तो विवाह के इच्छुक उस भेजने वाले को तपश्चर्या करनी ही श्रेष्ठ है; क्योंकि स्त्री के बिना तप करना उचित है। प्रकरण में उसी प्रकार जिस राजा का मंत्री धन-लम्पट है, उसे भी अपना राज्य छोड़कर तपश्चर्या करना श्रेष्ठ है; क्योंकि धन के बिना राज्य नहीं चल सकता और धन की प्राप्ति मंत्री-आदि की सहकारिता से होती है ॥१०७॥


स्थाल्येव भक्तं चेत् स्वयमश्नाति कुतो भोक्तुर्भुक्तिः ॥१०८॥

अर्थ: यदि थाली अन्न-आदि भोजन को स्वयं खा जावे, तो खाने वाले को भोजन किस प्रकार मिल सकता है ? नहीं मिल सकता । उसी प्रकार यदि मंत्री राज्य-द्रव्य को स्वयं हड़प करने लगे तो फिर राज्य किस प्रकार चल सकता है ? नहीं चल सकता ॥१०८॥


तावत् सर्वोऽपि शुचिर्निःस्पृहो यावन्न परवरस्त्रीदर्शनमर्थागमो वा ॥१०९॥

अर्थ: तब तक सभी मनुष्य पवित्र और निर्लोभी रहते हैं, जब तक कि उन्होंने दूसरों की उत्कृष्ट और कमनीय कान्ताओं (स्त्रियों) व धन-प्राप्ति को नहीं देखा ॥१०६॥


अदुष्टस्य हि दूषणं सुप्तव्यालप्रबोधनमिव ॥११०॥

अर्थ: निर्दोषी पुरुष को दूषण लगाना, सोते हुए सर्प या व्याघ्र को जगाने के समान हानिकारक है अर्थात् जिस प्रकार सोते हुए सर्प या व्याघ्र को जगाने से जगाने वाले की मृत्यु होती है, उसी प्रकार निर्दोषी को दूषण लगाने में मनुष्य की हानि होती है; क्योंकि ऐसा करने से निर्दोषी व्यक्ति वैर-विरोध करके उसकी यथाशक्ति हानि करने में प्रयत्नशील रहता है ॥११०॥


येन सह चित्तविनाशोऽभूत्, स सन्निहितो न कर्त्तव्यः ॥१११॥

अर्थ: जिसके व्यवहार से मन फट चुका हो, उसके साथ मित्रता न करनी चाहिए ॥१११॥


सकृद्विघटितं चेतः स्फटिकवलयमिव कः सन्धातुमीश्वरः ॥११२॥

अर्थ: वैर-विरोध के कारण एकबार फटे हुए मन को स्फटिकमणि के कङ्कण समान कौन जोड़ने में समर्थ है ? कोई नहीं ॥११२॥


न महताप्युपकारेण चित्तस्य तथानुरागो यथा विरागो
भवत्यल्पेनाप्यपकारेण ॥११३॥

अर्थ: महान् उपकार से भी मन में उतना अधिक स्नेह उपकारी के प्रति नहीं होता, जितना अधिक मन थोड़ा-सा अपकार (द्रोह-आदि) करने से फट जाता है ॥११३॥


सूचीमुखसर्पवन्नपकृत्य विरमन्त्यपराद्धाः ॥११४॥

अर्थ: शत्रु लोग दृष्टि-विष वाले सर्प की तरह अपकार किये बिना विश्राम नहीं लेते ॥११४॥


अतिवृद्धः कामस्तन्नास्ति यन्न करोति ॥११५॥

अर्थ: कामी पुरुष अत्यन्त बढ़ी हुई कामवासना के कारण संसार में ऐसा कोई अकार्य नहीं, जिसे नहीं करता अर्थात् सभी प्रकार के निंदनीय व घृणित कार्य करता है ॥११५॥


श्रूयते हि किल कामपरवशः प्रजापतिरात्मदु हितरि, हरिर्गोपवधूषु, हरः
शान्तनुकलत्रेषु, सुरपतिर्गौतमभार्यायां, चन्द्रश्च वृहस्पतिपत्न्यां
मनश्चकरोति ॥११६॥

अर्थ: पुराणों में प्रसिद्ध है कि ब्रह्माजी काम के वशीभूत होकर अपनी सरस्वती नाम की पुत्री में, कृष्ण ग्वालों की स्त्रियों में, शिवजी गंगा नाम की शान्तनु की स्त्री में, इन्द्र गौतम की स्त्री अहिल्या में, तारानाम की बृहस्पति की स्त्री में आसक्त हुए१ ॥१९६॥


अर्थेषूपभोगरहितास्तर वोऽपि साभिलाषाः किं पुनर्मनुष्याः ॥११७॥

अर्थ: जब कि वृक्ष अपने धन-पुष्प-फलादि-का उपभोग नहीं करते, तथापि वे भी धन के इच्छुक होते हैं अर्थात् स्वयं पुष्प व फलशाली होने की इच्छा रखते हैं, पुनः धन का उपभोग करने वाले मनुष्यों का तो कहना ही क्या है ? वे तो अवश्य धन के इच्छुक होते हैं, क्योंकि उन्हें उसका उपभोग (शरीर-यात्रादि) करना पड़ता है ॥१९७॥


कस्य न धनलाभाल्लोभः प्रवर्तते ॥११८॥

अर्थ: संसार में धन मिलने से कि से उस का लोभ नहीं होता ? सभी को होता है ॥१९८॥


स खलु प्रत्यक्षं दैवं यस्य परस्वेष्विव परस्त्रीषु निःस्पृहं चेतः ॥११९॥

अर्थ: जिस मनुष्य की चित्तवृत्ति अन्य-धन के समान पर-स्त्रियों के देखने पर भी लालसा-रहित है, वह प्रत्यक्ष देवता है मनुष्य नहीं, क्योंकि उसने असाधारण धर्म (परस्त्री, परधन का त्यागरूप) का अनुष्ठान किया ॥१९९॥


समायव्ययः कार्यारम्भो राभसिकानाम् ॥१२०॥

अर्थ: संतोषी पुरुष जो कार्य आरम्भ करते हैं, उसमें उन्हें आमदनी व खर्च बराबर होता है तथापि सन्तुष्ट रहते हैं ॥१२०॥


बहुक्लेशेनाल्पफलः कार्यारम्भो महामूर्खाणाम् ॥१२१॥

अर्थ: महामूर्ख मनुष्य जो कार्य आरम्भ करते हैं, उसमें उन्हें बहुत कष्ट उठाने पड़ते हैं और फल बहुत थोड़ा मिलता है ॥१२१॥


दोषभयान्न कार्यारम्भः कापुरुषाणाम् ॥१२२॥

अर्थ: कुत्सित-निन्द्य पुरुष दोषों के भय से (इस कार्य के करने में यह दोष है और अमुक कार्य में यह दोष है इत्यादि दोषों के डर से) किसी भी कार्य को शुरू नहीं करते। सारांश यह है कि अधम पुरुष आलसी, उद्यम-हीन व डरपोक होते हैं; इसलिए वे दोषों के डर से कार्यारम्भ नहीं करते ॥१२२॥


मृगाः सन्तीति किं कृषिर्न क्रियते ॥१२३॥

अजीर्णभयात् किं भोजनं परित्यज्यते ॥१२४॥

अर्थ (सूत्र 123 से 124): हिरणों के डर से क्या खेती नहीं की जाती ? अवश्य की जाती है। अजीर्ण के डर से क्या भोजन करना छोड़ दिया जाता है ? नहीं छोड़ा जाता। सारांश यह है कि जिस प्रकार हिरणों के डर से खेती करना नहीं छोड़ा जाता और अजीर्ण के भय से भोजन करना नहीं छोड़ा जाता, उसी प्रकार विघ्नों के डर से सज्जन लोग कर्त्तव्य-पथ को नहीं छोड़ते ॥१२३-१२४॥


स खलु कोऽपीहाभूदस्ति भविष्यति वा यस्य कार्यारम्भेषु प्रत्यवाया न
भवन्ति ॥१२५॥

अर्थ: जिसको कार्यारम्भ में विघ्न नहीं होते, क्या लोक में ऐसा कोई पुरुष हुआ है ? होगा ? या है ? न हुआ, न होगा, न है ॥१२५॥


आत्मसंशयेन कार्यारम्भो व्यालहृदयानाम् ॥१२६॥

अर्थ: सांप व श्वापद (हिंसक जन्तुओं) के समान दुष्ट हृदय-युक्त पुरुष ऐसे निन्द्य कार्य (चोरी वगैरह) प्रारम्भ करते हैं, जिनसे उन्हें अपने नाश की संभावना रहती है ॥१२६॥


दुर्भीरुत्वमासन्नशूरत्वं रिपौ प्रति महापुरुषाणां ॥१२७॥

अर्थ: महापुरुष दूरवर्ती शत्रु से भयभीत होते हैं-उससे युद्ध नहीं करते, परन्तु शत्रु के निकट आ जाने पर अपनी वीरता दिखाते हैं ॥१२७॥


जलवन्मार्दवोपेतः पृथूनपि भूभृतो भिनत्ति ॥१२८॥

अर्थ: जिस प्रकार कोमल जल-प्रवाह विशाल पर्वतों को उखाड़ देता है, उसी प्रकार कोमल राजा भी महाशक्तिशाली शत्रु-राजाओं को नष्ट कर डालता है ॥१२८॥


प्रियंवदः शिखीव सर्पदानपि द्विषत्सर्पानुत्सादयति ॥१२९॥

अर्थ: प्रियवादी पुरुष मोर के समान अभिमानी शत्रुरूपी सर्पों को नष्ट कर देता है ॥१२९॥


नाविज्ञाय परेषामर्थमनर्थं वा स्वहृदयं प्रकाशयन्ति महानुभावाः ॥१३०॥

अर्थ: उत्तम पुरुष दूसरों के हृदय की अच्छी या बुरी बात जान करके ही अपने मन की बात प्रगट करते हैं ॥१३०॥


क्षीरवृक्षवत् फलसम्पादनमेव महतामालापः ॥१३१॥

अर्थ: महापुरुषों के वचन दूध वाले वृक्ष की तरह फलदायक होते हैं। अर्थात् जिस प्रकार दूध वाले वृक्ष उत्तम मिष्ट फल देते हैं, उसी प्रकार सज्जन पुरुषों के वचन भी उत्तम-उत्तम फलदायक (ऐहिक और पारत्रिक कल्याण देने वाले) होते हैं ॥१३१॥‘’


दुरारोहपादप इव दंडाभियोगेन फलप्रदो भवति नीचप्रकृतिः ॥१३२॥

अर्थ: जिस प्रकार अधिक ऊँचाई व कंटक-आदि के कारण चढ़ने के अयोग्य वृक्ष (आम-आदि) लाठी आदि के प्रहारों से ताड़ित किये जाने पर फलदायक होते हैं, उसी प्रकार नीच प्रकृति का मनुष्य भी दंडित किये जाने पर काबू में आता है साम-दाम से नहीं ॥१३२॥


स महान् यो विपत्सु धैर्यमवलम्बते ॥१३३॥

अर्थ: जो आपत्ति में धैर्य, धारण करता है वही महापुरुष है ॥१३३॥


उत्तापक्त्वं हि सर्वकार्येषु सिद्धीनां प्रथमोऽन्तरायः ॥१३४॥

अर्थ: अधीरता (घबड़ाना-व्याकुल होना) मनुष्य की समस्त कार्य-सिद्धि में अत्यन्त बाधक है अर्थात्-जो मनुष्य कर्त्तव्य करते समय व्याकुल हो जाता है, उसका कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता; अतः कर्त्तव्य में उतावली करना उचित नहीं ॥१३४॥


शरद् घना इव न खलु वृथालापा गलगर्जितं कुर्वन्ति सत्कुलजाताः ॥१३५॥

अर्थ: कुलीन पुरुष शरदकालीन बादलों की तरह व्यर्थ बकवाद करने वाले और गरजने वाले नहीं होते। अर्थात्-जिस प्रकार शरदकाल के बादल केवल गरजते हैं बरसते नहीं, उसी प्रकार कुलीन उत्तम पुरुष व्यर्थ नहीं बोलते किन्तु अच्छे-अच्छे पुण्य व यशस्वी कार्य करके दिखाते हैं ॥१३५॥


न स्वभावेन किमपि वस्तु सुन्दरमसुन्दरं वा, किन्तु यदेव यस्य प्रकृतितो भाति
तदेव तस्य सुन्दरम् ॥१३६॥

अर्थ: अच्छापन व बुरापन केवल पुरुषों की कल्पनामात्र है; क्योंकि संसार में कोई वस्तु अच्छी और बुरी नहीं है, किन्तु जो जिस की प्रकृति-अनुकूल होने से रुचती है, वह उसकी अपेक्षा सुन्दर है यदि वह निकृष्ट ही क्यों न हो ॥१३६॥


न तथा कर्पूररेणुना प्रीतिः केतकीनां वा, यथाऽमेध्येन ॥१३७॥

अर्थ: मक्खियों को जिस प्रकार मल-मूत्र से प्रीति होती है, वैसी कपूर-धूलि व केतकी पुष्पों से नहीं होती ॥१३७॥


अतिक्रोधनस्य प्रभुत्त्वमग्नौ पतितं लवणमिव शतधा विशीर्यते ॥१३८॥

अर्थ: अत्यन्त क्रोध करने वाले मनुष्य का ऐश्वर्य अग्नि में पड़े हुए नमक के समान सैकड़ों प्रकार से नष्ट हो जाता है ॥१३८॥


सर्वान् गुणान् निहन्त्यनुचितज्ञः ॥१३९॥

अर्थ: योग्य-अयोग्य के विचार से शून्य पुरुष अपने समस्त ज्ञानादि गुणों को नष्ट कर देता है ॥१३९॥


परस्परं मर्मकथनयात्मविक्रम एव ॥१४०॥

अर्थ: जो पुरुष परस्पर की गुप्त बात कहते हैं, वे अपना-अपना पराक्रम ही दिखाते हैं। सारांश यह है कि जिस की गुप्त बात प्रकट की जाती है, वह भी ऐसा ही करने को तत्पर हो जाता है; अतएव वे दोनों दूसरों के समक्ष अपना पराक्रम दिखाकर अपनी हानि करते हैं ॥१४०॥


तदजाकृपाणीयं यः परेषु विश्वासः ॥१४१॥

अर्थ: शत्रुओं पर विश्वास करना ‘अजाकृपाणीय१ न्याय के समान घातक है ॥१४१॥


क्षणिकचित्तः किंचिदपि न साधयति३ ॥१४२॥

अर्थ: जिसका चित्त चंचल है वह किसी भी कार्य को सिद्ध नहीं कर सकता ॥१४२॥


स्वतंत्रः सहसाकारित्वात् सर्वं विनाशयति ॥१४३॥

अर्थ: जो राजा स्वतन्त्र होता है-राजकीय कार्यों में मंत्री आदि की योग्य सलाह नहीं मानता-वह बिना सोचे-समझे अनेक कार्यों को एक ही काल में आरम्भ करने के कारण अपने समस्त राज्य को नष्ट कर डालता है ॥१४३॥ और स्वयं राजकीय कार्य करता रहता है, इसलिए वह निश्चय से अपने राज्य को नष्ट कर देता है ॥१॥”


अलसः सर्वकर्मणामनधिकारी ॥१४४॥

अर्थ: आलसी पुरुष समस्त राजकीय-आदि कार्यों के अयोग्य होता है ॥१४४॥ राजपुत्र२ विद्वान् ने कहा है कि “जो राजा छोटे-छोटे कार्यों में भी आलसी अधिकारियों-मंत्री-आदि को नियुक्त करता है उसके समस्त कार्य सिद्ध नहीं होते ॥१॥”


प्रमादवान् भवत्यवश्यं विद्विषां वशः ॥१४५॥

अर्थ: जो मनुष्य कर्त्तव्य-पालन में सावधान वा उत्साही नहीं है, वह शत्रुओं के वश हो जाता है ॥१४५॥ जैमिनि३ विद्वान् ने भी कहा है कि “जो राजा छोटे-छोटे कार्यों में भी शिथिलता करता है, वह महान् ऐश्वर्य-युक्त हो करके भी शत्रुओं के अधीन हो जाता है ॥१॥”


कमप्यात्मनोऽनुकूलं प्रतिकूलं न कुर्यात् ॥१४६॥

अर्थ: नैतिक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि किसी भी अनुकूल-मित्र को शत्रु न बनाये ॥१४६॥ राजपुत्र४ विद्वान् ने भी कहा है कि “जो राजा मित्र को शत्रु बनाता है, उसे इस मूर्खता के कारण अपने कष्ट व अपकीर्ति उठानी पड़ती है ॥१॥”


प्राणादपि प्रत्यवायो रक्षितव्यः १ ॥१४७॥

अर्थ: मनुष्य को प्राणों से भी अधिक अपने गुप्त रहस्य की रक्षा करनी चाहिए ॥१४७॥ भागुरि५ विद्वान् ने कहा है कि “राजा को अपने जीवन से भी अधिक अपने गुप्त रहस्य सुरक्षित रखने चाहिए, क्योंकि शत्रुओं को मालूम हो जाने पर वे लोग प्रविष्ट होकर उसे मार डालते हैं ॥१॥”


आत्मशक्तिमजानतो विग्रहः क्षयकाले कीटिकानां पक्षोत्थानमिव ॥१४८॥

अर्थ: जो राजा अपनी सैनिक व कोष-शक्ति को न जानकर बलवान् शत्रु के साथ युद्ध करता है, वह विनाशकाल में पतङ्गों के पङ्ख उठाने की तरह अपना नाश कर डालता है। सारांश यह है कि जब पतङ्गों का विनाशकाल आता है-जब वे दीपक की लौ में जल-भुनकर मरने लगते हैं-उस समय अपने पंख उठाते हैं, उसी प्रकार राजा का जब विनाश काल आता है, उस समय उसकी बुद्धि बलवान् शत्रु के साथ युद्ध करने तत्पर होती है ॥१४८॥


कालमलभमानोऽपकर्तरि साधु वर्तेत ॥१४९॥

अर्थ: विजिगीषु को जब तक अनुकूल समय प्राप्त न हो, तब तक उसे शत्रु के साथ शिष्टता का व्यवहार करना चाहिए-उस से मैत्री कर लेनी चाहिए। सारांश यह है कि विजिगीषु को हीन शक्ति के साथ युद्ध और विशिष्ट शक्तियुक्त के साथ सन्धि करनी चाहिए ॥१४९॥


किन्तु खलु लोको न वहति मूर्ध्ना दग्धुमिन्धनं ॥१५०॥

अर्थ: मनुष्य ईंधन को आग में जलाने के उद्देश्य से क्या शिर पर धारण नहीं करते ? अवश्य करते हैं। सारांश यह है कि जलाने-योग्य ईंधन को शिर-वहन के समान पूर्व में शत्रु से शिष्ट व्यवहार करना चाहिए, पश्चात् अवसर पाकर शक्ति-संचय होने पर उस से युद्ध करना चाहिए ॥१५०॥ पश्चात् शक्ति-संचय करके उसका वध करना चाहिए ॥१॥‘’


नदीरयस्तरूणामंघ्रीन् क्षालयन्नप्युन्मूलयति ॥१५१॥

अर्थ: नदी का वेग (प्रवाह) अपने तट के वृक्षों के चरण-जड़ें-प्रक्षालन करता हुआ भी उन्हें जड़ से उखाड़ देता है। सारांश यह है कि उसी प्रकार विजिगीषु का कर्त्तव्य है कि वह शत्रु के साथ पूर्व में शिष्ट व्यवहार करके पश्चात् उसके उन्मूलन में प्रवृत्ति करे ॥१५१॥‘’ शुक्र विद्वान् ने भी कहा है कि- “जिस प्रकार नदी का वेग-प्रवाह-तटवर्ती वृक्षों के पाद-जड़ें धोता हुआ भी उन का उन्मूलन करता है, उसी प्रकार बुद्धिमानों को पहले शत्रुओं को सम्मानित करके पश्चात् वध करना चाहिए ॥१॥‘’


उत्सेको हस्तगतमपि कार्यं विनाशयति ॥१५२॥

अर्थ: अभिमानी पुरुष अपने हाथ में आये हुए कार्य-सन्धि-आदि द्वारा होने वाले अर्थ-लाभादि प्रयोजन-को नष्ट कर डालता है ॥१५२॥ शुक्र विद्वान् ने भी कहा है कि -“विजिगीषु को शत्रु से प्रिय वचन बोलना चाहिए और बिलाव की तरह चेष्टा करनी चाहिए परन्तु जब शत्रु इस के ऊपर विश्वास करने लगे, तब जिस प्रकार बिलाव मौका पाकर चूहे का हनन कर देता है, उसी प्रकार इसे भी उसका हनन कर देना चाहिए ॥१॥‘’


नाल्पं महद्वापक्षेपोपायज्ञस्य ॥१५३॥

अर्थ: शत्रुविनाश के उपाय-सन्धि-विग्रहादि-जानने वाले विजिगीषु के सामने न हीनशक्ति शत्रु ठहर सकता है और न महाशक्तिशाली ॥१५३॥ शुक्र विद्वान् ने भी कहा है कि-“जो राजा शत्रु-वध के उपाय भलीभाँति जानता है, उसके सामने महान्-प्रचुर सैनिक शक्ति-सम्पन्न-शत्रु नहीं ठहर सकता। पुनः हीन शक्ति वाला किस प्रकार ठहर सकता है ? नहीं ठहर सकता ॥१॥‘’


नदीपूरः सममेवोन्मूलयति [तीरजत्तृणांघ्रिपान्] ॥१५४॥

अर्थ: जिस प्रकार नदी का पूर तटवर्ती तृण व वृक्षों को एक साथ उखाड़ कर फेंक देता है, उसी प्रकार शत्रु-विनाश के उपायों को जानने वाला विजिगीषु भी अनेक सफल-अव्यर्थ-उपायों से महाशक्तिशाली व हीनशक्ति-युक्त शत्रुओं को परास्त कर देता है ॥१५४॥


युक्तमुक्तं वचो बालादपि गृह्णीयात् ॥१५५॥

अर्थ: नैतिक मनुष्य को न्याय-युक्त योग्य वचन बच्चे से भी ग्रहण कर लेना चाहिए ॥१५५॥


रवेरविषये किं न दीपः प्रकाशयति ॥१५६॥

अर्थ: जहाँ पर सूर्य-प्रकाश नहीं है, वहाँ क्या दीपक पदार्थों को प्रकाशित नहीं करता ? अवश्य करता है। उसी प्रकार ज्ञान-वृद्धों के अभाव में बालक या मूर्ख पुरुष भी न्याय-युक्त बात बोल सकता है, अतः उसकी कही हुई युक्ति-युक्त बात शिष्ट पुरुषों को अवश्य मान लेनी चाहिए ॥१५६॥


अल्पमपि वातायनविवरं बहूनुपलम्भयति ॥१५७॥

अर्थ: जिस प्रकार झरोखा-रोशनदान-छोटा होने पर भी गृहवर्ती बहुत से पदार्थों को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार बालक या अज्ञ भी नैतिक बात कह सकता है, अतः शिष्यों को उसकी नीति-पूर्ण बात स्वीकार करनी चाहिए ॥१५७॥


पतिंवरा इव परार्थाः खलु वाचस्ताश्च निरर्थकं प्रकाश्यमानाः शपयन्त्यवश्यं
जनयितारं ॥१५८॥

अर्थ: जिस प्रकार अपनी इच्छानुकूल पति को चुनने वाली कन्याएँ दूसरों को दी जाने पर (पिता द्वारा उनकी इच्छा-विरुद्ध दूसरों के साथ विवाही जाने पर) पिता को तिरस्कृत करती हैं या उसकी हँसी कराती हैं, उसी प्रकार श्रोताओं की इष्ट प्रयोजन-सिद्धि करने वाली वक्ता की वाणी भी जब निरर्थक कही जाती है, तब वह वक्ता को तिरस्कृत करती है अथवा उसकी हँसी-मजाक कराती है। निष्कर्ष यह है कि नैतिक वक्ता को श्रोताओं के इष्ट प्रयोजन-साधक, तात्त्विक और मधुर वचन बोलना चाहिए एवं उसे निरर्थक वचन कहना छोड़ देना चाहिए, जिस से उसका तिरस्कार और हंसी-मजाक न होने पावे। अथवा जिस प्रकार विवाह योग्य कन्याएँ अपने पति की इष्ट प्रयोजन-सिद्धि करने वाली होती हैं, उसी प्रकार वक्ता की वाणी भी श्रोताओं की इष्ट प्रयोजन-सिद्धि करने वाली होती है परन्तु जब वक्ता नीति-विरुद्ध और निरर्थक वाणी बोलता है, तब उस से उसका तिरस्कार या हँसी-मजाक किया जाता है ॥१५८॥


तत्र युक्तमप्युक्तमयुक्तसमं यो न विशेषज्ञः ॥१५८॥

अर्थ: जो मनुष्य वक्ता के कहे हुए वचनों पर विशेष विचार (इसने अमुक बात मेरे हित की कही है-इत्यादि) नहीं करता-जो मूर्ख है, उसके सामने उचित बात कहना भी अनुचित के समान है, क्योंकि उसका कोई फल नहीं होता। सारांश यह है कि मूर्ख को हितोपदेश देना व्यर्थ है ॥१५६॥


स खलु पिशाचकी वातकी वा यः परोऽनर्थिनि वाचमुदीरयति ॥१६०॥

अर्थ: वह मूर्ख है, क्योंकि वह निःसंदेह जंगल में रोता है ॥१॥’’


विध्यायतः प्रदीपस्येव नयहीनस्य वृद्धिः ॥१६१॥

अर्थ: नीति-विरुद्ध प्रवृत्ति करने वाले पुरुष की बढ़ती तत्काल बुझते हुए दीपक को बढ़ती के समान उसको जड़-मूल से नष्ट करने वाली होती है। अर्थात् जिस प्रकार बुझने वाला दीपक अधिक प्रकाश करके समूल नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार अन्यायी मनुष्य भी अन्याय-संचित धनादि से तत्काल उन्नतिशील-सा मालूम पड़ता है, परन्तु राजदण्ड आदि के खतरे से खाली न होने के कारण अन्त में वह जड़-मूल से नष्ट हो जाता है ॥१६१॥ नारद विद्वान् ने भी कहा है कि ‘‘अन्यायी मनुष्यों की जो चोरी वगैरह अन्याय से बढ़ती होती है उसे बुझने वाले दीपक की बढ़ती के समान विनाश का कारण समझनी चाहिए ॥१॥’’


जीवोत्सर्गः स्वामिपदमभिलषतामेव ॥१६२॥

अर्थ: जो सेवक-अमात्य-आदि-कृतघ्नता के कारण अपने स्वामी के राज्यपद की कामना करते हैं. उन का विनाश-मरण होता है। सारांश यह है कि सेवकों को अपने स्वामी-पद (राज्यपद) की कामना नहीं करनी चाहिए ॥१६२॥


बहुदोषेषु क्षणदुःखप्रदोऽपायोऽनुग्रह एव ॥१६३॥

अर्थ: तीव्रतम अपराधियों का विनाश राजा को क्षणभर के लिए कष्टदायक होता है, परन्तु यह उसका उपकार ही समझना चाहिए, क्योंकि इस से राज्य की श्रीवृद्धि होती है ॥१६३॥ हारीत विद्वान् ने भी कहा है कि ‘‘राजाओं को उन पापियों-अत्यन्त भयानक अपराधियों-को मार देना चाहिए, चाहे वे उनके कुटुम्बी होने के कारण अबध्य-मृत्यु-दंड के अयोग्य भी हों।


स्वामिदोषस्वदोषाभ्यामुपहतवृत्तयः क्रुद्ध-लुब्ध-भीतावमानिताः
कृत्याः ॥१६४॥

अर्थ: मंत्री, अमात्य और सेनाध्यक्ष-आदि राज्याधिकारियों में से राज-दोष (क्रोध व ईर्ष्या-आदि) और स्वयं किये हुए अपराधों के कारण जिनकी जीविका (वेतनादि) नष्ट कर दी गई है, वे क्रोधी, लोभी, भीत और तिरस्कृत होते हैं, उन्हें ‘कृत्या’ के समान महाभयंकर जानना चाहिए। अर्थात् जिस प्रकार जारणमारणादि मंत्रों से अयथाविधि किया हुआ यज्ञ क्षुब्ध (असन्तुष्ट) होने पर यज्ञ करने वाले का घातक होता है, उसी प्रकार पृथक्करण (नौकरी से हटाना) और अपमानादि से क्षुब्ध-असन्तुष्ट हुए राज कर्मचारी भी राजघातक होते हैं। निष्कर्ष यह है कि नीतिज्ञ राजा को उन क्षुब्ध हुए अधिकारी वर्ग से सदा सावधान रहना चाहिए एवं आगे के सूत्र में कहे हुए नैतिक उपायों से उन्हें वश करना चाहिए ॥१६४॥


अनुवृत्तिरभयं त्यागः सत्कृतिश्च कृत्यानां वशोपायाः ॥१६५॥

अर्थ: पूर्वोक्त कृत्या समान राज्य-क्षति करने वाले कारण-वश क्षुब्ध हुए अधिकारियों (मंत्री व सेनाध्यक्ष-आदि) को वश करने के निम्न प्रकार उपाय हैं। १. उनकी इच्छानुकूल प्रवृत्ति करना (यदि वे पुनः अपने पदों पर नियुक्त होना चाहें, तो नियुक्त करना आदि) २. अभयदान (जीविका के बिना दारिद्रयदोष से भयभीतों को पुनःजीविका पर लगाना) ३. त्याग-अभिलषित धन देना और ४. सत्कार-तिरस्कृतों का सम्मान करना।


क्षयलोभविरागकारणानि प्रकृतीनां न कुर्यात् ॥१६६॥

अर्थ: राजा का कर्त्तव्य है कि जिन कारणों से उनकी प्रकृति-मंत्री और सेनापति-आदि राज्य के अङ्ग नष्ट और विरक्त-कर्त्तव्य-च्युत होती हो, उन्हें न करे एवं लोभ के कारणों से पराङ्मुख होकर उदारता से काम लेवें ॥१६६॥


सर्वकोपेभ्यः प्रकृतिकोपो गरीयान् ॥१६७॥

अर्थ: शत्रु-आदि से होने वाले समस्त क्रोधों की अपेक्षा मंत्री व सेनापति-आदि प्रकृति का क्रोध राजा के लिए विशेष कष्टदायक होता है। निष्कर्ष यह है कि राज्यरूपी वृक्ष का मूल अमात्यादि प्रकृति होती है, अतः उसके विरुद्ध होने पर राज्य नष्ट हो जाता है, अतः राजा को उसे सन्तुष्ट रखने में प्रयत्नशील रहना चाहिये ॥१६७॥


अचिकित्स्यदोषदुष्टान् खनिदुर्गसेतुबन्धाकरकर्मान्तरेषु क्लेशयेत् ॥१६८॥

अर्थ: राजा का कर्त्तव्य है कि वह जिन के अपराध कौटुम्बिक-संबंध-आदि के कारण दवाई करने के अयोग्य हैं-दूर नहीं किये जा सकते (जिन्हें वध-बंधनादि द्वारा दंडित नहीं किया जा सकता) ऐसे राजद्रोही महान् अपराधियों को तालाब-खाई खुदवाना, किले में रखकर काम कराना, नदियों के पुल बंधवाना और खानियों से लोहा-प्रभृति धातुएँ निकलवाना-इत्यादि कार्यों में नियुक्त कर क्लेशित करे ॥१६८॥


अपराध्यैरपराधकैश्च सह गोष्ठीं न कुर्यात् ॥१६९॥

अर्थ: राजा को अपराधी व अपराध कराने वालों के साथ कथा-गोष्ठी (वार्तालाप-सहवास) नहीं करनी चाहिए। सारांश यह है कि अपराध करने व कराने वाले (बैरी) उच्छृंखल, छिद्रान्वेषी और भयंकर वैर-विरोध करने वाले होते हैं। अतः राजा को शत्रु-कृत उपद्रवों से बचाव करने के लिए उन के साथ कथा-गोष्ठी करने का निषेध किया गया है ॥१६९॥


ते हि गृहप्रविष्टसर्पवत् सर्वव्यसनानामागमनद्वारं ॥१७०॥

अर्थ: निश्चय से वे लोग-दण्डित व अपराधी पुरुष-गृह में प्रविष्ट हुए सर्प की तरह समस्त आपत्तियों के आने में कारण होते हैं। अर्थात्-जिस प्रकार घर में घुसा हुआ सांप घातक होता है, उसी प्रकार सजा पाये हुए और अपराधी लोग भी वार्तालाप-सहवास को प्राप्त हुए छिद्रान्वेषण द्वारा शत्रुओं से मिल जाते है; अतः राजा को अनेक कष्ट पहुँचाने में समर्थ होने से घातक होते हैं ॥१७०॥


न कस्यापि क्रुद्धस्य पुरतस्तिष्ठेत् ॥१७१॥

अर्थ: नैतिक पुरुष को किसी भी क्रोधी पुरुष के सामने नहीं ठहरना चाहिए। अभिप्राय यह है कि क्रोध से अन्धबुद्धि-युक्त पुरुष जिस किसी (निरपराधी को) भी अपने सामने खड़ा हुआ देखता है, उसे मार डालता है, इसलिए उसके सामने ठहरने का निषेध किया गया है ॥१७१॥


क्रुद्धो हि सर्प इव यमेवाग्रे पश्यति तत्रैव रोषविषमुत्सृजति ॥१७२॥

अर्थ: क्योंकि क्रोधी पुरुष जिस किसी को सामने देखता है, उसी के ऊपर सर्प के समान रोष रूपी जहर फेंक देता है। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार सांप निरपराधी को भी डस लेता है, उसी प्रकार क्रोध से अन्धा पुरुष भी निपराधी को भी मार देता हैं, इसलिए उस के पास नहीं जाना चाहिए ॥१७२॥


अप्रतिविधातुरागमनाद्वरमनगमनम् ॥१७३॥

अर्थ: जो मनुष्य प्रयोजन सिद्ध करने में समर्थ नहीं है, उसका प्रयोजनार्थी के गृह आने की अपेक्षा न आना ही उत्तम है, क्योंकि उसके निरर्थक आने से प्रयोजनार्थी-कार्य-सिद्धि चाहने वाले-का व्यर्थ समय नष्ट होने के शिवाय कोई लाभ नहीं ॥१७३॥

(११) पुरोहित-समुद्देशः

पुरोहितमुदितोदितकुलशीलं षडंगवेदे दैवे निमित्ते दण्डनीत्यामभिविनीतमापदां
दैवीनां मानुषीणां च प्रतिकर्तारं कुर्वीत ॥१॥

अर्थ: जो कुलीन, सदाचारी और छह वेदाङ्ग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द व ज्योतिष), चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद व सामवेद अथवा प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग) ज्योतिष, निमित्तज्ञान और दण्डनीति विद्या में प्रवीण हो एवं दैवी (उल्कापात, अतिवृष्टि और अनावृष्टि आदि) तथा मानुषी आपत्तियों के दूर करने में समर्थ हो, ऐसे विद्वान् पुरुष को राजपुरोहित राज-गुरु बनाना चाहिए ॥१॥


राज्ञो हि मंत्रिपुरोहितौ मातापितरौ, अतस्तौ न केषुचिद्वाञ्छितेषु विस्तरयेत् ॥२॥

अर्थ: निश्चय से मंत्री-पुरोहित हितैषी होने के कारण राजा के माता-पिता हैं, इसलिए उसे उनको किसी भी अभिलषित पदार्थ में निराश नहीं करना चाहिए ॥२॥


अमानुष्योऽग्निरवर्षमतिवर्षं मरकी दुर्भिक्षं सस्योपघातो जन्तूत्सर्गो व्याधि-
भूतपिशाच-शाकिनी-सर्प-व्याल-मूषक-क्षोभश्चेत्यापदः ॥३॥

अर्थ: उल्कापात-बिजली गिरना, अनावृष्टि, अतिवृष्टि, महामारी रोग, दुर्भिक्ष-अकाल, टिड्डी वगैरह से धान्य-नाश, हिंसक जीवों के छूटने से होने वाली पीड़ा, बुखार-गलगंडादि शारीरिक रोग, भूत, पिशाच, शाकिनी, सर्प और हिंसक जन्तुओं से होने वाली पीड़ा और मूषकों की प्रचुरता से होने वाला कष्ट-प्लेग की बीमारी वगैरह आपत्तियाँ हैं। निष्कर्ष यह है कि प्रकरण में राज-पुरोहित को उक्त प्रकार की राष्ट्र पर होने वाली दैवी-मानुषी आपत्तियों का प्रतीकार करने में समर्थ होना चाहिए ॥३॥


शिक्षालापक्रियाक्षमो राजपुत्रः सर्वासु लिपिषु प्रसंख्याने पदप्रमाणप्रयोगकर्मणि नीत्यागमेषु रत्नपरीक्षायां सम्भोगप्रहरणोपवाह्यविद्यासु च साधु विनेतव्यः ॥४॥

अर्थ: राजा अपने राजकुमार को पहले जनसभाओं के योग्य वक्तृत्व-कला में प्रवीण बनाये। पश्चात् समस्त भाषाओं की शिक्षा, गणित शास्त्र, साहित्य, न्याय, व्याकरण, नीतिशास्त्र, रत्नपरीक्षा, कामशास्त्र, शस्त्र-विद्या और हस्ती-अश्वादि वाहन विद्या में अच्छी तरह प्रवीण बनाये ॥४॥


अस्वातन्त्र्यमुक्तकारित्वं नियमो विनीतता च गुरूपासनकारणानि ॥५॥

अर्थ: स्वच्छन्द न रहना, गुरु की आज्ञा-पालन, इन्द्रियों का वशीकरण, अहिंसादि सदाचार-प्रवृत्ति एवं नम्रता का व्यवहार, ये गुण गुरु-सेवा के साधन हैं-शिष्य की उक्त सत्प्रवृत्ति से गुरु प्रसन्न रहते हैं ॥५॥


व्रतविद्यावयोधिकेषु नीचैराचरणं विनयः ॥६॥

अर्थ: व्रत-पालन-अहिंसा, सत्य व अचौर्य-आदि सदाचार प्रवृत्ति, विद्याध्ययन और आयु में बड़े पुरुषों के साथ नमस्कारादि नम्रता का बर्ताव करना विनय गुण है। सारांश यह है कि व्रती, विद्वान् व वयोवृद्ध (माता पिता आदि) पुरुष जो कि क्रमशः सदाचार-प्रवृत्ति, शास्त्राध्ययन और हित-चिंतन आदि सद्गुणों से विभूषित होने के कारण श्रेष्ठ माने गये हैं, उनको नम्रकारादि करना विनय गुण है ॥६॥


पुण्यावाप्तिः शास्त्ररहस्यपरिज्ञानं सत्पुरुषाधिगम्यत्वं च विनयफलम् ॥७॥

अर्थ: व्रती महापुरुषों की विनय से पुण्य-प्राप्ति, विद्वानों की विनय से शास्त्रों का वास्तविक स्वरूप-ज्ञान एवं माता-पिता-आदि वयोवृद्ध हितैषियों की विनय से शिष्ट पुरुषों के द्वारा सम्मान मिलता है ॥७॥


अभ्यासः कर्मसु कौशलमुत्पादयत्येव यद्यस्ति तज्ज्ञेभ्यः सम्प्रदायः ॥८॥

अर्थ: यदि विद्या-जिज्ञासु पुरुषों के लिए विद्वान् गुरुओं की परम्परा चली आ रही है तो उस क्रम से किया हुआ विद्याभ्यास कर्त्तव्य-पालन में चतुरता उत्पन्न करता है। अभिप्राय यह है कि विद्वान् गुरुओं की परम्परापूर्वक किये हुए विद्याभ्यास से शास्त्रों का यथार्थ बोध होता है, जिससे मनुष्य कर्त्तव्य-पालन में निपुणता प्राप्त करता है ॥८॥


गुरुवचनमनुल्लंघनीयमन्यत्राधर्मानुचिताचारात्मप्रत्यवायेभ्यः ॥६॥


युक्तमयुक्तं वा गुरुरेव जानाति यदि न शिष्यः प्रत्यर्थवादी ॥१०॥

गुरुजनरोषेऽनुत्तरदानमभ्युपपत्तिश्चौषधम् ॥११॥

शत्रूणामभिमुखः पुरुषः श्लाघ्यो न पुनर्गुरूणाम् ॥१२॥

आराध्यं न प्रकोपयेद्यद्यसावाश्रितेषु कल्याणशंसी ॥१३॥

गुरुभिरुक्तं नातिक्रमितव्यं, यदि नैहिकामुत्रिकफलविलोपः ॥१४॥

सन्दिहानो गुरुमकोपयन्नापृच्छेत् ॥१५॥

गुरूणां पुरतो न यथेष्टमासितव्यम् ॥१६॥

नानभिवाद्योपाध्यायाद्विद्यामादीत ॥१७॥

अर्थ (सूत्र 6 से 17): अधर्म, अनुचित-आचार-नीति-विरुद्ध प्रवृत्ति और अपने सत्कर्त्तव्यों में विघ्न की बातों को छोड़कर बाकी सभी स्थानों में शिष्य को गुरु के वचन उल्लंघन नहीं करना चाहिए ॥६॥ यदि शिष्य गुरु से शत्रुता और वाद-विवाद करने वाला नहीं है, तो उसके योग्य-अयोग्य कर्त्तव्य को गुरु ही जानता है ॥१०॥ गुरुजनों के कुपित होने पर शिष्य को जवाब न देना और उनकी सेवा करना उनके-क्रोध-शान्ति की औषधि है ॥११॥ शत्रुओं के सामने जाने वाला-उनसे लड़ाई-झगड़ा करने वाला-पुरुष प्रशंसनीय है, किन्तु गुरुजनों के सामने जाने वाला-उनसे शत्रुता व वाद-विवाद करने वाला शिष्य प्रशंसा के योग्य नहीं-निंद्य है ॥१२॥ यदि पूज्य (गुरु-आदि) अपने अधीन रहने वाले शिष्यादि की कल्याण-कामना करता है, तो उसे कुपित-नाराज-नहीं करना चाहिए ॥१३॥ जो इस लोक व परलोक सम्बन्धी सुख के नष्ट करने की इच्छा नहीं करते उन्हें गुरुजनों की कही हुई बात उल्लंघन नहीं करनी चाहिए ॥१४॥ सन्देह-युक्त शिष्य गुरु को कुपित (नाराज) न करके नम्रता से प्रश्न पूछे ॥१५॥ शिष्यों को गुरुजनों के सामने अपनी इच्छानुसार (उद्दण्डतापूर्वक) नहीं बैठना चाहिए ॥१६॥ गुरु को नमस्कार किये बिना उस से विद्याग्रहण नहीं करना चाहिए ॥१७॥ शिष्य को विद्याध्ययन करने के सिवाय दूसरा कार्य, शारीरिक व मानसिक चपलता तथा चित्तप्रवृत्ति को अन्यत्र ले जाना ये कार्य नहीं करने चाहिए ॥१८॥ गौतम विद्वान् ने भी कहा है कि “जो शिष्य पठन-काल में दूसरा कार्य चपलता और चित्त की प्रवृत्ति को अन्यत्र ले जाता है, वह मूर्ख रह जाता है ॥१॥” तीक्ष्णबुद्धि छात्र को अपने सहपाठियों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए ॥१९॥ गुरु विद्वान् ने भी कहा है कि “जो छात्र गुरु से विद्या पढ़ना चाहता है और यदि वह अपने सहपाठियों की अपेक्षा तीक्ष्णबुद्धि है, तथापि उसे उनका पराभव-तिरस्कार नहीं करना चाहिए ॥१॥” शिष्य का कर्तव्य है कि वह गुरु की अपेक्षा विशेष विद्वान् होने पर भी उसका तिरस्कार न करे ॥२०॥ भृगु विद्वान् ने कहा है कि “जो छात्र अधिक बुद्धिमान होने पर अपने गुरु को अनादर दृष्टि से देखता है, वह मरकर नरक जाता है और संसार में अपकीर्ति प्राप्त करता है ॥१॥”


अध्ययनकाले व्यासङ्गं पारिप्लवमन्यमनस्कतां च न भजेत् ॥१८॥


सहाध्यायिषु बुद्धयतिशयेन नाभिभूयेत ॥१९॥


प्रज्ञयातिशयानी न गुरुमवज्ञायेत ॥२०॥


स किमभिजातो मातरि यः पुरुषः शूरो वा पितरि ॥२१॥

अनुज्ञातो न क्वचिद् व्रजेत् ॥२२॥

मार्गमचलं जलाशयं च नैकोऽवगाहेत् ॥२३॥

अर्थ (सूत्र 21 से 23): जो मनुष्य माता-पिता के साथ वैर-विरोध करके अपनी वीरता प्रकट करता है, क्या वह कुलीन कहा जा सकता है ? नहीं कहा जा सकता । अभिप्राय यह है कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी कुलीनता प्रकट करने के लिए माता-पिता की भक्ति करनी चाहिए ॥२१॥ मनु विद्वान् ने भी कहा है कि “सच्चा पुत्र वही है, जो माता-पिता से किसी प्रकार का द्वेष नहीं करता, परन्तु जो उनसे द्वेष करता है, उसे दूसरे का वीर्य समझना चाहिए ॥१॥” पुत्र को माता-पिता की आज्ञा के बिना कहीं न जाना चाहिए ॥२२॥ वसिष्ठ विद्वान् ने भी कहा है कि “जो पुत्र माता-पिता की आज्ञा के बिना सूक्ष्म कार्य भी करता है, उसे कुलीन नहीं समझना चाहिए ॥१॥” पुत्र को माता-पिता व साथियों के बिना अकेला किसी मार्ग में नहीं जाना चाहिए, व पहाड़


पितरमिव गुरुमुपचरेत् ॥२४॥

अर्थ: शिष्य को गुरु की पिता के सदृश सेवा करनी चाहिए ॥२४॥


गुरुपत्नीं जननीमिव पश्येत् ॥२५॥

अर्थ: शिष्य गुरु-पत्नी को माता के समान पूज्य समझे ॥२५॥


गुरुमिव गुरुपुत्रं पश्येत् ॥२६॥

अर्थ: छात्र गुरु-पुत्र को गुरु के सदृश पूज्य समझे ॥२६॥


सब्रह्मचारिणि बान्धव इव स्निह्येत् ॥२७॥

अर्थ: छात्र को अपने सहपाठी ब्रह्मचारी से बन्धु की तरह स्नेह करना चाहिए ॥२७॥


ब्रह्मचर्यमाषोडशाद्वर्षात्ततो गोदानपूर्वकं दारकर्म चास्य ॥२८॥

समविद्यैः सहाधीतं सर्वदाभ्यस्येत् ॥२९॥

गृहदौःस्थ्यमागन्तुकानां पुरतो न प्रकाशयेत् ॥३०॥

अर्थ (सूत्र 28 से 30): छात्र सोलह वर्षपर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत धारण करे, पश्चात् इसका गो-दानपूर्वक विवाह-संस्कार होना चाहिए ॥२८॥ ब्रह्मचारी छात्र को सहपाठियों के साथ पढ़े हुए शास्त्र का सदा अभ्यास करना चाहिए ॥२९॥ नैतिक मनुष्य को अपनी गृह-विपत्ति (दरिद्रता-आदि) अतिथियों के समक्ष प्रकाशित नहीं करनी चाहिए ॥३०॥


परगृहे सर्वोऽपि विक्रमादित्यायते ॥३१॥

अर्थ: सभी मनुष्य दूसरों के गृह में जाकर उसका धनादि-व्यय कराने के लिए विक्रमादित्य राजा की तरह उदार हो जाते हैं-धनाढ्यों का अनुकरण करने लगते हैं ॥३१॥


स खलु महान् यः स्वकार्येष्विव परकार्येषूत्सहते ॥३२॥

अर्थ: जो अपने कार्य समान दूसरों के कार्य उत्साहपूर्वक करता है, वही महापुरुष है ॥३२॥


परकार्येषु को नाम न शीतलः ॥३३॥

अर्थ: कौन पुरुष दूसरों के कार्य-साधन में ठंडा-आलसी (उद्योग-शून्य) नहीं होता ? सभी होते हैं॥ ३३॥


राजासन्नः को नाम न साधुः ॥३४॥

अर्थपरेष्वनुनयः केवलं दैन्याय ॥३५॥

को नामार्थार्थी प्रणामेन तुष्यति ॥३६॥

अर्थ (सूत्र 34 से 36): कौन-सा राज-कर्मचारी राजा के समीप जाकर सज्जन नहीं होता ? सभी होते हैं। सारांश यह है कि ये लोग दण्ड-भय से कृत्रिम सज्जन होते हैं, न कि स्वाभाविक ॥३४॥ प्रयोजन-वश धनाढ्य कृपणों का अनुनय (गुण-गान-आदि) करने से केवल दीनता ही प्रकट होती है, न कि अर्थ-लाभादि प्रयोजन सिद्धि ॥३१॥ कौन धनाभिलाषी पुरुष केवल प्रणाम मात्र से सन्तुष्ट होता है ? कोई नहीं ॥३६॥


आश्रितेषु कार्यतो विशेषकारणेऽपि दर्शनप्रियालापनाभ्यां सर्वत्र समवृत्तिस्तंत्रं
वर्द्धयति अनुरञ्जयति च ॥३७॥

तनुधनादर्थग्रहणं मृतमारणमिव ॥३८॥

अप्रतिविधातरि कार्यनिवेदनमरण्यरुदितमिव ॥३९॥

अर्थ (सूत्र 37 से 39): राजा का कर्त्तव्य है कि वह अपने आश्रित अमात्य-आदि प्रकृति के साथ अनुरक्त दृष्टि और मधुरभाषण-आदि शिष्ट व्यवहार समान रखे। क्योंकि पक्षपात-शून्य समदृष्टि से राजतंत्र की श्रीवृद्धि होती है व समस्त प्रकृति-अमात्य-आदि-उस से अनुरक्त रहती है। यदि उसमें से किसी कर्मचारी द्वारा उसकी विशेष प्रयोजन-सिद्धि हुई हो, तो उसे एकान्त में पारितोषिक-प्रदान द्वारा प्रसन्न करे, परन्तु उसका पक्षपात प्रकाशित नहीं होने पावे, अन्यथा अन्य प्रकृति के लोग राजा से द्वेष करने लगते हैं ॥३७॥ दरिद्र मनुष्य से धन लेना मरे हुए को मारने के समान कष्टदायक है। सारांश यह है कि राजा धनिकों से ही टैक्स वसूल करे, गरीबों से नहीं, क्योंकि उन्हें विशेष कष्ट होता है ॥३८॥ जिस प्रकार जंगल में रुदन करना व्यर्थ है, उसी प्रकार प्रयोजन-सिद्धि करने में असमर्थ पुरुष के लिए अपना प्रयोजन कहना निरर्थक है ॥३६॥


दुराग्रहस्य हितोपदेशो बधिरस्याग्रतो गानमिव ॥४०॥

अकार्यज्ञस्य शिक्षणमन्धस्य पुरतो नर्तनमिव ॥४१॥

अविचारकस्य युक्तिकथनं तुषकण्डनमिव ॥४२॥

नीचेषूपकृतमुदके विशीर्णं लवणमिव ॥४३॥

अर्थ (सूत्र 40 से 43): हठग्राही पुरुष को हित का उपदेश देना बहरे के सामने गीत गाने के समान निष्फल है ॥४०॥ कर्त्तव्यज्ञान-शून्य-मूर्ख पुरुष को शिक्षा देना अन्धे के सामने नाचने के समान व्यर्थ है ॥४१॥ जिस प्रकार भूसे का कूटना निरर्थक है, उसी प्रकार विचार-शून्य-मूर्ख को योग्य बात कहना व्यर्थ है ॥४२॥ विद्वानों ने भी कहा है कि ‘‘जिस प्रकार सर्प को दूध पिलाना विष-वर्द्धक है, उसी प्रकार मूर्ख को उपदेश देना दुःखदायक है ॥१॥’’ नीच मनुष्य के साथ किया हुआ उपकार पानी में फेंके हुए नमक की तरह नष्ट हो जाता है। सारांश यह है कि नीच मनुष्य प्रत्युपकार करने के बदले उल्टी हानि पहुँचाने तत्पर रहता है ॥४३॥ वादीभसिंहसूरि ने भी कहा है कि जिस प्रकार सांप को पिलाया हुआ दूध विष-वर्धक होता है, उसी प्रकार नीच मनुष्य के साथ किया हुआ उपकार अपकार-हानि के लिए होता है ॥१॥


अविशेषज्ञे प्रयासः शुष्कनदीतरणमिव ॥४४॥

परोक्षे किलोपकृतं सुप्तसंवाहनमिव ॥४५॥

अकाले विज्ञप्तमूषरे कृष्टमिव ॥४६॥

उपकृत्योद्घाटनं बैरकरणमिव ॥४७॥

अर्थ (सूत्र 44 से 47): मूर्ख पुरुष को समझाने में परिश्रम करना सूखी नदी में तैरने के समान निष्फल है ॥४४॥ जो मनुष्य पीठ पीछे किसी का उपकार करता है, वह सोते हुए के पैर दाबने के समान व्यर्थ कष्ट उठाता है। सारांश यह है कि यद्यपि पीठ पीछे उपकार करने से भी भलाई होती है परन्तु उसे मालूम नहीं रहता कि किसने मेरा उपकार किया है ? इसलिए वह कभी भी उपकारी का प्रत्युपकार नहीं करता, इसलिए परोक्ष में उपकार करना निरर्थक है ॥४५॥ बिना मौके की बात कहना ऊसर जमीन में बीज बोने के समान निरर्थक है अतः अवसर पर बात कहनी चाहिए ॥४६॥ जो पुरुष किसी की भलाई करके उसके सामने प्रकट करता है, वह उस से बैर-विरोध करने के समान है ॥४७॥


अफलवतः प्रसादः काशकुसुमस्येव ॥४८॥

अर्थ: उपकार करने में असमर्थ पुरुष का प्रसन्न होना कास-घास विशेष-के पुष्प समान निरर्थक है। अर्थात् नदी के तटवर्ती कास (तृणविशेष) में फूल ही होते हैं, फल नहीं होते, अतः जिस प्रकार कास का फूल निष्फल-फल-रहित-होता है, उसी प्रकार उपकार करने में असमर्थ पुरुष का प्रसन्न होना निष्फल अर्थ-लाभादि प्रयोजन-रहित होता है। ॥४८॥ किसी विद्वान्१ ने भी कहा है कि जिस मनुष्य के असन्तुष्ट-नाराज-होने पर किसी प्रकार का भय नहीं है और संतुष्ट होने पर धन-प्राप्ति नहीं होती व जो उपकार-अपकार नहीं कर सकता, वह नाराज होने पर भी क्या कर सकता है ? कुछ नहीं कर सकता ॥१॥‘’


गुणदोषावनिश्चित्यानुग्रहनिग्रहविधानं ग्रहाभिनिवेश इव ॥४९॥

उपकारापकारासमर्थस्य तोषरोषकरणमात्मविडम्बनमिव ॥५०॥

अर्थ (सूत्र 49 से 50): नैतिक मनुष्य को किसी के गुण-दोष का निश्चय करके उसका क्रमशः उपकार-अनुपकार करना चाहिए। अर्थात् उसे गुणवान्-शिष्ट पुरुष का उपकार और दुष्ट पुरुष का अपकार करना चाहिए, परन्तु जो इससे विपरीत प्रवृत्ति करता है-गुण-दोष का निश्चय किये बिना ही किसी के अनुग्रह-निग्रह (उपकार-अपकार) में प्रवृत्त होता है, वह राहु-केतु या भूत-पिशाच के द्वारा व्याप्त पुरुष के समान कष्ट उठाता है अर्थात् जिस प्रकार राहु-केतु इन अशुभ ग्रहों से या पिशाचादि के आक्रमण से मनुष्य पीड़ित होता है, उसी प्रकार गुण-दोष की परीक्षा किये बिना किसी का उपकार-अनुपकार करने वाला मनुष्य भी अनेक कष्ट भोगता है ॥४९॥ जो मनुष्य उपकार करने में समर्थ नहीं है, उसे सन्तुष्ट करने का प्रयत्न करना और अपकार करने में असमर्थ को असंतुष्ट करना अपनी हँसी कराने के सदृश है। सारांश यह है कि जिस प्रकार अपनी हँसी कराना अनुचित है, उसी प्रकार उपकार करने में असमर्थ को सन्तुष्ट करना और अपकार करने में असमर्थ को असन्तुष्ट करना अनुचित है, अतः नैतिक व्यक्ति अपने उपकारी को संतुष्ट और अपकारी को असंतुष्ट रखे, जिसके परिणामस्वरूप वह संतुष्ट से उपकार प्राप्त कर सके और असंतुष्ट से अपनी हानि का बचाव कर सके ॥५०॥


ग्राम्यस्त्रीविद्रावणकारि गलगर्जितं ग्रामशूराणाम् ॥५१॥

अर्थ: जो मनुष्य स्वयं डरपोक हैं किन्तु झूठी शूरता दिखाकर ऊपरी भय दिखाते हैं, उनके भयंकर चिल्लाने से केवल ग्रामीण स्त्रियाँ ही भयभीत होती हैं, अन्य नागरिक मनुष्य नहीं ॥५१॥


स विभवो मनुष्याणां यः परोपभोग्यो न तु यः स्वस्यैवोपभोग्यो व्याधिरिव॥५२॥

अर्थ: रोग समान स्वयं भोगता है वह कृपण-धन निन्द्य है ॥५२॥ वल्लभदेव१ विद्वान् ने भी कहा है कि “उस कृपण-लक्ष्मी से क्या लाभ है ? जो कि कुलवधू-समान केवल उसी के द्वारा भोगी जाती है और जो सर्वसाधारण वेश्या की तरह पथिकों द्वारा नहीं भोगी जाती ॥१॥”


स किं गुरुः पिता सुहृद्वा योऽभ्यसूययाऽर्भं बहुदोषं बहुषु
वा दोषं प्रकाशयति न शिक्षयति च ॥५३॥

स किं प्रभुर्यश्चिरसेवकेष्वेकमप्यपराधं न सहते ॥५४॥

अर्थ (सूत्र 53 से 54): वह गुरु, पिता व मित्र निन्द्य वा शत्रु सदृश है, जो कि ईर्ष्यावश अपने बहुदोषी शिष्य, पुत्र व मित्र के दोष दूसरों के समक्ष प्रकट करता है और उसे नैतिक शिक्षण नहीं देता ॥५३॥ गौतम२ विद्वान् ने कहा है कि “गुरु को ईर्ष्यावश अपने शिष्य के दोष बहुत मनुष्यों के समक्ष प्रकाशित नहीं करने चाहिए, किन्तु उसे हित की शिक्षा देनी चाहिए ॥१॥” वह स्वामी निन्द्य है, जो कि अपने चिरकालीन सेवक का एक भी अपराध क्षमा नहीं करता ॥५४॥ शुक्र३ विद्वान् ने भी कहा है कि “स्वामी को उस सेवक का, जो कि भक्त होकर चिरकाल से उसकी सेवा कर रहा है, केवल एक दोष के कारण निग्रह नहीं करना चाहिए ॥१॥”

(१२) सेनापति-समुद्देशः

अभिजनाचारप्राज्ञानुरागशौचशौर्यसम्पन्नः प्रभाववान्, बहुबान्धवपरिवारो,
निखिलनयोपायप्रयोगनिपुणः
समभ्यस्तसमस्तवाहनायुधयुद्धलिपिभाषात्मपरिज्ञानस्थितिः
सकलतन्त्रसामन्ताभिमतः, साङ्ग्रामिकाभिरामिकाकारशरीरो,
भर्तुरादेशाभ्युदयहितवृत्तिषु निर्विकल्पः स्वामिनात्मवन्मानार्थप्रतिपत्तिः, राजचिह्नैः
सम्भावितः, सर्वक्लेशायाससह, इति सेनापतिगुणाः ॥१॥

अर्थ: जिस में निम्नप्रकार के गुण वर्तमान हों, उसे सेनाध्यक्ष-पद पर नियुक्त करना चाहिए। कुलीन, आचार-व्यवहार-सम्पन्न, राज-विद्याप्रवीण (विद्वान्), स्वामी व सेवको से अनुरक्त, पवित्रहृदय, बहुपरिवारयुक्त, समस्त नैतिक उपाय (साम-दामादि) के प्रयोग (अग्नि व जलःस्तम्भनप्रभृति) करने में कुशल, जिसने समस्त हाथी, घोड़े आदि वाहन, खङ्गादिशस्त्र-संचालन, युद्ध और भिन्न देशवर्ती भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया हो, आत्मज्ञानी, समस्त सेना व अमात्यप्रभृति प्रधान राज-सेवकों का प्रेमपात्र, जिसका शरीर योद्धाओं से लोहा लेने की शक्ति-सम्पन्न और मनोज्ञ (युद्ध करने में उत्साही) हो, स्वामी की आज्ञा-पालन, युद्ध में विजय प्राप्ति व राष्ट्र के हित-चिंतन में विकल्प रहित, जिसे स्वामी ने अपने समान समझकर सम्मानित व धन देकर प्रतिष्ठित किया हो, छत्र-चामरादि राज-चिह्नों से युक्त और समस्त प्रकार के कष्ट व खेदों की सहन करने में समर्थ ये सेनाध्यक्ष के गुण हैं। सारांश यह है कि उक्त गुण-विभूषित वीर पुरुष को सेनाध्यक्ष-पद पर नियुक्त करने से विजिगीषु को विजयलक्ष्मी प्राप्त होती है ॥१॥


स्वैः परैश्च प्रधृष्यप्रकृतिरप्रभाववान् स्त्रीजितत्वमौद्धत्यं
व्यसनिताऽक्षयव्ययप्रवासोपहतत्वं तन्त्राप्रतीकारः सर्वैः सह विरोधः परपरीवादः
परुषभाषितत्वमनुचितज्ञताऽसंविभागित्वं स्वातन्त्र्यात्मसम्भावनोपहतत्वं
स्वामिकार्यव्यसनोपेक्षः सहकारिकृतकार्यविनाशो राजहितवृत्तिषु चेर्ष्यालुत्वमिति
सेनापतिदोषाः ॥२॥

अर्थ: जिसकी प्रकृति (प्रधान पुरुष) आत्मीय व दूसरे शत्रुओं से पराजित हो सके, तेज-शून्य, स्त्रीकृत उपद्रवों से वश किया जानेवाला (जितेन्द्रियता-शून्य), अभिमानी; व्यसनासक्त, मर्यादा से बाहर धनव्ययी, चिरकाल पर्यन्त परदेशवासी, दरिद्र, सैन्यापराधी, सब के साथ बैर-विरोध करने वाला, अनुचित बात को जानने वाला, अपनी आय को अकेला खाने वाला, स्वच्छन्द प्रकृति-युक्त, स्वामी के कार्य व आपत्तियों का उपेक्षक, युद्ध-सहायक योद्धाओं का कार्य-विघातक और राज-हित चिन्तकों से ईर्ष्यालु ये सेनापति के दोष हैं। अभिप्राय यह है कि उक्त दोष-युक्त पुरुष को सेनाध्यक्ष बनाने से राज्य क्षति होती है॥ २॥


स चिरंजीवति राजपुरुषो यो नगरनापित इवानुवृत्तिपरः ॥३॥

अर्थ: जो राज-सेवक राजकीय प्रधान पुरुषों की नाई की तरह विनय करता है, वह चिरकाल तक सुखी रहता है। अर्थात् जिस प्रकार नाई नगर में प्रविष्ट होकर समस्त मनुष्यों के साथ विनय का बर्ताव करने से जीवन-निर्वाह करता हुआ सुखी रहता है, उसी प्रकार राजकीय पुरुषों के साथ विनयशील राजसेवक भी चिरकाल तक सुखी रहता है॥ ३॥

(१३) दूत-समुद्देशः

अनासन्नेष्वर्थेषु दूतो मंत्री ॥१॥

अर्थ: जो अधिकारी दूरदेशवर्ती राजकीय कार्य-सन्धि-विग्रहादि-का साधक या प्रदर्शक होने के कारण मंत्री समान होता है, उसे ‘दूत’ कहते हैं।॥१॥


स्वामिभक्तिरव्यसनिता दाक्ष्यं शुचित्वममूर्खता प्रागल्भ्यं प्रतिभानवत्वं क्षान्तिः
परमर्मवेदित्वं जातिश्च प्रथमे दूतगुणाः॥ २॥

अर्थ: स्वामी-भक्त, द्यूत-क्रीड़ा, मद्यपानादि व्यसनों में अनासक्त, चतुर, पवित्र (निर्लोभी व निर्मल शरीर तथा विशुद्ध वस्त्र-युक्त), विद्वान्, उदार, बुद्धिमान्, सहिष्णु, शत्रु-रहस्य का ज्ञाता और कुलीन ये दूत के मुख्य गुण हैं ॥२॥


स त्रिविधो निसृष्टार्थः परिमितार्थः शासनहरश्चेति॥ ३॥

अर्थ: दूत तीन प्रकार के होते हैं। १. निसृष्टार्थ २. परिमितार्थ ३. शासनहर॥ ३॥


यत्कृतौ स्वामिनः सन्धिविग्रहौ प्रमाणं स निसृष्टार्थः, यथा कृष्णः
पाण्डवानाम्॥४॥

अर्थ: जिसके द्वारा निश्चित किये हुए सन्धि-विग्रह को उसका स्वामी प्रमाण मानता है, वह ‘निसृष्टार्थ’ है, जैसे पांडवों का कृष्ण। अभिप्राय यह है कि कृष्ण ने पांडवों की ओर से जाकर कौरवों से विग्रह-युद्ध-निश्चित किया था, उसे पांडवों को प्रमाण मानना पड़ा; अतः कृष्ण पाण्डवों के ‘निसृष्टार्थ’ राज-दूत थे। इसी प्रकार राजा द्वारा भेजे हुए संदेश और शासन-लेख-को जैसे का तैसा शत्रु के पास कहने या देने वाले को क्रमशः ‘परिमितार्थ’ व ‘शासनहर’ जानना चाहिए॥ ४॥


अविज्ञातो दूतः परस्थानं न प्रविशेन्निर्गच्छेद्वा॥ ५॥

अर्थ: दूत शत्रु द्वारा अज्ञात होकर-उसकी आज्ञा के बिना-न तो शत्रु-स्थान में प्रविष्ट हो और न वहाँ से प्रस्थान करे। सारांश यह है कि जब दूत शत्रु की आज्ञा-पूर्वक प्रवेश या प्रस्थान करता है, तब उसे अपने घात का भय नहीं रहता ॥५॥


मत्स्वामिनाऽसंधातुकामो रिपुर्मां विलम्बयितुमिच्छतीत्यननुज्ञातोऽपि दूतोऽपसरेद्
गूढपुरुषान्वाऽवसर्पयेत्॥ ६॥

अर्थ: जब दूत को यह निश्चय हो जावे कि यह शत्रु मेरे स्वामी से सन्धि नहीं करेगा किन्तु युद्ध करने का इच्छुक है और इसी कारण मुझे यहाँ रोक रहा है, तब उसे शत्रु की आज्ञा के बिना ही वहाँ से प्रस्थान कर देना चाहिए या स्वामी के पास गुप्तदूत भेज देना चाहिए॥ ६॥


परेणाशु प्रेषितो दूतः कारणं विमृशेत् ॥७॥

अर्थ: यदि शत्रु ने दूत को देखकर ही वापस लौटा दिया हो, तो दूत उसका कारण सोचे ॥७॥


कृत्योपग्रहोऽकृत्योत्थापनं सुतदायादावरुद्धोपजापः स्वमण्डलप्रविष्ट-
गूढपुरुषपरिज्ञानमन्तपालाटविककोशदेशतन्त्रमित्रावबोधः कन्यारत्नवाहन-
विनिश्रावणं स्वाभीष्टपुरुषप्रयोगात् प्रकृतिक्षोभकरणं दूतकर्म॥८॥

अर्थ: दूत स्वामी-हितार्थ शत्रु-राजा के यहाँ ठहरकर निम्न प्रकार कर्त्तव्य-पालन करे। १. नैतिक उपाय द्वारा शत्रुकार्य-सैनिक-संगठन-आदि-को नष्ट करना, २. राजनैतिक उपाय द्वारा शत्रु का अनर्थ करना शत्रु-विरोधी-क्रुद्ध, लुब्ध, भीत और अभिमानी-पुरुषों को साम-दाम द्वारा वश में करना-आदि, ३. शत्रु के पुत्र, कुटुम्बी व जेलखाने में बन्दीभूत मनुष्यों में द्रव्य-दानादि द्वारा भेद उत्पन्न करना, ४. शत्रु द्वारा अपने देश में भेजे हुए गुप्त पुरुषों का ज्ञान, ५. सीमाधिप, आटविक (भिल्लादि), कोश देश, सैन्य और मित्रों की परीक्षा, ६. शत्रु राजा के यहाँ वर्तमान कन्यारत्न तथा हाथी-घोड़े आदि वाहनों को निकालने का प्रयत्न अथवा गुप्तचरों द्वारा स्वामी को बताना, ७. शत्रु-प्रकृति (मंत्री-सेनाध्यक्ष-आदि) में गुप्तचरों के प्रयोग द्वारा क्षोभ उत्पन्न करना ये दूत के कार्य हैं ॥८॥


मन्त्रिपुरोहितसेनापतिप्रतिबद्धपूजनोपचारविश्रम्भाभ्यां शत्रोरितकर्त्तव्यतामन्तः
सारतां च विद्यात् ॥९॥

अर्थ: दूत शत्रु के मंत्री, पुरोहित और सेनाध्यक्ष के समीपवर्ती पुरुषों को धन-दान द्वारा अपने में विश्वास उत्पन्न कराकर शत्रु-हृदय की गुप्त बात-युद्धादि-व उसके कोश-सैन्य के प्रमाण का निश्चय करे ॥९॥


स्वयमशक्तः परेणोक्तमनिष्टं सहेत ॥१०॥

अर्थ: दूत शत्रु के प्रति स्वयं कठोर वचन न कहकर उसके कहे हुए कठोर वचन सहन करे ॥१०॥


गुरुषु स्वामिषु वा परिवादे नास्ति क्षान्तिः ॥११॥

अर्थ: जब दूत शत्रु-मुख से अपने गुरु व स्वामी की निन्दा सुने तब उसे शान्त नहीं रहकर उसका यथायोग्य प्रतीकार करना चाहिए ॥११॥
जैमिनि विद्वान् ने भी कहा है कि “जो पुरुष शत्रु से की हुई अपने गुरु व स्वामी की निन्दा सुनकर कुपित नहीं होता, वह नरक जाता है ॥१॥”


स्थित्वापि यियासतोऽवस्थानं केवलमुपक्षयहेतुः ॥१२॥

अर्थ: जो मनुष्य स्थित हो करके भी किसी प्रयोजन-अर्थ-लाभादि-सिद्धि के लिए देशान्तर में गमन करने का इच्छुक है, यदि वह किसी कारणवश-आलस्य-आदि के कारण-रुक जाता है या जाने में विलम्ब कर देता है, तो इससे उसके धन-लाभादि प्रयोजन नष्ट हो जाते हैं, अतएव नैतिक व्यक्ति को गन्तव्य स्थान में अवश्य जाना चाहिए।
रैभ्य विद्वान् ने भी कहा है कि “नैतिक पुरुष गन्तव्य स्थान में जाने से विलम्ब न करे, अन्यथा उसकी धन-क्षति होती है ॥१॥” राजनैतिक-प्रकरण में अभिप्राय यह है कि जो विजिगीषु स्थित हो करके भी शक्ति-संचय-सैनिक-संगठन-आदि करके शत्रु पर चढ़ाई करने के उद्देश्य से शत्रु-देश में जाने का इच्छुक है, यदि वह वहाँ नहीं जाता या विलम्ब कर देता है, तो उसके धन-जन-आदि की क्षति हो जाती है; क्योंकि शत्रु, उसे हीनशक्ति समझकर उस पर चढ़ाई कर देता है, जिसके फलस्वरूप उसके धन-जन की क्षति होती है ॥१२॥


वीरपुरुषपरिवारितः शूरपुरुषान्तरितान् दूतान् पश्येत् ॥१३॥

श्रूयते हि किल चाणक्यस्तीक्ष्णदूतप्रयोगेणैकं नन्दं जघान ॥१४॥

अर्थ (सूत्र 13 से 14): विजिगीषु को स्वयं बहादुर सैनिकों से घिरा रहकर और शत्रु-देश से आये हुए दूतों को भी वीर सैनिकों के मध्य में रखकर उनसे वार्तालाप आदि करना चाहिए। सारांश यह है कि विजिगीषु कभी भी अरक्षित अवस्था में-पलटन के पहरे के बिना-शत्रु-देश से आये हुए दूतों से संभाषण-आदि न करे अन्यथा वह उनके खतरे से खाली नहीं रह सकता ॥१३॥
नारद विद्वान् ने भी कहा है कि “चिरकालीन जीवन की कामना करने वाला विजिगीषु बहुत से वीर सैनिकों से घिरा रहकर शत्रु-दूतों को देखे ॥१॥” इतिहास बताता है कि आर्य चाणक्य (ई. से ३३० वर्ष पूर्वकालीन सम्राट् चन्द्रगुप्त का मंत्री) ने तीक्ष्णदूत-विषकन्या के प्रयोग द्वारा अरक्षित नन्द राजा को मार डाला था ॥१४॥


शत्रुप्रहितं शासनमुपायनं च स्वैरपरीक्षितं नोपाददीत ॥१५॥

अर्थ: विजिगीषु राजा शत्रु द्वारा भेजे हुए लेख व उपहार आत्मीयजनों-प्रामाणिक राजवैद्य आदि से बिना परीक्षा किये हुए स्वीकार न करे ॥१५॥ शुक्र१ विद्वान् ने कहा है कि “राजा को शत्रु-प्रेषित पत्र व उपहार जब तक वैद्यादि आप्त-प्रामाणिक पुरुषों द्वारा परीक्षित न किये जावें तब तक ग्रहण नहीं करना चाहिए ॥१॥”


श्रूयते हि किल स्पर्शविषवासिताद्भुतवस्त्रोपायनेन करहाटपतिः कैटभो वसुनामानं राजानं जघान ॥१६॥

अर्थ: नीतिविद्या-विशारदों की परम्परा से सुना जाता है कि करहाट देश के राजा कैटभने वसुनाम के प्रतिद्वन्द्वी राजा को दूत द्वारा भेजे हुए व फैलने वाले विष से वासित (वासना दिये गये-बार-बार भिगोये हुए) बहुमूल्य वस्त्रों के उपहार-भेंट द्वारा मार डाला। सारांश यह है कि वसुराजा ने विष-दूषित उन बहुमूल्य वस्त्रों को आप्त पुरुषों द्वारा परीक्षित किये बिना ज्यों ही धारण किया, त्यों ही वह तत्काल काल-कवलित हो गया। अतः शत्रु-कृत खतरे से सुरक्षित रहने के लिए विजिगीषु को शत्रु-प्रेषित उपहार आप्तपुरुषों द्वारा परीक्षित होने पर ही ग्रहण करना चाहिए ॥१६॥


आशीविषविषधरोपेतरत्नकरण्डकप्राभृतेन च करवालः करालं जघानेति ॥१७॥

अर्थ: इसी प्रकार करवाल नाम के राजा ने कराल नाम के शत्रु राजा को दृष्टिविष वाले सर्प से व्याप्त रत्नों के पिटारे की भेंट भेजकर मार डाला। सारांश यह है कि ज्यों ही कराल राजा ने शत्रु-प्रेषित उस रत्न-पिटारे को खोला त्यों ही वह उस में वर्तमान दृष्टिविष सर्प के विष से तत्काल दीर्घ निद्रा (मृत्यु) को प्राप्त हो गया; अतः राजा को शत्रु-प्रेषित उपहार आप्त-परीक्षित हुए स्वीकार करना चाहिए ॥१७॥


महत्यपराधेऽपि न दूतमपहन्यात्२ ॥१८॥

अर्थ: राजा का कर्त्तव्य है कि वह दूत द्वारा महान् अपराध किये जाने पर भी उसका वध न करे ॥१८॥


उद्धृतेष्वपि शस्त्रेषु दूतमुखा वै राजानः३ ॥१९॥

अर्थ: वीर सैनिकों द्वारा शस्त्र संचालित किये जाने पर भी-घोर युद्ध-आरम्भ होने पर भी राजा लोग दूतमुख वाले होते हैं-दूत-वचनों द्वारा ही अपनी कार्य-सिद्धि (सन्धि-विग्रहादि से विजय लक्ष्मी प्राप्त करना) करते हैं। अभिप्राय यह है कि युद्ध के पश्चात् भी दूतों का उपयोग होता है; अतः दूत वध करने के अयोग्य हैं ॥१९॥


तेषामन्तावसायिनोऽप्यवध्याः ॥२०॥

किं पुनर्ब्राह्मणः ॥२१॥

अर्थ (सूत्र 20 से 21): यदि दूतों के मध्य में से चाण्डाल भी दूत बनकर आये हों, तो वे भी वध करने के अयोग्य हैं उच्चवर्ण वाले ब्राह्मण दूतों का तो कहना ही क्या है? अर्थात् वे तो सर्वथा वध करने के अयोग्य होते हैं ॥२०-२१॥


अवध्यभावो दूतः सर्वमेव जल्पति ॥२२॥

अर्थ: दूत राजा द्वारा वध करने के अयोग्य होता है, इसलिए वह उसके समक्ष सभी प्रकार के-सत्य, असत्य, प्रिय व अप्रिय-वचन बोलता है; अतः राजा को उसके कठोर वचन सहन करना चाहिए ॥२२॥


कः सुधीर्दूूतवचनात् परोत्कर्षं स्वापकर्षं च मन्येतः १ ॥२३॥

अर्थ: कौन बुद्धिमान राजा दूत के वचन सुनकर शत्रु की उन्नति और अपनी अवनति मानता है ? कोई नहीं मानता। अभिप्राय यह है कि राजा को दूत द्वारा प्रकट हुई शत्रु-वृद्धि प्रामाणिक-सत्य-नहीं माननी चाहिए ॥२३॥


स्वयं रहस्यज्ञानार्थं परदूतो नयाद्यैः
स्त्रीभिरुभयवेतनैस्तद्गुणाचारशीलानुवृत्तिभिर्वा वंचनीयः॥२४॥

अर्थ: राजा का कर्त्तव्य है कि वह शत्रु राजा का गुप्त रहस्य-सैन्यशक्ति-आदि जानने के लिए उसके दूत को नीतिज्ञ वेश्याओं, दोनों तरफ से वेतन पाने वाले दूतों तथा दूत के गुण, आचार व स्वभाव से परिचित रहने वाले दूत-मित्रों द्वारा वश में करे ॥२४॥


चत्वारि वेष्टनानि खड्गमुद्रा च प्रतिपक्षलेखानाम्॥२५॥

अर्थ: विजिगीषु को शत्रु राजा के पास भेजे हुए लेखों-पत्रादि में चार वेष्टन व उनके ऊपर खड्ग की मुद्रा (मुहर) लगा देनी चाहिए, जिससे वे मार्ग में न खुलने पावें ॥२५॥

(१४) चार-समुद्देशः

स्वपरमण्डलकार्याकार्यावलोकने चाराः खलु चक्षूंषि क्षितिपतीनाम् ॥१॥

अर्थ: गुप्तचर स्वदेश-परदेशसम्बन्धी कार्य-अकार्य का ज्ञान करने के लिए राजाओं के नेत्र हैं। अभिप्राय यह है कि राजा लोग गूढ़पुरुषों द्वारा ही अपने व दूसरे देश सम्बन्धी राजकीय वृत्तान्त जानते हैं, स्वयं नहीं ॥१॥


अलौल्यममान्द्यममृषाभाषित्त्वमभ्यूहकत्वं चारगुणाः॥२॥

अर्थ: संतोष, आलस्य का न होना-उत्साह अथवा निरोगता, सत्यभाषण और विचार-शक्ति ये गुप्तचरों के गुण हैं ॥२॥


तुष्टिदानमेव चाराणां वेतनम्॥३॥

ते हि तल्लोभात् स्वामिकार्येषु त्वरन्ते॥४॥

अर्थ (सूत्र 3 से 4): कार्य सिद्धि हो जाने पर राजा द्वारा जो संतुष्ट होकर प्रचुर धन दिया जाता है, वही गुप्तचरों का वेतन है; क्योंकि उस धन प्राप्ति के लोभ से वे लोग अपने स्वामी की कार्य-सिद्धि शीघ्रता से करते हैं॥ ३-४॥


असति संकेते त्रयाणामेकवाक्ये संप्रत्ययः ॥५॥

अर्थ: यदि राजा को गुप्तचर द्वारा कही हुई बातों में भ्रम या सन्देह उत्पन्न हो जावे, तो तीन गुप्तचरों की कही हुई एक सी बात मिलने पर उसे प्रमाण माननी चाहिए ॥५॥


अनवसर्पो हि राजा स्वैः परैश्चातिसन्धीयते ॥६॥

अर्थ: निश्चय से जिस राजा के यहां गुप्तचर नहीं होते उस पर स्वदेश और परदेश सम्बन्धी शत्रुओं द्वारा आक्रमण किया जाता है, अतः विजिगीषु को स्वदेश-परदेश में गुप्तचर भेजना चाहिए ॥६॥


किमस्त्यायामिकस्य निशि कुशलम् ॥७॥

अर्थ: क्या द्वारपाल के बिना धनाढ्य पुरुष का रात्रि में कल्याण हो सकता है ? नहीं हो सकता। उसी प्रकार गुप्तचरों के बिना राजाओं का कल्याण नहीं हो सकता ॥७॥


छात्रकापटिकोदास्थित-गृहपति-वैदेहिक-तापस-किरात यमपट्टिकाहि-
तुण्डिकशौण्डिक-शौभिक-पाटच्चर-विट-विदूषक-पीठमर्द्द-नर्त्तक-गायन-
वादक-वाग्जीवन-गणक शाकुनिक-भिषगैन्द्रजालिक-नैमित्तिक-सूदारालिक-
संवादक-तीक्ष्ण क्रूर-जड़-मूकबधिरान्धच्छद्मावस्थायायिभेदेनावसर्पवर्गः ॥८॥


परमर्मज्ञः प्रगल्भश्छात्रः ॥९॥

यं कमपि समयमास्थाय प्रतिपन्नछात्रवेषकः कापाटिकः ॥१०॥

प्रभूतान्तेवासी प्रज्ञातिशययुक्तो राज्ञा परिकल्पितवृत्तिरुदास्थितः ॥११॥

गृहपतिवैदेहिकौ ग्रामकूटश्रेष्ठिनौ ॥१२॥

वाह्यव्रतविद्याभ्यां लोकदम्भहेतुस्तापसः ॥१३॥

अल्पाखिलशरीरावयवः किरातः ॥१४॥

यमपट्टिको गलत्रोटिकः प्रतिगृहं चित्रपटदर्शी वा ॥१५॥

अहितुण्डिकः सर्पक्रीड़ाप्रसरः ॥१६॥

शौण्डिकः कल्यपालः ॥१७॥

शौभिकः क्षपायां पटावरणेन रूपदर्शी ॥१८॥

पाटच्चरश्चौरो बन्दीकारो वा ॥१९॥

व्यसनिनां प्रेषणानुजीवो विटः ॥२०॥

अर्थ (सूत्र 9 से 20): दूसरों के गुप्त रहस्य का ज्ञाता व प्रतिभाशाली गुप्तचर को ‘छात्र’ कहते हैं ॥९॥ किसी भी शास्त्र को पढ़कर छात्र-वेश में रहने वाले गुप्तचर को ‘कापटिक’ कहते हैं ॥१०॥ बहुत-सी शिष्य-मण्डली सहित, तीक्ष्ण बुद्धि-युक्त (विद्वान्) और जिसकी जीविका राजा द्वारा निश्चित की गई है, ऐसे गुप्तचर को ‘उदास्थित’ कहते हैं ॥११॥ कृषक-वेश में रहने वाला ‘गृहपति’ और सेठ के वेष में रहने वाला गुप्तचर ‘वैदेहिक’ कहा जाता है ॥१२॥ कपट-युक्त (बनावटी) व्रत विद्या द्वारा ठगने वाले और सन्यासी-वेशधारी गुप्तचर को ‘तापस’ कहा है ॥१३॥ जिसके समस्त शरीर के अङ्गोपाङ्ग (हस्तपादादि) कद में छोटे हों, उस (बोने) गुप्तचर को ‘किरात’ कहते हैं ॥१४॥ प्रत्येक गृह में जाकर चित्रपटवस्त्र में उकारी हुई तस्वीर-दिखाने वाला अथवा गला फाड़कर चिल्लाने वाला (कोटपाल-वेषी) गुप्तचर ‘यमपट्टिक’ है ॥१५॥ सर्प-क्रीड़ा में चतुर-सपेरे के वेष में वर्तमान-गुप्तचर ‘अहितुण्डिक’ कहा गया है ॥१६॥ शराब बेचने वाले के वेष में वर्तमान गुप्तचर को ‘शौण्डिक’ कहा है ॥१७॥ जो गुप्तचर रात्रि में नाट्य-भूमि में पर्दा लगाकर नाटक का पात्र बनकर अनेक रूप प्रदर्शन करता है, उसे ‘शौभिक’ कहते हैं ॥१८॥ चोर अथवा कैदी के वेष में वर्तमान गुप्तचर को ‘पाटच्चर’ कहते हैं ॥१९॥ जो गुप्तचर व्यभिचार-आदि व्यसनों में प्रवृत्ति करने वाले व्यभिचारियों आदि को वेश्या-आदि के यहाँ भेजकर अपनी जीविका करता हुआ राजकीय प्रयोजन-सिद्धि करता है उसे


सर्वेषां प्रहसनपात्रं विदूषकः ॥२१॥

कामशास्त्राचार्यः पीठमर्द्दः ॥२२॥

गीताङ्गपटप्रावरणेन नृत्यवृत्त्याजीवी नर्तको नाटकाभिनयरङ्गनर्त्तको वा ॥२३॥

रूपाजीवावृत्त्युपदेष्टा गायकः ॥२४॥

गीतप्रबन्धगतिविशेषवादकचतुर्विधातोद्यप्रचारकुशलो वादकः ॥२५॥

वाग्जीवी वैतालिकः सूतो वा ॥२६॥

गणकः संख्याविद्दैवज्ञो वा ॥२७॥

शाकुनिकः शकुनवक्ता ॥२८॥

भिषगायुर्वेदविद्वैद्यः शस्त्रकर्मविच्च ॥२९॥

अर्थ (सूत्र 20 से 29): ‘विट’ कहते हैं ॥२०॥ सभी दर्शकों या श्रोताओं को हँसाने की कला में प्रवीण गुप्तचर “विदूषक” है ॥२१॥ कामशास्त्र (वात्स्यायनकामसूत्र-आदि) के विद्वान् गुप्तचर को ‘पीठमर्द’ कहते हैं ॥२२॥ जो गुप्तचर कमनीय व स्त्रीवेष-प्रदर्शक वस्त्र-साड़ी-जम्फर-आदि पहनकर नाचने की जीविका करता हो अथवा नाटक की रङ्गभूमि में सुन्दर वेष-भूषा से अलंकृत होकर भाव प्रदर्शन पूर्वक नृत्य करने वाला हो उसे ‘नर्तक’ कहते हैं ॥२३॥ जो वेश्याओं की जीविका-पुरुष-वशीकरण द्वारा धन-निष्कासन व संगीतकला-आदि का उपदेश देने वाला हो,उसे ‘गायक’ कहते हैं ॥२४॥ गीत सम्बन्धी प्रबन्धों को गतिविशेषों को बजाने वाला और चारों प्रकार के-तत, अवनद्ध, घन व सुषिर (मृदङ्ग-आदि) वाद्य बजाने की कला में प्रवीण गुप्तचर को ‘वादक’ कहते हैं ॥२५॥ जो स्तुति पाठक या बन्दी बनकर राजकीय प्रयोजन सिद्धि करता है, उसे ‘वाग्जीवी’ कहते हैं ॥२६॥ गणित शास्त्र का वेत्ता अथवा ज्योतिष विद्या के विद्वान् गुप्तचर को ‘गणक’ कहते हैं ॥२७॥ शुभ-अशुभ लक्षणों से शुभाशुभ फल बताने वाले को ‘शाकुनिक’ कहते हैं ॥२८॥ अष्टाङ्ग आयुर्वेद का ज्ञाता व शस्त्रचिकित्सा-प्रवीण गुप्तचर को ‘भिषक्’ कहते हैं ॥२९॥


ऐन्द्रजालिकस्तन्त्रयुक्त्या मनोविस्मयकरो मायावी वा ॥३०॥


नैमित्ति को लक्ष्यवेधी दैवज्ञो वा ॥३१॥


महासाहसिकः सूदः॥ ३२॥


विचित्रभक्ष्यप्रणेता आरालिकः ॥३३॥


अङ्गमर्दनकलाकुशलो भारवाहको वा संवाहकः । ३४॥


द्रव्यहेतोः कृच्छ्रेण कर्मणा यो जीवितविक्रयी स तीक्ष्णोऽसहनो वा ॥३५॥


बन्धुस्नेहरहिताः क्रूराः ॥३६॥


अलसाश्च रसदाः॥ ३७॥


जड़-मूक-बाधिरान्धाः प्रसिद्धाः॥ ३८॥

अर्थ: गुप्तचरों (खुफिया पुलिस) के निम्न प्रकार ३४ भेद हैं, उनमें कुछ अवस्थायी (जिन्हें राजा अपने ही देश में मंत्री व पुरोहित-आदि की जाँच के लिए नियुक्त करता है) और कुछ स्थायी (जिन्हें शत्रुराजा के देश में भेजा जाता है) होते हैं। छात्र, कापटिक, उदास्थित, गृहपति, वैदेहिक, तापस, किरात, यमपट्टिक, अहितुण्डिक, शौण्डिक, शौभिक, पाटच्चर, विट, विदूषक, पीठमर्द, नर्त्तक, गायन, वादक, वाग्जीवन, गणक, शाकुनिक, भिषग्, ऐन्द्रजालिक, नैमित्तिक, सूद, आरालिक, संवादक, तीक्ष्ण, क्रूड़, रसद, जड़, मूक, बधिर और अन्ध ॥८॥

(१५) विचार-समुद्देशः

नाविचार्य कार्यं किमपि कुर्यात् ॥१॥

अर्थ: नैतिक पुरुष बिना विचारे-बिना सोचे-समझे (प्रत्यक्ष, प्रामाणिक पुरुषों के वचन व युक्ति द्वारा निर्णय किये बिना) कोई भी कार्य न करे ॥१॥


प्रत्यक्षानुमानागमैर्यथावस्थितवस्तुव्यवस्थापनहेतुर्विचारः॥२॥

अर्थ: सत्य-यथार्थ (जैसी की तैसी) वस्तु की प्रतिष्ठा (निर्णय) प्रत्यक्ष, अनुमान व आगम इन तीन प्रमाणों से होती है, न कि केवल एक प्रमाण से। इसलिए उक्त प्रत्यक्षादि तीनों प्रमाण द्वारा जो सत्य वस्तु की प्रतिष्ठा का कारण है उसे ‘विचार’ कहते हैं ॥२॥


स्वयं दृष्टं प्रत्यक्षम् ॥३॥

अर्थ: चक्षु-आदि इन्द्रियों द्वारा स्वयं देखने व जानने को ‘प्रत्यक्ष’ कहा है ॥३॥


न ज्ञानमात्रत्वात् प्रेक्षावतां प्रवृत्तिर्निवृत्तिर्वा ॥४॥

अर्थ: जल मान लिया पश्चात् उसे उस भ्रान्त विचार को दूर करने के लिए अनुमान प्रमाण से यथार्थ निर्णय करना चाहिए कि क्या मरुस्थल में ग्रीष्मऋतु में जल हो सकता है ? नहीं हो सकता । पश्चात् उसे किसी विश्वासी पुरुष से पूछना चाहिए कि क्या वहाँ जल है ? पश्चात् उसके मनाई करने पर वहाँ से निवृत्त होना चाहिए । सारांश यह है कि विचारक व्यक्ति सिर्फ ज्ञान मात्र से किसी भी पदार्थ में प्रवृत्ति या निवृत्ति न करे॥ ४॥


स्वयं दृष्टेऽपि मतिर्विमुह्यति संशेते विपर्यस्यति वा किं पुनर्न परोपदिष्टे वस्तुनि ॥५॥

अर्थ: क्योंकि जब स्वयं प्रत्यक्ष किये हुए पदार्थ में बुद्धि को मोह-अज्ञान, संशय और भ्रम होता है, तब क्या दूसरों के द्वारा कहे हुए पदार्थ में अज्ञान आदि नहीं होते ? अवश्य होते हैं ॥५॥


स खलु विचारज्ञो यः प्रत्यक्षेणोपलब्धमपि साधु परीक्ष्यानुतिष्ठति ॥६॥

अर्थ: जो मनुष्य प्रत्यक्ष द्वारा जानी हुई वस्तु को भी अच्छी तरह परीक्षा-संशय, भ्रम व अज्ञान रहित निश्चय-करके उसमें प्रवृत्ति करता है, उसे निश्चय से विचारज्ञ-विचारशास्त्र का वेत्ता कहते हैं ॥६॥


अतिरभसात् कृतानि कार्याणि किं नामानर्थं न जनयन्ति ॥७॥

अर्थ: बिना विचारे-अत्यन्त उतावली से किये हुए कार्य लोक में कौन-कौन से अनर्थ-हानि (इष्ट प्रयोजन क्षति उत्पन्न नहीं करते ? सभी प्रकार के अनर्थ उत्पन्न करते हैं ॥७॥


अविचार्य कृते कर्मणि यत् पश्चात् प्रतिविधानं गतोदके सेतुबन्धनमिव ॥८॥

अर्थ: जो मनुष्य बिना विचारे उतावली में आकर कार्य कर बैठता है और पश्चात् उसका प्रतीकार (इलाज-अनर्थ दूर करने का उपाय) करता है, उसका वह प्रतीकार उपयोगी जल-प्रवाह के निकल जाने पर पश्चात् उसको रोकने के लिए पुल या बंधान बाँधने के सदृश निरर्थक होता हैं, इसलिए नैतिक पुरुष को समस्त कार्य विचार पूर्वक ही करना चाहिए ॥८॥


आकारः शौर्यमायतिर्विनयश्च राजपुत्राणां भाविनो राज्यस्य लिङ्गानि ॥९॥

अर्थ: शारीरिक मनोज्ञ आकृति, पराक्रम, राजनैतिक-ज्ञान-सम्पत्ति, प्रभाव (सैन्य व कोश शक्तिरूप तेज) और नम्रता, राजकुमारों में वर्तमान ये सद्गुण उन्हें भविष्य में प्राप्त होने वाली राज्यश्री के अनुमापक चिह्न हैं ॥९॥


कर्मसु कृतेनाकृतावेक्षणमनुमानम् ॥१०॥

संभावितैकदेशो नियुक्तं विद्यात् ॥११॥

अर्थ (सूत्र 10 से 11): बहुत कार्यों में से किये हुए कार्य द्वारा बिना किये हुए कार्य का बुद्धि से निश्चय करना ‘अनुमान’ है। सारांश यह है कि किसी से की हुई एकदेश कार्य-सिद्धि द्वारा उस में पूर्ण कार्य-सिद्धि की सामर्थ्य का निश्चय करना अनुमान है। क्योंकि जो मनुष्य एकदेश कार्य-सिद्धि करने में कुशल होता है, उसे अनुमान प्रमाण द्वारा पूर्ण कार्य-सिद्धि में समर्थ जान लेना चाहिए ॥१०-११॥


प्रकृतेर्विकृतिदर्शनं हि प्राणिनां भविष्यतः शुभाशुभस्य चापि लिङ्गम् ॥१२॥

अर्थ: प्रकृति (शुभ-अशुभ स्वभाव) से विकृति (विकारयुक्त-बदलना) दिखाई देना प्राणियों के भविष्यकालीन अच्छी-बुरी होनहार का ज्ञापक चिह्न है। सारांश यह है कि जब कोई पुरुष नैतिकमार्ग-सदाचार से अनीति-दुराचार में प्रवृत्त हुआ दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि इस की होनहार बुरी है। इसी प्रकार जब कोई मनुष्य सत्सङ्ग-आदि द्वारा अनीति से नीति में प्रवृत्त हुआ प्रतीत हो तो उसकी होनहार अच्छी समझनी चाहिए ॥१२॥


य एकस्मिन् कर्मणि दृष्टबुद्धिः पुरुषकारः स कथं कर्मान्तरेषु न समर्थः ॥१३॥

अर्थ: जो मनुष्य अपनी बुद्धि और पौरुष (उद्योग) एक कार्य सिद्धि करने में सफल कर चुका है, वह दूसरे कार्य सिद्ध करने में क्यों नहीं समर्थ हो सकता ? अवश्य हो सकता है। अर्थात् संभव है कि बुद्धिमान पुरुष किसी दूसरे अपरिचित कार्य में कुशल न भी हो तथापि वह अपनी बुद्धि के प्रभाव से उस कार्य को सफल कर सकता है ॥१३॥


आप्तपुरुषोपदेश आगमः ॥१४॥

अर्थ: आप्त (वीतराग, सर्वज्ञ व हितोपदेशी तीर्थंकर प्रभु अथवा आगमानुकूल सत्यवक्ता शिष्टपुरुष) के उपदेश को ‘आगम’ कहते हैं ॥१४॥


यथानुभूतानुमितश्रुतार्थाविसंवादिवचनः पुमानाप्तः ॥१५॥

अर्थ: जो अनुभव, अनुमान एवं आगम प्रमाण द्वारा निश्चित किये हुए पदार्थों को तदनुकूल-विरोधशून्य-वचनों द्वारा निरूपण करता है, उस यथार्थ वक्ता तीर्थंकर महापुरुष को वा उक्त गुण-सहित प्रामाणिक शिष्ट पुरुष को ‘आप्त’ कहते हैं ॥१५॥


सा वागुक्ताऽप्यनुक्तसमा, यत्र नास्ति सद्युक्तिः ॥१६॥

अर्थ: वक्ता द्वारा कही हुई जिस वाणी में प्रशस्त युक्ति-कहे हुए पदार्थ को समर्थन करने वाले वचन व शोभन-अभिप्राय-नहीं है, वह कही हुई भी बिना कही हुई के समान है ॥१६॥


वक्तृगुणगौरवाद्वचनगौरवम् ॥१७॥

अर्थ: वक्ता के गुणों-विद्वत्ता व नैतिक प्रवृत्ति-आदि- में महत्ता होने से उसके कहे हुए वचनों में महत्ता प्रामाणिकता व मान्यता होती है ॥१७॥


किं मितंपचेषु धनेन चाण्डालसरसि वा जलेन यत्र सतामनुपभोगः ॥१८॥

अर्थ: नारद१ विद्वान् ने कहा है कि “सज्जनों के उपभोग-शून्य चाण्डाल-तालाब के पानी समान कृपण-धन से क्या लाभ है ? कोई लाभ नहीं ॥१॥’’


लोको गतानुगति को यतः सदुपदेशिनीमपि कुट्टिनीं तथा न प्रमाणयति यथा
गोघ्नमपि ब्राह्मणम् ॥१९॥

अर्थ: जनसाधारण एक दूसरे की देखा देखी करते हैं-यदि कोई मनुष्य किसी शुभ-अशुभ मार्ग से जाता है तो उसे देखकर दूसरे लोग भी बिना परीक्षा किये ही उसका अनुकरण करने लगते हैं। क्योंकि यदि वृद्ध वेश्या धर्म का उपदेश देती है तो उसे कोई प्रमाण नहीं मानता और यदि गो-घातक ब्राह्मण धर्म का उपदेश देता है, तो लोग उसकी बात प्रमाण मानते हैं ॥१९॥ गौतम२ विद्वान् ने भी कहा है कि “वेश्या धार्मिक होने पर भी यदि धर्मोपदेश देती है तो उसे कोई नहीं पूछता और गोहत्या करने वाला ब्राह्मण यदि धर्म का उपदेश देता है तो उसको सब प्रमाण मानते हैं ॥१॥’’ किसी विद्वान्३ ने भी कहा है कि जनसमूह वास्तविक कर्त्तव्य-मार्ग पर नहीं चलते किन्तु एक दूसरे की देखादेखी करने वाले होते हैं। बालुका-रेत में लिङ्ग का चिह्न बनाने से मेरा (कथा-नायक का) तांबे का बर्तन नष्ट हो गया४ ॥१॥’’

(१६) व्यसन-समुद्देशः

व्यसन-लक्षण, भेद, सहज व्यसन-निवृत्ति, शिष्ट-लक्षण व कृत्रिम व्यसनों से निवृत्ति


व्यस्यति पुरुषं श्रेयसः इति व्यसनम् ॥१॥

अर्थ: जो दुष्कर्म-द्यूत-क्रीड़ा व मद्यपानादि-मनुष्य को कल्याण-मार्ग से गिराते हैं, उन्हें ‘व्यसन’ कहते हैं ॥१॥


व्यसनं द्विविधं सहजमाहार्यं च॥२॥

अर्थ: व्यसन दो प्रकार के हैं-१. सहज-स्वाभाविक (जन्म से ही उत्पन्न होने वाले दुःख) २. आहार्य-कुसंग के कारण उत्पन्न होने वाले (मद्यपान-परकलत्र-सेवन-आदि) ॥२॥


सहजं व्यसनं धर्माभ्युदयहेतुभिरधर्मजनितमहाप्रत्यवायप्रतिपादनैरुपाख्यानैर्योग-
पुरुषैश्च प्रशमं नयेत् ॥३॥

अर्थ: मनुष्य को स्वाभाविक व्यसनधर्म व स्वर्ग के उत्पादक कल्याण-कारक पदार्थों (विशुद्ध भाव-आदि) के चिंतवन, पापों से उत्पन्न हुए महादोषों का कथन-श्रवण तथा उन दोषों के निरूपक चरित्र-(रावण-दुर्योधन-आदि अशिष्ट पुरुषों के भयंकर चरित्र) श्रवण द्वारा एवं शिष्ट पुरुषों की सङ्गति से नष्ट करना चाहिए ॥३॥


परचित्तानुकूल्येन तदभिलषितेषूपायेन विरक्तिजननहेतवो योगपुरुषाः॥४॥

अर्थ: मद्य-पानादि से जिनमें उसे व्यसन (निरन्तर आसक्ति) उत्पन्न हुआ है, विरक्ति उत्पन्न करते हैं-छुड़ा देते हैं-उन्हें योग (शिष्ट) पुरुष कहते हैं ॥४॥


शिष्टजनसंसर्गदुर्जनाऽसंसर्गाभ्यां पुरातनमहापुरुषचरितोत्थिताभिः कथाभिराहार्यं
व्यसनं प्रतिबध्नीयात् ॥५॥

अर्थ: बुद्धिमान् मनुष्य को शिष्ट पुरुषों की संगति और दुष्टों की कुसंगति के त्याग द्वारा एवं जिन उत्तम कथानकों में प्राचीन महापुरुषों का आदर्श चरित्र-चित्रण किया गया है, उनके पठन-श्रवण द्वारा अपने कृत्रिम-कुसंग-जनित-व्यसनों का नाश कर देना चाहिए॥ ५॥


स्त्रियमतिशयेन भजमानो भवत्यवश्यं तृतीया प्रकृतिः ॥६॥

अर्थ: अपनी स्त्री को अधिक मात्रा में सेवन करने वाला मनुष्य अधिक वीर्य धातु के क्षय हो जाने से असमय में वृद्ध या नपुंसक हो जाता है ॥६॥ धन्वन्तरि विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


सौम्यधातुक्षयेण
सर्वधातुक्षयः ॥७॥

अर्थ: क्योंकि स्त्री सेवन से पुरुष की शुक्र (वीर्य) धातु क्षय होती है, इससे शरीर में वर्तमान बाकी समस्त छह धातुएँ-रस, रुधिर, मांस, मेद व अस्थि-आदि नष्ट हो जाती हैं। निष्कर्ष यह है कि नैतिक पुरुष को वीर्य रक्षार्थ ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए अथवा अपनी स्त्री को अधिक मात्रा में सेवन का त्याग करना चाहिए ॥७॥ वैद्यक विद्वान् ने भी वीर्य-क्षय से इसी प्रकार हानि बताकर वीर्य रक्षा करने वाले शेर की हाथी से अधिक बलिष्ठता का निरूपण किया है ॥१-२॥


पानशौण्डश्चित्तविभ्रमान् मातरपि गच्छति ॥८॥

अर्थ: मद्यपी-शराबी-पुरुष मानसिक विकार-वश (नशे में आकर) माता को भी सेवन करने लगता है। अतः ऐसे अनर्थकारक मद्य का त्याग करना श्रेयस्कर है ॥८॥ नारद विद्वान् ने भी इसी प्रकार मद्य-पान के दोष बताकर उसके त्याग करने में प्रवृत्त किया है ॥१॥


मृगयासक्तः
स्तेनव्यालद्विषद्व्यादानामामिषं पुरुषं करोति ॥९॥

अर्थ: शिकार खेलने में आसक्त पुरुष, चोर-डाकू, सिंह-व्याघ्रादि हिंसक जन्तु, शत्रु और कुटुम्बियों द्वारा मार डाला जाता है ॥९॥ भारद्वाज विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


द्यूतासक्तस्य किमप्यकृत्यं
नास्ति ॥१०॥

मातर्यपि हि मृतायां दीव्यत्येव हि कितवः ॥११॥

अर्थ (सूत्र 10 से 11): जुआरी पुरुष लोक में ऐसा कौन सा अनर्थ (पाप) है जिस में प्रवृत्ति न करता हो; क्योंकि निश्चय से माता के मर जाने पर भी जुआरी पुरुष जुआ खेलता रहता है। सारांश यह है कि जुआरी कर्तव्य-बोध से विमुख होकर अनर्थ करता रहता है। अतः जुआ का त्याग ही श्रेयस्कर है ॥१०-११॥ शुक्र १ विद्वान् ने कहा है कि “यदि जुआरी मनुष्य प्रेम-वश कभी अपनी प्रिया की ग्रन्थि स्पर्श करता है तब उसकी स्त्री “कहीं यह मेरी सुन्दर साड़ी अपहरण करके जुए के दाव में न लगा देवे? इस डर से उसे बिल्कुल नहीं चाहती ॥१॥”


पिशुनः
सर्वेषामविश्वासं जनयति ॥१२॥

अर्थ: चुगलखोर अपने ऊपर सभी पुरुषों का अविश्वास उत्पन्न करता है। अर्थात् वह अपने कपट-पूर्ण बर्ताव (चुगली करने) के कारण लोक में किसी का भी विश्वास-पात्र नहीं रहता ॥१२॥ वसिष्ठ २ विद्वान् ने भी राजा के समक्ष चुगली करने वाले को सभी का अविश्वास-पात्र कहा है ॥१॥


दिवास्वापः गुप्तव्याधि व्यालानामुत्थापनदण्डः
सकलकार्यान्तरायश्च ॥१३॥

अर्थ: दिन में शयन शरीर में छिपे हुए अनेक रोगरूपी सर्पों को जगाने का कारण और समस्त कार्य-सिद्धि में बाधक है। निष्कर्ष यह है कि स्वास्थ्य व कार्य-सिद्धि चाहने वाले व्यक्ति को ग्रीष्म-ऋतु को छोड़कर अन्य ऋतुओं में दिन में नहीं सोना चाहिए ॥१३॥ धन्वन्तरि ३ विद्वान् ने भी ग्रीष्म-ऋतु को छोड़कर अन्य ऋतुओं में दिन में सोने वाले के रोग-वृद्धि व मृत्यु होने का निरूपण किया है ॥१॥


न परपरीवादात् परं सर्वविद्वेषणभेषजमस्ति ॥१४॥

अर्थ: लोक में पर-निंदा को छोड़कर सब से द्वेष उत्पन्न कराने वाली कोई औषधि नहीं है। अर्थात् जो मनुष्य पर-निंदा करता है, उससे सभी लोग द्वेष करने लगते हैं। अथवा जो मनुष्य पर-निंदा करता है, उस निंदा-निवृत्ति की निंदा किये जानेवाले पुरुष की प्रशंसा को छोड़कर अन्य कोई अमोघ औषधि नहीं है। उदाहरणार्थ-जब सोहन, मोहन की निंदा हमारे सामने करता है तब हमें चाहिए कि हम उस समय मोहन की अधिक प्रशंसा करें; ताकि वह उसकी निंदा करना छोड़ दे ॥१४॥ हारीत ४ विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


तौर्यत्रयासक्तिः प्राणार्थमानैर्वियोजयति ॥१५॥

अर्थ: गान-श्रवण, नृत्य-दर्शन व वादित्र-श्रवण में आसक्त हुआ कौन पुरुष अपने प्राण, धन और मानमर्यादा को नष्ट नहीं करता ? अर्थात् सभी नष्ट करते हैं अतः विवेकी को उक्त गान-श्रवण आदि में आसक्त नहीं होना चाहिए ॥१५॥


वृथाट्या नाविधाय कमप्यनर्थं
विरमति ॥१६॥

अर्थ: निरर्थक यहाँ वहाँ घूमने-फिरने वाला व्यक्ति अपूर्व अनर्थ (महान् पाप) किए बिना विश्राम नहीं लेता अर्थात् निष्प्रयोजन फिरने वाला सभी पापों में फँस जाता है, अतः अर्थलाभादि प्रयोजन शून्य फिरने का त्याग करना चाहिए ॥१६॥


अतीवेश्यालुं स्त्रियो घ्नन्ति त्यजन्ति वा पुरुषम् ॥१७॥

अर्थ: जो लोग अपनी स्त्रियों से अत्यंत ईर्ष्या (डाह-द्वेष) करते हैं, उन्हें स्त्रियां छोड़ देती हैं या मार डालती हैं, अतः प्रत्येक व्यक्ति स्त्री से प्रेम का बर्ताव करे ॥१७॥


परपरिग्रहाभिगमः कन्यादूषणं वा साहसम् ॥१८॥

यत् साहसं
दशमुखदण्डिकाविनाशहेतुः सुप्रसिद्धमेव ॥१९॥

अर्थ (सूत्र 18 से 19): दूसरों की स्त्रियों का सेवन और कन्याओं को दूषित (सेवन) करना ‘साहस’ है जिसके द्वारा रावण और दाण्डिक्य को मृत्यु-दण्ड प्राप्त हुआ था यह पुराणों में प्रसिद्ध ही है ॥१८-१९॥


यत्र नाहमस्मीत्यध्यवसायस्तत्
साहसम् ॥२०॥


अर्थदूषकः कुबेरोऽपि भवति भिक्षाभाजनम् ॥२१॥

अर्थ: जो मनुष्य आमदनी से अधिक खर्च व अपात्र-दान करता है, वह कुबेर समान धनाढ्य होने पर भी दरिद्र हो जाता है पुनः साधारण व्यक्ति का दरिद्र होना स्वाभाविक है ॥२१॥


अतिव्ययोऽपात्रव्ययश्चार्थदूषणम् ॥२२॥

अर्थ: आमदनी से अधिक धन-व्यय करना व अपात्रों को धन-आदि देना अर्थदूषण है ॥२२॥


हर्षामर्षाभ्यामकारणं तृणाङ्कुरमपि
नोपहन्यात्किंपुनर्मर्त्यम् ॥२३॥

अर्थ: नैतिक पुरुष अहङ्कार व क्रोधवश निष्प्रयोजन घास का अंकुर भी नष्ट न करे, फिर मनुष्य के विषय में तो कहना ही क्या है। अर्थात् उसका सताना या वध करना महाभयंकर है ॥२३॥


श्रूयते किल निष्कारणभूतावमानिनौ
वातापिरिल्वलश्च द्वावसुरावगस्त्याशनाद्विनेशतुरिति॥२४॥

अर्थ: वृद्ध-परम्परा से पुराण ग्रन्थों के आधार से सुना जाता है कि निष्प्रयोजन प्रजा को पीड़ित करने वाले ‘वातापि’ व ‘इल्वल’ नाम के दो असुर ‘अगस्त्य’ नाम के संन्यासी द्वारा नष्ट हुए ॥२४॥


यथादोषं कोटिरपि
गृहीता न दुःखायते। अन्यायेन पुनस्तृणशलाकापि गृहीता प्रजाः खेदयति॥ २५॥

अर्थ: यदि राजा द्वारा अपराधी के अपराधानुकूल न्यायोचित जुर्माना आदि करके करोड़ रुपए भी ले लिए गये हों, तो उससे उसे दुःख नहीं होता, परन्तु बिना अपराध के-अन्याय द्वारा तृण-शलाका बराबर दण्ड दिया जाता हो, तो उससे प्रजा पीड़ित होती है ॥२५॥


तरुच्छेदेन फलोपभोगः सकृदेव ॥२६॥

अर्थ: जिस प्रकार वृक्ष का मूलोच्छेद करने से उससे फल-प्राप्ति केवल उसी समय एक बार होती है उसी प्रकार जो राजा अन्याय के द्वारा प्रजा का सर्वस्व अपहरण करता है, उसे उसी समय केवल एक बार ही धन मिलता है, भविष्य में नहीं ॥२६॥


प्रजाविभवो हि स्वामिनोऽद्वितीयो
भाण्डागारोऽतो युक्तितस्तमुपभुञ्जीत ॥२७॥

अर्थ: प्रजा की सम्पत्ति निश्चय से राजा का विशाल खजाना है, इसलिए उसे उसका उपयोग न्याय से करना चाहिए अनुचित उपाय-अपराध-प्रतिकूल आर्थिक दण्ड आदि द्वारा नहीं ॥२७॥


राजपरिगृहीतं तृणमपि काञ्चनीभवति [जायते पूर्वसञ्चितस्याप्यर्थस्या-
पहाराय] ॥२८॥

अर्थ: जो व्यक्ति राजकीय तृण भी चुरा लेता है, उसे उसके बदले में सुवर्ण देना पड़ता है क्योंकि राजकीय साधारण वस्तु की चोरी राज-दण्ड-आदि के कारण पूर्व-संचित समस्त-धन को भी नष्ट कराने में कारण होती है, अतः नैतिक व्यक्ति को राजकीय चोरी-काला बाजार आदि-द्वारा धन संचय करना छोड़ देना चाहिए ॥२८॥


वाक्पारुष्यं शस्त्रपातादपि विशिष्यते॥२९॥

अर्थ: मर्म-भेदी कर्कश वचन शस्त्र के घाव से भी अधिक कष्टदायक होते हैं। इसलिए मनुष्य को किसी के लिए शस्त्र से चोट पहुँचाना अच्छा है, परन्तु कर्कश-कठोर-वचन बोलना अच्छा नहीं ॥२९॥


जातिवयोवृत्तविद्यादोषाणामनुचितं वचो वाक्पारुष्यम् ॥३०॥

अर्थ: मनुष्य की जाति, आयुष्य, सदाचार, विद्या, व निर्दोषता के अयोग्य-विरुद्ध (विपरीत) वचन कहना वाक्पारुष्य है, अर्थात् कुलीन को नीचकुल का वयोवृद्ध को बालक, सदाचारी को दुराचारी, विद्वान् को मूर्ख और निर्दोषी को सदोषी कहना वाक्पारुष्य है ॥३०॥


स्त्रियमपत्यं भृत्यं च
तथोक्त्या विनयं ग्राहयेद्यथा हृदयप्रविष्टाच्छल्यादिव न ते दुर्मनायन्ते॥ ३१॥

अर्थ: नैतिक मनुष्य को अपनी स्त्री, पुत्र व नौकरों को वाक्पारुष्य-कर्कश वचन का त्यागपूर्वक हित, मित और प्रिय वचन बोलते हुए इस प्रकार विनयशील बनाना चाहिए, जिससे उसे हृदय में चुभे हुए कीले के समान कष्टदायक न होने पावें, किन्तु आनन्ददायक हों ॥३१॥ शुक्र१ विद्वान् ने भी कहा है कि “जिसके कर्कश वचनों द्वारा स्त्री, पुत्र व सेवक पीड़ित रहते हैं, उसे उनके द्वारा लेशमात्र भी सुख नहीं मिलता ॥१॥”


वधः
परिक्लेशोऽर्थहरणमक्रमेण दण्डपारुष्यम् ॥३२॥

अर्थ: अन्याय से किसी का वध करना, जेलखाने की सजा देना और उसका समस्त धन अपहरण करना या उसकी जीविका नष्ट करना ‘दण्डपारुष्य’ है ॥३२॥ गुरु२ विद्वान् ने भी दण्डपारुष्य का यही लक्षण किया है ॥१॥


एकेनापि
व्यसनेनोपहतश्चतुरङ्गोऽपि राजा विनश्यति, किं पुनरष्टादशभिः ॥३३॥

अर्थ: जो राजा उक्त १८ प्रकार के व्यसनों में से एक भी व्यसन में फँस जाता है, वह चतुरंग सेना (हाथी, घोड़े, रथ और पदाति) से युक्त होता हुआ भी नष्ट हो जाता है, फिर १८ प्रकार के व्यसनों में फँसा हुआ क्या नष्ट नहीं होता? अवश्य नष्ट होता है॥ ३३॥

(१७) स्वामी-समुद्देशः

धार्मिकः कुलाचाराभिजनविशुद्धः प्रतापवान्न्यायानुगतवृत्तिश्च स्वामी ॥१॥

कोपप्रसादयोः स्वतन्त्रः ॥२॥

आत्मतिशयं धनं वा यस्यास्ति स स्वामी ॥३॥

अर्थ (सूत्र 1 से 3): जो धर्मात्मा, कुलाचार व कुलीनता के कारण विशुद्ध, भाग्यशाली, नैतिक, दुष्टों से कुपित व शिष्टों से अनुरक्त होने में स्वाधीन और आत्म-गौरव-युक्त तथा प्रचुर सम्पत्तिशाली हो उसे “राजा कहते हैं ॥१-३॥


स्वामिमूलाः सर्वाः प्रकृतयोऽभिप्रेतार्थयोजनाय भवन्ति नास्वामिकाः ॥४॥

अर्थ: समस्त प्रकृति के लोग (मंत्री-आदि) राजा के कारण से ही अपने अभिलषित अधिकार प्राप्त करने में समर्थ होते हैं, राजा के बिना नहीं ॥४॥


उच्छिन्नमूलेषु तरुषु किं कुर्यात् पुरुषप्रयत्नः ॥५॥

अर्थ: जिन वृक्षों की जड़ें उखड़ चुकी हों, उनसे पुष्प-फलादि की प्राप्ति के लिए किया हुआ प्रयत्न क्या सफल हो सकता है ? नहीं हो सकता, उसी प्रकार राजा के नष्ट हो जाने पर प्रकृति वर्ग द्वारा अपने अधिकार प्राप्ति के लिए किया हुआ प्रयत्न भी निष्फल होता है ॥५॥


असत्यवादिनो नश्यन्ति सर्वे गुणाः ॥६॥

अर्थ: झूठ बोलने वाले मनुष्य के सभी गुण (ज्ञान-सदाचार-आदि) नष्ट हो जाते हैं॥ ६॥


वञ्चकेषु न परिजनो नापि चिरायुः ॥७॥

अर्थ: धोखे बाजों के पास न सेवक ठहरते हैं और न वे चिरकाल तक जीवित रह सकते हैं; क्योंकि धोखे बाजों द्वारा सेवकों को वेतन नहीं मिलता, इससे उनके पास सेवक नहीं ठहरते एवं जनसाधारण उनसे द्वेष करते हैं, अतः वे असमय में मार दिये जाते हैं; अतः वे दीर्घजीवी भी नहीं होते अतः शिष्ट पुरुषों को धोखा देना छोड़ देना चाहिए ॥७॥


स प्रियो लोकानां योऽर्थं ददाति॥ ८॥

अर्थ: जो धन या अभिलषित वस्तु देकर दूसरों की भलाई करता है, वही उदार पुरुष लोगों का प्यारा होता है॥ ८॥


स दाता महान् यस्य नास्ति प्रत्याशोपहतं चेतः ॥९॥

अर्थ: संसार में वही दाता श्रेष्ठ है, जिसका मन पात्र (याचक) से प्रत्युपकार या धनादिक लाभ की इच्छा से दूषित नहीं है; क्योंकि प्रत्युपकार की इच्छा से पात्र-दान करना वणिक वृत्ति ही है। सारांश यह है कि आत्महितैषी उदार पुरुष प्रत्युपकार की कामना-शून्य होकर दान धर्म में प्रवृत्ति करे ॥९॥ ऋषिपुत्रक१ विद्वान् ने भी कहा है कि “जो व्यक्ति लोक में दान देकर याचक से धनादि चाहता है, उसका दान व्यर्थ है ॥१॥”


प्रत्युपकर्तुरुपकारः सवृद्धिकोऽर्थन्यास इव तज्जन्मान्तरेषु च न केषामृणं येषामप्रत्युपकार-
मनुभवनम् ॥१०॥

अर्थ: प्रत्युपकार करने वाले का उपकार बढ़ने वाली धरोहर समान है। सारांश यह है कि यद्यपि विश्वासपात्र शिष्ट पुरुष के यहाँ रक्खी हुई धरोहर (सुवर्ण-आदि बढ़ती नहीं है, केवल रखने वाले को जैसी की तैसी वापस मिल जाती है परन्तु प्रत्युपकारी के साथ किया हुआ उपकार (अर्थ-दानादि) उपकारी को विशेष फलदायक होने से-उसके बदले विशेष धनादि-लाभ होने के कारण बढ़ने वाली धरोहर के समान समझना चाहिए; अतः प्रत्युपकारी का उपकार विशेष लाभप्रद है। इसी प्रकार जो लोग बिना प्रत्युपकार किये ही परोपकार का उपभोग करते हैं वे जन्मान्तर में किन उपकारियों दाताओं के ऋणी नहीं होते ? सभी के होते हैं। निष्कर्ष यह है कि शिष्ट पुरुष को कृतज्ञता-प्रकाश-पूर्वक उपकारी का प्रत्युपकार करना चाहिए ॥१०॥ ऋषिपुत्रक२ विद्वान् ने भी इसी प्रकार कहा है ॥१॥


किं तया गवा या न क्षरति क्षीरं न गर्भिणी वा ॥११॥

अर्थ: उस गाय से क्या लाभ है, जो कि दूध नहीं देती और न गर्भवती है ? कोई लाभ नहीं। उसी प्रकार उस मनुष्य के उपकार करने से क्या लाभ है, जो कि वर्तमान या भविष्य में प्रत्युपकार नहीं कर सकता ? कोई लाभ नहीं ॥११॥


किं तेन स्वामि-प्रसादेन यो न पूरयत्याशाम् ॥१२॥

अर्थ: उस स्वामी की प्रसन्नता से क्या लाभ है, जो कि सेवकों के न्याय-युक्त मनोरथ पूर्ण नहीं कर सकता ? कोई लाभ नहीं। क्योंकि सेवकों के मनोरथ पूर्ण करना ही स्वामी-प्रसाद का फल है ॥१२॥


क्षुद्रपरिषत्कः सर्पाश्रय इव न कस्यापि सेव्यः ॥१३॥

अर्थ: जिसकी सभा में अमात्य-आदि प्रकृति दुष्ट होती है, वह राजा सर्प-युक्त गृह समान महाभयंकर होता है, इसलिए वह किसी के द्वारा सेवन करने के योग्य नहीं ॥१३॥ गुरु१ विद्वान् ने कहा है कि “यदि राजा हंस समान शुद्ध चित्त व सौम्य प्रकृति-युक्त भी हो, परन्तु यदि वह गृद्ध पक्षियों की तरह दुष्ट और घातक मंत्री आदि सभासदों से युक्त है, तो सर्प-युक्त गृह समान प्रजा द्वारा सेवन करने योग्य नहीं ॥१॥”


अकृतज्ञस्य व्यसनेषु न सहन्ते सहायाः ॥१४॥

अर्थ: जो कृतघ्न है-दूसरों की भलाई को नहीं मानता, उसकी आपत्ति-काल में सेवक लोग सहायता नहीं करते, अतएव प्रत्येक व्यक्ति को कृतज्ञ होना चाहिए ॥१४॥ जैमिनि२ विद्वान् ने भी कृतघ्न के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


अविशेषज्ञो विशिष्टैर्नाश्रीयते ॥१५॥

अर्थ: मूर्ख पुरुष शिष्ट पुरुषों द्वारा सेवन नहीं किया जाता ॥१५॥ शुक्र३ विद्वान् ने कहा है कि “कांच को मणि और मणि को काँच समझने वाले मूर्ख राजा की जब साधारण मनुष्य भी सेवा नहीं करता, फिर क्या विद्वान् पुरुष उसकी सेवा कर सकता है ? नहीं कर सकता ॥१॥”


आत्मम्भरिः परित्यज्यते कलत्रेणापि ॥१६॥

अर्थ: कुटुम्ब-आदि के संरक्षण में असमर्थ केवल अपनी उदर-पूर्ति करने वाले अत्यन्त लोभी पुरुष को जब उसकी स्त्री भी छोड़ देती है, फिर दूसरे सेवकों आदि द्वारा छोड़े जाने के विषय में तो कहना ही क्या है। अर्थात् वे तो उसे अवश्य छोड़ देते हैं ॥१६॥ गुरु४ विद्वान् ने भी आत्मम्भरि-पेटू के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


अनुत्साहः सर्वव्यसनानामागमनद्वारम् ॥१७॥

अर्थ: आलस्य सभी आपत्तियों का द्वार है-आलसी समस्त प्रकार के कष्ट भोगता है ॥१७॥ वादरायण५ विद्वान् ने भी कहा है कि आलसी को आपत्तियाँ कहीं पर भी किसी प्रकार नहीं छोड़तीं ॥१॥


शौर्यममर्षः शीघ्रकारिता सत्कर्मप्रवीणत्वमुत्साहगुणाः ॥१८॥

अर्थ: उत्साही पुरुष में शूरता, दूसरे व्यक्तियों द्वारा अनिष्ट किये जाने पर क्रुद्ध होना, कर्त्तव्य शीघ्रता, व प्रशस्त कार्य चतुराई से करना ये गुण होते हैं ॥१८॥ शौनक विद्वान् ने भी उत्साही के उक्त सभी गुण निर्दिष्ट किये हैं ॥१॥


अन्यायप्रवृत्तस्य न चिरं सम्पदो भवन्ति ॥१९॥

अर्थ: अन्यायी पुरुष की सम्पत्तियां चिरकालीन नहीं होतीं-नष्ट हो जाती हैं ॥१९॥ अत्रि विद्वान् ने भी अन्यायी सम्पत्तियों के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


यत्किञ्चनकारी स्वैः परैर्वाभिहन्यते ॥२०॥

अर्थ: स्वेच्छाचारी-अपनी इच्छानुकूल प्रवृत्ति करने वाला-आत्मीयजनों अथवा शत्रुओं द्वारा मार दिया जाता है ॥२०॥ अत्रि विद्वान् ने भी कहा है कि “ज्ञान-वृद्ध पुरुषों से बिना पूछे ही अपनी इच्छानुकूल चलने वाला पुरुष अंकुशहीन (मर्यादा-बाह्य) हुआ अपने कुटुम्बियों या शत्रुओं द्वारा वध कर दिया जाता है ॥१॥”


आज्ञाफलमैश्वर्यम् ॥२१॥

अर्थ: राजकीय ऐश्वर्य-सैन्य-कोश-शक्ति-प्रजा व प्रकृति (अमात्य-प्रभृति) द्वारा आज्ञा-पालन से ही सफल होता है ॥२१॥ वल्लभदेव विद्वान् ने भी कहा है कि “जिसकी आज्ञा सर्व-मान्य हो, वही राजा कहा जाता है, परन्तु जिसकी आज्ञा नहीं मानी जाती ऐसा कोई भी व्यक्ति, केवल अभिषेक, व्यंजन (चमरप्रभृति से हवा किया जाना) और पट्टबंधन आदि चिह्नों से राजा नहीं हो सकता। क्योंकि उक्त अभिषेक आदि कार्य व्रण (फोड़ा) के भी किये जाते हैं अर्थात् व्रण-फोड़े का भी अभिषेक (जल से धोया जाना), व्यंजन (पंखों से हवा किया जाना) व पट्टबंधन (पट्टी बाँधना) होता है ॥१॥”


राजाज्ञा हि सर्वेषामलंघ्यः प्राकारः ॥२२॥

अर्थ: राजकीय आज्ञा समस्त मनुष्यों से उल्लंघन न किये जानेवाले प्राकार (कोट) के समान होती है अर्थात् जिस प्रकार अत्यन्त विशाल व ऊँचा कोट उल्लंघन नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार राजकीय आज्ञा भी किसी के द्वारा उल्लंघन नहीं की जाती ॥२२॥ गुरु विद्वान् ने भी राजकीय आज्ञा के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


आज्ञाभंगकारिणं पुत्रमपि न सहेत ॥२३॥

अर्थ: राजा आज्ञा-भंग करने वाले पुत्र पर भी क्षमा न करे-यथोचित दण्ड देवे ॥२३॥


कस्तस्य चित्रगतस्य च विशेषो यस्याज्ञा
नास्ति ॥२४॥

अर्थ: जिसकी आज्ञा प्रजाजनों द्वारा उल्लंघन की जाती है, उसमें और चित्र (फोटो) के राजा में क्या अन्तर है ? कोई अन्तर नहीं। अर्थात् उसे मृत-प्राय समझना चाहिए ॥२४॥


राजाज्ञावरुद्धस्य तदाज्ञां न भजेत् ॥२५॥

अर्थ: जिसे राजकीय आज्ञा से जेलखाने आदि की सजा मिल चुकी है, उस दंडित पुरुष का पक्ष नहीं करना चाहिए। अन्यथा पक्ष करने वाला सजा का पात्र होता है ॥२५॥


परमर्माकार्यमश्रद्धेयं च न भाषेत ॥ २६॥

अर्थ: नैतिक पुरुष निरर्थक व विश्वास करने के अयोग्य दूसरे की गुप्त बात न कहे ॥२६॥


वेषमाचारं वानभिज्ञातं न भजेत् ॥२७॥

विकारिणि प्रभौ को नाम न विरज्यते ॥२८॥

अधर्मपरे राज्ञि को नाम नाधर्मपरः ॥२९॥

राज्ञावज्ञातो यः स सर्वैरवज्ञायते ॥३०॥

पूजितं पूजयन्ति लोकाः ॥३१॥

अर्थ (सूत्र 27 से 31): विजिगीषु ऐसे वेष (बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से अलंकृत कमनीय कान्ता-आदि के सुन्दर भेष) व व्यवहार-बर्ताव-पर विश्वास न करे और न उन्हें काम में लावे जो कि अज्ञात-बिना जाने हुए वा आप्त पुरुषों द्वारा बिना परीक्षा किये हुए हों, क्योंकि शत्रु लोग भी नाना प्रकार के छलकपट-पूर्ण वेश्याओं आदि के वेष व मायाचार-युक्त बर्ताव द्वारा विजिगीषु को धोखा देकर भयंकर खतरे में डाल देते हैं ॥२७॥ जिस मनुष्य से राजा कुपित हो गया है, उस पर कौन कुपित नहीं होता है ? सभी कुपित होते हैं ॥२८॥ हारीत विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥ राजा के पापी होने से कौन पुरुष पाप में प्रवृत्त नहीं होता ? सभी होते हैं ॥२९॥ व्यास विद्वान् ने भी कहा है कि प्रजा राजा का अनुकरण करती है अर्थात् जैसा राजा वैसी प्रजा हो जाती है। वह राजा के धर्मात्मा होने से धर्मात्मा, पापी होने से पापी व दुष्ट होने से दुष्ट हो जाती है ॥१॥” जो व्यक्ति राजा द्वारा तिरस्कृत-अपमानित किया जाता है, उसका सभी लोग अपमान करने लगते हैं और राज-सम्मानित पुरुष की सभी पूजा करते हैं ॥३०-३१॥ नारद विद्वान् ने भी राजा द्वारा तिरस्कृत व सम्मानित के विषय में यही कहा है ॥१॥


प्रजाकार्यं स्वयमेव पश्येत् ॥३२॥

अर्थ: राजा प्रजा कार्य-शिष्टपालन व दुष्टनिग्रह आदि स्वयं ही विचारे व अमात्य आदि के भरोसे पर न छोड़े, अन्यथा रिश्वतखोरी और पक्षपात वगैरह के कारण प्रजा पीड़ित होती है। ३२॥ देवल विद्वान् ने भी प्रजा कार्य को अधिकारियों के भरोसे पर छोड़ देने से प्रजा-पीड़ा-आदि हानि बताई है ॥१॥


यथावसरमसङ्गं द्वारं कारयेत् ॥३३॥

अर्थ: राजा मौके-मौके पर अपना राज-द्वार खुला रखे, जिससे प्रजा उसका दर्शन सुलभता से कर सके ॥३३॥


दुर्दर्शो हि राजा कार्याकार्य विपर्यासमासन्नैः कार्यते द्विषतामतिसन्धानीयश्च
भवति ॥३४॥

अर्थ: गर्ग१ विद्वान् ने तो कहा है कि केवल एक मौका छोड़कर बाकी समयों में राजा अपना द्वार सदा सुरक्षित रखे व अवसर आने पर भी प्रजा को अपना दर्शन न देवे तो निश्चय से प्रजा को दर्शन न देने वाले राजा का कार्य अधिकारी वर्ग स्वार्थ-वश बिगाड़ देते हैं और शत्रु लोग भी उससे बगावत करने तत्पर हो जाते हैं, अतः प्रजा को राजकीय दर्शन सरलता से होना चाहिए ॥३४॥ राजपुत्र२ और गर्ग३ विद्वान् ने भी क्रमशः कहा है कि जो राजा अपने द्वार पर आए हुए विद्वान् धनाढ्य, दीन (गरीब) साधु व पीड़ित पुरुष की उपेक्षा करता है उसे लक्ष्मी छोड़ देती है ॥१॥ स्त्रियों में आसक्त रहने वाले राजा का कार्य मंत्रियों द्वारा बिगाड़ दिया जाता है और शत्रु भी उससे युद्ध करने तत्पर हो जाते हैं ॥२॥


वैद्येषु श्रीमतां व्याधिवर्द्धनादिव नियोगिषु भर्तृव्यसनादपरो नास्ति
जीवनोपायः ॥३५॥

अर्थ: जिस प्रकार धनिकों की बीमारी बढ़ाना छोड़कर वैद्यों की जीविका का कोई दूसरा उपाय नहीं उसी प्रकार राजा को व्यसनों में फँसाने के सिवाय, मंत्री आदि अधिकारियों की जीविका का भी कोई दूसरा उपाय नहीं है सारांश यह है कि अशिष्ट वैद्यों की तरह अशिष्ट अधिकारी वर्ग की घृणित स्वार्थवश लोक में ऐसी अनुचित प्रवृत्ति देखी जाती है, अतः राजा को उनसे सावधान रहना चाहिए, जिससे वे उसे व्यसनों में फंसाकर स्वयं रिश्वतखोर आदि न होने पावें ॥३५॥ रैभ्य४ विद्वान् ने कहा है कि जिस प्रकार धनिकों की बीमारी के इलाज करने से वैद्यों को विशेष सम्पत्ति प्राप्त होती है उसी प्रकार स्वामी को व्यसन में फँसा देने से नौकरों को सम्पत्ति मिलती है ॥१॥’’


राज-कर्त्तव्य (रिश्वतखोरों से प्रजा-रक्षा) और रिश्वत से प्रजा व राजकीय हानि


कार्यार्थिनः पुरुषान् लञ्चलुञ्चानिशाचराणां भूतवलीन्न कुर्यात्५ ॥ ३६॥

अर्थ: राजा आये हुए प्रयोजनार्थी पुरुषों को, बलात्कार-पूर्वक रिश्वत लेने वाले (रिश्वतखोर) अमात्य-आदि अधिकारियों के लिए अपने प्राणों की बलि देने वाले (रिश्वत देने वाले) न बनाये। सारांश यह है कि रिश्वतखोरी से प्रजा-पीड़ा, अन्याय-वृद्धि व राज-कोश-क्षति होती है, अतः राजा को प्रयोजनार्थी पुरुषों का रिश्वतखोरों से बचाव करना चाहिए ॥३६॥


लञ्चलुञ्चा हि सर्वपातकानामागमनद्वारम् ॥३७॥

अर्थ: बलात्कार पूर्वक रिश्वत लेना समस्त पापों (हिंसा-आदि) का द्वार है ॥३७॥


मातुः स्तनमपि लुञ्चन्ति लञ्चोपजीविनः ॥३८॥

अर्थ: रिश्वतखोरी से जीविका करने वाले अन्यायी रिश्वतखोर अपनी माता का स्तन भी भक्षण कर लेते हैं-अपने हितैषियों से भी रिश्वत ले लेते हैं फिर दूसरों से रिश्वत लेना तो साधारण बात है ॥३८॥ भारद्वाज३ विद्वान् ने भी रिश्वतखोरों की निर्दयता व विश्वास-घात के विषय में इसी प्रकार कथन किया है। रिश्वतखोर अपने उन्नतिशील स्वामी को बेच देते हैं। क्योंकि जिस प्रयोजनार्थी से रिश्वत ली जाती है, उसका अन्याय-युक्त कार्य भी न्याय-युक्त बताकर रिश्वतखोरों को सिद्ध करना पड़ता है, जिससे स्वामी को आर्थिक-क्षति होती है यही रिश्वतखोरों द्वारा स्वामी का बेचना-पराधीन करना समझना चाहिए॥ ३९॥


प्रासादध्वंसनेन लोहकीलकलाभ इव लञ्चेन राज्ञोऽर्थलाभः ॥४०॥

अर्थ: जो राजा बलात्कार पूर्वक प्रजा से धन ग्रहण करता है, उसका वह अन्याय-पूर्ण आर्थिक लाभ महल को नष्ट करके लोह कीले के लाभ समान हानिकारक है। अर्थात् जिस प्रकार जरा से-साधारण लोह-कीले के लाभार्थ अपने बहुमूल्य प्रासाद (महल) का गिराना स्वार्थ-नाश के कारण महामूर्खता है, उसी प्रकार क्षुद्र स्वार्थ के लिए लूट-मार करके प्रजा से धन-ग्रहण करना भी भविष्य में राज्य-क्षति का कारण होने से राजकीय महामूर्खता है। क्योंकि ऐसा घोर अन्याय करने से प्रजा पीड़ित व संत्रस्त होकर बगावत कर देती है, जिसके फल-स्वरूप राज्य-क्षति होती है। अभिप्राय यह है कि राज्य-सत्ता बहुमूल्य प्रासाद-तुल्य है, उसे चोर समान नष्ट करके तुच्छ लञ्च (लूट-मार या रिश्वत) रूप कीले का ग्रहण करने वाला राजा हंसी का पात्र होता है, क्योंकि वह ऐसा महाभयंकर अन्याय करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी पटकता है॥ ४०॥


राज्ञो लञ्चेन कार्यकारणे कस्य नाम कल्याणम् ॥४१॥

अर्थ: जो राजा बलात्कार करके प्रजा से धनादि का अपहरण करता है, उसके राज्य में किस का कल्याण हो सकता है ? किसी का नहीं॥ ४१॥


देवतापि यदि चौरेषु मिलति कुतः प्रजानां कुशलम् ॥४२॥

अर्थ: क्योंकि यदि देवता भी चोरों की सहायता करने लगे, तो फिर किस प्रकार प्रजा का कल्याण हो सकता है ? नहीं हो सकता। उसी प्रकार रक्षक ही जब भक्षक हो जाय-राजा ही जब रिश्वत खोरों व लूटमार करने वालों की सहायता करने लगे, तब प्रजा का कल्याण किस प्रकार हो सकता है? नहीं हो सकता ॥४२॥


लुञ्चेनार्थोपाश्रयं दर्शयन् देशं कोशं मित्रं तन्त्रं च भक्षयति ॥४३॥

अर्थ: रिश्वत वा लूट-मार आदि घृणित उपाय द्वारा प्रजा का धन अपहरण करने वाला राजा अपने देश (राज्य) खजाना, मित्र व सैन्य नष्ट कर देता है। ४३॥


राज्ञोऽन्यायकरणं समुद्रस्य मर्यादालङ्घनमादित्यस्य तमः पोषणमिव
मातुश्चापत्यभक्षणमिव कलिकालविजृम्भितानि ॥४४॥

अर्थ: जाने वाला महाभयंकर अनर्थ है, जिसे कलिकाल का ही प्रभाव समझना चाहिए। सारांश यह है कि जिस प्रकार समुद्र ही अपनी मर्यादा-सीमा का उल्लंघन करने लगे और सूर्य अपना प्रकाश धर्म छोड़कर लोक में अंधकार का प्रसार करने तत्पर हो जाय एवं माता भी अपने बच्चे का पालन रूप धर्म छोड़कर यदि उसे भक्षण करने लग जाय, तो इन्हें कौन रोक सकता है ? कोई नहीं रोक सकता, उसी प्रकार राजा भी अपना शिष्ट-पालन व दुष्टनिग्रहरूप धर्म छोड़कर प्रजा के साथ अन्याय करने को तत्पर हो जाय, तो उसे दण्ड देने वाला कौन हो सकता है ? कोई नहीं हो सकता और इसे कलि-दोष ही समझना चाहिए; अतएव राजा को प्रजा के साथ अन्याय करना उचित नहीं ॥४४॥


न्याय से प्रजापालन का परिणाम, न्यायवान् राजा की प्रशंसा व राजकर्तव्य


न्यायतः पारपालके राज्ञि प्रजानां कामदुधा भवन्ति सर्वा दिशः ॥४५॥

अर्थ: जब राजा न्यायपूर्वक प्रजा-पालन करता है, तब सभी दिशाएँ प्रजा को अभिलषित वस्तु देने वाली होती हैं, क्योंकि ललितकला, कृषि वाणिज्य-आदि की प्रगति न्याय-युक्त शासन के अधीन है ॥४५॥


काले वर्षति मघवान्, सर्वाश्चेतयः प्रशाम्यन्ति, राजानमनुवर्त्तन्ते सर्वेऽपि
लोकपालाः तेन मध्यममप्युत्तमं लोकपालं राजानमाहुः ॥४७॥

अर्थ (सूत्र 46 से 47): न्यायी राजा के प्रभाव से मेघों से यथासमय जल-वृष्टि होती है और प्रजा के सभी उपद्रव शान्त होते हैं तथा समस्त लोकपाल राजा का अनुकरण करते हैं-न्याययुक्त कर्त्तव्य पालन करते हैं ॥४६॥ इसी कारण विद्वान् पुरुष राजा को मध्यम लोकपाल-मध्य लोक का रक्षक-होने पर भी उत्तम लोकपाल स्वर्गलोक का रक्षक कहते हैं ॥४७॥


अव्यसनेन क्षीणधनान् मूलधनप्रदानेन सम्भावयेत् ॥४८॥

अर्थ: राजा प्रजा के उन कुटुम्बियों को जो कि द्यूत-क्रीड़ा प्रभृति व्यसनों के बिना ही केवल व्यापार आदि में नुकसान (घाटा) लग जाने से दरिद्र हुए है, मूल धन (व्यापारियों के लिए कर्जा में दिया जाकर उनसे वापस लिया जाने वाला स्थाई धन) देकर संतुष्ट करे ॥१॥


राज्ञो हि समुद्रावधिर्मही कुटुम्बं, कलत्राणि च वंशवर्द्धनक्षेत्राणि ॥४९॥

अर्थ: समुद्रपर्यन्त पृथ्वी (उस में वर्तमान प्रजा) राजा का कुटुम्ब है और अन्न-प्रदान द्वारा प्रजा का संरक्षण-संवर्द्धन करने वाले खेत उसकी स्त्रियाँ है। अभिप्राय यह है कि धार्मिक राजा को प्रजा का जीवन-निर्वाह करने वाली कृषि की उन्नति करते हुए समस्त प्रजा को अपने कुटुम्ब समान समझ कर पालन करना चाहिए ॥४९॥


राज-कर्त्तव्य व मनुष्य कर्तव्य स्वीकार न करने योग्य भेंट, हँसी-मजाक की सीमा, वाद-विवाद का निषेध व निरर्थक आशा न देना


अर्थिनामुपायनमप्रतिकुर्व्वाणो न गृह्णीयात् ॥५०॥

अर्थ: यदि राजा प्रयोजनार्थियों का इष्ट प्रयोजन सिद्ध न कर सके, तो उसे उनकी भेंट स्वीकार न करनी चाहिए किन्तु वापस भेज देनी चाहिए। क्योंकि प्रत्युपकार न किये जाने वाले मनुष्य की भेंट स्वीकार करने से लोक में हँसी व निन्दा के सिवाय कोई लाभ नहीं होता ॥५०॥


आगन्तुकैरसहनैश्च सह नर्म न कुर्यात् ॥५१॥

अर्थ: नैतिक मनुष्य को अपरिचित और सहन न करने वाले व्यक्तियों से हँसी-मजाक न करनी चाहिए। क्योंकि इसका परिणाम महाभयंकर होता है, पुराण ग्रन्थों में लिखा है कि रुक्मी ने जुआ खेलते समय बलदेव की हँसी की थी, परन्तु वे उसे सहन न कर सके; इसलिए उन्होंने क्रुद्ध होकर रुक्मी पर गदा-प्रहार द्वारा घात कर डाला ॥५१॥ शौनक विद्वान् ने भी अपरिचित व सहन करने में असमर्थ पुरुषों के साथ हास्य-क्रीड़ा करने का निषेध किया है ॥१॥


पूज्यै सह नाधिकं वदेत् ॥५२॥

अर्थ: नैतिक व्यक्ति पूज्य पुरुषों के साथ वाद-विवाद न करे ॥५२॥ शुक्र विद्वान् ने भी कहा है कि “जो मूर्ख व्यक्ति पूज्य पुरुषों के साथ वाद-विवाद करता है, वह लोक में निन्दा और परलोक में नरक के दुःख भोगता है ॥१॥”


भर्त्तुमशक्यप्रयोजनं च जनं नाशया परिक्लेशयेत् ॥५३॥

अर्थ: विवेकी पुरुष ऐसे व्यक्ति को धनादि देने की आशा से क्लेशित न करे, जिसका उसके द्वारा भरण-पोषण नहीं किया जा सकता अथवा जिससे उसकी कोई प्रयोजन-सिद्धि नहीं हो सकती ॥५३॥ शुक्र विद्वान् ने भी उक्त बात को इसी प्रकार कहा है ॥१॥


पुरुषस्य पुरुषो न दासः किन्तु धनस्य ॥५४॥

अर्थ: लोक में मनुष्य केवल हाथ-पाँव वाले मनुष्य का सेवक नहीं होता, किन्तु उसके धन का सेवक होता है, क्योंकि जीवन-निर्वाह धनाधीन है॥ ५४॥ गुरु विद्वान् ने भी इसी प्रकार कहा है ॥१॥ व्यास विद्वान् ने भी महाभारत के भीष्मपर्व में लिखा है कि “महात्मा भीष्मपितामह ने युधिष्ठिर से कहा कि हे महाराज ! मनुष्य धन का दास है, परन्तु धन किसी का दास नहीं। अतः धन के कारण ही मैं कौरवों के अधीन हुआ हूँ ॥१॥


को नामधनहीनो न भवेल्लघुः ॥५५॥

अर्थ: लोक में कौन-सा दरिद्र मनुष्य लघु-छोटा-नहीं होता ? सभी होते हैं ॥५५॥


सर्वधनेषु विद्यैव धनं प्रधानमहार्यत्वात् सहानुयायित्वाच्च ॥५६॥

अर्थ: सुवर्ण-आदि समस्त धनों में विद्या ही प्रधान धन है, क्योंकि वह चोरों द्वारा चुराई नहीं जाती एवं जन्मान्तर में भी जीवात्मा के साथ जाती है ॥५६॥


सरित्समुद्रमिव नीचोपगतापि विद्या दुर्दर्शमपि राजानं संगमयति ॥५७॥

अर्थ: जिस प्रकार नीचे मार्ग से बहने वाली नदी अपने प्रवाह-वर्ती पदार्थों-तृणादिकों को दूरवर्ती समुद्र के साथ मिला देती है, उसी प्रकार नीच पुरुष की विद्या भी उसे बड़ी कठिनाई से दर्शन होने योग्य राजा से मिला देती है ॥५७॥


परन्तु भाग्यानां व्यापारः ॥५८॥

अर्थ: परन्तु ऐसा हो जाने पर भी राजा से अर्थ-लाभादि प्रयोजन सिद्धि उसके भाग्याधीन है, क्योंकि भाग्य के प्रतिकूल होने पर विद्या-प्रभाव नहीं हो सकता ॥५८॥


सा खलु विद्या विदुषां कामधेनुर्यतो भवति समस्तजगत्स्थितिज्ञानम् ॥५९॥

अर्थ: विद्या निश्चय से कामधेनु समान विद्वानों के मनोरथ पूर्ण करने वाली है, क्योंकि उससे उन्हें समस्त संसार में प्रतिष्ठा व कर्त्तव्य-बोध प्राप्त होता है ॥५९॥


लोकव्यवहारज्ञो हि सर्वज्ञोऽन्यस्तु प्राज्ञोऽप्यवज्ञायत एव ॥६०॥

अर्थ: निश्चय से लोक व्यवहार जानने वाला मनुष्य सर्वज्ञ समान और लोक व्यवहार-शून्य विद्वान् होकर भी लोक द्वारा तिरस्कृत समझा जाता है ॥६०॥


ते खलु प्रज्ञापारमिताः पुरुषा ये कुर्वन्ति परेषां प्रतिबोधनम् ॥६१॥

अर्थ: जो मनुष्य सदुपदेश आदि द्वारा दूसरों को कर्त्तव्य-बोध कराते हैं, वे निश्चय से ज्ञान-समुद्र के पारदर्शी हैं ॥६१॥ जैमिनि१ विद्वान् ने भी कहा है कि जो विद्वान् दूसरों को कर्त्तव्य-बोध कराने की कला में प्रवीण है, वे सर्वज्ञ हैं, परन्तु इसके विपरीत-कर्त्तव्यबोध न कराने वाले-घड़े में वर्तमान दीपक की तरह-केवल स्वयं विद्वत्ता-युक्त हैं। वे मूर्ख हैं ॥१॥‘’


अनुपयोगिना महतापि किं जलधिजलेन ॥६२॥

अर्थ: जिस प्रकार उपयोग-शून्य पीने के अयोग्य (खारे) बहुत समुद्र जल से क्या लाभ ? कोई लाभ नहीं, उसी प्रकार विद्वान् के कर्त्तव्य-ज्ञान कराने में असमर्थ प्रचुर ज्ञान से भी कोई लाभ नहीं ॥६२॥ शुक्र२ विद्वान् ने भी इसी प्रकार कहा है ॥१॥