(१०) मंत्रि-समुद्देशः
मंत्रि-पुरोहित-सेनापतीनां यो युक्तमुक्तं करोति स आहार्यबुद्धिः ॥१॥
अर्थ: जो राजा मंत्री, पुरोहित और सेनापति के कहे हुए धार्मिक एवं आर्थिक सिद्धान्तों का पालन करता है, उसे आहार्यबुद्धि-युक्त कहते हैं।
असुगन्धमपि सूत्रं कुसुमसंयोगात् किन्नोरोहति देवशिरसि ? ॥२॥
अर्थ: पुष्पमाला के आकार को प्राप्त हुए तंतु सुगन्धि-रहित होने पर भी पुष्पों की संगति-संयोग से क्या देवताओं के शिर पर धारण नहीं किये जाते ? अवश्य किये जाते हैं।
महद्भिः पुरुषैः प्रतिष्ठितोऽश्मापि भवति देवः किं पुनर्मनुष्यः ॥३॥
अर्थ: अचेतन और प्रतिमा की आकृति-युक्त पाषाण भी विद्वानों के द्वारा प्रतिष्ठित होने से देव हो जाता है-देव की तरह पूजा जाता है। तब “सचेतन पुरुष का महापुरुषों की संगति से उन्नत हो जाना” इसे तो कहना ही क्या है ? अर्थात् अवश्य उन्नत हो जाता है ॥३॥
तथा चानुश्रूयते विष्णुगुप्तानुग्रहादनधिकृतोऽपि किल चन्द्रगुप्त
साम्राज्यपदमवापेति ॥४॥
अर्थ: इतिहास बताता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य (सम्राट् नन्द का पुत्र) ने स्वयं राज्य का अधिकारी न होने पर भी विष्णुगुप्त-चाणक्य नाम के विद्वान् के अनुग्रह से साम्राज्य पद को प्राप्त किया ॥४॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशामेकतमं
स्वदेशजमाचाराभिजनविशुद्धमव्यसनिनमव्यभिचारिणमधीता
खिलव्यवहारतंत्रमस्त्रज्ञमशेषोपाधिविशुद्धं च मंत्रिणं कुर्वीत ॥५॥
अर्थ: बुद्धिमान राजा या प्रजा को निम्नप्रकार के गुणों से विभूषित प्रधान मंत्री नियुक्त करना चाहिए। जो द्विज-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों में से एक हो किन्तु शूद्र न हो, अपने देश आर्यावर्त का निवासी हो, किन्तु विदेश का रहने वाला न हो, सदाचारी अर्थात् दुष्कर्मों में प्रवृत्ति करने वाला न हो। किन्तु पवित्र आचरण वाला हो। जो कुलीन हो-जिसके माता और पिता का पक्ष (वंश) विशुद्ध हो (जो कि विवाहित समान वर्ण वाले माता-पिता से उत्पन्न हो)। जो जुआ खेलना, मद्यपान करना और परस्त्रीसेवन आदि व्यसनों से दूर हो। जो द्रोह करने वाला न हो-जो दूसरे राजा से मिला हुआ न होकर केवल अपने स्वामी में ही श्रद्धालुयुक्त हो। व्यवहार विद्या में निपुण-नीतिज्ञ (जिसने समस्त व्यवहार शास्त्रों-नीतिशास्त्रों के रहस्य का अध्ययन किया हो) युद्ध विद्या में निपुण तथा शत्रु-चेष्टा की परीक्षा में निपुण हो अथवा समस्त प्रकार के छल-कपट से रहित हो अर्थात् दूसरे के कपट को जानने वाला होने पर भी स्वयं कपट करने वाला न हो।
समस्तपक्षपातेषु स्वदेशपक्षपातो महान् ॥६॥
अर्थ: समस्त पक्षपातों में अपने देश का पक्षपात प्रधान माना गया है।
विषनिषेक इव दुराचारः सर्वान् गुणान् दूषयति ॥७॥
अर्थ: दुराचार-खोटा आचरण (कुत्सित और निंद्य कर्मों में प्रवृत्ति) विष-भक्षण की तरह समस्त गुणों का नाश कर देता है, अर्थात् जिस प्रकार विष का भक्षण जीवन नष्ट कर देता है उसी प्रकार दुराचार भी विद्या, कला और नीतिमत्ता आदि मानवोचित गुणों को अथवा राज्य की वृद्धि और रक्षा करने वाले संधि और विग्रह आदि षाड्गुण्य को नष्ट कर देता है।
दुष्परिजनो मोहेन कुतोऽप्यपकृत्य न जुगुप्सते ॥८॥
अर्थ: नीच कुलवाला मंत्री राजा से द्रोह करके भी मोह के कारण किसी से भी लज्जा नहीं करता।
सव्यसनसचिवो राजारूढ़व्यालगज इव नासुलभोऽपायः ॥९॥
अर्थ: जिस राजा का मंत्री जुआ, मद्यपान और परकलत्रसेवन-आदि व्यसनों में फँसा हुआ है, वह राजा पागल हाथी पर चढ़े हुए मनुष्य की तरह शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥६॥
किं तेन केनापि यो विपदि नोपतिष्ठते ॥१०॥
अर्थ: उस मंत्री, मित्र या सेवक से क्या लाभ है ? जो विपत्ति के समय अपने स्वामी या मित्र की सहायता नहीं करता किन्तु उल्टा उससे द्रोह करता है, चाहे वह कितना ही विद्वान् और व्यवहार कुशल ही क्यों न हो।
भोज्येऽसम्मततोऽपि हि सुलभो लोकः ॥११॥
अर्थ: यह निश्चित है कि भोजन की वेला में बिना बुलाये आने वाले लोग बहुत हैं। अर्थात्-सुख के समय सभी लोग सहायक हो जाते हैं किंतु दुःख में कोई सहायक नहीं होता। अतएव विपत्ति में सहायता करने वाला पुरुष राजमंत्री पद के योग्य है अन्य नहीं ॥११॥
किं तस्य भक्त्या यो न वेत्ति स्वामिनो हितोपायमहितप्रतीकारं वा ॥१२॥
अर्थ: जो मंत्री अपने स्वामी को उन्नति के उपाय (कोष-वृद्धि-आदि) और दुःखों का प्रतीकार-शत्रु का नाश-आदि-को नहीं जानता, किन्तु केवल भक्ति मात्र दिखाता है ‘‘उस मंत्री की केवल भक्ति से क्या लाभ है ? कोई लाभ नहीं ॥१२॥
किं तेन सहायेनास्त्रज्ञेन मंत्रिणा यस्यात्मरक्षणेऽप्यस्त्रं न प्रभवति३ ॥१३॥
अर्थ: जिसका शस्त्र-खड्ग और धनुष-आदि-अपनी रक्षा करने में भी समर्थ नहीं है ऐसे शस्त्र विद्या में प्रवीण सहायक मंत्री से राजा का क्या लाभ हो सकता है ? कोई लाभ नहीं हो सकता।
धर्मार्थकामभयेषु व्याजेन परचित्तपरीक्षणमुपधा४ ॥१४॥
अर्थ: शत्रु के धर्म, अर्थ, काम और भय की जानकारी के लिए-अमुक शत्रुभूत राजा धार्मिक है ? अथवा अधार्मिक है ? उसके खजाने में प्रचुर सम्पत्ति है, अथवा नहीं ? वह कामान्ध है ? अथवा जितेन्द्रिय ? बहादुर है ? या डरपोक ? इत्यादि ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से गुप्तचरों के द्वारा छल से शत्रु-चेष्टा की परीक्षा करना, यह ‘उपधा’ या ‘उपाधि’ नाम का राज-मंत्री का प्रधान सद्गुण है।
अकुलीनेषु नास्त्यपवादाद्भयम् ॥१५॥
अर्थ: नीच कुल वाले मंत्री आदि अपनी अपकीर्ति-लोक में होने वाली निन्दा-से नहीं डरते।
अलर्कविषवत् कालं प्राप्य विकुर्वते विजातयः ॥१६॥
अर्थ: नीचकुल वाले राजमंत्री वगैरह पुरुष कालान्तर में (राजा के ऊपर आपत्ति आने पर) पागल कुत्ते के विष की तरह विरुद्ध हो जाते हैं।
तदमृतस्य विषत्वं यः कुलीनेषु दोषसम्भवः ॥१७॥
अर्थ: कुलीन पुरुषों में विश्वासघात-आदि दोषों का होना अमृत का विष होने के समान है। अर्थात् जिस प्रकार अमृत विष नहीं हो सकता, उसी प्रकार उच्च कुल वालों में भी विश्वासघात आदि दोष नहीं हो सकते ॥१७॥
घटप्रदीपवत्तज्ज्ञानं मंत्रिणो यत्र न परप्रतिबोधः ॥१८॥
अर्थ: जिस ज्ञान के द्वारा दूसरों को समझा कर सन्मार्ग पर न लगाया जावे, वह मंत्री या विद्वान् का ज्ञान घट में रखे हुए दीपक के समान व्यर्थ है अर्थात् जिस प्रकार उजालकर घड़े में स्थापित किया हुआ दीपक केवल घड़े को ही प्रकाशित करता है, परन्तु बाह्य देश में रहने वाले पदार्थों को प्रकाशित नहीं करता, इसलिए वह व्यर्थ समझा जाता है, उसी प्रकार मंत्री अपने राजा को और विद्वान् पुरुष दूसरों को समझाने की कला में यदि प्रवीण नहीं है, तो उसका ज्ञान निरर्थक है ॥१८॥
तेषु शस्त्रमिव शास्त्रमपि निष्फलं येषां प्रतिपक्षदर्शनाद्भयमन्वयन्ति
चेतांसि ॥१९॥
अर्थ: जिन वीर पुरुषों के चित्त शत्रुओं को देखकर भयभीत होते हैं उनका शस्त्र-धारण जिस प्रकार व्यर्थ है, उसी प्रकार जिन विद्वान् पुरुषों के मन वादियों-विरुद्ध सिद्धान्त का समर्थन करने वाले पुरुषों- को देखकर भयभीत होते हैं, उनका शास्त्रज्ञान भी निरर्थक है ॥१९॥
तच्छस्त्रं शास्त्रं वात्मपरिभवाय यन्न हन्ति परेषां प्रसरं१ ॥२०॥
अर्थ: जिस वीर पुरुष का शस्त्र शत्रुओं के बढ़ते हुए वेग-आक्रमण-को नष्ट नहीं करता, उसका शस्त्र-धारण करना उसके पराभव-पराजय (हार) के लिए है। एवं जिस विद्वान् पुरुष का शास्त्रज्ञान वादियों के बढ़ते हुए वेग को नहीं रोकता, उसका शास्त्रज्ञान भी उसके पराजय का कारण होता है।
न हि गली वलीवर्दो भारकर्मणि केनापि युज्यते ॥२१॥
अर्थ: कोई भी विद्वान् पुरुष गाय के बछड़े को बोझा ढोने में नहीं लगाता।
मंत्रपूर्वः सर्वोऽप्यारंभः क्षितिपतीनाम् ॥२२॥
अर्थ: राजाओं को अपने समस्त कार्यों (संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभाव) का प्रारम्भ मंत्रपूर्वक-सुयोग्य मंत्रियों के साथ निश्चय करके करना चाहिए।
अनुपलब्धस्य ज्ञानं, उपलब्धस्य निश्चयः, निश्चितस्य बलाधानं, अर्थस्य द्वैधस्य संशयच्छेदनं, एकदेशलब्धस्याशेषोपलब्धिरिति मंत्रसाध्यमेतत् ॥२३॥
अर्थ: सन्धि व विग्रह-आदि में उपयोगी एवं अज्ञात-बिना जाने हुए-या अप्राप्त (बिना प्राप्त किये हुए) शत्रु-सैन्य वगैरह कार्य का जानना या प्राप्त करना। जाने हुए कार्य का निश्चय करना अथवा प्राप्त किये हुए को स्थिर करना। निश्चित कार्य को दृढ़ करना या किसी कार्य में संदेह उत्पन्न होने पर उसका निवारण करना। उदाहरण में शत्रुभूत राजा के देश से आये हुए पहले गुप्तचर ने शत्रुसैन्य-आदि के बारे में कुछ और कहा तथा दूसरे ने उससे विपरीत कह दिया ऐसे अवसर पर तीसरे विश्वासपात्र गुप्तचर को भेजकर उक्त संशय का निवारण करना अथवा अमुक शत्रुभूत राजा से सन्धि करना चाहिए? अथवा विग्रह-आदि करना चाहिए ? इस प्रकार का संशय उत्पन्न होने पर प्रबल प्रमाणों से उसको निवारण करना और एक देश प्राप्त किये हुए भूमि आदि पदार्थों को पूर्ण प्राप्त करना अथवा एक देश जाने हुए कार्य के शेष भाग को भी जान लेना ये सब कार्य राजा को मंत्र-मंत्री आदि की सलाह से सिद्ध करना चाहिए। अथवा उक्त मंत्र से इन सब कार्यों की सिद्धि होती है।
अकृतारम्भमारब्धस्याप्यनुष्ठानमनुष्ठितविशेषं विनियोगसम्पदं च ये कुर्युस्ते
मंत्रिणः ॥२४॥
अर्थ: जो बिना प्रारम्भ किये हुए कार्यों का प्रारम्भ करें, प्रारम्भ किये हुए कार्यों को पूरा करें और जो कार्य पूरे हो चुके हों उनमें कुछ विशेषता लावें तथा अपने अधिकार का उचित स्थान में प्रभाव दिखावें उन्हें मंत्री कहते हैं ॥२४॥
कर्मणामारम्भोपायः पुरुषद्रव्यसंपद्देशकालविभागो विनिपातप्रतीकारः
कार्यसिद्धिश्चेति पंचांगो मंत्रः ॥२५॥
अर्थ: मंत्र के पाँच अंग होते हैं। १. कार्य के प्रारम्भ करने का उपाय, २. पुरुष और द्रव्यसम्पत्ति, ३. देश और काल का विभाग, ४. विनिपात-प्रतीकार और ५ कार्यसिद्धि। अमुक देश और काल प्रतिकूल है। इसका विभाग (विचार) करना मंत्र का तीसरा अंग है, अथवा अपने देश में देश (दुर्ग आदि के बनाने के लिए जनपद के बीच का देश) और काल-सुभिक्ष-दुर्भिक्ष तथा वर्षा एवं दूसरे के देश में सन्धि-आदि करने पर कोई उपजाऊ प्रदेश और काल-आक्रमण करने या न करने का समय कहलाता है, इनका विचार करना यह देश-काल विभाग नाम का तीसरा मन्त्राङ्ग कहलाता है। किसी विद्वान् ने कहा है “कि जिस प्रकार नदी की मछली जमीन पर प्राप्त होने से नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार राजा भी खोटे देश को प्राप्त होकर नष्ट हो जाता हैं ॥१॥” जिस प्रकार कौआ रात्रि के समय और उल्लू दिन के समय घूमता हुआ नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार राजा भी वर्षा-काल-आदि खोटे समय को प्राप्त होकर नष्ट हो जाता है। अर्थात्-वर्षा-ऋतु-आदि कुसमय में लड़ाई करने वाला राजा भी अपनी सेना को निस्सन्देह कष्ट में डाल देता है ॥२॥ ४. विनिपात प्रतीकार-आई हुई आपत्तियों के नाश का उपाय चिंतन करना। जैसे अपने दुर्ग-आदि पर आने वाले या आये हुये विघ्नों का प्रतीकार करना यह मंत्र का “विनिपात प्रतिकार” नामक चौथा अंग हैं। किसी विद्वान् ने कहा है कि जो मनुष्य आपत्ति पड़ने पर मोह (अज्ञान) को प्राप्त नहीं होता और यथाशक्ति उद्योग करता है, वह उस आपत्ति को नष्ट कर देता हैं ॥१॥” ५. कार्यसिद्धि-उन्नति, अवनति और सम-अवस्था यह तीन प्रकार को कार्य-सिद्ध हैं। जिन सामादि उपायों से विजिगीषु राजा अपनी उन्नति, शत्रु की अवनति या दोनों को सम-अवस्था को प्राप्त हो, यह कार्य सिद्धि नाम का पाँचवाँ मंत्राङ्ग हैं। किसी विद्वान् ने कहा है “कि जो मनुष्य साम, दाम, दंड व भेद उपायों से कार्य-सिद्धि चिंतन करता हैं और कहीं पर उससे विरक्त नहीं होता, उसका कार्य निश्चय से सिद्ध हो जाता हैं ॥१॥ निष्कर्ष-विजिगीषु राजा को समस्त मंत्री-मंडल से या एक से या दो से उक्त पंचाङ्ग मंत्र का विचार वा तदनुकूल प्रवृत्ति करनी चाहिए ॥२५॥
आकाशे प्रतिशब्दवति चाश्रये मंत्रं न कुर्यात् ॥२६॥
अर्थ: जो स्थान चारों तरफ से खुला हुआ हो ऐसे स्थान पर तथा पर्वत व गुफा आदि स्थानों में जहाँ पर प्रतिध्वनि निकलती हो, राजा और मंत्री आदि को मंत्रणा नहीं करनी चाहिए ॥२६॥
मुखविकारकराभिनयाभ्यां प्रतिध्वानेन वा मनःस्थमप्यर्थमभ्यूहन्ति
विचक्षणाः ॥२७॥
अर्थ: चतुर लोग मंत्रणा करने वालों के मुख के विकार से हस्तादि के संचालन से तथा प्रतिध्वनिरूप शब्द से मन में रहने वाले गुप्त अभिप्राय को जान लेते हैं।
आकार्यसिद्धेरक्षितव्यो मंत्रः ॥२८॥
अर्थ: जब तक कार्य सिद्ध न हो जावे तब तक विवेकी पुरुष को अपने मंत्र की रक्षा करनी चाहिए। अर्थात्-उसे प्रकाशित नहीं करना चाहिए, अन्यथा कार्य सिद्ध नहीं हो पाता ॥२८॥
दिवा नक्तं वाऽपरीक्ष्य मंत्रयमाणस्याभिमतः प्रच्छन्नो वा भिनत्ति मंत्रम् ॥२९॥
अर्थ: जो व्यक्ति दिन या रात्रि में मन्त्रणा करने योग्य स्थान की परीक्षा किये बिना ही मंत्र करता है उसका गुप्त मंत्र प्रकाशित हो जाता है, क्योंकि छिपा हुआ आत्मीय पुरुष उसे सुनकर प्रकाशित कर देता है ॥२६॥
श्रूयते किल रजन्यां वटवृक्षे प्रच्छन्नो वररुचिर-प्र-शि-खेति पिशाचेभ्यो
वृत्तान्तमुपश्रुत्य चतुरक्षराद्यैः पादैः श्लोकमेकं चकारेति ॥३०॥
अर्थ: इतिहास प्रमाण में वृद्धपुरुषों के मुख से सुना जाता है कि एक समय पिशाच लोग हिरण्यगुप्त संबंधी वृत्तान्त की गुप्त मंत्रणा कर रहे थे, उसे रात्रि में वटवृक्ष के नीचे छिपे हुए वररुचि नाम के मनुष्य (राज मंत्री) ने सुन लिया था; अतएव उस ने हिरण्यगुप्त के द्वारा कहे हुए श्लोक के प्रत्येक पाद संबंधी एक-एक अक्षरों से अर्थात्-चारों पादों के चार अक्षरों-(अ-प्र-शि-ख) से पूर्ण (चारों पाद) श्लोक की रचना कर ली।
न तैः सह मंत्रं कुर्यात् येषां पक्षीयेष्वपकुर्यात् ॥३१॥
अर्थ: राजा ने जिनके बंधु-आदि कुटुम्बियों का अपकार-अनिष्ट (बध-बंधनादि) किया है, उसे उन विरोधियों के साथ मंत्र-गुप्त सलाह नहीं करनी चाहिए, क्योंकि विरोधियों के साथ मंत्रणा करने से उसके भेद का भय रहता है-मंत्र प्रकाशित हो जाता है ॥३१॥
अनायुक्तो मंत्रकाले न तिष्ठेत् ॥३२॥
अर्थ: अर्थात् कोई भी व्यक्ति राजा की आज्ञा के बिना मंत्रणा के समय बिना बुलाया हुआ उस स्थान पर न ठहरे अर्थात् जो पुरुष राजा की आज्ञा के अनुसार विचार करने के लिए बुलाये गये हों, वे ही वहाँ जावें, अन्य (बिना बुलाये हुए) व्यक्ति न जावें।
तथा च श्रूयते शुकसारिकाभ्यामन्यैश्च तिर्यग्भिर्मन्त्रभेदः कृतः ॥३३॥
अर्थ: वृद्ध पुरुषों से सुना जाता है कि पहले कभी तोता मैना ने तथा दूसरे पशुओं ने राजा की गुप्त मंत्रणा को प्रकाशित कर दिया था। -
मंत्रभेदादुत्पन्नं व्यसनं दुष्प्रतिविधेयं स्यात् ॥३४॥
अर्थ: गुप्त मंत्रणा के प्रकाशित हो जाने से राजा को जो संकट पैदा होता है वह कठिनाई से भी नष्ट नहीं हो सकता।
इङ्गितमाकारो मदः प्रमादो निद्रा च मंत्रभेदकारणानि ॥३५॥
अर्थ: गुप्तमंत्र का भेद निम्न प्रकार पाँच बातों से होता है, अतएव उनसे सदा सावधान रहना चाहिए (१) इङ्गित (गुप्त मंत्रणा करने वाले की मुख चेष्टा), (२) शरीर की सौम्य या रौद्र-भयंकर आकृति (३) शराब पीना (४) प्रमाद-असावधानी करना और (५) निद्रा ॥३५॥
इङ्गितमन्यथावृत्तिः ॥ ३६॥
अर्थ: गुप्त अभिप्राय को अभिव्यक्त (प्रकाश) करने वाली शरीर की चेष्टा ‘इङ्गित’ है। अथवा स्वाभाविक क्रियाओं से भिन्न क्रियाओं के करने को इङ्गित (चेष्टा) कहते हैं ॥३६॥
कोपप्रसादजनिताशरीरी विकृतिराकारः ॥३७॥
अर्थ: क्रोध से होने वाली भयंकर आकृति व प्रसन्नता से होने वाली सौम्य-आकृति को ‘आकार’ कहते हैं। अथवा क्रोध से होने वाली मुख की म्लानता एवं प्रसाद से होने वाली मुख की प्रसन्नता को ‘आकार’ कहते हैं। ३७॥
पानस्त्रीसंगादिजनितो हर्षो मदः ॥३८॥
प्रमादो गोत्रस्खलनादिहेतुः ॥३९॥
अन्यथा चिकीर्षतोऽन्यथावृत्तिर्वा प्रमादः ॥४०॥
निद्रान्तरितो [निद्रितः] ॥४१॥
अर्थ (सूत्र 38 से 41): मद्यपान व स्त्रीसंभोग से होने वाले हर्ष को ‘मद’ कहते हैं ॥३८॥ अपने या दूसरों के नाम को भूल जाना या उसका अन्यथा कहना आदि में कारण असावधानी को ‘प्रमाद’ कहते हैं ॥३९॥ इसी प्रकार करने योग्य इच्छित कार्य को छोड़कर दूसरे कार्य को करने लगना ऐसी असावधानतारूप प्रवृत्ति को भी ‘प्रमाद’ कहा गया है ॥४०॥ गाढ़ नींद में व्याप्त होने को ‘निद्रा’ कहा है ॥४१॥
उद्धृतमन्त्रो न दीर्घसूत्रः स्यात् ॥४२॥
अर्थ: विजिगीषु विचार निश्चित हो जाने पर उसे शीघ्र ही कार्यरूप में परिणत करने का यत्न करे, इसमें उसे आलस्य नहीं करना चाहिए। सारांश यह है कि मंत्र में विलम्ब करने से उसके फूटने का भय रहता है जिससे कार्य-सिद्धि नहीं हो पाती। अतः उसे शीघ्र ही कार्यरूप में परिणत करना चाहिए ॥४२॥
अननुष्ठाने छात्रवत् किं मंत्रेण ॥४३॥
अर्थ: विजिगीषु को कर्तव्य-पालन के बिना केवल निश्चित विचार से आलसी विद्यार्थी की तरह कोई लाभ नहीं होता-कार्य-सिद्धि नहीं होती। जिस प्रकार आलसी शिष्य गुरु से मंत्र सीख लेता है, किन्तु तदनुकूल जप वगैरह का आचरण नहीं करता, अतः उसका मंत्र सीखना निष्फल है, उसी प्रकार विजिगीषु भी यदि मंत्रणा के अनुकूल कर्तव्य में प्रवृत्त नहीं होता तो उसकी मंत्रणा भी व्यर्थ है ॥४३॥
न ह्यौषधिपरिज्ञानादेव व्याधिप्रशमः ॥४४॥
अर्थ: केवल औषधि के ज्ञानमात्र से रोग की शांति नहीं हो सकती। सारांश यह है कि जिस प्रकार केवल औषध के जान लेने मात्र से व्याधियों का नाश नहीं होता। किन्तु उसके सेवन से ही होता है, उसी प्रकार विचार-मात्र से सन्धि व विग्रह आदि कार्य सिद्ध नहीं हो सकते, किन्तु मंत्रणा के अनुकूल प्रवृत्ति करने से कार्य सिद्ध होते हैं ॥४४॥
नास्त्यविवेकात् परः प्राणिनां शत्रुः ॥४५॥
अर्थ: संसार में नीतिशास्त्र के अज्ञान को छोड़कर प्राणियों का कोई दूसरा शत्रु नहीं है। क्योंकि नैतिक अज्ञान ही मनुष्य को शत्रु से वध-बंधनादि कष्ट दिलाता है अथवा उससे सभी कार्य नष्ट हो जाते हैं ॥४५॥
आत्मसाध्यमन्येन कारयन्नौषधमूल्यादिव व्याधिं चिकित्सति ॥४६॥
अर्थ: जो मनुष्य स्वयं करने योग्य कार्य को दूसरों से कराता है, वह केवल औषधि के मूल्यज्ञान से ही रोग का परिहार-नाश चाहता है अर्थात् जिस प्रकार केवल दवाई की कीमत समझ लेने मात्र से बीमारी नष्ट नहीं होती, उसी प्रकार स्वयं करने योग्य कार्य को दूसरों से कराने से वह कार्य सिद्ध नहीं होता ॥४६॥
यो यत्प्रतिबद्धः स तेन सहोदयव्ययी ॥४७॥
अर्थ: जो सेवक जिस स्वामी के आश्रित है वह अपने स्वामी की उन्नति से उन्नतिशील और अवनति से अवनतिशील होता है। सारांश यह है कि संसार में सेवक के ऊपर उसके स्वामी को आर्थिक-हानि और लाभ का प्रभाव पड़ता है ॥४७॥
स्वामिनाधिष्ठितो मेषोऽपि सिंहायते ॥४८॥
अर्थ: साधारण (कमजोर) मेढ़ा भी अपने स्वामी से अधिष्ठित हुआ शेर के समान आचरण करता है-बलवान् हो जाता है, फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या है। सारांश यह कि साधारण सेवक भी अपने स्वामी की सहायता को प्राप्त कर वीर हो जाता है ॥४७॥
मंत्रकाले विगृह्य विवादः स्वैरालापश्च न कर्त्तव्यः ॥४९॥
अर्थ: मंत्रियों को मंत्रणा के समय परस्पर में कलह करके वाद-विवाद और स्वच्छन्द बातचीत (हँसी-मजाक आदि) न करनी चाहिए। सारांश यह है कि कलह करने से वैर-विरोध और स्वच्छन्दयुक्ति- अनुभव शून्य-वार्तालाप से अनादर होता है, अतएव मंत्रियों को मंत्र की वेला में उक्त बातें नहीं करनी चाहिए ॥४६॥
अविरुद्धैरस्वैरैर्विहितो मंत्रो लघुनोपायेन महतः कार्यस्य सिद्धिर्मंत्रफलम् ॥५०॥
अर्थ: परस्पर वैर-विरोध न करने वाले-प्रेम और सहानुभूति रखनेवाले और हंसी-मजाक आदि स्वच्छन्द (युक्ति व अनुभव-शून्य) वार्तालाप न करने वाले (सावधान) मंत्रियों के द्वारा जो मंत्रणा की जाती है, उससे थोड़े से उपाय से उपयोगी महान् कार्य की सिद्धि होती है और यही (अल्प उपाय से महान् कार्यसिद्धि करना) मंत्र का फल या माहात्म्य है। सारांश यह कि थोड़े उपाय से थोड़ा कार्य और महान् उपाय से महान् कार्य सिद्ध होना, यह मंत्रशक्ति का फल नहीं है, क्योंकि वह तो मंत्रणा के बिना भी हो सकता है, परन्तु थोड़े से उपाय द्वारा महान् कार्य की सिद्धि होना यही मंत्रशक्ति का माहात्म्य हैं ॥५०॥
न खलु तथा हस्तेनोत्थाप्यते ग्रावा यथा दारुणा ॥५१॥
अर्थ: जिस प्रकार पृथ्वी में गड़ी हुई विशाल पत्थर की चट्टान तिरछी लकड़ी के यन्त्र विशेष से शीघ्र ही थोड़े परिश्रम से उठाई जा सकती है (स्थान से हटाई जाती है-), उस प्रकार हाथों से महान् परिश्रम करने पर भी नहीं उठाई जा सकती। इसी प्रकार मंत्र शक्ति से महान् कार्य भी, थोड़े परिश्रम से सिद्ध हो जाते हैं, बिना मंत्रणा के कदापि सिद्ध नहीं हो सकते ॥५१॥
स मंत्री शत्रुर्यो नृपेच्छयाऽकार्यमपि कार्यरूपतयाऽनुशास्ति ॥५२॥
अर्थ: जो मंत्री राजा की इच्छा से-उसकी आज्ञा के अनुसार चलने के उद्देश्य से-उसको अकर्त्तव्य का कर्त्तव्यरूप से उपदेश देता है, वह राजा का शत्रु है। सारांश यह है कि अकर्त्तव्य में प्रवृत्त होने से राजा की अत्यन्त हानि होती है, इसलिए अकर्त्तव्य का उपदेश देने वाले मंत्री को शत्रु, कहा गया है ॥५२॥
वरं स्वामिनो दुःखं न पुनरकार्योपदेशेन तद्विनाशः ॥५३॥
अर्थ: मंत्री को राजा के लिए दुःख देना उत्तम है-अर्थात् यदि वह भविष्य में हितकारक किन्तु तत्काल अप्रिय लगने वाले ऐसे कठोर वचन बोलकर राजा को दुःखी करता है तो उत्तम है, परन्तु अकर्त्तव्य का उपदेश देकर राजा का नाश करना अच्छा नहीं-अर्थात् तत्काल प्रिय लगने वाले, किन्तु भविष्य में हानिकारक वचन बोलकर अकार्य का उपदेश देकर उसका नाश करना अच्छा नहीं ॥५३॥
पीयूषमपिबतो बालस्य किं न क्रियते कपोलहननं ॥५४॥
अर्थ: जब बच्चा माता के स्तनों का दूध नहीं पीता, तब क्या वह उसके गालों में थप्पड़ लगाकर उसे दूध नहीं पिलाती ? अवश्य पिलाती है। सारांश यह है कि जिस प्रकार माता बच्चे के हित के लिए उससे तात्कालिक कठोर और भविष्य में हितकारक व्यवहार करती है, उसी प्रकार मंत्री को भी राजा की भलाई के लिए भविष्य में हितकारक और तत्काल में कठोर व्यवहार करना चाहिए ॥५४॥
मंत्रिणो राजद्वितीयहृदयत्वान्न केनचित् सह संसर्गं कुर्युः ॥५५॥
अर्थ: मंत्री लोग राजा के दूसरे हृदय रूप होते हैं-राजारूप ही होते हैं, इसलिए उन्हें किसी के साथ स्नेहादि सम्बन्ध न रखना चाहिए ॥५५॥
राज्ञोऽनुग्रहविग्रहावेव मंत्रिणामनुग्रहविग्रहौ ॥५६॥
अर्थ: राजा की सुख-सम्पत्ति ही मंत्रियों की सुख-सम्पत्ति है एवं राजा के कष्ट मंत्रियों के कष्ट समझे जाते हैं अथवा राजा जिस पुरुष का निग्रह (दंड देना) और अनुग्रह करता है, वह मंत्रियों के द्वारा किया हुआ ही समझना चाहिए अर्थात् मंत्रियों को पृथक रूप से उस पुरुष का निग्रह या अनुग्रह नहीं करना चाहिए। अन्यथा (यदि मंत्री लोग, राजा की अवज्ञा करके उस पुरुष का अलग से निग्रह या अनुग्रह करेंगे) “ये मेरे राज्याधिकार को छीनना चाहते हैं। ऐसा समझ राजा उस पर विश्वास नहीं करेगा ॥५६॥
स दैवस्यापराधो न मंत्रिणां यत् सुघटितमपि कार्यं न घटते ॥५७॥
अर्थ: जो मंत्री राजकार्य में सावधान होते हैं, तथापि उनके द्वारा अच्छी तरह मंत्रणापूर्वक किया हुआ भी कार्य जब सिद्ध नहीं होता, उसमें उनका कोई दोष नहीं, किन्तु राजा के पूर्वजन्म संबंधी भाग्य का ही दोष समझना चाहिए ॥५७॥
स खलु नो राजा यो मंत्रिणोऽतिक्रम्य वर्तते ॥५८॥
अर्थ: जो राजा मंत्रियों की बात को उल्लंघन करता है-न उनकी बात सुनता है और न आचरण करता है, वह राजा नहीं रह सकता-उसका राज्य क्रमागत होने पर भी नष्ट हो जाता है ॥५८॥
सुविवेचितान्मंत्राद्भवत्येव कार्यसिद्धिर्यदि स्वामिनो न दुराग्रहः स्यात् ॥५९॥
अर्थ: यदि राजा दुराग्रही-हठी न हो तो अच्छी तरह विचारपूर्वक किये हुए मंत्र से अवश्य कार्य-सिद्धि होती है। सारांश यह है कि जब मंत्रिमंडल अपनी सैनिक शक्ति को दृढ़ और शत्रु की सैनिक शक्ति क्षीण देखता है, एवं देश काल का विचार करके सन्धि-विग्रहादि कार्य प्रारम्भ करता है, तब उसकी अवश्य विजय होती है, परन्तु ऐसे अवसर पर राजा की अनुमति होनी चाहिए, उसे दुराग्रही नहीं होना चाहिए ॥५६॥
अविक्रमतो राज्यं वणिकखड्गयष्टिरिव ॥६०॥
अर्थ: जो राजा पराक्रम-रहित है उसका राज्य वणिक-व्यापारी सेठ के खड्ग के समान व्यर्थ है अर्थात् जिस प्रकार प्रहार-क्रिया में कुशलता न रखने वाले सेठ का खड्ग व्यर्थ है, उसी प्रकार पराक्रम से शून्य राजा का राज्य भी व्यर्थ है, क्योंकि उसे पराक्रमी पुरुष जीत लेते हैं ॥६०॥’’
नीति-सदाचार प्रवृत्ति से लाभ
नीतिर्यथावस्थितमर्थमुपलम्भयति ॥६१॥
अर्थ: नीतिशास्त्र का ज्ञान मनुष्य को करने योग्य कार्य के स्वरूप को बोध करा देता है ॥६१॥
हित-प्राप्ति और अहित-त्याग का उपाय
हिताहितप्राप्तिपरिहारौ पुरुषकारायत्तौ ॥६२॥
अर्थ: हितकारक-सुख देने वाली-वस्तु की प्राप्ति करना और अहित-दुःख देने वाली-वस्तुओं को छोड़ना यह आत्मशक्ति-पुरुषार्थ के अधीन है। सारांश यह है कि जो वस्तु हितकारक होने पर भी दुर्लभ होती है उसे नैतिक मनुष्य पुरुषार्थ-आत्मशक्ति-से प्राप्त कर लेता है। एवं जो वस्तु तत्काल में लाभदायक होने पर भी अहित-फलकाल में दुःखदायक-होती है, उसे वह जितेन्द्रिय होकर-अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके-आत्मशक्ति से छोड़ देता है ॥६२॥
मनुष्य-कर्तव्य
अकालसहं कार्यमद्यस्वीनं न कुर्यात् ॥६३॥
अर्थ: जो कार्य विलम्ब करने योग्य नहीं है-शीघ्र करने योग्य है-उसके करने में विलम्ब (देरी) न करना चाहिए ॥६३॥
कालातिक्रमान्नखच्छेद्यमपि कार्यं भवति कुठारच्छेद्यं ॥६४॥
अर्थ: समय चूक जाने पर नख के द्वारा काटने योग्य-सरलता से किया जाने वाला-कार्य भी कुल्हाड़े से काटने योग्य अत्यन्त कठिन हो जाता है। सारांश यह है कि जो कार्य समय पर किया जाता है वह थोड़े परिश्रम से सिद्ध सफल हो जाता है, परन्तु समय चूक जाने पर उसमें महान् परिश्रम करना पड़ता है ॥६४॥
को नाम सचेतनः सुखसाध्यं कार्यं कृच्छ्रसाध्यमसाध्यं वा कुर्यात् ॥६५॥
अर्थ: कौन ऐसा बुद्धिमान पुरुष होगा ? जो कि सुख से सिद्ध होने योग्य-सरल (थोड़े परिश्रम से सिद्ध होने योग्य) कार्य को दुःख से सिद्ध होने योग्य (कठिन) या असाध्य (बिल्कुल न सिद्ध होने योग्य) करेगा ? कोई भी नहीं करेगा ॥६५॥
एको मंत्री न कर्त्तव्यः ॥ ६६॥
एको हि मन्त्री निरवग्रहश्चरति मुह्यति च कार्येषु कृच्छ्रेषु॥ ६७॥
अर्थ (सूत्र 66 से 67): राजा को केवल एक मंत्री नहीं रखना चाहिए, क्योंकि अकेला मंत्री स्वतन्त्र होने से निरंकुश हो जाता है; इसलिए वह अपनी इच्छा के अनुसार राजा का विरोधी होकर प्रत्येक कार्य को कर डालता है और कठिनता से निश्चय करने योग्य कार्यों में मोह-अज्ञान को प्राप्त हो जाता है।
द्वावपि मंत्रिणौ न कार्यौ॥ ६८॥
द्वौ मंत्रिणौ संहतौ राज्यं विनाशयतः॥ ६९॥
अर्थ (सूत्र 68 से 69): राजा दो मंत्रियों को भी सलाह के लिए न रक्खे; क्योंकि दोनों मंत्री आपस में मिलकर राज्य को नष्ट कर डालते हैं ॥६८-६९॥
निगृहीतौ तौ तं विनाशयतः ॥७०॥
अर्थ: यदि दोनों मंत्रियों का निग्रह किया जाता है, तो वे मिलकर राजा को नष्ट कर देते हैं ॥७०॥
त्रयः पंच सप्त वा मन्त्रिणस्तैः कार्याः ॥७१॥
अर्थ: राजाओं को तीन, पाँच या सात मंत्री नियुक्त करने चाहिए। सारांश यह है कि विषम संख्या वाले मंत्रिमंडल का परस्पर में एक मत होना कठिन है; इसलिए वे राज्य के विरुद्ध षड्यन्त्र-बगावत वगैरह-करने में असमर्थ रहते हैं; अतः राजा को तीन, पाँच या सात मंत्री रखने का निर्देश किया गया हैं ॥७१॥
विषमपुरुषसमूहे दुर्लभमैकमत्यं ॥७२॥
अर्थ: यदि राजा परस्पर में ईर्ष्या करने वाले मंत्रि-मण्डल को नियुक्त करे, तो उसकी किसी योग्य राजकीय काय में एक सम्मति होना कठिन है ॥७२॥
बहवो मंत्रिणः परस्परं स्वमतीरुत्कर्षयन्ति ॥७३॥
अर्थ: परस्पर में ईर्ष्या रखने वाले बहुत से मंत्री राजा के समक्ष अपनी-अपनी बुद्धि का महत्त्व प्रकट करके अपना-अपना मत पुष्ट करते हैं। सारांश यह है कि ईर्ष्यालु बहुत से मंत्री अपना-अपना मत पुष्ट करने में प्रयत्नशील होते हैं, इससे राज-कार्य में हानि होती है ॥७३॥
स्वच्छन्दाश्च न विजृम्भन्ते ॥७४॥
अर्थ: स्वेच्छाचारी मंत्री आपस की उचित सलाह नहीं मानते ॥७४॥
यद्बहुगुणमनपायबहुलं भवति तत्कार्यमनुष्ठेयम् ॥७५॥
अर्थ: राजा या विवेकी मनुष्य को सम्पत्ति और कीर्ति-लाभ-आदि बहुत गुणों से युक्त (श्रेष्ठ) तथा विनाश-रहित-नित्य व कल्याणकारक कार्य करना चाहिए ॥७५॥
तदेव भुज्यते यदेव परिणमति ॥७६॥
अर्थ: जिसका परिपाक (पचना) अच्छी तरह से हो सके, वही प्रकृति-ऋतु के अनुकूल भोजन करना उचित है। सारांश यह है कि नैतिक मनुष्य को पचने वाले (निरन्तर विशुद्ध, पुण्य, यशस्य और न्याययुक्त तथा भविष्य में कल्याण-कारक) सत् कार्य करना चाहिए। उसे न पचने वाले समाज दंड और राज-दंडादि द्वारा अपकीर्ति को फैलाने वाले अन्याय-युक्त असत् कार्यों से सदा दूर रहना चाहिए। इसी प्रकार राजा को भी राज्य की श्रीवृद्धि में उपयोगी संधि और विग्रह-आदि कार्य इस प्रकार विशुद्ध मंत्रणा पूर्वक करना चाहिए, जिससे उसका भविष्य उज्ज्वल-श्रेयस्कर हो। उसे भविष्य में होने वाली राज्य-वृत्ति संबंधी कार्यों से सदा दूर रहना चाहिए ॥७६॥
यथोक्तगुणसमवायिन्येकस्मिन् युगले वा मंत्रिणि न कोऽपि दोषः ॥७७॥
अर्थ: यदि मंत्री में पूर्वोक्त गुण (पाँच में सूत्र में कहे हुए द्विज, स्वदेशवासी, सदाचारी, कुलीन और व्यसनों से रहित-आदि सद्गुण) विद्यमान हों तो एक या दो मंत्रियों की भी नियुक्ति करने से राजा की हानि नहीं हो सकती। सारांश यह है कि पूर्व में आचार्यश्री ने एक या दो मंत्रियों के रखने का निषेध किया था, परन्तु अब यथार्थ सिद्धान्त प्रगट करते हैं कि पूर्वोक्त गुणों से विभूषित एक या दो मंत्रियों के रखने में भी राजा की कोई हानि नहीं हो सकती ॥७७॥
न हि महानप्यन्धसमुदायो रूपमुपलभेत ॥७८॥
अर्थ: बहुत से भी अन्धों का समूह रूप को नहीं जान सकता। सारांश यह है कि जिस प्रकार बहुत-सा अन्ध-समुदाय हरित-पीतादि रूप को नहीं जान सकता, उसी प्रकार पूर्वोक्त गुणों से शून्य व मूर्ख मंत्रि-मंडल भी राज्य-वृद्धि के उपायों का यथार्थ निश्चय नहीं कर सकता। अतएव नीतिज्ञ राजा को मूर्ख मंत्रि-मंडल नहीं रखना चाहिए ॥७८॥ दोनों बैल यदि अधिक बलिष्ठ हों, तो क्या वे दोनों महान् बोझा ढोने के लिए गाड़ी वगैरह में नहीं जोते जाते ? अवश्य जोते जाते हैं। सारांश यह है कि उसी प्रकार दो मन्त्री भी यदि पूर्वोक्त गुणों से अलंकृत हों, तो वे भी राज्य-भार को वहन करने में समर्थ हो सकते हैं; अतएव उक्त गुणों से युक्त दो मन्त्रियों के रखने में कोई हानि नहीं है ॥७९॥
बहुसहाये राज्ञि प्रसीदन्ति सर्व एव मनोरथाः ॥८०॥
अर्थ: जिस राजा के बहुत से सहायक (राज्य में सहायता देने वाले भिन्न-भिन्न विभागों के भिन्न-भिन्न प्रधानमन्त्री आदि) होते हैं, उसे समस्त अभिलषित पदार्थों की प्राप्ति होती है ॥८०॥
एको हि पुरुषः केषु नाम कार्येष्वात्मानं विभजते ॥८१॥
अर्थ: अकेला आदमी अपने को किन-किन कार्यों में नियुक्त कर सकता है ? नहीं कर सकता। सारांश यह है कि राजकीय बहुत से कार्य होते हैं, उन्हें अकेला मन्त्री किस प्रकार सम्पन्न कर सकता है ? नहीं कर सकता, अतएव अलग-अलग विभागों के लिए बहुत से मंत्री-आदि सहायक होने चाहिए ॥८१॥
किमेकशाखस्य शाखिनो महती भवतिच्छाया ॥८२॥
अर्थ: क्या केवल एक शाखा वाले वृक्ष से अधिक छाया हो सकती है ? नहीं हो सकती, उसी प्रकार अकेले मन्त्री से राज्य के महान् कार्य सिद्ध नहीं हो सकते ॥८२॥
कार्यकाले दुर्लभः पुरुषसमुदायः ॥८३॥
अर्थ: आपत्तिकाल आने पर कार्य करने वाले सहायक पुरुषों का मिलना दुर्लभ होता है। अतएव नैतिक व्यक्ति या राजा कार्य में सहायक पुरुषों को पहले से ही संग्रह करे। सारांश यह है कि यद्यपि भविष्य में आने वाली आपत्ति से बचाव करने के लिए पहले से सहायक पुरुषों के रखने में अधिक धनराशि का व्यय होता है, तथापि नैतिक पुरुष उसकी परवाह न करे। क्योंकि धन-व्यय की अपेक्षा सहायक पुरुषों के संग्रह को नीतिनिष्ठों ने अधिक महत्त्व दिया है और इसी कारण विजिगीषु राजा लोग भविष्य में होने वाले शत्रुओं के हमले आदि से राष्ट्र को सुरक्षित रखने के लिए विशाल सैनिक-संगठन करने में प्रचुर धनराशि के व्यय की ओर ध्यान नहीं देते। क्योंकि आपत्तिकाल आने पर उसी समय सहायक पुरुषों का मिलना कठिन होता है ॥८३॥
दीप्ते गृहे कीदृशं कूपखननम् ॥८४॥
अर्थ: मकान में आग लग जाने पर उसे बुझाने को तत्काल पानी के लिए कुआं खोदना क्या उचित है ? नहीं। सारांश यह है कि जिस प्रकार मकान में लगी हुई आग को बुझाने के लिए उसी समय कुआं खोदना व्यर्थ है, उसी प्रकार आपत्ति आने पर उसे दूर करने के लिए सहायक-संग्रह व्यर्थ है ॥८४॥
न धनं पुरुषसंग्रहाद्बहु मन्तव्यं ।८५॥
अर्थ: सहायक पुरुषों के संग्रह की अपेक्षा धन को उत्कृष्ट नहीं समझना चाहिए। इसलिए धनाभिलाषी एवं विजिगीषु राजाओं को सहायक पुरुषों का संग्रह करना चाहिए ॥८५॥
सत्क्षेत्रे बीजमिव पुरुषेषूपप्तं कार्यं शतशः फलति ॥८६॥
अर्थ: उत्तम उपजाऊ खेत में बोए हुए बीज की तरह सत्पुरुषों (सहायक कार्यपुरुष-मंत्री, सेनापति और अर्थ-सचिव-आदि) को दिया हुआ धन निस्सन्देह अनेक फल देता है-अनेक आर्थिक लाभ-वगैरह प्रयोजनों को सिद्ध करता है। सारांश यह है कि जिस प्रकार उपजाऊ पृथिवी में बोए गये धान्यादि के बीज प्रचुर धान्य-राशि को उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार मंत्री, अमात्य, पुरोहित और सेनापति-आदि सहायक पुरुषों को दिया हुआ धन भी प्रचुर धन-राशि को उत्पन्न करता हैं; अतएव विजिगीषु राजा या नैतिक पुरुष सहायक सत्पुरुषों के संग्रह की अपेक्षा धन को अधिक न समझे ॥८६॥
बुद्धावर्थे युद्धे च ये सहायास्ते कार्यपुरुषाः ॥८७॥
अर्थ: बुद्धि, धन और युद्ध में जो सहायक होते हैं वे कार्यपुरुष हैं। सारांश यह है कि राजाओं को राजनैतिक बुद्धि प्रदान करने वाले प्रधान मंत्री और पुरोहित आदि, सम्पत्ति में सहायक अर्थ-सचिव वगैरह और युद्ध में सहायक सेना सचिव-आदि इनको ‘कार्यपुरुष’ कहते हैं, अन्य को नहीं ॥८७॥
खादनवारायां को नाम न सहायः ॥८८॥
अर्थ: भोजन के समय कौन सहायक नहीं होता ? सभी सहायक होते हैं। सारांश यह है कि सम्पत्ति के समय सभी पुरुष सहायक हो जाते हैं, परन्तु जब मनुष्य के ऊपर आपत्ति पड़ती है तब कोई सहायता नहीं करता; इसीलिए आपत्ति आने के पूर्व ही सहायक पुरुषों का संग्रह कर लेना श्रेष्ठ है॥८८॥
श्राद्ध इवाश्रोत्रियस्य न मंत्रे मूर्खस्याधिकारोऽस्ति ॥८९॥
अर्थ: जो मनुष्य धार्मिक क्रियाकांडों का विद्वान् नहीं है, उसको जिस प्रकार श्राद्धक्रिया (श्रद्धा से किया जाने वाला दान पुण्य) कराने का अधिकार नहीं है, उसी प्रकार राजनीति-ज्ञान से शून्य-मूर्ख-मंत्री को भी मंत्रणा (उचित सलाह) का अधिकार नहीं है ॥८९॥
किं नामान्धः पश्येत् ॥९०॥
अर्थ: क्या अंधा मनुष्य कुछ देख सकता है ? नहीं देख सकता। सारांश यह है कि उसी प्रकार अंधे के समान मूर्ख मन्त्री भी मंत्र का निश्चय नहीं कर सकता ॥६०॥
किमन्थेनाकृष्यमाणोऽन्धः समं पन्थानं प्रतिपद्यते ॥९१॥
अर्थ: यदि अंधे मनुष्य को दूसरा अंधा ले जाता है, तो भी क्या वह सममार्ग (गड्ढे और कंकड़-पत्थरों से रहित एक से रास्ते) को देख सकता है ? नहीं देख सकता। सारांश यह है कि उसी प्रकार यदि मूर्ख राजा भी मूर्ख मंत्री की सहायता से संधि-विग्रहादि राजकार्यों को मन्त्रणा करे, तो क्या वह उसके फल (विजयलक्ष्मी व अर्थ-लाभ-आदि) प्राप्त कर सकता है ? नहीं कर सकता॥६१॥
तदन्धवर्तकीयं काकतालीयं वा यन्मूर्खमन्त्रात् कार्यसिद्धिः ॥९२॥
अर्थ: मूर्ख मंत्री की मंत्रणा-सलाह से भी कभी किसी समय कार्य-सिद्धि हो जाती है, परन्तु वह अन्धे के हाथ आई हुई बटेर-चिड़िया विशेष-की न्याय के समान अथवा काकतालीय न्याय (ताड़ वृक्ष के नीचे से उड़कर जाने वाले कौए को उसी समय उस वृक्ष से गिरने वाले ताड़फल की प्राप्तिरूप न्याय) के समान सार्वकालिक-सदा होने वाली और निश्चित नहीं होती। अर्थात्-जिस प्रकार अन्धे के हाथों में कभी किसी समय भाग्योदय से बटेर पक्षी अचानक आ जाता है परन्तु उसका मिलना सदा व निश्चित नहीं है। अथवा जिस प्रकार ताड़वृक्ष के नीचे से उड़कर जानेवाले कौए के मुख में उसी समय उस वृक्ष से गिरने वाले ताड़फल का प्राप्त होना, कभी उसके भाग्योदय से हो जाता है, परन्तु सार्वकालिक व निश्चित नहीं है, उसी प्रकार राजा को भी भाग्योदय से, मूर्ख मन्त्री की मंत्रणा से कार्यसिद्धि हो जाती है, परन्तु वह सदा और निश्चित नहीं होती।
स घुणाक्षरन्यायो यन्मूर्खेषु मंत्रपरिज्ञानम् ॥९३॥
अर्थ: मूर्ख मनुष्य को मंत्रणा का ज्ञान घुणाक्षरन्याय के समान कदाचित् हो जाता है, परन्तु निश्चित नहीं है।
अनालोकं लोचनमिवाशास्त्रं मनः कियत् पश्येत् ॥९४॥
अर्थ: शास्त्रज्ञान से शून्य जड़ात्मक मन ज्योति-रहित नेत्र के समान कितना कर्त्तव्य-बोध कर सकता है ? नहीं कर सकता। सारांश यह है कि जिस प्रकार अन्धा पुरुष ज्योति-हीन नेत्रों के द्वारा घट-पटादि पदार्थों को नहीं देख सकता, उसी प्रकार जिस मनुष्य का मन शास्त्र ज्ञान के संस्कार से शून्य है, वह भी समुचित कर्तव्य का निश्चय नहीं कर सकता॥९४॥
स्वामिप्रसादः सम्पदं जनयति न पुनराभिजात्यं पांडित्यं वा ॥९५॥
अर्थ: स्वामी की प्रसन्नता सम्पत्ति को पैदा करती है, कुलीनता व विद्वत्ता नहीं। अर्थात्-आश्रित मनुष्य कितना ही विद्वान् और उच्च कुल का क्यों न हो, परन्तु यदि उससे उसका स्वामी प्रसन्न नहीं है, तो उसे कदाऽपि धन प्राप्त नहीं हो सकता ॥९५॥
हरकण्ठलग्नोऽपि कालकूटः काल एव॥९६॥
अर्थ: शिवजी के श्वेत कण्ठ में लगा हुआ भी विष, विष ही है अर्थात् वह अपने नाशकारक स्वभाव को नहीं छोड़ सकता अथवा कृष्ण से श्वेत नहीं हो सकता। सारांश यह है कि जिस प्रकार विष शिवजी के अत्यन्त श्वेत कंठ के आश्रय से अपने प्राण-घातक स्वभाव को नहीं छोड़ सकता, उसी प्रकार वज्रमूर्ख मनुष्य भी राज-मंत्री आदि ऊँचे पदों पर अधिष्ठित होने पर भी अपने मूर्खता-पूर्ण स्वभाव को नहीं छोड़ सकता॥ ६६॥
स्ववधाय कृत्योत्थापनमिव मूर्खेषु राज्येभारारोपणम् ॥९७॥
अर्थ: जो राजा मूर्ख मंत्रियों को राज्य-भार समर्पण करता है, वह अपने नाश के लिए की गई मंत्रसिद्धि के समान अपना नाशकर डालता है। सारांश यह है कि जिस प्रकार कोई मनुष्य अपने शत्रु-वध करने के उद्देश्य से मंत्रविशेष सिद्ध करता है, उसके सिद्ध हो जाने पर शत्रु-वध करने के लिए एक पिशाच प्रगट होता है, परन्तु यदि शत्रु, जप, होम और दानादि करने से विशेष बलवान् होता है, तब वह पिशाच शत्रु को न मारकर उल्टा मंत्रसिद्धि करने वाले को मार डालता है, उसी प्रकार राजा भी मूर्ख मंत्री को राज्यभार सौंपने से अपना नाश कर डालता है॥९७॥
अकार्यवेदिनः किं बहुना शास्त्रेण ॥९८॥
अर्थ: जो मनुष्य कर्त्तव्य (हित-प्राप्ति व अहित-परिहार) को नहीं जानता-चतुर नहीं है, उसका बहुत शास्त्रों का अभ्यास व्यर्थ है ॥९८॥
गुणहीनं धनुः पिंजनादपि कष्टम् ॥९९॥
अर्थ: जिस प्रकार डोरी-शून्य धनुष को शत्रु पर प्रहार करने के लिए चढ़ाना व्यर्थ है, उसी प्रकार जो मनुष्य नैतिकज्ञान, सदाचार और वीरता-प्रभृति गुणों से शून्य (मूर्ख) है, उसको केवल श्वांस लेने मात्र से क्या लाभ है ? कोई लाभ नहीं-उसका जन्म निरर्थक है ॥६६॥
चक्षुष इव मंत्रिणोऽपि यथार्थदर्शनमेवात्मगौरवहेतुः ॥१००॥
अर्थ: जिस प्रकार नेत्र की सूक्ष्मदृष्टि उसके महत्त्व-प्रशंसा का कारण होती है, उसी प्रकार राज-मंत्री की भी यथार्थदृष्टि (सन्धि-विग्रह-आदि कार्य-साधक मंत्र का यथार्थज्ञान) उसको राजा द्वारा गौरव प्राप्त करने में कारण होती है ॥१००॥
शस्त्राधिकारिणो न मंत्राधिकारिणः स्युः ॥१०१॥
अर्थ: शस्त्र-संचालन करने वाले-केवल वीरता प्रकट करने वाले-क्षत्रिय लोग मंत्रणा करने के पात्र नहीं हैं ॥१०१॥
क्षत्रियस्य परिहरतोऽप्यायात्युपरि भंडनं ॥१०२॥
अर्थ: क्षत्रिय को रोकने पर भी केवल कलह करना ही सूझता है, अतः उसे मंत्री नहीं बनाना चाहिए ॥१०२॥
शस्त्रोपजीविनां कलहमन्तरेण भक्तमपि भुक्तं न जीर्यति ॥१०३॥
अर्थ: शस्त्रों से जीविका करने वाले (क्षत्रियों) को लड़ाई किये बिना खाया हुआ भोजन भी नहीं पचता; अतः क्षत्रिय लोग मंत्री पद के योग्य नहीं ॥१०३॥
मंत्राधिकारः स्वामिप्रसादः शस्त्रोपजीवनं चेत्येकैकमपि पुरुषमुत्सेकयति किं
पुनर्न समुदायः ॥१०४॥
अर्थ: मंत्री-पद की प्राप्ति, राजा की प्रसन्नता व शस्त्रों से जीविका करना (क्षत्रियपन) इनमें से प्राप्त हुई एक-एक वस्तु भी मनुष्य को उन्मत्त-अभिमानी बना देती है, पुनः क्या उक्त तीनों वस्तुओं का समुदाय उन्मत्त नहीं बनाता ? अवश्य बनाता है ॥१०४॥
नालम्पटोऽधिकारी ॥१०५॥
अर्थ: जो मनुष्य निःस्पृह (धनादि की चाह नहीं रखने वाला) होता है, वह अधिकारी (मंत्री-आदि कर्मचारी) नहीं हो सकता। सारांश यह है कि अमात्य-आदि कर्मचारी अवश्य धनादि की लालसा रखेगा ॥१०५॥
मन्त्रिणोऽर्थग्रहणलालसायां मतौ न राज्ञः कार्यमर्थो वा ॥१०६॥
अर्थ: जिसके मंत्री की बुद्धि धन-ग्रहण करने में लम्पट-आसक्त होती है, उस राजा का न तो कोई कार्य ही सिद्ध होता है और न उसके पास धन ही रह सकता है ॥१०६॥
वरणार्थं प्रेषित इव यदि कन्यां परिणयति तदा वरयितुस्तप एव शरणम् ॥१०७॥
अर्थ: जब कोई मनुष्य किसी की कन्या के साथ विवाह करने के उद्देश्य से कन्या को देखने के लिए अपने संबंधी (मामा, बंधु, चाचा और दूत-आदि) को भेजता है और वह वहाँ जाकर स्वयं उस कन्या के साथ यदि अपना विवाह कर लेता है, तो विवाह के इच्छुक उस भेजने वाले को तपश्चर्या करनी ही श्रेष्ठ है; क्योंकि स्त्री के बिना तप करना उचित है। प्रकरण में उसी प्रकार जिस राजा का मंत्री धन-लम्पट है, उसे भी अपना राज्य छोड़कर तपश्चर्या करना श्रेष्ठ है; क्योंकि धन के बिना राज्य नहीं चल सकता और धन की प्राप्ति मंत्री-आदि की सहकारिता से होती है ॥१०७॥
स्थाल्येव भक्तं चेत् स्वयमश्नाति कुतो भोक्तुर्भुक्तिः ॥१०८॥
अर्थ: यदि थाली अन्न-आदि भोजन को स्वयं खा जावे, तो खाने वाले को भोजन किस प्रकार मिल सकता है ? नहीं मिल सकता । उसी प्रकार यदि मंत्री राज्य-द्रव्य को स्वयं हड़प करने लगे तो फिर राज्य किस प्रकार चल सकता है ? नहीं चल सकता ॥१०८॥
तावत् सर्वोऽपि शुचिर्निःस्पृहो यावन्न परवरस्त्रीदर्शनमर्थागमो वा ॥१०९॥
अर्थ: तब तक सभी मनुष्य पवित्र और निर्लोभी रहते हैं, जब तक कि उन्होंने दूसरों की उत्कृष्ट और कमनीय कान्ताओं (स्त्रियों) व धन-प्राप्ति को नहीं देखा ॥१०६॥
अदुष्टस्य हि दूषणं सुप्तव्यालप्रबोधनमिव ॥११०॥
अर्थ: निर्दोषी पुरुष को दूषण लगाना, सोते हुए सर्प या व्याघ्र को जगाने के समान हानिकारक है अर्थात् जिस प्रकार सोते हुए सर्प या व्याघ्र को जगाने से जगाने वाले की मृत्यु होती है, उसी प्रकार निर्दोषी को दूषण लगाने में मनुष्य की हानि होती है; क्योंकि ऐसा करने से निर्दोषी व्यक्ति वैर-विरोध करके उसकी यथाशक्ति हानि करने में प्रयत्नशील रहता है ॥११०॥
येन सह चित्तविनाशोऽभूत्, स सन्निहितो न कर्त्तव्यः ॥१११॥
अर्थ: जिसके व्यवहार से मन फट चुका हो, उसके साथ मित्रता न करनी चाहिए ॥१११॥
सकृद्विघटितं चेतः स्फटिकवलयमिव कः सन्धातुमीश्वरः ॥११२॥
अर्थ: वैर-विरोध के कारण एकबार फटे हुए मन को स्फटिकमणि के कङ्कण समान कौन जोड़ने में समर्थ है ? कोई नहीं ॥११२॥
न महताप्युपकारेण चित्तस्य तथानुरागो यथा विरागो
भवत्यल्पेनाप्यपकारेण ॥११३॥
अर्थ: महान् उपकार से भी मन में उतना अधिक स्नेह उपकारी के प्रति नहीं होता, जितना अधिक मन थोड़ा-सा अपकार (द्रोह-आदि) करने से फट जाता है ॥११३॥
सूचीमुखसर्पवन्नपकृत्य विरमन्त्यपराद्धाः ॥११४॥
अर्थ: शत्रु लोग दृष्टि-विष वाले सर्प की तरह अपकार किये बिना विश्राम नहीं लेते ॥११४॥
अतिवृद्धः कामस्तन्नास्ति यन्न करोति ॥११५॥
अर्थ: कामी पुरुष अत्यन्त बढ़ी हुई कामवासना के कारण संसार में ऐसा कोई अकार्य नहीं, जिसे नहीं करता अर्थात् सभी प्रकार के निंदनीय व घृणित कार्य करता है ॥११५॥
श्रूयते हि किल कामपरवशः प्रजापतिरात्मदु हितरि, हरिर्गोपवधूषु, हरः
शान्तनुकलत्रेषु, सुरपतिर्गौतमभार्यायां, चन्द्रश्च वृहस्पतिपत्न्यां
मनश्चकरोति ॥११६॥
अर्थ: पुराणों में प्रसिद्ध है कि ब्रह्माजी काम के वशीभूत होकर अपनी सरस्वती नाम की पुत्री में, कृष्ण ग्वालों की स्त्रियों में, शिवजी गंगा नाम की शान्तनु की स्त्री में, इन्द्र गौतम की स्त्री अहिल्या में, तारानाम की बृहस्पति की स्त्री में आसक्त हुए१ ॥१९६॥
अर्थेषूपभोगरहितास्तर वोऽपि साभिलाषाः किं पुनर्मनुष्याः ॥११७॥
अर्थ: जब कि वृक्ष अपने धन-पुष्प-फलादि-का उपभोग नहीं करते, तथापि वे भी धन के इच्छुक होते हैं अर्थात् स्वयं पुष्प व फलशाली होने की इच्छा रखते हैं, पुनः धन का उपभोग करने वाले मनुष्यों का तो कहना ही क्या है ? वे तो अवश्य धन के इच्छुक होते हैं, क्योंकि उन्हें उसका उपभोग (शरीर-यात्रादि) करना पड़ता है ॥१९७॥
कस्य न धनलाभाल्लोभः प्रवर्तते ॥११८॥
अर्थ: संसार में धन मिलने से कि से उस का लोभ नहीं होता ? सभी को होता है ॥१९८॥
स खलु प्रत्यक्षं दैवं यस्य परस्वेष्विव परस्त्रीषु निःस्पृहं चेतः ॥११९॥
अर्थ: जिस मनुष्य की चित्तवृत्ति अन्य-धन के समान पर-स्त्रियों के देखने पर भी लालसा-रहित है, वह प्रत्यक्ष देवता है मनुष्य नहीं, क्योंकि उसने असाधारण धर्म (परस्त्री, परधन का त्यागरूप) का अनुष्ठान किया ॥१९९॥
समायव्ययः कार्यारम्भो राभसिकानाम् ॥१२०॥
अर्थ: संतोषी पुरुष जो कार्य आरम्भ करते हैं, उसमें उन्हें आमदनी व खर्च बराबर होता है तथापि सन्तुष्ट रहते हैं ॥१२०॥
बहुक्लेशेनाल्पफलः कार्यारम्भो महामूर्खाणाम् ॥१२१॥
अर्थ: महामूर्ख मनुष्य जो कार्य आरम्भ करते हैं, उसमें उन्हें बहुत कष्ट उठाने पड़ते हैं और फल बहुत थोड़ा मिलता है ॥१२१॥
दोषभयान्न कार्यारम्भः कापुरुषाणाम् ॥१२२॥
अर्थ: कुत्सित-निन्द्य पुरुष दोषों के भय से (इस कार्य के करने में यह दोष है और अमुक कार्य में यह दोष है इत्यादि दोषों के डर से) किसी भी कार्य को शुरू नहीं करते। सारांश यह है कि अधम पुरुष आलसी, उद्यम-हीन व डरपोक होते हैं; इसलिए वे दोषों के डर से कार्यारम्भ नहीं करते ॥१२२॥
मृगाः सन्तीति किं कृषिर्न क्रियते ॥१२३॥
अजीर्णभयात् किं भोजनं परित्यज्यते ॥१२४॥
अर्थ (सूत्र 123 से 124): हिरणों के डर से क्या खेती नहीं की जाती ? अवश्य की जाती है। अजीर्ण के डर से क्या भोजन करना छोड़ दिया जाता है ? नहीं छोड़ा जाता। सारांश यह है कि जिस प्रकार हिरणों के डर से खेती करना नहीं छोड़ा जाता और अजीर्ण के भय से भोजन करना नहीं छोड़ा जाता, उसी प्रकार विघ्नों के डर से सज्जन लोग कर्त्तव्य-पथ को नहीं छोड़ते ॥१२३-१२४॥
स खलु कोऽपीहाभूदस्ति भविष्यति वा यस्य कार्यारम्भेषु प्रत्यवाया न
भवन्ति ॥१२५॥
अर्थ: जिसको कार्यारम्भ में विघ्न नहीं होते, क्या लोक में ऐसा कोई पुरुष हुआ है ? होगा ? या है ? न हुआ, न होगा, न है ॥१२५॥
आत्मसंशयेन कार्यारम्भो व्यालहृदयानाम् ॥१२६॥
अर्थ: सांप व श्वापद (हिंसक जन्तुओं) के समान दुष्ट हृदय-युक्त पुरुष ऐसे निन्द्य कार्य (चोरी वगैरह) प्रारम्भ करते हैं, जिनसे उन्हें अपने नाश की संभावना रहती है ॥१२६॥
दुर्भीरुत्वमासन्नशूरत्वं रिपौ प्रति महापुरुषाणां ॥१२७॥
अर्थ: महापुरुष दूरवर्ती शत्रु से भयभीत होते हैं-उससे युद्ध नहीं करते, परन्तु शत्रु के निकट आ जाने पर अपनी वीरता दिखाते हैं ॥१२७॥
जलवन्मार्दवोपेतः पृथूनपि भूभृतो भिनत्ति ॥१२८॥
अर्थ: जिस प्रकार कोमल जल-प्रवाह विशाल पर्वतों को उखाड़ देता है, उसी प्रकार कोमल राजा भी महाशक्तिशाली शत्रु-राजाओं को नष्ट कर डालता है ॥१२८॥
प्रियंवदः शिखीव सर्पदानपि द्विषत्सर्पानुत्सादयति ॥१२९॥
अर्थ: प्रियवादी पुरुष मोर के समान अभिमानी शत्रुरूपी सर्पों को नष्ट कर देता है ॥१२९॥
नाविज्ञाय परेषामर्थमनर्थं वा स्वहृदयं प्रकाशयन्ति महानुभावाः ॥१३०॥
अर्थ: उत्तम पुरुष दूसरों के हृदय की अच्छी या बुरी बात जान करके ही अपने मन की बात प्रगट करते हैं ॥१३०॥
क्षीरवृक्षवत् फलसम्पादनमेव महतामालापः ॥१३१॥
अर्थ: महापुरुषों के वचन दूध वाले वृक्ष की तरह फलदायक होते हैं। अर्थात् जिस प्रकार दूध वाले वृक्ष उत्तम मिष्ट फल देते हैं, उसी प्रकार सज्जन पुरुषों के वचन भी उत्तम-उत्तम फलदायक (ऐहिक और पारत्रिक कल्याण देने वाले) होते हैं ॥१३१॥‘’
दुरारोहपादप इव दंडाभियोगेन फलप्रदो भवति नीचप्रकृतिः ॥१३२॥
अर्थ: जिस प्रकार अधिक ऊँचाई व कंटक-आदि के कारण चढ़ने के अयोग्य वृक्ष (आम-आदि) लाठी आदि के प्रहारों से ताड़ित किये जाने पर फलदायक होते हैं, उसी प्रकार नीच प्रकृति का मनुष्य भी दंडित किये जाने पर काबू में आता है साम-दाम से नहीं ॥१३२॥
स महान् यो विपत्सु धैर्यमवलम्बते ॥१३३॥
अर्थ: जो आपत्ति में धैर्य, धारण करता है वही महापुरुष है ॥१३३॥
उत्तापक्त्वं हि सर्वकार्येषु सिद्धीनां प्रथमोऽन्तरायः ॥१३४॥
अर्थ: अधीरता (घबड़ाना-व्याकुल होना) मनुष्य की समस्त कार्य-सिद्धि में अत्यन्त बाधक है अर्थात्-जो मनुष्य कर्त्तव्य करते समय व्याकुल हो जाता है, उसका कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता; अतः कर्त्तव्य में उतावली करना उचित नहीं ॥१३४॥
शरद् घना इव न खलु वृथालापा गलगर्जितं कुर्वन्ति सत्कुलजाताः ॥१३५॥
अर्थ: कुलीन पुरुष शरदकालीन बादलों की तरह व्यर्थ बकवाद करने वाले और गरजने वाले नहीं होते। अर्थात्-जिस प्रकार शरदकाल के बादल केवल गरजते हैं बरसते नहीं, उसी प्रकार कुलीन उत्तम पुरुष व्यर्थ नहीं बोलते किन्तु अच्छे-अच्छे पुण्य व यशस्वी कार्य करके दिखाते हैं ॥१३५॥
न स्वभावेन किमपि वस्तु सुन्दरमसुन्दरं वा, किन्तु यदेव यस्य प्रकृतितो भाति
तदेव तस्य सुन्दरम् ॥१३६॥
अर्थ: अच्छापन व बुरापन केवल पुरुषों की कल्पनामात्र है; क्योंकि संसार में कोई वस्तु अच्छी और बुरी नहीं है, किन्तु जो जिस की प्रकृति-अनुकूल होने से रुचती है, वह उसकी अपेक्षा सुन्दर है यदि वह निकृष्ट ही क्यों न हो ॥१३६॥
न तथा कर्पूररेणुना प्रीतिः केतकीनां वा, यथाऽमेध्येन ॥१३७॥
अर्थ: मक्खियों को जिस प्रकार मल-मूत्र से प्रीति होती है, वैसी कपूर-धूलि व केतकी पुष्पों से नहीं होती ॥१३७॥
अतिक्रोधनस्य प्रभुत्त्वमग्नौ पतितं लवणमिव शतधा विशीर्यते ॥१३८॥
अर्थ: अत्यन्त क्रोध करने वाले मनुष्य का ऐश्वर्य अग्नि में पड़े हुए नमक के समान सैकड़ों प्रकार से नष्ट हो जाता है ॥१३८॥
सर्वान् गुणान् निहन्त्यनुचितज्ञः ॥१३९॥
अर्थ: योग्य-अयोग्य के विचार से शून्य पुरुष अपने समस्त ज्ञानादि गुणों को नष्ट कर देता है ॥१३९॥
परस्परं मर्मकथनयात्मविक्रम एव ॥१४०॥
अर्थ: जो पुरुष परस्पर की गुप्त बात कहते हैं, वे अपना-अपना पराक्रम ही दिखाते हैं। सारांश यह है कि जिस की गुप्त बात प्रकट की जाती है, वह भी ऐसा ही करने को तत्पर हो जाता है; अतएव वे दोनों दूसरों के समक्ष अपना पराक्रम दिखाकर अपनी हानि करते हैं ॥१४०॥
तदजाकृपाणीयं यः परेषु विश्वासः ॥१४१॥
अर्थ: शत्रुओं पर विश्वास करना ‘अजाकृपाणीय१ न्याय के समान घातक है ॥१४१॥
क्षणिकचित्तः किंचिदपि न साधयति३ ॥१४२॥
अर्थ: जिसका चित्त चंचल है वह किसी भी कार्य को सिद्ध नहीं कर सकता ॥१४२॥
स्वतंत्रः सहसाकारित्वात् सर्वं विनाशयति ॥१४३॥
अर्थ: जो राजा स्वतन्त्र होता है-राजकीय कार्यों में मंत्री आदि की योग्य सलाह नहीं मानता-वह बिना सोचे-समझे अनेक कार्यों को एक ही काल में आरम्भ करने के कारण अपने समस्त राज्य को नष्ट कर डालता है ॥१४३॥ और स्वयं राजकीय कार्य करता रहता है, इसलिए वह निश्चय से अपने राज्य को नष्ट कर देता है ॥१॥”
अलसः सर्वकर्मणामनधिकारी ॥१४४॥
अर्थ: आलसी पुरुष समस्त राजकीय-आदि कार्यों के अयोग्य होता है ॥१४४॥ राजपुत्र२ विद्वान् ने कहा है कि “जो राजा छोटे-छोटे कार्यों में भी आलसी अधिकारियों-मंत्री-आदि को नियुक्त करता है उसके समस्त कार्य सिद्ध नहीं होते ॥१॥”
प्रमादवान् भवत्यवश्यं विद्विषां वशः ॥१४५॥
अर्थ: जो मनुष्य कर्त्तव्य-पालन में सावधान वा उत्साही नहीं है, वह शत्रुओं के वश हो जाता है ॥१४५॥ जैमिनि३ विद्वान् ने भी कहा है कि “जो राजा छोटे-छोटे कार्यों में भी शिथिलता करता है, वह महान् ऐश्वर्य-युक्त हो करके भी शत्रुओं के अधीन हो जाता है ॥१॥”
कमप्यात्मनोऽनुकूलं प्रतिकूलं न कुर्यात् ॥१४६॥
अर्थ: नैतिक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि किसी भी अनुकूल-मित्र को शत्रु न बनाये ॥१४६॥ राजपुत्र४ विद्वान् ने भी कहा है कि “जो राजा मित्र को शत्रु बनाता है, उसे इस मूर्खता के कारण अपने कष्ट व अपकीर्ति उठानी पड़ती है ॥१॥”
प्राणादपि प्रत्यवायो रक्षितव्यः १ ॥१४७॥
अर्थ: मनुष्य को प्राणों से भी अधिक अपने गुप्त रहस्य की रक्षा करनी चाहिए ॥१४७॥ भागुरि५ विद्वान् ने कहा है कि “राजा को अपने जीवन से भी अधिक अपने गुप्त रहस्य सुरक्षित रखने चाहिए, क्योंकि शत्रुओं को मालूम हो जाने पर वे लोग प्रविष्ट होकर उसे मार डालते हैं ॥१॥”
आत्मशक्तिमजानतो विग्रहः क्षयकाले कीटिकानां पक्षोत्थानमिव ॥१४८॥
अर्थ: जो राजा अपनी सैनिक व कोष-शक्ति को न जानकर बलवान् शत्रु के साथ युद्ध करता है, वह विनाशकाल में पतङ्गों के पङ्ख उठाने की तरह अपना नाश कर डालता है। सारांश यह है कि जब पतङ्गों का विनाशकाल आता है-जब वे दीपक की लौ में जल-भुनकर मरने लगते हैं-उस समय अपने पंख उठाते हैं, उसी प्रकार राजा का जब विनाश काल आता है, उस समय उसकी बुद्धि बलवान् शत्रु के साथ युद्ध करने तत्पर होती है ॥१४८॥
कालमलभमानोऽपकर्तरि साधु वर्तेत ॥१४९॥
अर्थ: विजिगीषु को जब तक अनुकूल समय प्राप्त न हो, तब तक उसे शत्रु के साथ शिष्टता का व्यवहार करना चाहिए-उस से मैत्री कर लेनी चाहिए। सारांश यह है कि विजिगीषु को हीन शक्ति के साथ युद्ध और विशिष्ट शक्तियुक्त के साथ सन्धि करनी चाहिए ॥१४९॥
किन्तु खलु लोको न वहति मूर्ध्ना दग्धुमिन्धनं ॥१५०॥
अर्थ: मनुष्य ईंधन को आग में जलाने के उद्देश्य से क्या शिर पर धारण नहीं करते ? अवश्य करते हैं। सारांश यह है कि जलाने-योग्य ईंधन को शिर-वहन के समान पूर्व में शत्रु से शिष्ट व्यवहार करना चाहिए, पश्चात् अवसर पाकर शक्ति-संचय होने पर उस से युद्ध करना चाहिए ॥१५०॥ पश्चात् शक्ति-संचय करके उसका वध करना चाहिए ॥१॥‘’
नदीरयस्तरूणामंघ्रीन् क्षालयन्नप्युन्मूलयति ॥१५१॥
अर्थ: नदी का वेग (प्रवाह) अपने तट के वृक्षों के चरण-जड़ें-प्रक्षालन करता हुआ भी उन्हें जड़ से उखाड़ देता है। सारांश यह है कि उसी प्रकार विजिगीषु का कर्त्तव्य है कि वह शत्रु के साथ पूर्व में शिष्ट व्यवहार करके पश्चात् उसके उन्मूलन में प्रवृत्ति करे ॥१५१॥‘’ शुक्र विद्वान् ने भी कहा है कि- “जिस प्रकार नदी का वेग-प्रवाह-तटवर्ती वृक्षों के पाद-जड़ें धोता हुआ भी उन का उन्मूलन करता है, उसी प्रकार बुद्धिमानों को पहले शत्रुओं को सम्मानित करके पश्चात् वध करना चाहिए ॥१॥‘’
उत्सेको हस्तगतमपि कार्यं विनाशयति ॥१५२॥
अर्थ: अभिमानी पुरुष अपने हाथ में आये हुए कार्य-सन्धि-आदि द्वारा होने वाले अर्थ-लाभादि प्रयोजन-को नष्ट कर डालता है ॥१५२॥ शुक्र विद्वान् ने भी कहा है कि -“विजिगीषु को शत्रु से प्रिय वचन बोलना चाहिए और बिलाव की तरह चेष्टा करनी चाहिए परन्तु जब शत्रु इस के ऊपर विश्वास करने लगे, तब जिस प्रकार बिलाव मौका पाकर चूहे का हनन कर देता है, उसी प्रकार इसे भी उसका हनन कर देना चाहिए ॥१॥‘’
नाल्पं महद्वापक्षेपोपायज्ञस्य ॥१५३॥
अर्थ: शत्रुविनाश के उपाय-सन्धि-विग्रहादि-जानने वाले विजिगीषु के सामने न हीनशक्ति शत्रु ठहर सकता है और न महाशक्तिशाली ॥१५३॥ शुक्र विद्वान् ने भी कहा है कि-“जो राजा शत्रु-वध के उपाय भलीभाँति जानता है, उसके सामने महान्-प्रचुर सैनिक शक्ति-सम्पन्न-शत्रु नहीं ठहर सकता। पुनः हीन शक्ति वाला किस प्रकार ठहर सकता है ? नहीं ठहर सकता ॥१॥‘’
नदीपूरः सममेवोन्मूलयति [तीरजत्तृणांघ्रिपान्] ॥१५४॥
अर्थ: जिस प्रकार नदी का पूर तटवर्ती तृण व वृक्षों को एक साथ उखाड़ कर फेंक देता है, उसी प्रकार शत्रु-विनाश के उपायों को जानने वाला विजिगीषु भी अनेक सफल-अव्यर्थ-उपायों से महाशक्तिशाली व हीनशक्ति-युक्त शत्रुओं को परास्त कर देता है ॥१५४॥
युक्तमुक्तं वचो बालादपि गृह्णीयात् ॥१५५॥
अर्थ: नैतिक मनुष्य को न्याय-युक्त योग्य वचन बच्चे से भी ग्रहण कर लेना चाहिए ॥१५५॥
रवेरविषये किं न दीपः प्रकाशयति ॥१५६॥
अर्थ: जहाँ पर सूर्य-प्रकाश नहीं है, वहाँ क्या दीपक पदार्थों को प्रकाशित नहीं करता ? अवश्य करता है। उसी प्रकार ज्ञान-वृद्धों के अभाव में बालक या मूर्ख पुरुष भी न्याय-युक्त बात बोल सकता है, अतः उसकी कही हुई युक्ति-युक्त बात शिष्ट पुरुषों को अवश्य मान लेनी चाहिए ॥१५६॥
अल्पमपि वातायनविवरं बहूनुपलम्भयति ॥१५७॥
अर्थ: जिस प्रकार झरोखा-रोशनदान-छोटा होने पर भी गृहवर्ती बहुत से पदार्थों को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार बालक या अज्ञ भी नैतिक बात कह सकता है, अतः शिष्यों को उसकी नीति-पूर्ण बात स्वीकार करनी चाहिए ॥१५७॥
पतिंवरा इव परार्थाः खलु वाचस्ताश्च निरर्थकं प्रकाश्यमानाः शपयन्त्यवश्यं
जनयितारं ॥१५८॥
अर्थ: जिस प्रकार अपनी इच्छानुकूल पति को चुनने वाली कन्याएँ दूसरों को दी जाने पर (पिता द्वारा उनकी इच्छा-विरुद्ध दूसरों के साथ विवाही जाने पर) पिता को तिरस्कृत करती हैं या उसकी हँसी कराती हैं, उसी प्रकार श्रोताओं की इष्ट प्रयोजन-सिद्धि करने वाली वक्ता की वाणी भी जब निरर्थक कही जाती है, तब वह वक्ता को तिरस्कृत करती है अथवा उसकी हँसी-मजाक कराती है। निष्कर्ष यह है कि नैतिक वक्ता को श्रोताओं के इष्ट प्रयोजन-साधक, तात्त्विक और मधुर वचन बोलना चाहिए एवं उसे निरर्थक वचन कहना छोड़ देना चाहिए, जिस से उसका तिरस्कार और हंसी-मजाक न होने पावे। अथवा जिस प्रकार विवाह योग्य कन्याएँ अपने पति की इष्ट प्रयोजन-सिद्धि करने वाली होती हैं, उसी प्रकार वक्ता की वाणी भी श्रोताओं की इष्ट प्रयोजन-सिद्धि करने वाली होती है परन्तु जब वक्ता नीति-विरुद्ध और निरर्थक वाणी बोलता है, तब उस से उसका तिरस्कार या हँसी-मजाक किया जाता है ॥१५८॥
तत्र युक्तमप्युक्तमयुक्तसमं यो न विशेषज्ञः ॥१५८॥
अर्थ: जो मनुष्य वक्ता के कहे हुए वचनों पर विशेष विचार (इसने अमुक बात मेरे हित की कही है-इत्यादि) नहीं करता-जो मूर्ख है, उसके सामने उचित बात कहना भी अनुचित के समान है, क्योंकि उसका कोई फल नहीं होता। सारांश यह है कि मूर्ख को हितोपदेश देना व्यर्थ है ॥१५६॥
स खलु पिशाचकी वातकी वा यः परोऽनर्थिनि वाचमुदीरयति ॥१६०॥
अर्थ: वह मूर्ख है, क्योंकि वह निःसंदेह जंगल में रोता है ॥१॥’’
विध्यायतः प्रदीपस्येव नयहीनस्य वृद्धिः ॥१६१॥
अर्थ: नीति-विरुद्ध प्रवृत्ति करने वाले पुरुष की बढ़ती तत्काल बुझते हुए दीपक को बढ़ती के समान उसको जड़-मूल से नष्ट करने वाली होती है। अर्थात् जिस प्रकार बुझने वाला दीपक अधिक प्रकाश करके समूल नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार अन्यायी मनुष्य भी अन्याय-संचित धनादि से तत्काल उन्नतिशील-सा मालूम पड़ता है, परन्तु राजदण्ड आदि के खतरे से खाली न होने के कारण अन्त में वह जड़-मूल से नष्ट हो जाता है ॥१६१॥ नारद विद्वान् ने भी कहा है कि ‘‘अन्यायी मनुष्यों की जो चोरी वगैरह अन्याय से बढ़ती होती है उसे बुझने वाले दीपक की बढ़ती के समान विनाश का कारण समझनी चाहिए ॥१॥’’
जीवोत्सर्गः स्वामिपदमभिलषतामेव ॥१६२॥
अर्थ: जो सेवक-अमात्य-आदि-कृतघ्नता के कारण अपने स्वामी के राज्यपद की कामना करते हैं. उन का विनाश-मरण होता है। सारांश यह है कि सेवकों को अपने स्वामी-पद (राज्यपद) की कामना नहीं करनी चाहिए ॥१६२॥
बहुदोषेषु क्षणदुःखप्रदोऽपायोऽनुग्रह एव ॥१६३॥
अर्थ: तीव्रतम अपराधियों का विनाश राजा को क्षणभर के लिए कष्टदायक होता है, परन्तु यह उसका उपकार ही समझना चाहिए, क्योंकि इस से राज्य की श्रीवृद्धि होती है ॥१६३॥ हारीत विद्वान् ने भी कहा है कि ‘‘राजाओं को उन पापियों-अत्यन्त भयानक अपराधियों-को मार देना चाहिए, चाहे वे उनके कुटुम्बी होने के कारण अबध्य-मृत्यु-दंड के अयोग्य भी हों।
स्वामिदोषस्वदोषाभ्यामुपहतवृत्तयः क्रुद्ध-लुब्ध-भीतावमानिताः
कृत्याः ॥१६४॥
अर्थ: मंत्री, अमात्य और सेनाध्यक्ष-आदि राज्याधिकारियों में से राज-दोष (क्रोध व ईर्ष्या-आदि) और स्वयं किये हुए अपराधों के कारण जिनकी जीविका (वेतनादि) नष्ट कर दी गई है, वे क्रोधी, लोभी, भीत और तिरस्कृत होते हैं, उन्हें ‘कृत्या’ के समान महाभयंकर जानना चाहिए। अर्थात् जिस प्रकार जारणमारणादि मंत्रों से अयथाविधि किया हुआ यज्ञ क्षुब्ध (असन्तुष्ट) होने पर यज्ञ करने वाले का घातक होता है, उसी प्रकार पृथक्करण (नौकरी से हटाना) और अपमानादि से क्षुब्ध-असन्तुष्ट हुए राज कर्मचारी भी राजघातक होते हैं। निष्कर्ष यह है कि नीतिज्ञ राजा को उन क्षुब्ध हुए अधिकारी वर्ग से सदा सावधान रहना चाहिए एवं आगे के सूत्र में कहे हुए नैतिक उपायों से उन्हें वश करना चाहिए ॥१६४॥
अनुवृत्तिरभयं त्यागः सत्कृतिश्च कृत्यानां वशोपायाः ॥१६५॥
अर्थ: पूर्वोक्त कृत्या समान राज्य-क्षति करने वाले कारण-वश क्षुब्ध हुए अधिकारियों (मंत्री व सेनाध्यक्ष-आदि) को वश करने के निम्न प्रकार उपाय हैं। १. उनकी इच्छानुकूल प्रवृत्ति करना (यदि वे पुनः अपने पदों पर नियुक्त होना चाहें, तो नियुक्त करना आदि) २. अभयदान (जीविका के बिना दारिद्रयदोष से भयभीतों को पुनःजीविका पर लगाना) ३. त्याग-अभिलषित धन देना और ४. सत्कार-तिरस्कृतों का सम्मान करना।
क्षयलोभविरागकारणानि प्रकृतीनां न कुर्यात् ॥१६६॥
अर्थ: राजा का कर्त्तव्य है कि जिन कारणों से उनकी प्रकृति-मंत्री और सेनापति-आदि राज्य के अङ्ग नष्ट और विरक्त-कर्त्तव्य-च्युत होती हो, उन्हें न करे एवं लोभ के कारणों से पराङ्मुख होकर उदारता से काम लेवें ॥१६६॥
सर्वकोपेभ्यः प्रकृतिकोपो गरीयान् ॥१६७॥
अर्थ: शत्रु-आदि से होने वाले समस्त क्रोधों की अपेक्षा मंत्री व सेनापति-आदि प्रकृति का क्रोध राजा के लिए विशेष कष्टदायक होता है। निष्कर्ष यह है कि राज्यरूपी वृक्ष का मूल अमात्यादि प्रकृति होती है, अतः उसके विरुद्ध होने पर राज्य नष्ट हो जाता है, अतः राजा को उसे सन्तुष्ट रखने में प्रयत्नशील रहना चाहिये ॥१६७॥
अचिकित्स्यदोषदुष्टान् खनिदुर्गसेतुबन्धाकरकर्मान्तरेषु क्लेशयेत् ॥१६८॥
अर्थ: राजा का कर्त्तव्य है कि वह जिन के अपराध कौटुम्बिक-संबंध-आदि के कारण दवाई करने के अयोग्य हैं-दूर नहीं किये जा सकते (जिन्हें वध-बंधनादि द्वारा दंडित नहीं किया जा सकता) ऐसे राजद्रोही महान् अपराधियों को तालाब-खाई खुदवाना, किले में रखकर काम कराना, नदियों के पुल बंधवाना और खानियों से लोहा-प्रभृति धातुएँ निकलवाना-इत्यादि कार्यों में नियुक्त कर क्लेशित करे ॥१६८॥
अपराध्यैरपराधकैश्च सह गोष्ठीं न कुर्यात् ॥१६९॥
अर्थ: राजा को अपराधी व अपराध कराने वालों के साथ कथा-गोष्ठी (वार्तालाप-सहवास) नहीं करनी चाहिए। सारांश यह है कि अपराध करने व कराने वाले (बैरी) उच्छृंखल, छिद्रान्वेषी और भयंकर वैर-विरोध करने वाले होते हैं। अतः राजा को शत्रु-कृत उपद्रवों से बचाव करने के लिए उन के साथ कथा-गोष्ठी करने का निषेध किया गया है ॥१६९॥
ते हि गृहप्रविष्टसर्पवत् सर्वव्यसनानामागमनद्वारं ॥१७०॥
अर्थ: निश्चय से वे लोग-दण्डित व अपराधी पुरुष-गृह में प्रविष्ट हुए सर्प की तरह समस्त आपत्तियों के आने में कारण होते हैं। अर्थात्-जिस प्रकार घर में घुसा हुआ सांप घातक होता है, उसी प्रकार सजा पाये हुए और अपराधी लोग भी वार्तालाप-सहवास को प्राप्त हुए छिद्रान्वेषण द्वारा शत्रुओं से मिल जाते है; अतः राजा को अनेक कष्ट पहुँचाने में समर्थ होने से घातक होते हैं ॥१७०॥
न कस्यापि क्रुद्धस्य पुरतस्तिष्ठेत् ॥१७१॥
अर्थ: नैतिक पुरुष को किसी भी क्रोधी पुरुष के सामने नहीं ठहरना चाहिए। अभिप्राय यह है कि क्रोध से अन्धबुद्धि-युक्त पुरुष जिस किसी (निरपराधी को) भी अपने सामने खड़ा हुआ देखता है, उसे मार डालता है, इसलिए उसके सामने ठहरने का निषेध किया गया है ॥१७१॥
क्रुद्धो हि सर्प इव यमेवाग्रे पश्यति तत्रैव रोषविषमुत्सृजति ॥१७२॥
अर्थ: क्योंकि क्रोधी पुरुष जिस किसी को सामने देखता है, उसी के ऊपर सर्प के समान रोष रूपी जहर फेंक देता है। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार सांप निरपराधी को भी डस लेता है, उसी प्रकार क्रोध से अन्धा पुरुष भी निपराधी को भी मार देता हैं, इसलिए उस के पास नहीं जाना चाहिए ॥१७२॥
अप्रतिविधातुरागमनाद्वरमनगमनम् ॥१७३॥
अर्थ: जो मनुष्य प्रयोजन सिद्ध करने में समर्थ नहीं है, उसका प्रयोजनार्थी के गृह आने की अपेक्षा न आना ही उत्तम है, क्योंकि उसके निरर्थक आने से प्रयोजनार्थी-कार्य-सिद्धि चाहने वाले-का व्यर्थ समय नष्ट होने के शिवाय कोई लाभ नहीं ॥१७३॥