नीतिवाक्यामृत (आचार्य सोमदेवसूरि), हिन्दी अनुवाद सहित | Neetivakyamrit (Acharya Somadeva Suri)

(१८) अमात्य-समुद्देशः

चतुरङ्गेऽस्ति द्यूते नानमात्योऽपि राजा किं पुनरन्यः ॥१॥

अर्थ: जब शतरंज का बादशाह मन्त्री के बिना चतुरङ्ग सेना (शतरंज के हाथी, प्यादे, आदि) सहित होकर भी उसका बादशाह नहीं हो सकता-अर्थात् उस खेल के बादशाह आदि प्रतिद्वन्द्वियों को परास्त कर विजय-श्री प्राप्त नहीं कर सकता, तब क्या पृथिवीपति (राजा) हस्ति, अश्व आदि चतुरङ्ग सैन्ययुक्त होकर के भी बिना मन्त्री के राजा हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता ॥१॥


नैकस्य कार्यसिद्धिरस्ति ॥२॥

नह्येकं चक्रं परिभ्रमति ॥३॥

अर्थ (सूत्र 2 से 3): जिस प्रकार रथ आदि का एक पहिया दूसरे पहिये की सहायता के बिना नहीं घूम सकता, उसी प्रकार अकेला राजा भी मंत्री आदि सहायकों के बिना राजकीय कार्य (सन्धि विग्रह प्रभृति) में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता ॥२-३॥


किमवातः सेन्धनोऽपि वह्निर्ज्वलति ॥४॥

अर्थ: एवं जिस प्रकार अग्नि ईंधन युक्त होने पर भी हवा के बिना प्रज्वलित नहीं हो सकती उसी प्रकार बलिष्ठ व सुयोग्य राजा भी राज्यशासन करने में समर्थ नहीं हो सकता ॥४॥


स्वकर्मोत्कर्षापकर्षयोर्दानमानाभ्यां सहोत्पत्तिविपत्ती येषां तेऽमात्याः ॥५॥

अर्थ: जो राजा द्वारा दिये हुए, दान-सम्मान प्राप्त कर अपने कर्त्तव्य-पालन में उत्साह व आलस्य करने से क्रमशः राजा के साथ सुखी-दुःखी होते हैं, उन्हें ‘अमात्य’ कहते हैं ॥५॥


आयो व्ययः स्वामिरक्षा तन्त्रपोषणं चामात्यानामधिकारः ॥६॥

अर्थ: मन्त्रियों के निम्न प्रकार चार मुख्य कर्त्तव्य हैं। १. आय-सम्पत्ति को उत्पन्न करने वाले उपायों (समुचित टेक्स प्रभृति) का प्रयोग, २. व्यय-स्वामी की आज्ञानुसार आमदनी के अनुकूल प्रजा-संरक्षणार्थ सैनिक विभाग-आदि में उचित खर्च, ३. स्वामी-रक्षा (राजा व उसके कुटुम्ब का संरक्षण), ४. हाथी-घोड़ा प्रभृति चतुरङ्ग सेना का पालन-पोषण ॥६॥


आयव्ययमुखयोर्मुनिकमण्डलुर्निदर्शनम् ॥७॥

अर्थ: सम्पत्ति की आमदनी व खर्च करने में मुनियों का कमण्डलु दृष्टान्त समझना चाहिए। अर्थात् जिस प्रकार मुनिराज का कमण्डलु जल-ग्रहण अधिक परिमाण में व शीघ्रता से करता है, परन्तु उसका खर्च-जल निष्कासन (निकालना) सूक्ष्म नली के अग्रभाग द्वारा धीरे-धीरे करता है, उसी प्रकार नैतिक पुरुष व राज-मन्त्री को क्रमशः व्यापारादि द्वारा और टेक्स द्वारा सम्पत्ति को आमदनी अधिक परिमाण में करते हुए अल्प खर्च करना चाहिए ॥७॥


आयो द्रव्यस्योत्पत्तिमुखम् ॥८॥

यथास्वामिशासनमर्थस्य विनियोगो व्ययः ॥९॥

आयमनालोच्य व्ययमानो वैश्रमणोऽप्यवश्यं श्रमणायते ॥१०॥

राज्ञः शरीरं धर्मः कलत्रं अपत्यानि च स्वामिशब्दार्थः ॥११॥

तन्त्रं चतुरङ्गबलम् ॥१२॥

अर्थ (सूत्र 8 से 12): सम्पत्ति उत्पन्न करने वाले न्यायोचित साधन उपाय कृषि, व्यापार व राज पक्ष में उचित कर-टेक्स लगाना-आदि को ‘आय’ (आमदनी) कहा है ॥८॥ स्वामी की आज्ञानुसार धन खर्च करना "व्यय है। सारांश यह है कि राजनैतिक प्रकरण में मंत्री को राजा की आज्ञापूर्वक राजकोश से सैन्य-रक्षा आदि में धन खर्च करना चाहिए ॥६॥ जो मनुष्य आमदनी को न विचार कर अधिक खर्च करता है, वह कुबेर समान असंख्य धन का स्वामी होकर भी भिक्षुक समान आचरण करता है- दरिद्र हो जाता है, फिर अल्पधनी मनुष्य व राजा का दरिद्र होना तो स्वाभाविक ही है ॥१०॥ राजा का शरीर, धर्म, रानियाँ व राजकुमार इनका स्वामी शब्द से बोध होता है। सारांश यह है कि मंत्री को इन सबकी रक्षा करनी चाहिए क्योंकि इनमें से किसी के साथ वैर विरोध करने से राजा रुष्ट हो जाता है ॥११॥ चतुरङ्ग (हाथी, घोड़े अथवा रोही व पैदल इन चारों अङ्गवाली) सेना को ‘तन्त्र’ कहा है ॥१२॥


तीक्ष्णं बलवत्पक्षमशुचिं व्यसनिनमशुद्धाभिजनमशक्यप्रत्यावर्त्तनमतिव्यय-
शीलमन्य देशायातमतिचिक्कणं चामात्यं न कुर्वीत ॥१३॥


तीक्ष्णोऽभियुक्तो
म्रियते मारयति वा स्वामिनम् ॥१४॥

अर्थ: क्रोधीमंत्री होने से अपराध-वश दण्डित किए जाने पर अपनी क्रूर प्रकृति-वश विचार-शून्य होकर या तो स्वयं अपना या अपने स्वामी का घात कर डालता है ॥१४॥


बलवत्पक्षो नियोगाभियुक्तः कल्लोलइव
समूलं नृपांघ्रिपमुन्मूलयति ॥१५॥

अर्थ: प्रबल पक्ष वाला व्यक्ति मंत्री पद पर नियुक्त हुआ महान् नदी-पूर समान राजारूपी वृक्ष को जड़ से उखाड़ देता है। अर्थात् जिस प्रकार नदी का शक्तिशाली जल-प्रवाह अपने तटवर्ती वृक्षों को जड़ से उखाड़ देता है, उसी प्रकार शक्तिशाली कुटुम्ब-युक्त मंत्री भी राज-रूपी वृक्ष को जड़ से उखाड़कर फेंक देता है ॥१५॥ शुक्र विद्वान् ने भी बलिष्ठ पक्ष वाले मंत्री के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


अल्पायतिर्महाव्ययो भक्षयति राजार्थम् ॥१६॥

अर्थ: जो मंत्री राज कोश में आमदनी कम करता हुआ अधिक खर्च करता है, वह राजकीय मूलधन खा जाता है-नष्ट कर डालता है ॥१६॥ गुरु विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


अल्पायमुखो जनपदपरिग्रहौ पीडयति ॥१७॥

अर्थ: थोड़ी आमदनी करने वाला मंत्री दरिद्रता के कारण देश व राजकुटुम्ब को पीड़ित करता है ॥१७॥ गर्ग विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


नागन्तुकेष्वर्थाधिकारः
प्राणाऽधिकारो वास्ति यतस्ते स्थित्वापि गन्तारोऽपकर्तारो वा ॥१८॥

अर्थ: राजा का कर्त्तव्य है कि वह विदेशी पुरुषों को धन के आय व्यय का अधिकार एवं प्राण-रक्षा करने का अधिकार न देवे। अर्थात् उन्हें अर्थ-सचिव व सेना-सचिव के उत्तर-दायित्व-पूर्ण पदों पर नियुक्त न करे। क्योंकि वे उसके राज्य में कुछ समय ठहर करके भी अपने देश को प्रस्थान कर जाते हैं एवं मौका पाकर राज-द्रोह करने लगते हैं। अतः अर्थसचिव व सेनासचिव अपने देश का योग्य व्यक्ति होना चाहिए ॥१८॥


स्वदेशजेष्वर्थः कूपपतित इव कालान्तरादपि लब्धुं शक्यते ॥१९॥

अर्थ: अपने देशवासी पुरुषों को अर्थ-सचिव आदि पदों पर नियुक्त करने से उनके द्वारा लोभवश ग्रहण किया हुआ धन-कुएं में गिरी हुई धनादि वस्तु के समान कुछ समय के बाद भी मिल सकता है। अर्थात् जिस प्रकार कुएं में गिरी हुई धनादि वस्तु कालान्तर में प्राप्त की जा सकती है, उसी प्रकार अपने देश से अधिकारियों-अर्थ-सचिव आदि द्वारा कारणवश ग्रहण किया हुआ धन भी कालान्तर में मिल सकता है, परन्तु विदेशी अधिकारियों द्वारा गृहीत धन कदापि नहीं मिल सकता, अतः अर्थ-सचिव आदि मंत्री मण्डल अपने देश का ही होना चाहिए ॥१९॥


चिक्कणादर्थलाभः पाषाणाद्वल् कलोत्पाटनमिव ॥२०॥

अर्थ (सूत्र 13 से 20): राजा या प्रजा को निम्न प्रकार दोष-दूषित व्यक्ति के लिए मंत्री पद पर नियुक्त नहीं करना चाहिए। १. अत्यन्त क्रोधी, २. जिसके पक्ष में बहुत से शक्तिशाली पुरुष हों, ३. बाह्य-अभ्यन्तर सम्बन्धी मलिनता से दूषित, ४. व्यसनी-द्यूत-क्रीड़ा मद्यपान आदि व्यसनों से दूषित, ५. नीचकुलवाला, ६. हठी-जो उपदेश द्वारा असत् कार्य करने से न रोका जा सके, ७. आमदनी से भी अधिक खर्च करने वाला, ८. परदेशी और ९. कृपण (लोभी) अभिप्राय यह है कि ये मंत्री में वर्तमान दोष राज्य-क्षति के कारण हैं। क्योंकि क्रोधी पुरुष मंत्री होने से जब कभी अपराधवश दण्डित किया जाता है, तो वह अपनी क्रूर प्रकृति के कारण या तो स्वयं मर जाता है अथवा अपने स्वामी को मार डालता है इसी प्रकार जिसका पक्ष-माता-पिता-आदि बलिष्ठ होता है, वह अपने पक्ष की सहायता से राजा को नष्ट कर देता है। इसी तरह अपवित्र मंत्री प्रभाव-हीन व राजा को अपने स्पर्श से दूषित करता है एवं व्यसनी कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के ज्ञान रहित,नीच कुल का थोड़ा-सा वैभव पाकर मदोन्मत्त, हठी दुराग्रह-वश हितकारक उपदेश की अवहेलना करने वाला, अधिक खर्चीला स्वार्थ-क्षति होने पर राजकीय सम्पत्ति को भी हड़प करने वाला, परदेशी मंत्री प्रजा की भलाई करने में असमर्थ व स्थिरता से अपना कर्त्तव्य पालन न करने वाला एवं लोभी मंत्री भी कर्त्तव्य-पराङ्मुख होता है। अतः उक्त दोष-दूषित पुरुष को मंत्री नहीं बनाना चाहिए ॥१३॥ शुक्र विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


योग्य-अयोग्य अधिकारी, अयोग्यों से हानि, बंधु सम्बन्ध के भेद व लक्षण


सोऽधिकारी यः स्वामिना सति दोषे सुखेन निगृहीतुं शक्यते ॥२१॥

अर्थ: वही व्यक्ति मन्त्री आदि पद के योग्य है, जो अपराध करने पर राजा द्वारा सरलता से दण्डित किया जा सके ॥२१॥ किसी नीतिज्ञ विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


ब्राह्मण-क्षत्रिय-सम्बन्धिनो न कुर्यादधिकारिणः ॥२२॥

ब्राह्मणो जातिवशात्सिद्धमप्यर्थं कृच्छ्रेण प्रयच्छति, न प्रयच्छति वा ॥२३॥

अर्थ (सूत्र 22 से 23): राजा के ब्राह्मण, क्षत्रिय व बन्धु आदि सम्बन्धियों को अमात्य आदि अधिकारी नहीं बनाना चाहिए ॥२२॥ क्योंकि ब्राह्मण अधिकारी होने पर अपनी जाति स्वभाव के कारण ग्रहण किया हुआ धन बड़ी कठिनाई से देता है अथवा नहीं देता ॥२३॥ सारांश यह है कि धन-लम्पटता व कातरता ब्राह्मण जाति का स्वाभाविक दोष है, अतः उससे गृहीत राज-धन की प्राप्ति दुर्लभ है, इसलिए ब्राह्मण अधिकारी पद के योग्य नहीं ॥२३॥


क्षत्रियोऽभियुक्तः खड्गं दर्शयति ॥२४॥

अर्थ: क्षत्रिय अधिकारी विरुद्ध हुआ तलवार दिखलाता है। सारांश यह है कि क्षत्रिय अधिकारी द्वारा ग्रहण किया हुआ धन शस्त्र-प्रहार के बिना नहीं प्राप्त हो सकता, अतएव उसे मंत्री आदि पद पर नियुक्त नहीं करना चाहिए ॥२४॥


सम्बन्धी ज्ञातिभावेनाक्रम्य सामवायिकान् सर्वमप्यर्थं ग्रसते ॥२५॥

अर्थ: जब राजा द्वारा अपना कुटुम्बी या सहपाठी बन्धु आदि मंत्री आदि अधिकारी बनाया जाता है, तो वह “मैं राजा का बन्धु हूँ” इस गर्व से दूसरे अधिकारियों को तुच्छ समझ कर स्वयं समस्त राजकीय धन हड़प कर लेता है अर्थात् सब अधिकारियों को तिरस्कृत करके स्वयं अत्यन्त प्रबल शक्तिशाली हो जाता है ॥२५॥


सम्बन्धस्त्रिविधः श्रौतो मौख्यो यौनश्च ॥२६॥

अर्थ: बन्धु तीन प्रकार के हैं-(१) श्रौत, (२) मौख्य और (३) यौन ॥२६॥


सहदीक्षितः सहाध्यायी वा श्रौतः ॥२७॥

मुखेन परिज्ञातो मौख्यः ॥२८॥

यौनेर्जातो यौनः ॥२९॥

अर्थ (सूत्र 27 से 29): जो राजा की राज्य-लक्ष्मी सम्बन्धी दीक्षा के साथ ही अमात्य-पद की दीक्षा से दीक्षित हुआ हो। अर्थात् जिस प्रकार राजा का राज्य-लक्ष्मी वंश परम्परा से-पिता व पितामह के राजा होने से प्राप्त हुई है, उसी प्रकार जिसे अमात्य पद भी वंश परम्परा से प्राप्त हुआ हो अर्थात् जिसके पितामह व पिता भी इसी वंश में पहले अमात्य पद पर आसीन हो चुके हों, पश्चात् इसे भी कुल क्रम-वंशपरम्परा से अमात्य पदवी प्राप्त हुई हो, उसे अथवा राजा के सहपाठी को श्रौत बन्धु कहते हैं ॥२७॥ जो मौखिक वार्तालाप व सहवास आदि के कारण राजा का मित्र रह चुका है, वह ‘मौख्य’ है ॥२८॥ राजा के भाई व चाचा वगैरह ‘यौन’ बन्धु हैं ॥२९॥


वाचिकसम्बन्धे नास्ति सम्बन्धन्तरानुवृत्तिः ॥३०॥

अर्थ: सकती, अतः मित्र को भी मंत्री पद पर नियुक्त नहीं करना चाहिए॥ ३०॥


न तं कमप्यधिकुर्यात् सत्यपराधे यमुपहत्यानुशयीत ॥३१॥

अर्थ: राजा पूर्वोक्त तीनों प्रकार के बन्धुओं में से किसी बन्धु की अथवा ऐसे किसी पुरुष को अर्थ-मंत्री आदि अधिकारी-पद पर नियुक्त न करे, जिसे अपराध-वश कड़ी सजा देने पर पश्चाताप करना पड़े ॥३१॥


मान्योऽधिकारी राजाज्ञामवज्ञाय निरवग्रहश्चरति ॥३२॥

अर्थ: राजा को पूज्य पुरुष के लिए अधिकारी नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि वह अपने को राजा द्वारा पूज्य समझकर निडर व उच्छृङ्खल होता हुआ राजा की आज्ञा उल्लंघन करता है व राजकीय-धन का अपहरण आदि मनमानी प्रवृत्ति करता है, जिससे राजकीय अर्थ-क्षति होती है ॥३२॥


चिरसेवको नियोगी नापराधेष्वाशङ्कते ॥३३॥

अर्थ: चिरकालीन-पुराना-सेवक अधि नियुक्त हुआ अति परिचय के कारण चोरी-आदि अपराध कर लेने पर भी निडर रहता है; अतः राजा पुराने सेवक को अधिकारी न बनाये ॥३३॥


उपकर्तारमधिकृत्य उपकारमेव ध्वजीकृत्य सर्वमवलुम्पति ॥३४॥

अर्थ: जो राजा अपने उपकारी पुरुष को अधिकारी पद पर नियुक्त करता है, तो वह (अधिकारी) पूर्व कृत उपकार राजा के समक्ष प्रकट करके समस्त राजकीय धन हड़प कर जाता है, अतः उपकारी को अधिकारी नहीं बनाना चाहिए॥ ३४॥


सहपांशुक्रीडितोऽमात्योऽतिपरिचयात् स्वयमेव राजायते ॥३५॥

अर्थ: राजा ऐसे बाल मित्र व्यक्ति को अर्थ-सचिव आदि अधिकारी न बनाये, जो कि बाल्यकाल में उसके साथ धूलि में खेल चुका हो; क्योंकि वह अति-परिचय के कारण अभिमान-वश अपने को राजा समान समझता है॥ ३५॥


अन्तर्दुष्टो नियुक्तः सर्वमनर्थमुत्पादयति ॥३६॥

अर्थ: क्रूर हृदय वाला पुरुष अधिकारी बनकर समस्त अनर्थ उत्पन्न करता है ॥३६॥


शकुनि-शकटालौ वात्र दृष्टान्तौ ॥३७॥

अर्थ: राज-द्वेषी क्रूर हृदय वाले पुरुष को मंत्री बनाने से जो हानि होती है उसके समर्थक शकुनि दुर्योधन का मामा जिसे उसने कौरवों का राज-मंत्री बनाया था) और शकटाल (नन्द राजा का मंत्री) ये दो ऐतिहासिक उदाहरण जानने चाहिए अर्थात् उक्त दोनों दुष्ट हृदय वाले मंत्रियों ने अपने-अपने स्वामियों से द्वेष कर राज्य में अनेक अनर्थ उत्पन्न किये, जिसके फलस्वरूप राज्य-क्षति हुई ॥३७॥


सुहृदि नियोगिन्यवश्यं भवति धनमित्रनाशः ॥३८॥

अर्थ: मित्र को अमात्य आदि अधिकारी बनाने से राजकीय-धन व मित्रता की क्षति होती है। अर्थात् मित्र अधिकारी राजा को अपना मित्र समझकर निर्भयता-पूर्वक उच्छृंखल होकर उसका धन खा लेता है, जिससे राजा उसका वध कर डालता है, इस प्रकार मित्र को अधिकारी बनाने से राजकीय धन व मित्रता दोनों को नाश होता है, अतः मित्र को अधिकारी नहीं बनाना चाहिए ॥३८॥


मूर्खस्य नियोगे भर्तुर्धर्मार्थयशसां संदेहो निश्चितौ चानर्थ-नरकपातौ ॥३९॥

अर्थ: मूर्ख को मन्त्री-आदि का अधिकार देने से स्वामी को धर्म, धन व यश प्राप्ति कठिनाई से होती है अथवा निश्चित नहीं होती। क्योंकि मूर्ख अधिकारी से स्वामी को धर्म का निश्चय नहीं होता और न धन प्राप्ति होती है एवं यश-प्राप्ति भी नहीं होती। परन्तु दो बातें निश्चित होती हैं, (१) स्वामी को आपत्ति में फंसना और (२) उसे नरक ले जाना। अर्थात् मूर्ख अधिकारी ऐसे दुष्कृत्य कर बैठता है, जिससे उसका स्वामी आपद्ग्रस्त हो जाता है एवं ऐसे दुष्कर्म कर डालता है, जिससे प्रजा पीड़ित होती है, जिसके फलस्वरूप स्वामी नरक जाता है ॥३९॥


सोऽधिकारी चिरं नन्दति स्वामिप्रसादो नोत्सेकयति ॥४०॥

अर्थ: जो मन्त्री-आदि अधिकारी स्वामी के प्रसन्न होने पर भी किसी प्रकार का अभिमान नहीं करता वही चिरकाल तक उन्नतिशील रहता है अर्थात् कभी पदच्युत न होकर कार्तव्य-अर्थ-लाभ आदि द्वारा उन्नति करता है ॥४०॥


किं तेन परिच्छदेन यत्रात्मकलेशेन कार्यं सुखं वा स्वामिनः ॥४१॥

का नाम निर्वृतिः स्वयमूढतृणभोजिनो गजस्य ॥४२॥

अर्थ (सूत्र 41 से 42): राजा को उन मन्त्री आदि अधिकारियों से क्या लाभ ? कोई लाभ नहीं, जिन के होने पर भी उसे स्वयं कष्ट उठाकर अपने-आप राजकीय कार्य करना पड़े। अथवा स्वयं कर्तव्य पूरा करके सुख प्राप्त करना पड़े। सारांश यह है कि मन्त्री-आदि अधिकारियों का यही गुण है कि वे स्वयं राजकीय कार्य पूर्ण करके दिखाते हैं, जिससे स्वामी को कुछ कष्ट न हो और वह सुखी रहे। अन्यथा उनका होना व्यर्थ हैं। जिस प्रकार घास का बोझा वहन कर उसका भक्षण करने वाला हाथी सुखी नहीं हो सकता उसी प्रकार मन्त्री आदि सहायकों के बिना स्वयं राजकीय कार्य-भार को वहन करने वाला राजा भी सुखी नहीं हो सकता। अतएव विजिगीषु राजा को योग्य अधिकारियों व सेवकों की सहायता से राजकीय कार्य सुसम्पन्न करना चाहिए, तभी वह सुखी हो सकता है अन्यथा नहीं ॥४१-४२॥


अश्वसधर्माणः पुरुषाः कर्म्मसु नियुक्ता विकुर्वते तस्मादहन्यहनि तान् परीक्षेत्॥४३॥

अर्थ: क्षुद्र प्रकृति वाले मन्त्री आदि अधिकारी अपने-अपने अधिकारों में नियुक्त किये हुए सैन्धव जाति के घोड़ों के समान विकृत-मदोन्मत्त हो जाते हैं। अर्थात् जिस प्रकार सैन्धव जाति के घोड़े योग्यता प्राप्त कर लेने पर (चाल आदि सीख लेने पर) दमन करने से उन्मत्त होकर सवार को जमीन पर पटकना आदि विकार-युक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार अधिकारी गण भी क्षुद्रप्रकृति-वश गर्व-युक्त होकर राज्य क्षति करने तत्पर रहते हैं, अतः राजा को सदा उनकी परीक्षा-जाँच करते रहना चाहिए ॥४३॥


मार्जारिषु दुग्धरक्षणमिव नियोगिषु विश्वास-करणम् ॥४४॥

अर्थ: स्वामी का मन्त्री आदि अधिकारियों पर विश्वास करना दूध की रक्षार्थ रखे हुए विलावों के समान है। अर्थात् जिस प्रकार विलावों से दूध की रक्षा नहीं हो सकती, उसी प्रकार मन्त्री आदि अधिकारियों से भी राजकोष की रक्षा नहीं हो सकती, अतः राजा को उनकी परीक्षा करते रहना चाहिए ॥४४॥


ऋद्धिश्चित्तविकारिणी नियोगिनामिति सिद्धानामादेशः ॥४५॥

अर्थ: ‘‘सम्पत्ति अधिकारियों का चित्त विकार-युक्त (गर्व युक्त) करती है’’ यह प्रामाणिक नीतिज्ञ पुरुषों का वचन है ॥४५॥


सर्वोऽप्यतिसमृद्धोऽधिकारी भवत्यायत्यामसाध्यः कृच्छ्रसाध्यः स्वामिपदाभिलाषी वा ॥४६॥

अर्थ: सभी अधिकारी अत्यन्त धनाढ्य होने पर भविष्य में स्वामी के वशवर्ती नहीं होते अथवा कठिनाई से वश में होते हैं अथवा उसकी पद-प्राप्ति के इच्छुक होते हैं ॥४६॥


भक्षणमुपेक्षणं प्रज्ञाहीनत्वमुपरोधः प्राप्तार्थाप्रवेशो द्रव्यविनिमयश्चेत्यमात्यदोषाः ॥४७॥

अर्थ: जिस सचिव-अमात्य में निम्न प्रकार छह दोष पाये जावें, उसे अमात्य पद पर नियुक्त नहीं करना चाहिए। १.भक्षण-राजकीय धन खानेवाला, २. उपेक्षण राजकीय सम्पत्ति नष्ट करने वाला, अथवा धन प्राप्ति में अनादर करने वाला ३. प्रज्ञाहीनत्व-जिसकी बुद्धि नष्ट हो गई हो, या जो राजनैतिक ज्ञान-शून्य (मूर्ख) है, ४. उपरोध-प्रभावहीन (उदाहरणार्थ-राजकीय द्रव्य हड़प करने वाले दूसरे अधिकारियों को देखते हुए जिसके द्वारा रोके जाने पर भी वे लोग अनर्थ करने से न चूकें ऐसा प्रभावहीन व्यक्ति) ५. प्राप्तार्था प्रवेश-जो टैक्स आदि उपायों द्वारा प्राप्त हुआ धन राज-कोष में जमा नहीं करता हो, ६. द्रव्य विनिमय जो राजकीय बहुमूल्य द्रव्य अल्पमूल्य में निकाल लेता हो। अर्थात् जो बहुमूल्य सिक्कों (असर्फी आदि) को स्वयं ग्रहण करके और उनके बदले में अल्प मूल्य वाले सिक्के (रुपये आदि) राजकीय खजाने में जमाकर देता हो अथवा चलाने में प्रयत्नशील हो। सारांश यह है कि जो राजा या प्रजा उक्त दोष-युक्त पुरुष को अर्थ सचिव बनाती है, उसका राज्य नष्ट हो जाता है ॥४७॥


राज-तन्त्र, स्वयं देख रेख के योग्य, अधिकार, राज-तन्त्र व नीवी-लक्षण, आयव्यय-शुद्धि और उसके विवाद में राज-कर्त्तव्य


बहुमुख्यमनित्यं च करणं स्थापयेत् ॥४८॥

अर्थ: राजा या प्रजा द्वारा ऐसे राज्यतंत्र की स्थापना होनी चाहिए, जो बहुत से शिष्ट अधिकारियों की बुद्धि से संचालित हो एवं जिसमें अधिकारियों की नियुक्ति स्थायी न हो क्योंकि अकेला अधिकारी स्वेच्छा से अनर्थ भी कर सकता है एवं स्थायी नियुक्ति वाले अधिकारी राज-कोष की क्षति करने वाले भी हो सकते हैं। अतः मंत्री सेनाध्यक्ष आदि करण की नियुक्ति अनेक नीतिज्ञ शिष्ट पुरुषों सहित तथा क्रमानुसार बदलने वाली होनी चाहिए ॥४८॥ गुरु विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


स्त्रीष्वर्थेषु च मनागप्यधिकारे न जातिसम्बन्धः ॥४९॥

अर्थ: राजा या नैतिक पुरुष अपनी स्त्रियों व धन का रक्षक किसी को न बनाये ॥४९॥ गुरु विद्वान् ने भी स्त्रियों व धन-रक्षा के विषय में यही कहा है ॥१॥


स्वपरदेशजावनपेक्ष्यानित्यश्चाधिकारः ॥५०॥

अर्थ: मंत्री आदि अधिकारियों की नियुक्ति स्वदेश व परदेश का विचार न कर अस्थायी रूप से करनी चाहिए क्योंकि अधिकारियों की स्थायी नियुक्ति का परिणाम हानिकर होता है अर्थात् वे राजकीय धन-अपहरण द्वारा राज्य-क्षति कर डालते हैं। परदेशवासी व्यक्ति जिस अधिकारी के कर्त्तव्य में कुशल हो, उसे उस पद पर अस्थायी तौर पर नियुक्त कर देना चाहिए ॥५०॥


आदायकनिबन्धक प्रतिबन्धकनीवीग्राहक राजाध्यक्षाः करणानि ॥५१॥

अर्थ: राजा के राज्यतन्त्र संचालनार्थ निम्न प्रकार पाँच करण-पंचकुल होते हैं। १. आदायक-व्यापारी व कृषकों से चुंगी व टैक्स के जरिये द्रव्य वसूल कर राज-कोष में जमा करने वाला कोषाध्यक्ष। २. निबंधक-उक्त उपाय द्वारा प्राप्त द्रव्य व माल का हिसाब वही-आदि में लिखने वाला। ३. प्रतिबन्धक चुंगी आदि के माल पर या खजाने में जमा होने वाली वस्तुओं पर राजकीय मुहर लगाने वाला। ४. नीवी ग्राहक-राजकीय द्रव्य को राज कोष में जमा करने वाला (खजानची)। ५. राजाध्यक्ष-उक्त चारों अधिकारियों की देख-रेख रखने वाला प्रधान पुरुष ॥५१॥


आयव्ययविशुद्धं द्रव्यं नीवी ॥५२॥

अर्थ: आमदनी में से उपयुक्त खर्च करने के पश्चात् बची हुई और जाँच पड़ताल-पूर्वक खजाने में जमा की हुई सम्पत्ति को ‘नीवी’ कहते हैं ॥५२॥


नीवीनिबन्धकपुस्तकग्रहणपूर्वकमायव्ययौ विशोधयेत् ॥५३॥

अर्थ: राजा उक्त नीवी ग्राहक-खजांची से उस वही की जिसमें राजकीय द्रव्य के आय-व्यय का हिसाब लिखा है, लेकर अच्छी तरह जांच-पड़ताल करके आय-व्यय को विशुद्ध करे ॥५३॥ किसी नीतिकार१ ने भी राजकीय संपत्ति की आय-व्यय शुद्धि के-विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


आयव्ययविप्रतिपत्तौ कुशलकरणकार्यपुरुषेभ्यस्तद्विनिश्चयः ॥५४॥

अर्थ: जब सम्पत्ति का आय-व्यय करने वाले अधिकारियों में आमदनी व खर्च के विषय में विवाद समान शक्तिवाला विरोध-उपस्थित हो जाय तब राजा को जितेन्द्रिय व राजनीतिज्ञ प्रधान पुरुषों मंत्री आदि से विचार-परामर्श करके उसका निश्चय कर लेना चाहिए। अभिप्राय यह है कि किसी अवसर पर, कारणवश राज्य में टैक्स आदि द्वारा होने वाली सम्पत्ति की आय-आमदनी बिल्कुल रुक गई हो और धन का व्यय अधिक हो रहा हो, जो कि अवश्य करने योग्य प्रतीत हो जैसे शत्रुकृत हमले के समय राष्ट्र रक्षार्थ सैनिक शक्ति के बढ़ाने में अधिक और आवश्यक खर्च। ऐसे अवसर पर यदि अधिकारियों में आय-व्यय सम्बन्धी विवाद उपस्थित हो जावे, तो राजा को सदाचारी व राजनीतिज्ञ शिष्ट पुरुषों की समिति बैठाकर उक्त विषय का निश्चय कर लेना चाहिए अर्थात् यदि महान् प्रयोजन-सिद्ध (विजय) होता हो तो आमदनी से अधिक खर्च करने का निश्चय कर लेना चाहिए अन्यथा नहीं ॥५४॥ शुक्र२ विद्वान् ने भी सम्पत्ति के आय-व्यय सम्बन्धी विवाद के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


नित्यपरीक्षणं कर्मविपर्ययः प्रतिपत्तिदानं नियोगिष्वर्थोपायाः ॥५५॥

अर्थ: राजा अधिकारियों से रिश्वत द्वारा संचित धन निम्न प्रकार तीन उपायों से प्राप्त कर सकता हैं। १. नित्य परीक्षण-सदा अधिकारियों की जाँच-पड़ताल करना। अर्थात् गुप्तचरों द्वारा उनके दोष जानकर कड़ी सजा देना। २. कम विपर्यय उन्हें उच्च पदों से पृथक् कर साधारण पदों पर नियुक्त करना, जिससे वे भयभीत होकर रिश्वत से संचित धन बताने में बाध्य हो सकें। ३. प्रतिपत्तिदानं-अधिकारियों के लिए छत्रचमर आदि बहुमूल्य वस्तुएँ भेंट देना; जिससे वे स्वामी से प्रसन्न होकर रिश्वत द्वारा गृहीत गुप्त धन दे देवें ॥५५॥


नापीडिता
नियोगिनो दुष्टव्रणा इवान्तःसारमुद्वमन्ति ॥५६॥

अर्थ: अधिकारी लोग दुष्ट व्रण (पके हुए दूषित फोड़े) समान बिना ताड़न-बंधन आदि किये गृह में रक्खा हुआ रिश्वत का धन नहीं बताते अर्थात् जिस प्रकार पके हुए दूषित फोड़े शस्त्रादि द्वारा छेदन-भेदन किये बिना भीतर का दूषित रक्त नहीं निकालते उसी प्रकार अधिकारी-गण भी कड़ी सजा पाये बिना रिश्वत का धन नहीं बताते ॥५६॥


पुनः पुनरभियोगे नियोगिषु
भूपतीनां वसुधाराः ॥५७॥

अर्थ: अधिकारियों को बार बार ऊँचे पदों से पृथक् करके साधारण पदों में नियुक्त करने से राजाओं को उनके द्वारा गृहीत रिश्वत का प्रचुर धन मिल जाता है। क्योंकि वे पदच्युत आदि होने के भय से रिश्वत का धन दे देते हैं ॥५७॥


सकृन्निष्पीडितं हि स्नानवस्त्रं किं जहाति
स्निग्धताम् ॥५८॥

अर्थ: केवल एक बार धोया हुआ स्नान-वस्त्र (धोती वगैरह) क्या अपनी मलीनता छोड़ सकता है? नहीं छोड़ सकता। अर्थात् जिस प्रकार नहाने का कपड़ा बार-बार पछाड़कर धोने से साफ होता है उसी प्रकार अधिकारी वर्ग भी बार-बार दंडित किये जाने से संचित रिश्वत आदि का गृहीत धन दे देता है ॥५८॥


देशमपीडयन् बुद्धिपुरुषकाराभ्यां पूर्वनिबन्धमधिकं
कुर्वन्नर्थमानौ लभते ॥५९॥

अर्थ: जो अधिकारी (अमात्य आदि) देश को पीड़ित नहीं करता (अधिक चुंगी व टैक्स द्वारा प्रजा को कष्ट नहीं देता) और अपनी बुद्धि-पटुता व उद्योगशीलता द्वारा राष्ट्र के पूर्व व्यवहार को विशेष उन्नतिशील बनाता हैं। अर्थात् राष्ट्र सम्बन्धी कृषि व वाणिज्य आदि की पूर्वापेक्षा विशेष उन्नति करके दिखाता है उसे स्वामी द्वारा धन व प्रतिष्ठा मिलती है ॥५९॥


यो यत्र कर्मणि कुशलस्तं तत्र विनियोजयेत् ॥६०॥

न खलु स्वामिप्रसादः
सेवकेषु कार्यसिद्धिनिबन्धनं किंतु बुद्धिपुरुषकारावेव ॥६१॥

शास्त्रविद्यप्यदृष्टकर्मा कर्मसु विषादं गच्छेत् ॥६२॥

अर्थ (सूत्र 60 से 62): जो अधिकारी जिस पद के कर्त्तव्य पालन में कुशल हो, उसे उस पद पर नियुक्त कर देना चाहिए ॥६०॥ निश्चय से स्वामी के प्रसन्न रहने से ही सेवक लोग कार्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सकते किन्तु जब उनमें कार्योपयोगी बुद्धि व पुरुषार्थ (उद्योग) गुण होंगे तभी वे कर्त्तव्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं ॥६१॥ शास्त्रवेत्ता विद्वान् पुरुष भी जिन कर्त्तव्यों से परिचित नहीं है, उनमें मोह (अज्ञान) प्राप्त करता है ॥६२॥


अनिवेद्यभर्तुर्न किंचिदारम्भं कुर्यादन्यत्रापत्प्रतीकारेभ्यः ॥६३॥

अर्थ: असह्य संकट दूर करने के सिवाय दूसरा कोई भी कार्य सेवक को स्वामी से निवेदन किये बिना नहीं करना चाहिए। अर्थात् युद्ध-कालीन शत्रु-कृत उपद्रवों का नाश सेवक को स्वामी से बिना पूछे कर देना चाहिए इसके सिवाय उसे कोई भी कार्य स्वामी की आज्ञा बिना नहीं करना चाहिए ॥६३॥


सहसोपचितार्थो मूलधनमात्रेणावशेषयितव्यः ॥६४॥

अर्थ: राजा अचानक मिला हुआ धन (लावारिस मरे हुए धनाढ्य व्यक्तियों को भाग्याधीन मिली हुई सम्पत्ति) खजाने में स्थापित कर उसकी वृद्धि करे ॥६४॥


मूलधनाद् द्विगुणाधिको लाभो भाण्डोत्थो यो भवति स राज्ञः ॥६५॥

अर्थ: जब व्यापारी लोग बर्तनों आदि के व्यापार में मूलधन से दूने से भी अधिक धन कमाते हों तब राजा को व्यापारियों के लिए मूल धन से दूना धन देकर अधिक धन जब्त कर लेना चाहिए। क्योंकि व्यापारी गण इतना अधिक मुनाफा छल-कपट व चोरी आदि कुमार्ग का अनुसरण किये बिना नहीं कर सकते ॥६५॥


परस्परकलहो नियोगिषु भूभुजां निधिः ॥६६॥

अर्थ: अधिकारियों में आपसी फूट-लड़ाई झगड़ा होने से राजाओं को खजाने के मिलने के समान महा लाभ होता है, क्योंकि ऐसा होने से अधिकारी वर्ग राजा के समक्ष एक दूसरे का अपराध प्रकट कर देते हैं, जिसके फलस्वरूप दण्डित किये जाने पर वे लोग रिश्वत द्वारा हड़प किया हुआ धन बता देते हैं ॥६६॥


नियोगिषु लक्ष्मीः क्षितीश्वराणां द्वितीयः कोशः ॥६७॥

अर्थ: अधिकारियों की सम्पत्ति राजाओं का दूसरा खजाना है क्योंकि उनके ऊपर संकट पड़ने पर अधिकारियों की सम्पत्ति उनके काम आ जाती है ॥६७॥


सर्वसंग्रहेषु धान्यसंग्रहो महान्, यतस्तन्निबन्धनं जीवितं सकलप्रयासश्च ॥६८॥

अर्थ: समस्त हाथी-घोड़े-आदि के संग्रह में से अन्न-संग्रह उत्तम माना गया है क्योंकि वह प्राणियों के जीवन-निर्वाह का साधन है, एवं जिसके कारण मनुष्यों को कृषि आदि जीविकोपयोगी कार्यों में कष्ट उठाना पड़ता है ॥६८॥


न खलु मुखे प्रक्षिप्तः खरोऽपि द्रम्मः प्राणत्राणाय यथा धान्यं ॥६९॥

अर्थ: जिस प्रकार भक्षण किया हुआ धान्य प्राण-रक्षाकर सकता है, उस प्रकार निश्चय से बहुमूल्य सुवर्ण का सिक्का मुख में रक्खा हुआ प्राणरक्षा नहीं कर सकता ॥६९॥


सर्वधान्येषु चिरजीविनः कोद्रवाः ॥७०॥

अर्थ: समस्त धान्यों में कोदों चिरस्थायी (घुण न लगने वाले) होते हैं, अतः उनका संग्रह करना चाहिए ॥७०॥


अनवं नवेन वर्द्धयितव्यं व्ययितव्यं च ॥७१॥

अर्थ: पुरानी संचित धान्य ब्याज न (फसल के मौके पर कृषकों को बाड़ी में देना) देकर बदले में नवीन धान्य के आय द्वारा बढ़ानी चाहिए और ब्याज द्वारा प्राप्त हुई धान्य खर्च करते रहना चाहिए, ताकि मूलधन की हानि न हो सके ॥७१॥


लवणसंग्रहः सर्वरसानामुत्तमः ॥७२॥

सर्वरसमयमप्यन्नमलवणं गोमयायते ॥७३॥

अर्थ (सूत्र 72 से 73): समस्त घृत व तेल प्रभृति रसों के संग्रह में नमक संग्रह उत्तम है अतः विवेकी पुरुष उसका संग्रह करे क्योंकि नमक के बिना सब रसों से युक्त अन्न भी गोबर समान अरुचिकर लगता है ॥७२-७३॥

(१९) जनपद-समुद्देशः

पशुधान्यहिरण्यसंपदा राजते इति राष्ट्रम् ॥१॥

अर्थ: क्योंकि देश गाय भैंस-आदि पशु गेहूँ-चावल प्रभृति अन्न व सुवर्ण-आदि सम्पत्ति से शोभायमान होता है, इससे इसकी ‘राष्ट्र’ संज्ञा है ॥१॥


भर्त्तुर्दण्डकोषवृद्धिं दिशतीति देशः ॥२॥

अर्थ: यह स्वामी को सैन्य-कोष की वृद्धि देता है, अतः इस की ‘देश’ संज्ञा है ॥२॥


विविधवस्तुप्रदानेन स्वामिनः सद्मनि गजान् वाजिनश्च विष्णोति बध्नातीति
विषयः ॥३॥

अर्थ: क्योंकि यह नाना प्रकार को सुवर्ण-धान्यादि वस्तुएँ प्रदान कर राज-महल में हाथी घोड़े बाँधता है, अतः इसे ‘विषय’ कहते हैं ॥३॥


सर्वकामधुक्त्वेन नरपतिहृदयं मण्डयति भूषयतीति मण्डलम् ॥४॥

अर्थ: क्योंकि यह समस्त मनोरथों की पूर्ति द्वारा राजा के हृदय को अलंकृत करता है, इसलिए इसे मण्डल कहते हैं ॥४॥


जनस्य वर्णाश्रमलक्षणस्य द्रव्योत्पत्तेर्वा पदं स्थानमिति जनपदः ॥५॥

अर्थ: क्योंकि देश वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र) और आश्रमों (ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति) में वर्तमान प्रजाजनों का निवास-स्थान अथवा धन का उत्पत्ति-स्थान है अतः इसे ‘जनपद’ कहते हैं ॥५॥ शुक्र विद्वान् ने भी ‘जनपद’ शब्द की यही व्याख्या की है ॥१॥


निजापतेरुत्कर्षजनकत्वेन शत्रु हृदयानि दारयति भिनत्तीति दारकम् ॥६॥

अर्थ: क्योंकि देश अपने स्वामी की उन्नति करके शत्रु हृदयों को विदीर्ण करता है अतः इसे ‘दारक’ कहा है ॥६॥ जैमिनि विद्वान् ने कहा है कि “देश बहुत से ऊँटों द्वारा अपने स्वामी की उन्नति करके शत्रु हृदयों को विदीर्ण करता है अतः उसे ‘दारक’ कहते हैं ॥१॥


आत्मसमृद्ध्या स्वामिनं सर्वव्यसनेभ्यो निर्गमयतीति निर्गमः ॥७॥

अर्थ: क्योंकि यह अपने धनादि वैभव द्वारा स्वामी को समस्त आपत्तियों से छुड़ाता है अतः इसे विद्वानों ने ‘निर्गम’ कहा है ॥७॥ शुक्र विद्वान् ने भी निर्गम शब्द की यही सार्थक व्याख्या की है ॥१॥


अन्योन्यरक्षकः खन्याकरद्रव्यनागधनवान् नातिवृद्धनातिहीनग्रामो
बहुसारविचित्रधान्यहिरण्यपण्योत्पत्तिरदेवमातृकः पशुमनुष्यहितः
श्रेणिशूद्रकर्षकप्राय इति जनपदस्य गुणाः ॥८॥

अर्थ: देश के निम्न प्रकार गुण होते हैं-१. परस्पर की रक्षा करने वाला-जहाँ पर राजा देश की और देश राजा की रक्षा करता हो, २. जो स्वर्ण, रत्न, चाँदी, तांबा व लोहा आदि धातुओं की तथा गन्धक, नमक आदि खनिज द्रव्यों की खानियों से युक्त एवं रुपया असर्फी आदि धन और हाथीयूप धन से परिपूर्ण हो, ३. जिसके ग्रामों की जनसंख्या न बहुत बढ़ी हुई और न बहुत कम हो, ४. जहाँ पर बहुत से उत्तम पदार्थ, नाना भाँति के अन्न, सुवर्ण और व्यापारियों के खरीदने व बेचने योग्य वस्तुएँ पाई जाती हों, ५. जो मेघजल की अपेक्षा से रहित हो-जहाँ रहट व चरसों के जल से खेती होती हो। ६. जो मनुष्य व पशुओं को सुख देने वाला हो, ७. जहाँ पर बढ़ई, जुलाहा, नाई, धोबी व चमार आदि शिल्प-शूद्र तथा किसान बहुलता से वर्तमान हों, सारांश यह है कि जिस देश में उक्त गुण पाए जाते हैं, वह सुखी रहता है ॥८॥


विषतृणोदकोषरपाषाणकण्टकगिरिगर्त्तगह्वरप्रायभूमर्भूरिवर्षा जीवनो व्याल-
लुब्धकम्लेच्छबहुलः स्वल्पसस्योत्पत्तिस्तरुफलाधार इति देशदोषाः ॥९॥

अर्थ: देश के निम्न प्रकार दोष होते हैं जिनसे वह निंदनीय समझा जाता है। १. जिसका घास पानी रोगजनक होने से विष समान हानिकारक हो, २. जहाँ की जमीन ऊसर-घास अन्न की उपज से शून्य हो, ३. जहाँ की जमीन विशेष पथरीली, अधिक कंटकाकीर्ण तथा बहुत पहाड़, गड्ढे और गुफाओं से व्याप्त हो, ४. जहाँ पर बहुत-सी जल-वृष्टि द्वारा प्रजाजनों का जीवन (धान्य की उपज) होता हो, ५. जहाँ पर बहुलता से सर्प, भील और म्लेच्छों का निवास हो। ६. जिसमें थोड़ी-सी धान्य (अन्न) उत्पन्न होती हो। ७. जहाँ के लोग धान्य की उपज कम होने के कारण वृक्षों के फलों द्वारा अपना जीवन-निर्वाह करते हों ॥९॥


तत्र सदा दुर्भिक्षमेव, यत्र जलदजलेन सस्योत्पत्तिकृष्टभूमिश्चारम्भः ॥१०॥

अर्थ: जिस देश में मेघों के जल द्वारा धान्य उत्पन्न होती है और खेती कर्षण-क्रिया के बिना होती है, अर्थात् जहाँ कछवारों की पथरीली जमीन में बिना हल जोते ही बीज बिखेर दिये जाते हैं, वहाँ सदा अकाल रहता है। क्योंकि मेघों द्वारा जल वृष्टि का यथासमय व उचित परिमाण में होना निश्चित नहीं रहता एवं कर्षण क्रिया की अपेक्षा शून्य पथरीली जमीन भी ऊसर जमीन समान उपज-शून्य अथवा बिल्कुल कम उपजाऊ होती है, अतः ऐसे देश में सदा अकाल होना निश्चित ही है ॥१०॥


क्षत्रिय व ब्राह्मणों की अधिक संख्या-युक्त ग्रामों से हानि व परदेश-प्राप्त स्वदेशवासी के प्रति राज-कर्त्तव्य


क्षत्रियप्राया हि ग्रामाः स्वल्पास्वपि बाधासु प्रतियुद्ध्यन्ते ॥११॥

अर्थ: जिन ग्रामों में क्षत्रिय शूरवीर पुरुष अधिक संख्या में निवास करते हैं वहाँ पर वे लोग थोड़ी-सी पीड़ाओं-आपसी तिरस्कार आदि से होने वाले कष्टों के होने पर आपस में लड़ मरते हैं-अनर्थ कर बैठते हैं ॥११॥


म्रियमाणोऽपि द्विजलोको न खलु सान्त्वेन सिद्धमप्यर्थं प्रयच्छति ॥१२॥

अर्थ: ब्राह्मण लोग अधिक कृपण-लोभी होने के कारण राजा के लिए देने योग्य टैक्स आदि का धन प्राण जाने पर भी बिना दण्ड के शान्ति से नहीं देते ॥१२॥


स्वभूमिकं भुक्तपूर्वमभुक्तं वा जनपदं स्वदेशाभिमुखं दानमानाभ्यां परदेशादावहेद्
वासयेच्च ॥१३॥

अर्थ: राजा का कर्त्तव्य है कि वह परदेश में प्राप्त हुए अपने देशवासी मनुष्य को, जिससे कि इसने पूर्व में कर-टैक्स ग्रहण किया हो अथवा न भी किया हो, दान सम्मान से वश में करे और अपने देश के प्रति अनुरागी बनाकर उसे वहाँ से लाकर अपने देश में बसावे । सारांश यह है कि अपने देशवासी, शिष्ट व उद्योगशील पुरुष को परदेश से लाकर बसाने से राष्ट्र की जन-संख्या-वृद्धि, व्यापारिक उन्नति, राजकोष की वृद्धि एवं गुप्त रहस्य-संरक्षण आदि अनेक लाभ होते हैं, जिसके फलस्वरूप राज्य की श्रीवृद्धि होती है ॥१३॥


स्वल्पोऽप्यादायेषु प्रजोपद्रवो महान्तमर्थं नाशयति ॥१४॥

अर्थ: जो राजा धन की आमदनी के स्थानों (चुंगीघर आदि) में व्यापारियों से थोड़ा-सा भी अन्याय का धन ग्रहण करता है-अधिक टैक्स लेता है उसे महान आर्थिक हानि होती है, क्योंकि व्यापारियों के क्रय-विक्रय के माल पर अधिक टैक्स लगाने से वे लोग उसके भय से क्षुब्ध होकर व्यापार बंद कर देते हैं या छल-कपट पूर्ण बर्ताव करते हैं जिसके फलस्वरूप राजा की अधिक हानि होती है ॥१४॥


क्षीरिषु कणिषेषु सिद्धादायो जनपदमुद्वासयति ॥१५॥

अर्थ: जो राजा लगान न देने कारण किसानों की अपरिपक्व (बिना पकी हुई) धान्य मंजरी-गेहूँ-चावल आदि की कच्ची फसल-कटाकर ग्रहण कर लेता है, वह उन्हें दूसरे देश में भगा देता है, जिससे कृषक आर्थिक संकट भोगते हैं, अतः राजा को कृषकों के प्रति ऐसा अन्याय करना उचित नहीं है ॥१५॥


लवनकाले सेनाप्रचारो दुर्भिक्षमावहति ॥१६॥

अर्थ: जो राजा पकी हुई धान्य की फसल काटते समय अपने राष्ट्र के खेतों में से हाथी घोड़े-आदि की सेना निकालता है उसका देश अकाल-पीड़ित हो जाता है। क्योंकि सेना धान्य-फसल का सत्यानाश कर डालती है, जिससे अन्न के अभाव से देश में अकाल हो जाता है ॥१६॥


सर्वबाधा प्रजानां कोशं पीडयति३ ॥१७॥

अर्थ: जो राजा अपनी प्रजा को समस्त प्रकार के कष्ट देता है-अधिक टैक्स आदि लगाकर प्रजा को पीड़ित करता है, उसका खजाना नष्ट हो जाता है। क्योंकि पीड़ित प्रजा असंतुष्ट होकर एकदम राजा से बगावत कर देती है जिसके फलस्वरूप राजकीय खजाना खाली हो जाता है ॥१७॥ गर्ग१ विद्वान् ने भी टैक्स द्वारा प्रजा को पीड़ित करने वाले, राजा की इसी प्रकार हानि निर्दिष्ट की है ॥१॥


दत्तपरिहारमनुगृह्णीयात् ॥१८॥

अर्थ: राजा ने जिन को पूर्व में टैक्स लेने से मुक्त कर दिया है, उनसे वह फिर से टैक्स न लेकर उनका अनुग्रह करे, क्योंकि इससे उसकी वचन-प्रतिष्ठा व कीर्ति होती है ॥१८॥ नारद२ विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


मर्यादातिक्रमेण फलवत्यपि भूमिर्भवत्यरण्यानी ॥१९॥

अर्थ: मर्यादा-लोकव्यवहार-का उल्लंघन करने से धन-धान्यादि से समृद्धिशाली भूमि भी जंगल समान फल-शून्य हो जाती है; अतः विवेकी मनुष्य व राजा को मर्यादा (नैतिक प्रवृत्ति) का उल्लंघन नहीं करना चाहिए ॥१९॥ गुरु३ विद्वान् ने भी मर्यादा उल्लंघन न करने वाले राजा के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


क्षीणजनसम्भावनं तृणशलाकाया अपि स्वयमग्रहः४
कदाचित्किंचिदुपजीवनमिति परमः प्रजानां वर्धनोपायः ॥२०॥

अर्थ: प्रजा की रक्षा करने के निम्न प्रकार हैं। (१) धन नष्ट हो जाने से विपत्ति में फँसे हुए (दरिद्र) कुटुम्बीजनों की द्रव्य से सहायता करना। (२) प्रजा से अन्याय पूर्वक तृणमात्र भी अधिक टैक्स वसूल न करना न्यायपूर्वक उचित टैक्स लेना अथवा दरिद्रतावश-आपत्ति में फँसी हुई प्रजा से तृणमात्र भी टैक्स न लेना। (३) किसी समय (अपराध करने पर)-अपराधानुकूल दण्ड-विधान करना ॥२०॥ नारद४ विद्वान् ने भी लोक-रक्षा के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


न्यायेन रक्षिता पण्यपुटभेदिनी पिष्ठा राज्ञां कामधेनुः५ ॥२१॥

अर्थ: राष्ट्र के शुल्क-स्थान (प्रधान शहर और बड़े-बड़े कृषिप्रधान ग्राम), जो कि न्याय से सुरक्षित होते हैं (जहाँ पर अधिक टैक्स न लेकर न्यायोचित टैक्स लिया जाता हो तथा चोरों-आदि द्वारा चुराई हुई प्रजा की धनादि वस्तु वापस दे दी जाती हो) और जहाँ पर व्यापारियों की खरीदने और बेचने योग्य वस्तुओं (केसर, हींग वस्त्रादि) की अधिक संख्या में दुकानें हों, वे राजाओं को कामधेनु समान अभिलषित वस्तु देने वाले होते हैं क्योंकि शुल्कस्थानों से राजा टैक्स के जरिये प्रचुर सम्पत्ति संचय कर शिष्टपालन व दुष्टनिग्रह में उपयोगी सैनिक-विभाग, शिक्षा विभाग व स्वास्थ्य-विभाग आदि की उन्नति करने में समर्थ होता हैं एवं राष्ट्र को शत्रु-कृत उपद्रवों से सुरक्षित हुआ खजाने की वृद्धि करता है। परन्तु शुल्क स्थान न्याय से सुरक्षित होने चाहिए, अन्यथा प्रजा असंतुष्ट और क्षुब्ध हो जाती है, जिसका परिणाम भयंकर होता है-आय के द्वार रुक जाने से कोष-क्षति व शत्रुकृत उपद्रवों द्वारा राज्य नष्ट होता है ॥२१॥ शुक्र विद्वान् ने भी शुल्क स्थानों को न्याय से सुरक्षित रखने के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


राज्ञां चतुरंगबलाभिवृद्धये भूयांसो भक्तग्रामा ॥२२॥

अर्थ: अर्थात् राजा ज्यादा धान्य की उपज वाले बहुत से ग्राम जो कि उसकी चतुरंग सेना (हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल) की वृद्धि के कारण हैं, उन्हें किसी को न देवे ॥२२॥ शुक्र विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


सुमहच्च गोमण्डलं हिरण्याय युक्तं शुल्कं कोषवृद्धेर्हेतुः ॥२३॥

अर्थ: बहुत-सा गोमण्डल-गाय-बैलों का समूह, सुवर्ण और चुंगी टैक्स (लगान) आदि द्वारा प्राप्त हुआ धन राज-कोष की वृद्धि का कारण है ॥२३॥ गुरु विद्वान् ने भी राजकोष की वृद्धि के उक्त कारण निरूपण किये हैं। ॥१॥


देवद्विजप्रदेया गोरुतप्रमाणा भूमिर्दातुरदातुश्च सुखनिर्वाहा ॥२४॥

अर्थ: राजा द्वारा विद्वान् और ब्राह्मणों के लिए इतनी थोड़ी भूमि दान में दी जानी चाहिए, जिसमें गाय के रम्हाने का शब्द सुनाई पड़े; क्योंकि इतनी थोड़ी भूमि देने से दाता और पात्र (ग्रहण करने वाला) को सुख मिलता है। अर्थात् दाता भी दरिद्र नहीं होने पाता एवं कोई राजकीय अधिकारी उतनी थोड़ी-सी जमीन पर कब्जा नहीं कर सकता ॥२४॥ गौतम विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


क्षेत्र व प्रखण्डधर्मायतनानामुत्तरः पूर्वं वाधते न पुनरुत्तरं पूर्वः ॥२५॥

अर्थ: विशाल खाली पड़ी हुई किसी जमीन पर भिन्न-भिन्न पुरुषों ने भिन्न-भिन्न समयों में, खेत, कोट, घर और मन्दिर बनवाये पश्चात् उनमें अपने स्वामित्व के विषय में वाद-विवाद उपस्थित हो गया। उनमें से धर्माध्यक्ष (न्यायाधीश) किसको अधिकारी (स्वामी) निश्चित करे ? अर्थात् सबसे प्रथम किसी एक पुरुष ने किसी स्थान की भूमि को खाली पड़ी हुई देखकर वहाँ खेत बना लिए। पश्चात् दूसरे ने उस पर कोट खड़ा कर दिया और तीसरे ने उस पर मकान बनवा लिया, और चौथे ने मन्दिर निर्माण करा दिया तत्पश्चात् उन सब का आपस में वाद-विवाद प्रारम्भ हो गया। ऐसे अवसर पर आगे-आगे की वस्तु बनाने वाले मनुष्य न्यायोचित मुख्य अधिकारी समझे जावेंगे अर्थात् खेत बनाने वाले की अपेक्षा कोट बनाने वाला, कोट बनाने वाले की अपेक्षा गृह बनाने वाला और गृह बनाने वाले की अपेक्षा मन्दिर बनाने वाला बलवान और प्रधान अधिकारी समझा जावेगा। परन्तु पूर्व-पूर्व की चीजें बनाने वाला नहीं।

(२०) दुर्ग-समुद्देशः

यस्याभियोगात्परे दुःखं गच्छन्ति दुर्जनोद्योगविषया व स्वस्यापदो गमयतीति
दुर्गम् ॥१॥

अर्थ: क्योंकि जिसके पास प्राप्त होकर या जिसके सामने युद्ध के लिए बुलाये गये शत्रु लोग, दुःख अनुभव करते हैं। अथवा यह दुष्टों के उद्योग द्वारा उत्पन्न होने वाली विजिगीषु की आपत्तियाँ नष्ट करता है, इसलिए इसे ‘दुर्ग’ कहते हैं। सारांश यह है कि जब विजिगीषु राजा अपने राज्य में शत्रु, द्वारा हमला होने के अयोग्य विकट स्थान (किला, खाई आदि) बनवाता है, तब शत्रु लोग उन विकट स्थानों से दुःखी होते हैं, क्योंकि उनके हमले सफल नहीं हो पाते एवं दुष्टों द्वारा होने वाले आक्रमण सम्बन्धी विजिगीषु के कष्ट-नाशक होने से भी इसे ‘दुर्ग’ कहते हैं ॥१॥


तद्द्विविधं स्वाभाविकमाहार्यं च ॥२॥

अर्थ: दुर्ग दो तरह के होते हैं-(१) स्वाभाविक (२) आहार्य। स्वाभाविक दुर्ग-स्वयं उत्पन्न हुए, युद्धोपयोगी व शत्रुओं द्वारा आक्रमण करने के अयोग्य पर्वत-खाई आदि विकट स्थानों को स्वाभाविक दुर्ग कहते हैं। अर्थशास्त्र-वेत्ता विद्वान् चाणक्य ने इसके चार भेद निरूपण किये हैं। (१) औदक-जलदुर्ग, (२) पार्वत-पर्वतदुर्ग, (३) धान्वन (४) वनदुर्ग-स्थलदुर्ग। औदक-चारों ओर नदियों से वेष्टित व मध्य में टापू समान विकट स्थान अथवा बड़े-बड़े तालाबों से वेष्टित मध्य स्थान को ‘औदक’ कहते हैं। पार्वत-बड़े-बड़े पत्थरों या महान् चट्टानों से घिरे हुए अथवा स्वयं गुफाओं के आकार बने हुए विकट स्थान ‘पार्वत दुर्ग’ हैं। धान्वन-जल व घास-शून्य भूमि या ऊसर जमीन में बने हुए विकट स्थान को ‘धान्वन दुर्ग’ कहते हैं। वन दुर्ग-चारों और घनी कीचड़ से अथवा कांटेदार झाड़ियों से घिरे हुए स्थान को ‘वनदुर्ग’ कहते हैं। जल-दुर्ग और पर्वत-दुर्ग देश रक्षा के एवं धान्वन और वन-दुर्ग आटविकों की रक्षा के स्थान हैं और राजा भी शत्रु कृत हमलों आदि आपत्ति के समय भागकर इन दुर्गों में आश्रय ले सकता है। (२) आहार्यदुर्ग-कृत्रिम उपायों द्वारा बनाये हुए शत्रुओं द्वारा आक्रमण न किये जाने वाले, युद्धोपयोगी खाई-कोट आदि विकट स्थानों को ‘आहार्य दुर्ग’ कहते हैं।


वैषम्यं पर्याप्तावकाशो यवसेन्धनोदकभूपस्त्वं स्वस्य परेषामभावो बहुधान्यरस-
संग्रहः प्रवेशापसारौ वीरपुरुषा इति दुर्गसम्पत् अन्यद्बन्दिशालावत् ॥३॥

अर्थ: निम्न प्रकार दुर्ग की विभूति-गुण है जिससे विजिगीषु शत्रुकृत उपद्रवों से अपना राष्ट्र सुरक्षित कर विजयश्री प्राप्त कर सकता है। १. दुर्ग की जमीन-पर्वत आदि के कारण विषम-ऊँची-नीची व विस्तीर्ण (विस्तार युक्त) हो। २. जहाँ पर अपने स्वामी के लिए ही घास, ईंधन और जल बहुतायत से प्राप्त हो सकें; परन्तु हमला करने वाले शत्रुओं के लिए नहीं। ३. जहाँ पर गेहूँ-चावल-आदि अन्न व नमक; तेल व घी वगैरह रसों का प्रचुर संग्रह हो। ४. जिसके पहले दरवाजे से प्रचुर धान्य और रसों का प्रवेश एवं दूसरे से निकासी होती हो। ५. जहाँ पर बहादुर सैनिकों का पहरा हो। यह दुर्ग की सम्पत्ति जाननी चाहिए, जहाँ पर उक्त सम्पत्ति नहीं है, उसे दुर्ग न समझ कर जेलखाने का सामान अपने स्वामी का घातक समझना चाहिए ॥३॥ शुक्र विद्वान् ने कहा है कि जिसमें एक द्वार से वस्तु-प्रवेश और दूसरे से निकासी न हो, वह दुर्ग नहीं जेलखाना है ॥१॥ दुर्गविहीन देश किसके पराजय का स्थान नहीं ? सभी के पराजय का स्थान है ॥४॥ आपत्तिकाल में-शत्रुकृत आक्रमणों के समय दुर्ग शून्य राजा का समुद्र के मध्य में नौका से गिरे हुए पक्षी के समान कोई रक्षक नहीं अर्थात् जिस प्रकार नौका से समुद्र में गिरे हुए पक्षी का कोई रक्षक नहीं, उसी प्रकार शत्रु कृत आक्रमण द्वारा संकट में फँसे हुए दुर्ग-शून्य राजा का भी कोई रक्षक नहीं है ॥५॥ शुक्र विद्वान् ने भी दुर्ग-शून्य राजा के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


अदुर्गो देशः कस्य नाम न परिभवास्पदं ॥४॥


अदुर्गस्य राज्ञः पयोधिमध्ये पोतच्युतपक्षिवदापदि नास्त्याश्रयः ॥५॥


उपायतोऽधिगमनमुपजापश्चिरानुबन्धोऽवस्कन्दस्तीक्ष्णपुरुषोपयोगश्चेति परदुर्गलंभोपायाः ॥६॥


नामुद्रहस्तोऽशोधितो वा दुर्गमध्ये कश्चित् प्रविशेन्निर्गच्छेद्वा ॥७॥

अर्थ: विजिगीषु, को, जिसके हाथ में राजमुद्रा नहीं दी गई हो ऐसे अज्ञात वा अपरीक्षित (जिसके निवास व गन्तव्य स्थान एवं उद्देश्य आदि की जाँच पड़ताल नहीं की गई हो) व्यक्ति को अपने दुर्ग में प्रविष्ट नहीं होने देना चाहिए और न दुर्ग से बाहर निकलने देना चाहिए ॥७॥


श्रूयते किल हूणाधिपतिः पण्यपुटवाहिभिः सुभटैः चित्रकूटं जग्राह ॥८॥

अर्थ: इतिहास में लिखा है कि हूण देश के नरेश ने अपने सैनिकों को विक्रय योग्य वस्तुओं को धारण करने वाले व्यापारियों के वेश में दुर्ग में प्रविष्ट कराया और उनके द्वारा दुर्ग के स्वामी को मरवा कर चित्रकूट देश पर अपना अधिकार कर लिया ॥८॥


खेटखङ्गधरैः सेवार्थं शत्रुणा भद्राख्यं कांचीपतिमिति ॥९॥

अर्थ (सूत्र 6 से 9): विजिगीषु को शत्रु, दुर्ग का नाश या उस पर अपना अधिकार करने के लिए निम्न प्रकार उपाय काम में लाने चाहिए। १. अधिगमन-सामादि उपायपूर्वक शत्रुदुर्ग पर शस्त्रादि से सुसज्जित सैन्य प्रविष्ट करना। २. उपजाप-विविध उपाय (सामादि) द्वारा शत्रु के अमात्य-आदि अधिकारियों में भेद करके शत्रु के प्रतिद्वन्दी बनाना। ३. चिरानुबन्ध-शत्रु के दुर्ग पर सैनिकों का चिरकालतक घेरा डालना। ४. अवस्कन्द-शत्रु, दुर्ग के अधिकारियों को प्रचुर सम्पत्ति और मान देकर वश करना। ५. तीक्ष्णपुरुषप्रयोग-घातक गुप्तचरों को शत्रु, राजा के पास भेजना ॥६॥

(२१) कोष-समुद्देशः

कोष शब्द की व्याख्या, उसके गुण व उसके विषय में राजकर्तव्य


यो विपदि सम्पदि च स्वामिनस्तंत्राभ्युदयं कोषयतीति कोषः ॥१॥

अर्थ: जो विपत्ति और संपत्ति के समय राजा के तंत्र (हाथी, घोड़े, रथ और प्यादे रूप चतुरङ्ग सेना), की वृद्धि करता है एवं उसको सुसंगठित करने के लिए धन-वृद्धि करता है, उसे कोष (खजाना) कहते हैं ॥१॥ शुक्र१ विद्वान् ने भी कोष शब्द की यही व्याख्या की है ॥१॥


सातिशयहिरण्यरजतप्रायो व्यावहारिकनाणकबहुलो महापदि व्ययसहश्चेति
कोषगुणाः ॥२॥

अर्थ: अधिक तादाद में सोना व चांदी से युक्त जिसमें व्यवहार में चलने वाले रुपयों और अशर्फियों आदि सिक्कों का आधिक संग्रह पाया जावे और जो संकट समय, अधिक खर्च करने में समर्थ हो, ये कोष के गुण हैं। अर्थात् ऐसे खजाने से राजा व राष्ट्र दोनों का कल्याण होता है ॥२॥ गुरु२ विद्वान् ने भी इसी प्रकार कोष-गुण निरूपण किये हैं ॥१॥ नीतिकार कामन्दक३ ने भी कहा है, कि “जो मोती सुवर्ण और रत्नों से भरपूर, पिता व पितामह से चला आने वाला न्याय से संचय किया हुआ व पुष्कल खर्च सहन करने वाला हो, उसे सम्पत्ति शास्त्र के विद्वानों ने ‘कोष’ कहा है ॥१॥ कोषवान्-धनाढ्य पुरुष को धर्म और धन की रक्षा के निमित्त एवं भृत्यों के भरण पोषणार्थ तथा आपत्ति से बचाव करने के लिए सदा कोष की रक्षा करनी चाहिए ॥२॥”


कोषं वर्धयन्नुत्पन्नमर्थमुपयुञ्जीत ॥३॥

अर्थ: कोष की सदा वृद्धि करनी चाहिए, न कि हानि ॥१॥


कुतस्तस्यायत्यां श्रेयांसि यः प्रत्यहं काकिण्यापि कोषं न वर्धयति ॥४॥

अर्थ: जो राजा सदा कौड़ी-कौड़ी जोड़कर भी, अपने कोष की वृद्धि नहीं करता, उसका भविष्य में किस प्रकार कल्याण हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता ॥४॥ गुरु ने भी कोषवृद्धि के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


कोषो हि भूपतीनां जीवनं न प्राणाः ॥५॥

अर्थ: निश्चय से कोष ही राजाओं का जीवन-प्राण-रक्षा का साधन है; प्राण नहीं। सारांश यह है कि राज-तन्त्र कोषाश्रित है, इसके बिना वह नष्ट हो जाता है ॥५॥ भागुरि विद्वान् ने लिखा है कि जिस प्रकार पक्षीगण कुलीन (पृथ्वी में लीन) और ऊँचे भी पेड़ को सूखा-फल-पुष्प विहीन देखकर दूसरे फल-पुष्पयुक्त पेड़ पर चले जाते हैं, उसी प्रकार राजकीय सेवक लोग-पदाधिकारी कुलीन और उन्नतिशील राजा को छोड़कर दूसरे (धनाढ्य) की सेवा करने लगते हैं ॥१॥


क्षीणकोषो हि राजा पौरजनपदानन्यायेन ग्रसते ततो राष्ट्रशून्यता स्यात् ॥६॥

अर्थ: कोषविहीन राजा देशवासियों के निर्दोष होने पर भी उन्हें अन्याय से दण्डित कर जुर्माना आदि द्वारा उनसे प्रचुर धनराशि ग्रहण करने को सतत प्रयत्नशील रहता है। जिसके फलस्वरूप अन्याय से पीड़ित प्रजा वहाँ से भाग जाती है, जिससे राष्ट्र में शून्यता हो जाती है। सारांश यह है कि राजा को न्यायोचित उपायों से कोष वृद्धि करते रहना चाहिए ॥६॥ गौतम विद्वान् ने भी उपरोक्त कथन की पुष्टि की है ॥१॥


कोषो राजेत्युच्यते न भूपतीनां शरीरं ॥७॥

अर्थ: नीतिज्ञ पुरुष राज-कोष को ही राजा मानते हैं, न कि उसके शरीर को। क्योंकि कोष-शून्य होने से वह शत्रुओं द्वारा पीड़ित किया जाता है ॥७॥ रैभ्य विद्वान् ने भी इसी प्रकार कहा है ॥१॥


यस्य हस्ते द्रव्यं स जयति ॥८॥

अर्थ: जिसके पास धन-राशि है वही विजयलक्ष्मी प्राप्त करता है ॥८॥


धनहीनः कलत्रेणापि परित्यज्यते किं पुनर्नान्यैः ॥९॥

अर्थ: निर्धन को, जबकि उसे स्वयं उसकी पत्नी भी छोड़ देती है, तो फिर सेवकों द्वारा उसे छोड़े जाने में विशेषता ही क्या है ? सारांश यह है कि संकट पड़ने पर निर्धन की कोई सहायता नहीं करता। अतः विवेकी पुरुष को न्यायोचित उपायों द्वारा धन-संचय करने में प्रयत्नशील रहना चाहिए ॥९॥


न खलु कुलाचाराभ्यां पुरुषः सर्वोऽपि सेव्यतामेति किन्तु वित्तेनैव ॥१०॥

अर्थ: सेवक लोग कुलीन और सदाचारी होने से ही मनुष्य को श्रेष्ठ या सेवा-योग्य नहीं समझते बल्कि धनाढ्य होने से ही उसे श्रेष्ठ मानते हैं। संसार में दरिद्र व्यक्ति के कितने ही कुलीन और सदाचारी होने पर उसकी सेवार्थ कोई प्रस्तुत नहीं होता, क्योंकि वहाँ जीविकोपार्जन का साधन (धन) नहीं है, जबकि नीच कुल में उत्पन्न और चारित्रभ्रष्ट होने पर भी धनाढ्य व्यक्ति को जीविका हेतु सभी लोग सेवा करते हैं। निष्कर्ष यह है कि कुलीन और सदाचारी होने पर भी राजा के लिए राज-तन्त्र को नियमित व व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए न्यायोचित उपायों द्वारा धन संग्रह कर कोष-वृद्धि करते रहना चाहिए ॥१०॥


स खलु महान् कुलीनश्च यस्यास्ति धनमनूनं ॥११॥

अर्थ: जिसके पास प्रचुर धन विद्यमान है, वही महान् और कुलीन कहलाता है ॥११॥


किं तया कुलीनतया महत्तया वा या न सन्तर्पयति परान् ॥१२॥

अर्थ: जो आश्रितों को सन्तुष्ट नहीं कर पाता, उसकी निरर्थक कुलीनता और बड़प्पन से कोई लाभ नहीं है। निष्कर्ष यह है कि पुरुष लोक में अपनी कुलीनता व बड़प्पन धन द्वारा आश्रितों की रक्षा करने के उपरान्त ही कायम रख सकता है, अतएव धन-संग्रह अनिवार्य है। धनाढ्य पर कंजूस मनुष्य का बड़प्पन व्यर्थ है क्योंकि उसके आश्रित उससे संतुष्ट नहीं रह पाते ॥१२॥ गर्ग१ विद्वान् ने भी कृपण के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


तस्य किं सरसो महत्त्वेन यत्र न जलानि ॥१३॥

अर्थ: उस तालाब के विस्तीर्ण होने से क्या लाभ है ? जिसमें पर्याप्त जल नहीं परन्तु जल से परिपूर्ण छोटा तालाब भी इससे कहीं अधिक प्रशंसनीय है। उसी प्रकार मनुष्य कुलीनता आदि से बड़ा होने पर भी यदि दरिद्र है तो उसका बड़प्पन व्यर्थ है। अतः न्यायोचित साधनों द्वारा धन-संचय महत्त्वपूर्ण होता हैं ॥१३॥


देवद्विजवणिजां धर्माध्वरपरिजनानुपयोगिद्रव्यभागैराढ्यविधवानियोगिग्राम-
कूटगणिकासंघपाखण्डिविभवप्रत्यादानैः समृद्धपौरजानपदद्रविण
संविभागप्रार्थनैरनुपक्षयश्रीकामंत्रिपुरोहितसामन्तभूपालानुनयग्रहागमनाभ्यां
क्षीणकोषः कोषं कुर्यात् ॥१४॥

अर्थ: खाली खजाने को भरने के लिए राजा निम्नलिखित चार उपाय उपयोग में लावे (१) विद्वान् ब्राह्मण और व्यापारियों से उनके द्वारा संचित किये हुए धन में से क्रमशः धर्मानुष्ठान यज्ञानुष्ठान और कौटुम्बिक-पालन के अतिरिक्त जो धन-राशि शेष बचे, उसे लेकर अपनी कोष-वृद्धि करे। (२) धनाढ्य पुरुष, सन्तान-हीन धनाढ्य, विधवायें, धर्माध्यक्ष आदि ग्रामीण अधिकारीवर्ग, वेश्याओं का समूह और कापालिक आदि पाखंडी लोगों के धन पर कर लगाकर उनकी सम्पत्ति का कुछ अंश लेकर अपने कोष की वृद्धि करे। (३) सम्पत्तिशाली देशवासियों की प्रचुर धन-राशि का विभाजन करके उनके भलीभाँति निर्वाह योग्य छोड़कर, अवशिष्ट धन को उनसे प्रार्थनापूर्वक शान्ति के साथ लेकर अपने कोष की वृद्धि करे। (४) अचल सम्पत्तिशाली, मंत्री, पुरोहित और अधीनस्थ राजा लोगों का अनुनय और विनय करके उनके घर जाकर उनसे धन-याचना करे और उस धन से अपनी कोष-वृद्धि करे ॥१४॥ शुक्र२ विद्वान् ने भी राजकीय कोष-वृद्धि के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥

(२२) बल-समुद्देशः

द्रविणदानप्रियभाषणाभ्यामरातिनिवारणेन यद्धि हितं स्वामिनं सर्वावस्थासु
बलते संवृणोति बलम् ॥१॥

अर्थ: जो शत्रुओं का निवारण करके धन-दान व मधुर भाषण द्वारा अपने स्वामी के सभी प्रयोजन सिद्ध करके उसका कल्याण करता है एवं उसे आपत्तियों से सुरक्षित रखकर शक्ति प्रदान करता है अतः उसे बल-सैन्य (हाथी, घोड़े, रथ, पैदल रूप चतुरङ्ग सेना) कहते हैं ॥१॥


बलेषु हस्तिनः प्रधानमंगं स्वैरवयवैरष्टायुधा
हस्तिनो भवन्ति ॥२॥

अर्थ: चतुरङ्ग सेना में हाथी प्रधान माने जाते हैं, क्योंकि वे अष्टायुध हैं। अर्थात् वे अपने चारों पैरों, दो दाँत, पूँछ और सूंड रूप शस्त्रों से युद्ध में शत्रुओं का विनाश करते हुए विजय-श्री प्राप्त करते हैं। जबकि अन्य पैदल आदि सैनिक दूसरे खड्ग आदि हथियारों के धारण करने से आयुधवान (शस्त्रधारी) कहे जाते हैं।


हस्तिप्रधानो विजयो राज्ञां यदेकोऽपि हस्ती सहस्रं योधयति
न सीदति प्रहारसहस्रेणापि ॥३॥

अर्थ: राजाओं की विजय के प्रधान कारण हाथी ही होते हैं; क्योंकि युद्धभूमि में वह शत्रुकृत हजारों प्रहारों से ताड़ित किये जाने पर भी व्यथित न होकर अकेला ही हजारों सैनिकों से युद्ध करता रहता है ॥३॥


जातिः कुलं वनं प्रचारश्च न हस्तिनां प्रधानं
किन्तु शरीर बलं शौर्यं शिक्षा च तदुचिता च सामग्री सम्पत्तिः ॥४॥

अर्थ: हाथी जाति, कुल, वन और प्रचार के ही कारण प्रधान नहीं माने जाते परन्तु निम्नलिखित चार गुणों से मुख्य माने जाते हैं (१) उनका शरीर हृष्ट-पुष्ट व शक्तिशाली होना चाहिए; क्योंकि यदि वे बलिष्ठ नहीं हैं और उनमें अन्य मन्द व मृग-आदि जाति, ऐरावत-आदि कुल, प्राच्य-आदि वन, पर्वत व नदी-आदि प्रचार के पाये जाने पर भी वे युद्ध-भूमि में विजयी नहीं हो सकते। (२) शौर्य, पराक्रम-हाथियों का पराक्रमी होना आत्यावश्यक है क्योंकि इसके बिना आलसी हाथी अपने ऊपर आरूढ़ महावत के साथ-साथ युद्धभूमि में शत्रुओं द्वारा मार डाले जाते हैं। (३) उनमें युद्धोपयोगी शिक्षा का होना भी अनिवार्य है, क्योंकि शिक्षित हाथी युद्ध में विजयी होते हैं, जबकि अशिक्षित अपने साथ-साथ महावत को भी ले डूबता है और बिगड़ जाने पर उलटकर अपने स्वामी की सेना को भी रौंद डालता है। (४) युद्धोपयोगी कारण सामग्री रूप लक्ष्मी-हाथियों में युद्धोपयोगी कर्त्तव्यशीलता आदि सामग्री (कठिन स्थानों में गमन करना, शत्रुसेना का उन्मूलन करना आदि) का होना भी प्रधान है; क्योंकि इसके बिना वे विजयश्री प्राप्त कराने में असमर्थ होते हैं ॥४॥


अशिक्षिता हस्तिनः केवलमर्थप्राणहराः ॥५॥

अर्थ: युद्धोपयोगी शिक्षा-शून्य हाथी केवल अपने स्वामी का धन व महावत आदि के प्राण नष्ट कर देते हैं। क्योंकि उनके द्वारा विजय-लाभ रूप प्रयोजन-सिद्धि नहीं होती, इससे वे निरर्थक घास व अन्न आदि भक्षण द्वारा अपने स्वामी की आर्थिक-तृप्ति करके अपने आरूढ़ महावत के भी प्राण ले लेते हैं एवं बिगड़ जाने पर उलट कर अपने स्वामी की सेना को भी रौंद डालते हैं ॥५॥


सुखेन यानमात्मरक्षा परपुरावमर्दनमरिव्यूहविघातो जलेषु सेतुबन्धो वचनादन्यत्र
सर्वविनोदहेतवश्चेति हस्तिगुणाः ॥६॥

अर्थ: हाथियों में निम्न प्रकार गुण होते हैं। १. कठिन मार्ग को सरलता पूर्वक पार कर जाना। २. शत्रु-कृत प्रहारों से अपनी तथा महावत की रक्षा करना। ३. शत्रु-नगर का कोट व प्रवेश द्वार भंग कर उसमें प्रविष्ट होकर नेस्तनाबूद करना। ४. शत्रु के सैन्य-समूह को कुचलकर नष्ट करना। ५. नदी के जल में एक साथ कतारबार खड़े होकर पुल बाँधना। ६. केवल वचनालाप-बोलना छोड़कर अपने स्वामी के लिए सभी प्रकार के आनन्द उत्पन्न करना ॥६॥


घोड़ों की सेना, उसका माहात्म्य व जात्यश्व का माहात्म्य


अश्वबलं सैन्यस्य जंगमं प्रकारः ॥७॥

अर्थ: घोड़ों की सेना चतुरङ्ग सेना का चलता-फिरता भेद है, क्योंकि वे अत्यन्त चपल व वेग से गमन करने वाले होते हैं ॥७॥


अश्वबलप्रधानस्य हि राज्ञः
कदनकन्दुकक्रीड़ाः प्रसीदन्ति श्रियः, भवन्ति दूरस्था अपि शत्रवः करस्थाः ।
आपत्सु सर्वमनोरथ-सिद्धिरस्तुरंगे एव, सरणमपसरणमवस्कन्दः परानीकभेदनं च
तुरङ्गमसाध्यमेतत् ॥८॥

अर्थ: जिस राजा के पास अश्व-सेना प्रधानता से विद्यमान है, उस पर युद्ध रूपी गेंद से क्रीड़ा करने वाली लक्ष्मी-विजयश्री प्रसन्न होती है जिसके फलस्वरूप उसे प्रचुर सम्पत्ति मिलती है। और दूरवर्ती शत्रु लोग भी निकटवर्ती हो जाते हैं। इसके द्वारा विजिगीषु आपत्तिकाल में अभिलषित पदार्थ प्राप्त करता है। शत्रुओं के सामने जाना और मौका पाकर वहाँ से भाग जाना, छल से उन पर हमला करना व शत्रु-सेना को छिन्न-भिन्न कर देना, ये कार्य अश्व-सेना द्वारा ही सिद्ध होते हैं रथादि से नहीं ॥८॥


जात्यारूढ़ो विजिगीषुः शत्रोर्भवति तत्तस्य गमनं
नारातितर्ददाति ॥९॥

अर्थ: जो विजिगीषु जात्यश्व पर आरूढ़ होकर शत्रु पर हमला करता है, इससे उसकी विजय होती है और शत्रु विजिगीषु पर प्रहार नहीं कर सकता ॥९॥


तर्जिका, (स्व) स्थलाणा करोखरा गाजिगाणा केकाणा
पुष्टाहारा गव्हारा सादुयारा सिन्धुपारा जात्याश्वानां नवोत्पत्तिस्थानानि ॥१०॥

अर्थ: जाति-अश्व के ९ उत्पत्ति स्थान-जातियाँ-हैं। १. तार्जिंका, २. स्वस्थलाणा, ३. करोखरा, ४ गाजिगाणा, ५ केकाणा, ६ पुष्टाहारा, ७. गाव्हारा, ८. सादुयारा व ९. सिन्धुपारा ॥१०॥


रथ-सैन्य का माहात्म्य, व सप्तम-उत्साही सेना एवं उसके गुण


समा भूमिर्धनुर्वेदविदो रथारूढाः प्रहर्त्तारो यदा तदा किमसाध्यं नाम
नृपाणाम् ॥११॥

अर्थ: जब धनुर्विद्या में प्रवीण धनुर्धारी योद्धागण रथारूढ़ होकर समतल युद्धभूमि में शत्रुओं पर प्रहार करते हैं, तब विजिगीषु राजाओं को कोई भी चीज-विजय-लाभादि-असाध्य नहीं। सारांश यह है, कि समतल भूमि-गर्त-पाषाणादि रहित जमीन व प्रवीण योद्धाओं के होने से ही युद्ध में विजिगीषु को विजय श्री प्राप्त होती है। क्योंकि ऊबड़-खाबड़ भूमि और अकुशल योद्धाओं के कारण रथ-संचालन व युद्धादि भली-भाँति न होने से निश्चय ही हार होती है ॥१॥ शुक्र विद्वान् के उद्धरण का भी यही आशय है ॥१॥


रथैरवमर्दितं परबलं सुखेन जीयते मौल-भृत्यकभृत्यश्रेणी मित्राटविकेषु पूर्वं पूर्वं
बलं यतेत ॥१२॥

अर्थ: विजिगीषु के रथों द्वारा नष्ट-भ्रष्ट हुई शत्रु सेना आसानी से जीती जाती है, परन्तु उसे मौल (वंशपरम्परा से चली आई, प्रामाणिक विश्वास-पात्र व युद्ध विद्या-विशारद पैदल सेना,) अधिकारी सैन्य, सामान्य सेवक, श्रेणी सेना, मित्र सेना व आटमिक सैन्य इन छह प्रकार की सेना में से सबसे पहले सारभूत सैन्य को युद्ध में सुसज्जित करने का प्रयत्न करना चाहिए। क्योंकि फल्गुसैन्य (कमजोर, अविश्वासी व युद्ध करने में अकुशल निस्सार सैन्य) द्वारा हार होना निश्चित रहता है ॥१२॥


अथान्यत्सप्तममौत्साहिकं बलं यद्विजिगीषोर्विजययात्राकाले
परराष्ट्रबिलोडनार्थमेव मिलति क्षत्रसारत्त्वं शस्त्रज्ञत्वं शौर्यसारत्वमनुरक्तत्वं
चेत्यौत्साहिकस्य गुणाः ॥१३॥

अर्थ: उक्त छह प्रकार की सेनाओं के सिवाय एक सातवीं उत्साही सेना भी होती है। जब बिजिगीषु शत्रु, को जीतने के लिए उस पर चतुरङ्ग सेना द्वारा प्रबल आक्रमण करता है, तब वह शत्रु-राष्ट्र को नष्ट-भ्रष्ट नेस्तनाबूद-करने व धन लूटने के लिए इस की सेना में मिल जाती है। इसमें क्षात्र तेज-युक्त शस्त्र-विद्याप्रवीण व इसमें अनुराग युक्त क्षत्रिय वीर पुरुष सैनिक होते हैं ॥१३॥


मौलवलाविरोधेनान्यद्दलमर्थमानाभ्यामनुगृह्णीयात् ॥१४॥

अर्थ: राजा अपने मौल सैन्य-प्रधान सेना-का अपमान न करके-धन मानादि द्वारा अनुरक्त करके-उसके साथ-साथ उत्साही सैन्य (शत्रु पर आक्रमणार्थ अपनी ओर प्रविष्ट हुई अन्य राजकीय सेना) को भी धन व मान देकर प्रसन्न रखे ॥१४॥


मौलाख्यमापद्यनुगच्छति
दण्डितमपि न द्रुह्यति भवति चापरेषामभेद्यम् ॥१५॥

अर्थ: विजिगीषु का मौलसैन्य आपत्ति काल में भी उसका साथ देता है और दण्डित किये जाने पर भी द्रोह नहीं करता, एवं शत्रुओं द्वारा फोड़ा नहीं जाता। अतः विजिगीषु उसे धन-मानादि देकर सदा सन्तुष्ट रखे ॥१५॥


न तथार्थः पुरुषान् योधयति
यथा स्वाभिसम्मानः ॥१६॥

अर्थ: जिस प्रकार राजा से दिया गया सम्मान सैनिकों को युद्ध करने में प्रेरित करता है उस प्रकार दिया हुआ धन प्रेरित नहीं करता। अर्थात् सैनिकों के लिए धन देने की अपेक्षा सम्मान देना कहीं ज्यादा श्रेयस्कर है ॥१६॥


स्वयमनवेक्षणं देयांशहरणं कालयापना व्यसनाप्रतीकारो विशेषविधावसंभावनं
च तंत्रस्य विरक्तिकारणानि ॥१७॥

अर्थ: राजा के निम्नलिखित कार्यों से, उसकी सेना उसके विरुद्ध हो जाती है। स्वयं अपनी सेना को देखरेख न करना, उनके देने योग्य वेतन में से कुछ भाग हड़प कर लेना, आजीविका के योग्य वेतन को यथासमय न देकर विलम्ब से देना, उन्हें विपत्तिग्रस्त देखकर भी सहायता न करना और विशेष अवसरों (पुरुषोत्पत्ति, विवाह व त्यौहार आदि खुशी के मौकों) पर उन्हें धनादि से सम्मानित न करना ॥१७॥ इसलिए राजा को समस्त प्रयत्नों से अपनी सेना को सन्तुष्ट रखना चाहिए। भारद्वाज१ विद्वान् ने भी राजा से सेना के विरुद्ध होने के उपरोक्त कारण बताये हैं ॥१॥


स्वयमवेक्षणीयसैन्यं पैरैर्वेक्ष्यन्नर्थतंत्राभ्यां परिहीयते ॥१८॥

अर्थ: जो राजा आलस्यवश स्वयं अपने सैन्य की देखरेख न करके दूसरे धूर्तों से कराता है, वह निःसंदेह धन और सैन्य से रहित हो जाता है ॥१८॥ जैमिनि२ विद्वान् का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


आश्रितभरणे स्वामिसेवायां धर्मानुष्ठाने पुत्रोत्पादने च खलु न सन्ति प्रतिहस्ताः ॥१९॥

अर्थ: नैतिक व्यक्ति को निश्चय से सेवकों का भरण-पोषण, स्वामी की सेवा,धार्मिक कार्यों का अनुष्ठान और पुत्रों को उत्पन्न करना, ये चार बातें किसी दूसरे पुरुष से न कराकर स्वयं करना चाहिए ॥१९॥ शुक्र३ विद्वान् ने भी उपरोक्त कार्य दूसरों से न कराने के लिए लिखा है ॥१॥


तावद्देयं यावदाश्रिताः सम्पूर्णतामाप्नुवन्ति ॥२०॥

अर्थ: स्वामी को अपने अधीन सेवकों के लिए इतना पर्याप्त धन देना चाहिए; जिससे वे सन्तुष्ट हो सकें ॥२०॥ शुक्र४ विद्वान् ने भी सेवकों को आर्थिक कष्ट देने से राजा की हानि बताई है ॥१॥


न हि स्वं द्रव्यमव्ययमानो राजा दण्डनीयः ॥२१॥

अर्थ: राजा, यदि सेवकों को अपना धन (वेतन आदि) नहीं देता, तो भी उन्हें उससे झगड़ा नहीं करना चाहिए ॥२१॥


को नाम सचेताः स्वगुडंचौर्यात्खादेत् ॥२२॥

अर्थ: जिस प्रकार स्वाभिमानी पुरुष अपने गुड़ को चोरी से नहीं खाता उसी प्रकार वह राजा से क्रोधित होकर अपनी हानि भी नहीं करवाना चाहता ॥२२॥


किं तेन जलदेन यः काले न वर्षति ॥२३॥

अर्थ: उस मेघ से क्या लाभ हैं ? जो समय पर पानी नहीं बरसाता उसी प्रकार जो समय पर अपने सेवकों की सहायता नहीं करता, वह स्वामी भी व्यर्थ है ॥२३॥


स किं स्वामी य आश्रितेषु व्यसने न प्रविधत्ते ॥२४॥

अर्थ: जो स्वामी संकटकालीन समय में अपने अधीन सेवकों की सहायता नहीं करता वह निंद्य है ॥२४॥


अविशेषज्ञे राज्ञि को नाम तस्यार्थे प्राणव्यये नोत्सहेत ॥२५॥

अर्थ: जो राजा सेवकों के गुणों और दोषों को परखने में शून्य है, अर्थात् जो विश्वासी और अविश्वासी (मणि और काँच) में फर्क न जान कर दोनों के साथ समान व्यवहार करता है, उसके लिए कौन सेवक प्राणों का बलिदान करने के लिए युद्धभूमि में शत्रु से लड़ेगा ? अर्थात् कोई नहीं ॥२५॥

(२३) मित्र-समुद्देशः

यः सम्पदीव विपद्यपि मेद्यति तन्मित्रम् ॥१॥

अर्थ: जो पुरुष सम्पत्तिकाल की तरह विपत्तिकाल में भी स्नेह करता है उसे मित्र कहते हैं । सारांश यह है कि जो लोग सम्पत्तिकाल में स्वार्थ-वश स्नेह करते हैं और विपत्तिकाल में धोखा देते हैं वे मित्र नहीं किन्तु शत्रु हैं ॥१॥ जैमिनि१ विद्वान् ने भी सम्पत्ति व विपत्तिकाल में स्नेह करने वाले व्यक्ति को ‘मित्र’ कहा है ॥१॥


यः कारणमन्तरेण रक्ष्यो रक्षको वा भवति तन्नित्यं मित्रम् ॥१॥

अर्थ: वे दोनों व्यक्ति परस्पर में नित्यमित्र हो सकते हैं, जो शत्रुकृत-पीड़ा-आदि आपत्तिकाल में परस्पर एक दूसरे के द्वारा बचाये जाते हैं या बचाने वाले हैं ॥२॥ नारद२ विद्वान् ने भी नित्यमित्र का यही लक्षण बताया है ॥१॥


तत्सहजं मित्रं यत्पूर्वपुरुषपरम्परायातः सम्बन्धः ॥३॥

अर्थ: वंशपरम्परा के सम्बन्ध से युक्त, भाई-आदि सहज मित्र हैं ॥३॥ भागुरि३ विद्वान् ने भी सहजमित्र का यही लक्षण किया है ॥१॥


यद्वृत्तिजीवितहेतोराश्रितं तत्कृत्रिमं मित्रम् ॥४॥

अर्थ: जो व्यक्ति अपनी उदरपूर्ति और प्राणरक्षा के लिए अपने स्वामी से वेतन आदि लेकर स्नेह करता है, वह ‘कृत्रिम मित्र’ है । क्योंकि वह स्वार्थ-सिद्धिवश मित्रता करता है और जीविकोपयोगी वेतन न मिलने पर अपने स्वामी से मित्रता करना छोड़ देता है ॥४॥ भारद्वाज४ विद्वान् ने भी ‘कृत्रिम मित्र’ का यही लक्षण किया है ॥१॥


व्यसनेषूपस्थानमर्थेष्वविकल्पः स्त्रीषु परमं शौचं कोपप्रसादविषये
वाप्रतिपक्षत्वमिति मित्रगुणाः ॥५॥

अर्थ: जो संकट पड़ने पर मित्र के रक्षार्थ बिना बुलाये उपस्थित होता हो, जो मित्र से स्वार्थ-सिद्धि न चाहता हो अथवा जो उसके धन को छल-कपट से हड़प करने वाला न हो, जिसकी मित्र की स्त्री के प्रति दुर्भावना न हो और मित्र के क्रुद्ध व प्रसन्न होने पर भी उससे ईर्ष्या न रखे ॥१॥ नारद१ विद्वान् ने भी संकट में सहायता करना-आदि मित्र के गुण बताये हैं ॥१॥


दानेन प्रणयः स्वार्थपरत्वं
विपद्युपेक्षणमहितसम्प्रयोगो विप्रलम्भनगर्भप्रश्रयश्चेति मित्रदोषाः ॥६॥

अर्थ: मित्र-द्वारा धनादि प्राप्त होने पर स्नेह करना, स्वार्थ-सिद्धि में लीन रहना, विपत्तिकाल में सहायता न करना, मित्र के शत्रुओं से जा मिलना, छल-कपट और धोखेबाजी से युक्त ऊपरी नम्रता प्रदर्शित करना और मित्र के गुणों की प्रशंसा न करना, ये मित्र के दोष हैं ॥६॥ रैभ्य२ विद्वान् ने भी इसी प्रकार मित्र के दोष प्रकट किये हैं ॥१॥


स्त्रीसंगतिर्विवादोऽभीक्ष्णयाचनमप्रदानमर्थसम्बन्धः परीक्षदोषग्रहणं पैशून्याकर्णनं
च मैत्रीभेदकारणानि ॥७॥

अर्थ: मित्र की स्त्री पर कुदृष्टि रखना, मित्र से वाद-विवाद करना, सदा उससे धनादि मांगना, पर अपना कभी न देना, आपस में लेन-देन का सम्बन्ध रखना, मित्र की निन्दा व चुगली करना, इन बातों से मित्रता भंग (नष्ट) हो जाती है ॥७॥ शुक्र३ विद्वान् ने भी मित्रता-नाशक यही कार्य बताये हैं ॥१॥


न क्षीरात् परं महदस्ति यत्संगतिमात्रेण करोति
नीरमात्मसमं ॥८॥

अर्थ: पानी का, दूध को छोड़कर दूसरा कोई पदार्थ उत्तम मित्र नहीं, क्योंकि वह अपनी संगति मात्र से पानी को अपने समान गुण-युक्त बना देता है। उसी प्रकार मनुष्य को ऐसे उत्तम पुरुष की संगति करनी चाहिए जो उसे अपने समान गुणयुक्त बना सके ॥८॥ गौतम४ विद्वान् का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


न नीरात्परं महदस्ति यन्मिलितमेव संवर्धयति रक्षति च स्वक्षयेण क्षीरम् ॥९॥

अर्थ: पानी को छोड़कर दूसरा कोई पदार्थ दूध का सच्चा मित्र नहीं, जो मिलने मात्र से ही उसकी वृद्धि कर देता है और अग्निपरीक्षा के समय अपना नाश करके भी दूध की रक्षा करता है ॥९॥


येन केनाप्युपकारेण तिर्यंचोऽपि प्रत्युपकारिणोऽव्यभिचारिणश्च न पुनः प्रायेण
मनुष्याः ॥१०॥

अर्थ: संसार में पशुगण भी उपकारी के प्रति कृतज्ञ व विरुद्ध न चलने वाले होते हैं न कि कृतघ्न। मनुष्य प्रायः इसके विपरीत चलने वाले भी देखे जाते हैं-वे उपकारी के प्रति भी कभी-कभी कृतघ्नता कर डालते हैं ॥१०॥


तथा चोपाख्यानकं-अटव्यां किलान्धकूपे पतितेषु
कपिसर्पसिंहक्षशालिकसौवर्णिकेषु कृतोपकारः कंकायननामा कश्चित्पान्थो
विशालायां पुरि तस्मादक्षशालिकाद्व्यापादनमवाप नाडीजंघश्च
गोतमादिति ॥११॥

अर्थ: इतिहास बताता है कि एक समय किसी अटवी (वनी) के घास वगैरह से आच्छादित अन्धकूप में भाग्य से प्रेरित हुए बन्दर, सर्प और शेर ये तीनों जीवजन्तु व आक्षशालिक-एक जुआरी व सुनार ये दोनों पुरुष गिर पड़े। पश्चात् किसी कांकायन नाम के पान्थ ने उन्हें उस अन्धकूप से बाहर निकाला। उपकृत हुए उन पाँचों में से बन्दर, सर्प, शेर व सुनार उसका अनिष्ट न कर उसकी आज्ञोपरान्त अपने-अपने निर्दिष्ट स्थान को चले गए। जुआरी कृतघ्नी होने के कारण उस पान्थ से कपटपूर्ण व्यवहारों से मित्रता कर उसके धन को हरण करने की इच्छा से उसके साथ हो लिया और अनेक ग्रामों व नगरों में भ्रमण करता रहा। पश्चात् एक समय विशाला नाम की नगरी के शून्य मन्दिर में जबकि पान्थ सो रहा था, तब इस जुआरी ने मौका पाकर उसके धन को हरण कर लिया। इससे सिद्ध होता है कि तिर्यंच भी कृतज्ञ होते हैं पर मनुष्य कभी-कभी इसके विपरीत कृतघ्नी भी होते देखे गये हैं। इसी प्रकार गौतम नाम के किसी तपस्वी ने नाड़ीजंघ नाम के उपकारी को स्वार्थवश मार डाला (यह कथानक अन्य ग्रन्थों से जान लेना चाहिए) ॥११॥

(२४) राजरक्षा-समुद्देशः

राज्ञि रक्षिते सर्वं रक्षितं भवत्यतःस्वेभ्यः परेभ्यश्च नित्यं राजा रक्षितव्यः ॥१॥

अर्थ: राजा की रक्षा होने से समस्त राष्ट्र सुरक्षित रहता है, इसलिए उसे अपने कुटुम्बियों तथा शत्रुओं से सदा अपनी रक्षा करनी चाहिए ॥१॥ रैभ्य विद्वान् ने भी राज-रक्षा के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


अतएवोक्तं नयविद्भिः-पितृपैतामहं महासम्बन्धानुबद्धं शिक्षितमनुरक्तं कृतकर्मणं
च जनं आसन्नं कुर्वीत ॥२॥

अर्थ: इसलिए नीतिज्ञों ने कहा है कि राजा अपनी रक्षार्थ ऐसे पुरुष को नियुक्त करे, जो उसके वंश का (भाई-वगैरह) हो अथवा वैवाहिक सम्बन्ध से बंधा हुआ-साला वगैरह हो, और वह नीतिशास्त्र का वेत्ता राजा से अनुराग रखने वाला और राजकीय कर्तव्यों में कुशल हो ॥२॥ गुरु विद्वान् ने भी राजा के शरीर रक्षार्थ यही कहा है ॥१॥


अन्यदेशीयमकृतार्थमानं स्वदेशीयं चापकृत्योपगृहीतमासन्नं न कुर्वीत ॥३॥

अर्थ: राजा, विदेशी पुरुष को, जिसे धन व मान देकर सम्मानित न किया गया हो और पूर्व में सजा पाये हुए स्वदेशवासी व्यक्ति को जो कि बाद में अधिकारी बनाया गया हो, अपनी रक्षार्थ नियुक्त न करे; क्योंकि असम्मानित व दण्डित व्यक्ति द्वेष युक्त होकर उससे बदला लेने की कुचेष्टा करेगा ॥३॥ शुक्र विद्वान् के संगृहीत श्लोकों का भी यही अभिप्राय है ॥१-२॥


चित्तविकृतेर्नास्त्यविषयः किन्न भवति मातापि राक्षसी ॥४॥

अर्थ: विकृत-दुष्ट-चित्तवाला पापीपुरुष कौन-कौन से अनर्थों में प्रवृत्ति नहीं करता ? अर्थात् सभी में प्रवृत्ति करता है, अत्यन्त स्नेहमयी माता भी विकृत-द्वेष युक्त हो जाने पर क्या राक्षसी (हत्यारी) नहीं होती ? अवश्य होती है ॥४॥


अस्वामिकाः प्रकृतयः समृद्धा अपि निस्तरीतुं न शक्नुवन्ति ॥५॥

अर्थ: प्रकृति वर्ग (मंत्री व सेनापति-आदि राजकर्मचारी) समृद्धिशाली हो करके भी जब राजा से रहित होते हैं, तब आपत्ति को पार नहीं कर सकते-शत्रुओं द्वारा होने वाले संकटों से राष्ट्र का बचाव नहीं कर सकते ॥५॥


देहिनि गतायुषि सकलांगे किं करोति धन्वन्तरिरपि वैद्यः ॥६॥

अर्थ: जिसकी आयु बाकी नहीं है, वह सकल अङ्गोपांगों या ७२ कलाओं से युक्त होने पर भी धन्वन्तरि समान अति निपुण वैद्य के द्वारा भी नहीं बचाया जा सकता । सारांश यह है कि जिस प्रकार जीवन रक्षा में आयु मुख्य है, उसी प्रकार राष्ट्र के सात अंगों (स्वामी, मंत्री, राज्य, किला, खजाना, सेना व मित्र वर्ग में राजा की प्रधानता है, अतः सबसे प्रथम उसे अपनी रक्षा करनी चाहिए ॥६॥


राज्ञस्तावदासन्ना स्त्रिय आसन्नतरा दायादा आसन्नतमाश्च पुत्रास्ततो राज्ञः प्रथमं
स्त्रीभ्यो रक्षणं ततो दायादेभ्यस्ततः पुत्रेभ्यः ॥७॥

अर्थ: राजा के पास रहने वाली स्त्रियाँ होती हैं और विशेष तौर से पास रहने वाले कुटुम्बीजन व पुत्र होते हैं; इसलिए उसे सबसे पहले स्त्रियों से पश्चात् कुटुम्बियों और पुत्रों से अपनी रक्षा करनी चाहिए ॥७॥


आवष्ठादाचक्रवर्तिनः सर्वेऽपि स्त्रीसुखाय क्लिश्यति ॥८॥

अर्थ: गर्ग विद्वान् का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


निवृत्तस्त्रीसंगस्य धनपरिग्रहो मृतमण्डनमिव ॥९॥

अर्थ: जिस प्रकार मुर्दे को वस्त्राभूषणों से अलंकृत करना व्यर्थ है, उसी प्रकार स्त्री-रहित पुरुष का धनसंचय करना व्यर्थ है ॥९॥ बल्लभदेव विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


सर्वाः स्त्रियः क्षीरोदवेला इव विषामृतस्थानम् ॥१०॥

अर्थ: जिस प्रकार क्षीर समुद्र की लहरों में विष व अमृत दोनों पाये जाते हैं उसी प्रकार स्त्रियों में भी विष (दुःख देना) और अमृत (सुख देना) या क्रूरता एवं मृदुता ये दोनों दोष व गुण पाये जाते हैं, क्योंकि प्रतिकूल स्त्री हानिकारक एवं अनुकूल सुख देने वाली होती है ॥१०॥ बल्लभदेव ने भी स्त्रियों को इसी प्रकार विष व अमृत-तुल्य बताया है ॥१॥


मकरदंष्ट्रा इव स्त्रियः स्वभावदेव वक्रशीलाः ॥११॥

अर्थ: जिस प्रकार मगर की दाढें स्वभावतः कुटिल होती हैं; उसी प्रकार स्त्रियाँ भी स्वभावतः कुटिल होती हैं ॥११॥ बल्लभदेव विद्वान् ने भी स्त्रियों को स्वभावतः कुटिल व भयंकर बताया है ॥१॥


स्त्रीणां वशोपायो देवानामपि दुर्लभः ॥१२॥

अर्थ: विरुद्ध हुई स्त्रियों को वशीभूत करने का उपाय देवता भी नहीं जानते ॥१२॥ बल्लभदेव विद्वान् ने भी इसी प्रकार कहा है ॥१॥


कलत्रं रूपवत्सुभगमनवद्याचारमपत्यवदिति महतः पुण्यस्य फलम् ॥१३॥

अर्थ: रूपवती, सौभाग्यवती, पतिव्रता, सदाचारिणी एवं पुत्रवती स्त्री पूर्वजन्म-कृत महान् पुण्य से प्राप्त होती है ॥१३॥ चारायण विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


कामदेवोत्संगस्थापि स्त्री पुरुषान्तरमभिलषति च ॥१४॥

अर्थ: चंचल प्रकृति वाली स्त्री कामदेव के समान सुन्दर पति के पास रहकर भी दूसरे पुरुष की कामना करती है ॥१४॥


न मोहो लज्जा भयं स्त्रीणां रक्षणं किन्तु परपुरुषादर्शनं संभोगः सर्वसाधारणताच ॥१५॥

अर्थ: पर-पुरुष से सम्पर्क न रखने वाली, पति द्वारा काम सेवन-सुख व अभिलषित वस्तुएँ प्राप्त करने वाली और ईर्ष्याहीन पति वाली स्त्री सदाचारिणी (पतिव्रता) रह सकती है, पर स्नेह, लज्जा और डर रखने वाली नहीं ॥१५॥


दानदर्शनाभ्यां समवृत्तौ हि पुंसि नापराध्यन्ते स्त्रियः ॥१६॥

अर्थ: जिन स्त्रियों का पति दान (वस्त्रभूषण-आदि का देना) व दर्शन-प्रेम पूर्ण दृष्टि द्वारा सबके साथ पक्षपात-रहित एक-सा बर्ताव करता है, उससे वे वैर-विरोध नहीं करतीं-उसके वश में रहती हैं ॥१६॥


परिगृहीतासु स्त्रीषु प्रियाप्रियत्वं न मन्येत ॥१७॥

अर्थ: नैतिक पुरुष अपनी विवाहित सुन्दर पत्नियों से प्रेम व कुरूप स्त्रियों से ईर्ष्या न करे-पक्षपात रहित एक-सा व्यवहार रखे, अन्यथा कुरूप स्त्रियाँ विरुद्ध होकर उसका अनिष्ट-चिंतन करने लगती हैं ॥१७॥


कारणवशान्निम्बोऽप्यनुभूयते एव ॥१८॥

अर्थ: जिस प्रकार रोग-निवृत्ति के लिए कड़वी नीम औषधि के रूप में सेवन की जाती है, उसी प्रकार अपनी रक्षा-आदि प्रयोजनवश कुरूप स्त्री भी उपभोग की जाती है ॥१८॥


चतुर्थदिवसस्नाता स्त्री तीर्थं तीर्थोपराधो महानधर्मानुबन्धः ॥१९॥

अर्थ: रजःस्राव के पश्चात् चौथे दिन स्नान की हुई स्त्री तीर्थ-शुद्ध (उपभोग करने योग्य) मानी गई है, उस समय जो व्यक्ति उसका त्याग कर देता है-सेवन नहीं करता वह अधर्मी है। क्योंकि उसने गर्भधारण में बाधा उपस्थित कर धर्मपरम्परा को अक्षुण्ण चलाने वाली एवं वंश-वृद्धि में सहायक सज्जाति (कुलीन) संतानोत्पत्ति में बाधा उपस्थित की, अतएव चौथे दिन स्नान की हुई स्त्री की उपेक्षा न करनी चाहिए ॥१९॥


ऋतावपि स्त्रियमुपेक्षमाणः पितृणामृणभाजनं ॥२०॥

अर्थ: ऋतु-स्नात-चौथे दिन स्नान की हुई अपनी स्त्री की उपेक्षा करने वाला व्यक्ति सन्तानोत्पत्ति में बाधक होने से अपने पूर्वजों का ऋणी है ॥२०॥


अवरुद्धाः स्त्रियः स्वयं नश्यन्ति स्वामिनं वा नाशयन्ति ॥२१॥

अर्थ: ऋतुकाल में भी सेवन न की जाने वाली स्त्रियाँ अपना वा अपने पति का अनिष्ट कर बैठती हैं ॥२१॥


न स्त्रीणामकर्त्तव्ये मर्यादास्ति वरमविवाहो नोढापेक्षं ॥२२॥

अर्थ: विरुद्ध स्त्रियाँ अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर अनर्थ कर बैठती हैं, अतएव ऋतुकाल में विवाहित स्त्रियों का त्याग करने की अपेक्षा उनसे विवाह न करना ही कहीं अधिक श्रेष्ठ है ॥२२॥


अकृतारक्षस्य किं कलत्रेणाकृष्टतः किं क्षेत्रेण ॥२३॥

अर्थ: जिस प्रकार बिना जोतने-बोने वाले कृषक के लिए खेत व्यर्थ हैं, उसी प्रकार ऋतुकाल में स्त्री का उपभोग न करने वाले मनुष्य के लिए भी स्त्री निरर्थक है, क्योंकि उससे उसका कोई इष्टप्रयोजन (धार्मिक सन्तान-आदि) सिद्ध नहीं होता ॥२३॥


सपत्नीविधानं पत्युरसमंजसं च विमाननमपत्याभावश्च चिरविरहश्च स्त्रीणां
विरक्तकारणानि ॥२४॥

अर्थ: निम्नलिखित बातों से स्त्रियाँ अपने पति से विरक्त (प्रतिकूल) हो जाती हैं-सपत्नीविधान (पति द्वारा सौत का रखना), पति का मनोमालिन्य (ईर्ष्या व द्वेष-आदि) अपमान, अपत्याभाव (सन्तान का अभाव) व चिरविरह (पति का चिरकाल तक विदेश में रहना) अतः नैतिक पुरुष स्त्रियों को अनुकूल रखने के लिए उक्त पाँचों बातों का त्याग करे ॥२४॥


न स्त्रीणां सहजो गुणो दोषो वास्ति किंतु नद्यः
समुद्रमिव यादृशं पतिमाप्नुवन्ति तादृश्यो भवन्ति स्त्रियः ॥२५॥

अर्थ: स्त्रियों में स्वाभाविक गुण या दोष नहीं होते। किंतु उनमें समुद्र में प्रविष्ट हुए नदी के समान पति के गुणों से गुण या दोषों से दोष उत्पन्न हो जाते हैं। जिस प्रकार नदियां समुद्र में मिलने से खारी हो जाती हैं, उसी प्रकार स्त्रियाँ पति के गुणों से गुणवती और दोषों से दोष-युक्त हो जाती हैं ॥२५॥


स्त्रीणां दौत्यं
स्त्रिय एव कुर्युस्तैरश्चोऽपि पुंयोगः स्त्रियं दूषयति किं पुनर्मानुष्यः ॥२६॥

अर्थ: स्त्रियों को सन्देश ले जाने का कार्य दूसरी स्त्रियों द्वारा ही करना चाहिए, पुरुषों से नहीं, क्योंकि जब पशुजाति का पुरुष भी उन्हें दूषित कर देता है तब फिर मनुष्यों से दूषित होने में कोई विशेषता नहीं ॥२६॥


वंशविशुद्ध्यर्थमनर्थपरिहारार्थं स्त्रियो रक्ष्यन्ते न भोगार्थं ॥२७॥

अर्थ: नैतिक मनुष्य अपनी वंश-विशुद्धि और अनर्थों से बचने के लिए स्त्रियों की रक्षा करते हैं, केवल विषय-वासना की तृप्ति के लिए नहीं ॥२७॥


भोजनवत्सर्वसमानाः पण्याङ्गनाः कस्तासु हर्षामर्षयोरवसरः ॥२८॥

यथाकामं कामिनीनां संग्रहः परमनीष्यावानकल्याणावहः प्रक्रमोऽदौवारिके द्वारि
को नाम न प्रविशति ॥२९॥

अर्थ (सूत्र 28 से 29): वेश्याएँ बाजार के भोजन की तरह सर्वसाधारण होती हैं, इसलिए कौन नैतिक पुरुष उन्हें देखकर सन्तुष्ट होगा ? कोई नहीं ॥२८॥ विजिगीषु राजा अभिलषित स्वार्थसिद्धि (शत्रुओं से विजय आदि) के लिए वेश्याओं का संग्रह करता है, परन्तु उसका ये कार्य निरर्थक और कल्याणनाशक है। क्योंकि जिस प्रकार द्वारपाल-शून्य दरवाजे में सभी प्रविष्ट होते हैं, उसी प्रकार सर्वसाधारण द्वारा भोगी जाने वाली वेश्याओं के यहाँ भी सभी प्रविष्ट होते हैं, इसलिए वे शत्रुपक्ष में मिलकर विजिगीषु को मार डालती हैं। अतएव शत्रु विजय अन्य उपाय (सामादि) द्वारा करनी चाहिए; न कि वेश्याओं के द्वारा ॥२९॥ विजिगीषु शत्रु विजय-आदि आवश्यक प्रयोजनवश मातृपक्ष से विशुद्ध (व्यभिचार शून्य) व राजद्वार पर निवास करने वाली वेश्याओं का संग्रह करे ॥३०॥ जिस प्रकार साँप की वामी में प्रविष्ट हुआ मेंढ़क नष्ट हो जाता है; उसी प्रकार जो राजा लोग स्त्रियों के गृह में प्रविष्ट होते हैं, वे अपने प्राणों को खो बैठते हैं, क्योंकि स्त्रियाँ, चंचल प्रकृति वश शत्रु-पक्ष से मिलकर इसे मार डालती हैं या मरवा देती हैं ॥३१॥ गौतम१ विद्वान् ने भी राजा को स्त्री-गृह में प्रविष्ट होने का निषेध किया है ॥१॥ राजा अपने प्राणों की रक्षा के लिए स्त्रियों के गृह से आई हुई कोई भी वस्तु भक्षण न करे ॥३२॥ वादरायण२ ने भी इसी बात की पुष्टि की है ॥१॥ राजा स्वयं भक्षण करने योग्य भोजनादि के कार्य में स्त्रियों को नियुक्त न करे, क्योंकि वे चंचलता वश अनर्थ कर डालती हैं ॥३३॥ भृगु३ विद्वान् का भी इस विषय में यही अभिप्राय है ॥३३॥


मातृव्यंजनविशुद्धा राजवसत्युपस्थायिन्यः स्त्रियः.संभक्तव्याः ॥३०॥


दर्दुरस्य सर्पगृहप्रवेश इव स्त्रीगृहप्रवेशो राज्ञः ॥३१॥


न हि स्त्री गृहादायातं किंचित्स्वयमनुभवनीयम् ॥३२॥


नापि स्वयमनुभवनीयेषु स्त्रियो नियोक्तव्याः ॥३३॥


संवननं स्वातंत्त्र्यं चाभिलषन्त्यः स्त्रियः किं नाम न कुर्वन्ति ॥३४॥

श्रूयते हि किल-आत्मनः स्वच्छन्दवृत्तिमिच्छन्ती विषविदूषितगण्डूषेण
मणिकुण्डला महादेवी यवनेषु निजतनूजराज्यार्थं जघान राजानमङ्गराजम् ॥३५॥

विषालक्तकदिग्धेनाधरेण वसन्तमतिः शूरसेनेषु सुरतविलासं, विषोपलिप्तेन
मेखलामणिना वृकोदरी दशार्णेषु मदनार्णवं, निशितनेमिना मुकुरेण मदराक्षी
मगधेषु मन्मथविनोदं, कवरीनिगूढेनासिपत्रेण चन्द्ररसा पाण्ड्येषु
पुण्डरीकमिति ॥३६॥

अमृतरसवाप्य इव श्रीजसुखोपकरणं स्त्रियः ॥३७॥

कस्तासां कार्याकार्यविलोकेनेऽधिकारः ॥३८॥

अर्थ (सूत्र 34 से 38): वशीकरण, उच्चाटन और स्वेच्छाचार चाहने वाली स्त्रियाँ कौन-कौन से अनर्थ नहीं करतीं ? सभी अनर्थ कर डालती हैं ॥३४॥ भारद्वाज१ विद्वान् ने भी स्त्रियों पर विश्वास न करने के लिए लिखा है ॥१॥ इतिहास बताता है; कि यवनदेश में स्वच्छन्द वृत्ति चाहने वाली मणिकुण्डला नाम की पट्टरानी ने अपने पुत्र के राज्यार्थ अपने पति अङ्गराज नाम के राजा को विष-दूषित शराब के कुरले से मार डाला ॥३५॥ इसी प्रकार शूरसेन (मथुरा) में बसन्तमति नाम की स्त्री ने विष के आलते से रंगे हुए अधरों से सुरतविलास नाम के राजा को, वृकोदरी ने दशार्ण (भेलसा) में विषलिप्त करधनी के मणि द्वारा मदनार्णव राजा को, मदिराक्षी ने मगधदेश में तीखे दर्पण से मन्मथविनोद को और पांड्यदेश में चण्डरसा रानी ने कवरी (केश-पाश) में छिपी हुई छुरी से पुण्डरीक नाम के राजा को मार डाला ॥३६॥
स्त्रियाँ लक्ष्मी से उत्पन्न होने वाले सुख की स्थान (आधार) हैं। अर्थात् जिस प्रकार लक्ष्मी के समागम से मनुष्यों को विशेष सुख प्राप्त होता है; उसी प्रकार स्त्रियों के समागम से भी विशेष सुख मिलता है एवं अमृत रस से भरी हुई बावडियों के समान, मनुष्यों के चित्त में आनन्द उत्पन्न करती हैं। अर्थात् जिस प्रकार अमृत-रस से भरी हुई बावड़ियाँ दर्शनमात्र से मनुष्यों के चित्त में विशेष आनन्द उत्पन्न कर देती हैं; उसी प्रकार स्त्रियाँ भी दर्शनादि से मनुष्यों के चित्त में विशेष आनन्द उत्पन्न कर देती हैं ॥३७॥
शुक्र२ विद्वान् ने भी इसी प्रकार स्त्रियों का माहात्म्य बताया है ॥१॥
मनुष्यों को उनके कर्तव्य व अकर्तव्य देखने से क्या प्रयोजन ? अर्थात् कोई प्रयोजन नहीं। सारांश यह हैं कि स्त्रियाँ स्वाभाविक कोमल व सरल हृदय होती हैं, अतः बुद्धिमान मनुष्यों को उनके साधारण दोषों पर दृष्टिपात न करते हुए उन्हें नैतिक शिक्षा द्वारा सन्मार्ग में प्रवृत्त करना चाहिए ॥३८॥


अपत्यपोषणे गृहकर्मणि शरीरसंस्कारे शयनावसरे स्त्रीणां स्वातंत्र्यं नान्यत्र ॥३९॥

अर्थ: स्त्रियों को सन्तान-पालन, गृहकार्य, शरीर-संस्कार और पति के साथ शयन इन चार बातों में स्वतन्त्रता देनी चाहिए, दूसरे कार्यों में नहीं ॥३९॥ भागुरि१ विद्वान् ने भी उक्त चार बातों में स्त्रियों को स्वतन्त्र रखने को कहा है ॥१॥


अतिप्रसक्तेः स्त्रीषु स्वातंत्र्यं करपत्रमिव पत्युर्नाविदार्य हृदयं विश्राम्यति ॥४०॥

अर्थ: जबकि कामी लोग स्त्रियों में अत्यधिक आसक्त होने के कारण उन्हें सभी कार्यों में स्वतन्त्रता दे देते हैं, तो वे स्वच्छन्द होकर पति के हृदय को उसी प्रकार कष्टों से विदीर्ण किये बिना नहीं रहतीं जैसे कि हृदय में प्रविष्ट हुई तलवार उसे वेधकर ही बाहर निकला करती है ॥४०॥


स्त्रीवशपुरुषो नदीप्रवाहपतितपादप इव न चिरं नन्दति ॥४१॥

अर्थ: जिस प्रकार नदी के प्रवाह में पड़ा हुआ वृक्ष चिरकाल तक अपनी वृद्धि नहीं कर पाता, बल्कि नष्ट हो जाता है, इसी प्रकार स्त्री के वश में रहने वाला पुरुष भी आर्थिक क्षति द्वारा नष्ट हो जाता है, अतः स्त्रियों के अधीन नहीं रहना चाहिए ॥४१॥ शुक्र२ विद्वान् ने भी स्त्रियों के अधीन रहने का निषेध किया है ॥१॥


पुरुषमुष्टिस्था स्त्री खड्गयष्टिरिव कमुत्सवं न जनयति ॥४२॥

अर्थ: जिस प्रकार मुट्ठी में धारण की हुई खड्गयष्टि-तलवार-विजिगीषु का मनोरथ (विजय-लाभादि) पूर्ण करती है, इसी प्रकार पुरुष की आज्ञानुकूल चलने वाली (पतिव्रता) स्त्री भी अपने पति का मनोरथ पूर्ण करती है ॥४२॥ किसी३ विद्वान् ने भी पतिव्रता स्त्री को पति का मनोरथ पूर्ण करने वाली कहा है ॥१॥


नातीव स्त्रियो व्युत्पादनीयाः स्वभावसुभगोऽपि शास्त्रोपदेशः स्त्रीषु, शस्त्रीषु पयोलव इव विषमतां प्रतिपद्यते ॥४३॥

अर्थ: नैतिक पुरुष स्त्रियों को कामशास्त्र की शिक्षा में प्रवीण न बनाये, क्योंकि स्वभाव से उत्तम कामशास्त्र का ज्ञान स्त्रियों को छुरी में पड़े हुए पानी की बूँद समान नष्ट कर देता है। अर्थात् जिस प्रकार पानी की बूँद छुरी पर पड़ने से एकदम नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार कामशास्त्र की शिक्षा भी स्त्रियों को कुलधर्म चारित्रधर्म से गिराकर नष्ट भ्रष्ट कर देती है, अतः स्त्रियों को कामशास्त्र की शिक्षा छोड़कर अन्य लौकिक व धार्मिक शिक्षाएँ देनी चाहिए ॥४३॥ भारद्वाज४ विद्वान् ने भी स्त्रियों को कामशास्त्र की शिक्षा देने का निषेध किया है ॥१॥


वेश्यागमन के दुष्परिणाम


अध्रुवेणाधिकेनाप्यर्थेन वेश्यामनुभवन्पुरुषो न चिरमनुभवति सुखम् ॥४४॥

विसर्जनाकारणाभ्यां तदनुभवे महाननर्थः ॥४५॥

वेश्यासक्तिः प्राणार्थहानिं कस्य न करोति ॥४६॥

अर्थ (सूत्र 44 से 46): जब विवेक-हीन पुरुष वेश्याओं को प्रचुर धन देकर भी उनका उपभोग करता हुआ अधिक समय तक सुखी नहीं हो पाता, तब थोड़ा-सा धन देने वाला कैसे सुखी हो सकता है ? नहीं हो सकता । बिना कारण छोड़ी हुई वेश्याओं के यहाँ पुनः जाने से वे व्यसनी का महान् अनर्थ (प्राणघात) कर डालती हैं वेश्यागामी पुरुष अपने प्राण-धन और मानमर्यादा को खो बैठते हैं ॥४४-४६॥


धनमनुभवन्ति वेश्या न पुरुषं ॥४७॥

अर्थ: वेश्याएँ केवल व्यसनी पुरुष द्वारा दिये हुए धन का ही उपभोग करती हैं, पुरुष का नहीं; क्योंकि निर्धन व्यक्ति ६४ कलाओं का पारगामी (महाविद्वान्) व कामदेव सदृश अत्यन्त रूपवान भी क्यों न हो, उसे वे तत्काल ठुकरा देती हैं; जबकि कुष्ठ-आदि भयानक व्याधियों से पीड़ित व कुरूप धनाढ्य व्यक्ति से अनुराग करती हैं ॥४७॥


धनहीने कामदेवेऽपि न प्रीतिं बध्नन्ति वेश्याः ॥४८॥

अर्थ: वेश्याएं कामदेव समान अत्यन्त रूपवान पर दरिद्र व्यक्ति से कभी भी अनुराग नहीं करती तो फिर भला कुरूप व दरिद्र व्यक्ति से कैसे प्रेम कर सकती हैं ? नहीं कर सकतीं ॥४८॥


स पुमान् न भवति सुखी, यस्यातिशयं वेश्यासु दानं ॥४९॥

स पशोरपि पशुः यः स्वधनेन परेषामर्थवन्तीं करोति वेश्यां ॥५०॥

अर्थ (सूत्र 49 से 50): वेश्याओं में आसक्त पुरुष उन्हें प्रचुर धन देने पर भी कभी सुखी नहीं हो सकता जो मूर्ख वेश्या को अपना प्रचुर धन देता है वह दूसरों को भी धन देने के लिए प्रोत्साहित कर उसे और भी धनाढ्य बनाता है, वह पशु से भी बढ़कर पशु है, क्योंकि वह अपने साथ साथ दूसरों की भी आर्थिक क्षति करता है ॥४९-५०॥


आचित्तविश्रान्ते वेश्यापरिग्रहः श्रेयान् ॥५१॥

अर्थ: विजिगीषु अपने चित्त को शान्ति पर्यन्त (शत्रु विजय पर्यन्त) गुप्तचर-आदि के कार्यार्थ वेश्या-संग्रह करे, इससे वह शत्रुकृत उपद्रवों से देश को सुरक्षित करता है ॥५१॥


सुरक्षितापि वेश्या न स्वां प्रकृतिं परपुरुषसेवनलक्षणां त्यजति ॥५२॥

अर्थ: अच्छी तरह रखवाली की हुई वेश्या दूसरे पुरुष का उपभोग करने रूप अपना स्वभाव नहीं छोड़ती ॥५२॥


प्रकृति-निर्देश


या यस्य प्रकृतिः सा तस्य दैवेनापि नापनेतुं शक्येत ॥५३॥

अर्थ: जिसकी जैसी प्रकृति होती है उसे विधाता भी दूर करने में असमर्थ है ॥५३॥


सुभोजितोऽपि श्वा
किमशुचीन्यस्थीनि परिहरति ॥५४॥

अर्थ: अच्छी तरह भोजनादि द्वारा तृप्त हुआ भी कुत्ता क्या हड्डियाँ चबाना छोड़ सकता है ? नहीं छोड़ सकता ॥५४॥


न खलु कपिः शिक्षाशतेनापि चापल्यं
परिहरति ॥५५॥

अर्थ: धैर्य-धारण की सैकड़ों शिक्षाओं द्वारा समझाया गया भी बंदर क्या कभी अपनी चंचल प्रकृति छोड़ सकता है ? नहीं छोड़ सकता ॥५५॥


इक्षुरसेनापि सिक्तो निम्बः कटुरेव ॥५६॥

अर्थ: गन्ने के मीठे रस से सींचा गया नीम का पेड़ कड़ुआ ही रहता है ॥५६॥


प्रकृति, कृतघ्न कुटुम्बियों का पोषण व उनके विकृति होने का कारण, शारीरिक सौंदर्य व कुटुम्बियों का संरक्षण


क्षीराश्रितशर्करापानभोजितश्चाहिर्न कदाचित् परित्यजति विषम् ॥५७॥

अर्थ: जिस प्रकार सांप को मीठा दूध पिलाने पर भी वह अपनी विषैली प्रकृति नहीं छोड़ सकता उसी प्रकार जिसकी जैसी प्रकृति होती है, उसे वह कदापि नहीं छोड़ सकता । सारांश यह है कि इसी तरह वेश्याएँ भी व्यभिचार-प्रकृति को धन लोभ से नहीं छोड़ सकतीं, इसलिए नैतिक विचारवान मनुष्य को शारीरिक भयंकर बीमारियों (गर्मी-सुजाक-आदि) को उत्पन्न करने वाली एवं धन, धर्म, प्राण व मानमर्यादा नष्ट करने वाली वेश्याओं से सदा दूर रहना चाहिए ॥५७॥


सम्मानदिवसादायुः कुल्यानामपग्रहहेतुः ॥५८॥

अर्थ: जब राजा अपने निकटवर्ती कुटुम्बीजनों को उच्च अधिकारी पदों पर नियुक्त करके जीवनपर्यन्त प्रचुर धनादि देकर उनका संरक्षण करता है, तब वे अभिमान-वश राज्य लोभ से राजा के घातक हो जाते हैं ॥५८॥


तंत्रकोषवर्धिनी वृत्तिर्दायादान्
विकारयति ॥५९॥

अर्थ: राजा द्वारा जब सजातीय कुटुम्बियों के लिए सैन्य व कोष बढ़ाने वाली जीविका दी जाती है, तब वे विकार-युक्त-अभिमानी हो जाते हैं, जिसका परिणाम महाभयंकर होता है- वे शक्ति सम्पन्न होकर अभिमान व राज्य-लोभ-वश राजा का वध-बंधनादि चिंतन करने लगते हैं, अतः उन्हें ऐसी जीविका न देनी चाहिए ॥५९॥


तारुण्यमधिकृत्यसंस्कारसाराहितोपयोगाच्च शरीरस्य
रमणीयत्वं न पुनः स्वभावः ॥६०॥

अर्थ: शरीर में कृत्रिम (बनावटी) सौन्दर्य होता है, न कि स्वाभाविक, क्योंकि युवावस्था को प्राप्त होकर उत्तम वस्त्राभूषणों से अलंकृत होने के कारण वह सुन्दर प्रतीत होता है ॥६०॥


भक्तिविश्रम्भादव्यभिचारिणं कुल्यं पुत्रं वा
संवर्धयेत् ॥६१॥

विनियुञ्जीत उचितेषु कर्मसु ॥६२॥

अर्थ (सूत्र 61 से 62): राजा को अपने पर श्रद्धा (भक्ति) रखनेवाले, भक्ति के बहाने से कभी विरुद्ध न होने वाले नम्र विश्वसनीय व आज्ञाकारी सजातीय कुटुम्बी व पुत्रों का संरक्षण करते हुए उन्हें योग्य पदों पर नियुक्त करना चाहिए ॥६१-६२॥


भर्तुरादेशं न विकल्पयेत् ॥६३॥

अन्यत्र प्राणबाधाबहुजनविरोधपातकेभ्यः ॥६४॥

अर्थ (सूत्र 63 से 64): सेवक की प्राणनाशिनी तथा लोगों से वैर-विरोध उत्पन्न कराने वाली एवं पाप में प्रवृत्ति कराने वाली स्वामी की आज्ञा को छोड़कर (उसे उल्लंघन करते हुए) दूसरे सभी स्थानों में सेवक को अपने स्वामी की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए ॥६३-६४॥


बलवत्पक्षपरिग्रहेषु दायिष्वाप्तपुरुषपुरःसरो विश्वासो वशीकरणं गूढपुरुषनिक्षेपः
प्रणिधिश्चा ॥६५॥

अर्थ: जब राजा के सजातीय कुटुम्बी लोग तन्त्र (सैन्य) व कोषशक्ति से बलिष्ठ हो जावें, उस समय उनके वश करने का पहला उपाय यह है कि वह अपने शुभचिन्तक व प्रामाणिक पुरुषों को अग्रेसर नियुक्त कर उनके द्वारा कुटुम्बियों को अपने में विश्वास उत्पन्न करावे और दूसरा उपाय यह है कि उनके पास गुप्तचरों को नियुक्त करे, ताकि उनके समस्त अभिप्राय राजा को विदित हो सके। सारांश यह है कि उक्त उपायों द्वारा उनकी सारी चेष्टाएँ विदित होने पर उनके वशीकरणार्थ प्रयोग की हुई साम-दाम-आदि उपायों की योजनाएँ सफल होंगी ॥६५॥


दुर्बोधे सुते दायादे वा सम्यग्युक्तिभिर्दुर्भिनिवेशमवतारयेत् ॥६६॥

अर्थ: नैतिक मनुष्य को पुत्र व भार्या वगैरह कुटुम्बी जनों का मूर्खता-पूर्ण दुराग्रह अच्छी युक्तियों (युक्ति-युक्त वचनों) द्वारा नष्ट कर देना चाहिए ॥६६॥


साधुषूपचर्यमाणेषु विकृतिभजनं स्वहस्ताङ्गारकर्षणमिव ॥६७॥

अर्थ: उपकार करने वाले शिष्ट पुरुषों के साथ अन्याय का बर्ताव करने वाला अपने हाथों से अंगारे खींचने समान अपनी हानि करता है। अर्थात् जिस प्रकार अपने हाथों से अग्नि के अंगारों को खींचने से जल जाते हैं, उसी प्रकार उपकार करने वाले शिष्ट पुरुषों के साथ अन्याय करने से अधिक हानि (आर्थिक-क्षति आदि) होती है ॥६७॥


क्षेत्रबीजयोर्वैकृत्यमपत्यानि विकारयति ॥६८॥

अर्थ: माता-पिता की अकुलीनता उनके पुत्रों को विकार-युक्त-नीचकुल का-बना देती है एवं सन्तान के जघन्य आचरण से माता-पिता की अकुलीनता जानी जाती है ॥६८॥


कुलविशुद्धिरुभयतः प्रीतिर्मनःप्रसादोऽनुपहतकालसमयश्च श्रीसरस्वत्यावाहन-
मंत्रपूतपरमान्नोपयोगश्च गर्भाधाने पुरुषोत्तममवतारयति ॥६९॥

अर्थ: दम्पति निम्न प्रकार कारण-सामग्री से उत्तम, कुलीन व भाग्यशाली पुत्र उत्पन्न करते हैं। १. कुलविशुद्धि-दम्पति के माता-पिता का वंश, परम्परा से चली आने वाली पिंड-शुद्धि से शुद्ध (सज्जाति) वंश होना चाहिए। भगवज्जिनसेनाचार्य¹ ने भी कहा है कि वंश-परम्परा से चली आई पिता की वंश-शुद्धि ‘कुल’ और माता को वंश शुद्धि ‘जाति’ है एवं दोनों (कुल व जाति) की शुद्धि को ‘सज्जाति’ कहते हैं। अभिप्राय यह है कि जिन दम्पतियों के बीज-वृक्ष समान परम्परा से चले आये हुए वंश में समान गोत्र में विवाह आदि द्वारा पिंड में अशुद्धि न हुई हो, किंतु एक जाति में भिन्न गोत्रज कन्या के साथ विवाह संस्कार द्वारा प्रवाह रूप से चला आया हुआ वंश विशुद्ध हो, उसे ‘सज्जाति’ कहते हैं। उसकी प्राप्ति होने से कुलीन पुरुष को बिना प्रयत्न किये प्राप्त होने वाले सद्गुणों (शिक्षा व सदाचार-आदि) के साथ साथ मोक्ष के कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्र रूप रत्नत्रय की प्राप्ति सुलभता से हो जाती है। उक्त सज्जाति की सुरक्षार्थ आचार्यश्री ने गर्भाधानादि संस्कारों से उत्पन्न होने वाली दूसरी सज्जाति का निरूपण किया है, जिसके द्वारा कुलीन भव्य पुरुष द्विजन्मा-दो जन्म वाला (१. शरीर जन्म २. संस्कारों से होने वाला आत्म-जन्म) कहा जाता है, जिसके फलस्वरूप उसमें नैतिक व धार्मिक सत्कर्त्तव्य-पालन की योग्यता उत्पन्न होती है। जिस प्रकार विशुद्ध खानि से उत्पन्न हुई मणि संस्कार से अत्यन्त उज्ज्वल हो जाती है, उसी प्रकार यह आत्मा भी क्रिया (गर्भाधानादि) व मंत्रों के संस्कार से अत्यन्त निर्मल-विशुद्ध हो जाती है एवं जिस प्रकार सुवर्ण पाषाण उत्तम संस्कार क्रिया (छेदन, भेदन व अग्निपुटपाक आदि) से शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार भव्य पुरुष भी उत्तम क्रियाओं (संस्कारों) को प्राप्त हुआ विशुद्ध हो जाता है। वह संस्कार धार्मिक ज्ञान से उत्पन्न होता है और सम्यग्ज्ञान सर्वोत्तम है, इसलिए जब यह पुण्यवान् पुरुष साक्षात् सर्वज्ञदेव के मुखचन्द्र से सम्यग्ज्ञानामृत पान करता है तब वह सम्यग्ज्ञानरूप गर्भ से संस्काररूप जन्म से उत्पन्न होकर पाँच अणुव्रतों (अहिंसाणुव्रत सत्याणुव्रत-आदि) तथा ७ शीलों (दिग्व्रत आदि) से विभूषित होकर ‘द्विजन्मा’ कहलाता है ॥१-७॥ सारांश यह है कि कुलीन दम्पति की संतान कुलीन होती है और गर्भाधान-आदि संस्कारों से संस्कृत होने पर उसमें मोक्ष-साधन सम्यग्दर्शनादि प्राप्त करने की योग्यता होती है। २. दम्पतियों का पारस्परिक प्रेम। ३. मनः प्रसाद (दम्पतियों के हृदय कमल का विकास-प्रसन्न चित्त रहना)। ४. चन्द्रग्रहण आदि दोषरहित गर्भाधान वेला (समय)। ५. लक्ष्मी (अनन्त दर्शन, अनंतज्ञान, अनंतसुख व अनंतवीर्य रूप अंतरंग लक्ष्मी व समवसरण विभूति रूप बहिरङ्ग लक्ष्मी) और सरस्वती (द्वादशाङ्ग श्रुतज्ञान) का आवाहन करने वाले मन्त्रों (पीठिका मंत्रादि) से पवित्र किये हुए (यथाविधि हवन पूर्वक) उत्कृष्ट-आचार शास्त्र व प्रकृति ऋतु के अनुकूल-अन्न का भक्षण ॥६९॥


गर्भशर्मजन्मकर्मापत्येषु देहलाभात्मलाभयोः कारणं परमम् ॥७०॥

अर्थ: जो स्त्री गर्भवती अवस्था में निरोगी व सुखी रहती है, उसकी संतान भी सुखी होती है एवं जिस बच्चे का जन्म शुभग्रहों में होता है, वह दीर्घजीवी (चिरायु) होता है। ॥७०॥ गुरु¹ विद्वान् ने भी संतान के निरोगी और दीर्घजीवी होने के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


स्वजातियोग्यसंस्कारहीनानां राज्ये प्रव्रज्यायां च नास्त्यधिकारः ॥७१॥

अर्थ: अपनी जाति के योग्य गर्भाधान-आदि संस्कारों से हीन पुरुषों को राज्य-प्राप्ति व दीक्षा-धारण करने का अधिकार नहीं है ॥७१॥


असति योग्येऽन्यस्मिन्नङ्गविहीनोऽपि पितृपदमर्हत्यापुत्रोत्पत्तेः ॥७२॥

अर्थ: राजा के कालकवलित हो जाने पर उसका अङ्गहीन पुत्र भी उस समय तक अपने पिता का पद (राज्याधिकार) प्राप्त कर सकता है, जब तक कि उस (अङ्गहीन) की कोई दूसरी योग्य सन्तान न हो जावे ॥७२॥ शुक्र² विद्वान् का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


साधुसम्पादितो हि राजपुत्राणां विनयोऽन्वयमभ्युदयं न च दूषयति ॥७३॥

अर्थ: जिन राजकुमारों को शिष्ट पुरुषों द्वारा विनय-सदाचार-आदि की नैतिक शिक्षा दी गई है-उनका वंश व वृद्धिंगत राज्य दूषित नहीं होता ॥७३॥ वादरायण१ विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


घुणजग्धं काष्ठमिवाविनीतं राजपुत्रं राजकुलमभियुक्तमात्रं भज्येत् ॥७४॥

अर्थ: जिस प्रकार घुन-कीड़ों से खाई हुई लकड़ी नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार दुराचारी व उद्दण्ड राजकुमार का वंश नष्ट हो जाता है; इसलिए दुराचारी व उद्दण्ड व्यक्ति को राज्य पद पर नियुक्त नहीं करना चाहिए ॥७४॥ भागुरि२ विद्वान् ने भी दुराचारी व्यक्ति को राज्य पद पर नियुक्त करने का निषेध किया है ॥१॥


आप्तविद्यावृद्धोपरुद्धाः सुखोपरुद्धाश्च राजपुत्राः पितरं नाभिद्रुह्यन्ति ॥७५॥

अर्थ: जो राजकुमार वंशपरम्परा से चले आये निजी विद्वानों द्वारा विनय व सदाचार-आदि की नैतिक शिक्षा से सुशिक्षित और सुसंस्कृत किये जाकर बढ़ाये गये हैं व जिन का लालन-पालन सुखपूर्वक किया गया है, वे कभी भी अपने पिता से द्रोह नहीं करते (उसका अनिष्ट चितवन नहीं करते) ॥७५॥ गौतम३ विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


मातृपितरौ राजपुत्राणां परमं दैवं ॥७६॥

अर्थ: उत्तम माता-पिता का मिलना राजकुमारों के उत्तम भाग्य का द्योतक है अर्थात् यदि उन्होंने पूर्व जन्म में पुण्य-संचय किया है तो वे माता-पिता द्वारा राज्यश्री प्राप्त करते हैं, अन्यथा नहीं ॥७६॥ गर्ग४ विद्वान् ने श्री राजकुमारों के अनुकूल व प्रतिकूल भाग्य से उन्हें इष्ट अनिष्ट फल देने वाले माता-पिता की प्राप्ति का निर्देश किया है ॥१॥


यत्प्रसादादात्मलाभो राज्यलाभश्च ॥७७॥

अर्थ: माता-पिता की प्रसन्नता से ही राजकुमारों को शरीर व राज्य-लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। सारांश यह है कि माता-पिता का पुत्रों के प्रति अनन्त उपकार है, इसलिए सुखाभिलाषी पुत्रों को उनकी तन, मन और धन से सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिए ॥७७॥


मातृपितृभ्यां मनसाप्यपमानेष्वभिमुखा अपि श्रियो विमुखा भवन्ति ॥७८॥

अर्थ: जो पुत्र माता-पिता का मन से भी तिरस्कार-अनादर करते हैं, उनके पास से प्रसन्न होकर समीप में आने वाली लक्ष्मी भी रुष्ट होकर दूर भाग जाती है। अभिप्राय यह है कि सुख-सम्पत्ति के इच्छुक पुत्रों को अपने माता-पिता का मन से भी तिरस्कार नहीं करना चाहिए। फिर प्रवृत्ति रूप से तिरस्कार करना तो महाअनर्थ का कारण है ॥७८॥


किं तेन राज्येन यत्र दुरपवादोपहतं जन्म ॥७९॥

अर्थ: उस निरर्थक राज्य से क्या लाभ है ? जिसकी प्राप्ति से मानव जीवन अत्यन्त लोकनिन्दा से दूषित होता हो ॥७९॥


क्वचिदपि कर्मणि पितुराज्ञां नो लंघयेत् ॥८०॥

अर्थ: पुत्र को किसी भी कार्य में पिता की आज्ञा उल्लंघन नहीं करनी चाहिए॥ ८०॥


किन्तु खलु रामः क्रमेण विक्रमेण वा हीनो यः पितुराज्ञया वनमाविवेश ॥८१॥

अर्थ: क्या निश्चय से महात्मा रामचन्द्र राजनैतिक-ज्ञान अथवा अधिकारीक्रम तथा शूरवीरता से हीन थे ? जिन्होंने अपने पिता (राजा दशरथ) की आज्ञानुसार वनवास को प्रस्थान किया। सारांश यह है कि लोक में वह राजपुत्र अपनी पैतृक राज-गद्दी का अधिकारी नहीं समझा जाता जो कि क्रम (राजनैतिकज्ञान, सदाचार व लोक व्यवहार पटुता आदि) एवं शूरवीरता से हीन हो अथवा उक्त गुण होने पर भी ज्येष्ठ न हो, परन्तु राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र महात्मा रामचन्द्र में पैतृक राज्यश्री की प्राप्ति के लिए यथेष्ट राजनैतिक-ज्ञान, लोकव्यवहार-पटुता, राज्य-शासन प्रवीणता एवं लोकप्रियता आदि सद्गुण थे। वे पराक्रमशाली थे और ज्येष्ठ होने के नाते कानूनन राजगद्दी के अधिकारी थे। यदि वे चाहते तो अपने पराक्रमी भाई लक्ष्मण की सहायता से अपनी सौतेली माँ (कैकेयी) को कैद करके व उसके फँदे में फँसे हुए अपने पिता को नीचा दिखाकर स्वयं राजगद्दी पर बैठ जाते। परन्तु उन्होंने ऐसा अनर्थ नहीं किया और अपने पिता की कठोरतम आज्ञा का पालन कर १४ वर्ष तक वनवास के कष्ट सहे। अतएव सम्यक्त्व और सदाचार को सुरक्षित रखते हुए पुत्रों को अपने पिता की कठोरतम भी आज्ञा का पालन करना चाहिए ॥८१॥


यः खलु पुत्री मनसितपरम्परया लभ्यते स कथमपकर्तव्यः ॥८२॥

अर्थ: जो पुत्र माता-पिता द्वारा अनेक प्रकार के मनोरथों या ईश्वर-आदि से की हुई याचनाओं द्वारा बड़ी कठिनाई से मिलता है, ऐसे दुर्लभ पुत्र के विषय में उसके माता-पिता किस प्रकार अनिष्ट चिंतन कर सकते हैं ? नहीं कर सकते ॥८२॥


कर्तव्यमेवाशुभं कर्म यदि हन्यमानस्य विपद्भिर्धानमात्मनो न भवेत् ॥८३॥

अर्थ: क्योंकि निरपराध मारे जानेवाले पुरुष के वध-बंधनादि कष्ट स्वयं हिंसक को भोगने पड़ते हैं, इसलिए क्या बुद्धिमान पुरुषों को ऐसा अनिष्ट खोटा कार्य करना चाहिए ? नहीं करना चाहिए ॥८३॥


ते खलु राजपुत्राः सुखिनो येषां पितरि राज्यभारः ॥८४॥

अर्थ: वे राजपुत्र निश्चय से सुखी माने गये हैं, जिनके पिता राज्य की बागडोर अपने हाथ में लिए हों; क्योंकि वे (राजपुत्र) राज्य-शासन के कठिन कार्यभार को संभालने आदि से निश्चिन्त रहते हैं ॥८४॥


अलं तया श्रिया या
किमपि सुखं जनयन्ती व्यासंगपरंपराभिः शतशो दुःखमनुभावयति ॥८५॥

अर्थ: राजा को उस राजलक्ष्मी से कोई लाभ नहीं, जो उसे थोड़ा-सा सुखी करने के उपरान्त अनेक चिन्ताओं द्वारा सैकड़ों कष्टों को उत्पन्न कर देती हो ॥८५॥ कौशिक¹ विद्वान् ने भी सुख की अपेक्षा अधिक कष्ट देने वाली राजलक्ष्मी को व्यर्थ बताया है ॥१॥


निष्फलो ह्यारम्भः कस्य नामोदर्केण सुखावहः ॥८६॥

अर्थ: फलशून्य-निष्प्रयोजन (उद्देश्य व लक्ष्य-हीन) कार्य का आरम्भ भविष्य में किसे सुखी बना सकता है ? किसी को नहीं। अतएव विवेकी मनुष्य को सोच-समझकर कार्य करना चाहिए ताकि भविष्य में वह उससे सुखी हो सके ॥८६॥


परक्षेत्रं स्वयं कृषतः कर्षापयतो वा फलं पुनस्तस्यैव यस्य तत्क्षेत्रम् ॥८७॥

अर्थ: जो मनुष्य दूसरे के खेत को स्वयं जोतता है या अन्य किसी से जुतवाता है, उसका परिश्रम व्यर्थ है, क्योंकि ऐसा करने से उसे कुछ भी लाभ नहीं होता, क्योंकि उसमें जो कुछ भी धान्य-आदि की उपज होगी, वह इसे न मिलकर उस खेत के स्वामी को ही मिलेगी ॥८७॥ कौशिक२ विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


सुतसोदरसपत्नपितृव्यकुल्यदौहित्रागन्तुकेषु पूर्वपूर्वाभावे भवत्युत्तरस्य
राज्यपदावाप्तिः ॥८८॥

अर्थ: १. राजपुत्र, २. राजा का भाई, ३. पटरानी को छोड़कर दूसरी रानी का पुत्र, ४. राजा का चाचा, ५. राजा के वंश का पुत्र, ६. राजकुमारी का पुत्र और ७. बाहर से आकर राजा के पास रहने वाला-दत्तकपुत्र-आदि इन सात प्रकार के राज्याधिकारियों में से सबसे पहले राजपुत्र को और उसके न रहने पर भाई आदि को यथाक्रम से राजा बनाना चाहिए ॥८८॥ शुक्र३ विद्वान् का भी राजा के बाद राज्य के उत्तराधिकारी बनाने के विषय में यही मत है ॥१॥


शुष्कश्याममुखता वाक्स्तम्भः स्वेदो विजृम्भणमतिमात्रं
वेपथुः प्रस्खलनमास्यप्रेक्षणमावेगः कर्मणि भूमौ वानवस्थानमिति दुष्कृतं कृतः
करिष्यतो वा लिङ्गानि ॥८९॥

अर्थ: जो पुरुष पूर्व में पाप कर चुका हो, वर्तमान में कर रहा हो और भविष्य में करेगा, उसके निम्न प्रकार के लक्षणों को देखकर न्यायाधीशों को उसके पापी (अपराधी) होने के विषय में पहिचान करनी चाहिए। १. जिसका चेहरा उदास (म्लान) और काला दिखाई पड़ता हो, २. जिसके मुख से स्पष्ट वचन न निकलते हों-न्यायालय में प्रश्न पूछे जाने पर जो उत्तर देने में असमर्थ हो, ३. जिसे लोगों के समक्ष पसीना आता हो, ४. जो बार-बार जंभाई लेता हो, ५. जो अत्यन्त काँप रहा हो, ६. जो लड़खड़ाते पैरों से चलता हो, ७. जो दूसरों के मुखों की ओर बारंबार देखता हो, ८. जो अत्यन्त जल्दबाज हो और ९. जो स्थिरता से कार्य न करता हो और जो स्थिर भाव से जमीन पर या एक स्थान पर न बैठता हो ॥८९॥ शुक्र४ विद्वान् का भी अपराधी-पुरुषों की पहचान के विषय में यही मत है ॥१॥

(२५) दिवसानुष्ठान-समुद्देशः

ब्राह्मे मुहूर्त्त उत्थायेति कर्त्तव्यतायां समाधिमुपेयात् ॥१॥

सुखनिद्राप्रसन्ने हि मनसि
प्रतिफलन्ति यथार्थग्राहिका बुद्धयः ॥२॥

उदयास्तमनशायिषु
धर्मकालातिक्रमः ॥३॥

आत्मवक्त्रमाज्ये दर्पणे वा निरीक्षेत ॥४॥

न प्रातर्वर्षधरं
विकलाङ्गं वा पश्येत् ॥५॥

अर्थ (सूत्र 1 से 5): मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्थिर चित्त से इस समुद्देश में कहे जाने वाले सत्य कर्तव्यों का पालन करना चाहिए ॥१॥ जिस मनुष्य का चित्त सुखपूर्वक गाढ़ निद्रा लेने से स्वस्थ रहता है, उसमें समस्त बुद्धियाँ यथार्थ होकर प्रतिबिंबित हो जाती हैं ॥२॥ सूर्योदय व सूर्यास्त के समय सोने वाले पुरुष सामायिक-आदि धार्मिक अनुष्ठान नहीं कर पाते; अतएव उन्हें यह समय सोने में खराब नहीं करना चाहिए ॥३॥ प्रातःकाल उठकर मनुष्य को अपना मुख घृत अथवा शीशा-दर्पण में देखना चाहिए ॥४॥ मनुष्य सुबह नपुंसक व अंगोपांग-हीन (लूले-लंगड़े-आदि) को न देखे ॥५॥


सन्ध्यासुधोतमुखं जप्त्वा देवतोऽनुगृह्णाति ॥६॥

अर्थ: तीनों सन्ध्याओं में मुख शुद्ध करके जप करने वाले व्यक्ति का ऋषभादि तीर्थंकर देव अनुग्रह करते हैं ॥६॥


नित्यमदन्तधावनस्य नास्ति मुखशुद्धिः ॥७॥

अर्थ: करने से कफादिक से उत्पन्न हुई मुख की दुर्गन्धि नष्ट हो जाती है और दांत भी सुन्दर व चमकीले दिखाई पड़ने लगते हैं ॥७॥


न कार्यव्यासङ्गेन शारीरं
कर्मोपहन्यात् ॥८॥

वेग-
व्यायाम-स्वाप-स्नान-भोजन स्वच्छन्दवृत्तिं कालान्नोपरुन्ध्यात् ॥१०॥

अर्थ (सूत्र 8 से 10): मनुष्य को किसी कार्य में आसक्त होकर शारीरिक क्रियाओं (मल-मूत्रादि का यथासमय क्षेपण आदि) को न रोकना चाहिए ॥८॥ नैतिक मनुष्य को कदापि समुद्र में स्नान नहीं करना चाहिए, चाहे समुद्र में चिरकाल से तरंगों का उठना बन्द हो गया हो ॥९॥ शारीरिक स्वास्थ्य के इच्छुक व्यक्ति को मलमूत्रादि का वेग, कसरत, नींद, स्नान, भोजन और ताजी हवा में घूमना-आदि की यथासमय प्रवृत्ति नहीं रोकनी चाहिए अर्थात् उक्त कार्य यथासमय करने चाहिए ॥१०॥


शुक्रमलमूत्रमरुद्वेगसंरोधोऽश्मरीभगन्दर-गुल्मार्शासां हेतुः ॥११॥

अर्थ: जो व्यक्ति अपने वीर्य, मल, मूत्र और वायु के वेगों को रोकता है उसे पथरी, भगंदर, गुल्म व बवासीर-आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। चरक विद्वान् ने लिखा है कि बुद्धिमान पुरुष को मल-मूत्र, वीर्य वायु, वमन, छींक, उद्गार जंभाई, भूख प्यास, बाष्प, नींद और परिश्रम से होने वाले श्वासोच्छ्वास के वेगों को नहीं रोकना चाहिए। क्योंकि मूत्र का वेग रोकने से गुदा और जननेन्द्रिय में पीड़ा, पेशाब करने में कष्ट व शरीर में पीड़ा होती है एवं शरीर झुक जाता है तथा अण्डकोषों की वृद्धि हो जाती है। मल का वेग रोकने से पक्वशय और शिर में पीड़ा-आदि होते हैं। वीर्य के वेग को रोकने से जननेन्द्रिय व अण्डकोषों में पीड़ा और पेशाब का रुक जाना-आदि उपद्रव हो जाते हैं-इत्यादि। अतः स्वास्थ्य चाहने वाले को उक्त वेग नहीं रोकना चाहिए ॥११॥


गन्धलेपावसानं शौचमाचरेत् ॥१२॥

अर्थ: शौच के पश्चात् गुदा और हस्त-पाद आदि की शुद्धि मुल्तानी मिट्टी और जल से करनी चाहिए


बहिरागतो नानाचाम्य गृहं प्रविशेत्॥१३॥

अर्थ (सूत्र 12 से 13): व अन्त में उन अंगों में सुगन्धित द्रव्य का लेप करना चाहिए, ताकि दुर्गन्धि नष्ट होकर चित्त प्रसन्न रहे ॥१२॥ बाहर से आया हुआ व्यक्ति आचमन (कुरला) किये बिना अपने गृह में प्रवेश न करे ॥१३॥


गोसर्गे व्यायामो रसायनमन्यत्र क्षीणाजीर्णवृद्धवातकिरूक्षभोजिभ्यः ॥१४॥

अर्थ: जिन की शारीरिक शक्ति क्षीण हो गई हो-जिनके शरीर में खून की कमी हो, ऐसे दुर्बल मनुष्य अजीर्ण रोग-युक्त, शरीर से वृद्ध, लकवा-आदि वात-रोगी और रूक्ष-भोगी मनुष्यों को छोड़कर दूसरे स्वस्थ बालक और नवयुवकों के लिए प्रातःकाल व्यायाम करना रसायन के समान लाभदायक है ॥१४॥ चरक¹ विद्वान् ने भी उक्त बात का समर्थन किया है ॥१॥


शरीरायासजननी क्रिया व्यायामः॥१५॥

अर्थ: शरीर में परिश्रम उत्पन्न करने वाली क्रिया (दण्ड, बैठक व ड्रिल आदि) को ‘व्यायाम’ कहते हैं ॥१५॥ चरक² विद्वान् ने भी कहा है कि शरीर को स्थिर रखने वाली शक्तिवर्धिनी व मन को प्रिय लगने वाली शस्त्र संचालन-आदि शारीरिक क्रिया को व्यायाम कहते हैं, इसे उचित मात्रा में करना चाहिए ॥१॥


शस्त्रवाहनाभ्यासेन व्यायामं सफलयेत् ॥१६॥

अर्थ: खड्ग आदि शस्त्र-संचालन तथा हाथी और घोड़े आदि की सवारी से व्यायाम को सफल बनाना चाहिए ॥१६॥


आदेहस्वेदं व्यायामकालमुशन्त्याचार्याः ॥१७॥

अर्थ: आयुर्वेद के विद्वान् आचार्य शरीर में पसीना आने तक व्यायाम का समय मानते हैं ॥१७॥ चरक³ विद्वान् ने भी अति मात्रा में व्यायाम करने से अत्यन्त थकावट, मन में ग्लानि व ज्वर आदि अनेक रोगों के होने का निर्देश किया है ॥१॥


बलातिक्रमेण व्यायामः कां नाम नापदं जनयति ॥१८॥

अव्यायामशीलेषु कुतोऽग्निदीपनमुत्साहो देहदाढ्यं च ॥१९॥

अर्थ (सूत्र 18 से 19): जो मनुष्य शारीरिक शक्ति को उल्लंघन कर अधिक मात्रा में व्यायाम करता है, उसे कौन-कौन सी शारीरिक व्याधियाँ नहीं होती ? सभी होती हैं ॥१८॥ -जो लोग व्यायाम नहीं करते उनको जठराग्नि का दीपन, शरीर में उत्साह और दृढ़ता किस प्रकार प्राप्त हो सकती है ? नहीं हो सकती ॥१९॥ चरक४ विद्वान् ने भी कहा है कि व्यायाम करने से शारीरिक लघुता, कर्त्तव्य करने में उत्साह, शारीरिक दृढ़ता, दुःखों को सहन करने की शक्ति, वात व पित्त आदि दोषों का क्षय व जठराग्नि प्रदीप्त होती है ॥१॥


निद्रा का लक्षण उससे लाभ, दृष्टान्त द्वारा समर्थन, आयु-रक्षक कार्य, स्नान का उद्देश्य व लाभ, स्नान की निरर्थकता। / स्नान-विधि व निषिद्ध स्नान


इन्द्रियात्ममनोमरुतां सूक्ष्मावस्था स्वापः ॥२०॥

यथासात्म्यं स्वपादृभुक्तान्नपाको भवति प्रसीदन्ति चेन्द्रियाणि ॥२१॥

सुघटितमपि हितं च भाजनं साधयत्यन्नानि ॥२२॥

अर्थ (सूत्र 20 से 22): स्पर्शन, रसना आदि इन्द्रियाँ, आत्मा, मन और श्वासोच्छ्वास की सूक्ष्मावस्था ‘निद्रा’ है ॥२०॥ प्रकृति के अनुकूल यथेष्ट निद्रा लेने से खाये हुए भोजन का परिपाक हो जाता है और समस्त इन्द्रियाँ प्रसन्न रहती हैं ॥२१॥ जिस प्रकार साबित व खुला हुआ बर्तन अन्न पकाने में समर्थ होता है; इसी प्रकार यथेष्ट निद्रा से स्वस्थ शरीर भी कर्तव्य-पालन में समर्थ होता है ॥२२॥


नित्यस्नानं द्वितीयमुत्सादनं तृतीयकमायुष्यं चतुर्थकं प्रत्यायुष्यमित्यहीनं सेवेत ॥२६॥

अर्थ: नित्यस्नान, स्निग्ध पदार्थों से उबटन करना, आयुरक्षक प्रकृति-ऋतु के अनुकूल आहार-विहार प्रत्यायुष्य (शरीर और इन्द्रियों को सुरक्षित और शक्तिशाली बनाने वाले कार्य-पूर्वोक्त मल-मूत्रादि के वेगों को न रोकना, व्यायाम व मालिश-आदि) कार्य करने में न्यूनता (कमी) न करनी चाहिए। अर्थात् उक्त कार्यों को यथाविधि यथाप्रकृति सम्पन्न करना चाहिए ॥२३॥


धर्मार्थकामशुद्धिर्दुर्जनस्पर्शाः स्नानस्य कारणानि ॥२४॥

श्रमस्वेदालस्यविगमः स्नानस्य फलम् ॥२५॥

अर्थ (सूत्र 24 से 25): मनुष्य को धर्म, अर्थ और काम-शुद्धि रखने के लिए एवं दुष्टों का स्पर्श हो जाने पर स्नान करना चाहिए ॥२४॥ स्नान करने से शरीर की थकावट आलस्य और पसीना नष्ट हो जाते हैं ॥२५॥


जलचरस्येव तत्स्नानं यत्र न सन्ति देवगुरुधर्मोपासनानि ॥२६॥

प्रादुर्भवत्क्षुत्पिपासोऽभ्यङ्गस्नानं कुर्यात्॥२७॥

अर्थ (सूत्र 26 से 27): जो व्यक्ति देव, गुरु और धर्म की उपासना के उद्देश्य से स्नान नहीं करता उसका स्नान पक्षियों की तरह निरर्थक है ॥२६॥ भूखे और प्यासे मनुष्य को मालिश करने के बाद स्नान करना


आतपसंतप्तस्य जलावगाहो दृग्मान्द्यं शिरोव्यथां च करोति ॥२८॥

अर्थ (सूत्र 27 से 28): चाहिए ॥२७॥ जो व्यक्ति सूर्य-आदि की गर्मी से संतप्त होकर जल में प्रविष्ट होता है (स्नान करता है), उसके नेत्रों की रोशनी मंद पड़ जाती है और शिर में पीड़ा हो जाती है, अतः गर्मी से पीड़ित व्यक्ति तत्काल स्नान न करे ॥२८॥


आहार सम्बन्धी स्वास्थ्योपयोगी सिद्धान्त


बुभुक्षाकालो भोजनकालः ॥२९॥

अर्थ: भूख लगने का समय ही भोजन का समय है। सारांश यह है कि विवेकी पुरुष अहिंसाधर्म की रक्षार्थ रात्रि-भोजन का त्यागकर दिन में भूख लगने पर प्रकृति-ऋतु के अनुकूल भोजन करे, बिना भूख कदापि भोजन न करे ॥२९॥ आदि से विरुद्ध आहार को अहितकारक-अपने रोग पैदा करने वाला कहा है। उसमें जो व्यक्ति भूखा न होने पर भी किसी कार्य विशेष से मल-मूत्र का वेग रोककर आहार करता है, उसके आहार को क्रम विरुद्ध कहा है। अज्ञानवश ऐसा (क्रम-विरुद्ध) आहार-करने वाला अनेक रोगों से पीड़ित हो जाता है, अतः भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए।


अक्षुधितेनामृतप्युपभुक्तं च भवति विषं ॥३०॥

जठराग्निं वज्राग्निं कुर्वन्नाहारादौ सदैव वज्रकं वलयेत् ॥३१॥

निरन्नस्य सर्वे द्रवद्रव्यमग्नि नाशयति ॥३२॥

अतिश्रमपिपासोपशान्तौ पेयायाः परं कारणमस्ति ॥३३॥

घृताधरोत्तरभुञ्जानोऽग्निं दृष्टिं च लभते ॥३४॥

सकृद्भूरि नीरोपयोगो वह्निमवसाद-
यति ॥३५॥

क्षुत्कालातिक्रमादन्नद्वेषो देहसादश्च भवति ॥३६॥

अर्थ (सूत्र 30 से 36): क्योंकि बिना भूख के खाया हुआ अमृत भी विष हो जाता है, अतः क्षुधा (भूख) लगने पर ही भोजन करना चाहिए ॥३०॥ जो मनुष्य सदा आहार के आरम्भ में अपनी जठराग्नि को वज्र की अग्नि समान प्रदीप्त करता है, वह वज्र के समान शक्तिशाली हो जाता है ॥३१॥ बुभुक्षित-भूखा मनुष्य यदि अन्न न खा कर केवल घी-दूध-आदि तरल पदार्थ पीता रहे, तो वह अपनी जठराग्नि को नष्ट कर डालता है, अतः तरल पदार्थों के साथ-साथ अन्न-भक्षण भी करना चाहिए ॥३२॥ अत्यंत थकावट के कारण उत्पन्न हुई प्यास को शान्त करने में दूध सहायक होता है ॥३३॥ घृत-पान पूर्वक भोजन करने वाले मनुष्य को जठराग्नि प्रदीप्त होती है और नेत्रों की रोशनी भी बढ़ जाती है ॥३४॥ जो एकबार में अधिक परिमाण में पानी पीता है, उसकी जठराग्नि मन्द हो जाती है ॥३५॥ भूख का समय उल्लंघन करने से अन्न में अरुचि व शरीर में कृशता-कमजोरी हो जाती है। अतः भूख के समय का उल्लंघन नहीं करना चाहिए ॥३६॥


विध्याते वह्नौ किं
नामेन्धनं कुर्यात् ॥३७॥

यो मितं भुंक्ते स बहुं भुंक्ते ॥३८॥

अप्रमितमसुखं विरुद्धम-
परीक्षितमसाधुपाकमतीतरसमकालं चान्नं नानुभवेत् ॥३९॥

अर्थ (सूत्र 37 से 39): जिस प्रकार अग्नि के बुझ जाने पर उसमें ईंधन डालने से कोई लाभ नहीं, उसी प्रकार बुभुक्षा-काल के उल्लंघन करने से जठराग्नि के बुझ जाने पर भोजन करने से भी कोई लाभ लाभ नहीं। अतः उसके प्रदीप्त होने पर भोजन करना चाहिए ॥३७॥ जठराग्नि के अनुकूल खानेवाला ही स्वस्थता के कारण अधिक खाता है ॥३८॥ स्वास्थ्य-रक्षा चाहने वाले को अज्ञान व लोभ-वश जठराग्नि से अधिक, अहितकर (दुःख देने वाला), अपरीक्षित भलीभाँति परिपाक न होने वाला, रसहीन व भूख का समय उल्लंघन करके किया हुआ भोजन नहीं खाना चाहिए। अर्थात्-स्वास्थ्य चाहने वाला व्यक्ति हँसी-मजाक न करता हुआ मौनपूर्वक उष्ण, स्निग्ध, जठराग्नि के अनुकूल, पूर्व भोजन के पच जाने पर किया हुआ, इष्टदेश में वर्तमान व काम-क्रोधादि दुर्भावों को उत्पन्न न करने वाला आहार न अत्यंत शीघ्रता से और न अत्यंत विलम्ब से करे। चरक विद्वान् ने इस विषय की विशद व्याख्या की है, परन्तु विस्तार के भय से हम लिखना नहीं चाहते ॥३९॥


फल्गुभुजमननुकूलं
क्षुधितमतिक्रूरं च न भुक्तिसमये सन्निधापयेत् ॥४०॥

गृहीतग्रासेषु सहभोजिष्वात्मनः
परिवेषयेत् ॥४१॥

तथा भुञ्जीत यथासायमन्येद्युश्च न विपद्यते वह्निः ॥४२॥

अर्थ (सूत्र 40 से 42): नैतिक पुरुष आहार की बेला में अल्प-भोजन करने वाला, अपने से वैर-विरोध रखने वाला, बुभुक्षित व दुष्ट व्यक्ति को अपने पास न बैठावे; क्योंकि इन की उपस्थिति भोजन को अरुचिकर बना देती है ॥४०॥ भोजन करने वाला व्यक्ति आहार की बेला (समय) में अपनी थाली भोजन करने वाले सहभोजियों से वेष्टित रखे ॥४१॥ मनुष्य इस प्रकार-अपनी जठराग्नि की शक्ति के अनुकूल-भोजन करे जिससे उसकी अग्नि शाम को व दूसरे दिन भी मन्द न होने पावे ॥४२॥


न
भुक्तिपरिमाणं सिद्धान्तोऽस्ति ॥४३॥

अर्थ: भोजन की मात्रा-परिमाण के विषय में कोई निश्चित सिद्धान्त नहीं है ॥४३॥


वह्न्यभिलाषायतं हि भोजनं ॥४४॥

अर्थ: निश्चय से मनुष्य जठराग्नि की उत्कृष्ट, मध्यम व अल्प शक्ति के अनुकूल उत्कृष्ट, मध्यम व अल्प-भोजन करे। अर्थात् भूख के अनुसार भोजन करे। चरक संहिता में भी आहार की मात्रा के विषय में लिखा हैं कि “आहारमात्रा पुनरग्निबलापेक्षिणी” अर्थात् आहार की मात्रा मनुष्य की जठराग्नि की उत्कृष्ट, मध्यम व अल्प शक्ति की अपेक्षा करती है (उसके अनुकूल होती है), अतः जठराग्नि की शक्ति के अनुकूल आहार करना चाहिए ॥४४॥


अतिमात्र-
भोजी देहमग्निं च विधुरयति ॥४५॥

दीप्तो वह्निर्लघुभोजनाद्वलं क्षपयति ॥४६॥

अत्यशितुर्दुःखेनान्नपरिणामः ॥४७॥

अर्थ (सूत्र 45 से 47): भूख से अधिक खानेवाला व्यक्ति अपना शरीर व जठराग्नि को क्षीण करता है ॥४५॥ प्रदीप्त हुई जठराग्नि भूख से थोड़ा भोजन करने से शारीरिक शक्ति नष्ट कर देती है ॥४६॥ भूख से अधिक खाने वाले के अन्न का परिपाक बड़ी कठिनाई से होता है ॥४७॥


श्रामार्तस्य पानं भोजनं च ज्वराय छर्दये वा ॥४८॥

अर्थ: परिश्रम से पीड़ित व्यक्ति द्वारा तत्काल पिया हुआ जल व भक्षण किया हुआ अन्न ज्वर व वमन पैदा करता है ॥४८॥


न जिहत्सुर्र्न प्रेस्त्रोतुमिच्छुर्नार्मसञ्जसमनाश्च नानपनीयपिपासोद्रेकमश्नीयात् ॥४९॥

भुक्त्वा व्यायामव्यवायौ सद्यो व्यापत्तिकारणं ॥५०॥

आजनमसात्म्यं विषमपि पथ्यं ॥५१॥

असात्म्यमपि पथ्यं सेवेत न पुनः सात्म्यमप्यपथ्यं ॥५२॥

सर्वं बलवतः पथ्यमिति न
कालकूटं सेवेत ॥५३॥

अर्थ (सूत्र 49 से 53): मल-मूत्र का वेग व प्यास को रोकने वाले व अस्वस्थ चित्त वाले व्यक्ति को उस समय भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं; अतः शौचादि से निवृत्त होकर स्वस्थ चित्त से भोजन करे ॥४९॥ भोजन करके तत्काल व्यायाम अथवा मैथुन करना आपत्तिजनक है ॥५०॥ जीवन के शुरू से सेवन किया जाने से प्रकृति के अनुकूल हुआ विष भी सेवन करने पर पथ्य माना गया है ॥५१॥ मनुष्य को पूर्वकालीन अभ्यास न होने पर भी पथ्य-हितकारक-वस्तु का सेवन करना चाहिए, परन्तु पूर्व का अभ्यासी होने पर भी अपथ्य वस्तु का सेवन नहीं करना चाहिए ॥५२॥ बलवान मनुष्य ऐसी समझकर कि मुझे सभी वस्तुएँ पथ्य हैं, विष का कदापि सेवन न करे ॥५३॥


सुशिक्षितोऽपि विषतंत्रज्ञो म्रियत एव कदाचिद्द्विषात् ॥५४॥

अर्थ: क्योंकि विष की शोधनादि विधि को जानने वाला सुशिक्षित मनुष्य भी विषभक्षण से मर ही जाता है; इसलिए कदापि विषभक्षण न करे ॥५४॥


संविभज्यातिथिष्वाश्रितेषु च स्वयमाहरेत् ॥५५॥

अर्थ: मनुष्य को अपने यहाँ आये हुए अतिथियों और नौकरों के लिए आहार देकर स्वयं भोजन करना चाहिए ॥५५॥


देवान् गुरून् धर्मं चोपचरन्न व्याकुलमतिः स्यात् ॥५६॥

व्याक्षेपभूमौ निरोधो मन्दयति सर्वाण्यपीन्द्रियाणि ॥५७॥

स्वच्छन्दवृत्तिः पुरुषाणां परमं रसायनम् ॥५८॥

यथाकामसमीहानाः किल काननेषु करिणो न भवन्त्यास्पदं व्याधीनाम् ॥५९॥

सततं सेव्यमाने द्वे एव वस्तुनी सुखाय, सरसः स्वैरालापः ताम्बूलभक्षणं चेति ॥६०॥

अर्थ (सूत्र 56 से 60): देव, गुरु व धर्म की भक्ति करने वाला कभी भ्रान्तबुद्धि (कर्तव्य-पक्ष से विचलित करने वाली बुद्धि-युक्त) नहीं होता ॥५६॥ तिरस्कार कराने वाली भूमि में स्थित होकर मानसिक-निरोध (ध्यान) करने से समस्त इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं, अतः विवेकी पुरुष ऐसी जगह बैठकर धर्मध्यान न करे, जहाँ उसका अनादर होता हो ॥५७॥ जिस प्रकार उत्तम रसायन के सेवन से शरीर निरोगी व बलिष्ठ होता है, उसी प्रकार शीतल, मंद, सुगंध वायु में संचार करने (घूमने) से भी मनुष्यों का शरीर निरोगी व बलशाली हो जाता है ॥५८॥ निश्चय से वनों में अपनी इच्छानुकूल भ्रमण करने वाले हाथी कभी बीमार नहीं होते ॥५९॥ हितैषी आत्मीय शिष्ट पुरुषों के साथ सरस (मधुर) वार्तालाप व पान का भक्षण इन दोनों वस्तुओं का मनुष्य को निरन्तर सेवन करना चाहिए, क्योंकि इन से सुख प्राप्त होता है ॥६०॥


चिरायोर्ध्वजानुजडयति रसवाहिनी र्नसाः ॥६१॥

सततमुपविष्टो जठरमाध्मापयति
प्रतिपद्यते च तुन्दिलतां वाचि मनसि शरीरे च ॥६२॥

अतिमात्रं खेदः पुरुषमकालेऽपि जरया योजयति ॥६३॥

नादेवं देहप्रासादं कुर्यात् ॥६४॥

देवगुरुधर्मरहिते पुंसि नास्ति सम्प्रत्ययः ॥६५॥

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेषो देवः ॥६६॥

अर्थ (सूत्र 61 से 66): जो मनुष्य चिरकाल तक ऊँचे घुटनों के बल बैठा रहता है, उसकी रस धारण करने वाली नसें कमजोर पड़ जाती है ॥६१॥ निरन्तर बैठे रहने से मनुष्य की जठराग्नि मन्द, शरीर स्थूल, आवाज मोटी व मानसिक विचार-शक्ति स्थूल हो जाती है ॥६२॥ अत्यन्त शोक करने से भी जवानी में भी मनुष्य का शरीर व इन्द्रियाँ निर्बल व शिथिल हो जाती हैं अतः शोक करना उचित नहीं ॥६३॥ मनुष्य अपने शरीर रूप गृह को ईश्वर-शून्य न करे-उसमें ईश्वर को स्थापित करे ॥६४॥ ईश्वर, गुरु व अहिंसाधर्म की अवहेलना करने वाले व्यक्ति के नैतिक और सदाचारी होने में किसी को विश्वास नहीं होता, अतः विवेकी पुरुष को शाश्वत कल्याण व लोक में विश्वासपात्र होने के लिए वीतराग, सर्वज्ञ व हितोपदेशी ऋषभभादि तीर्थंकर व निर्ग्रन्थ गुरु तथा अहिंसाधर्म का श्रद्धालु होना चाहिए ॥६५॥ ऐसे पुरुषश्रेष्ठ को ईश्वर कहते हैं, जो कि जन्म, जरा व मरण-आदि दुःख, ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय और अन्तराय इन चार घातिया कर्म तथा इनके उदय से होने वाले राग, द्वेष व मोह-आदि भावकर्म एवं पापकर्मरूप कालिमा से रहित हो जो वीतराग सर्वज्ञ व हितोपदेशी हो ॥६६॥ यशस्तिलक में भी आचार्यश्री ने१ सर्वज्ञ सब लोक का ईश्वर-संसार का दुःख-समुद्र से उद्धार करने वाले, क्षुधादि १८ दोषों से रहित व समस्त प्राणियों को मोक्षमार्ग का प्रत्यक्ष उपदेश करने वाले ऋषभादि तीर्थंकरों को सत्यार्थ ईश्वर कहा है ॥१॥


तस्यैवैतानि खलु विशेषनामान्यर्हन्नजोऽनन्तः शंभुर्बुद्धस्तमोऽन्तक इति ॥६७॥

अर्थ: उसी ईश्वर के अर्हन, अज, अनन्त शंभु, बुद्ध व तमोऽन्तक ये विशेष नाम हैं। सारांश यह है कि उसे त्रिलोक पूज्यता से ‘अर्हन्’ जन्मरहित होने से ‘अज’ मृत्यु-शून्यता से ‘अनन्त’ आत्मिक सुख-शान्ति को प्राप्त होने से ‘शंभु’ केवल ज्ञानी के कारण ‘बुद्ध’ अज्ञानांधकार का विध्वंसक होने से ‘तमोऽन्तक’ कहा गया है।


आत्मसुखानवरोधेन कार्याय नक्तमहश्च विभजेत् ॥६८॥

कालानियमेन कार्यानुष्ठानं हि मरणसमं ॥६९॥

अर्थ (सूत्र 68 से 69): प्रत्येक व्यक्ति शारीरिक-सुख में बाधा न डालता हुआ दिन-रात कर्तव्यपालन करता रहे ॥६८॥ निश्चित समय के उपरान्त किया हुआ कार्य मृत्यु के समान हानिकारक है, अतएव नैतिक व्यक्ति को अपने कार्य निश्चित समय पर ही करने चाहिए, अन्यथा समय ही उसके फल को पी लेता है ॥६९॥


आत्यन्तिके कार्ये नास्त्यवसरः ॥७०॥

अर्थ: नैतिक व्यक्ति शाश्वत कल्याण करने वाले सत्कर्तव्यों के पालन में मौका न चूके ॥७०॥


अवश्यं कर्तव्ये कालं न यापयेत् ॥७१॥

अर्थ: मनुष्य को नैतिक, धार्मिक और आर्थिक-लाभ-आदि के कारण अवश्य करने योग्य कार्यों में विलम्ब नहीं करना चाहिए, अन्यथा उसका कोई इष्ट प्रयोजन सिद्ध नहीं हो पाता ॥७१॥


आत्मरक्षायां कदाचिदपि न प्रमाद्येत ॥७२॥

अर्थ: मनुष्य को शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक कष्टों को दूर कर अपनी रक्षा करने में आलस्य नहीं करना


सवत्सां धेनुं प्रदक्षिणीकृत्य धर्मासनं यायात् ॥७३॥

अनधिकृतोऽनभिमतश्च न राजसभां प्रविशेत् ॥७४॥

आराध्यमुत्थायाभि-वादयेत् ॥७५॥

देवगुरुधर्मकार्याणि स्वयं पश्येत् ॥७६॥

कुहकाभिचारकर्म-कारिभिः सह न सङ्गच्छेत् ॥७७॥

प्राण्युपघातेन कामक्रीड़ां न प्रवर्तयेत् ॥७८॥

अर्थ (सूत्र 72 से 78): चाहिए ॥७२॥ राजा को बछड़े सहित गाय की प्रदक्षिणा देकर न्याययुक्त राज्य-सिंहासन पर बैठना चाहिए ॥७३॥ राजकीय अधिकारों से हीन व राजा द्वारा न बुलाये गये व्यक्तियों को राज-सभा में प्रविष्ट नहीं होना चाहिए ॥७४॥ मनुष्य को अपने पूज्य माता, पिता और गुरुजनों को खड़े होकर नमस्कार करना चाहिए ॥७५॥ मनुष्यों को देवकार्य-देवस्थान (मन्दिर आदि), गुरु कार्य व धर्म कार्यों की स्वयं देखरेख करनी चाहिए ॥७६॥ विवेकी मनुष्य को कपटी, जारण-मारण व उच्चाटन-आदि करने वाले दुष्ट पुरुषों की संगति नहीं करनी चाहिए ॥७७॥ मनुष्य को ऐसे अन्याय के भोगों में प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिए, जहाँ पर प्राणियों का घात हो ॥७८॥


जनन्यापि परस्त्रिया सह रहसि न तिष्ठेत् ॥७९॥

अर्थ: नैतिक पुरुष दूसरे की स्त्री के साथ एकान्त में न बैठे, चाहे वह उसकी माता भी क्यों न हो। क्योंकि इन्द्रियों को काबू में रखना निश्चित नहीं, इसलिए वे विद्वान् को भी अनीति के मार्ग की ओर आकृष्ट कर देती हैं ॥७९॥ मनुष्य को अत्यंत कुपित होने पर भी अपने माननीय-माता-पिता-आदि हितैषी पुरुषों के साथ अशिष्ट व्यवहार व अनादर नहीं करना चाहिए ॥८०॥


नातिक्रुद्धोऽपि
मान्यमतिक्रामेदवमन्येत वा ॥८०॥


नाप्ताशोधितपरस्थानमुपेयात् ॥८१॥

नाप्तजनैरनारूढं वाहन-मध्यासीत् ॥८२॥

अर्थ (सूत्र 81 से 82): मनुष्य को अपने हितैषी पुरुषों द्वारा अपरीक्षित शत्रु के स्थान में न प्रविष्ट होना चाहिए और न जाना चाहिए, क्योंकि उपद्रव-युक्त स्थान में जाने से संकटों का सामना करना पड़ता है ॥८१॥ इसी प्रकार अपने विश्वासपात्र व हितैषी पुरुषों द्वारा बिना सवारी किये हुए घोड़े व रथ-आदि वाहनों पर सवारी नहीं करनी चाहिए ॥८२॥


न स्वैरपरीक्षितं तीर्थं सार्थं तपस्विनं
वाभिगच्छेत् ॥८३॥

न याष्टिकैरविविक्तं मार्गं भजेत् ॥८४॥

न विषापहारौषधिमणीन्
क्षणमप्युपासीत ॥८५॥

सदैव जाङ्गुलिकीं विद्यां कण्ठे न धारयेत् ॥८६॥

मंत्रिभिषङ्नैमित्तिकरहितः कदाचिदपि न प्रतिष्ठेत् ॥८७॥

वह्नावन्वयचक्षुषि च
भोज्यमुपभोग्यं च परीक्षेत ॥८८॥

अमृते मरुति विशति सर्वदा चेष्टेत ॥८९॥

अर्थ (सूत्र 83 से 89): मनुष्य ऐसे तालाब-आदि जलाशय, व्यापारी व तपस्वी के पास न जावे, जो कि उसके आप्त पुरुषों द्वारा परीक्षित नहीं ॥८३॥ राजा को पुलिस द्वारा संशोधन न किये हुए मार्ग पर नहीं चलना चाहिए, क्योंकि संशोधित मार्ग में कोई खतरा नहीं रहता ॥८४॥ विवेकी पुरुष विष को दूर करने वाली औषधि व मणि की क्षण भर भी उपासना न करे ॥८५॥ इसी प्रकार जहर उतारने की विद्या का अभ्यास करे, परन्तु उसे कंठस्थ न करे ॥८६॥ राजा को मंत्री, वैद्य व ज्योतिषी के बिना कभी भी दूसरी जगह प्रस्थान नहीं करना चाहिए ॥८७॥ राजा या विवेकी पुरुष का कर्तव्य है कि वह अपनी भोजन सामग्री को भक्षण करने से पूर्व अग्नि में डालकर परीक्षा कर ले और यह देख ले कि कहीं अग्नि में से नीले रंग की लपटें न निकलने लगी हों, अगर ऐसा हो, तो समझ लेना चाहिए, कि यह सामग्री जहर-मिश्रित-भक्षण के अयोग्य है। इसी प्रकार वस्त्रादिक की जाँच भी अपने आप्त पुरुषों से कराते रहना चाहिए, ताकि उसकी सदैव इन विघ्नबाधाओं से रक्षा हो ॥८८॥ मनुष्य को अमृतसिद्धि के योग में सदा समस्त कार्य करना चाहिए, इससे कार्य-सिद्धि होती है ॥८९॥


भक्तिसुरतसमरार्थी दक्षिणे मरुति स्यात् ॥९०॥

परमात्मना समीकुर्वन् न कस्यापि
भवति द्वेष्यः ॥९१॥

मनःपरिजनशकुनपवनानुलोम्यं भविष्यतः कार्यस्य
सिद्धेर्लिङ्गम् ॥९२॥

नैकोनक्तं दिवं वा हिंडेत ॥९३॥

नियमितमनोवाक्कायः
प्रतिष्ठेत ॥९४॥

अर्थ (सूत्र 90 से 94): जब दक्षिण दिशा की ओर अनुकूल वायु का संचार हो रहा हो, उस समय मनुष्य को भोजन मैथुन व युद्ध में प्रवृत्ति करनी चाहिए। ऐसा करने से उसे उक्त कार्यों में सफलता मिलती है ॥९०॥ ईश्वर से अनुराग करने वाला अथवा दूसरे की अपने समान समझने वाला व्यक्ति किसी का द्वेष-पात्र नहीं होता ॥९१॥ मन, सेवक, शकुन व वायु की अनुकूलता भविष्य में किये जाने वाले कार्य की सफलता के ज्ञापक चिह्न हैं। अर्थात्- हृदय प्रफुल्लित होना, सेवकों का प्रसन्न रहना व दाहिनी आँख फड़कना-आदि शुभ शकुन इस बात के प्रतीक हैं, कि भविष्य में उस मनुष्य को सफलता मिलेगी ॥९२॥ अकेला व्यक्ति दिन व रात्रि में गमन न करे ॥९३॥ मनुष्य को अपना मन, वचन व शरीर काबू में रखते हुए-जितेन्द्रिय होकर प्रस्थान करना चाहिए ॥९४॥


अहनि संध्यामुपासीताऽनक्षत्रदर्शनात् ॥९५॥

चतुःपयोधिपयोधरां धर्मवत्सवतीमुत्साहबालधिं वर्णाश्रमखुरां कामार्थश्रवणां नयप्रतापविषाणां
सत्यशौचचक्षुषं न्यायमुखीमिमां गां गोपयामि, अतस्तमहं मनसापि न सहे
योऽपराध्येत्तस्यै, इतीमं मंत्रं समाधिस्थो जपेत् ॥९६॥

अर्थ (सूत्र 95 से 96): प्रत्येक व्यक्ति दिन में सुबह दोपहर और शाम-तीनों संध्याओं-में नक्षत्र देखने तक ईश्वर की उपासना करे ॥९५॥ राजा को ध्यान में स्थित होकर निम्न प्रकार के मंत्र का जाप करना चाहिए कि “मैं इस पृथ्वी रूपी गाय की रक्षा करता हूँ, जिसके चार समुद्र ही थन हैं, धर्म (शिष्ट-पालन व दुष्टनिग्रह) ही जिसका बछड़ा है, जो उत्साह रूप पूछ वाली है, वर्ण (ब्राह्मण-आदि) व आश्रम


कोकवद्दिवाकामो निशि स्निग्धं भुञ्जीत ॥९७॥

चकोरवन्नक्तंकामो दिवा च ॥९८॥

अर्थ (सूत्र 97 से 98): चकवा-चकवी के समान दिन में मैथुन करने वाला रात्रि में सचिक्कण वस्तु का भक्षण करे और चकोर पत्नी की तरह रात्रि में मैथुन करने वाला दिन में भोजन करे। सारांश यह है कि मनुष्य भी पक्षी की तरह रात्रि में मैथुन-कामसेवन करते हैं, अतः उन्हें दिन में ही भोजन करना चाहिए, इससे अहिंसा धर्म व स्वास्थ्य सुरक्षित रहता ॥९७-९८॥


पारावतकामो वृष्यान्नयोगान् चरेत् ॥९९॥

अर्थ: जो कबूतर की तरह हीन शक्ति होने पर भी काम-सेवन में प्रवृत्त होते हैं, उन्हें वीर्यवर्द्धक अन्न-घृत-शर्करा-मिश्रित मालपुआ आदि भक्षण करना चाहिए ॥९९॥


बष्कयणीनां सुरभीणां पयःसिद्धं
माषदलपरमान्नं परो योगः स्मरसवंर्द्धने ॥१००॥

अर्थ: एक बार ब्याई हुई गाय के दूध से सिद्ध की हुई उड़द की खीर खाने से विशेष कामोद्दीपन होता है ॥१००॥


नावृषस्यन्तीं स्त्रीमभिया-
यात् ॥१०१॥

अर्थ: विषय-भोग से पराङ्मुख-विरक्त-स्त्री से काम-सेवन नहीं करना चाहिए ॥१०१॥


उत्तरः प्रवर्षवान् देशः परमरहस्यमनुरागे प्रथम-प्रकृतीनाम् ॥१०२॥

द्वितीयप्रकृतिः सशाद्वलमृदूपवनप्रदेशः ॥१०३॥

तृतीयप्रकृतिः सुरतोत्सवाय
स्यात् ॥१०४॥

अर्थ (सूत्र 102 से 104): जल-वृष्टि वाले उत्तर देश में रहने वाला व वृष प्रकृतिवाला पुरुष पद्मिनी स्त्रियों द्वारा विशेष प्यार किया जाता है। सारांश यह है कि कामशास्त्र में वृष, शश व अश्व इस प्रकार तीन प्रकृति वाले पुरुष एवं पद्मिनी, शंखिनी और हस्तिनी इस प्रकार तीन प्रकृति वाली ललनाओं का उल्लेख है, इनमें प्रथम प्रकृति वाले (वृष) पुरुष से प्रथम प्रकृति वाली (पद्मिनी) विशेष अनुराग करती है एवं द्वितीय प्रकृति वाली शंखिनी स्त्रियाँ उसी प्रकृति वाले शशप्रकृति-पुरुष को हरी दूब युक्त व कोमल बगीचे के रमणीक प्रदेश की तरह सुखपूर्वक सेवन करती हैं। तीसरी अश्वप्रकृति पुरुष अत्यंत वीर्ययुक्त होने से मैथुन के समय स्त्रियों को विशेष संतोष देने वाला होता ॥१०२-१०४॥


धर्मार्थस्थाने लिङ्गोत्सवं लभते ॥१०५॥

अर्थ: धर्मस्थान-जिनमन्दिर आदि और अर्थस्थानों (व्यापार-आदि की जगहों) में मनुष्य की इन्द्रियाँ प्रसन्न रहती हैं ॥१०५॥


स्त्रीपुंसयोर्न समसमायोगात्परं
वशीकरण-मस्ति ॥१०६॥

अर्थ: स्त्री व पुरुषों के समसमायोग (एकान्त स्थान में मिलना जुलना वार्तालाप-आदि) को छोड़कर दूसरा कोई वशीकरण नहीं है ॥१०६॥


प्रकृतिरूपदेशः स्वाभाविकं च प्रयोगवैदग्ध्यमिति
समसमायोग-कारणानि ॥१०७॥

अर्थ: निम्न चार उपायों से स्त्री पुरुषों का एकान्त स्थान में मिलना रूप वशीकरण सफल होता है। १. प्रकृति (स्वभाव) अर्थात् एकान्त में उचित वार्तालाप-आदि द्वारा परस्पर के स्वभाव का ज्ञान करना, २. उपदेश-अनुकूल करने वाली समुचित शिक्षा, ३. प्रयोग वैदग्ध्य-एकान्त में की जाने वाली प्रयोग की चतुराई-हंसी-मजाक-आदि ॥१०७॥


क्षुत्तर्षपुरीषाभिष्यन्दार्तस्याभिगमो नापत्यमनवद्यं
करोति ॥१०८॥

अर्थ: भूख, प्यास व मल-मूत्रादि के वेग को रोकने से पीड़ित हुआ मनुष्य जब स्त्री-सेवन करता है, तो उससे निर्दोष (निरोग) संतान उत्पन्न नहीं होती ॥१०८॥


न सन्ध्यासु न दिवा नाप्सु न देवायतने मैथुनं कुर्वीत ॥१०९॥

अर्थ: विवेकी मनुष्य को प्रातः काल, मध्याह्न काल व सायंकाल सम्बन्धी तीनों संध्याओं में, दिन में, पानी में और मन्दिर में मैथुन नहीं करना चाहिए ॥१०९॥


पर्वणि
पर्वणि संधौ उपहते वह्नि कुलस्त्रियं न गच्छेत् ॥११०॥

अर्थ: मनुष्य को पर्व (दशलक्षण-आदि) के दिनों में, तीनों संध्याओं में, सूर्य-ग्रहण-आदि भयंकर उपद्रवों से व्याप्त दिनों में अपनी कुलवधू (धर्मपत्नी) का सेवन नहीं करना चाहिए ॥११०॥


न तद्गृहाभिगमने कामपि
स्त्रियमधि-शयीत ॥१११॥

अर्थ: किसी स्त्री के गृह जाकर उसके साथ शयन न करे ॥१११॥


वंशवयोवृत्तविद्याविभवानुरूपो वेषः समाचारो वा कं न
विडम्बयति ॥११२॥

अर्थ: कुटुम्ब, उम्र, सदाचार-कुल-धर्म-आदि-विद्या और धनादि ऐश्वर्य के अनुकूल की जाने वाली वेषभूषा और आचरण किसी को भी दुःखी नहीं बनाता-सभी को सुखी बनाता है। क्योंकि उक्त कुटुम्ब-आदि के अनुकूल वेष व नैतिक प्रवृत्ति करने वाले की समाज व राष्ट्र में बड़ाई होती है और वह सबका प्रेमपात्र बन जाता है ॥११२॥


अपरीक्षितमशोधितं च राजकुले न किंचित्प्रवेशयेन्निष्कास-
येद्वा ॥११३॥

अर्थ: राजा को अपने महलों में ऐसी वस्तु प्रविष्ट नहीं होने देनी चाहिए और न वहाँ से बाहर निकलने देनी चाहिए, जो कि उसके प्रामाणिक हितैषी पुरुषों द्वारा परीक्षित और निर्दोष साबित की हुई न हो ॥११३॥


श्रूयते हि स्त्रीवेषधारी कुन्तलनरेन्द्रप्रयुक्तो गूढपुरुषः कर्णनिहितेनासि-
पत्रेण पल्हवनरेन्द्रं हयपतिश्च मेषविषाणनिहितेन विषेण कुशस्थलेश्वरं
जघानेति ॥११४॥

अर्थ: इतिहास प्रमाण-साक्षी है कि कुन्तल देश के राजा द्वारा भेजे हुए स्त्री-भेषधारी गुप्तचर ने अपने कानों के पास छिपाये हुए खड्ग द्वारा पल्लव या पल्हव नरेश को मार डाला। इसी प्रकार हय देश के राजा द्वारा भेजे हुए गूढ़ पुरुष ने मेढ़े के सींग में रखे हुए विष द्वारा कुशस्थल-देशविशेष-के नरेश को मार डाला। अतः अपरीक्षित व असंशोधित वस्तु राज-गृह में प्रविष्ट न होनी चाहिए और न वहाँ से बाहर निकालनी चाहिए ॥११४॥


सर्वत्राविश्वासे नास्ति काचित्क्रिया ॥११५॥

अर्थ: लोक में सभी पर विश्वास न करने वाले व्यक्ति का कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो पाता ॥११५॥

(२६) सदाचार-समुद्देशः

लोभप्रमादविश्वासैर्बृहस्पतिरपि पुरुषो वध्यते वञ्च्यते वा ॥१॥

अर्थ: बृहस्पति के समान बुद्धिमान पुरुष भी अधिक लोभ, आलस्य व विश्वास करने से मारा जाता है अथवा ठगा जाता है ॥१॥


बलवताधिष्ठितस्य गमनं तदनुप्रवेशो वा श्रेयानन्यथा नास्ति क्षेमोपायः ॥२॥

अर्थ: बलिष्ठ शत्रु द्वारा आक्रमण किये जाने पर मनुष्य को या तो अन्यत्र चले जाना चाहिए अथवा उससे सन्धि कर लेनी चाहिए, अन्यथा उसकी रक्षा का कोई उपाय नहीं ॥२॥


विदेशवासोपहतस्य पुरुषकारः को नाम येनाविज्ञातस्वरूपः पुमान् स तस्य महानपि लघुरेव ॥३॥

अर्थ: परदेश-गमन से दूषित व्यक्ति का अपनी विद्वत्ता-आदि के परिचय कराने का पुरुषार्थ (वक्तृत्वकला आदि) व्यर्थ है, क्योंकि जिसके द्वारा उसका स्वरूप (विद्वत्ता-आदि) नहीं जाना गया है, वह पुरुष उसके महान् होने पर भी उसे छोटा समझ लेता है ॥३॥


अलब्धप्रतिष्ठस्य निजान्वयेनाहङ्कारः कस्य न लाघवं करोति ॥४॥

अर्थ: जो पाप-वश समाज व राष्ट्र द्वारा प्रतिष्ठा नहीं पा सका और केवल अपने वंश का अभिमान करता है, ऐसे अभिमानी को लोक में कौन लघु नहीं मानता ? सभी लघु मानते हैं ॥४॥


आर्तः सर्वोऽपि भवति धर्मबुद्धिः ॥५॥

अर्थ: सभी पुरुष व्याधि से पीड़ित होने पर मृत्यु के भय से अपनी बुद्धि धर्म में लगाते हैं, निरोगी अवस्था में नहीं ॥५॥


स नीरोगो यः स्वयं धर्माय समीहते ॥६॥

अर्थ: जो मनुष्य स्वयं-बिना किसी की प्रेरणा से - धर्म करने की चेष्टा करता है, वह निरोगी समझा जाता है व पापी निरोगी होने पर भी बीमार माना गया है ॥६॥ हारीत विद्वान् ने भी इसी प्रकार कहा है ॥१॥


व्याधिग्रस्तस्य ऋते धैर्यान्न परमौषधमस्ति ॥७॥

अर्थ: धैर्य को छोड़कर रोग-पीड़ित मनुष्य की दूसरी कोई उत्तम औषधि नहीं है, क्योंकि सैकड़ों मूल्यवान् औषधियों का सेवन भी उस समय तक बीमार को निरोग नहीं बना सकता, जब तक कि वह धैर्य धारण न करे ॥७॥ धन्वन्तरि विद्वान् ने भी व्याधि-पीड़ित पुरुष के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


स महाभागो यस्य न दुरपवादोपहतं जन्म ॥८॥

अर्थ: जिस मनुष्य का जीवन कुत्सित (निन्द्य) दोषों (हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील व परिग्रह-आदि) से नष्ट नहीं हुआ उसे महा भाग्यशाली कहा जाता है। गर्ग विद्वान् ने भी यावज्जीवन निन्दित न होने वाले व्यक्ति को महाभाग्यशाली कहा है ॥१॥


पराधीनेष्वर्थेषु स्वोत्कर्षसंभावनं मन्दमतीनाम् ॥९॥

अर्थ: मूर्ख लोग पराधीन (दूसरों के द्वारा की गई) इष्ट प्रयोजन-सिद्धि को स्वतः की हुई समझकर आनन्द प्रकट किया करते हैं ॥९॥ कौशिक विद्वान् ने भी मूर्खों के विषय में यही लिखा है ॥१॥


न भयेषु विषादः प्रतीकारः किंतु
धैर्यावलम्बनं ॥१०॥

अर्थ: मनुष्य को भय के स्थानों में घबड़ाना उपकारक नहीं, किन्तु धैर्य-धारण करना ही उपकारक है ॥१०॥ भृगु विद्वान् ने भी भयस्थानों में धैर्य रखना लाभ-दायक बताया है ॥१॥


स किं धन्वी तपस्वी वा यो रणे मरणे शरसन्धाने मनः-समाधाने
च मुह्यति ॥११॥

अर्थ: वह धनुर्धारी निन्द्य है, जो युद्धभूमि में कमान पर तीर चढ़ाकर एकाग्रचित्त से लक्ष्यभेद करने में अज्ञान करता है। इसी प्रकार वह तपस्वी भी निन्द्य हैं, जिसकी चित्तवृत्ति मृत्यु के समय आत्मदर्शन, श्रवण, मनन व निदिध्यासन (ध्यान में प्रवृत्त न होकर जीवन, आरोग्य व इन्द्रियों के भोगोपभोगों में अग्रेसर होती है ॥११॥


कृते प्रतिकृतमकुर्वतो नैहिकफलमस्ति नामुत्रिकं च ॥१२॥

अर्थ: उपकार करने वाले के साथ प्रत्युपकार न करने से एवं किसी के द्वारा अपकार होने पर अपकार द्वारा उसका प्रतीकार (शोधन) न करने से ऐहिक व पारलौकिक इष्ट फल नहीं मिलता ॥१२॥


शत्रुणामपि
सूक्तमुक्तं न दूषयितव्यम् ॥१३॥

अर्थ: नैतिक पुरुष शत्रु द्वारा भी कहे हुए न्याय युक्त व हितकारक वचनों को दोष-युक्त न बतावे और उन पर सदा अमल करता रहे ॥४३॥


कलहजननमप्रीत्युत्पादनं च दुर्जनानां धर्मः न
सज्जनानाम् ॥१४॥

अर्थ: दुष्टों के वचन कलह (वैर-विरोध) व द्वेष उत्पन्न करने वाले होते हैं जबकि सज्जन महापुरुषों के वचन ऐसे नहीं होते किंतु कल्याणकारक होते हैं ॥१४॥


श्रीर्न तस्याभिमुखी यो लब्धार्थमात्रेण सन्तुष्टः ॥१५॥

अर्थ: जो मनुष्य प्राप्त किये हुए साधारण धन से ही संतुष्ट रहता है, उसके पास से लक्ष्मी नहीं जाती अतः न्यायोचित साधनों द्वारा धन-संचय करने में प्रयत्नशील रहना चाहिए ॥१५॥


तस्य
कुतो वंशवृद्धिर्यो न प्रशमयति वैरानुबन्धम् ॥१६॥

अर्थ: जो पुरुष शत्रुओं द्वारा की जाने वाली वैर-विरोध की परम्परा को साम, दाम, दण्ड व भेद-आदि नैतिक उपायों से नष्ट नहीं करता उसकी वंश-वृद्धि किस प्रकार हो सकती है ? नहीं हो सकती ॥१६॥


भीतेष्वभयदानात्परं न दानमस्ति ॥१७॥

अर्थ: भूख, प्यास और शत्रुकृत उपद्रव-आदि से व्याकुल हुए प्राणियों को अभयदान (उनकी रक्षा) देने के सिवाय संसार में कोई उत्तम दान नहीं है ॥१॥


स्वस्यासंपत्तौ न चिन्ता किंचित्कांक्षित-
मर्थं [प्रसूते] दुग्धे किन्तूत्साहः ॥१८॥

अर्थ: धन न होने पर उसकी प्राप्ति के लिए मनुष्यों द्वारा की हुई चिन्ता अभिलषित और अपूर्व धन उत्पन्न नहीं करती, किन्तु उत्साह (उद्योग) ही मनुष्यों के लिए इच्छित और पुष्कल धन पैदा करता है ॥१८॥


स खलु स्वस्यैवापुण्योदयोऽपराधो वा
सर्वेषु कल्पः फलप्रदोऽपि स्वामी भवत्यात्मनि बन्ध्यः ॥१९॥

अर्थ: जो स्वामी किसी एक सेवक को छोड़कर अन्य सभी सेवकों के कल्पवृक्ष समान मनोरथ पूर्ण करता है किन्तु उसी अकेले को धन नहीं देता, इससे समझना चाहिए कि उसके पापकर्म का उदय है या उसके अपराधी होने के कारण स्वामी उससे रुष्ट है ॥१९॥


स सदैव दुःखितो
यो मूलधनमसंवर्धयन्ननुभवति ॥२०॥

अर्थ: जो मनुष्य अपने मूलधन (पैतृक या पूर्व-संचित धन) की व्यापार-आदि द्वारा वृद्धि नहीं करता और उसे खर्च करता रहता है, वह सदा दरिद्रता-वश दुःखी रहता है, इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को अपना मूलधन बढ़ाते हुए आयानुकूल खर्च करना चाहिए, ताकि भविष्य में दरिद्रता-वश उसे कष्ट न होने पावे ॥२०॥


मूर्खदुर्जनचाण्डालपतितैः सह संगतिं न
कुर्यात् ॥२१॥

अर्थ: बुद्धिमान मनुष्य को मूर्ख, दुष्ट, चाण्डाल व पतित (जाति और धर्म से च्युत) मनुष्यों के साथ मित्रता नहीं करनी चाहिए ॥२१॥


किं तेन तुष्टेन यस्य हरिद्राराग इव चित्तानुरागः ॥२२॥

अर्थ: जिसके चित्त का प्रेम हल्दी के रंग की तरह क्षणिक होता है; उसके प्रसन्न होने से क्या लाभ है ? कोई लाभ नहीं ॥२२॥


स्वात्मानमविज्ञाय पराक्रमः कस्य न परिभवं करोति ॥२३॥

अर्थ: अपनी शक्ति को बिना सोचे समझे पराक्रम करने से किसकी हार नहीं होती ? सभी की होती है ॥२३॥


नाक्रान्तिः पराभियोगस्योत्तरं किन्तु युक्तेरुपन्यासः ॥२४॥

अर्थ: शत्रु पर आक्रमण करने से ही उसका निग्रह नहीं होता, किन्तु युक्तियों-साम-दाम-आदि-के प्रयोग द्वारा ही वह वश में किया जा सकता है ॥२४॥


राज्ञोऽस्थाने कुपितस्य कुतः परिजनः ॥२५॥

अर्थ: निष्कारण आगबबूला (कुपित) होने वाले राजा के पास सेवक लोग नहीं ठहरते, अतः अपने सेवकों के साथ स्वामी को प्रेम का बर्ताव करना चाहिए ॥२५॥


न मृतेषु रोदितव्यमश्रुपातसमा हि किल पतन्ति तेषां हृदयेष्वङ्गाराः ॥२६॥

अर्थ: बन्धुओं के स्वर्गवास होने पर विवेकी मनुष्य को रुदन छोड़कर सबसे पहले उनकी दैहिक संस्कार करना चाहिए, इसके विपरीत जो रोते हैं, वे उनके अग्नि-संस्कार में विलम्ब करने से उल्टा उन्हें कष्ट पहुँचाते हैं। अतः रोने वालों के नेत्र से निकलने वाला अश्रु-प्रवाह मानों मृत-पुरुषों के हृदय पर गिरने वाले अङ्गारे ही हैं ॥२६॥


अतीते च वस्तुनि शोकः श्रेयानेव यद्यस्ति तत्समागमः ॥२७॥

अर्थ: यदि शोक करने से मरा हुआ व्यक्ति या नष्ट हुई इष्टवस्तु पुनः प्राप्त हो सकती हो, तब उसके विषय में शोक करना उचित है अन्यथा व्यर्थ है ॥२७॥


शोकमात्मनि चिरमनुवासयंस्त्रिवर्गमनुशोषयति ॥२८॥


स किं पुरुषो योऽकिंचनः सन् करोति विषयाभिलाषं ॥२९॥


अपूर्वेषु प्रियपूर्वं सम्भाषणं स्वर्गच्युतानां लिङ्गम् ॥३०॥


न ते मृता येषामिहास्ति शाश्वती कीर्तिः ॥३१॥


स केवलं भूभाराय जातो येन न यशोभिर्धवलितानि भुवनानि ॥३२॥


परोपकारो योगिनां महान् भवति श्रेयोबन्ध इति ॥३३॥

अर्थ: लोक में शिष्ट पुरुषों द्वारा किया हुआ उपकार उनके महाकल्याण का कारण है ॥३३॥ जैमिनि१ विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


का नाम शरणागतानां परीक्षा ॥३४॥

अर्थ: अपनी रक्षा कराने के लिए शरण में आये हुए (शरणाथी) पुरुषों की परीक्षा (सज्जनता व दुर्जनता की जाँच) करना व्यर्थ है। अर्थात् उनकी परीक्षा के प्रपंच में न पड़कर सहृदयता से उनकी सेवा करनी चाहिए ॥३४॥


अभिभवनमंत्रेण परोपकारो महापातकिनां न महासत्वानाम् ॥३५॥

अर्थ: जो लोग स्वार्थसिद्धि-वश दूसरों की भलाई करते हैं, वे महापापी हैं, महापुरुष नहीं ॥३५॥ गुरु२ विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


तस्य भूपतेः कुतोऽभ्युदयो जयो वा यस्य द्विषत्सभासु नास्ति
गुणग्रहणप्रागल्भ्यं ॥३६॥

अर्थ: जिस राजा का गुण-गान शत्रुओं की सभा में विशेषता से नहीं किया जाता, उसकी उन्नति वा विजय किस प्रकार हो सकती है ? नहीं हो सकती। अतः विजिगीषु को शूरवीरता व नीतिमत्ता-आदि सद्गुणों से अलंकृत होना चाहिए ॥३६॥


तस्य गृहे कुटुम्बं धरणीयं यत्र न भवति
परेषामामिषम् ॥३७॥

अर्थ: मनुष्य को अपना कुटुम्ब ऐसे व्यक्ति के मकान पर रखना चाहिए, जहाँ पर वह शत्रु-कृत उपद्रवों द्वारा नष्ट न हो सके ॥३७॥


परस्त्रीद्रव्यरक्षणेन नात्मनः। किमपि फलं विप्लवेन
महाननर्थसम्बन्धः ॥३८॥

अर्थ: मनुष्य को दूसरे की स्त्री व धन के संरक्षण से कोई लाभ नहीं, क्योंकि कभी-कभी उसका परिणाम भयंकर होता है अर्थात् यदि दुर्भाग्य-वश उसके शत्रु आदि द्वारा अपहरण या नष्ट किये जाने पर उल्टा उसका स्वामी संरक्षण करने वाले से वैर-विरोध करने लगता हे ॥३८॥


आत्मसंभावितः परेषां भृत्यानामसहमानश्च भृत्यो हि
बहुपरिजनमपि करोत्येकाकिनं स्वामिनं ॥४०॥

अर्थ: अपरिचित व्यक्तियों से प्रेमपूर्वक मधुर भाषण करना स्वर्ग से आये हुए सज्जन पुरुषों का प्रतीक है ॥४०॥ अभिमानी सेवक ईर्ष्या-वश दूसरे सेवकों की उन्नति सहन नहीं करता, इसलिए वे लोग स्वामी से रुष्ट होकर उसे छोड़ देते हैं। इस प्रकार घमंडी सेवक अन्य सेवकों के रहने पर भी अपने स्वामी को अकेला कर देता है, अतः अभिमानी सेवक नहीं रखना चाहिए ॥४०॥ राजपुत्र३ ने भी दुष्टबुद्धि व अभिमानी सेवक से इसी प्रकार हानि बताई है ॥१॥


अपराधानुरूपो दण्डः पुत्रेऽपि
प्रणेतव्यः ॥४१॥

अर्थ: जिन पुरुषों की लोक में परोपकार-आदि द्वारा स्थायी कीर्ति व्याप्त है उनके स्वर्गारोहण हो जाने पर भी उन्हें जीवित समझना चाहिए ॥४१॥ राजा को अपने पुत्र के लिए भी अपराधानुकूल दण्ड देना चाहिए फिर प्रजा-पीड़क अन्यायियों को दण्ड देना तो न्याय-संगत ही है ॥४१॥ शुक्र४ ने भी अपराधानुकूल दण्डविधान को न्याय-संगत बताया है ॥१॥


देशानुरूपः करो ग्राह्यः ॥४२॥

अर्थ: स्वामी को अपनी दरिद्रावस्था में भी ऐसे सेवक को नहीं छोड़ना चाहिए जो उस पर अनुरक्त व संतुष्ट रहता है ॥ जिस पुरुष ने, शूरता, विद्वत्ता व परोपकार-आदि द्वारा उत्पन्न होने वाली कीर्ति से समस्त पृथ्वी तल को शुभ्र नहीं किया, उसका जन्म पृथ्वी में भाररूप ही है ॥४२॥ राजा प्रजा से अपने देशानुकूल कर (टैक्स) वसूल करे। अन्यथा अच्छी फसल-आदि न होने के कारण एवं अधिक कर-टैक्स-से दबी हुई प्रजा राजा से विद्रोह करने तत्पर हो जाती है ॥४२॥


प्रतिपाद्यानुरूपं वचनमुदाहर्तव्यं ॥४३॥

आयानुरूपो व्ययः कार्यः ॥४४॥

ऐश्वर्यानुरूपोविलासो विधातव्यः ॥४५॥

धनश्रद्धानुरूपस्त्यागोऽनुसर्तव्यः५ ॥४६॥

अर्थ (सूत्र 43 से 46): वक्ता श्रोता के अनुकूल वचन बोले ॥४३॥ मनुष्य को अपनी आमदनी के अनुकूल खर्च करना चाहिए क्योंकि बिना सोचे-समझे अधिक खर्च करने वाला कुबेर के समान धनाढ्य होने पर भी दरिद्र हो जाता है ॥४४॥ अपने धनादि वैभव के अनुकूल विलास-वेश-भूषा करना चाहिए ॥४५॥ धन और श्रद्धानुकूल पात्रदान करना चाहिए, ऐसा करने से उसे आर्थिक कष्ट नहीं हो पाते ॥४६॥


सहायानुरूपं कर्म आरब्धव्यम्६ ॥४७॥

स पुमान् सुखी यस्यास्ति सन्तोषः ॥४८॥

अर्थ (सूत्र 47 से 48): बुद्धिमान पुरुष सहायकों के अनुकूल कार्य आरम्भ करे क्योंकि उनकी अनुकूलता के बिना कार्यसिद्धि संदिग्ध रहती है ॥४७॥ वही मनुष्य सुखी है, जो संतोषी है, क्योंकि तीन लोक की सम्पत्ति मिल जाने पर भी तृष्णा नष्ट नहीं होती, अतः उसके त्याग करने से ही सुख प्राप्त हो सकता है; अन्यथा नहीं ॥४८॥


रजस्वलाभिगामी
चाण्डालादप्यधमः ॥४९॥

सलज्जं निर्लज्जं न कुर्यात् ॥५०॥

स पुमान्
पटावृत्तोऽपि नग्न एव यस्य नास्ति सच्चरित्रमावरणम् ॥५१॥

स नग्नोऽप्यनग्न एव
यो भूषितः सच्चरित्रेण ॥५२॥

सर्वत्र संशयानेषु नास्ति कार्यसिद्धिः ॥५३॥

न
क्षीरघृताभ्यामन्यत् परं रसायनमस्ति ॥५४॥

अर्थ (सूत्र 49 से 54): रजस्वला स्त्री को सेवन करने वाला चाण्डाल से भी अधिक नीच है ॥४९॥ नैतिक पुरुष लज्जाशील व्यक्ति को निर्लज्ज न बनाये। सारांश यह है कि कुसंस्कार-वश नीति-विरुद्ध प्रवृत्ति करने वाला लज्जा-वश हितैषियों के भय से अनर्थ नहीं करता, परन्तु उसके कार्य को स्वयं देखकर उसे निर्लज्ज बनाने से वह उनके समक्ष अनर्गल प्रवृत्ति करने से नहीं चूकता ॥५०॥ जो सदाचाररूप वस्त्र से अलंकृत नहीं है, वह सुन्दर वस्त्रों से वेष्टित होने पर भी नग्न ही है ॥५१॥ सदाचार से विभूषित शिष्ट पुरुष नग्न होने पर भी नग्न नहीं गिने जाते, अतएव लोकप्रिय होने के लिए आचारण विशुद्ध रखना चाहिए ॥५२॥ सभी स्थानों में सन्देह करने वालों के कार्य सिद्ध नहीं होते ॥५३॥ दूध और घी से बढ़कर दूसरा कोई उत्तम रसायन (आयु व शक्तिवर्धक) नहीं है ॥५४॥


परोपघातेन वृत्तिर्निर्भाग्यानाम् ॥५५॥

वरमुपवासो, न पुनः पराधीनं भोजनम् ॥५६॥

स देशोऽनुसर्तव्यो यत्र नास्ति
वर्णसङ्करः ॥५७॥

अर्थ (सूत्र 55 से 57): दूसरे प्राणियों को पीड़ित करके जीविका करना पापियों का कार्य है, अतएव नैतिक पुरुष न्यायोचित साधनों द्वारा जीवन निर्वाह करे ॥५५॥ पराधीन भोजन की अपेक्षा उपवास करना अच्छा है, क्योंकि पराश्रित भोजन अनिश्चित व अनियमित होने से विशेष कष्टदायक होता है ॥५६॥ उस देश में निवास करना चाहिए जिसमें वर्णसंकर लोग नहीं हैं ॥५७॥


स जात्यन्धो यः परलोकं न पश्यति ॥५८॥

अर्थ: जो व्यक्ति अपने सत्कर्त्तव्यों द्वारा परलोक सुधारने में प्रयत्नशील नहीं रहता, वही जन्मान्ध है ॥५८॥


व्रतं विद्या सत्यमानृशंस्यमलौल्यता च ब्राह्मण्यं न पुनर्जातिमात्रं ॥५९॥

अर्थ: मनुष्य केवल ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से ही ब्राह्मण नहीं गिना जाता, परन्तु व्रतों (अहिंसा, सत्य, अचौर्य-आदि) का पालन, ज्ञानाभ्यास, सत्यभाषण, क्रूरता का त्याग व संतोष-आदि सद्गुणों को धारण करने से वास्तविक ब्राह्मण माना गया है ॥५९॥ भगवज्जिनसेनाचार्य १ ने भी तप, आगमज्ञान और ब्राह्मण कुल में जन्मधारण करने वाले को सच्चा ब्राह्मण एवं तप और आगमज्ञान से शून्य को जाति ब्राह्मण कहा है ॥१॥


निःस्पृहाणां
का नाम परापेक्षा ॥६०॥

अर्थ: निःस्पृह (धनादि की लालसा-रहित) व्यक्ति परमुखापेक्षी नहीं होते ॥६०॥


कं पुरुषमाशा न क्लेशयति ॥६१॥

अर्थ: तृष्णा से कौन मनुष्य दुःखी नहीं होता? सभी होते हैं ॥६१॥ सुन्दर २ कवि ने भी तृष्णा को दुःख का और संतोष को सुख का कारण बताया है ॥१॥


संयमी गृहाश्रमी वा यस्याविद्यातृष्णाभ्यामनुपहतं चेतः ॥६२॥

अर्थ: लोक में वही बुद्धिमान मनुष्य, चाहे वह यति-आश्रम वा गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट हो, तभी उच्च पद प्राप्त कर सकता है; जब उसका चित्त अज्ञान और तृष्णा से दूषित न हो ॥६२॥


शीलमलङ्कारः पुरुषाणां न देहखेदावहो बहिराकल्पः ॥६३॥

अर्थ: शील (नैतिक-प्रवृत्ति) ही पुरुषों का आभूषण है, ऊपरी कटक-कुण्डलादि शरीर को कष्ट पहुँचाने वाले हैं; अतः ये वास्तविक आभूषण नहीं ॥६३॥ नीतिकार भर्तृहरि ने ३ भी कहा है कि कानों की शोभा शास्त्र सुनने से है, न कि कुण्डल पहनने से, हाथों की शोभा पात्रदान से है, न कि कंकण धारण करने से एवं दयालु पुरुषों के शरीर की शोभा परोपकार से है, न कि चन्दनादि के लेप से ॥१॥


कस्य नाम नृपतिर्मित्रं ॥६४॥

अर्थ: राजा किस का मित्र होता है ? किसी का नहीं, क्योंकि अपराध करने पर वह मित्र को भी दण्ड देने से नहीं चूकता ॥६४॥ दुर्जन के साथ भी सज्जनता का बर्ताव करना चाहिए, इस को छोड़कर उसके प्रति और कोई कर्त्तव्य नहीं; क्योंकि भलाई का बर्ताव करने से प्रायः वे अपनी दुष्टता छोड़ देते हैं ॥६५॥ किसी कारणवश याचक को कुछ देने में असमर्थ होने पर भी मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह उसके साथ कठोर वचन कभी न बोले, क्योंकि इनका प्रयोग उसकी प्रतिष्ठा व मर्यादा को नष्ट करने के साथ-साथ उस याचक को भी असंतुष्ट कर डालता है, जिसके फलस्वरूप वह उसका अनिष्ट चिंतन करने लगता है ॥६६॥ उस स्वामी को याचक लोग मरुभूमि के समान निष्फल समझते हैं, जिसके पास आकर वे लोग इच्छित वस्तु प्राप्त कर अपना मनोरथ पूर्ण नहीं कर पाते ॥६७॥ प्राणियों की रक्षा करना ही राजा का यज्ञ (पूजन) है, न कि प्राणियों की बलि देना ॥६८॥ राजा को अपनी प्रचुर तीरन्दाज व सैनिक शक्ति का उपयोग शरणागतों की रक्षार्थ करना चाहिए न कि निरपराध प्राणियों की हत्या में।


अप्रियकर्तुर्न प्रियकरणात्परममाचरणं ॥६५॥


अप्रयच्छन्नर्थिनो न परुषं ब्रूयात ॥६६॥


स स्वामी मरुभूमैर्यत्रार्थिनो न भवन्तीष्टकामाश्च ॥६७॥


प्रजापालनं हि राज्ञो यज्ञो न पुनर्भूतानामालम्भः ॥६८॥


प्रभूतमपि नानपराधसत्त्वव्यापत्तये नृपाणां बलं धनुर्वा किन्तु शरणागतरक्षणाय ॥६९॥

(२७) व्यवहार-समुद्देशः

कलत्रं नाम नराणामनिगड़मपि दृढं बन्धनमाहुः ॥१॥

अर्थ: विद्वानों ने कहा है, कि पुरुषों को स्त्री रूप बन्धन सांकलों का न होकर के भी उस से कहीं अधिक दृढ़ (मजबूत) है क्योंकि स्त्री के प्रेम-पाश में फँसे हुए मनुष्य का उस से छुटकारा पाना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है और इसी कारण वह आत्म-कल्याण के उपयोगी नैतिक व धार्मिक सत्कर्त्तव्यों से विमुख रहता है ॥१॥


त्रीण्यवश्यं भर्तव्यानि माता
कलत्रमप्राप्तव्यवहाराणि चापत्यानि ॥२॥

अर्थ: मनुष्य को माता, स्त्री और प्रौढ़ न होने से जीवन-निर्वाह करने में असमर्थ पुत्रों का पालन-पोषण अवश्य करना चाहिए ॥२॥


दानं तपः प्रायोपवेशनं
तीर्थोपासनफलम् ॥३॥

अर्थ: पात्र-दान, तप व अनशन (उपवास) अथवा जीवन पर्यन्त तीर्थ भूमि में रहने का दृढ़ संकल्प करना, या प्रायोपगमन संन्यास धारण यह तीर्थ स्थान की सेवा का फल है। अर्थात् विवेकी पुरुष इन


तीर्थोपवासिषु देवस्वापरिहरणं क्रव्यादेषु कारुण्यमिव,
स्वाचारच्युतेषु पापभीरुत्वमिव प्राहुरधार्मिकत्वमतिनिष्ठुरत्वं वञ्चकत्वं प्रायेण
तीर्थवासिनां प्रकृतिः ॥४॥

अर्थ: जिस प्रकार व्याघ्रादि हिंसक जन्तुओं में दयालुता और आचार-भ्रष्ट (पापी) पुरुषों में पाप से डरना आश्चर्यकारक होता है, उसी प्रकार तीर्थस्थानों में रहने वाले ब्राह्मणों में भी देवता पर चढ़ाई हुई द्रव्य का त्याग करना आश्चर्यकारक होता है। विद्वानों ने कहा है कि तीर्थस्थानों में रहने वाले मनुष्यों की प्रकृति अधार्मिक, निर्दयी (क्रूर) और छल कपटपूर्ण होती है ॥४॥


स किं प्रभुर्यः कार्यकाले एव न सम्भावयति
भृत्यान् ॥५॥

अर्थ: जो स्वामी अपनी प्रयोजनसिद्धि हो जाने पर सेवकों को नियुक्त नहीं करता अथवा नियुक्त कर प्रयोजन सिद्ध होने पर भी उन्हें वेतन नहीं देता वह निन्द्य है॥ ५॥


स किं भृत्यः सखा वा यः कार्यमुद्दिश्यार्थं याचते ॥६॥

अर्थ: जो सेवक अपने द्वारा स्वामी की प्रयोजन-सिद्धि समझ कर उससे धन की याचना करता है, एवं जो मित्र अपने द्वारा मित्र की प्रयोजन-सिद्धि समझकर उससे धन चाहता या मांगता है वे दोनों (सेवक व मित्र) दुष्ट हैं॥ ६॥


यार्थेनप्रणयिनी करोति चाङ्गकऋष्टिं सा किं भार्या ॥७॥

अर्थ: वह स्त्री निन्द्य है जो धन के कारण पति से प्रेम करती हुई उसका गाढालिङ्गन करती है। सारांश यह है पतिव्रता स्त्री को पति के सुख-दुख में उसके साथ एक-सा (प्रेमपूर्ण) बर्ताव करना चाहिए ॥७॥


स किं देशो यत्र नास्त्यात्मनो वृत्तिः ॥८॥

अर्थ: वह देश निन्द्य है, जहाँ पर मनुष्य के लिए जीवन-निर्वाह के साधन (कृषि व व्यापार-आदि) नहीं हैं, अतः विवेकी पुरुष को जीविका-योग्य देश में निवास करना चाहिए॥ ८॥


स किं बन्धुर्यो व्यसनेषु नोपतिष्ठते ॥९॥

अर्थ: वह भाई निंद्य-शत्रु के समान है, जो आपत्तिकाल में भाई की सहायता नहीं करता ॥६॥


तत्किं मित्रं यत्र नास्ति विश्वासः ॥१०॥

अर्थ: वह मित्र निन्द्य है जो अपने मित्र के धन, धान्य व कलत्र (स्त्री) की रक्षा करने में विश्वासघात करता है; अतः मित्र द्वारा सोपे हुए धन-धान्यादि को सुरक्षित रखे ॥१०॥


स किं गृहस्थो यस्य नास्ति सत्कलत्रसम्पत्तिः ॥११॥

अर्थ: वह गृहस्थ किस काम का, जिसके यहाँ पतिव्रता व रूपवती कुलवधुरूप सम्पत्ति नहीं है ॥११॥


तत्किं दानं यत्र नास्ति
सत्कारः ॥१२॥

अर्थ: वह दाता निंदनीय है, जो दान लेने योग्य (पात्र) का यथाविधि सत्कार (विनय) नहीं करता । क्योंकि यथाविधि सत्कार के बिना दाता दान का पारत्रिक फल प्राप्त नहीं करता ॥१२॥


तत्किं भुक्तं यत्र नास्त्यतिथिसंविभागः ॥१३॥

अर्थ: भोजन की वेला में अतिथियों को आहार-दान न देने वाले व्यक्ति का आहार निन्द्य है-पशु की चेष्टा मात्र है। अर्थात्-जिस प्रकार पशु जीवन-रक्षार्थ तृणादि भक्षण करके मल-मूत्रादि क्षेपण करता है, उसी प्रकार वह मनुष्य भी जीवन-रक्षार्थ भोजन करके मल-मूत्रादि क्षेपण करता है व दान धर्म को नहीं जानता। अतः मनुष्य को अतिथियों को आहार-दान के पश्चात् भोजन करना


तत्किं प्रेम
यत्रकार्यवशात् प्रत्यावृत्तिः ॥१४॥


तत्किमाचरणं यत्र वाच्यता मायाव्यवहारो
वा ॥१५॥


तत्किमपत्यं यत्र नाध्ययनं विनयो वा ॥१६॥


तत्किं ज्ञानं यत्र
मदेनान्धता चित्तस्य ॥१७॥


तत्किं सौजन्यं यत्र परोक्षे पिशुनभावः ॥१८॥


सा किं
श्रीर्यया न सन्तोषः सत्पुरुषाणां ॥१९॥

अर्थ: अपनी विद्यमान सम्पत्ति से संतुष्ट न रहने वाले शिष्टपुरुषों की सम्पत्ति निंद्य है, क्योंकि वे लोग तृष्णावश दुःखी रहते हैं; अतः संतोष धारण करना चाहिए ॥१६॥


तत्किं कृत्यं यत्रोक्तिरुपकृतस्य ॥२०॥

अर्थ: किसी मनुष्य का उपकार करके उसके समक्ष प्रकट करना निन्द्य है, क्योंकि इससे वह प्रत्युपकार के बदले उपकारी से वैर-विरोध करने लगता है ॥२०॥


तयोः को नाम निर्वाहो यौ द्वावपि
प्रभूतमानिनौ पंडितो लुब्धौ मूर्खौ चासहनौ वा ॥२१॥

अर्थ: बुद्धिमानों को विद्वान् होकर अभिमानी व कृपण अथवा मूर्ख होकर लोभी, घमण्डी, असहिष्णु व पारस्परिक कलह उत्पन्न कराने-वालों को किसी भी कार्य में नियुक्त न करना चाहिए, क्योंकि इससे कार्य सिद्धि नहीं होती और उक्त दोनों का निर्वाह होना भी असम्भव है॥ २१॥


स्ववान्त इव स्वदत्ते
नाभिलाषं कुर्यात् ॥२२॥

अर्थ: बुद्धिमान को वमन की हुई वस्तु की तरह स्वयं दिया हुआ दान ग्रहण करने की अभिलाषा नहीं करनी चाहिए ॥२३॥


उपकृत्य मूकभावोऽभिजातीनाम् ॥२३॥

अर्थ: कुलीन पुरुष किसी का उपकार करके उसका दिग्दर्शन न करते हुए मौन ही रहते हैं॥ २३॥


परदोषश्रवणे
बधिरभावः सत्पुरुषाणां ॥२४॥

अर्थ: सत्पुरुष दूसरे की बुराई व दोष सुनकर ऐसे अनसुने बन जाते हैं मानो कि वे बहरे ही हों ॥२४॥


परकलत्रदर्शनेऽन्धभावो महाभाग्यानाम् ॥२५॥

अर्थ: पर स्त्रियों की तरफ दृष्टिपात करने में भाग्यशाली पुरुष अन्धे होते हैं-उन पर कुदृष्टि नहीं रखते। अभिप्राय यह है कि उनका अपनी पत्नी के सिवाय अन्य स्त्री जाति पर मातृ-भगिनी भाव होता है ॥२५॥


शत्रावपि गृहायाते संभ्रमः कर्तव्यः किं पुनर्न महति ॥२६॥

अर्थ: बुद्धिमान को अपने गृह में पदार्पण किये हुए शत्रु का भी सम्मान करना चाहिए। फिर क्या महापुरुष का नहीं करना चाहिए ? अवश्य करना चाहिए ॥२६॥


अन्तःसारधनमिव स्वधर्मो न प्रकाशनीयः ॥२७॥

अर्थ: विवेकी मनुष्य को गृह के मध्य में रखे हुए उत्तम धन के समान अपना धर्म (दानपुण्यादि) प्रकाशित नहीं करना चाहिए। अर्थात् जिस प्रकार गृह में रखा हुआ धन नष्ट होने के भय से चौर-आदि के सामने प्रकट नहीं किया जाता, उसी प्रकार अपना धर्म भी नष्ट होने के भय से किसी के समक्ष प्रकट नहीं किया जाता॥ २७॥


मदप्रमादजैर्दोषैर्गुरुषु निवेदनमनुशयः प्रायश्चित्तं प्रतीकारः ॥२८॥

अर्थ: गर्व व कामक्रोधादि कषायवश होने वाले दोषों की शुद्धि के लिए निम्न प्रकार तीन उपाय हैं॥ १. अपने दोषों को गुरुजनों के समक्ष प्रकट करना, किये हुए दोषों पर पश्चात्ताप करना, ३. प्रायश्चित्त करना ॥२८॥


श्रीमतोऽर्थार्जने कायक्लेशो धन्यो यो देवद्विजान् प्रीणाति ॥२९॥

अर्थ: जो धनाढ्य पुरुष अपने धन द्वारा देव, द्विज और याचकों को सन्तुष्ट करता है, उसका अर्थोपार्जन के लिए शारीरिक कष्ट उठाना प्रशंसनीय है॥ २९॥


चणका इव नीचा उदरस्थापिता अपि नाविकुर्वाणास्तिष्ठन्ति ॥३०॥

अर्थ: नीच पुरुषों का चाहे कितना ही उपकार किया जावे, तथापि वे चनों के भक्षण के समान बिना अपकार किये विश्राम नहीं लेते । अर्थात् जिस प्रकार चने खाये जाने पर विकार (अधोवायु निस्सारण द्वारा जनसाधारण से हंसी मजाक कराना) उत्पन्न कर देते हैं, उसी प्रकार उपकृत हुए भी नीच पुरुष अपकार कर डालते हैं॥ ३०॥


स पुमान् वन्द्यचरितो यः प्रत्युपकारमनपेक्ष्य परोपकारं करोति ॥३१॥

अर्थ: प्रत्युपकार की आशा न करके दूसरों का उपकार करने वाले का चरित्र नमस्कार करने योग्य है॥ ३१॥


अज्ञानस्य वैराग्यं भिक्षोर्विटत्वमधनस्य विलासो वेश्यारतस्य
शौचमविदितवेदितव्यस्य तत्त्वाग्रह इति पंच न कस्य मस्तकशूलानि ॥३२॥

अर्थ: मूर्ख मनुष्य का वैराग्य धारण, तपस्वी का काम सेवन, दरिद्र का श्रृंगार-विधान, वेश्यासक्त की पवित्रता और आत्मज्ञान-शून्य का वस्तु स्वरूप के विचारने का आग्रह, ये पाँच कार्य किसके मस्तकशूल (पीड़ाजनक) नहीं हैं ? अर्थात्-सभी को पीड़ा जनक हैं । सारांश यह है कि वैराग्य-इच्छुक को ज्ञानी, साधु को कामसेवन से विरक्त, श्रृंगार चाहने वाले को धनाढ्य, पवित्रता चाहने वाले को वेश्या सेवन को त्यागी व वस्तु स्वरूप के विचारक को आत्मज्ञानी होना चाहिए॥ ३२॥


स हि पंचमहापातकी योऽशस्त्रमशास्त्रं वा पुरुषमभियुञ्जीत ॥३३॥

अर्थ: जो मनुष्य निहत्थे व्यक्ति पर शस्त्र प्रहार और मूर्ख से शास्त्रार्थ करता है वह पंच महापातकों (स्त्री-वध, बाल-वध, गो-वध, ब्राह्मण-वध व स्वामी-वध) के कटुक फल भोगता है, अतः बुद्धिमान पुरुष को निहत्थे पर शस्त्रप्रहार और मूर्ख से वाद-विवाद नहीं करना चाहिए॥ ३३॥


उपाश्रुतिं श्रोतुमिव कार्यवशान्नीचमपि स्वयमुपसर्पेत् ॥३४॥

अर्थ: जिस प्रकार प्रयोजनवश शुभ या अशुभ शकुन-शब्द सुना जाता है, यदि शुभ सूचक होता है तो वह कार्य किया जाता है, अन्यथा छोड़ दिया जाता है, उसी प्रकार बुद्धिमान् मनुष्य को स्वार्थसिद्धि के लिए नीच पुरुष के भी पास जाकर उसके वचन सुनने चाहिए और अनुकूल होने पर मानना चाहिए अन्यथा नहीं ॥३४॥


अर्थी दोषं न पश्यति ॥३५॥

अर्थ: स्वार्थी मनुष्य अपने दोषों पर दृष्टि नहीं डालता॥ ३५॥


गृहदास्यभिगमो गृहं गृहिणीं गृहपतिं च प्रत्यवसादयति ॥३६॥

अर्थ: गृहदासी से अनुराग करने वाला अपने गृह, पत्नी व गृह के स्वामी को नष्ट कर देता है॥ ३६॥


वेश्यासंग्रहो देव-द्विज गृहिणी-बन्धूनामुच्चाटनमंत्रः ॥ ३७॥

अर्थ: वेश्या-संग्रह देव, ब्राह्मण, स्त्री बन्धुजनों से पृथक् कराने वाला उच्चाटन-मंत्र है अतः उक्त हानि व धार्मिक क्षति से बचने के लिए विवेकी मनुष्य को वेश्या-संग्रह का त्याग करना चाहिए॥ ३७॥


अहो लोकस्य पापं, यन्निजा स्त्री रतिरपि भवति निम्बुसमा, परगृहीता शुन्यपि
भवति रम्भासमा ॥३८॥

अर्थ: लोगों को पाप जानकर आश्चर्य होता है कि जिसके कारण वे लोग अपनी रति के समान सुन्दर स्त्री को भी नीम सदृश अप्रिय और दूसरे की कुरूप स्त्री को देवाङ्गना सम प्रिय मान बैठते हैं ॥३८॥


स सुखी यस्य एक एव दारपरिग्रहः ॥ ३९॥

अर्थ: वही सुखी है जिसके एक स्त्री है॥ ३६॥ चाणक्य४ ने भी दो पत्नियों को कलह का बीज बताया है ॥१॥


व्यसनिनो यथासुखमभिसारिकासु न
तथार्थवतीषु ॥४०॥

महान् धनव्ययस्तदिच्छानुवर्तनं दैन्यं चार्थवतीषु ॥ ४१॥

अर्थ (सूत्र 40 से 41): जिस प्रकार व्यभिचारी पुरुष को व्यभिचारिणी स्त्रियों से सुख प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार वेश्याओं से भी उसे कदापि सुख प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि वेश्याओं में अनुराग करने से व्यसनी का प्रचुर धन-व्यय होता है एवं उनकी इच्छानुकूल प्रवृत्ति करने से निर्धनता-वश उसे धनाढ्यों के समक्ष धन के लिए दीनता प्रकट करनी पड़ती है अतः नैतिक पुरुष को व्यभिचारिणी स्त्रियों व वेश्याओं से दूर रहना चाहिए ॥४०-४१॥


अस्तरणं कम्बलो जीवधनं गर्दभः परिग्रहो वोढा सर्वकर्मार्हश्च भृत्या इति कस्य
नाम न सुखावहानि १॥ ४२॥

अर्थ: बिछाने की गद्दी व ओढ़ने को कम्बल, कृषि-आदि में उपयोगी गो-बैल आदि जीव, धन, विवाहित स्त्री रूप परिग्रह एवं समस्त कार्य करने में निपुण सेवक, ये वस्तुएँ किसे सुखदायक नहीं होतीं ? सभी को होती हैं ॥४२॥


लोभवति भवन्ति विफलाः सर्वे गुणाः २॥ ४३॥

अर्थ: लोभी के समस्त विद्या आदि गुण निष्फल होते हैं, क्योंकि उनका वह सदुपयोग नहीं करता ॥४३॥


प्रार्थना कं नाम न लघयति ३॥ ४४॥

अर्थ: याचना करने वाला कौन मनुष्य लघु नहीं गिना जाता ? सभी लघु गिने जाते हैं ॥४४॥


न दारिद्र्यात्परं पुरुषस्य लाञ्छनमस्ति यत्संगेन
सर्वे गुणा निष्फलतां यान्ति। ४५॥

अर्थ: लोक में दरिद्रता से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु मनुष्य को दूषित (दोषयुक्त) नहीं बनाती, दरिद्रता ही सबसे बड़ा दोष है जिसके कारण मनुष्य के समस्त गुण निष्फल हो जाते हैं ॥४५॥ किसी विद्वान्५ ने भी गुणवान् दरिद्र व्यक्ति द्वारा किये जाने वाले उपकार को शङ्कायुक्त कहा है ॥१॥


अलब्धार्थोऽपि लोको धनिनो भाण्डो भवति॥
४६॥

अर्थ: धनाढ्य से धन न मिलने पर भी याचक लोग उसकी प्रशंसा करते हैं, पुनः धन मिलने पर तो उसकी प्रशंसा के पुल बांधना कोई बड़ी बात नहीं ॥४६॥ वल्लभदेव६ ने भी नीच कुल के कुरूप धनाढ्य पुरुष की याचकों द्वारा स्तुति बताई है ॥१॥


धनिनो यतयोऽपि चाटुकाराः॥ ४७॥

अर्थ: जबकि साधु पुरुष भी धनाढ्य पुरुष की प्रशंसा करते हैं फिर साधारण लोगों का तो कहना ही क्या है ? वे तो उसकी प्रशंसा करते ही हैं ॥४७॥


पवित्रवस्तु, उत्सव, पर्व, तिथि व यात्रा का माहात्म्य, पांडित्य, चातुर्य व लोकव्यवहार


न रत्नहिरण्यपूताज्जलात्परं पावनमस्ति ॥४८॥

स्वयं मेध्या आपो वह्नितप्ता
विशेषतः ॥४९॥

अर्थ (सूत्र 48 से 49): मरकत आदि रत्न व सुवर्ण से पवित्र किये हुए जल को छोड़कर दूसरा कोई पदार्थ पवित्र नहीं है। सारांश यह है कि ऐसा जल स्नान करने व पीने के लायक है॥ ४८॥ जल स्वयं पवित्र है। व गर्मजल विशेष पवित्र है ॥४९॥


स एवोत्सवो यत्र वन्दिमोक्षो दीनोद्धरणं च ॥५०॥

तानि पर्वाणि येष्वतिथिपरिजनयोः प्रकामं सन्तर्पणं ॥५१॥

अर्थ (सूत्र 50 से 51): उत्सव मनाने की सार्थकता तभी है जब कि इस अवसर पर वन्दियों कैदियों का छुटकारा और अनाथों की रक्षा की जावे, पर्व (रक्षाबंधन-आदि) मनाने की भी सार्थकता तभी है, जबकि इस अवसर पर अतिथियों और कुटुम्बीजनों को दान-सम्मान द्वारा अत्यन्त संतुष्ट किया जावे ॥५०-५१॥


तास्तिथयो यासु
नाधर्माचरणं ॥५२॥

अर्थ: तीस तिथियों में से वे ही तिथियां सार्थक हैं जिनमें मनुष्य पापाचरण से हटकर धर्माचरण की ओर अग्रेसर होता है ॥५२॥


सा तीर्थयात्रा यस्यामकृत्यनिवृत्तिः ॥५३॥

अर्थ: चाहिए ॥५३॥ किसी नीतिकार१ के उद्धरण से भी यही बात प्रतीत होती है ॥१॥


तत्पाण्डित्यं यत्र
वयोविद्योचितमनुष्ठानम् ॥५४॥

अर्थ: अपनी आयु और विद्यानुकूल सत्कर्त्तव्य का पालन करने वाले विद्वान् की विद्वत्ता सच्ची है ॥५४॥ गुरु२ ने भी विद्या व आयु के योग्य सत्कर्त्तव्य-पालन व योग्य वेषधारण करने वाले को विद्वान् माना है ॥१॥


तच्चातुर्यं यत्परप्रीत्या स्वकार्यसाधनम् ॥५५॥

अर्थ: दूसरे से प्रीति उत्पन्न करके उससे अपना प्रयोजन सिद्ध करना ‘चातुर्य’ नामक सद्गुण है ॥५५॥ शुक्र३ ने भी सामनीति द्वारा अपना प्रयोजन सिद्ध करने वाले को चतुर और दण्ड-भेद-आदि द्वारा अपना प्रयोजन सिद्ध करने वाले को ‘मूर्ख’ कहा है ॥१॥


तल्लोकोचितत्वं यत्सर्वजनादेयत्वम् ॥५६॥

अर्थ: विवेकी मनुष्य का वही लोकोपयोगी नैतिक सत्कर्त्तव्य है जिसके अनुष्ठान से वह लोक-प्रिय (सबका प्यारा) हो जाता है ॥५६॥


सज्जनता व धीरता का माहात्म्य, सौभाग्य, सभा-दोष, हृदय-हीन के अनुराग की निष्फलता, निन्द्य स्वामी, लेख का स्वरूप व उसका अप्रामाण्य, तत्काल अनिष्टकारी पाप, बलिष्ठ के साथ विग्रह से हानि, बलवान का आश्रय पाकर उससे उद्दण्डता करने से-हानि, प्रवास का स्वरूप व उसका सुख


तत्सौजन्यं यत्र नास्ति परोद्वेगः ॥५७॥

अर्थ: वही सज्जनता है, जिससे दूसरों के हृदय-सरोवर में भय व उद्वेग न होकर प्रसन्नता लहराये वादरायण१ ने भी जनसमुदाय को प्रसन्न रखने वाले कार्यों को सज्जनता और इससे विपरीत भयोत्पादक कार्यों को दुर्जनता कहा है ॥१॥


तद्धीरत्वं यत्र यौवनेनानपवादः ॥५८॥

अर्थ: जो शिष्ट पुरुष युवावस्था को प्राप्त करके अपने जीवन को परस्त्री व वेश्यासेवन आदि दोषों से दूषित नहीं होने देते अर्थात्-अपनी स्त्री में हो सन्तुष्ट रहते हैं उनका वह धीरता गुण है ॥५८॥


तत्सौभाग्यं यत्रादानेन वशीकरणं ॥५९॥

अर्थ: दान न देने पर भी जन-समुदाय को वशीभूत रखने वाला मनुष्य भाग्यशाली है ॥५९॥


सा सभाण्यानी यस्यां न संति विद्वांसः॥
६०॥

अर्थ: जिस सभा में विद्वान् पुरुष नहीं हैं; उसे जंगल समझना चाहिए, क्योंकि विद्व-मण्डली के बिना सभ्यों को धर्म-अधर्म कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का बोध नहीं होता ॥६०॥


किं तेनात्मनः प्रियेण यस्य न भवति स्वयं प्रियः ॥६१॥

अर्थ: वह मनुष्य शत्रु समान है, जो अपनी हृदय-हीनता वश दूसरे मनुष्य द्वारा प्रेम करने पर भी उसका प्रत्युत्तर प्रेम से न देकर रुष्टता से देता है ॥६१॥


स कि प्रभुर्यो न
सहते परिजन सम्बाधम् ॥६२॥

अर्थ: जो स्वामी अपने सेवकों द्वारा वेतन आदि मांगने पर उनको वेतन आदि देने में हिचकिचाता है या उनके खर्च का धक्का सहन नहीं कर पाता वह निन्दनीय है ॥६२॥


न लेखाद् वचनं प्रमाणे ॥६३॥

अर्थ: लेख व वचन में से लेख की ही विशेष प्रतिष्ठा व अत्यधिक प्रामाणिकता होती है और वचनों को चाहे वे बृहस्पति द्वारा ही क्यों न कहे गये हो, प्रतिष्ठा नहीं होती ॥६३॥


अनभिज्ञाते लेखेऽपि
नास्ति सम्प्रत्ययः ॥६४॥

अर्थ: अनिश्चित लेख प्रामाणिक नहीं गिने जाते। सारांश यह है कि मनुष्य को किसी की लिखी हुई बात पर सहसा-बिना सोचे समझे विश्वास नहीं करना चाहिए और प्रत्यक्ष व साक्षियों द्वारा उसका निर्णय करना चाहिए ॥६४॥ चाहिए ॥१॥


त्रीणि पातकानि सद्यः फलन्ति स्वामिद्रोहः स्त्रीवधा
बालवधश्चेति ॥६५॥

अर्थ: स्वामी, स्त्री और बच्चे का वध ये तीन महा पाप हैं, जिन का कुफल मनुष्य को इसी लोक में तत्काल भोगना पड़ता है ॥६५॥


अप्लवस्य समुद्रावगाहनमिवाबलस्य बलवता सह विग्रहाय
टिरिटिल्लितं ॥६६॥

अर्थ: जिस प्रकार बिना नौका केवल भुजाओं से समुद्र पार करने वाला मनुष्य शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होता है, उसी प्रकार कमजोर पुरुष बलिष्ठ पुरुष के साथ युद्ध करने से शीघ्र नष्ट हो जाता है, अतः निर्बल को बलिष्ठ के साथ युद्ध नहीं करना चाहिए ॥६६॥


बलवन्तमाश्रित्य विकृतिभजनं सद्यो मरणकारणं ॥६७॥

अर्थ: जो मनुष्य बलवान् का आश्रय-सहारा या उपकार-पाकर उससे उद्दण्डता का बर्ताव करता है, उसकी तत्काल मृत्यु होती है ॥६७॥


प्रवासः चक्रवर्तिनामपि सन्तापयति किं पुनरन्यं ॥६८॥

अर्थ: परदेश की यात्रा चक्रवर्ती को भी कष्ट देती है, पुनः साधारण व्यक्ति को उससे कष्ट होना स्वाभाविक है ॥६८॥


बहुपाथेयं मनोनुकूलः
परिजनः सुविहितश्चोपस्करः प्रवासे दुःखोत्तरण तरण्ड को वर्गः ॥६९॥

अर्थ: मनुष्य को परदेश की यात्रा में पर्याप्त भोजन सामग्री आज्ञाकारी सेवक व उत्तम धन व वस्त्रादि सामग्री दुःख रूप समुद्र से पार करने के लिए जहाज के समान है ॥६९॥

(२८) विवाद-समुद्देशः

गुणदोषयोस्तुलादण्डसमो राजा स्वगुणदोषाभ्यां जन्तुषु गौरवलाघवे ॥१॥

अर्थ: राजा का कर्त्तव्य है कि प्रजाजनों के गुणों व दोषों की जांच तराजू की दण्डी की तरह निष्पक्ष भाव से करने के उपरान्त ही उन्हें गुण व दोष के कारण क्रमशः गुरु (महान्) और लघु समझे और उनके साथ योग्य-अयोग्य व्यवहार करे अर्थात् शिष्टों का पालन व दुष्टों का निग्रह करे ॥१॥


राजा
त्वपराधालिंगितानां समवर्ती तत्फलमनुभावयति ॥२॥

अर्थ: समस्त प्रजाजनों को एक नजर से देखने वाला राजा अपराधियों को अपराधानुकूल दण्ड देने की सोचता है ॥२॥


आदित्यवद्यथावस्थितार्थ
प्रकाशन प्रतिभाः सभ्याः ॥३॥

अर्थ: राज सभा (विधान परिषत्) के सभाषद-एक्जीक्यूटिव कौन्सिल या पार्लिमेंट के अधिकारी गण (गवर्नर जनरल, प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री तथा सेना अर्थ स्वास्थ्य न्याय यातायात शिक्षा के सचिव आदि) सूर्य के समान पदार्थ को जैसे का तैसा प्रकाश करने वाली प्रतिभा से युक्त होने चाहिए। अर्थात् उन्हें समस्त राज्य शासन सम्बन्धी व्यवहार को यथार्थ सिद्ध करने में प्रवीण होना चाहिए॥ ३॥


अदृष्टाश्रुतव्यवहाराः परिपन्थिनः सामिषा न
सभ्याः ॥४॥

अर्थ: उत्तरदायित्वपूर्ण कर्तव्यों) का शास्त्र द्वारा अनुभव प्राप्त नहीं किया हो और न राजनीतिज्ञ शिष्ट पुरुषों के सत्संग से उन व्यवहारों को श्रवण किया हो एवं जो राजा से ईर्ष्या वा वाद-विवाद करते हों ऐसे पुरुष राजा के शत्रु हैं, वे कदापि विधान परिषद के मेंबर (सभासद) होने लायक नहीं हैं, अतएव विधान परिषद में सभासद के पद पर उन्हीं को नियुक्त करना चाहिए, जो राज्य-संचालन या अपने उत्तर दायित्व-पूर्ण कर्तव्य पालन की पूर्ण योग्यता रखते हों, अनुभवी व वाद-विवाद न करने वाले हों; अपनी कार्य प्रणाली को उचित व्यवस्था पूर्वक कार्य रूप में परिणत कर सकने की क्षमता रखते हों, तथा पक्के राजनीतिज्ञ एवं अपने उत्तरदायित्वपूर्ण राज्य-शासन-आदि कार्य भार को पूर्ण रूप से संभाल सकते हों॥ ४॥


लोभ पक्षपाताभ्यामयथार्थवादिनः सभ्याः सभापतेः सद्योमानार्थ-
हानिं लभेरन् ॥५॥

अर्थ: जिस राजा की सभा में लोभ व पक्षपात के कारण झूठ बोलने वाले सभासद होंगे, वे निःसन्देह उसके मान व धन की क्षति करेंगे॥ ५॥


तत्रालं विवादेन यत्र स्वयमेव सभापतिः प्रत्यर्थीसभ्य-
सभापत्योःसांमंजस्येन कुतो जयः किं बहुभिश्च्छागलैः श्वा न क्रियते ॥६॥

अर्थ: जिस सभा में सभापति (न्यायाधीश) पक्षपाती वादी (मुद्देई) हो वहाँ वाद-विवाद करने से कोई लाभ नहीं, क्योंकि वाद-विवाद करने वाले सभासद व सभापति इनमें एकमत न होने से वादी की विजय कदापि नहीं हो सकती। क्योंकि अन्य लोग राजा का ही पक्ष लेंगे, अतः ऐसी जगह वादी की विजय असम्भव है। क्योंकि क्या बहुत से बकरे मिल कर कुत्ते को पराजित नहीं कर सकते ? अवश्य कर सकते हैं। अर्थात् जिस प्रकार बलिष्ठ कुत्ता भी अनेक बकरों द्वारा परास्त कर दिया जाता है उसी प्रकार प्रभावशाली वादी विरोधी राजा आदि द्वारा परास्त कर दिया जाता है ॥६॥


विवादमास्थाय यः सभायां नोपतिष्ठेत, समाहूतोऽपसरति, पूर्वोक्तेमुत्तरोक्तेन
बाधते, निरुत्तरः पूर्वोक्तेषु युक्तेषु युक्तमुक्तं न प्रतिपद्यते, स्वदोषमनुवृत्य
परदोषमुपालभते, यथार्थवादेऽपि द्वेष्टि सभामिति पराजितलिङ्गानि ॥७॥

अर्थ: जो वाद विवाद करके सभा में नहीं आवे; आग्रहपूर्वक बुलाये जाने पर भी जो सभा में उपस्थित नहीं होता, जो अपने द्वारा कहे हुए वचनों को झूठा बनाकर-बात बदलकर-नई बात कहता हो, पूर्व में कहे हुए अपने वचनों पर सभ्य मनुष्यों द्वारा प्रश्न किये जाने पर जो यथोचित उत्तर न दे सकता हो, जो कही हुई बात को सत्य प्रमाणित न कर सके, अपनी गल्तियों पर ध्यान न देकर जो उल्टा प्रतिवादी को ही दोषी बताता हो, एवं सज्जनों द्वारा कहे हुए उचित शब्दों पर ध्यान न देकर सभा से ही द्वेष करता हो उपरोक्त चिह्नों-लक्षणों से जान लेना चाहिए कि यह वादी. प्रतिवादी, या साक्षी (गवाही) वाद विवाद में हार गया है ॥७॥


छलेनाप्रतिभासेन वचनाकौशलेन चार्थहानिः ॥८॥

अर्थ: जो सभासद छलकपट, बलात्कार व वाक्चातुर्य द्वारा वादी की स्वार्थ-हानि करते हैं, वे अधम हैं ॥८॥


भुक्तिः साक्षी शासनं प्रमाणं ॥९॥

अर्थ: यथार्थ अनुभव, सच्चे गवाही और सच्चा लेख इन प्रमाणों से वाद विवाद में सत्यता का निर्णय होता है॥ ९॥


भुक्तिः सापवादा, साक्रोशाः साक्षिणः शासनं च कूटलिखितमिति न विवादं
समापयन्ति ॥१०॥

अर्थ: जहाँ पर सदोष अनुभव व झूठे गवाही और झूठे लेख वर्तमान होते हैं, वहाँ पर यथार्थ निर्णय न होने से वाद विवाद समाप्त न होकर उल्टा बढ़ता ही है॥ १०॥


बलोत्कृतमन्यायकृतं राज्ञोपधिकृतं च न प्रमाणं ॥११॥

अर्थ: पूर्वोक्त अनुभव व साक्षी आदि जब सभासदों द्वारा बलात्कार व अन्याय पूर्वक एवं राजकीय शक्ति की सामर्थ्य से उपयोग में लाये जाते हैं, तब वे प्रमाण नहीं माने जाते ॥११॥


वेश्याकितवयोरुक्तं ग्रहणानुसारितया प्रमाणयितव्यं ॥१२॥

अर्थ: यद्यपि वेश्या और जुआरी झूठे हुआ करते हैं, परन्तु न्यायालय में उनके द्वारा कही हुई बात भी उक्त अनुभव व साक्षी आदि द्वारा निर्णय की जाने पर प्रमाण मानी जाती है ॥१२॥ रैभ्य१ ने भी उक्त बात का समर्थन किया है ॥१॥


असत्यङ्कारे व्यवहारे नास्ति विवादः ॥१३॥

अर्थ: जहाँ पर मिथ्या व्यवहार-झूठा विवाद-खड़ा हो जाता है वहाँ यथार्थ निर्णय करने के लिए शिष्ट पुरुष को विवाद नहीं करना चाहिए, क्योंकि जिस मुकदमे में वादी व प्रतिवादी (मुद्दई और मुद्दालय) दोनों झूठे होते हैं अथवा मुद्दई के स्टाम्प-वगैरह झूठे होते हैं वहाँ विवाद (मुकदमा) खड़ा ही नहीं हो सकता, तब निराधार निर्णय की आशा करना व्यर्थ है ॥१३॥
ऋषिपुत्रक२ ने भी झूठे व्यवहार वाले विवाद को निरर्थक कहा है ॥१॥


नीवीविनाशेषु विवादः पुरुषप्रामाण्यात्
सत्यापयितव्यो दिव्यक्रियया वा ॥१४॥

अर्थ: किसी पुरुष ने किसी मनुष्य को अपना सुवर्ण-आदि धन संरक्षण करने के लिए धरोहर रूप से सौंपा हो और उस धन के नष्ट हो जाने पर (वापिस मांगने पर यदि वह मनाई कर बैठे) उस समय न्यायाधीश का कर्त्तव्य है कि उसका इन्साफ धरोहर रखने वाले पुरुष की प्रामाणिकता-(सचाई) द्वारा करे, और यदि ऐसा न हो धरोहर रखने वाला (विश्वासपात्र व सच्चा न हो) तो उससे शपथ करावे वा उसे दण्ड का भय दिखा कर इस प्रकार सत्य का निर्णय करे कि मुद्दई का धन मुद्दालय के यहाँ से जो नष्ट हुआ है, वह चोरों द्वारा अपहरण किया गया है ? अथवा मुद्दायल स्वयं मुद्दई के धन को हड़प कर गया है ? नारद३ ने भी धरोहर के धन सम्बन्धी विवाद का इन्साफ करने के लिए उक्त दोनों उपाय बताये हैं ॥१॥


यादृशे तादृशे वा साक्षिणि नास्ति दैवी
क्रिया किं पुनरुभयसम्मते मनुष्ये नीचेऽपि ॥१५॥

अर्थ: हुए श्रेष्ठ पुरुष के साक्षी होने पर सत्य की जाँच के लिए शपथ का प्रयोग करना तो बिल्कुल निरर्थक है ही ॥१५॥ भार्गव१ ने भी गवाही द्वारा विवाद सम्बन्धी सत्यता का निर्णय हो जाने पर शपथ-क्रिया को निरर्थक बताया है ॥१॥


यः परद्रव्यमभियुञ्जीताभिलम्पते वा तस्य शपथः कशा दिव्यं वा ॥१६॥

अर्थ: दूसरे का धन अपहरण या नष्ट करने वाले अपराधी का निर्णय करने के लिए साक्षी के अभाव में न्यायाधीश को दिव्य क्रिया (शपथ कराना आदि) उपाय काम में लाना चाहिए ॥१६॥ गर्ग२ ने भी ऐसे अपराधी की जाँच के लिए शपथ कराने का संकेत किया है ॥१॥


अभिवारयोगैर्विशुद्धस्याभियुक्तार्थसम्भावनायां प्राणाव शेषोऽर्थापहारः ॥१७॥

अर्थ: जो अपराधी शपथ-आदि कूटनीति से अपने लिए निर्दोष साबित कर चुका हो, पश्चात् चोरी के कारण उसके अपराधी साबित हो जाने पर न्यायाधीश द्वारा उसे प्राण दान देकर उसका सर्वस्व (तमाम धन) हरण कर लेना चाहिए ॥१७॥ शुक्र३ विद्वान् ने भी ऐसे अपराधी के विषय में इसी प्रकार दंडित करने का संकेत किया है ॥१॥


लिंगिनास्तिकस्वाचरच्युतपतितानां दैवी क्रिया नास्ति ॥१८॥

अर्थ: संन्यासी के भेष में रहने वाले, नास्तिक, चरित्र-भ्रष्ट व जाति से च्युत मनुष्यों के अपराध यदि गवाही आदि उपाय द्वारा साबित न हो सकें, तथापि धर्माध्यक्ष (न्यायाधीश) को शपथ खिलाकर उनके अपराध साबित नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये लोग अक्सर झूठी शपथ खाकर अपने को निर्दोषी प्रमाणित करने का प्रयत्न करते हैं, इसलिए न्यायाधीश को युक्तियों द्वारा उनकी प्रयोजन-सिद्धि करनी चाहिए अर्थात् अनेक युक्ति-पूर्ण उपायों द्वारा उन्हें अपराधी साबित कर दंडित करना चाहिए अथवा निर्दोषी साबित होने पर उन्हें छोड़ देना चाहिए ॥१८-१९॥


तेषां युक्तितोऽर्थसिद्धिरसिद्धिर्वा ॥१९॥


संदिग्धे पत्रे साक्षे वा विचार्य परिच्छिन्द्यात्॥ २०॥

अर्थ: यदि वादी (मुद्दई) के स्टाम्प वगैरह लेख वा साक्षी संदिग्ध-संदेह युक्त हों, तो न्यायाधीश अच्छी तरह सोच-समझकर निर्णय (फैसला) देवे॥ २०॥


परस्परविवादे न युगैरपि विवादपरिसमाप्तिरानन्त्याद्विपरीतप्रत्युक्तीनां॥ २१॥

अर्थ: मुद्दई मुद्दायलों के मुकदमे का फैसला बिना धर्माध्यक्ष के स्वयं उनके द्वारा बारह वर्ष में भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि परस्पर अपने-अपने पक्ष को समर्थन आदि करने वाली युक्तियाँ अनन्त होती हैं इसलिए दोनों को न्यायालय में जाकर न्यायाधीश द्वारा अपना फैसला कराना चाहिए, वहाँ पर सत्यासत्य का निर्णय किया जा सकता है॥ २१॥


ग्रामे पुरे वा वृत्तो व्यवहारस्तस्य विवादे तथा राजानमुपेयात्॥ २२॥

अर्थ: ग्राम व शहर संबंधी मुकदमों का फै सला कराने के लिए वहाँ के मुद्दई-मुद्दायलों को राजा के पास जाना चाहिए॥ २२॥


राज्ञा दृष्टे व्यवहरे नास्त्यनुबन्धः॥ २३॥

राजाज्ञां मर्यादां वाऽतिक्रामन् सद्यः फलेन दण्डेनोपहन्तव्यः४॥ २४॥

अर्थ (सूत्र 23 से 24): राजा द्वारा किया हुआ फै सला निर्दोष होता है, इसलिए जो मुद्दई-मुद्दायल राजकीय आज्ञा या मर्यादा का उल्लंघन करे (उस निर्णय को न माने) उसे मृत्यु दण्ड दिया जावे॥ २३-२४॥


न हि दुर्वृत्तानां दण्डादन्योऽस्ति विनयोपायोऽग्निसंयोग एव वक्रं काष्ठं
सरलयति ॥२५॥

अर्थ: अन्यायी दुष्टों को वश करने के लिए दण्डनीति को छोड़कर और दूसरा कोई उपाय नहीं, क्योंकि जिस प्रकार टेड़ी व तिरछी लकड़ी आग लगाने से ही सीधी होती है, उसी प्रकार पापी लोग भी दण्ड से ही सीधे (न्याय मार्ग में चलने वाले) होते हैं ॥२५॥


ऋजुं सर्वेऽपि परिभवन्ति न हि तथा वक्रतरुश्छिद्यते यथा सरलः॥ २६॥

अर्थ: जिस प्रकार जंगल में वर्तमान टेढ़ा वृक्ष न काटा जाकर सीधा ही काटा जाता है, उसी प्रकार सरल स्वभाव वाला मनुष्य ही सर्व मनुष्यों द्वारा परास्त किया जाता है ॥२६॥


स्वोपलम्भपरिहारेण परमुपालभेत स्वामिनमुत्कर्षयन् गोष्ठीमवतारयेत् ॥२७॥
हि भर्तुरभियोगात्। परं सत्यमसत्यं वा वदन्तमवगृह्णीयात् ॥२८॥

अर्थ: धर्माध्यक्ष (न्यायाधीश) को राज-सभा में राजा को प्रसन्न करते हुए मुद्दई-मुद्दलयों का विवाद (मुकदमा) इस तरीके से विस्तार पूर्वक करना चाहिए, जिससे उसके ऊपर उलाहना न आवे और उक्त दोनों में से कोई एक कानूनन दोषी ठहराया जावे ॥२७॥


अर्थसम्बन्धः
सहवासश्च नोकलहः सम्भवति ॥२९॥

अर्थ: आपस में रुपये पैसे का लेन देन व एक मकान में निवास करना ये दोनों कार्य कलह उत्पन्न करते हैं ॥२९॥


निधिरकस्मिकी वार्थालाभः प्राणैः सह
संचितमप्यर्थमपहारयति ॥३०॥

अर्थ: अकस्मात् मिला हुआ खजाना व अन्याय से प्राप्त हुआ धन ये दोनों वस्तुएँ प्राणों के साथ साथ पूर्व संचित धन को भी नष्ट कर डालती हैं ॥३०॥


ब्राह्मणानां हिरण्ययज्ञोपवीतस्पर्शनं च शपथः ॥३१॥

शस्त्ररत्नभूमिवाहनपल्याणानां तु क्षत्रियाणाम् ॥३२॥

श्रवणपोतस्पर्शनात्
काकिणीहिरण्ययोर्वा वैश्यानाम् ॥३३॥

शूद्राणां क्षीरबीजयोर्वल्मीकस्य वा ॥३४॥

कारूणां यो येन कर्मणा जीवति तस्य तत्कर्मोपकरणानां ॥३५॥

अर्थ (सूत्र 31 से 35): वाद विवाद के निर्णयार्थ ब्राह्मणों को सुवर्ण व जनेऊ के छूने की, क्षत्रियों को शस्त्र, रत्न, पृथ्वी, हाथी, घोड़े आदि वाहन और पलाण की, वैश्यों को कर्ण, बच्चा, कौड़ी, रुपया पैसा व सुवर्ण के स्पर्श करने की, शूद्रों को दूध, बीज व सांप की बामी छूने की तथा धोबी-चमार आदि कारू शूद्रों को उनके जीविकोपयोगी उपकरणों की शपथ (कसम) करानी चाहिए ॥३१-३५॥


व्रतिनामन्येषां
चेष्टदेवतापादस्पर्शनात् प्रदक्षिणादिव्यकोशात्तन्दुलतुलारोहणैर्विशुद्धिः ॥३६॥

व्याधानां तु धनुर्लङ्घनं ॥३७॥

अन्त्यवर्णावसायिनामार्द्रचर्मावरोहणम् ॥३८॥

अर्थ (सूत्र 36 से 38): इसी प्रकार व्रती व अन्य पुरुषों की शुद्धि उनके इष्ट देवता के चरणस्पर्श से व प्रदक्षिणा कराने से तथा धन, चावल व तराजू को लांघने से होती है एवं व्याधों से धनुष लांघने की और चांडाल कंजर और चमार आदि से गीले चमड़े पर चढ़ने की शपथ खिलानी चाहिए ॥३६-३८॥


वेश्यामहिला, भृत्यो भण्डः, क्रीणिनियोगो, नियोगिमित्रं,
चत्वार्य्यशाश्वतानि ॥३९॥

अर्थ: वेश्यारूप स्त्री, उद्दण्ड या क्रोधी नौकर, अधिक टैक्स लेना व अधिकारी मित्र इनकी मैत्री या संसर्ग चिरस्थायी नहीं है॥ ३९॥


क्रीतेष्वाहारेष्विव पण्यस्त्रीषु क आस्वादः ॥४०॥

अर्थ: जिस प्रकार बाजार से खरीदा हुआ भोजन सुखकारक नहीं होता, उसी प्रकार बाजारू वेश्याओं से भी सुख प्राप्त नहीं हो सकता, अतः विवेकी पुरुषों को सदा के लिए वेश्याओं का त्याग करना चाहिए ॥४०॥


यस्य यावानेव परिग्रहस्तस्य तावानेव सन्तापः ॥४१॥

अर्थ: संसार में जिस पुरुष के पास जितना परिग्रह (गाय-भैंस, रुपया, पैसा आदि) होता है उसे उतना ही संताप (दुःख) होता है; अर्थात् जिसके पास अधिक परिग्रह है उसे अधिक और जिसके पास थोड़ा परिग्रह हैं, उसे थोड़ा संताप होता है ॥४१॥


गजे गर्दभे च राजरजकयोः सम
एव चिन्ताभारः ॥ ४२ ॥

अर्थ: राजा को जैसी चिंता हाथी के पालन-पोषण की रहती है, वैसी धोबी को गधे के पालन पोषण की नारद४ के उद्धरण से भी यही बात प्रतीत होती है ॥१॥


मूर्खस्याग्रहो नापायमनवाप्य निवर्तते ॥४३॥

अर्थ: मूर्ख मनुष्य का हठ उसका नाश किये बिना शान्त नहीं होता। अर्थात् वह हानि होने के पश्चात् ही अपनी जिद्द छोड़ता है ॥४३॥


कर्पासाग्नेरिव मूर्खस्य शान्तावुपेक्षणमौषधं ॥४४॥

अर्थ: जिस प्रकार कपास में तीव्र आग लग जाने पर उसे बुझाने का प्रयत्न करना निष्फल है उसी प्रकार मूर्ख के हठ पकड़ लेने पर उसकी हठ छुड़ाने का प्रयत्न भी निष्फल है, क्योंकि वह अपनी हठ नहीं छोड़ता अतः ऐसे अवसर पर उससे उपेक्षा करना ही औषधि है (उससे भाषण न करना ही उत्तम है) ॥४४॥


मूर्खस्याभ्युपपत्तिकरणमुद्दीपनपिण्डः ॥ ४५ ॥

अर्थ: मूर्ख को हित का उपदेश उसके अनर्थ बढ़ाने में सहायक होता है, अतः शिष्ट पुरुष मूर्ख के लिए उपदेश न देवें॥ ४५॥ गौतम२ ने भी कहा है कि जैसे-जैसे विद्वान् पुरुष मूर्ख को सन्मार्ग पर लाने का प्रयत्न करता है, वैसे-वैसे उसकी जड़ता बढ़ती जाती है ॥१॥


कोपाग्निप्रज्ज्वलितेषु मूर्खेषु
तत्क्षणप्रशमनं घृताहुतिनिक्षेप इव॥ ४६॥

अर्थ: क्रोधरूपी अग्नि से प्रज्ज्वलित होने वाले मूर्खों को तत्काल समझाना जलती हुई आग में घी की आहुति देने के समान है। अर्थात्-जिस प्रकार से प्रज्ज्वलित अग्नि घी की आहुति देने से शान्त न होकर उल्टी बढ़ती है, उसी प्रकार मूर्ख का क्रोध भी समझाने से शान्त न होकर उल्टा बढ़ता चला जाता है, अतः मूर्ख को क्रोध के अवसर पर समझाना निरर्थक है॥ ४६॥


अनस्तितोऽनड्वानिव ध्रियमाणो मूर्खः
परमाकर्षति॥ ४७॥

अर्थ: जिस प्रकार नथुने रहित बैल खींचने वाले पुरुष को अपनी ओर तेजी से खींचता जाता है, उसी प्रकार मर्यादाहीन व हठी मूर्ख मनुष्य भी उपदेश देने वाले शिष्ट पुरुष को अपनी ओर खींचता है-उससे अत्यन्त शत्रुता करने लगता है, अतः विवेकी पुरुष मूर्ख को हित का उपदेश न देवें॥ ४७॥ भागुरि३ के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥


स्वयमगुणं वस्तु न खलु पक्षपाताद्गुणवद्भवति न
गोपालस्नेहादुक्षा क्षरति क्षीरम्॥ ४८॥

अर्थ: जिस प्रकार ग्वाले द्वारा अधिक स्नेह किया हुआ बैल दूध नहीं दे सकता, उसी प्रकार स्वयं निर्गुण वस्तु पक्षपात-वश किसी के द्वारा प्रशंसा की जाने पर भी गुणयुक्त नहीं हो सकती॥ ४८॥ नारद४ ने भी निर्गुण वस्तु के गुण-युक्त न होने के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥

(२९) षाड्गुण्य-समुद्देशः

शमव्यायामौ योगक्षेमयोर्योनिः ॥१॥

अर्थ: शम (कर्मों के फलोपभोग में कुशलता उत्पन्न करने वाला गुण) व व्यायाम (नैतिक पुरुषार्थ) कार्य की प्राप्ति और उसमें सफलता प्राप्त कराते हैं। सारांश यह है कि शिष्ट पुरुष लौकिक एवं धार्मिक कार्यों में तभी सफलता प्राप्त कर सकता है, जब वह पुण्य कर्म के फलोपभोग (इष्ट वस्तु की प्राप्ति) में कुशल-गर्व-शून्य और पाप कर्म के फलोपभोग (अनिष्ट वस्तु की प्राप्ति) में धीरवीर हो ॥१॥


कर्मफलोपभागानां क्षेमसाधनः शमः कर्मणां योगाराधनो-व्यायामः ॥२॥

अर्थ: पुण्य पाप कर्मों के फल इष्ट-अनिष्ट वस्तु के उपभोग के समय कुशलता का उत्पादक गुण (संपत्ति में गर्व-शून्यता और विपत्तियों में धैर्य धारण करना) ‘शम’ एवं कार्यारंभ किये जाने वाला उद्योग ‘व्यायाम’ कहा जाता है ॥२॥


दैवं धर्माधर्मौ ॥३॥

अर्थ (सूत्र 1 से 3): प्राणियों द्वारा पूर्वजन्म में किये हुए पुण्य व पाप कर्म को ‘दैव’ (भाग्य) कहते हैं ॥३॥ व्यास¹ ने कहा है कि जिसने पूर्व जन्म में दान, अध्ययन व तप किया है, वह पूर्वकालीन अभ्यास वश इस जन्म में भी उसी प्रकार पुण्य कर्म में प्रवृत्ति करता है ॥३॥ समन्तभद्राचार्य ने भी कहा है कि जो लोग अनुकूल व प्रतिकूल भाग्य द्वारा ही इष्ट व अनिष्ट पदार्थ की सिद्धि मानते हैं, उनके यहाँ जब उद्योग नगण्य है, तब नीति-पूर्ण पुरुषार्थ द्वारा अनुकूल भाग्य और अनीति-युक्त पुरुषार्थ द्वारा प्रतिकूल भाग्य का सम्पादन नहीं हो सकेगा। इसी प्रकार भाग्य द्वारा परंपरा अक्षुण्ण चालू रहने से सांसारिक व्याधियों के कारण कर्मों का नैतिक पुरुषार्थ द्वारा ध्वंस न होने से मुक्ति श्री की प्राप्ति नहीं हो सकती। एवं लौकिक-कृषि-व्यापारादि व धार्मिक दान, शीलादि कार्यों की सिद्धि के लिए किया जाने वाला पुरुषार्थ (उद्योग) निरर्थक हो जायगा। इसी प्रकार जो लोग पुरुषार्थ से ही अर्थ-सिद्धि मानते हैं, उनके यहाँ दैव प्रामाण्य से पुरुषार्थ निष्फल नहीं होना चाहिए और समस्त प्राणियों का पुरुषार्थ सफल होना चाहिए। अतः अर्थ सिद्धि में भाग्य और पुरुषार्थ दोनों की उपयोगिता है, एक की नहीं। साथ में यह ध्यान देने योग्य है कि जिस समय मनुष्यों को इष्ट (सुखादि) व अनिष्ट (दुःखादि) पदार्थ बिना उद्योग किये अचानक प्राप्त होते हैं, वहाँ उनका अनुकूल व प्रतिकूल भाग्य ही कारण समझना चाहिए, वहाँ पुरुषार्थ गौण है। इसी प्रकार पुरुषार्थ के जरिये होने वाले सुख-दुःखादि में नीति-अनीतिपूर्ण पुरुषार्थ कारण है वहाँ दैव गौण है। अभिप्राय यह है कि इष्ट-अनिष्ट पदार्थ की सिद्धि में अनुकूल प्रतिकूल भाग्य व नीति-अनीतियुक्त पुरुषार्थ इन दोनों की उपयोगिता है, केवल एक की नहीं ॥१-३॥


मानुषं नयानयौ ॥४॥

अर्थ: नीतिपूर्ण (अहिंसा व सत्य-आदि) व अनीति-पूर्ण (विश्वासघात आदि) कार्यों में किये जानेवाले उद्योग को ‘पुरुषार्थ’ कहते हैं, परन्तु कर्त्तव्य दृष्टि से विवेकी पुरुषों को श्रेय प्राप्ति के लिए नीतिपूर्ण सत् कार्य करने में ही प्रयत्नशील होना चाहिए ॥४॥ गर्ग ने नीतिपूर्ण सत्कार्य करने का उल्लेख करते हुए अनीति-युक्त असत्कार्य करने का निषेध किया है ॥


दैवं मानुषञ्च कर्म लोकं यापयति ॥५॥

अर्थ: भाग्य पुरुषार्थ दोनों से ही प्राणियों की प्रयोजन सिद्धि होती है, एक से नहीं। सारांश यह है कि लोक में मनुष्यों को अनुकूल भाग्य व नीति-पूर्ण पुरुषार्थ से इष्ट-सिद्धि और प्रतिकूल भाग्य व अनीतियुक्त पुरुषार्थ से अनिष्टसिद्धि होती है, केवल भाग्य व पुरुषार्थ से नहीं ॥५॥


तच्चिन्त्यमचिन्त्यं वा दैवं ॥६॥


अचिन्तितोपस्थितोऽर्थसम्बन्धो दैवायत्तः ॥७॥

अर्थ: दूसरे कार्य की सिद्धि के विषय में सोचने वाले व्यक्ति को बिना विचारे अचानक ही अगर किसी इष्ट अनिष्ट पदार्थ की प्राप्ति हो जाती है, तो उसे भाग्याधीन समझना चाहिए ॥७॥


बुद्धिपूर्वहिताहितप्राप्तिपरिहारसम्बन्धो मानुषायतः ॥८॥

अर्थ: मनुष्य बुद्धिपूर्वक सुखदायक पदार्थों की प्राप्ति व कष्टदायक पदार्थों से निवृत्ति करता है, वह उसके नैतिक पुरुषार्थ पर निर्भर है॥ ८॥


सत्यपि दैवेऽनुकूले न निष्कर्मणो भद्रमस्ति ॥९॥

अर्थ: भाग्य अनुकूल होने पर भी यदि मनुष्य उद्योग-हीन (आलसी) है तो उसका कल्याण नहीं हो सकता, सारांश यह है कि विवेकी पुरुष भाग्य भरोसे न बैठ कर सदा लौकिक व धार्मिक कार्यों में पुरुषार्थ करता रहे, इससे उसका कल्याण हो सकता है, अन्यथा नहीं॥ ९॥


न खलु दैवमीहमानस्य कृतमप्यन्नं मुखे स्वयं प्रविशति ॥१०॥

अर्थ: जिस प्रकार भाग्य-वश प्राप्त हुआ अन्न भाग्य के भरोसे रहने वाले व्यक्ति के मुख में स्वयं प्रविष्ट नहीं होता, किन्तु हस्त-संचालन आदि पुरुषार्थ द्वारा ही प्रविष्ट होता है, उसी प्रकार केवल भाग्य के भरोसे रहने वाले मनुष्य को कार्य में सफलता नहीं मिलती, किन्तु पुरुषार्थ करने से ही मिलती है ॥१०॥


न हि दैवमवलम्बमानस्य धनुः स्वयमेव शरान् संधत्ते ॥११॥

अर्थ: जिस प्रकार धनुष अपनी डोरी पर बाणों को स्वयं पुरुष प्रयत्न के बिना स्थापन नहीं कर सकता, उसी प्रकार भाग्याधीन पुरुष भी उद्योग के बिना किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता ॥११॥


पौरुषमवलम्बमानस्यार्थानर्थयोः सन्देहः ॥१२॥

अर्थ: पुरुषार्थ का सहारा लेकर कार्यारम्भ करने वाले मनुष्य को इष्ट-सिद्धि (आर्थिक लाभ आदि) व अनर्थ (आर्थिक हानि आदि) होने में संदेह रहता है। सारांश यह हैं कि उद्यमी पुरुष व्यापारादि कार्य आरम्भ करता है, परन्तु इसमें मुझे आर्थिक लाभ (मुनाफा) होगा या नहीं ? अथवा इसमें मुझे हानि (घाटा) तो नहीं हो जायेगा ? इस प्रकार शङ्कित रहता हैं। कर्त्तव्य दृष्टि से अभिप्राय यह है कि पुरुषार्थी (उद्योगशील) पुरुष की अर्थ सिद्धि भाग्य की अनुकूलता पर ही निर्भर है, परन्तु भाग्य की अनुकूलता व प्रतिकूलता का निश्चय पुरुषार्थ किये बिना नहीं होता अतएव विवेकी पुरुष को नैतिक पुरुषार्थ द्वारा सदा कर्त्तव्यशील होना चाहिए ॥१२॥


निश्चित एवानर्थो दैवपरस्य ॥१३॥

अर्थ: जो मनुष्य भाग्य के भरोसे रहता है, उसका अकर्मण्यता के कारण अनर्थ होना निश्चित ही है ॥१३॥


आयुरौषयोरिव दैवपुरुषकारयोः परस्परसंयोगः समीहितमर्थ साधयति ॥१४॥

अर्थ: विवेकी मनुष्य को भाग्य के भरोसे ही बैठकर लौकिक (कृषि व्यापारादि) तथा धार्मिक (दाम शीलादि) कार्यों में नीति-पूर्ण पुरुषार्थ करना चाहिए॥ ६॥ जिस प्रकार आयु और योग्य औषधि का मिलाप जीवन-रक्षा करता है, उसी प्रकार भाग्य व पुरुषार्थ दोनों का संयोग भी मनोवांछित वस्तु उत्पन्न करता है। अर्थात् जिस प्रकार आयु रहने पर ही योग्य औषधि बीमार को स्वास्थ्य प्रदान करती है, आयु के बिना नहीं, उसी प्रकार भाग्य की अनुकूलता होने पर किया हुआ पुरुषार्थ मनुष्य को इष्ट-सिद्धि प्रदान करता है, भाग्य की प्रतिकूलता में नहीं ॥१४॥


धर्म का परिणाम व धार्मिक राजा की प्रशंसा


अनुष्ठीयमानः स्वफलमनुभावयन्न कश्चिद्धर्मोऽधर्ममनुबध्नाति ॥१५॥

अर्थ: जब मनुष्यों द्वारा धर्म (अहिंसा व सत्य आदि) पालन किया जाता है तब वह (धर्म) उन्हें अपना फल देता है उनके पाप ध्वंस करता है और अधर्म (पाप) उत्पन्न नहीं करता। अर्थात्-धर्मानुष्ठान करने वाले को अधर्म नहीं होता, क्योंकि धर्मरूपी सूर्य के उदय होने पर पापरूपी अंधेरा न तो रह सकता है और न उत्पन्न ही हो सकता है। अतः प्रत्येक प्राणी को सांसारिक व्याधियों के कारण पापों की निवृत्ति के लिए धर्मानुष्ठान करना चाहिए ॥१५॥


त्रिपुरुषमूर्तित्वान्न भूभुजः प्रत्यक्षं दैवमस्ति ॥१६॥

अर्थ: राजा ब्रह्मा, विष्णु और महेश की मूर्ति है, अतः इससे दूसरा कोई प्रत्यक्ष देवता नहीं है ॥१६॥


प्रतिपन्न-प्रथमाश्रमः परे ब्रह्मणि निष्णातमतिरुपासितगुरुकुलः सम्यग्विद्यायामधीती कौमारवयोऽलंकुर्वन् क्षत्रपुत्रो भवति ब्रह्मा ॥१७॥

अर्थ: जिसने प्रथमाश्रम (ब्रह्मचर्याश्रम को स्वीकार किया है, जिसकी बुद्धि परब्रह्म ईश्वर या ब्रह्मचर्यव्रत) में आसक्त है, गुरुकुल की उपासना करने वाला एवं समस्त राज-विद्याओं (आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता व दण्डनीति) का वेत्ता विद्वान् तथा युवराज पद से अलंकृत ऐसा क्षत्रिय का पुत्र राजा ब्रह्मा के समान माना गया है ॥१७॥


संजातराज्यकुललक्ष्मीदीक्षाभिषेकं स्वगुणैः प्रजास्वनुरागं जनयन्तं राजानं नारायणमाहुः ॥१८॥

अर्थ: राज्य लक्ष्मी की दीक्षा से अभिषिक्त, अपने शिष्टपालन व दुष्टनिग्रह आदि सद्गुणों के कारण प्रजा में अपने प्रति अनुराग उत्पन्न करने बाला राजा विष्णु के समान नीति कारों द्वारा कहा गया है ॥१८॥


प्रवृद्धः प्रतापतृतीयलोचनानलः परमैश्वर्यमातिष्ठमानो राष्ट्रकण्टकान् द्विषद्वान्धवान् छेत्तुं यतते विजिगीषुभूपतिर्भवति पिनाकपाणिः ॥१९॥

अर्थ: बढ़ी हुई है प्रताप रूपी तृतीय नेत्र की अग्नि जिसकी, परमैश्वर्य को प्राप्त होने वाला, राष्ट्र के कण्टक शत्रु रूप दानवों के संहार करने में प्रयत्न शाल ऐसा विजिगीषु राजा महेश के समान माना गया है ॥१९॥


उदासीन-मध्यम-विजिगीषु-अमित्रमित्रपाष्णिग्राहाक्रन्दासारान्तर्द्धयो
यथासम्भवगुणगणविभवतारतम्यान्मण्डलानामधिष्ठातारः ॥२०॥

अग्रतः पृष्ठतः कोणे वा सन्निकृष्टे वा मण्डले स्थितोमध्यमादीनां विगृहीतानां निग्रहे
संहितानामनुग्रहे समर्थोऽपि केनचित् कारणेनान्यस्मिन् भूपतौ विजिगीषुमाणे य
उदास्ते स उदासीनः ॥२१॥

उदासीनवदनियतमण्डलोऽपरभूपापेक्षया समधिकबलोऽपि कुतश्चित्
कारणादन्यस्मिन् नृपतौ विजिगीषुमाणेयो-मध्यस्थभावमवलम्बतेस
मध्यस्थः ॥२२॥

राजात्मदैवद्रव्यप्रकृतिसम्पन्नो नयविक्रमयोरधिष्ठानं
विजिगीषुः ॥२३॥

य एव स्वस्याहितानुष्ठानेन प्रतिकूल्यमियर्त्ति स एवारिः ॥२४॥

मित्रलक्षणमुक्तमेव पुरस्तात् ॥२५॥

यो विजिगीषौ प्रस्थितेऽपि प्रतिष्ठमाने वा
पश्चात् कोपं जनयति स पार्ष्णिग्राहः ॥२६॥

पार्ष्णिग्राहाद्यः पश्चिमः स
आक्रन्दः ॥२७॥

पार्ष्णिग्राहामित्रमासार आक्रन्द मित्रं च ॥२८॥

अरि विजिगीषोर्मण्डलान्त-र्विहितवृत्तिरुभयचेतनः पर्वताटवी
कृताश्रयश्चान्तर्द्धिः ॥२९॥

अर्थ (सूत्र 20 से 29): राजमण्डल के अधिष्ठाता उदासीन, मध्यम, विजिगीषु, अरि, मित्र, पार्ष्णिग्राह, आक्रन्द, आसार व अन्तर्द्धि हैं, जो कि यथायोग्य गुणसमूह और ऐश्वर्य के तारतम्य से युक्त होते हैं। सारांश यह है कि विजिगीषु इनको अपने अनुकूल रखने का प्रयत्न करे॥ २०॥ अपने देश में वर्तमान जो राजा किसी अन्य विजिगीषु राजा के आगे पीछे या पार्श्वभाग में स्थित हो और मध्यम आदि युद्ध करने वालों के निग्रह करने में और उन्हें युद्ध से उन्हें रोकने में सामर्थ्यवान होने पर भी किसी कारण से या किसी अपेक्षा वश दूसरे विजिगीष राजा के विषय में जो उपेक्षा करता है-उससे युद्ध नहीं करता-उसे ‘उदासीन’ कहते हैं॥ २१॥ जो उदासीन की तरह मर्यादातीत मंडल का रक्षक होने से अन्य राजा की अपेक्षा प्रबल सैन्य से शक्तिशाली होने पर भी किसी कारण वश (यदि मैं एक की सहायता करूंगा तो दूसरा मुझसे वैर बाँध लेगा-इत्यादि) विजय की कामना करने वाले अन्य राजा के विषय में मध्यस्थ बना रहता है उससे युद्ध नहीं करता-वह ‘मध्यस्थ’ कहा गया है॥२२॥ जो राज्याभिषेक से अभिषिक्त हो चुका हो, और भाग्यशाली, खजाना, अमात्य आदि प्रकृति-युक्त हो एवं राजनीति में निपुण व शूरवीर हो, उसे ‘विजिगीषु’ कहते हैं॥२३॥ जो अपने निकट सम्बन्धियों का अपराध करता हुआ कभी भी दुष्टता करने से बाज नहीं आता उसे ‘अरि’ (शत्रु) कहते हैं॥२४॥ पिछले मित्र समुद्देश में ‘जो मित्र’ का लक्षण निरूपण किया गया है उस लक्षण वाले को मित्र समझना चाहिए॥२५॥ विजिगीषु के शत्रु भूत राजा के साथ युद्ध के लिए प्रस्थान करने पर बाद में जो क्रुद्ध होकर उसके देश को नष्ट भ्रष्ट कर डालता है, उसे ‘पार्ष्णिग्राह, कहते हैं॥ २६॥ जो पार्षिणग्राह से बिल्कुल विपरीत चलता है-विजिगीषु को विजय यात्रा में जो हर तरह से सहायता पहुँचाता है, उसे ‘आक्रन्द’ कहते हैं? क्यों कि प्रायः समस्त सीमाधिपति मित्रता रखते हैं, अतः वे सब आक्रन्द हैं ॥२७॥ जो पार्ष्णिग्राह का विरोधी और आक्रन्द से मैत्री रखता है-वह ‘आसार’ है॥ २८॥ शत्रु राजा का व विजिगीषु राजा इन दोनों के देश में है जीविका जिसकी-दोनों तरफ से वेतन पाने वाला पर्वत व अटवी में रहने वाला ‘अन्तर्द्धि’ है ॥२९॥


अराजबीजी लुब्धः क्षुद्रो विरक्तप्रकृतिरन्यायपरो व्यसनी
विप्रतिपन्नमित्रामात्यसामन्तसेनापतिः शत्रुरभियोक्तव्यः॥ ३०॥

अर्थ: जो जार से उत्पन्न हो अथवा जिसके देश का पता मालूम न हो, लोभी, दुष्ट हृदय-युक्त जिससे प्रजा ऊब गई हो, अन्यायी, कुमार्गगामी, जुआ व मद्यपान आदि व्यसनों में फँसा हुआ, मित्र, अमात्य, सामन्त व सेनापति आदि राजकीय कर्मचारीगण जिससे विरुद्ध हों, इस प्रकार के शत्रुभूत राजा पर विजिगीषु को आक्रमण कर विजयश्री प्राप्त कर लेनी चाहिए ॥३०॥ शुक्र विद्वान् ने भी उक्त दोष वाले शत्रु राजा को विजिगीषु द्वारा हमला करने योग्य बताया है ॥१॥


अनाश्रयो दुर्बलाश्रयो वा शत्रुरुच्छेदनीयः॥ ३१॥

अर्थ: विजिगीषु को आश्रयहीन (सहायकों से रहित) व दुर्बल आश्रय वाले शत्रु से युद्ध करके उसे नष्ट कर देना चाहिए ॥३१॥


विपर्ययो निष्पीडनीयः कर्षयेद्वा ॥३२॥

अर्थ: शुक्र ने भी उक्त प्रकार से शत्रु को नष्ट करने के विषय में लिखा है। यदि कारणवश शत्रु से संधि (मित्रता) हो जावे, तो भी विजिगीषु भविष्य के लिए अपना मार्ग निष्कण्टक बनाने के लिए उसका समस्त धन छीन ले या उसे इस तरह दलित व शक्तिहीन कर डाले, जिससे वह पुनः अपना सिर न उठा सके ॥३२॥


सभामिजनः सहजशत्रुः ॥३३॥

अर्थ: अपने ही कुल का (कुटुम्बी) पुरुष राजा का स्वाभाविक शत्रु है क्यों कि वह ईर्ष्यावश उसका उत्थान कभी न देख कर हमेशा पतन के विषय में उसी प्रकार सोचा करता है, जिस प्रकार बिलाव चूहे की कभी भी भलाई न सोचकर उसे अपना आहार बना डालता है ॥३३॥


विरोधो विरोधयिता वा कृत्रिमः शत्रुः॥ ३४॥

अर्थ: जिसके साथ पूर्व में विजिगीषु द्वारा वैर विरोध उत्पन्न किया गया है तथा जो स्वयं आकर विजिगीषु से वैर विरोध करता है-ये दोनों उसके कृत्रिम शत्रु हैं। यदि ये बलहीन हैं, तो इनके साथ विजिगीषु को युद्ध करना चाहिए और यदि प्रबल सैन्य-शक्ति-सम्पन्न हैं तो उन्हें सामनीति द्वारा सन्तुष्ट करना चाहिए ॥३४॥


अनन्तरेः शत्रुरेकान्तरं मित्रमिति नैषः एकान्तः कार्यं हि मित्रत्वामित्रत्वयोः कारणं न पुनर्विप्रकर्षासन्निकर्षौ॥ ३५॥

अर्थ: दूरवर्ती (सीमाधिपति-आदि) शत्रु व निकटवर्ती मित्र होता है यह शत्रु, मित्र का सर्वथा लक्षण नहीं माना जा सकता, क्योंकि शत्रुता व मित्रता के अन्य ही कारण हुआ करते हैं, दूरवर्तीपन व निकटवर्तीपन नहीं। क्योंकि दूरवर्ती सीमाधिपति भी कार्यवश निकटवर्ती के समान शत्रु व मित्र हो सकते हैं ॥३५॥


ज्ञानबलं मंत्रशक्तिः ॥३६॥

बुद्धिशक्तिरात्मशक्तेरपि गरीयसी॥ ३७॥

शशकेनेव सिंहव्यापादनमत्र दृष्टान्तः॥ ३८॥

अर्थ (सूत्र 36 से 38): ज्ञानबल को मंत्र-शक्ति कहते हैं। शारीरिक बल से बुद्धिबल महान् व श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इसके समर्थन में यह दृष्टान्त है कि बुद्धि बल में प्रवीण अल्प शारीरिक शक्तियुक्त किसी खरगोश ने प्रचंड शारीरिक शक्तिशाली शेर को भी बुद्धिबल से मार डाला। सारांश यह है कि विजिगीषु मंत्रशक्ति, प्रभुत्वशक्ति व उत्साहशक्ति से सम्पन्न होकर शत्रु से विजयश्री प्राप्त कर सकता है अन्यथा नहीं। उसमें शारीरिक बल की अपेक्षा बुद्धिबल की प्रधानता है ॥३६-३८॥


कोषदण्डबलं प्रभुशक्तिः॥ ३९॥

अर्थ: जिस विजिगीषु के पास विशाल खजाना व हाथी, घोड़े, रथ व पैदल रूप चतुरंग सेना है, वह उसकी प्रभुत्वशक्ति है, जो कि उसे युद्ध भूमि में शत्रु को परास्त कर विजयश्री प्राप्त कराने में सहायक होती है ॥३९॥


शूद्रकशक्तिकुमारौ दृष्टान्तौ ॥४०॥

अर्थ: शूद्रक व शक्तिकुमार के दृष्टान्त इस कथन को समर्थन करने वाले उज्ज्वल प्रमाण हैं। अर्थात् शूद्रक नाम के विजिगीषु राजा ने अपनी खजाने की शक्ति से सुसज्जित व संगठित सैन्य द्वारा शक्तिकुमार नाम के शत्रु राजा को युद्ध में परास्त किया था यह उसकी प्रभुत्वशक्ति का ही माहात्म्य था ॥४०॥


विक्रमो बलं चोत्साहशक्तिस्तत्र रामो दृष्टान्तः॥ ४१॥

अर्थ: विजिगीषु की पराक्रम व सैन्यशक्ति को ‘उत्साह शक्ति’ कहते हैं, उसके ज्वलन्त उदाहरण मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र हैं, जिन्होंने अपने पराक्रम व वानरवंशीय हनुमान-आदि सैनिकों की सहायता से रावण को युद्ध में परास्त किया था ॥४१॥


शक्तित्रयोपचितो ज्यायान्
शक्तित्रयापचितो हीनः समानशक्तित्रयः समः॥ ४२॥

अर्थ: जो विजिगीषु शत्रु की अपेक्षा उक्त तीनों प्रकार की (प्रभुशक्ति, मंत्रशक्ति व उत्साहशक्ति) शक्तियों से अधिक (शक्तिशाली) होता है वह श्रेष्ठ है, क्योंकि उसकी युद्ध में विजय होती है, और जो उक्त शक्तित्रय से शून्य है, वह जघन्य है, क्योंकि वह शत्रु से हार जाता है एवं जो उक्त तीनों शक्तियों में शत्रु के समान है, वह सम है, उसे भी शत्रु से युद्ध नहीं करना चाहिए ॥४२॥


षाड्गुण्य (सन्धि विग्रह-आदि) का निरूपण


सन्धिविग्रहयानासनसंश्रयद्वैधीभावाः षाड्गुण्यं ॥४३॥

अर्थ: सन्धि (मैत्री करना) विग्रह-युद्ध करना, यान-शत्रु पर चढ़ाई करना, आसन-शत्रु की उपेक्षा करना व संश्रय-आत्म समर्पण करना ये राजाओं के षट् गुण हैं॥ ४३॥


पणबन्धः सन्धिः ॥४४॥

अर्थ: जब विजिगीषु अपनी दुर्बलता वश बलिष्ठ शत्रु राजा के लिए धनादि देकर उससे मित्रता करता है, इसे ‘सन्धि’ कहते हैं ॥४४॥


अपराधो विग्रहः ॥४५॥

अर्थ: विजिगीषु किसी के द्वारा किये हुए अपराध-वश युद्ध करता है वह विग्रह है ॥४५॥


अभ्युदयो यानं ॥४६॥

अर्थ: विजिगीषु द्वारा शत्रु, पर आक्रमण किया जाना उसे ‘यान’ कहते हैं अथवा शत्रु को अपने से ज्यादा बलिष्ठ समझ कर किसी दूसरे स्थान पर चले जाना भी ‘यान’ है ॥४६॥


उपेक्षणमासनं ॥४७॥

अर्थ: सबल शत्रु को आक्रमण करते तत्पर देखकर उसकी उपेक्षा करना (उस स्थान को छोड़कर अन्यत्र चले जाना) आसन कहलाता है ॥४७॥ बलिष्ठ शत्रु द्वारा देश पर आक्रमण होने पर जो उसके प्रति आत्मसमर्पण किया जाता है,उसे ‘संश्रय’ कहते हैं ॥४८॥ बलवान और निर्बल दोनों शत्रुओं द्वारा आक्रमण किये जाने पर विजिगीषु को बलिष्ठ के साथ सन्धि और निर्बल के साथ युद्ध करना चाहिए अथवा बलिष्ठ के साथ सन्धिपूर्वक जो युद्ध किया जाता है उसे द्वैधीभाव कहते हैं ॥४९॥ जब विजिगीषु अपने से बलिष्ठ शत्रु के साथ पहले मित्रता स्थापित कर लेता हैं और फिर कुछ समय बाद शत्रु के हीन शक्ति हो जाने पर उसी से युद्ध छेड़ देता है उसे बुद्धि-आश्रित ‘द्वैधीभाव’ कहते हैं, क्योंकि इससे विजिगीषु की विजय निश्चित रहती है ॥५०॥


परस्यात्मार्पणं संश्रयः ॥४८॥


एकेन सह सन्धायान्येन सह विग्रहकरणमेकत्र वा
शत्रौ सन्धानपूर्वं विग्रहो द्वैधीभावः ॥४९॥


प्रथमपक्षे सन्धीयमानो विगृह्यमाणो
विजिगीषुरिति द्वैधीभावो बुद्ध्याश्रयः ॥५०॥


सन्धि, विग्रह-आदि के विषय में विजिगीषु का कर्तव्य


हीयमानः पणबन्धेन सन्धिमुपेयात् यदि नास्ति परेषां विपणितेऽर्थे
मर्यादोल्लङ्घनम् ॥५१॥

अर्थ: जब विजिगीषु शत्रु की अपेक्षा हीन शक्ति वाला हो, तो उसे शत्रु राजा के लिए आर्थिक दण्ड (धनादि) देकर उस हालत में सन्धि कर लेनी चाहिए जबकि उसके द्वारा प्रतिज्ञा की हुई व्यवस्था में मर्यादा का उल्लंघन न हो। अर्थात् शपथ-आदि खिलाकर भविष्य में विश्वासघात न करने का निश्चय करने के उपरान्त ही सन्धि करनी चाहिए, अन्यथा नहीं ॥५१॥


अभ्युच्चीयमानः परं विगृह्णीयाद्यदि नास्त्यात्मबलेषु
क्षोभः ॥५२॥

अर्थ: यदि विजिगीषु शत्रु राजा से सैन्य व कोप आदि में अधिक शक्तिशाली है और यदि उसकी सेना में क्षोभ नहीं है, तब उसे शत्रु से युद्ध छेड़ देना चाहिए ॥५२॥


न मां परो हन्तुं नाहं परं हन्तुं शक्त इत्यासीत यद्यायत्यामस्ति
कुशलम् ॥५३॥

अर्थ: यदि विजिगीषु शत्रु द्वारा भविष्यकालीन अपनी कुशलता का निश्चय कर ले कि शत्रु मुझे नष्ट नहीं करेगा और न मैं शत्रु को, तब उसके साथ विग्रह न कर मित्रता ही करनी चाहिए ॥५३॥


गुणातिशययुक्तो यायाद्यदि न सन्ति राष्ट्रकण्टका मध्ये न
भवति पश्चात्क्रोधः ॥५४॥

अर्थ: विजिगीषु, यदि सर्वगुणसम्पन्न (प्रचुर सैन्य व कोष शक्तियुक्त) है एवं उसका राज्य निष्कंटक है तथा प्रजा-आदि का उस पर कोप नहीं है तो उसे शत्रु के साथ युद्ध करना चाहिए। अर्थात् उसे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि युद्ध करने से उसके राज्य को किसी तरह की हानि तो नहीं होगी ॥५४॥


स्वमण्डलमपरिपालयतः परदेशाभियोगो विवसनस्य
शिरोवेष्टनमिव ॥५५॥

अर्थ: जो राजा स्वदेश की रक्षा न कर शत्रु के देश पर आक्रमण करता हैं, उसका यह कार्य नंगे को पगड़ी बाँधने के समान निरर्थक हैं अर्थात् जिस प्रकार नंगे की पगड़ी बांध लेने पर भी उसके नंगे पन की निवृत्ति नहीं हो सकती, उसी प्रकार अपने राज्य की रक्षा न कर शत्रु के देश पर हमला करने वाले राजा का भी संकटों में छुटकारा नहीं हो सकता ॥५५॥


रज्जुबलनमिव शक्तिहीनः संश्रयं कुर्याद्यदि न भवति
परेषामामिषम् ॥५६॥

अर्थ: सैन्य व कोष आदि की शक्ति से क्षीण हुए विजिगीषु को यदि शत्रुभूत राजा व्यसनी नहीं है, तो उसके प्रति आत्मसमर्पण कर देना चाहिए ऐसा करने से निर्बल विजिगीषु उसी प्रकार शक्तिशाली हो जाता हैं जिस प्रकार अनेक तन्तुओं के आश्रय से रस्सी में मजबूती आ जाती हैं ॥५६॥


शक्तिहीन व अस्थिर के आश्रय से हानि, स्वाभिमानी का कर्तव्य, प्रयोजन-वश विजिगीषु का कर्त्तव्य राजकीय कार्य व द्वैधीभाव


बलवद्भयादबलवदाश्रयणं हस्तिभयादेरण्डाश्रयणमिव॥ ५७॥

अर्थ: शक्तिहीन विजिगीषु शक्तिशाली ही आश्रय लेवे, शक्तिहीन (निर्बल) का नहीं, क्योंकि जो विजिगीषु बलिष्ठ शत्रु के आक्रमण के भय से बलहीन का आश्रय लेता हैं, उसकी उसी प्रकार हानि होती हैं, जिस प्रकार हाथी द्वारा होने वाले उपद्रव के डर से एरण्ड पर चढ़ने वाले मनुष्य की तत्काल हानि होती हैं अर्थात् जिस प्रकार हाथी के आक्रमण के भय से बचाव करने वाला निस्सार एरण्ड के वृक्ष पर चढ़ने से एरण्ड के साथ-साथ पृथ्वी पर गिर जाता है और पश्चात् हाथी द्वारा नष्ट कर दिया जाता है, उसी प्रकार बलवान् शत्रु के आक्रमण के डर से बचने वाला विजिगीषु शक्तिहीन का आश्रय लेने से उसके साथ-साथ नष्ट कर दिया जाता है-बलिष्ठ शत्रु द्वारा मार दिया जाता हैं। सारांश यह है कि एरण्ड समान निस्सार (शक्तिहीन) के आश्रय से भविष्य में होने वाला अनर्थ तत्काल हो जाता है ॥५७॥


स्वयमस्थिरेणास्थिराश्रयणं नद्यां वहमानन वहमानस्याश्रयणमिव॥ ५८॥

अर्थ: शत्रु द्वारा सताया गया विजिगीषु जब अपने समान शत्रु द्वारा सताये हुए अन्य राजा का आश्रय लेता है, तो वह उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जिस प्रकार नदी में बहने या डूबने वाला दूसरे बहने या डूबने वाले व्यक्ति का आश्रय लेने से नष्ट हो जाता है। अतः प्रस्थिर (शत्रु-परित्रस्त-क्षीणशक्ति) को स्थिर का ही आश्रय लेना चाहिए, अस्थिर का नहीं॥ ५८॥


वरं मानिनो मरणं न परेच्छानुवर्तनादात्म विक्रयः ॥५९॥

अर्थ: स्वाभिमानी को मर जाना अच्छा, परन्तु पराई इच्छापूर्वक अपने को बेचना अच्छा नहीं, अतः स्वाभिमानी को शत्रु के लिए आत्मसमर्पण करना उचित नहीं ॥५९॥


आयतिकल्याणे सति
कस्मिंश्चित्सम्बन्धे परसंश्रयः श्रेयान्॥ ६०॥

अर्थ: यदि विजिगीषु का भविष्य में कल्याण निश्चित हो तो उसे किसी विषय में शत्रु की अधीनता स्वीकार करना श्रेष्ठ है॥ ६०॥


निधानादिव न राजकार्येषु
कालनियमोऽस्ति ॥६१॥

अर्थ: जिस प्रकार खजाना मिलने पर उसी समय उसे ग्रहण किया जाता है, उसमें समय का उल्लंघन नहीं किया जाता उसी प्रकार राजसेवकों को भी राजकीय कार्यों के सम्पादन करने में समय नहीं चुकाना चाहिए, किन्तु तत्काल सम्पन्न कर लेना चाहिए॥ ६१॥


मेघवदुत्थानं राजकार्याणामन्यत्र च शत्रोः
सन्धिविग्रहाभ्याम्॥ ६२॥

अर्थ: जिस प्रकार नभ मण्डल में मेघ (बादल) अचानक ही उठ जाते हैं, उसी प्रकार राजकीय कार्यों की उत्पत्ति अचानक ही हुआ करती है, अतएव सन्धि व विग्रह को छोड़कर अन्य राजकीय कार्यों को सम्पन्न करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए ॥६२॥


द्वैधीभावं गच्छेद् यदन्योवश्यमात्मना सहोत्सहते ॥६३॥

अर्थ: जब विजिगीषु को यह मालूम हो जावे कि आक्रमणकारी का शत्रु उसके साथ युद्ध करने को तैयार है, (दोनों शत्रु परस्पर में युद्ध कर रहे हैं) तब इसे द्वैधीभाव (बलिष्ठ से सन्धि व निर्बल से युद्ध) अवश्य करना चाहिए ॥६३॥


बलद्वयमध्यस्थितः शत्रुरुभयसिंहमध्यस्थितः करीव भवति सुखसाध्यः ॥६४॥

अर्थ: दोनों विजिगीषुओं के बीच में घिरा हुआ शत्रु, दो शेरों के बीच में फँसे हुए हाथी के समान सरलता से जीता जा सकता है ॥६४॥


भूम्यर्थिनं भूफलप्रदानेन संदध्यात् ॥६५॥

अर्थ: जब कोई सीमाधिपति शक्तिशाली हो और वह विजिगीषु की भूमि ग्रहण करने का इच्छुक हो तो उसे भूमि से पैदा होने वाली धान्य ही देकर उससे सन्धि कर लेनी चाहिए, न कि भूमि देकर॥ ६५॥


भूफलदानमनित्यं परेषु भूमिर्गता गतैव ॥६६॥

अर्थ: क्योंकि भूमि में उत्पन्न होने वाली धान्य विनश्वर होने के कारण शत्रु के पुत्र-पौत्रादि द्वारा नहीं भोगी जा सकती, जब कि भूमि एक बार हाथ से निकल जाने पर पुनः प्राप्त नहीं हो सकती॥ ६६॥


अवज्ञायापि भूमावारोपितस्तरुर्भवति वृद्धतलः ॥६७॥

अर्थ: जिस प्रकार तिरस्कार पूर्वक भी आरोपण किया हुआ वृक्ष पृथ्वी पर अपनी जड़ों के कारण से ही फैलता है, उसी प्रकार विजिगीषु द्वारा दी हुई पृथ्वी को प्राप्त करने वाला सीमाधिपति भी दृढ़मूल (शक्तिशाली) होकर पुनः उसे नहीं छोड़ता ॥६७॥


उपायोपपन्नविक्रमोऽनुरक्तप्रकृतिरल्पदेशोऽपि भूपतिर्भवति सार्वभौमः ॥६८॥

अर्थ: साम-दामादि नैतिक उपायों के प्रयोग में निपुण, पराक्रमी व जिससे अमात्य-आदि राजकर्मचारीगण एवं प्रजा अनुरक्त है, ऐसा राजा अल्प देश का स्वामी होने पर भी चक्रवर्ती के समान निर्भय माना गया है ॥६८॥


न हि कुलागता कस्यापि भूमिः किन्तु वीरभोग्या वसुन्धरा ॥६९॥

अर्थ: कुलपरम्परा से चली आने वाली पृथ्वी किसी राजा की नहीं होती, बल्कि वह वीर पुरुष द्वारा ही भोगने योग्य होती है, अतः राजा को पराक्रमशील होना चाहिए ॥६९॥


सामोपप्रदानभेददण्डा उपायाः ॥७०॥

अर्थ: शत्रुभूत राजा व प्रतिकूल व्यक्ति को वश करने के चार उपाय हैं, १. साम, २. उपप्रदान, ३. भेद व ४. दण्डनीति ॥७०॥


तत्र पंचविधं साम, गुणसंकीर्तनं
सम्बन्धोपाख्यानं परोपकारदर्शनमायतिप्रदर्शनमात्मोपसन्धानमिति ॥७१॥

अर्थ: सामनीति के पाँच भेद हैं-१. गुणसंकीर्तन-प्रतिकूल व्यक्ति को अपने वशीभूत करने के लिए उसके गुणों का उसके समक्ष कथन द्वारा उसकी प्रशंसा करना, २. सम्बन्धोपाख्यान-जिस उपाय से प्रतिकूल व्यक्ति की मित्रता दृढ़ होती हो, उसे उसके प्रति कहना; ३. विरुद्ध व्यक्ति की भलाई करना, ४. आयतिप्रदर्शन-‘हम लोगों की मैत्री का परिणाम भविष्य जीवन को सुखी बनाना है’’ इस प्रकार प्रयोजनार्थी को प्रतिकूल व्यक्ति के लिए प्रकट करना और ५. आत्मोपसन्धान- ‘‘मेरा धन आप अपने कार्य में उपयोग कर सकते हैं ’’ इस प्रकार दूसरे को वश करने के लिए कहना ॥७१॥ व्यास१ ने भी कहा है कि ‘‘जिस प्रकार कर्कश वचनों द्वारा सज्जनों के चित्त विकृत नहीं होते, उसी प्रकार सामनीति से प्रयोजनार्थी का कार्य विकृत न होकर सिद्ध होता है, और जिस प्रकार शक्कर द्वारा शान्त होने वाले पित्त में पटोल (औषधि विशेष) का प्रयोग व्यर्थ है, उसी प्रकार सामनीति से सिद्ध होने वाले कार्य में दण्डनीति का प्रयोग भी व्यर्थ है ॥२॥


यन्मम
द्रव्यं तद्भवता स्वकृत्येषु प्रयुज्यतामित्यात्मोपसन्धानं ॥७२॥

बह्वर्थसंरक्षणायाल्पार्थप्रदानेन परप्रसादनमुपप्रदानं ॥७३॥

अर्थ (सूत्र 72 से 73): शत्रु को वश करने के अभिप्राय से उसे अपनी सम्पत्ति का उपभोग करने के लिए विजिगीषु द्वारा इस प्रकार का अधिकार-सा दे दिया जाता है कि यह सम्पत्ति मेरी है, इसे आप अपनी इच्छानुसार कार्यों में लगा सकते हैं’’ इसे ‘‘आत्मोपसन्धान नाम की सामनीति कहते हैं ॥७२॥ जहाँ पर विजिगीषु शत्रु से अपनी प्रचुर सम्पत्ति के संरक्षणार्थ उसे थोड़ा-सा धन देकर प्रसन्न कर लेता है उसे ‘उपप्रदान’ (दान) नीति कहते हैं ॥७३॥ शुक्र२ ने भी शत्रु से प्रचुर धन की रक्षार्थ उसे थोड़ा-सा धन देकर प्रसन्न करने की ‘उपप्रदान’ कहा है ॥१॥


योगतीक्ष्णगूढपुरुषोभयवेतनैः परबलस्य परस्परशंकाजननं निर्भर्त्सनं वा
भेदः ॥७४॥

अर्थ: विजिगीषु अपने सैन्यनायक, तीक्ष्ण व अन्य गुप्तचर तथा दोनों तरफ से वेतन पाने वाले गुप्तचरों द्वारा शत्रु की सेना में परस्पर एक दूसरे के प्रति सन्देह वा तिरस्कार उत्पन्न कराकर भेद (फूट) डालने को भेद नीति कहा है ॥७४॥ गुरु३ ने भी उक्त उपाय द्वारा शत्रु सेना में परस्पर भेद डालने की ‘भेदनीति’ कहा है।


वधः परिक्लेशोऽर्थहरणं च दंडः ॥७५॥

अर्थ: शत्रु का वध करना, उसे दुःखित करना या उसके धन का अपहरण करना दण्डनीति है ॥७५॥ जैमिनि४ विद्वान् ने भी दण्डनीति की इसी प्रकार व्याख्या की है ॥१॥


शत्रोरागतं साधु परीक्ष्य
कल्याणबुद्धिमनुगृह्णीयात् ॥७६॥

अर्थ: शत्रु के पास से आये हुए मनुष्य की सूक्ष्म बुद्धि से परीक्षा करने के उपरान्त ही विश्वस्त सिद्ध होने पर उसका अनुग्रह करना चाहिए, अपरीक्षित का नहीं ॥७६॥ भागुरि५ ने भी शत्रु के यहाँ से आये हुए व्यक्ति की परीक्षा करने के बारे में संकेत किया है ॥१॥


किंमरण्यजमौषधं न भवति क्षेमाय ॥७७॥

अर्थ: क्या जंगल में उत्पन्न हुई औषधि शारीरिक आरोग्यता के लिए नहीं होती ? अवश्य होती है उसी


गृहप्रविष्टकपोत इव स्वल्पोऽपि शत्रु सम्बन्धो लोकस्तंत्रमुद्वासयति ॥७८॥

अर्थ: जिस प्रकार गृह में प्रविष्ट हुआ कबूतर उसे ऊजड़ बना देता है, उसी प्रकार शत्रु, दल का छोटा-सा भी व्यक्ति विजिगीषु के तन्त्र (सैन्य) को नष्ट-भ्रष्ट कर डालता है ॥७८॥


मित्रहिरण्यभूमिलाभानामुत्तरोत्तरलाभः श्रेयान् ॥७९॥

अर्थ: मित्र, स्वर्ण व भूमि-लाभ इन लाभों में उत्तरोत्तर-आगे-आगे की वस्तु का लाभ कल्याण कारक है अर्थात् मित्र की प्राप्ति श्रेष्ठ है व उसकी अपेक्षा स्वर्ण की एवं स्वर्ण-प्राप्ति की अपेक्षा भूमि की प्राप्ति सर्वश्रेष्ठ है, अतः विजिगीषु को भूमि की प्राप्ति करनी चाहिए ॥१॥


हिरण्यं भूमिलाभाद्भवति मित्रं च हिरण्यलाभादिति ॥८०॥

अर्थ: क्योंकि भूमि की प्राप्ति से स्वर्ण प्राप्ति व स्वर्ण प्राप्ति से मित्रप्राप्ति होती है॥८०॥


शत्रोर्मित्रत्वकारणं विमृश्य तथाचरेद्यथा न वञ्च्यते ॥८१॥

अर्थ: विवेकी पुरुष शत्रु की मित्रता का कारण सोच समझकर उससे ऐसा व्यवहार करे, जिससे कि वह उसके द्वारा ठगाया न जा सके ॥८१॥


गूढोपायेन सिद्धकार्यस्यासंवित्ति-करणं सर्वां शंकां दुरपवादं च करोति ॥८२॥

अर्थ: संधि को प्राप्त हुए जिस शत्रु राजा द्वारा गुप्त रीति से विजिगीषु का प्रयोजन सिद्ध किया गया है उसका यदि यह उचित सम्मानादि नहीं करता तब उसके मन में इसके प्रति अनेक प्रकार की आशंकाएँ उत्पन्न होती हैं। अर्थात् वह ऐसी आशंका करता है कि मेरे द्वारा उपकृत यह विजिगीषु पहले तो मुझसे अनुकूल हुआ मेरा उचित सम्मान करता था, परन्तु अब मुझसे प्रतिकूल रहता है, इससे मालूम होता है कि इसकी मेरे शत्रु, से मैत्री हो चुकी है इत्यादि एवं जनता में इस प्रकार की निन्दा का पात्र होता कि अमुक शत्रु राजा द्वारा यह विजिगीषु रक्षित व शक्तिवर्द्धित किया गया तथापि यह उसकी भक्तिसेवा आदि नहीं करता, इससे यह बड़ा कृतघ्न है-इत्यादि। अतः विजिगीषु को उसके प्रयोजन सिद्ध करने वाले की सेवा-आदि करनी चाहिए ॥८२॥


गृहीतपुत्रदारानुभयवेतनान् कुर्यात् ॥८३॥

अर्थ: विजिगीषु दोनों पक्ष से वेतन पाने वाले गुप्तचरों के स्त्री पुत्रों को अपने यहाँ सुरक्षित रखकर उन्हें शत्रु के देश में भेजे, ताकि वे वापस आकर इसे शत्रु की चेष्टा निवेदन करें ॥८३॥


शत्रुमपकृत्य भूदानेन तद्दायादानात्मनः सफलयैत् क्लेशयेद्वा॥ ८४॥

अर्थ: विजिगीषु शत्रु का अपकार करके उसके शक्तिहीन कुटुम्बियों के लिए उसकी भूमि प्रदान कर उन्हें अपने अधीन बनाये अथवा यदि वे बलिष्ठ हों तो उन्हें क्लेशित करे ॥८४॥


परविश्वासजनने सत्यं शपथः प्रतिभूः प्रधानपुरुषपरिग्रहो वा हेतुः ॥८५॥

अर्थ: विजिगीषु अपने प्रतिद्वन्दी का विश्वास उसी हालत में करे, जब वह शपथ खावे या गवाही उपस्थित करें अथवा उसके सचिव आदि प्रधानपुरुष उसके द्वारा अपने पक्ष में मिला लिए जावें ॥८५॥


सहस्रैकीयः पुरस्ताल्लाभः शतैकीयः पश्चात्कोप इति न यायात् ॥८६॥

अर्थ: शत्रु देश पर आक्रमण करने से वहाँ से हजार स्वर्णमुद्राओं का लाभ होने पर भी यदि अपने देश का सौ मुद्राओं का भी नुकसान होता हो तो राजा का कर्तव्य है कि वह शत्रु पर आक्रमण न करे ॥८६॥


सूचीमुखा ह्यनर्था भवन्त्यल्पेनापि सूचीमुखेन महान् दोरकः प्रविशति ॥८७॥

अर्थ: विजिगीषु के ऊपर आने वाली आपत्तियाँ प्रजा-आदि से होने वाले पीठ पीछे के थोड़े से कोप से होती है क्योंकि जिस प्रकार सुई से वस्त्र में छिद्र हो जाने के उपरान्त उसमें से बहुत सा डोरा निकल जाता है, उसी प्रकार देश में पीठ पीछे थोड़ा सा उपद्रव खड़ा हो जाने पर राजा को महान् आपत्तियों का सामना करना पड़ता है अतः ऐसे अवसर पर विजिगीषु शत्रु पर चढ़ाई करने प्रस्थान न करे ॥८७॥


न पुण्यपुरुषापचयः क्षयो हिरण्यस्य धान्यापचयो व्ययः शरीरस्यात्मनो
लाभविच्छेदेन सामिषक्रव्याद् इव न परैरवरुध्यते ॥८८॥

अर्थ: विजिगीषु को इस प्रकार के लाभ की इच्छा करनी चाहिए, जिसमें उसके अमात्य व सेनाध्यक्ष आदि प्रधान पुरुष कोष, अन्न तथा उसके जीवन का नाश न होने पावे एवं जिस प्रकार मांस खण्ड की धारण करने वाला पक्षी दूसरे मांसभक्षी पक्षियों द्वारा रोका जाता है, उसी प्रकार यह भी शत्रुभूत राजाओं द्वारा न रोका जा सके ॥८८॥


शक्तस्यापराधिषु या
क्षमा सा तस्यात्मनस्तिरस्कारः ॥८९॥

अर्थ: जो राजा शक्तिशाली होकर अपराधियों को अपराधानुकूल दंडित न कर क्षमा धारण करता है, उसका तिरस्कार होता है, अतः राजा को अपराधियों के प्रति क्षमा धारण नहीं करनी चाहिए ॥८९॥


अतिक्रम्यवर्तिषु निग्रहं कर्तुः सर्पादिव
दृष्टप्रत्यवायः सर्वोऽपि विभेति जनः ॥९०॥

अर्थ: अपराधियों का निग्रह करने वाले राजा से सभी लोग अपने नाश की आशंका करते हुए सर्प के समान डरते हैं अर्थात् कोई भी अपराध करने की हिम्मत नहीं करता ॥९०॥


अनायकां बहुनायकां वा सभां न प्रविशेत् ॥९१॥

अर्थ: बुद्धिमान पुरुष को ऐसी सभा में प्रवेश नहीं करना चाहिए जिसमें कोई नायक (नेता) न हो या बहुत से नायक हों ॥९१॥


गणपुरश्चारिणः सिद्धे कार्ये स्वस्य न किंचिद्भवत्यसिद्धे पुनः ध्रुवमपवादः॥९२॥

अर्थ: जन समुदाय या राजसभा आदि में विवेकी पुरुष को अग्रसर-मुख्य होना व्यर्थ है क्योंकि प्रयोजन सिद्ध होने पर मुख्य व्यक्ति को तो कोई लाभ नहीं होता परन्तु यदि प्रयोजन सिद्ध न हुआ तो सब लोग मुख्य की ही निश्चय से निन्दा करते हैं, कि इसी मूर्ख ने विरुद्ध बोलकर हम लोगों का प्रयोजन नष्ट कर दिया ॥९२॥


सा गोष्ठी न प्रस्तोतव्या यत्र परेषामपायः ॥९३॥

अर्थ: वह सभा प्रशंसनीय नहीं कही जा सकती-निंद्य है जिसमें प्रयोजन सिद्धि के लिए आये हुए प्रयोजनार्थी पुरुष को पक्षपात आदि के कारण हानि होती है ॥९३॥


गृहागतमर्थं केनापि कारणेन
नावधीरयेद्यदैवार्थागमस्तदैव सर्वतिथि नक्षत्रग्रहबलं ॥९४॥

अर्थ: गृह में पदार्पण की हुई लक्ष्मी-सम्पत्ति का कभी भी किसी कारण से-तिथि आदि अशुभ जानकर-तिरस्कार नहीं करना चाहिए, किन्तु उसे तत्काल ग्रहण कर लेना चाहिए, क्योंकि जिस समय लक्ष्मी का आगमन होता है उस समय की तिथि व नक्षत्र शुभ और ग्रह बलिष्ठ गिने जाते हैं ॥९४॥


गजेन गजबन्धनमिवार्थेनार्थोपार्जनम् ॥९५॥

अर्थ: जिस प्रकार हाथी से हाथी बांधा जाता है, उसी प्रकार धन से धन कमाया जाता है ॥९५॥ जैमिनि ने भी धनोपार्जन का यही उपाय निर्दिष्ट किया है ? ॥१॥


दण्डनीति का निर्णय, प्रशस्तभूमि, राक्षसीवृत्ति वाले व पर प्रणेय राजा का स्वरूप, स्वामी की आज्ञा का पालन, राजा द्वारा ग्राह्य व दूषित धन तथा धन-प्राप्ति


न केवलाभ्यां बुद्धिपौरुषाभ्यां महतो जनस्य सम्भूयोत्थाने संघातविधातेन दण्डं
प्रणयेच्छतमवध्यं सहस्रमदण्ड्यं न प्रणयेत्॥९६॥

अर्थ: राजा को अपनी बुद्धि व पौरुष के गर्व में आकर एकमत रखने वाले उत्तम पुरुषों के समूह को अपराधी बता कर दण्डित नहीं करना चाहिए, क्योंकि एक सी बात कहने वाले सौ आदमी वध के अयोग्य व हजार आदमी दण्ड के अयोग्य होते हैं, अतः उन्हें दण्ड न देना चाहिए॥ ९६॥ शुक्र ने भी उत्तम पुरुषों का समूह राजा द्वारा बुद्धि व पौरुष के गर्व-वश दण्ड देने के अयोग्य बताया है ॥१॥


सा राजन्वती भूमियंस्यां
नासुरवृत्ती राजा॥९७॥

अर्थ: जिस भूमि का अधीश्वर राक्षसी बर्ताव करने वाला (अपराध से प्रतिकूल अत्यधिक दण्ड देने वाला व व्यसनी-आदि दोष युक्त) नहीं है बल्कि नीतिज्ञ व सदाचारी है वह (भूमि) राजन्वती (प्रशस्त राजा से युक्त) कही जाती है ॥९७॥ गुरु ने भी नीतिज्ञ व सदाचारी नरेश से युक्त पृथ्वी को श्रेष्ठ व उन्नतिशील कहा है ॥१॥


परप्रणेयो राजाऽपरीक्षितार्थमानप्राणहरोऽसुरवृत्तिः॥९८॥

अर्थ: बिना विचारे दूसरे के मतानुसार कार्य करने वाला और अपराधियों के अर्थमान व प्राणमान को न जानकर बिना सोचे समझे उनका प्राणघात करने वाला-‘‘अमुक अपराधी अपने अपराधानुकूल कानूनन कितने जुर्माने, कितनी शारीरिक सजा के योग्य है ? इत्यादि बिना सोचे समझे दूसरों के कहने मात्र से उनके धन, मान व प्राण लेने वाला (सौ रुपये जुर्माने के योग्य अपराधी से हजार रुपये जुर्माने में) लेने वाला, तुच्छ दोष पर फांसी देने वाला राजा ‘असुरवृत्ति’ (राक्षसी बर्ताव करने वाला) कहा गया है॥९८॥


परकोपप्रसादानुवृत्तिः परप्रणेयः॥९९॥

अर्थ: जो राजा दूसरों के कहने मात्र से ही बिना सोचे समझे जिस किसी के प्रति कुपित व प्रसन्न हो जाया करता है, उसे ‘परप्रणेय’ कहा है ॥९९॥


तत्स्वामिच्छन्दोऽनुवर्तनं श्रेयो यन्न
भवत्यायत्यामहिताय ॥१००॥

अर्थ: सेवक को स्वामी की उसी आज्ञा का पालन करना श्रेयस्कर है, जिससे उसके स्वामी का भविष्य में अहित न हो सके ॥१००॥


निरनुबन्धमर्थानुबंधं चार्थमनुगृह्णीयात् ॥१०१॥

अर्थ: राजा को प्रजा से इस प्रकार धन ग्रहण करना चाहिए जिससे प्रजा को पीड़ा व उसके धन की क्षति न हो अथवा ऐसा अर्थ हो सकता है कि विवेकी पुरुष इस प्रकार से धन संचय करे, जिससे जनसाधारण को कष्ट न हो एवं भविष्य में धन प्राप्ति का संबन्ध बना रहे ॥१०१॥


नासावर्थो धनाय यत्रायतयां महानर्थानुबंधः ॥१०२॥

अर्थ: भविष्य में महान् अनर्थ (राजदण्डादि) उत्पन्न करने वाला अन्याय-संचित धन स्थिरशील नहीं होता। सारांश यह है कि चोरी आदि निन्द्य कर्म से जो धन संचय किया जाता है, वह राजा द्वारा पूर्व संचित धन के साथ जब्तकर लिया जाता है, अतः नैतिक पुरुष को न्यायोचित साधनों द्वारा धनसंचय करना चाहिए ॥१०२॥


लाभस्त्रिविधो नवो भूतपूर्वः पैत्र्यश्च ॥१०३॥

अर्थ: अर्थ लाभ (धन प्राप्ति) तीन प्रकार का है। १. नवीन-कृषि व व्यापारादि साधनों द्वारा नवीन धन की प्राप्ति, २. भूतपूर्व-पूर्व में उक्त साधनों द्वारा प्राप्त किया हुआ धन, ३. पित्र्य-पिता वगैरह परम्परा से प्राप्त किया हुआ धन, ये उक्त तीनों लाभ श्रेष्ठ हैं ॥१०३॥

(३०) युद्ध-समुद्देशः

स किं मंत्री मित्रं वा यः प्रथममेव युद्धोद्योगं भूमित्यागं चोपदिशति, स्वामिनः
सम्पादयति च महन्तमर्थसंशयं ॥१॥

अर्थ: वह मंत्री व मित्र दोनों निंद्य-शत्रु के समान हैं, जो शत्रु द्वारा आक्रमण किये जाने पर अपने स्वामी को भविष्य में कल्याण-कारक अन्य सन्धि आदि उपाय न बताकर पहले ही युद्ध करने में प्रयत्नशील होने का अथवा भूमि का परित्याग कर दूसरी जगह भाग जाने का उपदेश देकर उसे महान् अनर्थ (प्राण सन्देह के खतरे) में डाल देते हैं ॥१॥ गर्ग१ ने भी शत्रु के उपस्थित होने पर राजा को युद्ध व भाग जाने की सलाह देने वाले सचिव को शत्रु कहा है ॥१॥


संग्रामे को नामात्मवानादावेव स्वामिनं प्राणसन्देहतुलायामारोपयति ॥२॥

अर्थ: कौन बुद्धिमान सचिव अपने स्वामी को सबसे पहले युद्ध में प्रेरित कर उसे प्राण-संदेह रूप तराजू पर चढ़ायगा ? कोई नहीं। सारांश यह है कि शत्रु द्वारा हमला किये जाने पर पूर्व में मंत्री अपने स्वामी को संधि के लिए प्रेरित करे, उसमें असफल होने पर युद्ध के लिए प्रेरित करे॥ २॥ गौतम२ ने भी अन्य उपाय असफल होने पर युद्ध करने का संकेत किया है ॥१॥


भूम्यर्थं नृपाणां नयो विक्रमश्च न भूमित्यागाय ॥३॥

अर्थ: राजाओं की नीति व पराक्रम की सार्थकता अपनी भूमि की रक्षा के लिए होती है, न कि भूमि-त्याग के लिए, अतः उसका त्याग कर्तव्य-दृष्टि से किस प्रकार ग्राह्य हो सकता है ? नहीं हो सकता ॥३॥


बुद्धियुद्धेन परं जेतुमशक्तः
शस्त्रयुद्धमुपक्रमेत् ॥४॥

अर्थ: जब विजिगीषु बुद्धि-युद्ध-सामादि उपाय के प्रयोग द्वारा शत्रु पर विजयश्री प्राप्त करने में असमर्थ हो जाय, तब उसे शस्त्र-युद्ध करना चाहिए॥ ४॥


न तथेषवः प्रभवन्ति यथा प्रज्ञावतां प्रज्ञाः ॥५॥

अर्थ: जिस प्रकार बुद्धिमानों की बुद्धियाँ शत्रु के उन्मूलन करने में समर्थ होती हैं उस प्रकार वीर पुरुष द्वारा प्रेषित बाण समर्थ नहीं होते॥ ५॥


दृष्टेऽप्यर्थे सम्भवन्त्यपराद्धेषो धनुष्मतोऽदृष्टमर्थं साधु साधयति प्रज्ञावान् ॥६॥

अर्थ: धनुर्धारियों के बाण निशाना साधकर चलाये जाने पर भी प्रत्यक्ष में वर्तमान लक्ष्य-भेद करने में असफल हो जाते हैं परन्तु बुद्धिमान पुरुष बुद्धिबल से बिना देखे हुए पदार्थ भी भलीभाँति सिद्ध कर लेता है।


श्रूयते हि किल दूरस्थोऽपि माधवपिता कामन्दकीयप्रयोगेण माधवाय मालतीं
साधयामास ॥७॥

अर्थ: महाकवि श्री भवभूति विरचित मालती माधव नामक नाटक में लिखा है कि माधव के पिता देवरात ने बहुत दूर रहकर के भी कामन्द की नाम की संन्यासिनी के प्रयोग द्वारा-उसे मालती के पास भेज कर अपने पुत्र माधव के लिए ‘मालती’ प्राप्त की थी, यह देवरात की बुद्धि-शक्ति का ही माहात्म्य था ॥७॥


प्रज्ञा ह्यमोघं शस्त्रं कुशलबुद्धीनां ॥८॥

प्रज्ञाहताः कुलिशहता इव न प्रादुर्भवन्ति भूमिभृतः ॥९॥

अर्थ (सूत्र 8 से 9): विद्वानों की बुद्धि ही शत्रु पर विजय-श्री प्राप्त करने में सफल शस्त्र मानी गयी है, क्योंकि जिस प्रकार वज्र प्रहार से ताड़ित किये हुए पहाड़ पुनः उत्पन्न नहीं होते, उसी प्रकार विद्वानों की बुद्धि द्वारा जीते हुए शत्रु भी पुनः शत्रुता करने का साहस नहीं कर सकते ॥८-९॥


परैः स्वस्याभियोगमपश्यतो भयं नदीमपश्यत उपानत्परित्यजनमिव ॥१०॥

अर्थ: जिस प्रकार नदी को बिना देखे ही पहले से जूते उतारने वाला व्यक्ति हंसी का पात्र होता है, उसी प्रकार शत्रुकृत उपद्रव को जाने बिना पहले से ही भयभीत होने वाला व्यक्ति भी हंसी का पात्र होता है, अतः शत्रु का आक्रमण होने पर उसका प्रतिकार सोचना चाहिए ॥१०॥


अतितीक्ष्णो बलवानपि शरभ इव न चिरं नन्दति ॥११॥

अर्थ: अत्यन्त क्रोधी पुरुष बलिष्ठ होने पर भी अष्टापद के समान चिरकाल तक जीवित नहीं रह सकता-नष्ट हो जाता है। अर्थात्-जिस प्रकार अष्टापद मेघ की गर्जना सुनकर उसे हाथी का चिघाड़ समझकर सहन न करता हुआ पर्वत के शिखर से पृथ्वी पर गिरकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधी व्यक्ति भी क्रोध-वश बलिष्ठ शत्रु से युद्ध करने पर नष्ट हो जाता है अतः अत्यन्त क्रोधी होना उचित नहीं ॥११॥


प्रहरतोऽपसरतो वा समे विनाशे वरं प्रहारो यत्र नैकान्तिको विनाशः ॥१२॥

अर्थ: शत्रु से युद्ध करना अथवा युद्ध-भूमि से भाग जाना इन दोनों कार्यों में जब विजिगीषु को अपना विनाश निश्चित हो जाय तो उसे युद्ध करना ही श्रेष्ठ है, क्योंकि उसमें मृत्यु निश्चित नहीं होती परन्तु भागने से अवश्य मृत्यु होती है ॥१२॥


कुटिला हि गतिर्देवस्य मुमूर्षुमपि जीवयति जिजीविषुं मारयति ॥१३॥

अर्थ: कर्म की गति-भाग्य की रेखा-बड़ी वक्र वा जटिल होती है क्योंकि वह मरने की कामना करने वाले को दीर्घायु व जीवन की आकांक्षा करने वाले को मार डालती है ॥१३॥


दीपशिखायां पतंगवदैकान्ति के विनाशेऽविचारमपसरेत् ॥१४॥

अर्थ: गौतम१ का उद्धरण भी इसी बात का समर्थन करता है ॥१॥


जीवितसम्भवे दैवो देयात्कालबलम् ॥१५॥

अर्थ: जब मनुष्य दीर्घायु होता है, तब भाग्य उसे ऐसी शक्ति प्रदान करता है, जिससे वह निर्बल होने पर भी बलिष्ठ शत्रु को मार डालता है ॥१५॥ शुक्र२ ने भी भाग्योदय से दीर्घायु पुरुष के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥


वरमल्पमपि सारं बलं न भूयसी मुण्डमण्डली ॥१६॥

अर्थ: सार हीन (शक्तिहीन व कर्तव्यविमुख) अधिक फौज की अपेक्षा सार-युक्त (शक्तिशाली व कर्तव्य-परायण) थोड़ी-सी सेना हो तो उत्तम है ॥१६॥ नारद३ ने भी अच्छी तैयार थोड़ी भी फौज को उत्तम व बहुत सी डरपोक को नगण्य बताया है ॥१॥


असारबलभंगः सारबलभंगं करोति ॥१७॥

अर्थ: जब शत्रु-कृत उपद्रव द्वारा विजिगीषु की सार-हीन (शक्तिहीन) सेना नष्ट होती है तब उसकी शक्तिशाली सेना भी नष्ट हो जाती है-अधीर हो जाती है अतः विजिगीषु दुर्बल सैन्य न रखे ॥१७॥ कौशिक४ ने भी कायर सेना का भंग विजिगीषु की वीर सेना के भंग का कारण बताया है ॥१॥


नाप्रतिग्रहो युद्धमुपेयात् ॥१८॥

अर्थ: राजा को कभी अकेले युद्ध में नहीं जाना चाहिए ॥१८॥ गुरु५ ने भी अर्जुन समान वीर राजा को अकेले (सैन्य के बिना) युद्ध में जाने से खतरा बताया है ॥१॥


राजव्यञ्जनं पुरस्कृत्य पश्चात्स्वाम्यधिष्ठितस्य सारबलस्य निवेशनं प्रतिग्रहः ॥१९॥

सप्रतिग्रहं बलं साधुयुद्धायाोत्सहते ॥२०॥

अर्थ (सूत्र 19 से 20): राज-चिह्न-युद्ध के बाजे-आदि-आगे करके पश्चात् राजा से अधिष्ठित प्रधान सैन्य सुसज्जित करके युद्ध के लिए तैयार करना वा स्थापित करना ‘प्रतिग्रह’ है, ऐसी प्रतिग्रह-सहित (विजिगीषु से अधिष्ठित) प्रधान फौज युद्ध करने में अच्छी तरह उत्साह करती है जिसका फल विजय है ॥१९-२०॥


पृष्ठतः सदुर्गजला भूमिर्बलस्य महानाश्रयः ॥२१॥

नद्या नीयमानस्य तटस्थपुरुषदर्शनमपि जीवितहेतुः ॥२२॥

अर्थ (सूत्र 21 से 22): युद्ध के अवसर पर सैन्य के पीछे दुर्ग व जल-सहित पृथ्वी रहने से उसे काफी जीवन-सहारा रहता है, क्योंकि पराजित होने पर भी वह दुर्ग में प्रविष्ट होकर जल-प्राप्ति द्वारा अपनी प्राण रक्षा उसी प्रकार कर सकती है, जिस प्रकार नदी में बहने वाले मनुष्य को तटवर्ती पुरुष का दर्शन उसकी प्राण-रक्षा का साधन होता है ॥२१-२२॥


निरन्नमपि सप्राणमेव बलं यदि जलं लभेत्६ ॥२३॥

अर्थ: युद्ध के समय सेना को अन्न न मिलने पर भी यदि जल मिल जाय, तो वह अपनी प्राण-रक्षा कर सकती है ॥२३॥


आत्मशक्तिमविज्ञायोत्साहः शिरसा पर्वतभेदनमिव ॥२४॥

अर्थ: जो निर्बल राजा अपनी सैन्य-आदि शक्ति को न जानकर बलिष्ठ शत्रु से युद्ध करता है उसका वह कार्य मस्तक से पहाड़ तोड़ने के समान असम्भव व घातक है ॥२४॥


सामसाध्यं युद्धसाध्यं न
कुर्यात् ॥२५॥

गुडादभिप्रेतसिद्धौ को नाम विषं भुञ्जीत ॥२६॥

अर्थ (सूत्र 25 से 26): विजिगीषु को सामनीति द्वारा सिद्ध होने वाला इष्ट प्रयोजन युद्ध द्वारा सिद्ध नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब गुड़-भक्षण द्वारा ही अभिलषित प्रयोजन (आरोग्य-लाभ) होता है, तब कौन बुद्धिमान पुरुष विष-भक्षण में प्रवृत्त होगा ? कोई नहीं ॥२५-२६॥


अल्पव्ययभयात्
भयात् सर्वनाशं करोति मूर्खः ॥२७॥

अर्थ: मूर्ख मनुष्य थोड़े से खर्च के डर से अपना सर्वनाश कर डालता है। प्राकरणिक अभिप्राय यह है कि मूर्ख राजा से जब प्रतिद्वन्द्वी (शत्रु) सामनीति से कुछ भूमि आदि माँगता हे, तब वह थोड़े से खर्च के डर से उसे कुछ नहीं देता, पश्चात् उसके द्वारा आक्रमण किये जाने पर सर्वनाश कर बैठता है, अतः नैतिक व्यक्ति या विजिगीषु अल्प व्यय के डर से अपना सर्वनाश न करे ॥२७॥


का नाम कृतधीः शुल्कभयाद्भाण्डं परित्यजति ॥२८॥

अर्थ: कौन बुद्धिमान मनुष्य महसूल देने के डर से अपना व्यापार छोड़ता है ? कोई नहीं ॥२८॥


स किं व्ययो यो महान्तमर्थं रक्षति ॥२९॥

अर्थ: जिस खर्च द्वारा अपने प्रचुर धन की रक्षा व महान् इष्ट प्रयोजन सिद्ध होता है क्या वह खर्च कहा जा सकता है ? नहीं कहा जा सकता। प्राकरणिक अभिप्राय यह है, कि बलिष्ठ शत्रु से सन्धि करने में विजिगीषु द्वारा किया जाने वाला धनादि-खर्च, खर्च नहीं कहा जाता, क्योंकि उससे उसके संचित धन की रक्षा व इष्ट प्रयोजन-सिद्धि होती है॥ २९॥


पूर्णसरः-सलिलस्य हि न परीवाहादपरोऽस्ति रक्षणोपायः ॥३०॥

अर्थ: जिस प्रकार जल से समूचे भरे हुए तालाब की रक्षा का बहाव (जल के निकास) के सिवाय दूसरा कोई उपाय नहीं, उसी प्रकार धनाढ्य पुरुष की धन-रक्षा का धन के सिवाय और कोई दूसरा उपाय नहीं है॥ ३०॥


अप्रयच्छतो बलवान् प्राणैः सहार्थं गृह्णाति ॥३१॥

अर्थ: जो निर्बल मनुष्य बलिष्ठ शत्रु द्वारा प्रार्थना किये जाने पर भी उसे अज्ञान व लोभ-वश धन नहीं देता, उसकी समस्त धन-राशि बलिष्ठ द्वारा अपहरण कर ली जाती है ॥३१॥


बलवति सीमाधिपेऽर्थं प्रयच्छन् विवाहोत्सवगृहगमनादिमिषेण प्रयच्छेन् ॥३२॥

अर्थ: शक्तिहीन राजा यदि किसी शक्तिशाली सीमाधिपति के लिए प्रयोजन-वश धन देने का इच्छुक हो, तो वह उसे विवाह-आदि उत्सव के अवसर पर सम्मानपूर्वक अपने गृह बुलाकर किसी भी बहाने द्रव्य प्रदान करे ॥३२॥


आमिषमर्थमप्रयच्छतोऽनवधिः स्यान्निबन्धः शासनम् ॥ ३३॥

अर्थ: जो शक्ति-हीन राजा शक्तिशाली प्रतिद्वन्दी सीमाधिपति को किसी बहाने से धन नहीं देता, उसे भविष्यकालीन अपरिमित-असंख्य धन-राशि देना व उसकी कठोर आज्ञा-पालन में बंधना पड़ता है अर्थात् भविष्य में उसके द्वारा किये जाने वाले हमले का कटुक फल (असंख्य धनराशि का अपहरण व राष्ट्र का बर्बादी-आदि) भोगना पड़ता है। अतः निर्बल राजा लोभ को तिलाञ्जलि देकर शत्रुभूत सीमाधिपति को धन-प्रदान द्वारा पहले से ही काबू में रखे ॥३३॥


कृतसंघातविधातोऽरिभिर्विशीर्णयूथो गज इव कस्य न भवति साध्यः ॥३४॥

अर्थ: शत्रु द्वारा जिसका सैन्य नष्ट कर दिया गया है व परदेश से आया हुआ ऐसा शक्ति-हीन राजा अपने झुण्ड से भ्रष्ट हुए अकेले हाथी के समान किसके द्वारा वश नहीं किया जाता ? सभी के द्वारा वश कर लिया जाता हैं। अर्थात् क्षुद्र लोग भी उसे पराजित कर देते हैं ॥३४॥


विनिःस्रावितजले सरसि विषमोऽपि ग्राहो जलव्यालवत् ॥३५॥

अर्थ: जिसकी समस्त जल-राशि निकाली जा चुकी है ऐसे जल-शून्य तालाब में वर्तमान मगर आदि भयंकर जल-जन्तु भी जिस-प्रकार जल-सर्प के समान निर्विष व क्षीणशक्ति हो जाता है, उसी प्रकार सैन्य के क्षय हो जाने से राजा भी क्षीण-शक्ति हो जाता है ॥३५॥


वनविनिर्गतः सिंहोऽपि शृगालायते ॥३६॥

अर्थ: जिस प्रकार जंगल से निकला हुआ शेर गीदड़ समान शक्ति-हीन हो जाता है, उसी प्रकार नष्ट-सैन्य व स्थान-भ्रष्ट राजा भी क्षीणशक्ति हो जाता है ॥३६॥


नास्ति संघातस्य निःसारता किन्न स्खलयति मत्तमपि वारणं
कुथिततृणसंघातः ॥३७॥

अर्थ: समूह निस्सार (शक्ति-हीन) नहीं होता, क्योंकि क्या बँटा हुआ तृण-समूह (घास का रस्सा) मदोन्मत्त हाथी के गमन को नहीं रोकता ? अवश्य रोकता है। अर्थात् उसके द्वारा मदोन्मत्त हाथी भी बांधा जाता है ॥३७॥


संहतैर्बिसतन्तुभिर्दिग्गजोऽपि नियम्यते ॥३८॥

अर्थ: जिस प्रकार बटे हुए मृणाल-तन्तुओं से दिग्गज भी वशीभूत किया जाता है (बांधा जाता है) उसी प्रकार राजा भी सैन्य द्वारा शक्तिशाली शत्रु को वश कर लेता है-युद्ध में परास्त कर देता है ॥३८॥


दण्डसाध्ये रिपावुपायान्तरमग्नावाहुतिप्रदानमिव॥३९॥

अर्थ: जो शत्रु दण्ड द्वारा वश करने योग्य है, उसके प्रति अन्य सामदान-आदि उपायों का प्रयोग, प्रज्वलित अग्नि में घृत की आहुति देने के समान उसकी क्रोध-वृद्धि का कारण होता है। अर्थात् जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि घृत की आहुति द्वारा अत्यधिक बढ़ती है, उसी प्रकार दण्ड द्वारा काबू में किया जाने वाला शत्रु भी अन्य सामादि उपायों द्वारा अत्यधिक कुपित हो जाता है॥३६॥


यन्त्रशस्त्राग्निक्षारप्रतीकारे व्याधौ किं नामान्यौषधं कुर्यात् ॥४०॥

अर्थ: द्वारा नष्ट नहीं की जा सकती, उसी प्रकार दण्ड द्वारा वश में किया जाने वाला शत्रु भी अन्य सामादि उपाय द्वारा काबू में नहीं किया जा सकता।


उत्पाटितदंष्ट्रो भुजंगो रज्जुरिव॥४१॥

अर्थ: जिस प्रकार सर्प की दाँढ़ें निकाल देने पर वह रस्सी के समान शक्तिहीन (निर्विष) हो जाता है, उसी प्रकार जिसका धन व सैन्य नष्ट कर दिया गया है, ऐसा शत्रु भी शक्तिहीन हो जाता है। ४१॥ नारद ने भी उक्त व उखाड़े हुए सींग वाले बैल का दृष्टान्त देकर उक्त बात का समर्थन किया है ॥१॥


प्रतिहतप्रतापोऽङ्गारः संपतितोऽपि किं कुर्यात् ॥४२॥

विद्विषां चाटुकारं न बहु मन्येत ॥४३॥

जिह्वया लिहन् खड्गो मारत्येव ॥४४॥

तन्त्रावापौ नीतिशास्त्रम् ॥४५॥

स्वमण्डलपालनाभियोगस्तंत्रम् ॥४६॥

परमण्डलावाप्त्यभियोगोऽवापः ॥४७॥

अर्थ (सूत्र 42 से 47): जिस प्रकार नष्ट हो गया है प्रताप जिसका ऐसा अङ्गार (भस्म) शरीर पर पड़ा हुआ कुछ नहीं कर सकता, उसी प्रकार जिसका धन व सैन्य रूप प्रताप नष्ट किया गया है, वह शत्रु भी कुछ नहीं कर सकता ॥४२॥ नैतिक पुरुष शत्रु के कपट-पूर्ण व्यवहार (चिकनी चुपड़ी बातें-आदि) पर अधिक ध्यान न देवें-उसके अधीन न होवे, क्योंकि जिस प्रकार तलवार जीभ द्वारा चाटी जाने पर भी उसे काट डालती है, उसी प्रकार शत्रु भी मधुर वचन बोलता हुआ मार डालता है ॥४३-५४॥ तंत्र (अपने देश की रक्षार्थ सैनिक-संगठन की योजना) व अवाप (दूसरे देश की प्राप्ति के लिए की जाने वाली सन्धि विग्रहादि की योजना) को प्रतिपादन करने वाले शास्त्र को “नीतिशास्त्र” कहते हैं। अपने देश की रक्षा के लिए सैन्य-संगठन आदि उपायों की योजना ‘तंत्र’ है और दूसरे देश की प्राप्ति के लिए किये जाने वाले (सन्धि-विग्रहादि) की योजना को ‘अवाप’ कहते हैं ॥४५-४७॥


बहूनेको न गृह्णीयात् सदर्पोऽपि सर्पो व्यापाद्यत एव पिपीलिकाभिः ॥४८॥

अर्थ: शुक्र ने भी स्वदेश की रक्षा का उपाय ‘तंत्र’ और दूसरे देश की प्राप्ति के उपाय को ‘अवाप’ कहा है ॥१॥ अकेला व्यक्ति कभी भी बहुसंख्यक के साथ युद्ध न करे, क्योंकि मदोन्मत्त जहरीला सांप बहुत-सी चीटियों द्वारा भक्षण कर लिया जाता है ॥४८॥ नारद ने भी उक्त दृष्टान्त द्वारा अकेले व्यक्ति को युद्ध करने का निषेध किया हैं ॥१॥


अशोधितायां परभूमौ न प्रविशेन्निर्गच्छेद्वा ॥४९॥

अर्थ: विजिगीषु बिना परीक्षा की हुई शत्रु की भूमि में न तो प्रविष्ट हो और न वहाँ से वापस आवे ॥४९॥


विग्रहकाले परस्मादागतं कमपि न संगृह्णीयात् गृहीत्वा न संवासयेदन्यत्र
तद्दायादेभ्यः, श्रूयते हि निजस्वामिना कूटकलहं विधायावाप्तविश्वासः कृकलासो
नामानीकपतिरात्मविपक्षं विरूपाक्षं जघानेति ॥ ५०॥

अर्थ: लड़ाई के समय परचक्र से आये हुए किसी भी अपरीक्षित व्यक्ति को अपने पक्ष में न मिलावे, यदि मिलाना हो तो अच्छी तरह जांच-पड़ताल करके मिलावे, परन्तु उसे वहाँ ठहरने न देवे और शत्रु के कुटुम्बी, जो कि उससे नाराज होकर वहाँ से चले आये हैं उन्हें परीक्षा-पूर्वक अपने पक्ष में मिलाकर ठहरा लेवे, अन्य किसी को नहीं। इतिहास बताता है कि कृकलास नाम के सेनापति ने अपने मालिक से झूठ-मूठ कलह करके शत्रु के हृदय में अपना विश्वास उत्पन्न कराकर अपने स्वामी के प्रतिपक्षी (शत्रु) विरूपाक्ष नाम के राजा को मार डाला ॥५०॥


बलमपीडयन्
परानभिषेणयेत्॥ ५१॥

अर्थ: विजिगीषु अपनी सेना की प्रसन्नता का ख्याल रखते हुए (उसे दान-मानादि द्वारा सुखी बनाते हुए) शत्रुओं से युद्ध करने अपनी सेना के साथ प्रस्थान करे ॥५१॥


दीर्घप्रयाणोपहतं बलं न कुर्यात् स तथाविधमनायासेन
भवति परेषां साध्यं ॥५२॥

अर्थ: विजिगीषु शत्रु-राष्ट्र में प्रविष्ट हुआ अपनी फौज से विशेष मुसाफिरी न करावे, क्योंकि लम्बी मुसाफिरी से ताड़ित-खेदखिन्न (थकी हुई) फौज शत्रुओं द्वारा सरलता से जीती जा सकती है ॥५२॥


न दायादादपरः परबलस्याकर्षणमंत्रोऽस्ति ॥५३॥

अर्थ: विजिगीषु शत्रु के कुटुम्बियों को अपने पक्ष में मिलावे, क्योंकि उनके मिलाने के सिवाय दूसरा कोई शत्रु-सेना को नष्ट करने वाला मंत्र नहीं ॥५३॥


यस्याभिमुखं गच्छेत्तस्यावश्यं दायादानुत्थापयेत् ॥५४॥

कण्टकेन कण्टकमिव
परेण परमुद्धरेत् ॥५५॥

विल्वेन हि विल्वं हन्यमानमुभय यथाप्यात्मनो
लाभाय ॥५६॥

अर्थ (सूत्र 54 से 56): विजिगीषु जिस शत्रु पर चढ़ाई करे, उसके कुटुम्बियों को साम-दानादि उपाय द्वारा अपने पक्ष में मिलाकर उन्हें शत्रु से युद्ध करने के लिए प्रेरित करे। उसे अपनी सैन्य क्षति द्वारा शत्रु को नष्ट नहीं करना चाहिए, किन्तु कांटे से कांटा निकालने की तरह शत्रु द्वारा शत्रु को नष्ट करने में प्रयत्नशील होना चाहिए। जिस प्रकार बेल से बेल फोड़े जाने पर दोनों में से एक अथवा दोनों फूट जाते हैं, उसी प्रकार जब विजिगीषु द्वारा शत्रु से शत्रु लड़ाया जाता है,तब उनमें से एक का अथवा दोनों का नाश निश्चित होता है जिससे विजिगीषु का दोनों प्रकार से लाभ होता है ॥५४-५६॥


यावत्परेणापकृतं तावतोऽधिकमपकृत्य सन्धिं कुर्यात् ॥५७॥

अर्थ: विजिगीषु का कर्त्तव्य है कि शत्रु ने इसका जितना नुकसान किया है उससे ज्यादा शत्रु की हानि करके उससे सन्धि कर ले ॥५७॥


नातप्तं लोहं लोहेन सन्धत्ते ॥५८॥

अर्थ: जिस प्रकार ठंडा लोहा गरम लोहे से नहीं जुड़ता, किन्तु गरम लोहे ही जुड़ते हैं, उसी प्रकार दोनों कुपित होने पर परस्पर सन्धि के सूत्र में बंधते हैं ॥५८॥


तेजो हि सन्धाकारणं नापराधस्य क्षान्तिरुपेक्षा वा ॥५९॥

उपचीयमानघटनेवाश्मा हीनेन विग्रहं कुर्यात् ॥६०॥

अर्थ (सूत्र 59 से 60): अपराधी शत्रु पर विजय प्राप्त करने में क्षमा या उपेक्षा का कारण नहीं, किन्तु विजिगीषु का कोष व सैन्यशक्ति रूप तेज ही कारण हैं। अर्थात्-तेज से ही शत्रु जीता जा सकता है, न कि क्षमा या उपेक्षा से ॥५९॥ जिस प्रकार छोटा-सा पत्थर शक्तिशाली (वजनदार) होने के कारण बड़े घड़े को फोड़ने की क्षमता रखता है, उसी प्रकार विजिगीषु भी सैन्य शक्ति युक्त होने के कारण महान् शत्रु को नष्ट करने की क्षमता रखता है, अतः शक्तिशाली को हीन शक्ति वाले शत्रु के साथ युद्ध करना चाहिए ॥६०॥


दैवानुलोम्यं पुण्यपुरुषोपचयोऽप्रतिपक्षता च विजिगीषोरुदयः ॥६१॥

अर्थ: भाग्य की अनुकूलता, उत्तम व कर्त्तव्यशील पुरुषों की प्राप्ति और विरोधियों का अभाव इन गुणों से विजिगीषु की उन्नति होती है॥ ६१॥


पराक्रमकर्कशः प्रवीरानीकश्चेद्धीनः सन्धाय साधूपचरितव्यः ॥६२॥

अर्थ: जब विजिगीषु स्वयं शक्तिहीन हो और शत्रु विशेष पराक्रमी व प्रबल सैन्य-युक्त हो, तो उससे सन्धि कर लेनी चाहिए॥ ६२॥


दुःखामर्षजं तेजो विक्रमयति ॥६३॥

अर्थ: दुःख से क्रोध और क्रोध से तेज उत्पन्न होता है, पश्चात् उस तेज द्वारा शत्रु पराक्रम करने के लिए प्रेरित किया जाता है। अर्थात् विजिगीषु द्वारा शत्रु क्लेशित किया जाता है, तब उसके हृदय में क्रोधरूपी भीषण ज्वाला धधकती है, जिसके फलस्वरूप उसमें तेज उत्पन्न होता है जो कि उसे पराक्रमी बनाने में सहायक होता है अतः वीर सैन्यशक्तिवाला व प्रतापी शत्रु अपने भाग्य की प्रतिकूलतावश यदि एक वार विजिगीषु द्वारा हरा दिया जाता है परन्तु उसका परिणाम विजिगीषु के लिए महाभयंकर होता है, क्योंकि वह पुनः बार बार हमला करने तत्पर रहता है, इसलिए प्रबल सैनिकों वाले शत्रु के साथ युद्ध न कर सन्धि ही करनी चाहिए ॥६३॥


स्वजीविते हि निराशस्याचार्यो भवति वीर्यवेगः ॥६५॥

अर्थ: जिस प्रकार शेर का बच्चा छोटा होने पर भी शक्तिशाली होने के कारण बड़े भारी हाथी को मार डालता है, उसी प्रकार विजिगीषु भी प्रबल सैन्य की शक्ति से महान् शत्रु को युद्ध में परास्त कर देता है ॥६५॥


न चातिभग्नं पीडयेत् ॥६६॥

अर्थ: विजिगीषु अत्यन्त पराजित किये हुए शत्रु को पीड़ित न करे-फिर से उस पर चढ़ाई न करे। अन्यथा सताया हुआ शत्रु अपने नाश की आशंका से पुनः पराक्रम शक्ति का प्रयोग करता है ॥६६॥


शौर्यैकधनस्योपचारो मनसि तच्छागस्येव पूजा ॥६७॥

अर्थ: जो विजिगीषु अपने जीवन की भी अभिलाषा नहीं करता-मृत्यु से भी नहीं डरता-उसकी वीरता का वेग उसे शत्रु, से युद्ध करने के लिए प्रेरित करता है ॥६४॥ शूरता ही है अद्वितीय धन जिसका ऐसे शूरवीर शत्रु का जब विजिगीषु दुरभिप्राय-वश सम्मान करता है तब वह शत्रु अपने मन में उसके प्रति बकरे की पूजा के समान अत्यधिक कुपित हो जाता है अर्थात् जिस प्रकार दुरभिप्रायवश बलिदान करने के पूर्व की जाने वाली बकरे की पूजा उसे कुपित करती है, उसी प्रकार दुरभिप्रायवश विजिगीषु द्वारा किये हुए सम्मान से भी शक्तिशाली शत्रु की क्रोधाग्नि पूर्व में अत्यधिक उद्दीप्त हो जाती है, अतः विजिगीषु को शक्तिशाली शत्रु का कपटपूर्ण सम्मान करके अपने को खतरे में नहीं डालना चाहिए ॥६७॥


समस्य समेन सह विग्रहे निश्चितं मरणं जये च सन्देहः, आमं हि पात्र-
मामेनाभिहतमुभयतः क्षयं करोति ॥६८॥

अर्थ: समान शक्ति वालों का परस्पर युद्ध होने से दोनों का मरण निश्चित और विजय प्राप्ति संदिग्ध रहती है, क्योंकि यदि कच्चे घड़े परस्पर एक दूसरे से ताड़ित किये जावें तो दोनों नष्ट हो जाते हैं ॥६८॥


ज्यायसा सह विग्रहो हस्तिना
पदातियुद्धमिव॥ ६९॥

अर्थ: जिस प्रकार पदाति (पैदल) सैनिक हाथी के साथ युद्ध करने से नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार हीन-शक्ति बाला विजिगीषु भी अपने से अधिक शक्तिशाली शत्रु के साथ युद्ध करने से नष्ट हो जाता है॥ ६९॥


स धर्मविजयी राजा यो विधेयमात्रेणैव सन्तुष्टः प्राणार्थमानेषु
न व्यभिचरति ॥७०॥

स लोभविजयी राजा यो द्रव्येण कृतप्रीतिः प्राणाभिमानेषु न
व्यभिचरति ॥७१॥

सोऽसुरविजयी यः। प्राणार्थमानोपघातेन महीमभिलषति ॥७२॥

अर्थ (सूत्र 70 से 72): जो राजा प्रजा पर नियत किये हुए टैक्स से ही सन्तुष्ट होकर उसके प्राण धन व मान की रक्षा करता हुआ अन्याय प्रवृत्ति नहीं करता-उसके प्राण व धनादि नष्ट नहीं करता, उसे “धर्म विजयी” और जो सिर्फ धन से ही प्रेम रखकर प्रजा के प्राण और मान मर्यादा की रक्षार्थ उसके अन्यायपूर्ण बर्ताव नहीं करता उसे “लोभ विजयी” एवं जो प्रजा के प्राण, धन और सम्मान का नाश पूर्वक शत्रु का वध करके उसकी भूमि चाहता है उसे ‘असुर विजयी’ कहते है ॥७०-७२॥


असुरविजयिनः संश्रयः सूनागारे मृगप्रवेशः इव ॥७३॥

अर्थ: जिस प्रकार चाण्डाल-गृह में प्रविष्ट हुए हिरण का वध होता है, उसी प्रकार असुरविजयी राजा के आश्रय से भी प्रजा का नाश होता है ॥७३॥


यादृशस्तादृशो वा यायिनः
स्थायी बलवान् यदि साधुचरः संचारः ॥७४॥

अर्थ: विजिगीषु जैसा-वैसा-दुर्बल व कोष-हीन क्यों न हो परन्तु यदि वह उत्तम कर्तव्य-परायण व वीर पुरुषों के सन्निधान से युक्त है तो उसे शत्रु की अपेक्षा बलिष्ठ समझना चाहिए ॥७४॥


चरणेषु पतितं भीतमशस्त्रं च हिंसन्
ब्रह्महा भवति ॥७५॥

अर्थ: जो व्यक्ति संग्राम भूमि में अपने पैरों पर पड़े हुए, भयभीत व शस्त्र-हीन (निहत्थे) शत्रु की हत्या करता है, वह ब्रह्मघाती है ॥७५॥


संग्रामधृतेषु यायिषु सत्कृत्य विसर्गः ॥७६॥

अर्थ: संग्राम-भूमि से भागने वाले शत्रु, जो विजिगीषु द्वारा पकड़ लिए गये हैं, उन्हें वस्त्रादि द्वारा सम्मानित करके छोड़ देना चाहिए ॥७६॥


स्थायिषु संसर्गः
सेनापत्यायतः ॥७७॥

अर्थ: स्थायी शत्रु भूत राजाओं की अन्य गिरफ्तार किये हुए बन्दी राजाओं के पास जाकर भेंट होने देना यह सेनापति के अधीन है। अर्थात् यदि वह कोई खतरा न समझे तो भेंट करने दे अन्यथा नहीं।


मतिनदीयं नाम सर्वेषां प्राणिनामुभयतो वहांत पापाय धर्माय च, तत्राद्य
स्रोतोऽतीव सुलभं दुर्लभं तद् द्वितीयमिति ॥७८॥

अर्थ: आश्चर्य है कि संसार में मनुष्य मात्र की बुद्धि रूपी नदी पाप व पुण्य दोनों तरफ बहा करती है। उनमें से उसका पहला पाप की ओर बहाव अत्यन्त सुलभ-सरलता से होने वाला और दूसरा धर्म की ओर बहाव महा कठिन है। सारांश यह है कि मनुष्य की बुद्धि नीति विरुद्ध व त्याज्य, असत्कार्यों-जुआ व मद्यपानादि पाप कार्य) में स्वतः प्रवृत्त होती हैं, परन्तु अहिंसा व सत्य आदि नैतिक शुभ कार्यों में लाखों प्रयत्न करने पर भी प्रवृत्त नहीं होती; इसलिए कल्याण की कामना करने वाले नैतिक पुरुष को अपनी बुद्धि अनीति व अनाचार से हटा कर नीति व सदाचार की ओर प्रेरित करने में प्रयत्नशील रहना चाहिए ॥७८॥


सत्येनापि शप्तव्यं
महतामभयप्रदानवचनमेव शपथः ॥७९॥

अर्थ: नैतिक मनुष्य को दूसरों के हृदय में अपना विश्वास उत्पन्न करने के लिए सच्ची शपथ-सौगंध (कसम) खानी चाहिए, झूठी नहीं, अभयदान देने वाले प्रामाणिक वचन बोलना ही महापुरुषों की सौगंध है, अन्य नहीं ॥७९॥


सतामसतां च वचनायत्ताः खलु
सर्वेव्यवहाराः स एव सर्वलोकमहनीयो यस्य वचनमन्यमनस्कतयाप्यायातं भवति
शासनं ॥८०॥

अर्थ: लोक में सत्पुरुष व असत्पुरुषों के सभी व्यवहार उनके द्वारा कहे हुए वचनों पर निर्भर होते हैं, इसलिए नैतिक व्यक्ति को अपने कहे हुए वचनों का पालन करना चाहिए। जिसके वचन मानसिक उपयोग के बिना भी कहे हुए लिखित स्टाम्प के समान प्रामाणिक-सच्चे होते हैं, वही पुरुष लोक में समस्त मनुष्यों द्वारा पूज्य होता है ॥८०॥


नयोदिता वाग्वदति सत्या ह्येषा सरस्वती ॥८१॥

अर्थ: शिष्ट पुरुषों द्वारा कही जाने वाली नैतिक वाणी साक्षात् सरस्वती के समान प्यारी प्रतीत होती है॥ ८१॥


व्यभिचारिवचनेषु नैहिकी पारलौकिकी वा क्रियास्ति॥ ८२॥

अर्थ: जो प्रामाणिक (सत्य) वचन नहीं बोलते, उनकी ऐहिक वा पारलौकिक क्रियाएँ (कर्त्तव्य) निष्फल होती हैं ॥८२॥


न विश्वासघातात परं पातक्रमस्ति॥ ८३॥

अर्थ: लोक में विश्वासघात से बढ़कर दूसरा कोई महान् पाप नहीं अतः शिष्ट पुरुष कदापि किसी के साथ विश्वासघात न करे ॥८३॥


विश्वासघातकः सर्वेषामविश्वासं करोति॥ ८४॥

अर्थ: विश्वासघाती अपने ऊपर सभी लोगों का अविश्वास उत्पन्न करता है अर्थात् उस पर कोई भी विश्वास नहीं करता ॥८४॥


असत्यसन्धिषु काशपानं जातान् हन्ति१॥ ८५॥

अर्थ: झूठी प्रतिज्ञा करने वालों द्वारा खाई जाने वाली झूठी सौगन्ध उनकी सन्तान-हानि कर डालती है॥ ८५॥


बलं बुद्धिर्भूमिर्गृहानुलोम्यं परोद्योगश्च प्रत्येकं बहुविकल्पं दण्डमण्डलाभोगा
संहतव्यूहरचनाया हेतवः ॥८६॥

अर्थ: अनेक प्रकार का सैन्य (हाथी व घोड़े आदि), बुद्धि, विजिगीषु के ग्रहों की अनुकूलता, शत्रु द्वारा की जाने वाली लड़ाई का उद्योग और सैन्य मंडल का विस्तार ये संगठित सैन्य व्यूह (विन्यास) की रचना के कारण हैं अर्थात् उक्त कारण सामग्री के सन्निधान से विजिगीषु द्वारा सैन्य व्यूह की रचना की जाती हैं॥८६॥


साधुरचितोऽपि व्यूहस्तावत्तिष्ठति यावन्न परबलदर्शनं ॥८७॥

अर्थ: अच्छी तरह से रचा हुआ सैन्य-व्यूह तब तक ठीक व स्थिर-शील रहता है, जब तक कि उसके द्वारा शत्रु-सैन्य दृष्टिगोचर नहीं हुआ। अभिप्राय यह है कि शत्रु-सेना दिखाई पड़ने पर विजिगीषु के वीर सैनिक अपना व्यूह छोड़ कर शत्रु, की सैन्य में प्रविष्ट होकर उससे भयंकर युद्ध करने भिड़ जाते हैं ॥८७॥ शुक्र¹ ने भी सैन्य की व्यूह रचना के विषय में इसी प्रकार का उल्लेख किया है ॥१॥


न हि शास्त्रशिक्षाक्रमेण योद्धव्यं किन्तु परप्रहाराभिप्रायेण ॥८८॥

अर्थ: विजिगीषु के वीर सैनिकों को युद्ध शास्त्र की शिक्षानुसार युद्ध न कर शत्रु द्वारा किए जाने वाले प्रहारों के अभिप्राय से उन्हें ध्यान में रखते हुए-युद्ध करना चाहिए ॥८८॥ शुक्र² ने भी लड़ाई करने का यही तरीका बताया है ॥१॥


अन्याभिमुखप्रयाणकमुपक्रम्यान्योपघातकरणं कूटयुद्धं ॥९०॥

अर्थ: दूसरे शत्रु पर चढ़ाई प्रकट करके वहाँ से अपना सैन्य लौटा कर युद्ध द्वारा जो अन्य शत्रु का घात किया जाता है उसे कूट युद्ध कहते हैं॥ ९०॥ शुक्र⁴ ने भी कूट युद्ध का इसी प्रकार लक्षण किया है ॥१॥


विषविषमपुरुषोपनिषद्वाग्योगोपजापैः परोपघातानुष्ठानं तूष्णीदण्डः ॥९१॥

अर्थ: विष-प्रदान, घातक पुरुषों को भेजना, एकान्त में चुपचाप स्वयं शत्रु के पास जाना व भेदनीति इन उपायों द्वारा जो शत्रु का घात किया जाता है, उसे “तूष्णी युद्ध, कहते हैं॥ ९१॥ गुरु⁵ ने भी उक्त उपायों द्वारा किए जाने वाले शत्रु, वध को तूष्णी युद्ध कहा है ॥१॥


एकं बलस्याधिकृतं न कुर्यात्, भेदापराधेनैकः समर्थो जनयति महान्तमनर्थं ॥९२॥

अर्थ: राजा किसी अकेले व्यक्ति को सैन्याधिकारी न बनाये, क्योंकि अकेला सैन्याधिकारी स्वेच्छाचारी और सेना के कारण राजा से भी अधिक शक्तिशाली होता है, इसलिए वह शत्रु द्वारा फोड़े जाने के अपराध-वश अपने स्वामी से प्रतिकूल होकर सेना की सहायता से किसी समय राजा का व राष्ट्र का महान् अनर्थ उत्पन्न कर सकता है ॥९२॥ भागुरि⁶ ने भी अकेले व्यक्ति को सेनाध्यक्ष बनाने से उक्त प्रकार की हानि बताई है ॥१॥


राजा राजकार्येषु मृतानां सन्ततिमपोषयन्नृणभागी स्यात् साधु नोपचर्यते तंत्रेण ॥९३॥

अर्थ: यदि राजा राजकीय कार्यों-युद्ध-आदि में मरे हुए सैनिक-आदि सेवकों की सन्तति-पुत्र-पौत्रादि का पालन-पोषण नहीं करता, तो वह उनका ऋणी रहता है और ऐसा अनर्थ करने से प्रतिकूल हुए मंत्री-आदि प्रकृतिवर्ग भी उसकी भली-भांति सेवा नहीं करते। अतएव राजा को राजकीय कार्य में निर्धनता को प्राप्त हुए सेवकों की सन्तति का पालन-पोषण करना चाहिए ॥६३॥


स्वामिनः पुरः सरणं युद्धेऽश्वमेधसमं ॥९४॥

अर्थ: लड़ाई में अपने स्वामी से आगे जाकर शत्रु से युद्ध करने वाले वीर सैनिक को अश्वमेध यज्ञ समान फल मिलता है।


युधि स्वामिनं परित्यजतो नास्तीहामुत्र च कुशलं ॥९५॥

अर्थ: करने से उसकी इस लोक में अपकीर्ति व परलोक में दुर्गति होती है ॥६५॥


विग्रहायोच्चलितस्यार्द्धं बलं सर्वदा सन्नद्धमासीत्, सेनापतिः प्रयाणमावासं च कुर्वीत चतुर्दिशमनीकान्यदूरेण संचरेयुस्तिष्ठेयुश्च ॥९६॥

अर्थ: जब विजिगीषु, शत्रु से युद्ध करने के लिए प्रस्थान करे, उस समय उसका सेनाध्यक्ष आधी फौज सदा तैयार-शस्त्रादिक से सुसज्जित रखे, इसके पश्चात् ही विजिगीषु शत्रु पर चढ़ाई करे और जब वह शत्रु-सैन्य के आवास (निवास-स्थान) की ओर प्रस्थान करने में प्रयत्नशील होवे, तब उसके समीप चारों तरफ फौज का पहरा रहे एवं उसके पीछे डेरे में भी फौज मौजूद रहनी चाहिए। इसका कारण यह है कि विजिगीषु कितना ही शक्तिशाली हो, परन्तु वह चढ़ाई के समय व्याकुल हो जाता है और शूरवीर लोग उस पर प्रहार कर देते हैं॥९६॥


धूमाग्निरजोविषाणध्वनिव्याजैनाटविकाः प्रणधयः परबलान्यागच्छन्ति निवेदयेयुः ॥९७॥

अर्थ: जब विजिगीषु दूरवर्ती हो और शत्रु की फौज उसकी ओर आ रही हो, ऐसे अवसर पर जंगल में रहने वाले उसके गुप्तचरों को चाहिए कि वे धुंआ करने, आग जलाने, धूल उड़ाने, अथवा भैंसे के सींग फूँकने का शब्द करने के बहाने उसे शत्रु की फौज आने का बोध करावें ताकि उनका स्वामी सावधान हो जावे॥ ६७॥


पुरुषप्रमाणोत्सेधमबहुजनविनिवेशनाचरणापसरणयुक्तमग्रतो महामण्डपावकाशं च तदंगमध्यास्य सर्वदा स्थानं दद्यात् ॥९८॥

सर्वसाधारणभूमिकं तिष्ठतो नास्ति शरीररक्षा॥ ९९॥

अर्थ (सूत्र 98 से 99): विजिगीषु शत्रु के देश में पहुँच कर अपनी फौज का पड़ाव ऐसे स्थान में डाले जो कि मनुष्य की ऊँचाई माफक ऊँचा हो, जिसमें थोड़े आदमियों का प्रवेश, घूमना तथा निकास हो जिसके आगे विशाल सभामंडपके लिए पर्याप्त स्थान हो, उसके मध्य में स्वयं ठहर कर उसमें अपनी सेना को ठहरावे। सर्वसाधारण के आने-जाने योग्य स्थान में सैन्य का पड़ाव डालने व स्वयं ठहरने से विजिगीषु अपनी प्राण-रक्षा नहीं कर सकता॥ ६८॥


भूचरो दोलाचरस्तुरंगचरो वा न कदाचित् परभूमौ प्रविशेत् ॥१००॥

अर्थ: विजिगीषु पैदल, पालकी अथवा घोड़े पर चढ़ा हुआ शत्रु की भूमि में प्रविष्ट न होवे, क्योंकि ऐसा करने से जब उसे अचानक शत्रु-कृत उपद्रवों का भय प्राप्त होगा, तब वह उनसे अपनी रक्षा नहीं कर सकता ॥१००॥


करिणं जंपाणं वाप्यध्यासीने न प्रभवन्ति क्षुद्रोपद्रवाः ॥१०१॥

अर्थ: जब विजिगीषु हाथी अथवा जंपान (वाहन विशेष) पर आरूढ़ हुआ शत्रु-भूमि में प्रविष्ट होता है, तो उसे क्षुद्र उपद्रवों-शत्रु द्वारा मारा जाना आदि का भय नहीं होता ॥१०१॥

(३१) विवाह-समुद्देशः

द्वादशवर्षा स्त्री षोडशवर्षाः पुमान् प्राप्तव्यवहारौ भवतः ॥१॥

विवाहपूर्वो व्यवहारश्चातुर्वर्ण्यं कुलीनयति॥ २॥

अर्थ (सूत्र 1 से 2): १२ वर्ष की स्त्री और १६ वर्ष का पुरुष ये दोनों कामसेवन की योग्यता वाले होते हैं ॥१॥ विवाह पूर्वक किये जाने वाले कामसेवन से चारों वर्ण की सन्तान में कुलीनता उत्पन्न होती है ॥२॥


युक्तितो वरणविधानमग्निदेव-द्विजसाक्षिकं च पाणिग्रहणं विवाहः॥ ३॥

स ब्राह्मयो विवाहो यत्र वरायालंकृत्य कन्या प्रदीयते ॥४॥

अर्थ (सूत्र 3 से 4): युक्ति से कन्या का वरण निश्चय करके अग्नि देव व ब्राह्मण की साक्षी पूर्वक वर द्वारा कन्या का जो पाणिग्रहण किया जाता है उसे विवाह कहते हैं॥ ३॥ विवाह के आठ भेद हैं-ब्राह्मय, दैव आर्ष, प्राजापत्य, गान्धर्व, आसुर पैशाच और राक्षस विवाह। उनमें से जिसमें कन्या के पिता आदि संरक्षक अपनी शक्ति-अनुसार कन्या को वस्त्राभूषणों से अलंकृत करके वर के लिए कन्या प्रदान करते हैं, वह ब्राह्मय विवाह है॥ ४०॥


स देवो यत्र यज्ञार्थमृत्विजः कन्याप्रदानमेव दक्षिणा ॥५॥

अर्थ: जिसमें यज्ञ (हवन आदि) कर्ता के लिए यज्ञ के निमित्त संरक्षकों द्वारा दक्षिणारूप में कन्या दी


गोमिथुनपुरःसरं कन्यादानादार्षः ॥६॥

“त्वं भवास्य महाभागस्य सहधर्मचार-
णीति” विनियोगेन कन्याप्रदानात् प्राजापत्यः एते चत्वारो धर्म्या विवाहाः॥८॥

अर्थ (सूत्र 5 से 8): जाती है, वह ‘दैव विवाह’ है ॥५॥ जिसमें गौ मिथुन (गाय बैल का जोड़ा) आदि दहेज देकर कन्या दी जाती है, वह “आर्ष विवाह” कहते हैं॥ ६॥ गुरु१ व किसी विद्वान्२ ने भी ‘दैव और आर्ष विवाह’ के उक्त प्रकार लक्षण किये हैं ॥१-२॥ “तू इस महाभाग्यशाली की सधर्मचारिणी (व्यवहार धर्म में सहायता पहुँचाने वाली धर्म पत्नी)हो, इस प्रकार नियोग करके जहाँ पर कन्या प्रदान की जाती है, वह “प्राजापत्य विवाह है ॥७॥ गुरु३ ने धनिक पुरुष द्वारा धनिक के लिए अपनी कन्या दी जाने को ‘प्राजापत्य विवाह’ माना है ॥१॥ ये पूर्वोक्त चारों विवाह धर्मरूप-न्याय-संगत (श्रेष्ठ) हैं ॥८॥


मातुः पितुर्बन्धूनां चाप्रामाण्यात् परस्परानुरागेण मिथः समवायाद्गान्धर्वः ॥९॥

अर्थ: जिसमें वर कन्या अपने माता-पिता व बन्धुजनों को प्रमाण न मान कर (उनकी उपेक्षा करके) पारस्परिक प्रेम-वश आपस में मिल जाते हैं-दाम्पत्य प्रेम कर लेते हैं वह गान्धर्व विवाह है ॥६॥ जिसमें कन्या के संरक्षक (पिता आदि) लोभवश वर पक्ष से धनादि ले कर अयोग्य वर के लिए कन्या प्रदान करते हैं उसे ‘आसुर विवाह’ कहते हैं ॥१०॥ जिसमें सोती हुई व बेहोश कन्या का अपहरण किया जाता है, वह ‘पैशाच विवाह’ है ॥११॥ जिसमें कन्या बलात्कार पूर्वक (जबरदस्ती) ले जाई जाती है या अपहरण की जाती है, वह ‘राक्षस विवाह’ है ॥१२॥ गुरु१ ने भी उक्त गांधर्व आदि विवाहों के लक्षण निर्देश किये हैं ॥१॥ यदि वर-वधू का दाम्पत्यप्रेम निर्दोष है तो उक्त चारों विवाह जघन्य श्रेणी के होने पर भी उन्हें अन्याय-युक्त नहीं कहा जा सकता ॥१३॥ यदि कन्या में निम्न लिखित दूषण वर्तमान हों, तो उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिए। जिसकी आँखों की तारकायें उठी हुई व जंघाओं में रोम वर्तमान हो एवं उरु भाग अधिक पतला तथा कमर, नाभि, उदर और कुच कलश भद्दे हों। जिसकी भुजाओं में अधिक नसें दृष्टिगोचर हों और उसका आकार भी अशुभ प्रतीत हो। जिसके तालु, जिह्वा व ओष्ठ हरड़ समान काले हों व दाँत विरले और विषम (छोटे बड़े) हों। जिसका गालों में गड्ढे, आँखें पीली बंदर समान रंग वाली हों। जिसकी दोनों भृकुटियाँ जुड़ी हुई, मस्तक जिसका ऊँचा-नीचा और श्रोत्रों को आकृति भद्दी एवं केश, मोटे, भूरे व रूक्ष हों। जो बहुत बड़ी व छोटी हो। जिसके कमर के पार्श्वभाग सम हो जो कुबड़ी बौनी व भीलों के समान अङ्गों वाली हो। जो वर के बराबर आयु वाली या उससे बड़ी हो, जो वर के यहाँ से आये हुए दूत के समक्ष एकान्त में प्रकट होती हो। इसी प्रकार बीमार, रोती हुई, पति का घात करने वाली, सोती हुई, क्षीण आयु वाली, अप्रसन्न, दुःखी, बाहर निकली हुई (मर्यादा में न रहने वाली) व्यभिचारिणी, कलह-प्रिय, कुटुम्बियों को उजाड़ने वाली, कुरूप व जिसका भाग्य फूटा हो ॥१४॥


पणबन्धेन कन्याप्रदानादासुरः ॥१०॥


सुप्तप्रमत्तकन्यादानात्पैशाचः ॥११॥


कन्यायाः प्रसह्यादानाद्राक्षसः ॥१२॥


एते चत्वारोऽधमा अपि नाधर्म्या यद्यस्ति वधूवरयोरनपवादं परस्परस्य भाव्यत्वं ॥१३॥


उन्नतत्वं कनीनिकयोः, लोभशत्वं जंघयोरमांस-
लत्वमूर्वोरचारुत्वं कटिनाभिजठरकुचयुगलेषु, शिरालुत्वमशुभ संस्थानत्वंच बाह्वोः,
कृष्णत्वं तालुजिह्वाधरहरीतकीषु, विरलविषमभावो दशनेषु, कूपत्वं कपोलयोः,
पिंगलत्वमश्म्रोर्लग्नत्वंपि (चि) ल्लिकयोः, स्थपुटत्वं ललाटे, दुःसन्निवेशत्वं
श्रवणयोः, स्थूलकपिलपरुषभावः केशेषु, अतिदीर्घाति-लघुन्यूनाधिकता
समकटकुब्जवामनकिराताङ्ग त्वं जन्मदेहाभ्यां समानताधिकत्वं चेति कन्यादोषाः
सहसा तद्गृहे स्वयं दूतस्य चागतस्याग्रे अभ्यक्ता व्याधिमती रुदती पतिघ्नी सुप्ता
स्तोकायुष्का बहिर्गता कुलटाऽप्रसन्ना दुःखिता कलहोद्यता परिजनोद्वासिन्यप्रियदर्शना
दुर्भगेति नैतां वृणीति कन्याम् ॥१४॥


शिथिले पाणिग्रहणे वरः कन्यया परिभूयते ॥१५॥

मुखमपश्यतो
वरस्यानमीलितलोचना कन्या भवति प्रचण्डा ॥१६॥

अर्थ (सूत्र 15 से 16): वर-कन्या का पाणिग्रहण शिथिल हो जाने से कन्या द्वारा वर तिरस्कृत किया जाता है ॥१५॥ जब वर लज्जा के कारण अपनी नव वधू के मुख की ओर दृष्टिपात नहीं करे और वधू अपने नेत्र उघाड़ती हुई टकटकी लगाकर उसके मुखकमल की ओर सतृष्ण दृष्टि से देखती रहे, तब वह प्रचण्ड (बेशर्म) हो जाती है ॥१६॥


सह शयने तूष्णीं भवन्
पशुवन्मन्येत ॥१७॥

अर्थ: नारद२ व जैमिनि३ ने भी पाणिग्रहण की शिथिलता एवं नव वधू की प्रचण्डता के विषय में यही बताया है ॥१॥ जो वर अपनी नवा (नई) वधू के साथ एक स्थान में शयन करता हुआ लज्जा वश चुपचाप रहता है। अपना कर्तव्य पालन-(चतुरता पूर्वक संलाप, हास्यादि) पतिधर्म का पालन नहीं करता) उसे वह पशु समान मूर्ख समझती है ॥१७॥


बलादाक्रान्ता जन्मविद्वेष्यो भवति ॥१८॥

धैर्यचातुर्यायत्तं हि कन्याविस्त्रम्भणं ॥१९॥

समविभवाभिजनयोरसमगोत्रयोश्च
विवाहसम्बन्धः ॥२०॥

महतः पितुरैश्वर्यादल्पमवगणयति ॥२१॥

अल्पस्य कन्या,
पितुर्दोर्बल्यान् महतावज्ञायते ॥२२॥

अल्पस्य महता सह संव्यवहारे महान्
व्ययोऽल्पश्चायः॥ २३॥

अर्थ (सूत्र 18 से 23): यदि वर अपनी नई वधू के साथ जबर्दस्ती काम-क्रीड़ा करने तत्पर होता है, तो उसकी वधू जन्मपर्यन्त उससे द्वेष करती रहती है ॥१८॥ क्योंकि नवा वधू द्वारा प्राप्त होने वाला प्रणय (प्रेम) वर की धीरता व चतुराई के अधीन होता है। सारांश यह है कि यदि वर धीरता व चतुरता से अपनी नवा वधू के साथ प्रेम-पूर्ण दान-मानादि का बर्ताव करता है, तो उसे उसका प्रणय मिलता है, अन्यथा नहीं॥ १९॥ समान ऐश्वर्य व कुटुम्ब-युक्त तथा विषम (भिन्न) गोत्र वाले वर-कन्‍याओं में विवाह सम्बन्ध माना गया है ॥२०॥ क्योंकि ऐसा न होने पर जब धनाढ्य की कन्या दरिद्र वर प्राप्त करती है, तब वह अपने पिता के ऐश्वर्य से उन्मत्त होकर अपने दरिद्र पति को नीचा गिनने लगती है। यदि निर्धन की कन्या धनाढ्य वर के साथ ब्याही जाती है, तो वह अपने पिता की दुर्बलता के कारण अपने धनाढ्य पति द्वारा तिरस्कृत की जाती हैं ॥२१-२२॥ जब छोटा (साधारण पैसे वाला) बड़े (धनाढ्य) के साथ विवाह सम्बन्ध आदि व्यवहार करता है, तो उसमें उसका ज्यादा खर्च व आमदनी थोड़ी होती है ॥२३॥ किसी प्रकार वेश्या का अङ्गीकार करना अच्छा है, परन्तु अशुद्ध (व्यभिचारिणी या असञ्जातीय) कन्या के साथ विवाह करना उचित नहीं, क्योंकि इससे भविष्य में असञ्जाति सन्तान उत्पन्न होने के कारण उसका मोक्षमार्ग बंद हो जाता है॥ २४॥ कन्या का पैदा होते ही मर जाना अच्छा है, परन्तु उसका नीच कुल वाले वर के साथ विवाह करना अथवा उसका नीच कुल में पैदा होना अच्छा नहीं॥ २५॥


वरं वेश्यायाः परिग्रहो नाविशुद्धकन्याया परिग्रहः ॥२४॥


वरं जन्मनाशः कन्यायाः नाकुलीनेष्ववक्षेपः१॥ २५॥


सम्यग्व्यवृत्ता कन्या तावत्सन्देहास्पदं यावन्न पाणिग्रहः ॥२६॥

विक्रुतप्रत्यूढोऽपि
पुनर्विवाहमर्हतीति स्मृतिकाराः ॥२७॥

आनुलोम्येन चतुस्त्रिद्विवर्णाः
कन्याभाजनाः ब्राह्मणक्षत्रियविशः ॥२८॥

देशापेक्षो मातुलसंबन्धः ॥२९॥

अर्थ (सूत्र 26 से 29): जब तक कन्या का विवाह-संस्कार नहीं होता, तब तक वह सन्देह का स्थान होती है, चाहे वह सदाचारिणी हो ॥२६॥ जिसकी पहले सगाई की जा चुकी थी ऐसी कन्या का वर यदि विक्रुत- लूला लंगड़ा या काल-कवलित-हो गया हो, तो उसका पुनर्विवाह-अन्य वर के साथ विवाह करना योग्य है ऐसा स्मृतिकार मानते हैं॥ २७॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अनुलोम (क्रम) से चारों तीनों व दोनों वर्ण की कन्याओं से विवाह करने के पात्र हैं अर्थात् ब्राह्मण चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य व शूद्र) की और क्षत्रिय तीनों वर्ण (क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र) की एवं वैश्य दोनों वर्ण (वैश्य व शूद्र) की कन्याओं के साथ विवाह कर सकता है॥ २८॥ मामा का विवाह आदि सम्बन्ध देश व कुल की अपेक्षा से योग्य समझा जाता है। अर्थात्-जिस देश व कुल में मामा की पुत्री का सम्बन्ध प्रचलित है, वहाँ उसे योग्य माना जाता है, सर्वत्र नहीं ॥२९॥ धर्मपरम्परा का अक्षुण्ण चलते रहना अथवा धार्मिक सज्जाति सन्तान का लाभ होना, कामोपभोग में बाधा न आना, गृह व्यवस्था का सुचारु रूप से संचालन, कुलीनता व आचार-शुद्धि, देव, ब्राह्मण अतिथि और बंधुजनों का निर्दोष सम्मान उक्त प्रकार के लाभ धर्मपत्नी द्वारा सम्पन्न होते हैं ॥३०॥ जहाँ पर स्त्री वर्तमान है, उसे ‘गृह’ कहा जाता है न कि केवल लकड़ी पाषाण व मिट्टी के संघात से बने हुए गृह को ॥३१॥ कुलवधुओं की रक्षा के निम्न उपाय हैं-१. गृह के काम धन्धों में निरन्तर लगाये रखना, २. उसे खर्च के लिए सीमित (थोड़ा) धन देना, ३. स्वच्छन्द न होने देना-सन्तान-संरक्षण-आदि उत्तरदायित्व पूर्ण कार्यों में स्वतंत्रता देते हुए भी अपने अधीन रखना, ४. नीति एवं सदाचार की शिक्षा देना और माता के समान चिह्न वाले स्त्रीजनों द्वारा रोक रखना-अन्यत्र न जाने देना (उसकी चौकसी रखना) ॥३२॥ वेश्याएँ धोबी की शिला, कुत्तों के खप्पर समान सर्व साधारण व घृणास्पद होती हैं, उनमें कौन कुलीन पुरुष अनुराग करेगा ? कोई नहीं ॥३३॥ वेश्याओं के निम्न प्रकार कुलपरम्परा से चले आने वाले कार्य हैं- १. दान करने में उनका भाग्य फूटा रहता है-जो कभी भी दान करना नहीं जानती, २. अनुरक्त पुरुषों द्वारा सम्मानित होने पर भी दूसरे पुरुषों से काम सेवन कराना, ३. आसक्त पुरुषों का तिरस्कार वा घात करना, ४. अनुरक्त पुरुषों द्वारा महान् उपकार किये जाने पर भी उनके प्रति अपनापन प्रकट न करना एवं ५. अनुरक्त पुरुषों के साथ बहुत समय तक प्रेम सम्बन्ध रहने पर भी उनके द्वारा छोड़ दी जाने पर अन्य पुरुषों से रति कराना ॥३४॥


धर्मसन्ततिरनुपहता रतिर्गृहवार्तासुविहितत्वमाभिजात्याचारविशुद्धिर्देव-
द्विजातिथिबान्धवसत्कारानवद्यत्वं च दारकर्मणः फलं ॥३०॥


गृहिणी गृहमुच्यते
न पुनः कुड्यकटसंघातः ॥३१॥


गृहकर्मविनियोगः परिमितार्थत्वमस्वातंत्र्यं
सदाचारः मातृव्यंजनस्त्रीजनावरोध इति कुलबधूनां रक्षणोपायः ॥३२॥


रजकशिलाकुर्कुरखरपरसमा हि वेश्याः कस्तास्वभिजातोऽभिरज्येत ॥३३॥


दानैर्दौर्भाग्यं सत्कृतौ परोपभोग्यत्वं आसक्तौ परिभवो मरणं वा
महोपकारेप्यनात्मीयत्वं बहुकालसंबन्धेऽपि त्यक्तानां तदेव पुरुषान्तरगामित्वमिति
वेश्यानां कुलागतो धर्मः ॥३४॥

(३२) प्रकीर्णक-समुद्देशः

समुद्र इव प्रकीर्णकसूक्तरत्नविन्यासनिबन्धनं प्रकीर्णकं ॥१॥

अर्थ: जो समुद्र के समान फै ले हुए सुभाषित-रूप रत्नों की रचना का स्थान है, उसे ‘प्रकीर्णक’ कहते हैं। अर्थात् जिस प्रकार समुद्र में फैली हुई प्रचुर रत्नराशि वर्तमान होती है, उसी प्रकार प्रकीर्णक काव्य समुद्र में भी फैली हुई सुभाषित रत्न राशि पाई जाती है ॥१॥


वर्णपदवाक्यप्रमाणप्रयोगनिष्णातमतिः सुमुखः सुव्यक्तो मधुरगम्भीरध्वनिः
प्रगल्भः प्रतिभावान् सम्यगूहपोहावधारणगमकशक्तिसम्पन्नः संप्रज्ञातसमस्त-
लिपि भाषावर्णाश्रमसमयस्वपरव्यवहारस्थितिराशुलेखनवाचन समर्थश्चेति
सन्धिविग्रहिकगुणाः ॥२॥

अर्थ: वर्ण पद, वाक्य और तर्कशास्त्र इन विषयों में परिपक्व है बुद्धि जिसकी, स्पष्ट व सार्थक बोलने वाला, मधुर व गम्भीर है वाणी जिसकी, चतुर, प्रतिभाशाली (तेजस्वी), अपने हृदय में योग्य-अयोग्य के ज्ञान को धारण करने की शक्ति से सम्पन्न, समस्त देशों की लिपि, भाषा तथा चार वर्ण (ब्राह्मणादिक) व चार आश्रमों (ब्रह्मचारी आदि) के शास्त्र का वेत्ता, सम्पूर्ण स्व और पर का व्यवहार का जानकार तथा शीघ्र लिखने व बाँचने की कला में प्रवीण ये राजा के गुण हैं। अर्थात् उक्त गुणों से अलंकृत पुरुष राजा होने लायक है ॥२॥


कथाव्यवच्छेदो व्याकुलत्वं मुखे वैरस्यमनवेक्षणं-
स्थानत्यागः साध्वाचरितेपि दोषोद्भावनं विज्ञप्तेच मौनमक्षमाकालयापनमदर्शनं
वृथाभ्युपगमश्चेति विरक्तलिङ्गानि ॥३॥

अर्थ: जो कथा को ध्यान पूर्वक न सुने व उसे सुनता हुआ भी व्याकुल हो जाय, जिसकी मुखाकृति उस समय म्लान हो जाय, बात कही जाने पर जो वक्ता के सामने दृष्टिपात न करे, जिस स्थान पर बैठा हो वहाँ से उठकर दूसरी जगह चला जाय वक्ता द्वारा अच्छे कार्य किये जाने पर भी उसे दोषी बतावे, समझाने पर भी जो मौन धारण कर ले कुछ भी उत्तर न देवे, जो स्वयं क्षमा (वक्ता की बात को सहन करने की शक्ति) न होने के कारण अपना काल क्षेप करता हो-निरर्थक समय बिताता हो, जो वक्ता को अपना मुख न दिखावे और अपने वायदा को झूठा करता हो ये कथा से या अपने से विरक्त रहने वाले मनुष्य के चिह्न हैं अर्थात् उक्त चिह्नों से विरक्त की परीक्षा करनी चाहिए ॥३॥


दूरादवेक्षणं, मुखप्रसादः संप्रश्नेष्वादरः
प्रियेषु वस्तुषुस्मरणं, परोक्षे गुणग्रहणं तत्परिवारस्य सदानुवृत्तिरित्यनुरक्त-लिंगानि
॥४॥

अर्थ: अपने को दूर से आता हुआ देखकर जिसका मुख कमल विकसित हो जाय कुछ प्रश्न किये जाने पर जो अपना सम्मान करे अपने द्वारा पूर्व में की हुई अभीष्ट वस्तुओं (उपकार आदि) का स्मरण करने वाला (कृतज्ञ) परोक्ष में गुणकीर्तन करने वाला व अपने (मित्र के) परिवार से सदा स्नेह-वृत्ति धारण करने बाला ये अपने से अनुरक्त (अनुराग करने वाले) पुरुष के चिह्न हैं। अर्थात् नैतिक पुरुष उक्त लक्षणों से युक्त पुरुष को अपने में अनुरक्त समझे ॥४॥


श्रुतिसुखत्वमपूर्वाविरुद्धार्थातिशययुक्तत्वमुभयालंकार-
सम्पन्नत्वमन्यूनाधिकवचनत्व-मतिव्यक्तान्यत्वमिति काव्यस्य गुणाः ॥५॥

अर्थ: श्रवण करने से श्रोत्रेन्द्रिय को प्रिय लगने वाला अपूर्व (नवीन) व विरोधादि दोष शून्य (निर्दोष) अर्थ का निरूपण करने के कारण अतिशय युक्त (श्रेष्ठ) शब्दालङ्कार-अनुप्रास आदि और अर्थालंकार (उपमा उत्प्रेक्षा-प्रभृति) से व्याप्त, हीनाधिक वचनों से रहित और जिसका अन्वय अति स्पष्ट हो-जो दूरान्वयी न हो ये काव्य के गुण हैं। अर्थात् उक्त गुण-युक्त काव्य उत्तम माना गया है॥ ५॥


अतिपरुषवचनविन्यासत्वमनन्वितगतार्थत्वंदुर्बोधानुपपन्नपदोपन्यासमयाथार्थ्यतिविन्या-
सत्वमभिधानाभिधेयशून्यत्वमिति काव्यस्य दोषाः ॥६॥

अर्थ: जिसमें श्रुति-कटु वचन (श्रोत्र को अप्रिय लगने वाले कठोर) पदों की रचना व अप्रसंगत अर्थ पाया जावे, दुर्बोध (कठिन) एवं अयोग्य शब्दों की रचना से युक्त, छन्द-भ्रष्ट होने के कारण जिसमें यथार्थ यतिविन्यास (विश्रान्त की रचना) न हो, जिसकी पद-रचना कोषविरुद्ध हो, जिसमें स्वरुचिकल्पित (मन गढन्त) ग्राम्य (असभ्य) पद रचना वर्तमान हो, ये काव्य के दोष हैं।


वचनकविरर्थकविरु
भयकविश्चित्रकविर्वर्णकविर्दुष्करकविररोचकीसतृषाभ्यवहारी चेत्यष्टौ
कवयः ॥७॥

अर्थ: कवि आठ प्रकार के होते हैं-१. वचन कवि जो आचार्य श्री वीरनन्दी कालिदास आदि के समान ललित पदों द्वारा काव्य रचना करता हो, २. अर्थकवि जो महाकवि हरिचन्द्र व भारवि कवि समान गूढ़ार्थ वाले काव्य का रचयिता हो, ३. उभय कवि जो भगवज्जिनसेनाचार्य या माघ कवि समान ललित शब्द युक्त और गूढ़ार्थ युक्त काव्य माला का गुम्फन करता हो, ४. चित्र कवि (चित्रांलकारयुक्त काव्य रचयिता), ५. वर्ण कवि (शब्दाडम्बर युक्त) काव्य बनाने वाला, ६. दुष्करि कवि -चाणक्य आदि कवियों के समान अत्यन्त कठिन शब्द कुसुमों द्वारा काव्य माला गुम्फित करने वाला, ७. अरोचकी जिसकी काव्य रचना रुचिकर न हो और ८. सम्मुखाभ्यवहारी-श्रोताओं के समक्ष तत्काल काव्य रचना करने वाला ॥७॥


मनःप्रसादः कलासुकौशलं सुखेन चतुर्वर्गविषयाव्युत्पत्तिरासंसार च
यश इति कविसंग्रहस्य फलं ॥८॥

अर्थ: मानसिक प्रसन्नता, ललित कलाओं (पद्य रचना की कला आदि) में चातुर्य, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पुरुषार्थों का सरलता से सम्यग्ज्ञान होना, एवं उमास्वामी आचार्य व व्यास आदि के समान संसार पर्यन्त स्थायी कीर्ति रहना इतनी चीजों का लाभ कवि होने से होता है॥ ८॥


आलप्तिशुद्धिर्माधुर्यातिशयः
प्रयोगसौन्दर्यमतीवमसृणतास्थानकम्पितकुहरितादिभावो रागान्तरसंक्रान्तिः
परिगृहीतरागनिर्वाहो हृदयग्राहिता चेति गीतस्य गुणाः ॥९॥

अर्थ: षड्ज, ऋषभ गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद, (सा, रे, ग, मा, पा, धा, नी,) इन सातों स्वरों का आलाप शुद्ध (एक स्वर में दूसरे स्वर का सांकर्य-सम्मिश्रण न होना) हो श्रोत्रेन्द्रिय को अत्यन्त प्रिय मालूम हो, (जिसमें अत्यन्त मिठास हो) सुकोमल पद रचना-युक्त अथवा अभिनय (नाट्य) क्रिया में निपुणता का दर्शक हो, जिसके पदोच्चारण में घनाई हो, जिसमें त्रिमात्रा वाले षड्ज व ऋषभ आदि स्वरों का विस्तार (आरोहीपन) व संकोच (अवरोहीपन) वर्तमान हो, जिसमें एक राग से दूसरे राग का संक्रमण वर्तमान हो अथवा राग-वेध पाया जावे, जिस राग में गीत प्रारम्भ किया गया हो उसी राग में उसका निर्वाह (समाप्ति) हो एवं जिसे सुनकर हृदय फड़क (अत्यन्त आल्हादित) उठे ये गायन के गुण हैं ॥६॥


समस्वं
तालानुयायित्वं गेयाभिनेयानुगतत्वं श्लक्ष्णत्वं प्रव्यक्तयतिप्रयोगत्वं
श्रुतिसुखावहत्वं चेति वाद्यगुणाः ॥१०॥

अर्थ: कर्कशता-शून्य, पाँच प्रकार का ताल तथा व गीत व नृत्य के अनुकूल बजने वाला, वाद्य (बाजे) सम्बन्धी दोषों से रहित (निर्दोष) जिसमें यति (विश्रान्ति) यथोचित व प्रकट रीति से पाई जावे एवं जिनके सुनने से श्रोत्रेन्द्रिय को सुख प्रतीत हो, ये बाजे के गुण हैं ॥१०॥


दृष्टिहस्तपादक्रियासु समसमायोगः
संगीतकानुगतत्वं सुश्लिष्टललिताभिनयांगहारप्रयोगभावो
रसभाववृत्तिलावण्यभाव इति नृत्यगुणाः ॥११॥

अर्थ: जिसमें नेत्र, हाथ व पैरों की संचालन क्रिया का एक काल में मिलाप गाने व बजाने के अनुकूल एवं यथोचित पाया जावे संगीत (गाने बजाने) का अनुसरण करने वाला, जिसमें गायनाचार्य द्वारा सूचित किये हुए सघन और ललित अभिनय (नृत्य) द्वारा अङ्ग-संचालन अभिव्यक्त किया गया हो तथा शृङ्गार आदि नवरस और आलम्बन भाव व उद्दीपन भावों के प्रदर्शन से जिसमें दर्शकों को लावण्य प्रतीत हो, ये नृत्य के गुण हैं अर्थात् उक्त गुणों वाला नृत्य श्रेष्ठ माना गया है ॥११॥


स महान् यः खल्वार्तोऽपि न दुर्वचनं ब्रूते ॥१२॥

अर्थ: जो शिष्ट पुरुष दुःखी होने पर भी किसी के सामने दुर्वचन (कटु शब्द) नहीं कहता, वही महापुरुष है ॥१२॥


स किं गृहाश्रमी यत्रागत्यार्थिनो न भवन्ति कृतार्थाः ॥१३॥

अर्थ: जिसके पास आकर याचक लोग कृतार्थ (संतुष्ट) नहीं होते, वह गृहस्थ निन्द्य हैं ॥१३॥


ऋणग्रहणेन धर्मः सुखं सेवा वणिज्या च तादात्विकानां नायतोहितवृत्तीनां ॥१४॥

अर्थ: तत्कालीन क्षणिक सुख चाहने वाले पुरुष धनाढ्यों से ऋण लेकर उस धन से दान-पुण्यादि धर्म, सांसारिक सुखों (विवाह आदि) का उपभोग और राजा का सम्मान एवं व्यापार करते हैं, परन्तु भविष्य में स्थायी सुख चाहने वाले नहीं ॥१४॥


स्वस्य विद्यमानमर्थिभ्यो देयं नाविद्यमानं ॥१५॥

अर्थ: दाता याचकों के लिए अपने मौजूद धनादि वस्तु देवें, गैरमौजूद नहीं अर्थात् उसे कर्जा लेकर दान नहीं करना चाहिए ॥१५॥


ऋणदातुरासन्नं फलं परोपास्तिः
कलहः परिभवः प्रस्तावेऽर्थलाभश्च ॥१६॥

अर्थ: कर्जा देने वाले धनाढ्य पुरुष को निम्न प्रकार कटुफल भोगने पड़ते हैं। १. सबसे पहला निकट फल परोपास्ति (ऋण लेने वाले की सेवा-सुश्रूषा करना), २. कलह (धन-प्राप्ति न होने से कर्जा लेने वाले के साथ लड़ाई झगड़ा होना), ३. तिरस्कार (ऋण लेने वाले के द्वारा अपमानित होना), ४. अवसर पड़ने पर धन न मिलना। निष्कर्ष-किसी को ऋण रूप में धन देना उचित नहीं ॥१६॥


अदातुस्तावत्स्नेहः सौजन्यं
प्रियभाषणं वा साधुता च यावन्नार्थावाप्तिः ॥१७॥

अर्थ: धनाढ्य के साथ तभी तक स्नेह, प्रिय भाषण व सज्जनता प्रकट करता है, जब तक कि उसे उससे धन-प्राप्ति नहीं हुई अर्थात् धन प्राप्त हो जाने पर वह उसके साथ उक्त शिष्ट व्यवहार (स्नेहादिक) नहीं करता ॥१७॥


तदसत्यमपि नासत्यं यत्र न
सम्भाव्यार्थहानिः ॥१८॥

अर्थ: वह वचन असत्य होने पर भी असत्य नहीं माना जा सकता, जिससे सम्भावना किये हुए इष्ट


प्राणवधे नास्ति कश्चिदसत्यवादः ॥१९॥

अर्थ (सूत्र 18 से 19): प्रयोजन (प्राण-रक्षा) आदि की क्षति नहीं होती-उसकी सिद्धि होती है, क्योंकि वक्ता के वचनों में सत्यता वा असत्यता का निर्णय लौकिक प्रमाण-किसी के कहने मात्र-से नहीं किया जा सकता, किन्तु नैतिक विचार द्वारा ही किया जा सकता है, अतः गुरुतर इष्ट प्रयोजन की सिद्धि के अभिप्राय से कहे हुए मिथ्या वचन मिथ्या नहीं कहे जा सकते ॥१८॥ प्राण-घात के समय उनकी रक्षार्थ कहा हुआ असत्य वचन असत्य नहीं भी है ॥१९॥


अर्थाय मातरमपि लोको हिनस्ति किं पुनरसत्यं न भाषते॥ २०॥

अर्थ: जब कि पापी पुरुष धन के लिए माता का भी घात कर डालता है, तब क्या वह उसके लिए मिथ्याभाषण नहीं करता ? अवश्य करता है। अतः धन के विषय में किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए चाहे वह अनेक प्रकार की शपथ भी खावे॥२०॥


सत्कलासत्योपासनं हि विवाहकर्म, दैवायत्तस्तु वधूवरयोर्निर्वाहः४ ॥२१॥

अर्थ: पूर्व कर्मानुसार मनुष्यों को प्रशस्त कलाएँ, सत्य की उपासना व विवाह संबन्ध प्राप्त होता है, परन्तु विवाह सम्बन्ध हो जाने पर भी दम्पत्ति का निर्वाह उनके भाग्य की अनुकूलता के अधीन हैं ॥२१॥


रतिकाले यन्नास्ति कामार्तो यन्न ब्रूते पुमान् न चैतत्प्रमाणं ॥२२॥

अर्थ: काम-पीड़ित पुरुष रति (काम-सेवन) के अवसर पर ऐसा कोई “वचन (सत्य व झूठ) बाकी नहीं रखता, जिसे वह अपनी प्रियतमा (स्त्री) से नहीं बोलता-वह सभी प्रकार के सत्य असत्य वचन बोलता है, परन्तु उसके वे वचन प्रामाणिक नहीं होते । अभिप्राय यह है कि विषयाभिलाषी व सज्जाति सन्तान के इच्छुक पुरुष को रतिकाल के समय तात्कालिक प्रिय (मधुर) वचनों द्वारा अपनी प्रिया को अनुरक्त करना चाहिए ॥२२॥


तावत्स्त्रीपुरुषयोः परस्परं प्रीतिर्यावन्न प्रातिलोम्यं कलहो रतिकैतवं च॥२३॥

अर्थ: दम्पत्तियों में तभी तक पारस्परिक प्रेम रहता है, जब तक कि उनमें प्रतिकूलता, कलह और विषयोपभोग सम्बन्धी कुटिलता नहीं पाई जाती ॥२३॥


तादात्विकबलस्य कुतो रणे जयः प्राणार्थैः स्त्रीषु कल्याणं वा॥ २४॥

अर्थ: जिस विजिगीषु के पास थोड़े समय तक टिकने वाली अल्प सैन्य वर्तमान है वह युद्ध में शत्रु से विजयश्री किस प्रकार प्राप्त कर सकता है ? नहीं कर सकता । इसी प्रकार स्त्रियों का कल्याण (उपकार) करने से भी मनुष्य अपनी प्राण-रक्षा नहीं कर सकता अतः युद्ध में विजयश्री के लाभार्थ प्रचुर सैन्य शक्ति होनी चाहिए तथा विवेकी पुरुष स्त्रियों के प्रति किये हुए उपकार को प्राण-रक्षा का साधन न समझे ॥२४॥


तावत्सर्वः सर्वस्यानुवृत्तिपरो यावन्न भवति कृतार्थः५॥ २५॥

अर्थ: जब तक लोग दूसरों के द्वारा कृतार्थ (अपनी प्रयोजन-सिद्धि करने वाले) नहीं होते, तभी तक सभी लोग सभी के साथ विनय शीलता दिखाते हैं, परन्तु प्रयोजन सिद्ध हो जाने पर कौन किसे पूछता है ? कोई नहीं पूछता ॥२५॥


अशुभस्य कालहरणमेव प्रतीकारः॥ २६॥

अर्थ: अशुभ करने वाले (विरोधी) व्यक्ति से समय पर न मिलना ही उसके शान्त करने का उपाय है। अर्थात् जब शत्रुता करने वाला मनुष्य समय का उल्लंघन और मिष्ट वचनों द्वारा वंचना किया जाता है, तभी वह शान्त होता है, अन्यथा नहीं॥ २६॥


पक्वान्नादिव स्त्रीजनाद्दाहोपशान्तिरेव प्रयोजनं किं तत्र रागविरागाभ्यां ॥२७॥

अर्थ: जिस प्रकार बुभुक्षित (भूखे) की क्षुधा की निवृत्ति करने के लिए पके हुए अन्न से प्रयोजन रहता है, उसी प्रकार काम रूपी अग्नि से संतप्त हुए पुरुष को भी शारीरिक आताप (मैथुनेच्छा) को शांत करने के लिए स्त्री से प्रयोजन रहता है, अन्य कोई प्रयोजन नहीं। इसलिए उनमें अनुराग (प्रेम)व विराग (विरोध) करने से कोई लाभ नहीं अर्थात् उनके साथ माध्यस्थ्य भाव रखे। क्योंकि उनमें विशेष अनुरक्त व आसक्त पुरुष धार्मिक (दान-पुण्यादि) व आर्थिक (व्यापार आदि) कार्यों से विमुख होने के कारण अपनी धार्मिक व आर्थिक क्षति कर डालता हैं एवं उनसे विरोध रखने वाला काम पुरुषार्थ से वंचित रह जाता हैं, अतः स्त्रियों के प्रति मध्यस्थ भाव ही श्रेयस्कर है॥ २७॥


तृणेनापि प्रयोजनमस्ति किं पुनर्न पाणिपादवता मनुष्येण ॥२८॥

अर्थ: जबकि तिनके से भी मनुष्य का प्रयोजन (दन्त-शुद्धि आदि सिद्ध होता है तब क्या हाथ पाँव वाले मनुष्य से उसका प्रयोजन सिद्ध न होगा अवश्य सिद्ध होगा ? अतः उसे उत्तम, मध्यम व अधम सभी के साथ मैत्री रखनी चाहिए एवं अधम पुरुष की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए॥ २८॥


न कस्यापि लेखमवमन्येत, लेखप्रधाना हि राजानस्तन्मूलत्वात् सन्धिविग्रहयोः
सकलस्य जगद्व्यापारस्य च॥२९॥

अर्थ: विजिगीषु अथवा विवेकी पुरुष किसी भी साधारण व्यक्ति के लेख (पत्र) की अवज्ञा (तिरस्कार) न करे क्योंकि राजा लोग लेख द्वारा ही शत्रु की चेष्टा का ज्ञान करते हैं, इसलिए वे लेखप्रधान कहे जाते हैं एवं सन्धि, विग्रह व समस्त संसार के व्यापार की स्थिति का ज्ञान भी लेख द्वारा ही होता है ॥२६॥


पुष्पयुद्धमपि नीतिवेदिनो नेच्छन्ति किं पुनः शस्त्रयुद्धं॥३०॥

अर्थ: नीति के वेत्ता पुरुष पुष्पों द्वारा भी युद्ध करना नहीं चाहते, तब शस्त्र-युद्ध किस प्रकार चाहेंगे? नहीं चाहेंगे॥ ३०॥


स प्रभुर्यो बहूँन् बिभर्ति किमर्जुनतरोः फलसम्पदा या न भवति
परेषामुपभोग्या ॥३१॥

अर्थ: जो साधारण धन वाला हो करके भी अपनी उदारता के कारण बहुत से मनुष्यों का पालन-पोषण करता है, वही स्वामी है और जो स्वामी धनाढ्य होकर कृपणता-वश ऐसा नहीं करता वह दूसरों के द्वारा उपभोग में न आने वाली अर्जुन वृक्ष की फल सम्पत्ति के समान निरर्थक व निन्द्य गिना जाता है॥ ३१॥


मार्गपादप इव स त्यागी यः सहते सर्वेषां संबाधां॥ ३२॥

अर्थ: जो रास्ते में रहने वाले वृक्ष के समान समस्त अभ्यागत या याचकों के उपद्रव सहन करता हुआ क्लेशित नहीं होता, वही दाता है अर्थात्-जिस प्रकार रास्ते में वर्तमान वृक्ष पान्थों द्वारा किए जाने वाले उपद्रव (पुष्प व फल तोड़ना) सहन करता है, उसी प्रकार भोजन व शयनादि के दान द्वारा अभ्यागतों को सम्मानित करने वाला दाता भी उनके द्वारा दिए जाने वाले कष्ट सहन करता है ॥३२॥


पर्वता इव राजानो दूरतः सुन्दरालोकाः॥ ३३॥

अर्थ: राजा लोग पर्वतों के समान दूर से ही सुन्दर दिखाई देते हैं, समीप में जाने से नहीं अर्थात् जिस प्रकार पर्वत पार्श्वभाग-आदि के कारण दूर से मनोहर और समीप में जाने पर अनेक थूहर-आदि कटीले वृक्षों व बड़ी-बड़ी विशाल चट्टानों के कारण चढ़ने में कष्टदायक होते हैं, उसी प्रकार राजा लोग भी छत्र-चामरादि विभूति-युक्त होने से दूर से रमणीक दृष्टिगोचर होते हैं, परन्तु पास जाने से कष्टदायक-आर्थिक दण्ड आदि द्वारा पीड़ित करने वाले होते हैं, अतः उनसे दूर रहना ही श्रेष्ठ


वार्तारमणीयः सर्वोऽपि देशः॥३४॥

अधनस्याबान्धवस्य च जनस्य मनुष्यवत्यपि भूमिर्भवति महाटवी॥३५॥

श्रीमतो
ह्यरण्यान्यपि राजधानी॥ ३६॥

सर्वस्याप्यासन्नविनाशस्य भवति प्रायेण
मतिर्विपर्यस्ता॥ ३७॥

पुण्यवतः पुरुषस्य न क्वचिदप्यस्ति दौःस्थ्यं॥३८॥

दैवानुकूलः कां सम्पदं न करोति विघटयति वा विपदं ॥३९॥

असूयकः पिशुनः
कृतघ्नो दीर्घरोष इति कर्मचाण्डालाः ॥४०॥

औरसः क्षेत्रजोदत्तः कृत्रिमो
गूढोत्पन्नोऽपविद्ध एते षट् पुत्रा दायादाः पिण्डदाश्च ॥४१॥

अर्थ (सूत्र 33 से 41): है ॥३३॥ सभी देश में उनके बारे में कही जाने वाली लोगों की सुन्दर बातें सुनने से रमणीक मालूम पड़ते हैं, अतः बिना परीक्षा किए ही किसी के कहने मात्र से परदेश को गुण-युक्त जानकर स्वदेश का त्याग करना उचित नहीं ॥३४॥
गौतम१ और रैभ्य ने२ भी राजाओं व परदेश के विषय में इसी प्रकार का उल्लेख किया है ॥१-२॥
निर्धन (दरिद्र) और बन्धुहीन पुरुष को अनेक मनुष्यों से व्याप्त पृथ्वी भी महान् अटवी के समान दुःखदायक है, क्योंकि उसे दारिद्र्य व कुटुम्बहीनता के कारण वहाँ सांसारिक सुख नहीं मिल सकता। धनाढ्य पुरुष को वनस्थली भी राजधानी समान सुख देने वाली हो जाती है ॥३५-३६॥
रैभ्य३ ने भी दरिद्र व बन्धुहीन व्यक्ति के बारे में इसी प्रकार का कथन किया है ॥१॥
विनाशकाल के निकट आने पर प्रायः सभी की बुद्धि विपरीत (उल्टी) हो जाती है, क्योंकि निकट विनाश वाला व्यक्ति अपने हितैषियों की निन्दा व शत्रु की प्रशंसा आदि विपरीत कार्य करता है, जिससे प्रतीत होता है कि इसका विनाश निकट है॥ ३७॥ भाग्यशाली पुण्यवान् पुरुष को कभी भी आपत्तियां नहीं होतीं ॥३८॥ दैव- पूर्वजन्म में किए हुए कर्म (भाग्य) की अनुकूलता होने पर भाग्यशाली पुरुष को कौन-कौन सी सम्पत्तियाँ प्राप्त नहीं होतीं ? सभी सम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं और उसकी कौन-कौन सी विपत्तियाँ नष्ट नहीं होतीं ? सभी नष्ट हो जाती हैं ॥३९॥
गर्ग४ व हारीत५ ने भी निकट विनाश वाले और भाग्यशाली के विषय में उक्त बात का समर्थन किया है ॥१-२॥
दूसरों की निन्दा करने वाला, चुगलखोर, कृतघ्न-उपकार को न मानने वाला (गुणमेटा) और दीर्घकाल तक क्रोध करने वाला ये चारों मनुष्य अनीति के कारण कर्मचाण्डाल हैं ॥४०॥
गर्ग६ ने भी उक्त चार प्रकार के मनुष्यों को कर्मचाण्डाल माना है ॥१॥
औरस (धर्मपत्नी से उत्पन्न हुआ पुत्र), क्षेत्रज (दूसरे स्थान में धर्मपत्नी से उत्पन्न हुआ), दत्त (गोद लिया हुआ) कृत्रिम-बन्धन से मुक्त किया हुआ, गूढोत्पन्न (गूढ़ गर्भ से उत्पन्न हुआ), और अपविद्ध (पति के अन्यत्र चल जाने पर या मरने के बाद उत्पन्न हुआ) यह छह प्रकार के पुत्र दायाद


देशकालकुलापत्यस्त्रीसमापेक्षो दायादविभागोऽन्यत्र यतिराजकुलाभ्यां ॥४२॥

अर्थ: आचार्य-कुल व राजकुल को छोड़कर दायभाग (पैतृक सम्पत्ति प्राप्त करना) के अधिकारियों में देश, काल, कुल, पुत्र, स्त्री व शास्त्र की अपेक्षा भेद होता है अर्थात् समस्त देश और सभी कुलों में दायाधिकारी एक समान नहीं होते, जैसे केरल देश में पुत्र की मौजूदगी में भी भागिनेय (भानेज) पैतृक सम्पत्ति पाने का अधिकारी होता है, दूसरा नहीं एवं किन्हीं-किन्हीं कुलों में दुहिता-लड़की का लड़का-दायाधिकारी होता है, इत्यादि, परन्तु आचार्य-कुल में उसका प्रधान शिष्य (जैन धर्मानुसार दीक्षित मुनि) ही आचार्य पदवी के योग्य होगा, अन्य नहीं इसी प्रकार राजकुल में पट्टरानी का ही ज्येष्ठ पुत्र राज्यपद का अधिकारी होगा, दूसरा नहीं ॥४२॥


अति परिचयः कस्यावज्ञां न जनयति ॥४३॥

अर्थ: ज्यादा परिचय (संसर्ग) से किसका अपमान नहीं होता ? सभी का होता है ॥४३॥


भृत्यापराधे स्वामिनो दण्डो यदि
भृत्यं न मुञ्चति ॥४४॥

अर्थ: यदि नौकर अपराध करे, तो उसका स्वामी दण्ड का पात्र है, परन्तु यदि वह (मालिक) अपने अपराधी नौकर को नहीं निकाले। अर्थात् अपराधी नौकर के छुड़ा देने पर उसका स्वामी सजा का पात्र नहीं ॥४४॥


अलं महत्तया समुद्रस्य यः लघुं शिरसा वहत्यधस्ताच्च
नयति गुरुम् ॥४५॥

अर्थ: समुद्र का बड़प्पन किस काम का ? किसी काम का नहीं, जो कि छोटी वस्तु तृणादि को अपने शिर पर धारण करता है और भारी-बड़ी को डुबो देता हैं। उसी प्रकार साधारण लोगों को सम्मानित तथा बड़े पुरुषों को तिरस्कृत करने वाला स्वामी भी निन्य है ॥४५॥


रतिमंत्राहारकालेषु न कमप्युपसेवेत ॥४६॥

अर्थ: रति (मैथुन), मंत्र व आहार में प्रवृत्त हुए किसी भी पुरुष के पास उस समय न जावे। क्योंकि रति क्रिया में प्रवृत्त पुरुष लज्जा के कारण अपने पास आये हुए मनुष्य से वैर-विरोध करने लगता है। इसी प्रकार मंत्रकाल में आये हुए व्यक्ति से मंत्र-भेद की आशंका रहती है; इससे वह भी द्वेष का पात्र होता है। एवं भोजन की वेला में अज्ञान व लोभवश अधिक खाने वाला यदि वमन कर देता है या उसे उदर रोग हो जाता है; तो आने वाले का दृष्टिदोष समझा जाता है, जिसके कारण आहार करने वाला उससे घृणा व द्वेष करने लगता है। अतः उक्त रति आदि की बेला में किसी के पास नहीं जाना चाहिए ॥४६॥


सुष्टुपरिचितेष्वपि तिर्यक्षु विश्वासं न गच्छेत् ॥४७॥

अर्थ: गाय वगैरह पशुओं पर विश्वास न करे चाहे वे अच्छी तरह से परिचित (विश्वसनीय) भी क्यों न हों॥ ४७॥


मत्तवारणारोहिणो जीवितव्ये
सन्देहो निश्चितश्चापायः ॥४८॥

अर्थ: मतवाले हाथी पर आरोहण (चढ़ना) करने वाले मनुष्य के जीवन में सन्देह रहता है और यदि वह भाग्यवश जीवित बच जाता है, तो निश्चय से उसके शारीरिक अङ्गोपाङ्ग भंग हो जाते हैं-टूट जाते हैं ॥४८॥


अत्यर्थं हयविनोदोऽङ्गभंगमनापाद्य न
तिष्ठति ॥४९॥

अर्थ: घोड़े पर सवार होकर जो उससे अत्यधिक विनोद-क्रीड़ा की जाती है, वह सवार के शारीरिक अङ्गोपाङ्ग तोड़े बिना विश्राम नहीं लेती ॥४९॥


ऋणमददानो दासकर्मणा निर्हरेत् ॥५०॥


अन्यत्र यतिब्राह्मण-
क्षत्रियेभ्यः ॥५१॥

अर्थ: जो ऋणी पुरुष, ऋण देने वाले धनाढ्य पुरुष का कर्जा बिना चुकाये मर जाता है उसे दूसरे जन्म में दास होकर उसका ऋण चुकाना पड़ता है, परन्तु साधु, ब्राह्मण व क्षत्रियों पर उक्त नियम लागू नहीं होता क्योंकि साधु व विद्वान् ब्राह्मणों से धनाढ्यों का हित साधन होता हैं, अतः वे ऋणी नहीं रहते, इसी प्रकार क्षत्रिय राजा लोग जो प्रजा से टैक्स लेते हैं वह कर्जा ही नहीं कहा जाता॥ ५१॥


तस्यात्मदेह एव वैरी यस्य यथालाभमशनं शयनं च न
सहते ॥५२॥

अर्थ: जिसका भोजन व शयन रोगादि के कारण सुखदायक नहीं है, उसे अपने शरीर को बैरी समझना चाहिए। क्योंकि जिस प्रकार शत्रु के भय से स्वेच्छा-पूर्वक भोजन व शयन नहीं किया जाता, उसी प्रकार शरीर के व्याधि-पीड़ित रहने से भी यथेष्ट भोजन व शयन नहीं किया जा सकता ॥५२॥


तस्य किमसाध्यं नाम यो महामुनिरिव सर्वान्नीनः सर्वक्लेशसहः
सर्वत्र सुखशायी च ॥५३॥

अर्थ: जो महापुरुष महामुनि समान उत्तम-मध्यम-आदि सभी जाति के अन्न-भक्षण करने की रुचि रखने वाला तथा समस्त प्रकार के शीत-उष्ण आदि के कष्ट सहन करने में समर्थ एवं सभी जगह (पाषाणादि) पर सुखपूर्वक निद्रा लेने की प्रकृति युक्त है, उसे संसार में कोई कार्य असाध्य (न करने योग्य) नहीं ॥५३॥


स्त्रीप्रीतिरिव कस्य नामेयं स्थिरा लक्ष्मीः ॥५४॥

अर्थ: यह लक्ष्मी स्त्री की प्रीति-समान अस्थिर-नाश होने वाली है ॥५४॥


परपैशून्योपायेन राज्ञां वल्लभो लोकः ॥५५॥

अर्थ: वही लोग राजाओं के प्रेमपात्र होते हैं, जो कि उनके समक्ष दूसरों की चुगली किया करते हैं ॥ ५५॥


नीचोमहत्त्वमात्मनो मन्यते परस्य कृतेनापवादेन ॥५६॥

अर्थ: नीच पुरुष दूसरों की निन्दा करके अपने को बड़ा मानता है ॥५६॥


गुण-कृत महत्त्व, महापुरुष, सत्-असत्सँग का असर, प्रयोजनार्थी व निर्धन का धनाढ्य के


न खलु परमाणोरल्पत्वेन महान् मेरुः किन्तु स्वगुणेन ॥५७॥

न खलु निर्निमित्तं महान्तो भवन्ति कलुषितमनीषाः ॥५८॥

अर्थ (सूत्र 57 से 58): जिस प्रकार सुमेरुपर्वत अपने गुण-उच्चता आदि के कारण महान् है न कि परमाणु की लघुता से उसी प्रकार मनुष्य भी विद्वत्ता व सदाचार-आदि सद्गुणों के कारण महान् होता है, न कि किसी के दुष्ट होने से ॥५७॥ महापुरुष बिना निमित्त के मलिन बुद्धि-युक्त नहीं होते। अर्थात् जिस प्रकार दुष्ट लोग बिना प्रयोजन अचानक कुपित हो जाते हैं, वैसे महापुरुष नहीं होते, वे किसी कारणवश कुपित होते हैं ॥५८॥


स वह्नेः प्रभावो यत्प्रकृत्या शीतलमपि जलं भवत्युष्णं ॥५९॥

अर्थ: जिस प्रकार स्वभाव से शीतल जल के उष्ण होने में अग्नि का असर कारण है, उसी प्रकार स्वाभाविक शान्त पुरुष के कुपित होने में दुष्टों की संगति ही कारण समझना चाहिए ॥५९॥


सुचिरस्थायिनं कार्यार्थी वा साधूपचरेत् ॥६०॥

अर्थ: प्रयोजनसिद्धि चाहने वाले मनुष्य को इस प्रकार के मनुष्य की अच्छी तरह सेवा करनी चाहिए, जो कि चिरकाल तक स्थिरशील होकर उसकी प्रयोजन-सिद्धि में सहायक हो॥ ६०॥


स्थितैः सहार्थोपचारेण व्यवहारं न कुर्यात् ॥६१॥

अर्थ: दुर्बल-निर्धन पुरुष को स्थिरशील (धनाढ्य) पुरुषों के साथ धन देने का बर्ताव नहीं करना चाहिए, इससे उसकी अत्यधिक आर्थिक-क्षति-धन व्यय-नहीं होने पाता॥ ६१॥


सत्पुरुषपुरश्चारितया शुभमशुभं वा कुर्वतोनास्त्यपवादः प्राणव्यापादो वा ॥६२॥

सपदि सम्पदमनुबध्नाति विपच्च विपदं ॥६३॥

अर्थ (सूत्र 62 से 63): महापुरुषों का ऐसा अपूर्व माहात्म्य है कि उनकी सेवा करने से मनुष्य में ऐसा व्यक्तित्व आ जाता है कि यदि वह असावधानी-वश कोई अच्छा बुरा कार्य कर बैठता हैं-कोई अपराध कर लेता है-तो लोक में उसको निन्दा नहीं हो पाती और न उसे अपने प्राणों के नष्ट होने का खतरा रहता है। इसी प्रकार सत्पुरुषों की सेवा तत्काल सम्पत्ति उत्पन्न करती है एवं विपत्ति का नाश करती है ॥६२-६३॥


गोरिव दुग्धार्थी को नाम कार्यार्थी परस्परं विचारयति ॥६४॥

अर्थ: कौन-सा प्रयोजनार्थी मनुष्य स्वार्थ सिद्धि के निमित्त गाय से दूध चाहने वाले मनुष्य के समान उसकी प्रयोजन सिद्धि करने वाले दूसरे मनुष्य के आचार का विचार करता है ? कोई नहीं करता। अर्थात्-जिस प्रकार गाय से दूध चाहने वाला उसके आचार (अपवित्र वस्तु का भक्षण करना) पर दृष्टि पात नहीं करता, उसी प्रकार प्रयोजनार्थी भी “अर्थी दोषं न पश्यति”-स्वार्थसिद्धि का इच्छुक दूसरे के दोष नहीं देखता” इस नीति के अनुसार अपनी प्रयोजन सिद्धि के लिए दूसरे के दोषों पर दृष्टिपात न करे ॥६४॥


शास्त्रविदः स्त्रियश्चानुभूतगुणाः परमात्मानं रञ्जयन्ति ॥६५॥

अर्थ: जिनके पुष्कल ज्ञान व सदाचार प्रभृति सद्गुणों से परिचय हो चुका है, ऐसे विद्वान् और कमनीय कन्याएँ (स्त्रियाँ) मनुष्य की आत्मा को अत्यन्त रञ्जायमान (सुखी) करती हैं ॥६५॥


चित्रगतमपि राजानं नावमन्येत क्षात्रं हि तेजो महत्सत्पुरुषदेवतास्वरूपेण तिष्ठति ॥६६॥

अर्थ: चित्र (फोटो) में वर्तमान राजा का भी तिरस्कार नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसमें ऐसा अपूर्व क्षात्र-तेज (क्षत्रिय सम्बन्धी तेज) विद्यमान रहता है, जो कि राज-पुरुष के शरीर में महान् देवता रूप से निवास करता है ॥६६॥


कार्यमारभ्य पर्यालोचः शिरो मुण्डयित्वा नक्षत्रप्रश्न इव ॥६७॥

अर्थ: जो मनुष्य कार्य-आरम्भ करने के पश्चात् उसके होने वाले लाभ का विचार करते हैं, वे शिर मुड़ाकर नक्षत्र प्रश्न (शुभ-अशुभ मुहूर्त का पूछना) करने वाले के समान मूर्ख हैं। अर्थात् जिस प्रकार शिर मुड़ा कर शुभ-अशुभ मुहूर्त पूछना निरर्थक है, उसी प्रकार कार्यारम्भ करके पश्चात् उससे होने वाले हानि-लाभ का विचार करना भी निरर्थक है, अतः कार्य आरम्भ के पहले उस पर विचार कर लेना उचित है, क्योंकि उतावली से किये हुए कार्य हृदय में काँटे चुभने के समान अत्यधिक पीड़ा पहुँचाते हैं ॥ ६७॥


ऋणशेषाद्रिपुशेषाद्वा वश्यं भवत्यायत्यां भयं ॥६८॥

अर्थ: जो मनुष्य शत्रु को बाकी रखने की तरह ऋण (कर्जा) बाकी रखता है, उसे भविष्य में भय रहता है, अतः सुखाभिलाषी पुरुष अग्नि, रोग, शत्रु और ऋण इन चार कष्टदायक चीजों को बाकी न छोड़े, अन्यथा ये बढ़कर अत्यन्त पीड़ा पहुँचाती हैं ॥६८॥


नवसेवकः को नाम न भवति विनीतः ॥६९॥

अर्थ: कौन-सा नया सेवक शुरू में नम्रता प्रदर्शन नहीं करता ? प्रायः सभी करते हैं। अभिप्राय यह है कि नया नौकर शुरू में विश्वसनीय कार्यों द्वारा स्वामी को प्रसन्न करने में प्रयत्नशील रहता है, पश्चात् विकृत-कार्य में असावधानी करने वाला (आलसी) हो जाता है, अतः नये सेवक पर विश्वास नहीं करना चाहिए ॥६९॥


यथाप्रतिज्ञं को नामात्र
निर्वाहः ॥७०॥

अर्थ: कौन पुरुष इस कलिकाल में की हुई प्रतिज्ञा का निर्वाह (पूर्णरूप से पालन) करता है ? कोई नहीं करता, अतः खूब सोच समझ कर प्रतिज्ञा लेकर उसका पालन करना चाहिए, अन्यथा प्रतिज्ञा-भंग होने से पुण्य क्षीण हो जाता है ॥७०॥


अप्राप्तेऽर्थे भवति सर्वोऽपि त्यागी ॥७१॥

अर्थ: जब तक धन नहीं मिलता-निर्धन अवस्था में-सभी लोग उदार होते हैं। सारांश यह है कि दरिद्रावस्था में प्रायः सभी लोग प्रचुर दान करने के मनोरथ किया करते हैं कि यदि मैं धनाढ्य होता तो प्रचुर दान करता ॥७१॥


अर्थार्थी
नीचैराचरणान्नोद्विजेत्, किन्नाधो व्रजति कूपे जलार्थी ॥७२॥

अर्थ: स्वार्थी जघन्य पुरुष अपनी प्रयोजन-सिद्धि के लिए नीच आचरण से भयभीत नहीं होते, क्या जलाभिलाषी मनुष्य कुँआ खोदने के लिए नीचे नहीं जाता ? अवश्य जाता है। अभिप्राय यह है कि इष्ट प्रयोजन सिद्धि के लिए उत्तम आचरण ही श्रेयस्कर है ॥७२॥


स्वामिनोपहतस्य
तदाराधनमेव निर्वृत्तिहेतु जनन्या कृतविप्रियस्य हि बालस्य जनन्येव भवति
जीवितव्याकरणं ॥७३॥

अर्थ: जिस प्रकार अपराध के कारण माता द्वारा तिरस्कृत किये हुए बच्चे की माता ही जीवन रक्षा करती है, उसी प्रकार अपराध-वश पृथक् किये हुए सेवक की जीवन-रक्षा उसके द्वारा की जाने वाली स्वामी की सेवा शुश्रूषा द्वारा ही होती है।


ग्रन्थकार की प्रशस्ति


इति सकलतार्किकचक्रचूडामणिचुम्बितचरणस्य, पंचपंचाशन्महावादि विजयोपार्जित
कीर्तिमन्दाकिनीपवित्रितत्रिभुवनस्य, परमतपश्वचरणरत्नोदन्वतः श्रीमन्नेमिदेवभगवतः प्रियशिष्येण
वादीन्द्रकालानलश्रीमन्महेन्द्रदेवभट्टारकानुजेन, स्याद्वादाचलसिंह-तार्किकचक्रवर्तिवादीभपंचानन-
वाक्कल्लोलपयोनिधिकविकुलराजप्रभृतिप्रशस्तिप्रशास्तालङ्कारेण, षण्णवतिप्रकरणयुक्तचिन्ता-
मणिसूत्रमहेन्द्रमातलिसंजल्पयशोधरमहाराजचरितमहाशास्त्रवेधसा श्रीसोमदेवसूरिणा विरचितं
(नीतिवाक्यामृतं) समाप्तमिति।

अर्थ: समस्त तार्किक-समूह में चूडामणि-शिरोरत्न (श्रेष्ठ), विद्वानों द्वारा पूजे गये हैं चरणकमल जिनके, पचपन महावादियों पर विजयश्री पाने से प्राप्ति की हुई कीर्ति-रूपी स्व गंगा से पवित्र किये हैं तीन भुवनों को जिन्होंने एवं परम तपश्चरणरूप रत्नों के रत्नाकर (समुद्र) ऐसे श्रीमत्पूज्य नेमिदेव, उनके प्रिय शिष्य, ‘वादीन्द्रकालानल’ (बड़े-बड़े वादियों के लिए प्रलयकालीन अग्नि के समान) उपाधिविभूषित श्रीमान् महेन्द्रदेव भट्टारक के अनुज, ‘स्याद्वादाचलसिंह’ (स्याद्वादरूप विशाल पर्वत के सिंह) ‘तार्किकचक्रवर्ती’ ‘वादीभपंचानन’ (वादीरूप हाथियों के गर्वोन्मूलन करने के लिए सिंह सदृश) ‘वाक्कल्लोलपयोनिधि’ (सूक्ति-तरङ्गों के समुद्र) ‘कविकुलराज’ इत्यादि प्रशस्तियाँ (उपाधियाँ) ही हैं प्रशस्त अलङ्कार (आभूषण) जिनके तथा षण्णवतिप्रकरण (९६ अध्याय बाला शास्त्र), युक्तिचिन्तामणि (दार्शनिक ग्रन्थ), त्रिवर्गमहेन्द्रमातलिसंजल्प (धर्मादि-पुरुषार्थत्रय-निरूपक नीतिशास्त्र) और यशोधरमहाराजचरित (यशस्तिलकचम्पू) इन महाशास्त्रों के बृहस्पति समान रचयिता श्रीमत्सोमदेवसूरि द्वारा रचा गया यह ‘नीतिवाक्यामृत’ समाप्त हुआ।


दर्पान्धबोधबुधसिन्धुरसिंहनादे, वादिद्विपोद्दलनदुर्धरवाग्विवादे।
श्रीसोमदेवमुनिपे वचनारसाले, वागीश्वरोऽपि पुरतोऽस्ति न वादकाले॥७४॥

अर्थ: “छोटों के साथ अनुग्रह, बराबरी वालों के साथ सज्जनता और पूज्य महापुरुषों के साथ महान् आदर का बर्ताव करना’’ यह उच्च व चित्र (आश्चर्यजनक) चरित्र वाले मुझ सोमदेव का सिद्धान्त है तथापि जो व्यक्ति अत्यधिक गर्व वृद्धि से दुराग्रही होकर मुझसे स्पर्द्धा करता है-ऐंठ दिखाता है-उसके गर्वरूप पर्वत को भेदन करने के लिए मेरे वचन वज्र-समान व काल-तुल्य आचरण करते हैं ॥१॥