(१८) अमात्य-समुद्देशः
चतुरङ्गेऽस्ति द्यूते नानमात्योऽपि राजा किं पुनरन्यः ॥१॥
अर्थ: जब शतरंज का बादशाह मन्त्री के बिना चतुरङ्ग सेना (शतरंज के हाथी, प्यादे, आदि) सहित होकर भी उसका बादशाह नहीं हो सकता-अर्थात् उस खेल के बादशाह आदि प्रतिद्वन्द्वियों को परास्त कर विजय-श्री प्राप्त नहीं कर सकता, तब क्या पृथिवीपति (राजा) हस्ति, अश्व आदि चतुरङ्ग सैन्ययुक्त होकर के भी बिना मन्त्री के राजा हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता ॥१॥
नैकस्य कार्यसिद्धिरस्ति ॥२॥
नह्येकं चक्रं परिभ्रमति ॥३॥
अर्थ (सूत्र 2 से 3): जिस प्रकार रथ आदि का एक पहिया दूसरे पहिये की सहायता के बिना नहीं घूम सकता, उसी प्रकार अकेला राजा भी मंत्री आदि सहायकों के बिना राजकीय कार्य (सन्धि विग्रह प्रभृति) में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता ॥२-३॥
किमवातः सेन्धनोऽपि वह्निर्ज्वलति ॥४॥
अर्थ: एवं जिस प्रकार अग्नि ईंधन युक्त होने पर भी हवा के बिना प्रज्वलित नहीं हो सकती उसी प्रकार बलिष्ठ व सुयोग्य राजा भी राज्यशासन करने में समर्थ नहीं हो सकता ॥४॥
स्वकर्मोत्कर्षापकर्षयोर्दानमानाभ्यां सहोत्पत्तिविपत्ती येषां तेऽमात्याः ॥५॥
अर्थ: जो राजा द्वारा दिये हुए, दान-सम्मान प्राप्त कर अपने कर्त्तव्य-पालन में उत्साह व आलस्य करने से क्रमशः राजा के साथ सुखी-दुःखी होते हैं, उन्हें ‘अमात्य’ कहते हैं ॥५॥
आयो व्ययः स्वामिरक्षा तन्त्रपोषणं चामात्यानामधिकारः ॥६॥
अर्थ: मन्त्रियों के निम्न प्रकार चार मुख्य कर्त्तव्य हैं। १. आय-सम्पत्ति को उत्पन्न करने वाले उपायों (समुचित टेक्स प्रभृति) का प्रयोग, २. व्यय-स्वामी की आज्ञानुसार आमदनी के अनुकूल प्रजा-संरक्षणार्थ सैनिक विभाग-आदि में उचित खर्च, ३. स्वामी-रक्षा (राजा व उसके कुटुम्ब का संरक्षण), ४. हाथी-घोड़ा प्रभृति चतुरङ्ग सेना का पालन-पोषण ॥६॥
आयव्ययमुखयोर्मुनिकमण्डलुर्निदर्शनम् ॥७॥
अर्थ: सम्पत्ति की आमदनी व खर्च करने में मुनियों का कमण्डलु दृष्टान्त समझना चाहिए। अर्थात् जिस प्रकार मुनिराज का कमण्डलु जल-ग्रहण अधिक परिमाण में व शीघ्रता से करता है, परन्तु उसका खर्च-जल निष्कासन (निकालना) सूक्ष्म नली के अग्रभाग द्वारा धीरे-धीरे करता है, उसी प्रकार नैतिक पुरुष व राज-मन्त्री को क्रमशः व्यापारादि द्वारा और टेक्स द्वारा सम्पत्ति को आमदनी अधिक परिमाण में करते हुए अल्प खर्च करना चाहिए ॥७॥
आयो द्रव्यस्योत्पत्तिमुखम् ॥८॥
यथास्वामिशासनमर्थस्य विनियोगो व्ययः ॥९॥
आयमनालोच्य व्ययमानो वैश्रमणोऽप्यवश्यं श्रमणायते ॥१०॥
राज्ञः शरीरं धर्मः कलत्रं अपत्यानि च स्वामिशब्दार्थः ॥११॥
तन्त्रं चतुरङ्गबलम् ॥१२॥
अर्थ (सूत्र 8 से 12): सम्पत्ति उत्पन्न करने वाले न्यायोचित साधन उपाय कृषि, व्यापार व राज पक्ष में उचित कर-टेक्स लगाना-आदि को ‘आय’ (आमदनी) कहा है ॥८॥ स्वामी की आज्ञानुसार धन खर्च करना "व्यय है। सारांश यह है कि राजनैतिक प्रकरण में मंत्री को राजा की आज्ञापूर्वक राजकोश से सैन्य-रक्षा आदि में धन खर्च करना चाहिए ॥६॥ जो मनुष्य आमदनी को न विचार कर अधिक खर्च करता है, वह कुबेर समान असंख्य धन का स्वामी होकर भी भिक्षुक समान आचरण करता है- दरिद्र हो जाता है, फिर अल्पधनी मनुष्य व राजा का दरिद्र होना तो स्वाभाविक ही है ॥१०॥ राजा का शरीर, धर्म, रानियाँ व राजकुमार इनका स्वामी शब्द से बोध होता है। सारांश यह है कि मंत्री को इन सबकी रक्षा करनी चाहिए क्योंकि इनमें से किसी के साथ वैर विरोध करने से राजा रुष्ट हो जाता है ॥११॥ चतुरङ्ग (हाथी, घोड़े अथवा रोही व पैदल इन चारों अङ्गवाली) सेना को ‘तन्त्र’ कहा है ॥१२॥
तीक्ष्णं बलवत्पक्षमशुचिं व्यसनिनमशुद्धाभिजनमशक्यप्रत्यावर्त्तनमतिव्यय-
शीलमन्य देशायातमतिचिक्कणं चामात्यं न कुर्वीत ॥१३॥
तीक्ष्णोऽभियुक्तो
म्रियते मारयति वा स्वामिनम् ॥१४॥
अर्थ: क्रोधीमंत्री होने से अपराध-वश दण्डित किए जाने पर अपनी क्रूर प्रकृति-वश विचार-शून्य होकर या तो स्वयं अपना या अपने स्वामी का घात कर डालता है ॥१४॥
बलवत्पक्षो नियोगाभियुक्तः कल्लोलइव
समूलं नृपांघ्रिपमुन्मूलयति ॥१५॥
अर्थ: प्रबल पक्ष वाला व्यक्ति मंत्री पद पर नियुक्त हुआ महान् नदी-पूर समान राजारूपी वृक्ष को जड़ से उखाड़ देता है। अर्थात् जिस प्रकार नदी का शक्तिशाली जल-प्रवाह अपने तटवर्ती वृक्षों को जड़ से उखाड़ देता है, उसी प्रकार शक्तिशाली कुटुम्ब-युक्त मंत्री भी राज-रूपी वृक्ष को जड़ से उखाड़कर फेंक देता है ॥१५॥ शुक्र विद्वान् ने भी बलिष्ठ पक्ष वाले मंत्री के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥
अल्पायतिर्महाव्ययो भक्षयति राजार्थम् ॥१६॥
अर्थ: जो मंत्री राज कोश में आमदनी कम करता हुआ अधिक खर्च करता है, वह राजकीय मूलधन खा जाता है-नष्ट कर डालता है ॥१६॥ गुरु विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥
अल्पायमुखो जनपदपरिग्रहौ पीडयति ॥१७॥
अर्थ: थोड़ी आमदनी करने वाला मंत्री दरिद्रता के कारण देश व राजकुटुम्ब को पीड़ित करता है ॥१७॥ गर्ग विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥
नागन्तुकेष्वर्थाधिकारः
प्राणाऽधिकारो वास्ति यतस्ते स्थित्वापि गन्तारोऽपकर्तारो वा ॥१८॥
अर्थ: राजा का कर्त्तव्य है कि वह विदेशी पुरुषों को धन के आय व्यय का अधिकार एवं प्राण-रक्षा करने का अधिकार न देवे। अर्थात् उन्हें अर्थ-सचिव व सेना-सचिव के उत्तर-दायित्व-पूर्ण पदों पर नियुक्त न करे। क्योंकि वे उसके राज्य में कुछ समय ठहर करके भी अपने देश को प्रस्थान कर जाते हैं एवं मौका पाकर राज-द्रोह करने लगते हैं। अतः अर्थसचिव व सेनासचिव अपने देश का योग्य व्यक्ति होना चाहिए ॥१८॥
स्वदेशजेष्वर्थः कूपपतित इव कालान्तरादपि लब्धुं शक्यते ॥१९॥
अर्थ: अपने देशवासी पुरुषों को अर्थ-सचिव आदि पदों पर नियुक्त करने से उनके द्वारा लोभवश ग्रहण किया हुआ धन-कुएं में गिरी हुई धनादि वस्तु के समान कुछ समय के बाद भी मिल सकता है। अर्थात् जिस प्रकार कुएं में गिरी हुई धनादि वस्तु कालान्तर में प्राप्त की जा सकती है, उसी प्रकार अपने देश से अधिकारियों-अर्थ-सचिव आदि द्वारा कारणवश ग्रहण किया हुआ धन भी कालान्तर में मिल सकता है, परन्तु विदेशी अधिकारियों द्वारा गृहीत धन कदापि नहीं मिल सकता, अतः अर्थ-सचिव आदि मंत्री मण्डल अपने देश का ही होना चाहिए ॥१९॥
चिक्कणादर्थलाभः पाषाणाद्वल् कलोत्पाटनमिव ॥२०॥
अर्थ (सूत्र 13 से 20): राजा या प्रजा को निम्न प्रकार दोष-दूषित व्यक्ति के लिए मंत्री पद पर नियुक्त नहीं करना चाहिए। १. अत्यन्त क्रोधी, २. जिसके पक्ष में बहुत से शक्तिशाली पुरुष हों, ३. बाह्य-अभ्यन्तर सम्बन्धी मलिनता से दूषित, ४. व्यसनी-द्यूत-क्रीड़ा मद्यपान आदि व्यसनों से दूषित, ५. नीचकुलवाला, ६. हठी-जो उपदेश द्वारा असत् कार्य करने से न रोका जा सके, ७. आमदनी से भी अधिक खर्च करने वाला, ८. परदेशी और ९. कृपण (लोभी) अभिप्राय यह है कि ये मंत्री में वर्तमान दोष राज्य-क्षति के कारण हैं। क्योंकि क्रोधी पुरुष मंत्री होने से जब कभी अपराधवश दण्डित किया जाता है, तो वह अपनी क्रूर प्रकृति के कारण या तो स्वयं मर जाता है अथवा अपने स्वामी को मार डालता है इसी प्रकार जिसका पक्ष-माता-पिता-आदि बलिष्ठ होता है, वह अपने पक्ष की सहायता से राजा को नष्ट कर देता है। इसी तरह अपवित्र मंत्री प्रभाव-हीन व राजा को अपने स्पर्श से दूषित करता है एवं व्यसनी कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के ज्ञान रहित,नीच कुल का थोड़ा-सा वैभव पाकर मदोन्मत्त, हठी दुराग्रह-वश हितकारक उपदेश की अवहेलना करने वाला, अधिक खर्चीला स्वार्थ-क्षति होने पर राजकीय सम्पत्ति को भी हड़प करने वाला, परदेशी मंत्री प्रजा की भलाई करने में असमर्थ व स्थिरता से अपना कर्त्तव्य पालन न करने वाला एवं लोभी मंत्री भी कर्त्तव्य-पराङ्मुख होता है। अतः उक्त दोष-दूषित पुरुष को मंत्री नहीं बनाना चाहिए ॥१३॥ शुक्र विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥
योग्य-अयोग्य अधिकारी, अयोग्यों से हानि, बंधु सम्बन्ध के भेद व लक्षण
सोऽधिकारी यः स्वामिना सति दोषे सुखेन निगृहीतुं शक्यते ॥२१॥
अर्थ: वही व्यक्ति मन्त्री आदि पद के योग्य है, जो अपराध करने पर राजा द्वारा सरलता से दण्डित किया जा सके ॥२१॥ किसी नीतिज्ञ विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥
ब्राह्मण-क्षत्रिय-सम्बन्धिनो न कुर्यादधिकारिणः ॥२२॥
ब्राह्मणो जातिवशात्सिद्धमप्यर्थं कृच्छ्रेण प्रयच्छति, न प्रयच्छति वा ॥२३॥
अर्थ (सूत्र 22 से 23): राजा के ब्राह्मण, क्षत्रिय व बन्धु आदि सम्बन्धियों को अमात्य आदि अधिकारी नहीं बनाना चाहिए ॥२२॥ क्योंकि ब्राह्मण अधिकारी होने पर अपनी जाति स्वभाव के कारण ग्रहण किया हुआ धन बड़ी कठिनाई से देता है अथवा नहीं देता ॥२३॥ सारांश यह है कि धन-लम्पटता व कातरता ब्राह्मण जाति का स्वाभाविक दोष है, अतः उससे गृहीत राज-धन की प्राप्ति दुर्लभ है, इसलिए ब्राह्मण अधिकारी पद के योग्य नहीं ॥२३॥
क्षत्रियोऽभियुक्तः खड्गं दर्शयति ॥२४॥
अर्थ: क्षत्रिय अधिकारी विरुद्ध हुआ तलवार दिखलाता है। सारांश यह है कि क्षत्रिय अधिकारी द्वारा ग्रहण किया हुआ धन शस्त्र-प्रहार के बिना नहीं प्राप्त हो सकता, अतएव उसे मंत्री आदि पद पर नियुक्त नहीं करना चाहिए ॥२४॥
सम्बन्धी ज्ञातिभावेनाक्रम्य सामवायिकान् सर्वमप्यर्थं ग्रसते ॥२५॥
अर्थ: जब राजा द्वारा अपना कुटुम्बी या सहपाठी बन्धु आदि मंत्री आदि अधिकारी बनाया जाता है, तो वह “मैं राजा का बन्धु हूँ” इस गर्व से दूसरे अधिकारियों को तुच्छ समझ कर स्वयं समस्त राजकीय धन हड़प कर लेता है अर्थात् सब अधिकारियों को तिरस्कृत करके स्वयं अत्यन्त प्रबल शक्तिशाली हो जाता है ॥२५॥
सम्बन्धस्त्रिविधः श्रौतो मौख्यो यौनश्च ॥२६॥
अर्थ: बन्धु तीन प्रकार के हैं-(१) श्रौत, (२) मौख्य और (३) यौन ॥२६॥
सहदीक्षितः सहाध्यायी वा श्रौतः ॥२७॥
मुखेन परिज्ञातो मौख्यः ॥२८॥
यौनेर्जातो यौनः ॥२९॥
अर्थ (सूत्र 27 से 29): जो राजा की राज्य-लक्ष्मी सम्बन्धी दीक्षा के साथ ही अमात्य-पद की दीक्षा से दीक्षित हुआ हो। अर्थात् जिस प्रकार राजा का राज्य-लक्ष्मी वंश परम्परा से-पिता व पितामह के राजा होने से प्राप्त हुई है, उसी प्रकार जिसे अमात्य पद भी वंश परम्परा से प्राप्त हुआ हो अर्थात् जिसके पितामह व पिता भी इसी वंश में पहले अमात्य पद पर आसीन हो चुके हों, पश्चात् इसे भी कुल क्रम-वंशपरम्परा से अमात्य पदवी प्राप्त हुई हो, उसे अथवा राजा के सहपाठी को श्रौत बन्धु कहते हैं ॥२७॥ जो मौखिक वार्तालाप व सहवास आदि के कारण राजा का मित्र रह चुका है, वह ‘मौख्य’ है ॥२८॥ राजा के भाई व चाचा वगैरह ‘यौन’ बन्धु हैं ॥२९॥
वाचिकसम्बन्धे नास्ति सम्बन्धन्तरानुवृत्तिः ॥३०॥
अर्थ: सकती, अतः मित्र को भी मंत्री पद पर नियुक्त नहीं करना चाहिए॥ ३०॥
न तं कमप्यधिकुर्यात् सत्यपराधे यमुपहत्यानुशयीत ॥३१॥
अर्थ: राजा पूर्वोक्त तीनों प्रकार के बन्धुओं में से किसी बन्धु की अथवा ऐसे किसी पुरुष को अर्थ-मंत्री आदि अधिकारी-पद पर नियुक्त न करे, जिसे अपराध-वश कड़ी सजा देने पर पश्चाताप करना पड़े ॥३१॥
मान्योऽधिकारी राजाज्ञामवज्ञाय निरवग्रहश्चरति ॥३२॥
अर्थ: राजा को पूज्य पुरुष के लिए अधिकारी नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि वह अपने को राजा द्वारा पूज्य समझकर निडर व उच्छृङ्खल होता हुआ राजा की आज्ञा उल्लंघन करता है व राजकीय-धन का अपहरण आदि मनमानी प्रवृत्ति करता है, जिससे राजकीय अर्थ-क्षति होती है ॥३२॥
चिरसेवको नियोगी नापराधेष्वाशङ्कते ॥३३॥
अर्थ: चिरकालीन-पुराना-सेवक अधि नियुक्त हुआ अति परिचय के कारण चोरी-आदि अपराध कर लेने पर भी निडर रहता है; अतः राजा पुराने सेवक को अधिकारी न बनाये ॥३३॥
उपकर्तारमधिकृत्य उपकारमेव ध्वजीकृत्य सर्वमवलुम्पति ॥३४॥
अर्थ: जो राजा अपने उपकारी पुरुष को अधिकारी पद पर नियुक्त करता है, तो वह (अधिकारी) पूर्व कृत उपकार राजा के समक्ष प्रकट करके समस्त राजकीय धन हड़प कर जाता है, अतः उपकारी को अधिकारी नहीं बनाना चाहिए॥ ३४॥
सहपांशुक्रीडितोऽमात्योऽतिपरिचयात् स्वयमेव राजायते ॥३५॥
अर्थ: राजा ऐसे बाल मित्र व्यक्ति को अर्थ-सचिव आदि अधिकारी न बनाये, जो कि बाल्यकाल में उसके साथ धूलि में खेल चुका हो; क्योंकि वह अति-परिचय के कारण अभिमान-वश अपने को राजा समान समझता है॥ ३५॥
अन्तर्दुष्टो नियुक्तः सर्वमनर्थमुत्पादयति ॥३६॥
अर्थ: क्रूर हृदय वाला पुरुष अधिकारी बनकर समस्त अनर्थ उत्पन्न करता है ॥३६॥
शकुनि-शकटालौ वात्र दृष्टान्तौ ॥३७॥
अर्थ: राज-द्वेषी क्रूर हृदय वाले पुरुष को मंत्री बनाने से जो हानि होती है उसके समर्थक शकुनि दुर्योधन का मामा जिसे उसने कौरवों का राज-मंत्री बनाया था) और शकटाल (नन्द राजा का मंत्री) ये दो ऐतिहासिक उदाहरण जानने चाहिए अर्थात् उक्त दोनों दुष्ट हृदय वाले मंत्रियों ने अपने-अपने स्वामियों से द्वेष कर राज्य में अनेक अनर्थ उत्पन्न किये, जिसके फलस्वरूप राज्य-क्षति हुई ॥३७॥
सुहृदि नियोगिन्यवश्यं भवति धनमित्रनाशः ॥३८॥
अर्थ: मित्र को अमात्य आदि अधिकारी बनाने से राजकीय-धन व मित्रता की क्षति होती है। अर्थात् मित्र अधिकारी राजा को अपना मित्र समझकर निर्भयता-पूर्वक उच्छृंखल होकर उसका धन खा लेता है, जिससे राजा उसका वध कर डालता है, इस प्रकार मित्र को अधिकारी बनाने से राजकीय धन व मित्रता दोनों को नाश होता है, अतः मित्र को अधिकारी नहीं बनाना चाहिए ॥३८॥
मूर्खस्य नियोगे भर्तुर्धर्मार्थयशसां संदेहो निश्चितौ चानर्थ-नरकपातौ ॥३९॥
अर्थ: मूर्ख को मन्त्री-आदि का अधिकार देने से स्वामी को धर्म, धन व यश प्राप्ति कठिनाई से होती है अथवा निश्चित नहीं होती। क्योंकि मूर्ख अधिकारी से स्वामी को धर्म का निश्चय नहीं होता और न धन प्राप्ति होती है एवं यश-प्राप्ति भी नहीं होती। परन्तु दो बातें निश्चित होती हैं, (१) स्वामी को आपत्ति में फंसना और (२) उसे नरक ले जाना। अर्थात् मूर्ख अधिकारी ऐसे दुष्कृत्य कर बैठता है, जिससे उसका स्वामी आपद्ग्रस्त हो जाता है एवं ऐसे दुष्कर्म कर डालता है, जिससे प्रजा पीड़ित होती है, जिसके फलस्वरूप स्वामी नरक जाता है ॥३९॥
सोऽधिकारी चिरं नन्दति स्वामिप्रसादो नोत्सेकयति ॥४०॥
अर्थ: जो मन्त्री-आदि अधिकारी स्वामी के प्रसन्न होने पर भी किसी प्रकार का अभिमान नहीं करता वही चिरकाल तक उन्नतिशील रहता है अर्थात् कभी पदच्युत न होकर कार्तव्य-अर्थ-लाभ आदि द्वारा उन्नति करता है ॥४०॥
किं तेन परिच्छदेन यत्रात्मकलेशेन कार्यं सुखं वा स्वामिनः ॥४१॥
का नाम निर्वृतिः स्वयमूढतृणभोजिनो गजस्य ॥४२॥
अर्थ (सूत्र 41 से 42): राजा को उन मन्त्री आदि अधिकारियों से क्या लाभ ? कोई लाभ नहीं, जिन के होने पर भी उसे स्वयं कष्ट उठाकर अपने-आप राजकीय कार्य करना पड़े। अथवा स्वयं कर्तव्य पूरा करके सुख प्राप्त करना पड़े। सारांश यह है कि मन्त्री-आदि अधिकारियों का यही गुण है कि वे स्वयं राजकीय कार्य पूर्ण करके दिखाते हैं, जिससे स्वामी को कुछ कष्ट न हो और वह सुखी रहे। अन्यथा उनका होना व्यर्थ हैं। जिस प्रकार घास का बोझा वहन कर उसका भक्षण करने वाला हाथी सुखी नहीं हो सकता उसी प्रकार मन्त्री आदि सहायकों के बिना स्वयं राजकीय कार्य-भार को वहन करने वाला राजा भी सुखी नहीं हो सकता। अतएव विजिगीषु राजा को योग्य अधिकारियों व सेवकों की सहायता से राजकीय कार्य सुसम्पन्न करना चाहिए, तभी वह सुखी हो सकता है अन्यथा नहीं ॥४१-४२॥
अश्वसधर्माणः पुरुषाः कर्म्मसु नियुक्ता विकुर्वते तस्मादहन्यहनि तान् परीक्षेत्॥४३॥
अर्थ: क्षुद्र प्रकृति वाले मन्त्री आदि अधिकारी अपने-अपने अधिकारों में नियुक्त किये हुए सैन्धव जाति के घोड़ों के समान विकृत-मदोन्मत्त हो जाते हैं। अर्थात् जिस प्रकार सैन्धव जाति के घोड़े योग्यता प्राप्त कर लेने पर (चाल आदि सीख लेने पर) दमन करने से उन्मत्त होकर सवार को जमीन पर पटकना आदि विकार-युक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार अधिकारी गण भी क्षुद्रप्रकृति-वश गर्व-युक्त होकर राज्य क्षति करने तत्पर रहते हैं, अतः राजा को सदा उनकी परीक्षा-जाँच करते रहना चाहिए ॥४३॥
मार्जारिषु दुग्धरक्षणमिव नियोगिषु विश्वास-करणम् ॥४४॥
अर्थ: स्वामी का मन्त्री आदि अधिकारियों पर विश्वास करना दूध की रक्षार्थ रखे हुए विलावों के समान है। अर्थात् जिस प्रकार विलावों से दूध की रक्षा नहीं हो सकती, उसी प्रकार मन्त्री आदि अधिकारियों से भी राजकोष की रक्षा नहीं हो सकती, अतः राजा को उनकी परीक्षा करते रहना चाहिए ॥४४॥
ऋद्धिश्चित्तविकारिणी नियोगिनामिति सिद्धानामादेशः ॥४५॥
अर्थ: ‘‘सम्पत्ति अधिकारियों का चित्त विकार-युक्त (गर्व युक्त) करती है’’ यह प्रामाणिक नीतिज्ञ पुरुषों का वचन है ॥४५॥
सर्वोऽप्यतिसमृद्धोऽधिकारी भवत्यायत्यामसाध्यः कृच्छ्रसाध्यः स्वामिपदाभिलाषी वा ॥४६॥
अर्थ: सभी अधिकारी अत्यन्त धनाढ्य होने पर भविष्य में स्वामी के वशवर्ती नहीं होते अथवा कठिनाई से वश में होते हैं अथवा उसकी पद-प्राप्ति के इच्छुक होते हैं ॥४६॥
भक्षणमुपेक्षणं प्रज्ञाहीनत्वमुपरोधः प्राप्तार्थाप्रवेशो द्रव्यविनिमयश्चेत्यमात्यदोषाः ॥४७॥
अर्थ: जिस सचिव-अमात्य में निम्न प्रकार छह दोष पाये जावें, उसे अमात्य पद पर नियुक्त नहीं करना चाहिए। १.भक्षण-राजकीय धन खानेवाला, २. उपेक्षण राजकीय सम्पत्ति नष्ट करने वाला, अथवा धन प्राप्ति में अनादर करने वाला ३. प्रज्ञाहीनत्व-जिसकी बुद्धि नष्ट हो गई हो, या जो राजनैतिक ज्ञान-शून्य (मूर्ख) है, ४. उपरोध-प्रभावहीन (उदाहरणार्थ-राजकीय द्रव्य हड़प करने वाले दूसरे अधिकारियों को देखते हुए जिसके द्वारा रोके जाने पर भी वे लोग अनर्थ करने से न चूकें ऐसा प्रभावहीन व्यक्ति) ५. प्राप्तार्था प्रवेश-जो टैक्स आदि उपायों द्वारा प्राप्त हुआ धन राज-कोष में जमा नहीं करता हो, ६. द्रव्य विनिमय जो राजकीय बहुमूल्य द्रव्य अल्पमूल्य में निकाल लेता हो। अर्थात् जो बहुमूल्य सिक्कों (असर्फी आदि) को स्वयं ग्रहण करके और उनके बदले में अल्प मूल्य वाले सिक्के (रुपये आदि) राजकीय खजाने में जमाकर देता हो अथवा चलाने में प्रयत्नशील हो। सारांश यह है कि जो राजा या प्रजा उक्त दोष-युक्त पुरुष को अर्थ सचिव बनाती है, उसका राज्य नष्ट हो जाता है ॥४७॥
राज-तन्त्र, स्वयं देख रेख के योग्य, अधिकार, राज-तन्त्र व नीवी-लक्षण, आयव्यय-शुद्धि और उसके विवाद में राज-कर्त्तव्य
बहुमुख्यमनित्यं च करणं स्थापयेत् ॥४८॥
अर्थ: राजा या प्रजा द्वारा ऐसे राज्यतंत्र की स्थापना होनी चाहिए, जो बहुत से शिष्ट अधिकारियों की बुद्धि से संचालित हो एवं जिसमें अधिकारियों की नियुक्ति स्थायी न हो क्योंकि अकेला अधिकारी स्वेच्छा से अनर्थ भी कर सकता है एवं स्थायी नियुक्ति वाले अधिकारी राज-कोष की क्षति करने वाले भी हो सकते हैं। अतः मंत्री सेनाध्यक्ष आदि करण की नियुक्ति अनेक नीतिज्ञ शिष्ट पुरुषों सहित तथा क्रमानुसार बदलने वाली होनी चाहिए ॥४८॥ गुरु विद्वान् के उद्धरण का भी यही अभिप्राय है ॥१॥
स्त्रीष्वर्थेषु च मनागप्यधिकारे न जातिसम्बन्धः ॥४९॥
अर्थ: राजा या नैतिक पुरुष अपनी स्त्रियों व धन का रक्षक किसी को न बनाये ॥४९॥ गुरु विद्वान् ने भी स्त्रियों व धन-रक्षा के विषय में यही कहा है ॥१॥
स्वपरदेशजावनपेक्ष्यानित्यश्चाधिकारः ॥५०॥
अर्थ: मंत्री आदि अधिकारियों की नियुक्ति स्वदेश व परदेश का विचार न कर अस्थायी रूप से करनी चाहिए क्योंकि अधिकारियों की स्थायी नियुक्ति का परिणाम हानिकर होता है अर्थात् वे राजकीय धन-अपहरण द्वारा राज्य-क्षति कर डालते हैं। परदेशवासी व्यक्ति जिस अधिकारी के कर्त्तव्य में कुशल हो, उसे उस पद पर अस्थायी तौर पर नियुक्त कर देना चाहिए ॥५०॥
आदायकनिबन्धक प्रतिबन्धकनीवीग्राहक राजाध्यक्षाः करणानि ॥५१॥
अर्थ: राजा के राज्यतन्त्र संचालनार्थ निम्न प्रकार पाँच करण-पंचकुल होते हैं। १. आदायक-व्यापारी व कृषकों से चुंगी व टैक्स के जरिये द्रव्य वसूल कर राज-कोष में जमा करने वाला कोषाध्यक्ष। २. निबंधक-उक्त उपाय द्वारा प्राप्त द्रव्य व माल का हिसाब वही-आदि में लिखने वाला। ३. प्रतिबन्धक चुंगी आदि के माल पर या खजाने में जमा होने वाली वस्तुओं पर राजकीय मुहर लगाने वाला। ४. नीवी ग्राहक-राजकीय द्रव्य को राज कोष में जमा करने वाला (खजानची)। ५. राजाध्यक्ष-उक्त चारों अधिकारियों की देख-रेख रखने वाला प्रधान पुरुष ॥५१॥
आयव्ययविशुद्धं द्रव्यं नीवी ॥५२॥
अर्थ: आमदनी में से उपयुक्त खर्च करने के पश्चात् बची हुई और जाँच पड़ताल-पूर्वक खजाने में जमा की हुई सम्पत्ति को ‘नीवी’ कहते हैं ॥५२॥
नीवीनिबन्धकपुस्तकग्रहणपूर्वकमायव्ययौ विशोधयेत् ॥५३॥
अर्थ: राजा उक्त नीवी ग्राहक-खजांची से उस वही की जिसमें राजकीय द्रव्य के आय-व्यय का हिसाब लिखा है, लेकर अच्छी तरह जांच-पड़ताल करके आय-व्यय को विशुद्ध करे ॥५३॥ किसी नीतिकार१ ने भी राजकीय संपत्ति की आय-व्यय शुद्धि के-विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥
आयव्ययविप्रतिपत्तौ कुशलकरणकार्यपुरुषेभ्यस्तद्विनिश्चयः ॥५४॥
अर्थ: जब सम्पत्ति का आय-व्यय करने वाले अधिकारियों में आमदनी व खर्च के विषय में विवाद समान शक्तिवाला विरोध-उपस्थित हो जाय तब राजा को जितेन्द्रिय व राजनीतिज्ञ प्रधान पुरुषों मंत्री आदि से विचार-परामर्श करके उसका निश्चय कर लेना चाहिए। अभिप्राय यह है कि किसी अवसर पर, कारणवश राज्य में टैक्स आदि द्वारा होने वाली सम्पत्ति की आय-आमदनी बिल्कुल रुक गई हो और धन का व्यय अधिक हो रहा हो, जो कि अवश्य करने योग्य प्रतीत हो जैसे शत्रुकृत हमले के समय राष्ट्र रक्षार्थ सैनिक शक्ति के बढ़ाने में अधिक और आवश्यक खर्च। ऐसे अवसर पर यदि अधिकारियों में आय-व्यय सम्बन्धी विवाद उपस्थित हो जावे, तो राजा को सदाचारी व राजनीतिज्ञ शिष्ट पुरुषों की समिति बैठाकर उक्त विषय का निश्चय कर लेना चाहिए अर्थात् यदि महान् प्रयोजन-सिद्ध (विजय) होता हो तो आमदनी से अधिक खर्च करने का निश्चय कर लेना चाहिए अन्यथा नहीं ॥५४॥ शुक्र२ विद्वान् ने भी सम्पत्ति के आय-व्यय सम्बन्धी विवाद के विषय में इसी प्रकार कहा है ॥१॥
नित्यपरीक्षणं कर्मविपर्ययः प्रतिपत्तिदानं नियोगिष्वर्थोपायाः ॥५५॥
अर्थ: राजा अधिकारियों से रिश्वत द्वारा संचित धन निम्न प्रकार तीन उपायों से प्राप्त कर सकता हैं। १. नित्य परीक्षण-सदा अधिकारियों की जाँच-पड़ताल करना। अर्थात् गुप्तचरों द्वारा उनके दोष जानकर कड़ी सजा देना। २. कम विपर्यय उन्हें उच्च पदों से पृथक् कर साधारण पदों पर नियुक्त करना, जिससे वे भयभीत होकर रिश्वत से संचित धन बताने में बाध्य हो सकें। ३. प्रतिपत्तिदानं-अधिकारियों के लिए छत्रचमर आदि बहुमूल्य वस्तुएँ भेंट देना; जिससे वे स्वामी से प्रसन्न होकर रिश्वत द्वारा गृहीत गुप्त धन दे देवें ॥५५॥
नापीडिता
नियोगिनो दुष्टव्रणा इवान्तःसारमुद्वमन्ति ॥५६॥
अर्थ: अधिकारी लोग दुष्ट व्रण (पके हुए दूषित फोड़े) समान बिना ताड़न-बंधन आदि किये गृह में रक्खा हुआ रिश्वत का धन नहीं बताते अर्थात् जिस प्रकार पके हुए दूषित फोड़े शस्त्रादि द्वारा छेदन-भेदन किये बिना भीतर का दूषित रक्त नहीं निकालते उसी प्रकार अधिकारी-गण भी कड़ी सजा पाये बिना रिश्वत का धन नहीं बताते ॥५६॥
पुनः पुनरभियोगे नियोगिषु
भूपतीनां वसुधाराः ॥५७॥
अर्थ: अधिकारियों को बार बार ऊँचे पदों से पृथक् करके साधारण पदों में नियुक्त करने से राजाओं को उनके द्वारा गृहीत रिश्वत का प्रचुर धन मिल जाता है। क्योंकि वे पदच्युत आदि होने के भय से रिश्वत का धन दे देते हैं ॥५७॥
सकृन्निष्पीडितं हि स्नानवस्त्रं किं जहाति
स्निग्धताम् ॥५८॥
अर्थ: केवल एक बार धोया हुआ स्नान-वस्त्र (धोती वगैरह) क्या अपनी मलीनता छोड़ सकता है? नहीं छोड़ सकता। अर्थात् जिस प्रकार नहाने का कपड़ा बार-बार पछाड़कर धोने से साफ होता है उसी प्रकार अधिकारी वर्ग भी बार-बार दंडित किये जाने से संचित रिश्वत आदि का गृहीत धन दे देता है ॥५८॥
देशमपीडयन् बुद्धिपुरुषकाराभ्यां पूर्वनिबन्धमधिकं
कुर्वन्नर्थमानौ लभते ॥५९॥
अर्थ: जो अधिकारी (अमात्य आदि) देश को पीड़ित नहीं करता (अधिक चुंगी व टैक्स द्वारा प्रजा को कष्ट नहीं देता) और अपनी बुद्धि-पटुता व उद्योगशीलता द्वारा राष्ट्र के पूर्व व्यवहार को विशेष उन्नतिशील बनाता हैं। अर्थात् राष्ट्र सम्बन्धी कृषि व वाणिज्य आदि की पूर्वापेक्षा विशेष उन्नति करके दिखाता है उसे स्वामी द्वारा धन व प्रतिष्ठा मिलती है ॥५९॥
यो यत्र कर्मणि कुशलस्तं तत्र विनियोजयेत् ॥६०॥
न खलु स्वामिप्रसादः
सेवकेषु कार्यसिद्धिनिबन्धनं किंतु बुद्धिपुरुषकारावेव ॥६१॥
शास्त्रविद्यप्यदृष्टकर्मा कर्मसु विषादं गच्छेत् ॥६२॥
अर्थ (सूत्र 60 से 62): जो अधिकारी जिस पद के कर्त्तव्य पालन में कुशल हो, उसे उस पद पर नियुक्त कर देना चाहिए ॥६०॥ निश्चय से स्वामी के प्रसन्न रहने से ही सेवक लोग कार्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सकते किन्तु जब उनमें कार्योपयोगी बुद्धि व पुरुषार्थ (उद्योग) गुण होंगे तभी वे कर्त्तव्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं ॥६१॥ शास्त्रवेत्ता विद्वान् पुरुष भी जिन कर्त्तव्यों से परिचित नहीं है, उनमें मोह (अज्ञान) प्राप्त करता है ॥६२॥
अनिवेद्यभर्तुर्न किंचिदारम्भं कुर्यादन्यत्रापत्प्रतीकारेभ्यः ॥६३॥
अर्थ: असह्य संकट दूर करने के सिवाय दूसरा कोई भी कार्य सेवक को स्वामी से निवेदन किये बिना नहीं करना चाहिए। अर्थात् युद्ध-कालीन शत्रु-कृत उपद्रवों का नाश सेवक को स्वामी से बिना पूछे कर देना चाहिए इसके सिवाय उसे कोई भी कार्य स्वामी की आज्ञा बिना नहीं करना चाहिए ॥६३॥
सहसोपचितार्थो मूलधनमात्रेणावशेषयितव्यः ॥६४॥
अर्थ: राजा अचानक मिला हुआ धन (लावारिस मरे हुए धनाढ्य व्यक्तियों को भाग्याधीन मिली हुई सम्पत्ति) खजाने में स्थापित कर उसकी वृद्धि करे ॥६४॥
मूलधनाद् द्विगुणाधिको लाभो भाण्डोत्थो यो भवति स राज्ञः ॥६५॥
अर्थ: जब व्यापारी लोग बर्तनों आदि के व्यापार में मूलधन से दूने से भी अधिक धन कमाते हों तब राजा को व्यापारियों के लिए मूल धन से दूना धन देकर अधिक धन जब्त कर लेना चाहिए। क्योंकि व्यापारी गण इतना अधिक मुनाफा छल-कपट व चोरी आदि कुमार्ग का अनुसरण किये बिना नहीं कर सकते ॥६५॥
परस्परकलहो नियोगिषु भूभुजां निधिः ॥६६॥
अर्थ: अधिकारियों में आपसी फूट-लड़ाई झगड़ा होने से राजाओं को खजाने के मिलने के समान महा लाभ होता है, क्योंकि ऐसा होने से अधिकारी वर्ग राजा के समक्ष एक दूसरे का अपराध प्रकट कर देते हैं, जिसके फलस्वरूप दण्डित किये जाने पर वे लोग रिश्वत द्वारा हड़प किया हुआ धन बता देते हैं ॥६६॥
नियोगिषु लक्ष्मीः क्षितीश्वराणां द्वितीयः कोशः ॥६७॥
अर्थ: अधिकारियों की सम्पत्ति राजाओं का दूसरा खजाना है क्योंकि उनके ऊपर संकट पड़ने पर अधिकारियों की सम्पत्ति उनके काम आ जाती है ॥६७॥
सर्वसंग्रहेषु धान्यसंग्रहो महान्, यतस्तन्निबन्धनं जीवितं सकलप्रयासश्च ॥६८॥
अर्थ: समस्त हाथी-घोड़े-आदि के संग्रह में से अन्न-संग्रह उत्तम माना गया है क्योंकि वह प्राणियों के जीवन-निर्वाह का साधन है, एवं जिसके कारण मनुष्यों को कृषि आदि जीविकोपयोगी कार्यों में कष्ट उठाना पड़ता है ॥६८॥
न खलु मुखे प्रक्षिप्तः खरोऽपि द्रम्मः प्राणत्राणाय यथा धान्यं ॥६९॥
अर्थ: जिस प्रकार भक्षण किया हुआ धान्य प्राण-रक्षाकर सकता है, उस प्रकार निश्चय से बहुमूल्य सुवर्ण का सिक्का मुख में रक्खा हुआ प्राणरक्षा नहीं कर सकता ॥६९॥
सर्वधान्येषु चिरजीविनः कोद्रवाः ॥७०॥
अर्थ: समस्त धान्यों में कोदों चिरस्थायी (घुण न लगने वाले) होते हैं, अतः उनका संग्रह करना चाहिए ॥७०॥
अनवं नवेन वर्द्धयितव्यं व्ययितव्यं च ॥७१॥
अर्थ: पुरानी संचित धान्य ब्याज न (फसल के मौके पर कृषकों को बाड़ी में देना) देकर बदले में नवीन धान्य के आय द्वारा बढ़ानी चाहिए और ब्याज द्वारा प्राप्त हुई धान्य खर्च करते रहना चाहिए, ताकि मूलधन की हानि न हो सके ॥७१॥
लवणसंग्रहः सर्वरसानामुत्तमः ॥७२॥
सर्वरसमयमप्यन्नमलवणं गोमयायते ॥७३॥
अर्थ (सूत्र 72 से 73): समस्त घृत व तेल प्रभृति रसों के संग्रह में नमक संग्रह उत्तम है अतः विवेकी पुरुष उसका संग्रह करे क्योंकि नमक के बिना सब रसों से युक्त अन्न भी गोबर समान अरुचिकर लगता है ॥७२-७३॥