तत्त्वचर्चा 9 (2 फ़रवरी 1999)
पूज्य बाबूजी जुगल किशोर जी युगल, कोटा
तत्त्व-चर्चा नंबर ९, तारीख २-२-१९९९
श्री शांतिभाई ज़वेरी निवास स्थान - नीलांबर, मुंबई
प्रश्न:-76 आत्मा की प्रतीति और आत्मानुभूति, ये (इन) दो प्रयोग के समय में ज्ञान-दर्शन-चारित्र गुणों की परिणति में क्या फर्क रहता है?
मुमुक्षु:- परिणमन में क्या फर्क रहता है?
पूज्य बाबूजी:- गुणों के परिणमन में क्या फर्क रहता है?
मुमुक्षु:- हाँ जी!
पूज्य बाबूजी:- जिस समय आत्मा की अनुभूति अर्थात् शुद्धोपयोग होता है, तो उस समय सम्यग्दर्शन की पर्याय पूर्ण होती है; पूर्ण प्रगट होती है चाहे उपशम हो, क्षयोपशम हो, क्षायिक हो (मगर) सम्यग्दर्शन की पर्याय पूर्ण प्रगट होती है। सम्यग्ज्ञान भी पूरा होता है।
केवलज्ञान और श्रुतज्ञान का जो अंतर है वो यहाँ गिनना नहीं चाहिए। वो ज्ञान पूरा ही है, श्रुतज्ञान (क्योंकि) शुद्धोपयोगरूप है और आत्मा का स्पष्ट अनुभव (अर्थात्) प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा है। आत्मा के प्रदेश दिखाई नहीं देते फिर भी प्रत्यक्षवत् होने से प्रत्यक्ष अनुभूति कही जाती है। और चारित्र गुण में आंशिक परिणमन होता है, उसे स्वरूपाचरण (चारित्र) कहते हैं। लेकिन इतना अल्प होता है चारित्र कि करणानुयोग उसको (चारित्र) नहीं गिनता, (मात्र) अध्यात्म गिनता है।
जैसे शुद्धोपयोग है वो निश्चय रत्नत्रयात्मक होता है - ऐसा वचन है आगम का। शुद्धोपयोग की जो परिणति है वो निश्चय रत्नत्रयात्मक होती है। जैसे पहली बार हुआ तो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और (सम्यक्) चारित्र की अल्प परिणति (हुई)। इस तरह निश्चय रत्नत्रयात्मक (रूप ही) शुद्धोपयोग होता है।
शुद्धोपयोग वो ज्ञान की पर्याय है, लेकिन उस समय तीनों की उत्पत्ति (होती है) और फिर सम्यग्दर्शन रहता है, ज्ञान भी रहता है। (और) अगर (ज्ञान) बाह्य पदार्थों में चला जाता है तो ये ज्ञान रहता है उसे व्यवहार ज्ञान कहते हैं। शुद्धोपयोग, स्वसंवेदन, निर्विकल्प समाधि, निर्विकल्प अनुभूति - ये निश्चयज्ञान है, निश्चय सम्यग्ज्ञान। और चारित्र में जो स्थिरता- लीनता (है) उसका नाम स्वरूपाचरण चारित्र कहलाता है। करणानुयोग उसको नहीं गिनता (लेकिन) अध्यात्म में उसकी पूरी गिनती होती है क्योंकि अनंतानुबंधी कषाय (चली) गई है। तो अनंतानुबंधी (कषाय) चारित्र
76 आत्मानुभूति के समय में ज्ञान-दर्शन-चारित्र गुणों की परिणति में क्या फर्क रहता है? - 0.15 Mins (गुण) की मिथ्या पर्याय है। तो वो (उसके) जाने पर अल्प चारित्र अवश्य प्रगट होता है। और वो चारित्र प्रगट होता है, इसीलिए उधर आनंद प्रगट होता है। क्योंकि स्थिरता ही न हो आत्मा में, तो आनंद नहीं होगा। क्योंकि सम्यग्दर्शन वो तो प्रतीति करता है, श्रद्धा करता है, अहम् करता है। ज्ञान वो आत्मा को जानता है, जैसा है वैसा जानता है। तो उसी समय चारित्र में अल्प स्थिरता होती है, लीनता। स्थिरता माने लीनता; और उस लीनता के फलस्वरूप अतींद्रिय आनंद का जन्म होता है। लेकिन शुद्धोपयोग और आत्मानुभूति की जो दशा है वो शुद्ध-चिन्मात्र ज्ञायक पर ही रहती है, तो इधर आनंद रहता है।
और इधर शुद्धोपयोग सिमटकर, शुद्धोपयोग समाप्त होकर जब बाह्य पदार्थों में परिणति हो जाती है, तो उस समय वो आनंद नहीं रहता जो अनुभूति के समय (था)। उपयोगात्मक जो आनंद है वो उस समय नहीं रहता (लेकिन) सुख गुण में जो निर्मलता आई है, वो बराबर रहती है विकल्पों के समय भी। माने विकल्प की ओर, रागादि की ओर जब ज्ञान चला जाता है… (ऐसा) कहते हैं माने व्यवहार है ये भी; ज्ञान चला जाता है माने व्यवहार से। ज्ञान के लिए व्यवहार है ये, वास्तविक नहीं है। वास्तविक तो जो पद्धति है ज्ञान के जानने की (वो) उसी तरह जानता है। क्योंकि राग ज्ञान में जानने में नहीं आता, राग ज्ञान में आता नहीं है। ज्ञान स्वयं राग के स्वरूप को जानता हुआ परिणमित होता है वो ज्ञान की ही पर्याय है, वो राग की नहीं। तो इस तरह तीनों का जन्म होता है, तो जो आनंद अनुभूति के समय हुआ, वो आनंद बाह्य पदार्थों की दशा में जब उपयोग होता है तो उस समय नहीं रहता। लेकिन सुख में, सुख गुण में जो निर्मलता आई है वो बराबर विकल्पदशा के समय भी बनी रहती है। और चारित्र में भी मिश्र परिणति हो जाती है - कुछ शुद्धता और कुछ अशुद्धता। उसका तोल-माप कर्मों से किया जाता है। जो तीन कषायें अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान (और) संज्वलन ये जो बाकी हैं, इतना तो अचारित्र है। मिथ्याचारित्र यहाँ नहीं है अब।
मुमुक्षु:- बराबर! अचारित्र है।
पूज्य बाबूजी:- अचारित्र है। और जितनी शुद्धता प्रगट हुई है उतना सम्यक्चारित्र है। इस तरह अनुभूति के समय इन तीनों का जन्म होता है। और फिर तीनों की स्थिति (ये कि) सम्यग्दर्शन रहता है, सम्यग्ज्ञान वो व्यवहार हो जाता है। बाह्य पदार्थों को विषय करते समय वो व्यवहारज्ञान है। सम्यग्ज्ञान ही है लेकिन है व्यवहार; और सम्यक्चारित्र में जो दशा प्रगट हुई वो बराबर रहती है।
मुमुक्षु:- बाबूजी! दोनों ही… जैसे जन्म कैसे होता है और फिर उसकी…
पूज्य बाबूजी:- फिर उसकी परिणति कैसे चला करती है… वो बराबर रहता है।
मुमुक्षु:- माने दर्शन और ज्ञान तो पूर्णरूप से शुद्ध हो जाते हैं पर वो चारित्र की आंशिक… पूज्य बाबूजी:- आंशिक शुद्धि चारित्र में प्रगट होती है, उसे स्वरूपाचरण कहते हैं। वैसे चारित्र के जो भेद हैं वो तो संयम, संयमासंयम इत्यादि हैं, यथाख्यात् तक। लेकिन ये स्वरूपाचरण चारित्र का लक्षण ही ये है (कि) स्वरूपे चरणं चारित्रं (प्रवचनसार गाथा ७ ‘तत्त्वप्रदीपिका’ नामक संस्कृत टीका) स्वरूप में जो आचरण है उसका नाम चारित्र है। तो यहाँ पर वो जो चारित्र के नाम हैं उनकी प्रगटता नहीं बताई। पर स्वरूप में आचरण अवश्य होता है और उसके फलस्वरुप आनंद का जन्म होता है। आनंद का जन्म होता है लेकिन आत्मा आनंद को जानने नहीं जाता।
मुमुक्षुः- वाह रे वाह!
पूज्य बाबूजी:- आनंद जानने में आ जाता है लेकिन बुद्धिपूर्वक वह शुद्धात्मा को, ध्रुव को, चिन्मात्र को जानता हुआ (ही) परिणमित होता है।
मुमुक्षुः- बराबर! आनंद को जानने नहीं जाता।
पूज्य बाबूजी:- जानने नहीं जाता लेकिन आनंद जानने में आ जाता है। आनंद उस समय परतत्त्व है। स्वतत्त्व नहीं है, स्वतत्त्व केवल शुद्धात्मा है।
मुमुक्षुः- बराबर! आनंदमूर्ति है।
प्रश्न है प्रभु!77 ज्ञान में जब ज्ञेय का प्रतिबिम्ब झलकता है, तब ज्ञान में वैसा ही अनुभव होता है। ज्ञान में जब ज्ञेय का प्रतिबिम्ब झलकता है, तब ज्ञान में वैसा ही अनुभव होता है। उस समय आत्मा की अनुभूति कैसे करनी चाहिए? कृपया कर स्पष्ट कीजिए।
ज्ञान में जब ज्ञेय का प्रतिबिम्ब झलकता है - ये बात कही जाती है। ये व्यवहार है ये, ये निश्चय नहीं (है)। क्योंकि ज्ञेय का कोई प्रतिबिम्ब ज्ञान में नहीं आता। प्रतिबिम्ब अर्थात् जो प्रतिभास है… प्रतिबिम्ब माने प्रतिभास। जो प्रतिभास है वो ज्ञान ही है और वो ज्ञानाकार है। ज्ञान ने स्वयं निरपेक्ष भाव से, ज्ञेय से अत्यंत निरपेक्ष रहकर उसकी रचना अपनी सामर्थ्य से की है। लेकिन उसका विषय, ये व्यवहार की ओर से कहा जाता है कि उसका विषय जो है वो राग है; तो राग को जाना इस तरह व्यवहार से कहने में आता है। वास्तविकता ये है कि वो जो प्रतिभास है वो ज्ञान ही है। माने वो जैसे राग प्रतिबिंबित हुआ ऐसा कहते हैं। तो राग प्रतिबिंबित नहीं हुआ बल्कि स्वयं ज्ञान ने राग के स्वरूप को जानकर अपना आकार वैसा बनाया है। वैसा, वह नहीं।
मुमुक्षुः- वह नहीं, वैसा!
पूज्य बाबूजी:- वैसा आकार अपना बनाया है और वो संपूर्ण प्रतिभास वो ज्ञानाकार है और वो ज्ञान ही है। इस तरह वो ज्ञान है अर्थात् मैं ही हूँ, ज्ञायक ही हूँ। इस तरह ज्ञायक की ओर अंतर्मुख होकर अनुभूति और शुद्धोपयोग हो जाता है। ये अंतर्मुख होने की पद्धति है।
77 ज्ञान में जब ज्ञेय का प्रतिबिम्ब झलकता है, तब ज्ञान में वैसा ही अनुभव होता है। उस समय आत्मा की अनुभूति कैसे करनी चाहिए? - 8.42 Mins ज्ञान की जो स्वपरप्रकाशकता है, इसमें ये जो स्वप्रकाशन है… वास्तव में (तो) स्व का ही प्रकाशन होता है (अर्थात्) ज्ञान ही जानने में आता है। ये भी व्यवहार है (कि) ज्ञान ही जानने में आता है क्योंकि इसमें भी जो अंतर है, भेद है, उस भेद में अनुभूति नहीं होती (है); पर इसके फलस्वरूप भी विकल्प का जन्म होता है। इसलिए ज्ञान जानने में आता है माने ये सबका सब ज्ञान ही है अर्थात् मैं ही हूँ। इस तरह ‘मैं ही हूँ, ज्ञायक ही हूँ, चिन्मात्र ही हूँ’, तो ये इस तरह अनुभूति में चला जाता है।
वो तो विचार की दशा है। ज्ञान में ज्ञान ही जानने में आता है - ये तो विचारदशा है, विकल्पदशा है। विकल्प माने राग नहीं, पर ज्ञानात्मक विकल्प।
मुमुक्षुः- वाह रे वाह! ये क्या प्रभु?
पूज्य बाबूजीः- रागात्मक विकल्प नहीं पर ज्ञानात्मक विकल्प! तो ज्ञानात्मक विकल्प में ज्ञान ही जानने में आता है, इतना हुआ। पर इससे क्या साध्य है? ज्ञायक तो हाथ में नहीं आया। इसीलिए ये सबका सब जितना भी ये प्रतिभास है अनेकाकारवाला, ये सबका सब ज्ञान ही है और ज्ञान है वो मैं ही हूँ, ज्ञायक ही हूँ, चिन्मात्र (अर्थात्) मैं शुद्ध ही हूँ - ऐसा जानता है तो अनुभूति हो जाती है।
मुमुक्षुः- माने ‘ज्ञान जानने में आ रहा है’ वो तो भेद (अर्थात्) ज्ञान का विकल्प है। परंतु ‘मैं ज्ञान हूँ’ तो अनुभूति हो जाती है?
पूज्य बाबूजीः- ‘ज्ञान है वो मैं ही हूँ’ - ये भी विकल्प। ‘ज्ञान है वो मैं ही हूँ’ - ये भी विकल्प है। और ‘मैं ज्ञायक हूँ’ बस ये अनुभूति का स्वरूप (है)। ‘मैं ज्ञायक हूँ’ - ऐसा।
मुमुक्षुः- जब ज्ञान जानने में आया तो ‘मैं ज्ञायक, चिन्मात्र हूँ’ - ऐसा जाना।
पूज्य बाबूजीः- ऐसा जाना।
मुमुक्षुः- हाँ! तो अनुभूति (होती है)?
पूज्य बाबूजीः- तो अनुभूति होती है। ‘ज्ञायक चिन्मात्र हूँ’ - ऐसा जानकर ज्ञायक में उपयोग का स्थिर हो जाना इसका नाम अनुभूति है।
मुमुक्षुः- बराबर! ‘मैं चिन्मात्र, ज्ञायक हूँ’ - ऐसा जानकर ज्ञान का, उपयोग का स्थिर हो जाना।
पूज्य बाबूजीः- उपयोग का ज्ञायक में स्थिर हो जाना। होता सब पर्याय में है। कल अपनी बात आयी थी। सबका सब पर्याय में ही होता है। जो ज्ञायक है ध्रुव और शुद्ध, ध्रुव है और शुद्ध है। शुद्ध है और ध्रुव है इसीलिए वो उपलब्ध होता है। अगर वो ध्रुव न हो तो उपलब्ध नहीं होता, जैसे (कि) पर्याय। क्योंकि पर्याय जो है वो तो चक्रीय है (अर्थात्) चक्कर खाती है। एक के बाद एक आती है और जाती है। तो इसीलिए श्रद्धा उसमें मिथ्या होती है। श्रद्धा वहाँ निभती नहीं है बल्कि श्रद्धा को तीव्र आकुलता (होती है)। श्रद्धा में और ज्ञान में तीव्र आकुलता होती है क्योंकि उस (चक्रीय) पर्याय ने संपूर्ण आत्मा का अहम् किया। जो पर्याय है, कोई भी पर्याय… अपनी पर्याय हो अथवा कोई जगत की पर्याय हो, उसमें संपूर्ण आत्मतत्त्व का अहम् किया। तो वह जो अहम् है, वो मिथ्या है। मिथ्या (अर्थात्) ज्ञान चूक गया चुनाव करने में, selection में। द्रव्य-पर्याय में जो selection (चुनाव) करना था, तो वो पर्याय का selection (चुनाव) कर बैठा आत्मा के रूप में। और पर्याय क्षणभंगुर होने से उसको आत्मा मान लेने पर, पर्याय के व्यय में आत्मा का व्यय अर्थात् आत्मा का नाश अनुभव में आता है; इसीलिए तीव्र आकुलता होती है। निगोद से लेकर, एकेन्द्रीय से लेकर सैनी पंचेंद्रिय तक अज्ञानी की स्थिति यही है कि वो निरंतर तीव्र आकुलता का वेदन करता है। चाहे पापभाव हो, चाहे पुण्यभाव, कोई भी हो तीव्र आकुलता का वेदन करता है। आकुलता में थोड़ा फर्क हो सकता है तीव्र-मंद का, लेकिन आकुलता ही होती है उसके फल में।
मुमुक्षुः- क्योंकि ज्ञान अपना धर्म चूक गया।
पूज्य बाबूजीः- चूक गया। selection (चुनाव) में चूक गया। select (चुनाव) करना था उसे ध्रुव को क्योंकि वो निष्कम्प होता है (और) अचल होता है और जब चाहें तब उपलब्ध होता है। इसलिए select (चुनाव) तो वो करना चाहिए। लोक में भी ध्रुव को ही select (चुनाव) करते हैं लोग।
मुमुक्षुः- बराबर!
पूज्य बाबूजीः- एक स्टील का गिलास लाए (और) एक काँच का गिलास लाए। काँच का ग्लास लाए तब से चिंता शुरू हो गई। स्टील का लाए तो निश्चिंत है।
इसलिए पर्याय मात्र, चाहे अपनी हो (या) विकारी हो, अपनी शुद्ध पर्याय हो अथवा परद्रव्य की पर्याय हो, कोई भी हो… पर्यायमात्र के प्रति बल समाप्त हो जाना चाहिए, वजन समाप्त हो जाना चाहिए, उससे विरक्ति हो जाना चाहिए। आसक्ति टूट जाना चाहिए, ममत्व टूट जाना चाहिए, अहम् टूट जाना चाहिए। तो अहम् टूट जाने के बाद एकमात्र जो चिन्मात्र ज्ञायक है, वही शेष रहता है। इसलिए उपयोग उधर ढल जाता है और उसी समय श्रद्धा का भी जन्म होता है, सम्यग्दर्शन का; सम्यग्ज्ञान का भी जन्म होता है और स्वरूपाचरण चारित्र का (भी) जन्म होता है (अर्थात्) आंशिक चारित्र प्रगट होता है। इस तरह रत्नत्रय परिणति होती है। शुद्धोपयोग - है तो ज्ञान की पर्याय लेकिन उसमें रत्नत्रय साथ (में) होता है।
ज्ञायक78 तो ज्ञायक ही रहता है। क्योंकि हम ध्रुव मान चुके न उसे इसलिए वो तो अचल और निष्कंप है। तो वो कभी पर्याय में नहीं आता। पर पर्याय… जैसे राग को जाना ऐसा हम बोलें, तो राग को नहीं जाना क्योंकि राग नहीं है ज्ञान में। ज्ञान और राग सदा से ही, अनादि से ही भिन्न रहे हैं और आगे भी जब तक राग चलेगा तब तक भिन्न ही रहेंगे। राग-द्वेष-मोह सब आ गए इसमें। राग जो है represent (प्रतिनिधित्व) करता है, सबको सारे विकार को; योग तक का विकार,
78 अभेदता की पराकाष्ठा। - 17.27 Mins चौदवें गुणस्थान तक का वो सब आ गया इसमें, सारा का सारा। इसीलिए वो जैसे अपन रागाकार कहते हैं, तो रागाकार माने ज्ञानाकार। वो जो राग के स्वरूप का प्रतिभास माने राग के स्वरूप का ज्ञान (है)। प्रतिभास माने जैसा राग का स्वरूप है - ज्ञान ठीक वैसा का वैसा जाननेरूप प्रवृत्त होता है, इसे प्रतिभास कहते हैं।
मुमुक्षुः- बहुत सुंदर! फिर से।
पूज्य बाबूजी:- क्योंकि राग का क्या आकार होगा? राग का आकार क्या है? राग का कोई आकार नहीं। तो इसीलिए राग का स्वरूप जो है अर्थात् वो परसंबंधों को लेकर ही चलता है सदा, सदा संबंध-भाव से चलता है। तो ये संबंध-भाव वाला जो राग है, द्वेष है, पाप है, पुण्य है, ये (सब) संबंध-भाव की परिणतियाँ हैं। संबंध-भाव माने मिथ्यादर्शन हो अथवा न हो तो भी संबंध-भावरूप ही उसका स्वर होता है, राग का, द्वेष का और पाप का, पुण्य का। पाप जो है वो विषयों में प्रवृत्त होता है। तो मेरे हैं, मैं चखता हूँ, इत्यादि इत्यादि विकल्प लेकर परिणत होता है।
जैसे इसकी अपन चर्चा करते हैं कि वो राग ज्ञान में नहीं आता क्योंकि वो न्यारे ही हैं, सदा से। वो हमेशा से ज्ञान के बाहर ही रहा है पर parallel चलता है, समानांतर चलता है। तो राग जैसा प्रतिभास, राग के स्वरूप का प्रतिभास - ऐसा कहना भी व्यवहार (है)। क्योंकि वो राग का स्वरूप नहीं है न असल में तो। वो तो ज्ञान ने ही राग जैसा, राग को जैसा जानकर और अपना स्वरूप तैयार किया है, अपनी पर्याय का स्वरूप है वो।
तो वो जो प्रतिभास है वो स्वयं ज्ञान है। प्रतिभास स्वयं ज्ञान है, जाननभावरूप है। वो कोई दो चीज नहीं है कि ज्ञान ने ज्ञान को ही जाना; तो ऐसी दो चीज नहीं है। पर वो जो प्रतिभास है वो स्वयं ज्ञान है और स्वयं ही ज्ञेय है - इस तरह अभेद हुआ। तो इसका अर्थ हुआ कि ये ज्ञानाकार ही है, ज्ञेयाकार नहीं है। और ज्ञानाकार है अर्थात् ज्ञान ही है और कुछ नहीं है। कोई विशेषता इसमें नहीं है। इस तरह विशेषता का संपूर्णरूप से तिरोभाव करके पर्याय में सामान्यज्ञान का आविर्भाव हुआ। सामान्यज्ञान माने पर्याय में सामान्य।
मुमुक्षुः- बहुत सुंदर! …
पूज्य बाबूजी:- हाँ! वो सामान्य नहीं।
मुमुक्षुः- नहीं! त्रिकाल सामान्य नहीं?
पूज्य बाबूजी:- द्रव्य का या गुण का सामान्य नहीं (बल्कि) पर्याय सामान्य हो गई अर्थात् ज्ञान ही हूँ। ज्ञान हूँ अर्थात् मैं तो ज्ञायक ही हूँ, क्योंकि इसने पहले ज्ञायक का निश्चय कर लिया था।
मुमुक्षुः- निर्णय पहले!
पूज्य बाबूजी:- निर्णय में पहले ज्ञायक का निर्णय किया था कि ‘मैं मात्र ज्ञायक हूँ’। इसलिए बीच में रुकता नहीं है, इन विकल्पों में। ये सब विकल्प हैं; तो विकल्पों में न रुककर ज्ञायक पर पहुँचता है। कैसे पहुँचता है? ज्ञायक तो ज्ञायक की जगह रहता है और जैसे राग का प्रतिभास हुआ (था) इसी तरह ज्ञायकाकर होता है ज्ञान। ज्ञायक ज्ञायक की ही जगह रहता है।
मुमुक्षु:- जैसे राग राग की ही जगह रहता है।
पूज्य बाबूजी:- राग की जगह रहता है। इस तरह ज्ञायक ज्ञायक की जगह रहता है और ज्ञान ज्ञायक जैसे आकार (का) अपने में निर्माण करता है, उसकी संरचना करता है ज्ञायक जैसे आकार की। तो पर्याय जो है वो ‘मैं ज्ञायक का अनुभव कर रही हूँ’ - इस तरह भेद में प्रवृत्त नहीं होती। क्योंकि अगर भेद में प्रवृत्त होगी सदा ही, सदा ही अगर… द्रव्य और पर्याय ये दो भेद हैं और दो भेद जो न्यारे-न्यारे हैं, विरुद्ध स्वभाववाले हैं… तो अगर पर्याय भेद में प्रवृत्त होगी अर्थात् ‘मैं ज्ञायक को जानती हूँ’ - इस तरह भेद में ही होगी… तो एक पदार्थ में जो भेदाभेद स्वरूप है, तो ये तो भेद हुआ और वो अभेदता जो है वो नहीं होने के कारण द्रव्य और पर्याय ये दो द्रव्य हो जायेंगे; एक द्रव्य नहीं रहेगा। इसलिए उसकी अभेद परिणति भी होना चाहिए।
मुमुक्षु:- वाह रे वाह!
पूज्य बाबूजी:- तो अभेद परिणति होती है कि वो जो उपयोग की पर्याय है, ज्ञान की पर्याय है, श्रुतज्ञान की पर्याय, भावश्रुतज्ञान की पर्याय, वो ज्ञायक जैसी रचना अपने भीतर उसके स्वरूप की करती है… जैसा निश्चय किया था पहले विकल्पदशा में, वैसी की वैसी रचना अपने भीतर करती है और फिर अभेद होकर बोलती है ‘मैं ज्ञायक चिन्मात्र हूँ’।
मुमुक्षु:- बहुत सुंदर! बहुत सुंदर!
पूज्य बाबूजी:- मैं चिन्मात्र हूँ।
मुमुक्षु:- भेद-अभेद स्वरूप वस्तु है।
पूज्य बाबूजी:- भेद-अभेद स्वरूप वस्तु है। तो हम केवल भेद में ही ढहेंगे तो वो एकांत होगा और वो दो द्रव्य हो जायेंगे। एक ही पदार्थ के अंग जो द्रव्य और पर्याय हैं, वो दो द्रव्य हो जायेंगे अगर एकांत भेद में रहेंगे तो। इसलिए अभेद परिणति भी होना चाहिए कि यहाँ आकर ऐसी अभेदता हुई कि ये अभेदता की पराकाष्ठा है। इससे आगे अभेदता का कोई रूप नहीं है (कि) मैं ज्ञायक चिन्मात्र हूँ।
मुमुक्षु:- बराबर! ये अभेदता की पराकाष्ठा है।
पूज्य बाबूजी:- ये अभेदता की पराकाष्ठा है। तो ये अनुभूति हो गई पर्याय को। अपने में रचना की तो वही ज्ञाता और वही ज्ञेय और वही ज्ञान - तीनों की अभेद परिणति होकर अनुभूति हो जाती है। ये अनुभूति ही है (कि) मैं ज्ञायक हूँ। ये अनुभूति ही है सचमुच।
मुमुक्षु:- मैं ज्ञायक हूँ!
पूज्य बाबूजी:- मैं ज्ञायक हूँ - ये अनुभूति ही है, क्योंकि अनुभव पर्याय में होता है। द्रव्य में नहीं होता है, ध्रुव में अनुभव नहीं होता। अब जब ध्रुव में अनुभव नहीं होता तो फिर अनुभव करनेवाला कोई चाहिए न, जाननेवाला। वरना ध्रुव के रहने से फायदा क्या हुआ? ध्रुव के अस्तित्व से लाभ क्या हुआ? इसलिए कुदरत की ही है ये एक रचना। कुदरत का ही स्वरूप ऐसा है कि जो ध्रुव है वो यदि अनबोला है, तो ये जो अनुभूति की पर्याय है ये बोलनेवाली है।
मुमुक्षुः- वाह रे वाह! बहुत सुंदर!
पूज्य बाबूजी:- ये दोनों का संग साथ में किया। साथ में दोनों का संघ है, ऐसा ये कुदरत ही है प्रकृति की। हर एक में! अचेतन पदार्थों में भी यही है कि वो द्रव्य तो ध्रुव रहता है और जो पर्याय है वो उसकी परिचायिका होती है, परिचय देनेवाली।
मुमुक्षुः- वाह रे वाह! परिचायिका होती है। माने स्व-पर का जो प्रतिभास होता है, वही ज्ञेयाकार है; और ज्ञेयाकार है वह जाननभावरूप है तो ज्ञानाकर है।
पूज्य बाबूजी:- वो ज्ञेयाकार है माने ये व्यवहार कथन। और वो ज्ञानाकर है ये निश्चय कथन, उसकी अपेक्षा।
मुमुक्षुः- उसकी अपेक्षा माने?
पूज्य बाबूजी:- उसकी अपेक्षा माने ज्ञेयाकार की अपेक्षा ये निश्चय कथन (है)। फिर ये निश्चय भी व्यवहार हो गया कि ये तो ज्ञानाकार ही है क्योंकि ये विकल्प है, इसलिए ये व्यवहार हो गया। तो ये भी मिटकर मैं तो ज्ञान ही हूँ - ये निश्चय हो गया। और फिर ज्ञान हूँ - ये भी व्यवहार। तो ‘मैं तो ज्ञायक चिन्मात्र ही हूँ’ - ये निश्चय हुआ और अनुभूति प्रगट (हो गई)।
मुमुक्षुः- ये अनुभूति हो गई। माने ये पूरी अनुभूति की रीति (है)।
पूज्य बाबूजी:- श्रंखला है ये।
मुमुक्षुः- श्रंखला है। बराबर!
पूज्य बाबूजी:- अंतर्मुख होने की ये श्रंखला है एक। एक प्रक्रिया है ये।
मुमुक्षुः- माने उत्तरोत्तर वृद्धिंगत अंतर्मुखता होती है, जो पहले निश्चय था वही व्यवहार बनकर रह जाता है।
पूज्य बाबूजी:- वही व्यवहार बनकर रहता है। और वो जो ज्ञान में जिसे हम प्रतिभास कहते हैं ज्ञेय जैसा प्रतिभास, तो उस प्रतिभास को ज्ञेय कहना (सिर्फ) ये बताने के लिए कि वर्तमान में उसका विषय क्या है। व्यवहार के बिना वो समझ में नहीं आएगा न। क्योंकि निश्चय का ही अगर हम उत्तर देंगे तो वो एक ही उत्तर होगा। कुछ नहीं, कोई जानने में नहीं आता। (बस!) ज्ञान ही जानने में आता है। तो इससे वो उत्तर नहीं होगा। क्योंकि ज्ञान ही अगर जानने में आता है, तो ज्ञान में ये विभिन्न प्रकार के चित्र क्यों बनते हैं? - ये प्रश्न खड़ा होता है। ज्ञान ही जानने में आता है, तो ज्ञान तो साफ होना चाहिए एक बिल्कुल सफेद दीवार की तरह। उसमें ये जो चित्र बनते हैं ये क्यों बनते हैं? ऐसा प्रश्न पैदा होता है। तब उसका उत्तर व्यवहार (नय) देता है कि ये चित्र इसलिए बनते हैं कि ऐसे के ऐसे पदार्थ बाहर हैं। ये तो ज्ञान के चित्र हैं और ये ज्ञान ने जो चित्र बनाये, ऐसे के ऐसे पदार्थ बाहर जगत में हैं। जीव-पुद्गल-धर्म-अधर्म-आकाश और काल, बाहर ये पदार्थ हैं; और ज्ञान का जो चितेरा (है) वो अपने भीतर ये चित्र स्वतः बनाता है।
मुमुक्षुः- आहाहा! बहुत सुंदर! ज्ञान का जो चितेरा है वो अपने भीतर, खुद का खुद ज्ञान चित्र बना देता है।
पूज्य बाबूजीः- स्वयं ही चित्र बनाता है, बिना किसी की सहायता के, निरपेक्ष भाव से। अत्यंत निरपेक्ष भाव से। अत्यंत निरपेक्ष ज्ञप्ति है ये।
मुमुक्षुः- और ये बताता है कि बाहर ऐसा कोई न कोई पदार्थ कहीं पर है।
पूज्य बाबूजीः- इसका नाम व्यवहार हुआ। तो उस प्रतिभास को हम ज्ञेय का नाम देते हैं और ज्ञेय का नाम इसीलिए देते हैं क्योंकि पदार्थ अनंत हैं। तो ये जो प्रतिभास है, ये कौनसे पदार्थ जैसा है? - ऐसा जानने के लिए उस प्रतिभास को हम ज्ञेय का नाम देते हैं तो इससे पता चलता है कि ज्ञान ने ये चित्र उस पदार्थ जैसा बनाया है, क्योंकि अनंत हैं (न) पदार्थ।
मुमुक्षुः- बहुत सुंदर! ज्ञान ने ये चित्र उस पदार्थ जैसा बनाया है; ना कि वो पदार्थ जैसा ज्ञान हुआ है।
पूज्य बाबूजीः- हाँ ऐसा! वो तो है ही नहीं। वो तो है ही नहीं। ये व्यवहार कथन (है), परप्रकाशकता कहते हैं इसको। इसका नाम परप्रकाशकता है लेकिन (वास्तव में) स्वप्रकाशकता ही है ये। स्वप्रकाशकता की पर्याय को ही परप्रकाशकता कहना, इसका नाम व्यवहार है।
मुमुक्षुः- स्वप्रकाशकता की पर्याय को ही…
पूज्य बाबूजीः- परप्रकाशकता कहना इसका नाम व्यवहार है।
मुमुक्षुः- ये थोड़ा सा जरा लंबा है।
पूज्य बाबूजीः- ज्ञान के प्रतिभास को माने ज्ञानाकर जैसा ज्ञेय का जो आकार है, वैसा ज्ञानाकर हुआ उसका नाम प्रतिभास। तो उस प्रतिभास को ज्ञेय का नाम देना इसका नाम व्यवहार - व्यवहारनय। वैसा हुआ नहीं (है) कुछ। वो प्रतिभास ज्ञान ही है, वो ज्ञेय नहीं बना। लेकिन अगर हम उसका नाम ज्ञेय नहीं रखते तो ये पता नहीं लगता कि ज्ञान का विषय क्या है।
ये भी है (तो) व्यवहार कथन, लेकिन कहने के लिए ये कहना पड़ेगा कि ज्ञान का… क्योंकि ज्ञान का कोई विषय नहीं (है)। ज्ञान तो ज्ञान है। उसके साथ किसी चीज को लगाना इसी का नाम व्यवहार (है)। ज्ञान का विषय ऐसा हमने बोला तो ज्ञान तो निरपेक्ष है। तो उसका विषय कौन हो गया? कोई विषय नहीं। लेकिन हमने ये बताने के लिए कि ज्ञान ने जो चित्र बनाया है वो निरर्थक नहीं (बल्कि) वो सार्थक है क्योंकि वैसा ज्ञेय जगत में विद्यमान है।
मुमुक्षुः- तो ज्ञान का चित्र जाननभावरूप है?
पूज्य बाबूजीः- जाननभावरूप सारा।
मुमुक्षुः- और ज्ञेयों (के) चित्र तो अपने आकारों के मुताबिक हैं।
पूज्य बाबूजी:- वो तो, वो तो जड़-चेतन जैसा (भी) है। जैसा द्रव्य-गुण-पर्यायवाला (है), तो वैसा का वैसा द्रव्य-गुण-पर्याय इधर ज्ञान में भासित होता है, वैसा का वैसा। वह नहीं; वह नहीं, वैसा। पर हम (उसको) ‘वह’ कहते हैं फिर (सिर्फ) ये बताने के लिए कि ये चित्र किसका है। क्योंकि अगर हम सिर्फ निश्चय से उत्तर देते रहेंगे, तो ज्ञान ही जानने में आया है और कुछ नहीं है। कोई लोकालोक जानने में नहीं आया - ये उत्तर होगा और उससे फिर सर्वज्ञता का और सबका परिहार हो जायेगा। द्वादशांग का परिहार हो जायेगा। कुछ नहीं रहेंगे।
इसलिए व्यवहार ये जवाब देता है कि जितने भी ज्ञेय जगत में हैं, ठीक वैसा का वैसा आकार केवलज्ञान बना लेता है। और जितने अलग-अलग प्रतिभास एक ही पर्याय में, केवलज्ञान की एक ही पर्याय में अनंतानंत प्रतिभास (हैं) वो सबके सब ज्ञान (हैं) और वो ज्ञान अंतर्मुख होकर शुद्धात्मा का वेदन निरंतर करता है। निरंतर करता है वही ज्ञान, वही प्रतिभासात्मक ज्ञान। अनेकाकार ज्ञान वो एकाकर होकर और शुद्धात्मा का अनुभव करता है। एकाकार होकर माने वो ज्ञान ही है।
मुमुक्षु:- बहुत सुंदर! होता नहीं है, है ही एकाकार।
पूज्य बाबूजी:- है ही एकाकार। अनेकाकार होकर वो एकाकार ही है अर्थात् ज्ञान ही है। इस तरह शुद्धात्मा का अनुभव निरंतर भगवान सिद्ध किया करते हैं।
मुमुक्षु:- हम तो ये सोच रहे थे कि जैसे ज्ञेय हैं, उस ही प्रकार की लकीरें ज्ञान में बनती होंगी।
पूज्य बाबूजी:- वो व्यंजन-पर्याय की अपेक्षा से है।
मुमुक्षु:- तो व्यंजन-पर्याय की अपेक्षा से नहीं (है) ये तो जाननभाव की अपेक्षा से…
पूज्य बाबूजी:- ये सब पर्यायों की अपेक्षा (से), द्रव्य-गुण-पर्याय सबकी अपेक्षा। और पर्याय में लें तो अर्थ-पर्याय और व्यंजन-पर्याय, सब सारी आती हैं। बस! उसी को अर्थ का प्रतिभास कहते हैं, अर्थ-विकल्प कहते हैं। अर्थ-विकल्प माने अर्थ का प्रतिभास, पदार्थ का प्रतिभास। पदार्थ का प्रतिभास माने ज्ञान का प्रतिभास अर्थात् ज्ञानाकार। ज्ञानाकर माने ज्ञान (और) ज्ञान माने ज्ञायक।
मुमुक्षु:- पदार्थ का प्रतिभास माने ज्ञान का प्रतिभास।
पूज्य बाबूजी:- माने ज्ञान का प्रतिभास।
मुमुक्षु:- और ज्ञान का प्रतिभास…
पूज्य बाबूजी:- ज्ञान का बना हुआ आकार। ज्ञान का प्रतिभास माने ज्ञान का बना हुआ आकार, ऐसा। लेकिन अब ये निश्चय करने के बाद जब भी ये स्वपरप्रकाशक का प्रकरण आता है, तो उत्तर व्यवहार की ओर से ही दिया जाता है। क्योंकि उसी से सारी अन्य सिद्धि होती है। निश्चय के जवाब से नहीं होती क्योंकि ‘ज्ञान ही जानने में आता है’ या ‘ज्ञायक ही जानने में आता है’ तो उससे सिद्धि नहीं होती। इसलिए व्यवहार उसका जवाब देता है कि - असल में हैं तो वो सब ज्ञान के ही आकार, ये तो निश्चय। लेकिन जैसे ज्ञान के आकार ज्ञान ने बनाये हैं स्वयं स्वतः (और) निरपेक्ष भाव से, वैसे के वैसे ज्ञेय जगत में द्रव्य-गुण-पर्यायात्मक विद्यमान हैं।
मुमुक्षु:- वाह रे वाह! द्रव्य-गुण-पर्यायात्मक विद्यमान हैं।
पूज्य बाबूजी:- शक्ति जो कहते हैं स्वपरप्रकाशक शक्ति, वो स्वपरप्रकाशक शक्ति इसमें आ गई। ज्ञान वास्तव में तो स्वप्रकाशक है, वास्तव में स्वप्रकाशक है। लेकिन ये जो व्यवहार हमने इसके साथ लगाया है अर्थात् उस ज्ञान के प्रतिभास को… शक्ति नाम से ही पुकारा गया है। है वो एक ही अखंड पर्याय।
मुमुक्षु:- व्यवहार को शक्ति के नाम से पुकारा गया है।
पूज्य बाबूजी:- पुकारा गया है क्योंकि है वो एक ही पर्याय।
असल में क्या है कि वो जितने भी ज्ञेय के आकार हैं, ठीक वैसे ज्ञानाकर माने प्रतिभासरूप बनकर ज्ञान ने रचना की (है)। तो ज्ञान ने जो रचना की तो उनका अगर हम व्यवहार से कथन करें… तो जैसी ये रचना है, ठीक वैसा का वैसा विश्व है। तो इस ज्ञान की पर्याय को देखो अथवा विश्व को देखो, एक ही बात है। और जैसा विश्व है, वैसी की वैसी ज्ञान की पर्याय है। जैसी ज्ञान की पर्याय है ठीक वैसा का वैसा विश्व है। तो ज्ञान की पर्याय को देखो तो सारा विश्व नज़र आ गया इसका नाम परप्रकाशकता।
मुमुक्षु:- ज्ञान की पर्याय को देखो तो सारा का सारा…
पूज्य बाबूजी:- ज्ञान की एक पर्याय को देखो तो सारा विश्व नज़र आ गया, केवलज्ञान की पर्याय में - ऐसा।
काँच होते हैं न ऐसे महलों में कि जहाँ पर रानियाँ बाहर नहीं निकलती हैं। तो वो ऐसे काँच होते हैं जिनमें सारा शहर दिखाई देता है। छोटा सा, छोटा सा (काँच होता है) कैमरे जैसा, उसमें सारा शहर दिखाई देता है।
मुमुक्षु:- तो काँच को देख लो!
पूज्य बाबूजी:- तो वो तो शहर तो शहर की जगह ही रहता है। वो काँच का ही परिणमन है, सारा।
मुमुक्षु:- पहले तो ऐसा लगता था बाबूजी! कि जैसे विश्व है, उसी प्रकार का ज्ञान है। अब ऐसा कहते हैं आप कि जैसा ज्ञान का स्वरूप है, ठीक उसी की भाँति विश्व का स्वरूप है।
पूज्य बाबूजी:- बस! दोनों तरफ से कह सकते हैं। कोई दिक्कत नहीं है! जैसा ज्ञान की एक पर्याय का स्वरूप है, केवलज्ञान की एक पर्याय का, ठीक वैसा का वैसा विश्व है अनादि-अनंत। अनादि-अनंत माने अनादि की जो पर्यायें हैं, जो वर्तमान में विद्यमान नहीं हैं (और) भविष्य की जो पर्यायें हैं जो वर्तमान में विद्यमान नहीं हैं - ऐसी तीनों काल की पर्याय सहित द्रव्य-गुण सहित सारा का सारा केवलज्ञान की एक पर्याय में प्रतिभासित होता है। और वो प्रतिभास केवल ज्ञान ही है, ज्ञान ही है। ‘केवल’ शब्द शुद्धात्मा के लिए है। ‘केवल’ शब्द उसके लिए नहीं है, लोकालोक को जानने के लिए। ‘केवल’ माने जो सिर्फ आत्मा में क्रीड़ा करते हैं, उसको केवल कहते हैं। सदा ही जो आत्मा में क्रीड़ा करते हैं उसका नाम केवल। केवते हैं - ऐसा आगम का वाक्य है। केवते हैं माने क्रीड़ा करते हैं।
मुमुक्षु:- जो हम समझ रहे हैं उससे आप उल्टा ही बता रहे हैं।
पूज्य बाबूजी:- हाँ! उल्टा माने अगर हम समझ रहे हैं वैसा होता तो अब तक हम यहाँ नहीं होते। अब तक सिद्धों में शामिल होते। जैसा हम समझते हैं वैसा ही होता तो यहाँ कैसे होते हम? हम तो कभी के सिद्धों में शामिल होते। लेकिन जैसा हम समझते हैं, उससे ठीक उल्टा ही है बिल्कुल। एकदम about turn (पूर्ण परिवर्तन) है।
मुमुक्षु:- क्योंकि केवलज्ञान की बात होती तो हम तो समझते (हैं कि) …
पूज्य बाबूजी:- लोकालोक को जानता है। लोकालोक को जानता है।
मुमुक्षु:- (लोकालोक) को जानता है। और आप ये कह रहे हैं कि ये तो केवल ज्ञान को ही जानते हैं।
पूज्य बाबूजी:- बस! अब कहने में ये निश्चय हो जाने के बाद कि संपूर्णरूप से सबका सब ज्ञानाकार ही है, जितना भी प्रतिभास है - ये जानने के बाद और ज्ञायक की अनुभूति के बाद, अब जो भी प्रयोग होगा वो सब व्यवहार का ही होगा, आगम में भी और अपनी बातचीत में भी। हम कहेंगे लोकलोक को जानता है।
दूसरी (बात) ये कि जैसे ज्ञान ही जानने में आता है, तो ऐसा कहने पर जो अन्यमति हैं वे प्रहार करेंगे कि तुम्हारा सारा आगम झूठा, तुम्हारा सर्वज्ञ झूठा। क्योंकि सिर्फ एक आत्मा जानने में आता है, और (तो कुछ) जानने में नहीं आता। तब हम जवाब देंगे कि - नहीं! निश्चय से वो लोकालोक को जानते हैं। तब हमारा जवाब ये होगा कि वो व्यवहार से नहीं पर निश्चय से लोकालोक को जानते हैं। ये तो न्याय के प्रकरण हैं। जो दर्शन है वो सब न्यायप्रधान होते हैं। तो उनमें जो युक्तियाँ है, वो इसी तरह चलती हैं (कि) जैसे कोई एक-दूसरे पर पत्थर फेंक रहा हो। इसलिए हमारा उत्तर ये होगा कि निश्चय से भगवान सर्वज्ञ हैं और तीनलोक-तीनकाल को निश्चय से जानते हैं और साथ में आत्मा को भी जानते हैं - ऐसा।
मुमुक्षु:- और साथ में आत्मा को भी जानते हैं।
पूज्य बाबूजी:- आज महेन्द्र जी चुप कैसे हो गए? अनुभूति हो गई?
मुमुक्षु:- नहीं! इस बात को पीना है।
पूज्य बाबूजी:- हाँ! है तो पीने की (बात), कहने की नहीं है। जो बोला जाता है वो सत्य नहीं है, इसलिए अनुभूति (ही) सत्य है।
एक दार्शनिक का वाक्य है ये - It is not truth which is spoken. (जो कहा जाता है वह सत्य नहीं है)। सत्य बोला नहीं जाता है, सत्य की अनुभूति होती है।
मुमुक्षुः- कल एक अंत में प्रश्न आया था, बेन का। वो बेटी आई नहीं है इसलिए इंतजार करते हैं। (प्रश्न था) सम्यग्दर्शन के बाद ही ज्ञान को सम्यग्ज्ञान कहते हैं। उसके एक समय पहले भी उस ज्ञान को मिथ्याज्ञान कहते हैं - ऐसा क्यों है?79
पूज्य बाबूजीः- ऐसा इसलिए है कि ज्ञान के जो विषय हैं वो अनेक हैं और श्रद्धा का जो विषय है वो केवल एक है। इसलिए श्रद्धा जब अपने विषय का वरण कर लेती है तब ज्ञान सम्यक् कहलाता है क्योंकि ज्ञान के विषय अनेक हैं। जिस समय ज्ञान शुद्धात्मा को देखता है, जानता है, अनुभव करता है, शुद्धोपयोग में होता है उस समय भी ज्ञान को ये स्वीकार है कि अभी राग बाकी है। लेकिन श्रद्धा को ये स्वीकार नहीं है। श्रद्धा को केवल एक ज्ञायक (ही) स्वीकार है, चिन्मात्र स्वीकार है। इसलिए चिन्मात्र ज्ञायक का वरण हो जाने पर ज्ञान तुरंत सम्यक् हो जाता है।
ज्ञान के दो पहलू हैं (और) श्रद्धा का एक पहलू (है)। तब सच्चा हुआ न!
जैसे स्वयंवर होता है। तो स्वयंवर में एक राजकन्या है और उसकी कोई प्रतिज्ञा होती है। तो वो सब राजकुमार आते हैं। अब वो सबको देखती है लेकिन वरण नहीं हुआ अभी। और वरण होते ही वो सम्यक् हो गया माने स्व-पर का विभाग हो गया उसमें, वरण होते ही। उसके पहले मिथ्या होता है क्योंकि वो तो स्व ही ढूँढ रही है न अभी। इसलिए स्व-पर का विभाग नहीं हुआ अभी; और ज्ञायक को जानते ही ज्ञान में स्व-पर का विभाग उत्पन्न होता है। ‘ये मैं हूँ’ इसका अर्थ (ये) हुआ कि अन्य सब जितने भाव हैं, इससे अनमेल जितने भाव हैं वे सारे के सारे पर हैं। ये विभाग उसी समय उत्पन्न होता है। पहले विकल्पात्मक था विभाग, पहले विकल्पों में था। लेकिन वास्तविक विभाग अब हुआ कि जब स्वसत्ता को जाना तब परसत्ता वास्तव में जानने में आई कि ये पर है। इसीलिए सम्यग्दर्शन को पहले लिया है। स्वयंवर हुआ, स्वयं (का) वरण हुआ, स्व का वरण हुआ (तब)…
मुमुक्षुः- बराबर! स्व का वरण हुआ।
पूज्य बाबूजीः- स्व का वरण हुआ तब ज्ञान सम्यक् हुआ। स्व-पर का विभाग तब पैदा हुआ उसको।
मुमुक्षुः- श्रद्धा हुई सम्यक् तब ज्ञान सम्यक् हुआ।
पूज्य बाबूजीः- तब ज्ञान सम्यक् हुआ, उसी समय; और उसी समय स्व-पर का विभाग हुआ, उसी समय निश्चय-व्यवहार का जन्म हुआ।
मुमुक्षुः- हाँ जी! और उसी समय?
79 सम्यग्दर्शन के बाद ही ज्ञान को सम्यग्ज्ञान कहते हैं। उसके एक समय पहले भी उस ज्ञान को मिथ्याज्ञान कहते हैं - ऐसा क्यों है? - 41 Mins पूज्य बाबूजी:- निश्चय-व्यवहार का जन्म हुआ, उसी समय। शेष इससे पहले जो निश्चय-व्यवहार था वो सविकल्प (अर्थात्) विकल्पात्मक था। जो भी निश्चय का चिंतन था वो सारा का सारा अथवा निर्णय का जो समय था, वो सारा का सारा विकल्पात्मक था। ज्ञान के विकल्प, राग के विकल्प नहीं। उनसे काम कुछ नहीं होता है राग के विकल्पों से। भले ही वो ज्ञान के स्वर में बोलते हों तो भी वो मूर्ख हैं, ज्ञानशून्य हैं। इसलिए उनसे काम नहीं होता। वो तो हेयतत्त्व हैं। ये भी हेयतत्त्व है - ज्ञान का विकल्प भी, ये भी हेयतत्त्व है।
मुमुक्षु:- ओहोहो! ये क्या कहा प्रभु?
पूज्य बाबूजी:- भाई! उपादेय केवल एक है न, उपादेय केवल शुद्धात्मा है। बाकी अन्य सब हेय हैं। अब इसमें कौन बाकी बचा? केवल (और) केवल शुद्धात्मा (ही) उपादेय है विश्व में, संपूर्ण विश्व में। अन्य सारा अपना पर्याय समुदाय, अपना गुण समुदाय और अन्य सारा जगत - ये सब हेयतत्त्व है।
मुमुक्षु:- अपना पर्याय समुदाय, अपना गुण समुदाय…
पूज्य बाबूजी:- गुण समुदाय। गुण समुदाय में गुणों का विकल्प, गुण का भिन्न-भिन्न विचार - ये सब हेय (है) और सारा जगत हेय (है)। सारे जगत के द्रव्य-गुण-पर्याय ये हेयतत्त्व हैं।
मुमुक्षु:- गुण समुदाय माने ज्ञेयों का अन्य-अन्य विकल्प?
पूज्य बाबूजी:- विकल्प!
मुमुक्षु:- भिन्न-भिन्न गुण?
पूज्य बाबूजी:- भिन्न-भिन्न विकल्प। और गुण समुदायरूप से देखें तो वो शुद्धात्मा के साथ गया, क्योंकि गुणों का जो स्वरूप है वो शुद्धात्मा जैसा है। पर्याय का स्वरूप परिणमन है और गुण और द्रव्य का स्वरूप अपरिणामी है; अपरिणामी है।
द्रव्य अपरिणामी है,80 निश्चितरूप में अपरिणामी है। अकर्ता है (और) अपरिणामी है। इसीलिए वास्तव में पर का कर्ता तो है ही नहीं, पर को जाननेवाला भी नहीं है।
मुमुक्षु:- पर का कर्ता तो नहीं, पर को जाननेवाला (भी नहीं)।
पूज्य बाबूजी:- (पर को) जाननेवाला भी नहीं, इससे अंतर्मुख होता है। और ये मान ले कि… स्वपरप्रकाशक ही (है ऐसा) माने; तो स्वपरप्रकाशक माने तो परप्रकाशकता भी (ज्ञान का) स्वभाव हुआ न? तो स्वभाव हुआ तो वो पर की ओर ज्ञान गए बिना नहीं रहेगा और कभी भी अंतर्मुख नहीं हो सकेगा।
मुमुक्षु:- आहाहा! वाह वाह! स्वपरप्रकाशक माना…
पूज्य बाबूजी:- क्योंकि उसकी तो आदत है न सदा से। इसलिए परप्रकाशकता मानी तो वो ज्ञान बहिर्मुख होगा ही होगा और अंतर्मुख होकर ज्ञायक का वरण नहीं करेगा वो। बहिर्मुख
80 निश्चय से स्वप्रकाशक ही है, स्वपरप्रकाशक नहीं है। - 46 Mins ज्ञान होगा ही होगा उसमें। इसलिए निश्चय से स्वप्रकाशक ही है वास्तव में। वही है, प्रक्रिया देखें तो वही है। क्योंकि ज्ञान कहीं जाता नहीं और ज्ञान में कोई आता नहीं। और व्यवहार में कहते हैं कि ज्ञान सर्वगत है और सर्व पदार्थ आत्मगत हैं - इसका नाम व्यवहार है।
मुमुक्षु:- ज्ञान सर्वगत है!
पूज्य बाबूजी:- ज्ञान सर्वगत है।
मुमुक्षु:- और पदार्थ ज्ञानगत हैं।
पूज्य बाबूजी:- ज्ञानगत हैं।
मुमुक्षु:- आत्मगत हैं।
पूज्य बाबूजी:- आत्मगत हैं।
मुमुक्षु:- वो व्यवहार?
पूज्य बाबूजी:- वो व्यवहार।
मुमुक्षु:- तो निश्चय क्या?
पूज्य बाबूजी:- निश्चय माने ज्ञान ज्ञानगत है, ज्ञायकगत है।
मुमुक्षु:- बहुत सुंदर!
पूज्य बाबूजी:- ज्ञान तो ज्ञायकगत है। ‘मैं ज्ञायक हूँ’ - बस इसका नाम है ज्ञान। जहाँ ज्ञान ने स्वयं अपने को बिल्कुल तिरोभूत कर दिया हो, बल्कि निकाल दिया (हो), बल्कि अपना लोप जैसा कर दिया हो… लोप नहीं हुआ है (वास्तव में)। है पर्याय, पर्याय में सारा (काम) हो रहा है। पर भीतर से पर्याय का जो उत्साह है वो यह है कि उसे ज्ञायक के साथ अभेद होना है। ‘मैं ज्ञायक का अनुभव करती हूँ’ - यहाँ अभेदता नहीं है, यहाँ अभी अंतर पड़ा है। ये अंतर है यहाँ। इसलिए अभेदता की पराकाष्ठा ये है कि मैं ही ज्ञायक हूँ, ये अभेदता की पराकाष्ठा (है)। बोलती पर्याय है। तो पर्याय स्वयं बाहर निकल गई और ज्ञायक पसर गया उसमें, पर्याय में; तो पर्याय ज्ञायक बन गई - ऐसा।
ज्ञायक बन गई माने ज्ञायक का स्वर भरने लगी।
मुमुक्षु:- पर्याय स्वयं बाहर निकल गई और…
पूज्य बाबूजी:- और ज्ञायक भर गया उसमें।
मुमुक्षु:- और ज्ञायक उसमें भर गया!
पूज्य बाबूजी:- उसमें सारा ज्ञायक पसर गया।
मुमुक्षु:- माने पर्याय का स्वर बदल गया कि मैं ज्ञायक हूँ।
पूज्य बाबूजी:- पर्याय का स्वर बदल गया।
पहले पर्याय अपने को आत्मा मानती थी वो मिथ्यादर्शन था, मिथ्याज्ञान था, मिथ्याचारित्र था। अब वो ज्ञायक को स्व मान रही है, स्व जान रही है और आचरण भी कर रही है। इस तरह ‘मैं ज्ञायक हूँ’ बस यही अनुभूति है। और अनुभूति में कुछ नहीं टटोलना (है)। वो जो ज्ञायकाकार है वो स्वयं अनुभूति (है)। वो ज्ञायकाकर है वो स्वयं ज्ञान है, ज्ञान की पर्याय है। ज्ञान की पर्याय स्वयं ज्ञायकाकार है। तो ज्ञायकाकार है तो ज्ञायक पसर गया उसमें क्योंकि वो बोल रही है कि मैं ज्ञायक हूँ, मैं ही ज्ञायक हूँ। अथवा अनुभव में तो दशा दूसरी होती है, ये तो अपने बोलने की बात है; क्योंकि बोलना और इससे आगे ताकत नहीं है शब्दों में कि ‘मैं चिन्मात्र हूँ, मैं ज्ञायक हूँ’। इससे आगे ताकत नहीं है कि वो अनुभव करके बता दे, ऐसी शब्दों में ताकत नहीं है; और अनुभव के पास शब्द नहीं हैं। इसलिए शब्दों से ही समझाया जाता है तो समझ में आ जाता है। ज्ञान में इतनी ताकत है कि वो शब्द जो होते हैं उससे उसको भाव समझ में आ जाता है; तो वो (पर्याय) अभेद हो जाती है। ‘मैं ज्ञायक हूँ’ इसी का नाम अभेदता है। अब अभेदता का और दूसरा चरण कौनसा होगा? कौनसा विकल्प (और) कौनसा अवकाश है बहिरता का? पराकाष्ठा हो गई।
मुमुक्षुः- कि मैं ज्ञायक हूँ।
पूज्य बाबूजी:- 81 मैं ज्ञायक हूँ, बस। क्योंकि ज्ञान और ज्ञेय, श्रद्धा और श्रद्धेय - वो एक ही पदार्थ में होने चाहिए। क्योंकि दूसरे पदार्थों से ज्ञान और आत्मा का अत्यंत विभाग है। दूसरे पदार्थों से ज्ञान और आत्मा अत्यंत पर हैं और आत्मा से दूसरे पदार्थ अत्यंत पर हैं। इसलिए श्रद्धा और ज्ञान (हैं बस)। तो श्रद्धा का श्रद्धेय और ज्ञान का ज्ञेय, वो स्वयं उस पदार्थ में ही होना चाहिए। उस पदार्थ में ही होना चाहिए। तो उस पदार्थ में ही ये व्यवस्था है कि अगर जो ज्ञेय है - ध्रुव ज्ञायक, वो अगर नहीं बोलता है वो अगर नहीं चलता है, वो परिणमन नहीं करता है तो उसके साथ में प्रकृति ने परिणमन को रखा। और परिणमन यह बोलता है (कि) मैं ज्ञायक हूँ - ये (है) अभेदता की पराकाष्ठा।
और केवल भेद में हम रहेंगे कि ‘मैं ज्ञायक को जानती हूँ’ तो इस तरह भेद जो चलेगा, तो उस भेद से अभेदता नहीं होने पर ये दो द्रव्य हो जायेंगे (द्रव्य और पर्याय)। क्योंकि अत्यंत भेद हो जायेगा (इसमें), एकांत। ये एकांत हो जायेगा! ये जो भेद है न, तो वो एकांत हो जायेगा। और एकांत होने के कारण जो द्रव्य और पर्याय हैं, वो दो एक ही पदार्थ के अवयव नहीं रहकर वो परद्रव्य हो जायेंगे - दो। इसलिए अभेदता का भी कोई अवसर होना चाहिए। तो अभेदता का अवसर है अनुभूति और शुद्धोपयोग (कि) मैं ज्ञायक हूँ, चिन्मात्र।
मुमुक्षुः- अद्भूत! एक-एक लफ़्ज़ बहुत सुंदर। वाह रे वाह! दो सत् दो द्रव्य बन जायेंगे।
पूज्य बाबूजी:- दो द्रव्य बन जायेंगे। अगर केवल भेद में हम परिणमन करेंगे तो दो द्रव्य बन जायेंगे वो, क्योंकि पदार्थ को अकेला भेदरूप माना न। भेदरूप मान न अकेला भेदरूप, तो भेदरूप है तो अनेक द्रव्य हो गए वो। और एक पदार्थ में जो द्रव्य-गुण-पर्याय हैं उनकी अभेदता
81 अभेद होने का अवकाश ही नहीं होगा, तो द्रव्य और पर्याय एक पदार्थ के अवयव न रहकर दो द्रव्य हो जायेंगे। - 50.36 Mins भी है और उनमें जो स्वरूप-भेद है वो भी स्वीकार है, दोनों स्वीकार हैं। उनमें जो स्वरूप-भेद है, वो भी स्वीकार है और उनकी अभेदता भी स्वीकार है क्योंकि एक ही पदार्थ के सदस्य हैं ये। तो द्रव्य और पर्याय ये मूलरूप से दो सदस्य अपन ने बनाये।
तो जो द्रव्य है वो यदि स्थिर है, ध्रुव है, स्थायी है, स्थायीभाव है, तो पर्याय है वो संचारीभाव है।
नाटक कहा न समयसार को। तो ये नाटक के ही अवयव हैं स्थायीभाव, संचारीभाव, विभाव और अनुभाव। ये नाटक के चार अंग होते हैं, भावों के। इस तरह यहाँ भी नाटक कहा समयसार को… तो स्थायीभाव तो ध्रुव है - शुद्ध ज्ञायक; और संचारीभाव है अनुभूति (अर्थात्) शुद्धोपयोग - ये संचारीभाव। ध्यान, ध्यान भी उसे कहेंगे क्योंकि अंतर्मुहूर्त तो होती ही है वो। उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त नहीं पर मध्यम अंतर्मुहूर्त (होती है)।
मुमुक्षु:- होती है, तो आत्मा के सन्मुख होता है।
पूज्य बाबूजी:- हाँ!
मुमुक्षु:- भिन्नता है लेकिन अतद्भाव से है न?
पूज्य बाबूजी:- अतद्भाव से।
मुमुक्षु:- अतद्भाव से है।
पूज्य बाबूजी:- अतद्भाव! स्वरूप न्यारे-न्यारे हैं न, इसलिए अतद्भाव (है)।
मुमुक्षु:- लेकिन ऐसे दो भेद नहीं हैं।
पूज्य बाबूजी:- पृथकता नहीं है!
मुमुक्षु:- बराबर! पृथकता नहीं है, अतद्भाव से है।
पूज्य बाबूजी:- पृथकता नहीं है। हाँ! अतद्भाविक भेद है, अतद्भाव।
मुमुक्षु:- क्योंकि एक ही पदार्थ है इसलिए।
पूज्य बाबूजी:- एक ही पदार्थ है इसलिए। इसलिए उसका नाम अतद्भाव (है)। जो द्रव्य है वो गुण नहीं है। जो गुण है वो पर्याय नहीं है। जो पर्याय है वो गुण नहीं है, वो द्रव्य नहीं है। जो गुण है वो द्रव्य नहीं है, पर्याय नहीं है - इस तरह अतद्भाविक भेद है। तीनों का स्वरूप न्यारा-न्यारा है।
मुमुक्षु:- गुण-गुणी में भी अतद्भाव हो सकता है? एक गुण दूसरे गुण में अतद्भाव है?
पूज्य बाबूजी:- एक गुण दूसरे गुणरूप नहीं होता, ये भी अतद्भाव है।
मुमुक्षु:- बाबूजी! इसमें जो एकरुपता है वो ध्रुवपना है?
पूज्य बाबूजी:- एकरूपता है, वो ध्रुवपना है। जो अन्वय है उसका नाम द्रव्य, उसका नाम ध्रुव और वो एकरूपता (है) क्योंकि वो एकरूप रहता है। जो परिणाम है उसमें अनेकरूपता होती है। अनेकरूपता माने शुद्ध पर्याय हो तो भी अनेकरुपता है न। एक के बाद एक, एक के बाद एक, एक के बाद एक, अनेकात्मक है वो। और जो ध्रुव है वो एकात्मक है, एक है; एक को शुद्ध कहते हैं।
मुमुक्षु:- बाबूजी! इसमें तीन बात आ गईं कि निर्विषय भी हो गया, अतद्भाव भी हो गया और एकरूप भाव भी हो गया।
पूज्य बाबूजी:- एकरूप भी हो गया, सब हो गया।
और लाइए न, प्रश्न लाइए। इसी में कोई बात रह गई हो तो।
मुमुक्षु:-82 श्रद्धा के विषय में गुण शामिल है या नहीं?
पूज्य बाबूजी:- श्रद्धा के विषय में गुण शामिल हैं। जो प्रयोग-पद्धति होती है तो उसमें गुण शामिल होते हैं। जो विचार-पद्धति होती है तो उसमें न्यारा-न्यारा विचार होता है। गुणों के माध्यम से ही… द्रव्य का जो विचार है वो गुणों के माध्यम से ही होता है। क्योंकि द्रव्य एक सत्ता है और जो गुण हैं वो उसकी संपत्ति है। इसलिए आत्मा का जो विचार है वो गुणों के माध्यम से ही होता है। लेकिन जो प्रयोग-पद्धति है अनुभव की उसमें (अनंत) गुणात्मक एक द्रव्य; अनंत गुणात्मक एक - ऐसा ध्रौव्य उसकी अनुभूति होती है।
अनुभूति ध्रुव की ही हो सकती है। अन्य की जो अनुभूति है वो मिथ्या होती है, चाहे एक गुण की हो चाहे एक पर्याय की हो, किसी की भी हो।
मुमुक्षु:-83 निर्विकल्प अनुभव के समय ज्ञान क्या काम करता है?
पूज्य बाबूजी:- ज्ञान जानता है आत्मा का जैसा स्वरूप निश्चय किया था, ठीक वैसा का वैसा जानता है।
मुमुक्षु:- ज्ञान तो सविकल्प कहा जाता है?
पूज्य बाबूजी:- सविकल्प कहा (है) दर्शन की अपेक्षा (से)। जो दर्शन नाम का गुण है न उसकी पर्याय की अपेक्षा (से ज्ञान को) सविकल्प कहा है। क्योंकि दर्शन की पर्याय निर्विकल्प होती है - निराकार, और ज्ञान साकार (होता है); दर्शन निर्विकल्प और ज्ञान सविकल्प। सविकल्प माने ज्ञान जानता है तो पदार्थ को भेदों सहित ही जानता है। और जो दर्शन है उसका विषय केवल सत् है, केवल सत्, तीनों लोक में। तीनों लोक में दर्शन किसी को भी विषय करता है तो वो सत् है केवल। उस सत् का निश्चय होने के बाद फिर ज्ञान प्रवेश करता है। तो ये दशा होती है छद्मस्थ दशा (कि) पहले दर्शन होता है और फिर ज्ञान होता है। ये छद्मस्थ दशा में हुआ। और केवलज्ञान में दोनों साथ (में) होते हैं - दर्शन और ज्ञान। इसलिए सविकल्प केवलज्ञान भी है पर (वो) रागात्मक नहीं (है)। सविकल्प माने जानता है तो पदार्थ को भेद सहित ही जानता है (कि) ये आत्मा है, ये
82 श्रद्धा के विषय में गुण शामिल है या नहीं? - 56.03 Mins
83 निर्विकल्प अनुभव के समय ज्ञान क्या काम करता है? - 57.06 Mins पुद्गल है, ये धर्म है, ये अधर्म है, ये आकाश है, ये काल है। इस तरह जानता है, उनके स्वरूप सहित, इसलिए उसको सविकल्प कहा। विकल्प माने भेद।
मुमुक्षु:- भेद सहित जानना होता है ज्ञान में?
पूज्य बाबूजी:- भेद सहित जानना होता है। इसमें भेद नहीं (है) दर्शन में। दर्शन में किसी भी पदार्थ को विषय करेगा तो सत्, बस केवल इतना।
मुमुक्षु:- दर्शन माने?
पूज्य बाबूजी:- सत् केवल सत्। उसको महासत्ता भी कहते हैं कि संपूर्ण जो विश्व है ये, तो केवल सत् रूप - ये दर्शन का विषय (है)। संपूर्ण विश्व की अपेक्षा लें तो उसे महासत्ता कहते हैं। और एक पदार्थ की अपेक्षा लें तो उसे अवांतर सत्ता कहते हैं।
मुमुक्षु:- वाह वाह!
पूज्य बाबूजी:- उसे अवांतर सत्ता कहते हैं। वो दोनों नहीं एक ही रूप, अवांतर सत्तारूप ही होता है। और जो केवलज्ञान है वो बिल्कुल महासत्तारूप हो गया क्योंकि सारे पदार्थ सत् (हैं) केवल। केवलज्ञान-केवलदर्शन में भी ऐसा ही होता है। केवलज्ञान नहीं, केवलज्ञान मत लिख लेना। केवलदर्शन!
तो केवलदर्शन और केवलज्ञान साथ ही होते हैं, लेकिन केवलदर्शन का विषय ये सारा विश्व लेकिन न्यारे-न्यारे, न्यारे-न्यारे। मुमुक्षु:- और केवलज्ञान का?
पूज्य बाबूजी:- केवलज्ञान का भी न्यारा-न्यारा पर ये ज्ञान एक पर्याय है न आखिर, इसीलिए एक ही है। उसको प्रोत्साहित नहीं करना। उसको ज्यादा माने वज़न नहीं देना कि ज्ञान में अनेक आकार हैं। उनकी कोई कीमत नहीं।
मुमुक्षु:- कोई कीमत नहीं!
पूज्य बाबूजी:- वो ज्ञान ही हैं सारे के सारे, सबके सब ज्ञान ही हैं।
मुमुक्षु:-84 श्रद्धा का विषय और ज्ञान का विषय एक ही हो फिर भी ज्ञान सविकल्प हो सकता है..
पूज्य बाबूजी:- सविकल्प में कहाँ दिक्कत रही? जब दर्शन निर्विकल्प है, निराकार है अर्थात् उसमें भेद नहीं होता है, वो सारे जगत को केवल सत् रूप विषय करता है। जैसे ज्ञान को जो विषय करना है जिस पदार्थ को विषय करना है, तो उसके पहले छद्मस्थ दशा में दर्शन होगा। तो वो दर्शन उस पदार्थ को सत् - इतना विषय करके रह जायेगा। इसके बाद ज्ञान की परिणति होगी तो ये क्या है ये? क्या है? - ये जो ज्ञान है, तो ये यहाँ से ज्ञान शुरू हो गया। मैं तो ज्ञान हूँ -
84 श्रद्धा का विषय और ज्ञान का विषय एक ही होता है फिर भी ज्ञान सविकल्प हो सकता है? - 1.00.20 Hours यहाँ से ज्ञान शुरू हो गया। ये जड़ है, पुद्गल है, सफेद है, काला है, पीला है, नीला है, खट्टा है, मीठा है, चरपरा है कुछ भी। कोई भी भेद उसमें प्रवृत्त हुआ तो वो ज्ञान हो गया।
मुमुक्षु:- तो एक ही पर्याय में होता है सब?
पूज्य बाबूजी:- एक ही। हें?
मुमुक्षु:- एक ही पर्याय में उत्पन्न होता है?
पूज्य बाबूजी:- नहीं! एक पर्याय में नहीं होता। छद्मस्थ दशा में माने केवलज्ञान से पहले तो दर्शन-उपयोग होता है और दूसरे क्षण में ज्ञान-उपयोग होता है। दंसणपुव्वं णाणं ऐसा छद्मत्थाणं वृहद्-द्रव्यसंग्रह में है (कि) छद्मस्थों को दर्शनपूर्वक ज्ञान होता है और केवलज्ञान में युगपद् जम्हा केवलि केवली को युगपद् होते हैं।
दंसणपुव्वं णाणं, छद्मत्थाणं ण दोण्णि उवउग्गा।
जुगवं जम्हा केवलिणाहे जुगवं तु ते दो वि॥४४॥
मुमुक्षु:-85 एक प्रश्न है प्रभु! उपयोगो जीव लक्षणं - उसका स्पष्टीकरण।
पूज्य बाबूजी:- हाँ! उपयोग माने ये जो ज्ञान प्रतिसमय चलता है, ज्ञान की पर्याय उसका नाम उपयोग है। यहाँ गुण नहीं (लेना) द्रव्य नहीं (लेना)। पर ज्ञान की जो पर्याय प्रतिसमय चलती है तो उसका अर्थ ये है कि ये जो काम होता है जानने का, तो इसके पीछे कोई पदार्थ होना चाहिए। पदार्थ नहीं होगा तो कोई परिणति कैसे होगी? पर्याय कैसे होगी?
जैसे घर में आटा नहीं है फिर भी रोटी बन गई - ऐसा कभी देखा नहीं। तो आटा होना चाहिए फिर रोटी इसके बाद बनती है। इसी तरह पदार्थ होता है तो ये जो ज्ञान (है) ये सिद्ध करता है कि इस तरह का जाननेवाला कोई पदार्थ है - ऐसा निश्चय करता है। ज्ञान की जो उपयोगरूप पर्याय है, वो ये निश्चय करती है कि जाननेवाला कोई है अर्थात् ‘मैं जाननेवाला हूँ’ - ये निश्चय करती है। और इसी तरह मैं जाननेवाला हूँ और जगत में ऐसे भी पदार्थ हैं कि जो जाननेवाले नहीं हैं - ये भी वो उपयोग ही जानता है, ज्ञान की पर्याय ही जानती है।
यहाँ उपयोग में ज्ञान लेना क्योंकि उपयोग के दो भेद - एक दर्शन और एक ज्ञान; तो यहाँ ज्ञान लेना। तो ज्ञान है लक्षण, दर्शन लक्षण नहीं है। तो उपयोग माने वो पर्याय ज्ञान की जो प्रतिसमय चलती है वो लक्षण है। उससे आत्मा भी जाना जाता है और जगत भी जाना जाता है, सब जाना जाता है।
मुमुक्षु:- बाबूजी! उस पर्याय में बंध-मोक्ष की प्रवृत्ति है?
पूज्य बाबूजी:- नहीं उसमें नहीं है। उसमें बंध-मोक्ष की प्रवृत्ति नहीं है फिर भी सदा से, अनादिकाल से जो अज्ञान है, उस अज्ञान पर ही सारा दोषारोपण किया है। क्योंकि ज्ञान होता है समझदार, अन्य गुण समझदार नहीं हैं। (तो) ज्ञान ने जो भूल की है, ज्ञान जो भ्रम में पड़ा है,
85 उपयोग लक्षण का स्पष्टीकरण। - 1.02.05 Hours इसलिए समयसार में सारा दोष ज्ञान को ही दिया है और अज्ञान कहा है कि अज्ञान से ही बंध होता है और ज्ञान से ही बंध का निरोध होता है - ऐसा कहा है। लेकिन सचमुच ज्ञान और अज्ञान इन दोनों से करणानुयोग की अपेक्षा बंध नहीं होता है, संवर भी नहीं होता (और) निर्जरा भी नहीं होती। लेकिन चूँकि ज्ञान की प्रवृत्ति जब होती है तो उधर संवर और निर्जरा प्रगट होते हैं। सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र ये प्रगट होते हैं, उसके फलस्वरुप। इसलिए ज्ञान पर ही सारा वजन डाला जाता है आत्मा में क्योंकि ज्ञान ही प्रमुख है।
मुमुक्षु:- ज्ञान ही प्रमुख है!
पूज्य बाबूजी:- इसलिए सारा दोष समयसार में ज्ञान को दिया है, क्योंकि जानेगा नहीं तो श्रद्धा कैसे करेगा? आचरण भी कैसे होगा? इसलिए ज्ञान पहले निश्चय करे कि तेरा विहार-स्थल कौनसा है? तेरे आचरण का आश्रम कौनसा है? तो ये ज्ञान निश्चय करता है। तो ज्ञान निश्चय करता है तो श्रद्धा जागृत हुई और उधर आचरण उसमें क्रीड़ा करता है। जैसे उपवन में क्रीड़ा होती है ऐसे आत्मा में क्रीड़ा करता है, चारित्र। इस तरह तीनों प्रगट होते हैं।
मुमुक्षु:- बाबूजी! लेकिन जो उपयोग है वो उपयोग तो जीव का लक्षण है। तो वो जीव का लक्षण कभी मलिन तो नहीं होता न?
पूज्य बाबूजी:- हाँ! नहीं हुआ न!
मुमुक्षु:- हाँ! तो ये जो उपयोग है (वो) हमेशा वैसा (का) ही वैसा है?
पूज्य बाबूजी:- नहीं! उपयोग तो वैसा का वैसा है लेकिन जब ये मिथ्याप्रवृत्ति करता है माने जैसा है वैसा नहीं जानता, तो इसको मिथ्याज्ञान और अज्ञान कहते हैं। ये भी तो होता है न! ये तो स्वयं प्रगट है न, अपने अनुभव की चीज है न कि जैसा है वैसा नहीं जानता।
मुमुक्षु:- धर्म चूक जाता है!
पूज्य बाबूजी:- तो वो अज्ञान है, मिथ्याज्ञान है। इसीलिए वो ज्ञान में ही होता है। ऐसा नहीं है कि ज्ञान शुद्ध है। ज्ञान शुद्ध इसीलिए कहा जाता है कि ज्ञान में जो कल्पना होती है कि ये अन्य पदार्थ मेरे ज्ञान में आते हैं - ये जो कल्पना और ये जो अध्यवसान है इसके कारण वो पदार्थ ज्ञान में नहीं आते। ज्ञान में तो ये कल्पना होती है कि पदार्थ मेरे ज्ञान में आते हैं, आ जाते हैं। तो इसको भय, चिंता, विषाद, संक्लेश ये सब होते हैं। और जिस समय इसको ये ज्ञान हो जाये कि पदार्थ मेरे ज्ञान में नहीं आते पर मैं तो अपने भीतर ही भीतर पदार्थों जैसी रचना कर लेता हूँ, तो ज्ञान सम्यक् हो गया। और जब तक ये नहीं जानता तब तक सव-पर का विभाग नहीं हुआ न? तब तक उसने पर का अस्तित्व ज्ञान में माना तो स्व-पर का विभाग नहीं हुआ। इसलिए ज्ञान मिथ्या है और ये ज्ञान का ही दोष है। पर मिथ्याज्ञान होने पर भी उससे बंध नहीं होता और उससे निर्जरा, संवर-निर्जरा भी नहीं होते, मिथ्याज्ञान होने पर भी।
मुमुक्षु:- क्यों, वो कैसे?
पूज्य बाबूजी:- उसका कारण है बहुत बड़ा कि अगर ज्ञान से आस्रव और बंध होने लग जायें, मिथ्याज्ञान से अगर आस्रव-बंध होने लग जायें तो वो सारा ज्ञान आवृत्त हो जायेगा; सारा ज्ञान, संपूर्ण ज्ञान। क्योंकि जब ज्ञान हमेशा क्षयोपशमरूप रहता है संसार दशा में, लेकिन अगर हम उससे ज्ञान से आस्रव और बंध मानेंगे, तो फिर वो ज्ञान सारा आवृत्त हो जायेगा। इसका अर्थ है कि आत्मा अचेतन हो जायेगा। ज्ञान ही नहीं रहेगा, ज्ञान की पर्याय ही नहीं रहेगी। इसलिए ज्ञान से बंध और मोक्ष नहीं माना पर समयसार में दोष उसी को दिया (है) क्योंकि समझदार वही है। अन्य को दोष नहीं दिया है। अज्ञान से ही आस्रव-बंध होता है और अज्ञान से ही आस्रव-बंध की निवृत्ति होती है। आस्रव की निवृत्ति ज्ञान से ही होती है।
मुमुक्षु:- ज्ञान से बंध-मोक्ष नहीं होता।
पूज्य बाबूजी:- नहीं होता!
मुमुक्षु:- अज्ञान से बंध-मोक्ष (होता है)।
पूज्य बाबूजी:- न अज्ञान से भी नहीं होता। अज्ञान से भी नहीं होता है।
मुमुक्षु:- तो प्रभु! कैसे होता है?
पूज्य बाबूजी:- वो अज्ञान ही मूल कारण रहा न! कि अज्ञान ने स्व-पर का विभाग नहीं किया - यही तो मूल कारण रहा न। इसी का नाम मिथ्यादर्शन, इसी का नाम मिथ्याज्ञान, इसी का नाम मिथ्याचारित्र। मूल कारण ज्ञान है, इसीलिए वो मिथ्याज्ञान होता है बराबर।
परम उपकारी श्री सद्गुरुदेव की जय हो!
जिनवाणी माता की जय हो!
जिनवाणी-स्तुति
आत्मज्ञान में ही आत्मा की सिद्धि और प्रसिद्धि है।
आत्मज्ञान में ही भिन्नरूप विश्व की भी सिद्धि है ॥
आत्मज्ञान ही बस ज्ञान है आत्मज्ञान ही बस ज्ञेय है।
आत्मज्ञानमय ज्ञाता ही आत्मा ज्ञान-ज्ञेय अभेद है॥
दर्शाय सरस्वती देवीने किया परम उपकार है।
निजभाव में ही थिर रहूँ, माँ वंदना अविकार है॥
जिनवाणी के ज्ञान से सूझे लोकालोक।
सो वाणी मस्तक नमूँ, सदा देत हूँ ढोक ॥