नीलाम्बर तत्त्वचर्चा (बाबू युगल जी) | Neelambar Tattva Charcha (Babu Yugal Ji)

तत्त्वचर्चा 20 (13 फ़रवरी 1999)

पूज्य बाबूजी जुगल किशोर जी युगल, कोटा
तत्त्व-चर्चा नंबर २०, तारीख १३-२-१९९९
श्री शांतिभाई ज़वेरी निवास स्थान - नीलांबर, मुंबई

मुमुक्षुः- 62पूज्य बाबूजी! प्रश्न है (कि) ९-१०वीं गाथा से (कि) जो द्वादशांग को जानता है वह तो श्रुतकेवली है और आत्मा को जाननेवाले को भी श्रुतकेवली कहा जाता है।

फिर से। प्रश्न है कि - द्वादशांग को जो जाने उसको तो श्रुतकेवली कहा है और साथ में आत्मा को जो जाने उसको भी श्रुतकेवली कहा है। द्वादशांग को जानना वो तो पर का जानना होता है। और आत्मा के जाननेवाले को श्रुतकेवली कहें - तो ये बात (में) जरा समस्या है, समझाईये।

पूज्य बाबूजी:- द्वादशांग का जो केंद्र है वो एकमात्र शुद्धात्मा है। द्वादशांग के हृदय में जो बैठा है वो एकमात्र शुद्धात्मा है। द्वादशांग में से जो शुद्धात्मा अलग कर दिया जाए तो कुछ बचता नहीं है। इसलिए द्वादशांग के निमित्त से माने द्रव्यश्रुत के निमित्त से जो शुद्धात्मा को सीधा जानता है, शुद्धात्मा के अभिमुख होकर जो शुद्धात्मा का वेदन करता है, उसको निश्चय श्रुतकेवली कहा है। और शुद्धात्मा (का) वेदन ही निश्चय सम्यग्ज्ञान है। और श्रुतकेवली इसलिए कहा कि श्रुत उसमें निमित्त है।

श्रुत पहले शुद्धात्मा का स्वरूप जानता है और उसके बाद उसका निर्णय करके, विचार करके उसकी महिमा लाकर, शुद्धात्मा का निर्विकल्प स्वसंवेदन करता है। इसलिए वो निश्चय श्रुतकेवली रहा। और द्वादशांग को जाननेवाला वो भी ज्ञान है। द्वादशांग स्वयं नहीं है श्रुतकेवली, पर द्वादशांग को जाननेवाला ज्ञान है, वो श्रुतकेवली है। वो श्रुतकेवली माने व्यवहार श्रुतकेवली है क्योंकि निश्चय के साथ व्यवहार घटाना आवश्यक है न।

तो वो तो है उत्कृष्ट बात! लेकिन जो शुद्धात्मा को जानते हैं, वे द्वादशांग को जानते ही हों - ऐसा नहीं है।

मुमुक्षुः- ये क्या कहा?

पूज्य बाबूजी:- वो तो है ही सही न! शुद्धात्मा को जो जानते हैं, जिन्हें सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान हुआ है, वे द्वादशांग को जानें ही जाने - ऐसा आवश्यक नहीं है। द्वादशांग का सार तो वो जानते हैं। लेकिन पूरा द्वादशांग जाननेवाले ये द्वादशांग के पाठी वो श्रुतकेवली कहलाते हैं,

62 ९-१०वीं गाथा से जो द्वादशांग को जानता है वह तो श्रुतकेवली है और आत्मा को जाननेवाले को भी श्रुतकेवली कहा जाता है। - 0.15 Mins व्यवहार श्रुतकेवली; क्योंकि वो द्वादशांग को जानते हैं। द्वादशांग को जानकर आत्मा को जाने, वो निश्चय श्रुतकेवली होता है और द्वादशांग को जाननेवाले वो व्यवहार श्रुतकेवली (होते हैं)।

द्वादशांग को जानने में भी ये जो आशय है, अभिप्राय है, वो यही रहता है कि मुझे शुद्धात्मा जानना है द्वादशांग के द्वारा। तो द्वादशांग निमित्त होता है इसलिए निमित्त की ओर से वो जो शुद्धात्मा को जाननेवाले हैं, निर्विकल्प स्वसंवेदन में तो उस निर्विकल्प स्वसंवेदन को श्रुत नाम दिया। श्रुतकेवली उनको कहा। और जो सर्व द्वादशांग को जानते हैं वे श्रुतकेवली हैं - ये व्यवहार है।

लेकिन क्योंकि वो सबको संभव नहीं होता है। जैसे तुष-माष भिन्नम् जैसा वो शिवभूति मुनि का ज्ञान था, तो उसमें द्वादशांग का ज्ञान पूरा कहाँ था? द्रव्यश्रुत का? तो भी द्रव्यश्रुत का जो सारभूत कि शुद्धात्मा है, उसका ज्ञान उनको था। तो वो जो ज्ञान है, वो द्वादशांग का जो ज्ञान है वो आत्मा ही है। ज्ञान द्वादशांग का नहीं (है) पहली बात तो ये।

मुमुक्षु:- ज्ञान द्वादशांग का नहीं (है)।

पूज्य बाबूजी:- नहीं! ज्ञान आत्मा का (है)। लेकिन द्वादशांग इसकी उत्पत्ति में निमित्त हो जाता है। अगर हमारे ज्ञान का उपादान थोड़ा अच्छा हो तो वो निमित्त हो जाता है, इसलिए उसको श्रुतकेवली संज्ञा दी जाती है। लेकिन हर कोई नहीं जानता है न! इसलिए वो जितना कुछ ज्ञान होता है, उस ज्ञान में वह आत्मा का चिंतन चलता है तो उसमें भेद उत्पन्न होता है। माने ज्ञान सो आत्मा - ये इतना भेद ये (भी) बहुत अंतिम भेद (है), सूक्ष्म भेद है ये (कि) ज्ञान सो आत्मा।

ये ज्ञान सो आत्मा - इस विचार में चिंतन में जो प्रवृत्त हो रहा है वो तो हुआ व्यवहार श्रुतकेवली। यानि द्वादशांग का जाननेवाला वो तो उत्कृष्टरूप से श्रुतकेवली है ही। लेकिन सबको द्वादशांग का ज्ञान नहीं होता और निश्चय के साथ व्यवहार आवश्यक है। तो सबको नहीं होता, तो जो द्वादशांग के सारभूत आत्मा को जानता है, तो वो व्यवहार श्रुतकेवली हुआ चाहे उसका ज्ञान कितना ही (कम हो)। द्रव्यश्रुत का ज्ञान चाहे कितना ही (कम हो)! वो ज्ञान सिर्फ इतना (हो) कि ये जो ज्ञान है सो आत्मा है। बस! ये तिर्यंच ऐसा कर लेता है कि ये जो ज्ञान है सो आत्मा है। तो वो जो तिर्यंच है, वो व्यवहार श्रुतकेवली हुआ। और ऐसा करते हुए वो शुद्धात्मा पर पहुँच जाता है, तो वो निश्चय श्रुतकेवली है तिर्यंच, नारकी सब।

मुमुक्षु:- माने ज्ञानस्वरूप आत्मा के निर्णय को भी व्यवहार श्रुतकेवली कहा जाता है।

पूज्य बाबूजी:- हो गया न वहाँ। अनुभूति कहाँ है वहाँ? वहाँ तो चिंतन है, विचार है। ज्ञान सो आत्मा, बस इतना। इतना भेद जहाँ पड़ा (तो) और नहीं कुछ लंबा-चौड़ा दूसरा (कुछ भी), देव-शास्त्र-गुरुवाला नहीं वो। (बस!) ज्ञान सो आत्मा - इतना जो भेद पड़ा, तो वो व्यवहार हो गया। तो वो व्यवहार श्रुतकेवली है।

मुमुक्षु:- हाँ! पर वो अगर अनुभूति के साथ हो तो… पूज्य बाबूजी:- अनुभूति हो जाएगी। अनुभूति होनेवाली हो तो उसका नाम व्यवहार श्रुतकेवली - बस इतना। अनुभूति नहीं होनेवाली हो और वो केवल भेद में, विचार में, चिंतन में प्रवृत्तमान हो, तो (इसका अर्थ है कि) वो चिंतन उसे प्रिय लगा। चिंतन के प्रति उसे ममत्व हो गया (तो) वो शुद्धात्मा को भूल गया (और) इसलिए मिथ्यात्व और अज्ञान आ गया।

मुमुक्षु:- बराबर! माने श्रुतकेवली जैसे ज्ञान सो आत्मा, वो उतना अनुभव के पहले भी विचार चिंतन यथार्थरूप से करे, उसे भी श्रुतकेवली कहा जाता है।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! कहा जाता है।

मुमुक्षु:- पर वो व्यवहार से है।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! पर वास्तविक तो जिस समय निश्चय श्रुतकेवली होते हैं, शुद्धात्मा की अनुभूति करते हैं, तभी उसको व्यवहार संज्ञा मिलती है। लेकिन ये भी अनुचित नहीं है कि जिसे शुद्धात्मा का वेदन होनेवाला है, तो उसके पहले जो ज्ञान सो आत्मा, दर्शन सो आत्मा - ऐसा जो विचार चलता है उसको व्यवहार श्रुतकेवली कहना सर्वथा अनुचित हो, ऐसा नहीं है। वो कहना चाहिए, कहना चाहिए। (उसको सर्वथा व्यवहार) श्रुतकेवली कहें ही नहीं - ऐसा नहीं है, क्योंकि वो तो प्राप्त करनेवाले हैं। इसलिए प्राप्त कर लिया है, इस रूप में उसको स्वीकार किया जाता है।

मुमुक्षु:- बराबर! और प्राप्त करने के बाद अगर फिर विचार कर रहे हैं (तो) या तो ज्ञान खुल गया द्वादशांग का, (तो) उसे भी व्यवहार श्रुतकेवली कहते हैं।

पूज्य बाबूजी:- वो भी व्यवहार है।

मुमुक्षु:- माने व्यवहार श्रुतकेवली के दो प्रकार बन गए। एक तो अनुभूति के पहले ही जिसको अनुभूति होनेवाली है, उसे भी व्यवहार श्रुतकेवली कहेंगे। और अनुभव के बाद उसको जब सविकल्पदशा में शास्त्रों का ज्ञान या तो द्वादशांग का ज्ञान खुल गया (हो) तो उसे भी श्रुतकेवली कहा जाता है।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! उसे भी श्रुतकेवली कहते हैं। जैसे 63आत्मा की जब अनुभूति होती है तो उसका process (विधि) ये ही है कि वो पहले आत्मा के किन्हीं विशेष गुणों का चिंतन उसे चलता है, और महिमा बढ़ती है तो (फिर) तुरंत शुद्धात्मा पर पहुँचकर उसका संवेदन कर लेता है। ये ही तरीका है बस। और (कोई) दूसरा तरीका नहीं है।

मुमुक्षु:- आत्मा के गुणों का चिंतन चलता है।

पूज्य बाबूजी:- आत्मा के जो मुख्य गुण हैं, मुख्य में भी फिर ज्ञान रह जाता है तो उसका चिंतन चलता है। ज्ञान और आनंद स्वरूप हूँ - ऐसा चिंतन चला। लेकिन क्योंकि इस चिंतन में तो विकल्प है, विचार है, तरलता है, चंचलता है। स्थिरता नहीं है और यह अनुभूति का स्वरुप नहीं है

63 आत्मा की अनुभूति की विधि। - 10.42 Mins तथा आत्मा का भी स्वरूप नहीं है। इसलिए आत्मा इस तरह चिंतनपूर्वक खंड-खंडज्ञान से अपना अनुभव कर सके - ऐसा नहीं है। इसलिए दोनों ही ये आत्मा न होने के कारण उनको व्यवहार कहा है। लेकिन ये व्यवहार साधन अवश्य बन जायेंगे यदि ये आत्मा का अनुभव कर लेगा, तो व्यवहार साधन (है)।

मुमुक्षुः- क्योंकि चिंतन से महिमा बढ़ती है।

पूज्य बाबूजीः- हाँ! (और) वास्तव में तो बाधक है।

मुमुक्षुः- बाबूजी! 64सविकल्प स्वसंवेदनवाले को व्यवहार केवली बोल सकते हैं न? सविकल्प स्वसंवेदनवाले जो भगवान आत्मा हैं, उनको व्यवहार केवली बोल सकते हैं?

पूज्य बाबूजीः- हाँ! बोल सकते हैं।

मुमुक्षुः- यहाँ सम्यग्दृष्टि को केवली कहा? यहाँ सम्यग्दर्शन वाला, चौथावाला (जो है) उसको केवली क्यों कहा?

पूज्य बाबूजीः- केवली कहा न! केवल को जानता है वो, केवल माने मात्र शुद्धात्मा। शुद्धात्मा को जानता है। उसका नाम केवल है, शुद्धात्मा का नाम। इसलिए कहा (है) केवली। और श्रुत उसमें निमित्त है इसलिए श्रुतकेवली कहा।

मुमुक्षुः- 65आपने अभी बताया कि द्वादशांग का ज्ञान वास्तव में द्वादशांग का नहीं है।

पूज्य बाबूजीः- नहीं है। द्वादशांग का नहीं है, आत्मा का है। इसलिए वो द्वादशांग का कोई भी, कोई भी भाग, कोई भी हिस्सा जानकर और आत्मा पर आ जाता है। उसको (बस) इतना सा रहता है (कि) ज्ञान सो आत्मा। तो ये ज्ञान बना लिया न उसने सारे द्वादशांग को।

द्वादशांग का ज्ञान द्वादशांग का नहीं (है), पर ज्ञान आत्मा का है। इसलिए यह जो ज्ञान है सो मैं ही हूँ (अर्थात्) आत्मा ही है - ये ज्ञान, ये व्यवहार श्रुतकेवली हो गया। ऐसा करते-करते ये विचार रुक जाता है और अनुभूति वो प्रगट हो जाती है।

मुमुक्षुः- माने अनेकाकार ज्ञान में से उसने एकाकार ज्ञान के स्वरूप को जाना।

पूज्य बाबूजीः- हाँ! एकाकार करना ही पड़ता है न! एकाकार करना ही पड़ता है। ये जो अनेक भेद हैं, वो सब उसमें से निकल जाते हैं और अकेला ज्ञान सामान्य जो है (वो) शुद्धात्मा का अनुभव कर लेता है। स्वयं ज्ञायक बन जाता है। स्वयं ज्ञायक बन जाता है - ऐसी अभेदता! यहाँ तो भेद है। वहाँ अभेदता ऐसी होती है कि - ये है तो अनुभूति, पर्याय (है) लेकिन ये स्वयं ज्ञायक बनकर बोलती है। ज्ञायक बनकर बोलती है (कि) मैं ज्ञायक हूँ, चिन्मात्र हूँ, चैतन्य हूँ - ऐसा इसका स्वर होता है।

64 सविकल्प स्वसंवेदनवाले को व्यवहार केवली बोल सकते हैं? - 12.22 Mins

65 ज्ञान द्वादशांग का नहीं है। - 13.10 Mins मुमुक्षुः- तो वो पर्याय का स्वर पर्यायमय होता नहीं (बल्कि) वो ज्ञायकरूप हो जाता है उसका स्वर।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! पर्याय का स्वर पर्यायमय नहीं रहता, पर पर्याय का स्वर द्रव्य बन जाता है।

मुमुक्षुः- तो व्यवहार श्रुतकेवली निश्चय श्रुतकेवली बन जाता है।

पूज्य बाबूजी:- निश्चय श्रुतकेवली वही होता है। ये निश्चय श्रुतकेवली है। इसलिए सभी निश्चय श्रुतकेवली हैं जो ऐसा करते हैं - नारकी, तिर्यंच, मनुष्य, देव (सभी)। क्योंकि उसमें भेद कैसे होगा? क्योंकि सब एक ही विधि से उस शुद्धात्मा को पा रहे हैं। दूसरी कोई विधि है नहीं। बस ये ही विधि है कि ज्ञान सो आत्मा, आनंद सो आत्मा। ऐसे किया (तो) ऐसा करते-करते अनुभूति हुई, तो (वो) निश्चय श्रुतकेवली हो गया (और) ये व्यवहार रह गया।

मुमुक्षुः- माने इसका मतलब तो ये हुआ बाबूजी कि स्वरूप का सही चिंतन करनेवाले को, माने ज्ञानस्वरूप आत्मा का निर्णय करनेवाले को भी व्यवहार श्रुतकेवली कह दिया है।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! कहा है। है वो, है। है वो। कहा है माने वो है व्यवहार श्रुतकेवली। क्योंकि है तो उसका भी ज्ञान श्रुत (ही)। उसके ज्ञान में भी है तो श्रुत ही निमित्त। तो श्रुत निमित्त होने पर भी वो श्रुत का विकलपात्मक चिंतन कर रहा है। विकलपात्मक चिंतन कर रहा है, इसलिए वो अभी अनुभूति में न होने के कारण व्यवहार हो गया।

मुमुक्षुः- तो ऐसा लगता है कि एक गरीब को राजमहल में बिठाकर राजा बना दिया। आत्मा के चिंतन करने वाले को व्यवहार श्रुतकेवली बोल दिया।

पूज्य बाबूजी:- आत्मा सदा ही अमीर है न, गरीब नहीं है। इसलिए जो पर्याय है न गरीब, वो पर्याय महारानी बन जाती है। वो साम्राज्ञी बन जाती है। वो तो सम्राट है शुद्धात्मा तो और वो साम्राज्ञी बन जाती है। गरीबी तो पर्याय में है (कि) मैं दुखी हूँ। ये गरीब ही बोलता है (कि) मैं अज्ञानी हूँ; (ये) गरीबी है पर्याय की। ये पर्याय की गरीबी समाप्त होकर ऊँचाईओं को छूती है।

मुमुक्षुः- ऊँचाईओं को छूती है। बराबर! Absolutely! बराबर!

पूज्य बाबूजी:- हो ही जाता है (न)! कोई गरीब कन्या किसी राजा के घर चली जाये, तो फिर क्या स्थिति होती है उसकी? और क्या मानती है (वो) अपने आप को? बल्कि (सिर्फ) संबंध भी हो जाए तो? क्या मानती है? महारानी मानती है। अब उस गरीबी को कौन याद करे? गई वो तो, समाप्त हो गई।

मुमुक्षुः- यूँ भी बुरे दिन किसी को याद आते अच्छे नहीं लगते।

पूज्य बाबूजी:- बुरे दिन तो लोक में याद करने चाहिए, बाकी प्रकरण में। अध्यात्म में बुरे दिन होते ही नहीं हैं आत्मा के। आत्मा के कभी बुरे दिन आए ही नहीं। अब कल्पना में कोई ऐसा बन जाए तो उसका कोई क्या करे? कल्पना में, भ्रम में किसी भी रूप से आत्मा को भूलकर जो दीन हो गया, हीन हो गया। हीन हो गया माने अपने आपको हीन मानने लगा पर्याय में, स्वयं अत्यंत उच्च होने पर भी, ओजस्व-तेजवाला होने पर भी अपने आप को पर्याय में दीन और हीन मानने लगा। लेकिन इससे वो जो तत्त्व है परम तत्त्व, उसमें हीनता नहीं आई। उसमें दीनता नहीं आई। वो तो ऊँचा ही रहा, आसमान को ही चूमता रहा वो।

हाँ! ये पर्याय (है) यदि उसको आज समझ में आ जाए (और उसकी) समझ ठीक हो जाए तो ये उस जैसी बन जाती है। और ऐसी बनती है कि फिर अपना स्वर ही बदल देती है। तो स्वर बदलकर बिल्कुल जैसे कोई छाती से छाती लगाकर ऐसा एकाकार मिलन हो रहा हो, ऐसा एकाकार मिलन होता है कि जिसमें (वो) स्वयं गायब हो जाती है।

मुमुक्षु:- बराबर! सही बात है!

एक दूसरा प्रश्न है प्रभु!66 अनुभूति के पहले की विचारधारा में स्व-पर के भेद की धारा का चिंतन कार्यकारी है कि ज्ञायक की महिमा का (चिंतन कार्यकारी है)?

पूज्य बाबूजी:- हाँ! ज्ञायक की महिमा का। स्व-पर का भेद तो पहले ही कर लेना चाहिए। पहले ही किया जा चुका होता है, स्व-पर का भेद (तो)। स्व-पर का भेद करके जो पर है, वो तो मेरे किसी काम का नहीं है, किसी प्रयोजन का नहीं है - ये मैंने जान लिया है। उसको कहते हैं जानना। अब उनको ज्ञेय की कोटि में रखना कि वे मेरे किसी काम के (और) किसी मतलब के नहीं हैं। सारे के सारे हेय तत्त्व हैं और अहम् करने लायक नहीं हैं। मैंने जो अब तक उनमें अहम् किया वो सारा का सारा बरबाद हुआ, व्यर्थ हुआ। और उसमें जो श्रम किया गया वो भी सारा का सारा बरबाद हुआ। ऐसा जानकर पर से विमुख होकर और अपनी पर्याय को पर से खाली कर देता है, विविक्त कर लेता है पर्याय को। ज्ञान की पर्याय को परपदार्थों से विविक्त करके उसमें एकमात्र चैतन्य को भर देता है। और चैतन्य को भरकर चैतन्य का चिंतन करने लगता है कि मैं तो शुद्ध, बुद्ध, एक, एकरूप, अनंत और अनंत समृद्धि सम्पन्न हूँ। अनंत वैभव सम्पन्न हूँ। तो अनंत वैभव सम्पन्न मैं हूँ अगर ज्ञान ने ऐसा वास्तव में दृढ़ता से स्वीकार किया तो इस चिंतन में प्रसन्नता नहीं होगी क्या?

मुमुक्षु:- आनी ही है। प्रसन्नता ही होगी।

पूज्य बाबूजी:- होगी ही होगी न! क्योंकि निश्चितरूप में, अत्यंत निश्चित रूप में वो इस बात को (स्वीकार) करता है। दृढ़ता से ज्ञान ने स्वीकर किया कि और कुछ नहीं है इसके सिवाय। बस! ये एक ही मेरा उपादेय और अहम् करने योग्य है - ऐसा जानकर और (ऐसा माना कि) इसका जो वैभव है, वो अनंत है (और) अपार है। अर्थात् मेरा वैभव अनंत और अपार है और वो वर्तमान में विद्यमान है। वो कोई लाया जाएगा (और) पर्याय उसे पैदा करेगी - ऐसा नहीं है। लेकिन

66 अनुभूति के पहले की विचारधारा में स्व-पर के भेद की धारा का चिंतन कार्यकारी है कि ज्ञायक की महिमा का? - 19.52 Mins वर्तमान में विद्यमान है वो और अपरंपार है उसकी महिमा। इस तरह जिसने महिमा को जाना तो तुरंत विकल्प छूटकर महिमा-मग्न हो जाता है।

मुमुक्षु:- तुरंत विकल्प छूटकर महिमा-मग्न हो जाता है।

पूज्य बाबूजी:- हो जाता है। आनी महिमा और उसका स्पष्ट ज्ञान। (बाकी) सबको निकाल दिया, सारे जगत को निकाल दिया (उसने)। सारे जगत को अपने से, अपनी जो पर्याय है, वो सारे जगत से खाली कर ली क्योंकि राग-द्वेष नहीं बचे। क्योंकि राग-द्वेष तो कब पैदा होते थे? कि जब उन पदार्थों को यह अपने साथ जोड़ता था ममत्व में, अहम् में जोड़ता था। तब न मिथ्यादर्शन और राग-द्वेष पैदा होते थे। अब जब वो सारे पदार्थ मेरे से न्यारे ही हैं, तो वो उनके ममत्व से उत्पन्न होने वाले जो मिथ्यादर्शन और राग-द्वेष के भाव हैं, क्या वे अब पैदा होंगे?

फिर से। जब सारे पदार्थों को अपने से बिल्कुल न्यारा मान लिया तो वे राग-द्वेष और मिथ्यादर्शन बचा या नहीं बचा?

मुमुक्षु:- कैसे बच सकता है?

पूज्य बाबूजी:- तो कैसे नहीं बचेगा? ये जब सारे को अलग माना तो उनसे ममत्व करने का कोई प्रश्न ही नहीं रहता। कोई अवकाश ही नहीं रहता। इसलिए ममत्व और राग-द्वेष से भी खाली हो गया। वो भी पर में चले गए। पर के साथ वो भी पर में चले गए क्योंकि ये जो भाव (हैं, ये) पैदा तो मेरे में (ही) होते थे लेकिन इनका संबंध था अन्य पदार्थों से। इसलिए उनको परपदार्थों में ही रख दिया। इस तरह सबसे विविक्त हो गया। मोह-राग-द्वेष और परपदार्थ सबसे विविक्त होकर, खाली होकर और वो जो पर्याय है, वो पर्याय ज्ञायक से भर गई। और ज्ञायक से भरकर ज्ञायक का धारावाहिक चिंतन महिमापूर्वक करने लगी। और अंत में समय आया कि ये जो चिंतन है, उसको भी हेय जानता था; शुरु से ही हेय जानता था। और आत्मा का स्वरुप निश्चित हो ही चुका है। इसलिए ये जो चिंतन है, ये भी विराम पाकर अंत में आत्मा में आत्मस्थ हो जाता है। ये तरीका है।

क्योंकि वो तो गुणों की जो अनेकता है वो भी घटती जाती है। पहले तो गुण… कई गुणों के आधार से विचार करे। उसके बाद वो गुणों की अनेकता भी घटती जाती है और ज्ञानमात्र, ज्ञानमात्र, आनंदमात्र, बस इतना। अंत में जाकर इतना रह जाता है। जैसे बरफ जमते-जमते वो तरंग जो है, वो दिखाई भी नहीं देती (है)। तो इस तरह अंतिम स्थिति ऐसी हो जाती है कि बस ज्ञायक-ज्ञायक-ज्ञायक ही हूँ एक, ऐसा। और अभी भी विकल्प है लेकिन और इसको भी हेय जान रहा है। और बस अगले कदम में शुद्धात्मा में पदार्पण कर लेता है।

मुमुक्षु:- बराबर! अद्भुत! अद्भुत! अनुभव पूर्व के अंतिम क्षणों का परिणमन कैसा होता है?

पूज्य बाबूजी:- ये (ही) होता है।

मुमुक्षु:- ये होता है।

पूज्य बाबूजी:- बहुत मधुर प्रकरण है ये। बहुत मधुर! दुनिया में इतना मधुर, इतना सुंदर प्रकरण कोई सुनने को मिल जाए, ऐसा आज तक हुआ नहीं और होगा नहीं। इतना मधुर प्रकरण है ये आत्मानुभूति का और उसकी विधि का।

मुमुक्षु:- उसकी विधि में भी मधुरता है।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! विधि ये ही। ये ही विधि है उसकी। (इसमें भी) बहुत मधुरता है, बहुत मधुरता है। उछलता है जैसे भीतर ही भीतर। भीतर ही भीतर उछलता है कि ये मिला, ये मिला, ये मिला, वो आ गया।

मुमुक्षु:- आहाहा! ⁶⁷पर को जानना कहा आपने, तो इसका मतलब ये मेरे नहीं हैं - ये पर को जानना हुआ?

पूज्य बाबूजी:- ये हुआ पर को जानना क्योंकि मेरा अस्तित्व स्वीकृत हो गया। तब ही कहा न इसने कि ये मेरे नहीं है और इनका मेरे से कोई संबंध नहीं है। ये कब कहा? कि जब उनका अस्तित्व स्वीकार कर लिया। तो हो तो गया तीनलोक का जानना।

मुमुक्षु:- बराबर! पर कैसे हैं - ये पर का जानना नहीं।

पूज्य बाबूजी:- वो नहीं। पर कैसे हैं उनसे नहीं (है) मतलब।

मुमुक्षु:- पर मेरे नहीं हैं - वो पर का जानना हुआ।

पूज्य बाबूजी:- वो पर का जानना हुआ।

मुमुक्षु:- ये क्या बाबूजी! ये बात तो विचारकोटि में भी आने की मुश्किल है।

पूज्य बाबूजी:- मुश्किल लगती है क्योंकि उसमें दिल नहीं लगता है। विस्तार में जाता है। उसकी आदत विस्तार में जाने की पड़ी है इसलिए अनेक पदार्थों पर विचार करने लगता। शरीर मेरा नहीं है, इंद्रियाँ मेरी नहीं हैं। अरे भाई! एक में डाल दे न सबको। अजैन-अजैन सब एक कोटि के हैं। बस! हो गया खतम। मैं जैन हूँ बस। वो सब एक ही कोटि के हैं।

मुमुक्षु:- बहुत सुंदर! पर को जानना माने पर मेरे नहीं हैं - ये जानना है। ये पर का जानना (है)।

पूज्य बाबूजी:- ये प्राण है उसका, पर को जानने का। ज्ञान का प्राण है ये।

मुमुक्षु:- बहुत सुंदर! स्व-पर को विभाजित करने की प्रक्रिया में ये है कि पर कैसे हैं - ये नहीं जानना है। पर मेरे नहीं हैं - ये जानना है पर का।

पूज्य बाबूजी:- बस वही है। उसी में ये परम सदाचारी हो गया, परम सदाचारी। एक अणुमात्र भी मेरा नहीं है।

67 पर को जानना कहा आपने, तो इसका मतलब ये मेरे नहीं हैं - ये पर को जानना हुआ। - 27.10 Mins तो जिसने इतने बड़े विश्व के साथ फैले हुए अपने ममत्व को समेटकर जो जिस क्षण में ये बोला कि अणुमात्र भी मेरा नहीं है, तो फिर केवलज्ञान का ताज किसको पहनाया जाएगा? इसको नहीं पहनाया जाएगा (क्या)? और कौन है जो केवलज्ञान के लायक है? क्योंकि केवलज्ञान में तो दिखाई अनेक देंगे। जो इसने इतने थोड़े से श्रुतज्ञान में सारे ही विश्व को परत्व दे दिया, सारे विश्व को! इतने छोटे से ज्ञान में सारे विश्व को परत्व दिया और केवलज्ञान भी सारे विश्व को परत्व देता है, तो इसमें (और) केवलज्ञान में कहाँ अंतर रहा? और जो यदि अंतर माना भी जाता है तो केवलज्ञान का उत्तराधिकारी कौन है? कहते हैं (कि) ये ज्ञान है तुष माष भिन्नम् जितना।

मुमुक्षु:- वाह रे वाह! ये ज्ञान है..

पूज्य बाबूजी:- इसको ताज पहनाया जाएगा।

मुमुक्षु:- Beautiful! केवलज्ञान का उत्तराधिकारी किसको माना जाता है? ये तुष माष (भिन्नम्) जितना ज्ञान (उसका) उत्तराधिकारी है।

पूज्य बाबूजी:- इस अल्पज्ञान में ताकत कितनी कि संपूर्ण विश्व में अणुमात्र भी मेरा नहीं है। कितनी ताकत! कितना ईमान-धर्म! इसको कहते हैं ईमान-धर्म।

मुमुक्षु:- ये छोटे मुँह बड़ीवाली बात नहीं है। ये तो ईमान-धर्म की है।

पूज्य बाबूजी:- ईमान-धर्म की बात है।

मुमुक्षु:- हमने तो ये सोचा था कि आपने कह दिया कि पर को जानना मत, तो जानना ही बंद कर दिया था। तो ये मेरे नहीं है - इतना जो जानना बाकी रह गया था, उसका सुझाव (अब) मिल गया।

पूज्य बाबूजी:- बस! तो वो हो गया। जानना बंद हो गया (और) यहाँ पर पूर्णाहुति हो गई। पूर्ण ज्ञान हो गया (कि) बस मेरे नहीं हैं। अब कोई संबंध भी नहीं है। था भी नहीं (और) है भी नहीं। केवल मानने की कल्पना में था, वो ख़त्म हो गई। वो मेरे से जुदा हो चुकी (है), बस।

मुमुक्षु:- 68तो ज्ञायक की महिमा फलदायी होती है।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! ज्ञायक की महिमा इसी तरह आवे कि उसे (ज्ञायक को) वो समृद्धशाली माने। जगत का सबसे समृद्धशाली पदार्थ वो मैं हूँ। वो इसलिए हूँ कि जगत में भले ही हैं जीव मेरे जैसे, लेकिन उनकी समृद्धियाँ उनके पास हैं। वे तो मुझे एक दाना भी नहीं देते हैं। इसलिए सबसे समृद्धशाली मैं हूँ क्योंकि मैं उनके भी सामने जाता नहीं हूँ। मैं उनसे भीख कभी माँगता नहीं हूँ।

तो मेरा जो आत्म-गौरव है वो सबसे ऊँचा है। सबसे ऊँचा! मैं तो भगवान सिद्ध से ही नहीं माँगता हूँ, और की (तो) क्या बात है? और की क्या बिसात है? मैं तो भगवान सिद्ध से ही नहीं माँगता हूँ। क्योंकि मेरे पास (जो) है वो क्या काम आएगा? मेरा टिफ़िन क्या काम आएगा अगर

68 ज्ञायक की महिमा कब फलदायी होती है? - 31.11 Mins मैं भगवान से माँगूँगा तो? और वो क्यों देंगे? वो देंगे तो.. वो पूजा में लिखी है ये बात कि वो अपराधी हैं अगर दे देवें (तो)। अपराधी हैं वो क्योंकि उन्होंने जगत में भीख माँगने का व्यवसाय शुरू करा दिया। ये अपराध है बड़ा भारी (है)। ये बड़ा भारी अपराध है।

मुमुक्षुः- विश्व की सुंदरता खत्म हो जाती है।

पूज्य बाबूजीः- हाँ! विश्व की ही नहीं (बल्कि) ये तो सौन्दर्य समाप्त हो गया उसका, जीव का। जीवलोक जो है वो सब भिखारी बन गया। भिखारी बन गया।

मुमुक्षुः- आहाहा! जीवलोक है, वो सब भिखारी बन गया।

पूज्य बाबूजीः- अज्ञानी तो चाहता ही ये ही है कि कोई दे दे। बिना मेहनत के मिल जाए बस और क्या है! अज्ञानी को तो प्रमाद ने घेर रखा है, इसलिए वो शुद्धात्मा की ओर आना ही नहीं चाहता। उसको तो ये है कि दे दें भगवान और क्या है? उनके पास बहुत तो है, क्या करेंगे? मेरे पास भी है उसका बोध इसको नहीं है।

ज्ञान को भगवान के सामने ले जाया जाये, केवल राग को नहीं ले जाये। हाँ! हम तो राग को ले जाते हैं इसलिए फेरी लगाकर आ जाते हैं। ज्ञान को भगवान के सामने ले जाए तो निश्चितरूप में कुछ लेकर लौटता है। माने ये स्वीकार करके लौटता है कि अरे! मैं तो स्वयं ही भगवान हूँ। मैंने क्या किया ये कि मैं भगवान के सामने गया और उनसे माँगा?

मुमुक्षुः- आहाहा! ज्ञान को भगवान के पास लेकर गया तो भगवान के द्रव्य, गुण और पर्याय से मिलान हो गया।

पूज्य बाबूजीः- अनेक करोड़पति हों, उसमें कौनसे करोड़पति को यह याद आवे कि ये दूसरे और भी अपने जैसे करोड़पति हैं। तो अपन देखें, एक दिन चलें तो सही न उनके पास। कुछ थोड़ा-बहुत माँगकर तो देखें! ऐसा विचार आएगा? अरे अपन तो (खुद) हम ही करोड़पति हैं। वो भी हैं तो होंगे, उनके घर के हैं वो। भगवान भगवान के घर के हैं। मुझे देकर थोड़े (ही) खाते हैं।

मुमुक्षुः- तो तो बाबूजी आपने तो सभी को अहमिंद्र बना दिए।

पूज्य बाबूजीः- अहमिंद्र ही है ये।

मुमुक्षुः- कमी है ही नहीं।

एक प्रश्न है69 कि सम्यग्दर्शन होते ही श्रद्धा परिपूर्ण हो जाती है। प्रश्नकार का विचार लिखा है कि - सम्यग्दर्शन होते ही श्रद्धा परिपूर्ण हो जाती है और ज्ञान केवलज्ञान होते परिपूर्ण होता है। त्रिकाली ध्रुव तो अकार्यकारणत्व का धारक है। तो फिर श्रद्धा-ज्ञान की परिपूर्णता का असली कारण कौन है? कृपया समाधान कीजिए।

69 श्रद्धा-ज्ञान की परिपूर्णता का असली कारण कौन है? - 35 Mins पूज्य बाबूजी:- स्वयं ही है वैसे तो। दोनों बातें आती हैं कि - वो जो शुद्धात्मा है (उसको) कारण परमात्मा भी कहते हैं। वो इसलिए कहते हैं कि पर्याय जो है, वो सारे जगत से लौटकर उसकी ओर झाँकती है। तो इसलिए उसे कारण भी कहा जाता है। (लेकिन वो तो) हमेशा से ही बना हुआ है। इसलिए पर्याय में कहाँ दोष का निवारण हुआ? लेकिन पर्याय ने अपना अपराध छोड़कर उस कारण परमात्मा की ओर (जब) झाँकी, तो वो कारण परमात्मा बन गई स्वयं। स्वयं परमात्मा बन गई, इसलिए पर्याय में ही होता है।

और केवलज्ञान में पूर्ण होता है सम्यग्ज्ञान - ऐसा नहीं (है)। सम्यग्ज्ञान तो हो गया। जिस समय श्रद्धा पूरी हुई उस समय ज्ञान भी सम्यक् रूप में तो पूरा हो गया। अब ये केवलज्ञान की बात है तो वो तो गिनती की (बात) है, पदार्थों की। पदार्थों की गिनती की है। तो वो दिखाई दें (अथवा) न दें, इससे क्या मतलब है इसको? उनको दिखाई देते हैं भगवान को, तो भी भगवान को उनके प्रति पूरी उपेक्षा है। पूरी उपेक्षा है।

तो जिनके प्रति उपेक्षा है तो उसके संबंध में इसको अपेक्षा होगी क्या कि - मैं केवलज्ञान लूँ? ऐसा केवलज्ञान लूँ कि जिसमें लोकालोक दिखाई दे.. और फिर केवलज्ञान को क्या कहेगा? कि भाई! तेरे श्रुतज्ञान में ये लोकालोक का वो जो अपनी छाती में दबाकर बैठा है, वो दिख रहा है। तो तू उस केवलज्ञान को लेकर क्या करेगा? इस तरह केवलज्ञान की प्रीति तोड़ने पर केवलज्ञान भागा आता है।

मुमुक्षु:- दौड़ा आता है।

पूज्य बाबूजी:- दौड़ा आता है।

मुमुक्षु:- माने ज्ञान भी परिपूर्ण हो गया, सम्यक् प्रकार से।

पूज्य बाबूजी:- सम्यक् हो गया। सभी सम्यक् हैं ये मति सम्यक्, श्रुत सम्यक्, अवधि सम्यक्, मनः पर्यय सम्यक् और केवलज्ञान सम्यक्। सम्यग्ज्ञान तो हो गया पूरा।

मुमुक्षु:- 70कार्य परमात्मा को निश्चय से कारण परमात्मा की अपेक्षा है?

पूज्य बाबूजी:- कारण परमात्मा निरपेक्ष है। तो उसकी अपेक्षा से कार्य परमात्मा सापेक्ष है, उसकी अपेक्षा से। क्योंकि कार्य परमात्मा तो नया बना है (और) कारण परमात्मा पुरातन है।

मुमुक्षु:- वो कहा गया है इसका मतलब क्या? शुद्धात्मा कारण परमात्मा है - ऐसा जो कहा गया है (उसका अर्थ क्या)?

पूज्य बाबूजी:- शुद्धात्मा कारण परमात्मा यानि ऐसा कारण नहीं है कि उसके होने पर शुद्धि हो ही हो - ऐसा आवश्यक नहीं। लेकिन फिर भी जब-जब शुद्धि प्रगट होगी, तो उसकी ओर ही पर्याय को झाँकना पड़ेगा। इसलिए उसे कारण परमात्मा कहते हैं। और, और जगत में

70 कार्य परमात्मा को निश्चय से कारण परमात्मा की अपेक्षा है? - 38.12 Mins कोई नहीं, कोई पदार्थ कि जिसकी ओर ये देखे। केवल उसी की ओर देखेगा, तो पर्याय जो है वो कार्य परमात्मा बन जाएगी। इसलिए उसे कारण कहते हैं। वरना वो तो शुद्धात्मा शुद्ध चैतन्य है।

मुमुक्षुः- वो किसी का कारण होता नहीं।

पूज्य बाबूजी:- और भावरुप में अनुभव (में) आता है। किसी नाम से अनुभव में नहीं आता। इसलिए एक चैतन्यमात्र हूँ बस - ऐसा। ऐसा जो एक सामान्य बनाया चैतन्यमात्र हूँ मैं, ऐसा सामान्यभाव अनुभव में आता है। (उसको) चिन्मात्र कहते हैं। चिन्मात्र नाम से अगर करें तो नहीं आएगा।

मुमुक्षुः- वाह रे वाह! भावरुप से अनुभव में आता है, नामरुप से नहीं - ये क्या कहा?

पूज्य बाबूजी:- नामरुप से नहीं आता है (क्योंकि) नाम में तो विकल्प हो जाएगा। नाम में तो विकल्प हो जाएगा। नामरूप से नहीं आता। सीधा जैसा उसका स्वरुप निर्णय किया, ठीक वैसा का वैसा भासित ज्ञान में होता है।

मुमुक्षुः- माने सोचे तो अशांति, परिणमे तो शांति।

उसी भाँति का एक प्रश्न है 71- पर्याय का षट्कारक पर्याय है। ये माननेवाला ज्ञानी हो या अज्ञानी, दोनों के अभिप्राय में फर्क होता है क्या?

पूज्य बाबूजी:- अज्ञानी तो जानता ही नहीं है इस बात को। वो तो पर्याय के षट्कारक मानता ही नहीं है। वो तो पर्याय को पराधीन मानता है। वरना अन्य के साथ ममत्व क्यों जोड़ेगा? और पराधीन क्यों बनाएगा उसको? इसलिए वो तो इस बात को मानता ही नहीं (है) क्योंकि वस्तु व्यवस्था… कहे भले ही। कहे भी (और) नहीं भी कहे।

और वस्तु-व्यवस्था ऐसी है कि पर्याय के जो है कारक हैं, कारक सामग्री (अर्थात्) काम बनानेवाली, काम करनेवाली सामग्री, उसका नाम कारक (है)। तो ये छह प्रकार के कारक जो हैं, वो कार्य की सामग्री हैं। तो वो हर पर्याय के पास रहते हैं - ये ज्ञानी जानता है। ये पर्याय अपने षट्कारकों से पैदा होती है। इसमें द्रव्य भी कारण नहीं और गुण भी कारण नहीं (है) - ऐसा जानकर वो पर्याय से भी निरपेक्ष हो जाता है। उसकी भी उपेक्षा कर देता है कि ये जो होगी तो अपने षट्कारक से होगी। इसमें अपने द्रव्य और गुण का कहाँ काम है? तो उससे विमुख हो जाता है, तो पर्यायदृष्टि छूट जाती है। इसमें भी पर्यायदृष्टि छूट जाती है। पर्याय के षट्कारक मानने में (क्योंकि) उसमें मेरा कोई काम नहीं है।

मुमुक्षुः- 72पर्याय में राग-द्वेष हुआ तो अज्ञानी बोले कि उसको होनेवाला था तो हुआ, उसमें हमें क्या? तो क्या दोष आता है?

71 पर्याय का षट्कारक पर्याय है - ऐसा माननेवाले ज्ञानी और अज्ञानी में कोई फरक होता है क्या? - 40.43 Mins

72 पर्याय में राग-द्वेष हुआ तो अज्ञानी बोले कि जो होनेवाला था तो हुआ, उससे हमें क्या? तो क्या उसमें दोष आता है? - 42.34 Mins पूज्य बाबूजी:- हाँ! होनेवाला था सो हुआ - ऐसा वो मानता है क्या? अज्ञानी बोला (कि जो) होनेवाला था सो हुआ, तो ऐसा वो मानता है कि नहीं मानता है? पहली बात (तो) ये। अगर वो खाली कहता ही है (और) मानता नहीं है, तो फिर उसने कहाँ माना कि होनेवाला है सो होता है? और यदि उसने मान लिया (हो) तो (फिर) उसकी दशा ही बदल जाती है। दशा बदल जाती है क्योंकि होनेवाला था तो हुआ - ऐसा जिसने जाना, उसका पर्याय की ओर से उपयोग हट जाता है; कि इसमें मैं क्या करूँगा? जो उसमें होना है वो सिद्ध भगवान, केवली भी नहीं लौटा सकते। तो मैं भी इसको (नहीं लौटा सकता)।

और इसको क्यों लौटाऊँ मैं? ये तो मेरे घर की व्यवस्था है, शान है मेरी कि मेरा कार्य कभी भी, तीन लोक, तीन काल में इधर-उधर होता ही नहीं है। इतना निश्चित timetable (समय-सारिणी) है कि वो इधर से उधर कभी होगा ही नहीं। तो ये तो मेरे द्रव्य की इतनी सुंदर व्यवस्था है कि जैसी है ही नहीं अज्ञानी के पास। अज्ञानी के पास नहीं है। ये तो मेरे द्रव्य का गौरव है न! कि वहाँ जो कुछ कार्य निश्चित है वो कार्य अपने समय पर होना है। तो ये गौरव है या नहीं?

तो उसने जाना कि ये जो होना है ये अपने समय पर होना है। तो इसमें मेरा कोई हिस्सा वास्तव में नहीं है। इसमें उलट-फेर करना, वो मुझे उलट-फेर करना भी नहीं है और ताकत भी किसी में नहीं है - इस तरह जानता है। ताकत नहीं है (ऐसा) माने तो कमजोरी आती है। तो ऐसे में उलट-फेर करना ही नहीं है। क्यों करे? व्यवस्था है, ये तो अपने घर की शान है। शान है ये तो। इसलिए व्यवस्थित को व्यवस्थित करने का नाम अव्यवस्था है।

तू उस व्यवस्थित को व्यवस्थित करना चाहता है। (तो) वो क्या करता है? (कहता है कि) होना था सो हुआ, होना था सो हुआ, होना था सो हुआ - (जब) ये व्यवस्थित है तो तू ये सौ बार क्यों दोहराता है इस बात को? इसका मतलब कि तू उसमें व्यवस्था थोपना चाहता है अपनी। होना तो ये चाहिए कि जब व्यवस्थित मान लिया तो तू वहाँ से हट जा एकदम। क्योंकि उसकी ओर देखना भी पाप है तेरे लिए। उसकी ओर देखना भी पाप है। क्यों देखा तूने उधर? इसका मतलब तुझे विश्वास नहीं है उसकी व्यवस्था पर तो (इसलिए) देखता है तू। (और) बार-बार (उसको) छेड़ता है।

जैसे (नक्की) हो गया है कि सवेरे बारात आनेवाली है और रात को सारा हमने, सारी सामग्री व्यवस्थित कर ली। सारी कुर्सियाँ, सोफा-सेट और दुनियाभर का सब-सब set (व्यवस्थित) कर लिया। अब एक व्यक्ति कोई आता है (कि) नहीं ये कुर्सी यहाँ नहीं, यहाँ। ये कुर्सी यहाँ नहीं, यहाँ। ये सोफा यहाँ नहीं, यहाँ - तो वो तो व्यवस्था बिगाड़नेवाला है। अरे भई! हमने तो सब सोच समझकर पहले किया था। ये क्या करता है तू? तो उसको हटा दिया जाएगा वहाँ से (कि) छेड़ना मत बिल्कुल। ऐसा का ऐसा रहने देना।

तू तो छेड़खानी क्यों करता है उसकी? इसलिए उस सारे कक्ष को ही, पर्याय के कक्ष को ही तू उपेक्षित कर दे। और उपेक्षित किया (तो) तेरी पर्यायदृष्टि छूट जाएगी। इसलिए जो होना है सो होता है, यदि ये भी तूने माना है (तो) तेरी ये पर्याय दृष्टि छूट जाएगी। बल्कि और कहें इससे भी बड़ी बात? क्रमबद्धपर्याय की श्रद्धा ही छूट जाएगी। क्रमबद्धपर्याय की श्रद्धा करके और क्रमबद्ध पर्याय की श्रद्धा छूट जाएगी।

मुमुक्षु:- क्योंकि अक्रम स्वरूप से एकरूप हो जाता है।

पूज्य बाबूजी:- एकदम एकरूप हो गया न, क्रम से। तो अब पर्याय की थोड़े ही श्रद्धा रहेगी। क्रमबद्ध भी पर्याय है न! उसकी श्रद्धा छूट जाएगी पर्यायमात्र की। क्योंकि उधर क्यों देखेगा ये? उसमें अगर थोड़ी भी बुद्धि है, तो वो तो इतना सेट है, ऐसा सेटिंग है वो कि - तीन लोक (और) तीन काल में उसमें ज़रा भी तो फरक नहीं पड़ सकता है। तो ये उधर क्यों झाँकेगा? और क्यों जाएगा उधर?

बस! तो उससे विमुख हुआ कि यहाँ तो ठीक है। ये तो बिल्कुल सेट है मेरा कक्ष। पर्याय का कक्ष तो मेरा सेट है बिल्कुल, तो प्रसन्नता होती है। और प्रसन्न होकर वहाँ से विमुख हो जाता है कि बस! अब यहाँ तो कोई तीन लोक (और) तीन काल में कोई इसमें कुछ कर ही नहीं सकता। और मैं भी कुछ, (उसमें) मुझे भी कुछ करना नहीं है। बस! वहाँ से हटा और वो द्रव्य ही तो दिखता है फिर, और कौन दिखता है?

मुमुक्षु:- कोई जगह ही नहीं है दूसरी।

पूज्य बाबूजी:- कोई है ही नहीं बिल्कुल। ये उसका फल होता है। असल में तो फल तो हम समझते ही नहीं हैं। हम तो जो होना था सो हुआ। जो होना था तो (ऐसा कहकर) तू भीतर से तो रो रहा है और बाहर से ये बोल रहा है।

मुमुक्षु:- ये तो मनःपर्यय ज्ञान जैसी बात हो गई बाबूजी, आपके मन से। अद्भुत बात! अद्भुत बात! ये ही बाबूजी बात चल रही है।

पूज्य बाबूजी:- ये ही होता है।

मुमुक्षु:- ये ही होता है।

पूज्य बाबूजी:- अरे भाई! तेरा उनमें क्या है? होना था सो हुआ। उनमें क्या है? कि तेरे घर में हुआ, नोटों में हुआ, बंगले में हुआ, बंगले की दिवार गिरी। जो कुछ होना था सो हुआ। तेरा क्या हुआ इसमें? इसमें क्या होना-होना करता है तू? इसमें क्रमबद्ध पर्याय लगाता भी क्यों है तू?

मुमुक्षु:- सही बात है! ये तो उदय के खाते में (है)।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! तू तो अपनी जो पर्याय होती है, उसमें लगा (क्रमबद्ध)। हाँ! कि ये मेरी पर्याय सेट है एकदम, त्रैकालिक! बस! उसका सेटिंग जानकर वहाँ से हट जा। वहाँ क्या करेगा? कोई भी बुद्धिमान होगा तो वहाँ से हट जाएगा (कि) यहाँ कुछ होनेवाला ही नहीं है। फिर क्या है?

तीन लोक में किसी की शक्ति ही नहीं है और मुझे करना नहीं है। क्योंकि इससे तो मेरा घर जो है वो अव्यवस्थित दिखता है, अगर मैं पर्याय को इधर-उधर करूँ तो।

मुमुक्षु:- बहुत सुंदर!

पूज्य बाबूजी:- (ऐसा दिखता है) कि इसके घर में व्यवस्था नहीं है। तो मेरा तो घर व्यवस्थित है। इसलिए पर्याय का कक्ष इतना सुव्यवस्थित है कि वहाँ झाँकना ही नहीं है मुझे अब। और विश्व में झाँकूँगा ही नहीं - ऐसी शपथ लेता हूँ। ऐसी शपथ लेता हूँ कि झाकूँगा ही नहीं उधर।

मुमुक्षु:- प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, आलोचना सब हो गया?

पूज्य बाबूजी:- हो गया सब।

मुमुक्षु:- उसकी ओर झाँकूँगा भी नहीं।

पूज्य बाबूजी:- झाँकूँगा भी नहीं। क्यों झाँकूँगा? किसलिए झाँकूँगा? इसका अर्थ ये हुआ कि तुझे विश्वास नहीं है तेरी setting पर, तेरी व्यवस्था पर।

मुमुक्षु:- तो व्यवहार जाना हुआ प्रयोजनवान है, वो कहा है - तो पर्याय की ही बात कही है।

पूज्य बाबूजी:- हो गया न! ये सारी पर्याय व्यवहार हुई। जाना हुआ प्रयोजनवान का अर्थ ये है कि वो उसे जानता रहे - ये नहीं है। लेकिन जानने में कभी आ जाए तो, बस इतना। कभी जानने में आ जाए, अपने ज्ञान की क्रमबद्ध दशा में। ज्ञान की क्रमबद्ध दशा में कभी जानने में आ जाए तो वो जाना हुआ प्रयोजनवान (है)। बस इतना! और जो जाना हुआ प्रयोजनवान होता है, उधर ज्ञान जाए क्यों बार-बार? ये तो सिर्फ जानना ही है, कुछ करना (तो) नहीं है। तो उधर क्यों जाए ज्ञान? जाएगा भी क्यों? नहीं जाएगा। समझदार होगा ज्ञान तो नहीं जाएगा।

मुमुक्षु:- 73पर्याय की क्रमबद्धता निश्चित करके वो क्रमबद्ध से भी अलग हो जाता है।

पूज्य बाबूजी:- अलग हो जाता है। अलग हो जाता है, फिर नहीं करता है वो।

ये तो लोक के पदार्थों में लगा है। अब क्या है, क्या करें? अब तेरा बस नहीं चला तब तू कहने लगा और रोने लगा, तेरा बस नहीं चला जो। और नहीं तो बस चलता तब तो (कहता कि) कैसे हो सकता है ये? कैसे हो सकता है? - ऐसा। तो जब सारे प्रयत्न fail (अनुत्तीर्ण) हुए तब ये यहाँ आया (है)। पर आया क्या? आया ही नहीं वो तो, रो रहा है वो तो।

मुमुक्षु:- रो रहा है, रो रहा है। सचमुच रो रहा है। वो ही स्थिति है।

पूज्य बाबूजी:- दुःखी है वो तो, महादुःखी है भीतर से। क्रमबद्ध पर्याय का जो निर्णय है, वो तो सुख पैदा करता है एकदम। कि अरे! इतना बड़ा ये पर्याय समुदाय (और) इसमें मुझे कुछ करना नहीं। इतनी मेरी शान! इतनी मेरी व्यवस्था कि मुझे इसमें कुछ करना ही नहीं है।

73 पर्याय की क्रमबद्धता निश्चित करके वो क्रमबद्ध का से भी अलग हो जाता है? - 51.12 Mins वो तो topic ही बहुत बड़ा है कि एक पर्याय को दूसरी जगह रखे तो सारा तेरा द्रव्य ही नष्ट होता है। द्रव्य ही नष्ट होता है। वो तो बहुत बड़ा topic है ये तो, क्रमबद्ध पर्याय का।

मुमुक्षुः- बाबूजी! उसका संक्षिप्त में हो सकता है तो बाबूजी, थोड़ा बोलिये न। क्योंकि जो आप इतनी बड़ी बात करते हैं और हम इससे विमुख रह जायें ये, ये बाबूजी थोड़ा दुखता है। तो आप इसमें अपना limited time (सीमित समय) लगाएँ, जितना है बाबूजी प्रयोजनभूत बोलिये।

पूज्य बाबूजी:- पर्याय को इधर-उधर कर सकता है का अर्थ ये हुआ कि इसको पर्याय को इधर-उधर करने का अधिकार मिल गया। ठीक हो गया न? नहीं?

ये अपनी पर्याय को, क्योंकि ये स्वयं इसकी है पर्याय। इसलिए ये उस पर्याय को इधर-उधर कर सकता है, ऐसा इसको अधिकार है। ऐसा इसने माना तो फिर ये कौनसी पर्याय को लायेगा? और वर्तमान में पर्यायें जो चल रही हैं, वो (तो) चल ही रही हैं। लेकिन इसका मन संतुष्ट नहीं है कि मुझे तो ये दुख नहीं चाहिए और दीनता नहीं चाहिए। हीनता नहीं चाहिए, अज्ञानता नहीं चाहिए। तो फिर उसको क्या करना पड़ेगा? कि वो जितना पर्याय का रास्ता है, जहाँ ये चल रही हैं पर्यायें, उन सारी पर्यायों को तो वो हटाएगा क्योंकि उनको हटाने का अधिकार मिल गया न इसको। उलट-फेर करने का (अधिकार)! उनको तो हटाएगा और उनके स्थान पर अब कमी भी क्यों रखेगा? वो तो सिद्ध दशा (ही) लाएगा (फिर)। ठीक हो गया? अच्छा! अब जो पर्यायें हटायी हैं उनका क्या हुआ? वो तो आयेंगी तो सही न आगे-पीछे (कभी भी)? तो वो सिद्ध भगवान करेंगे मोह का अनुभव।

मुमुक्षुः- आहाहा! अद्भुत बाबूजी! अद्भुत! क्योंकि दुख की पर्याय..

पूज्य बाबूजी:- क्योंकि उसने हटा दिया था उस समय। और वो उसको (सुख की पर्याय को) ले आया था। लेकिन वो हटी हैं लेकिन आयेंगी तो सही (कभी न कभी)। वो नष्ट थोड़ी (ना) हो गई हैं। तो आयेंगी, तो वहाँ आयेंगी (उधर)। इसलिए भगवान सिद्ध होंगे मोही-रागी-द्वेषी।

मुमुक्षुः- आहाहा! कितनी सुंदर व्यवस्था! तो अपने हाथ से ही अपनी शान (को) तोड़े रखता है?

पूज्य बाबूजी:- है ही नहीं न! एक सुख का मार्ग है (और) एक अत्यंत दुख का मार्ग है। बहुत कष्ट का मार्ग है!

मुमुक्षुः- 74संपूर्ण द्रव्य कैसे नष्ट होता है इसमें?

पूज्य बाबूजी:- संपूर्ण द्रव्य तो नष्ट हो ही जाएगा जब वो पर्याय का प्रवाह टूट जाएगा। पर्याय का एक सुनिश्चित प्रवाह है और उस प्रवाह में से हमने एक पर्याय को निकाल दिया, तो वो टूटा कि नहीं वो प्रवाह? टूट गया! तो वो टूट गया तो वो द्रव्य टूट गया, खतम हो गया।

74 पर्याय की क्रमबद्धता न स्वीकारने में संपूर्ण द्रव्य कैसे नष्ट होता है? - 55.04 Mins तोड़े बिना नहीं हो सकता है, पर्याय को निकालना क्योंकि पर्याय तो set है बिल्कुल अपनी जगह। और उसका प्रवाह है सुनिश्चित, एक के बाद एक, एक के बाद एक, एक के बाद एक। ये जानता (है) कि पर्यायें इकट्ठी पड़ी हैं (तो) जो मेरी इच्छा हो, जो लाऊँ। उसका मानना ऐसा होता है। पर्यायें सब इकट्ठी पड़ी हैं। तो उनमें से मैं ढूँढ-ढूँढकर मेरी इच्छा हो जिसको लाऊँ। कि तू ला (तो) फिर बाकी का क्या होगा? जो विकारी हैं उनका (क्या होगा)? क्योंकि ऐसा थोड़े ही है कि तू कहेगा कि मैं सम्यग्दर्शन … ना ना! सम्यग्दर्शन से क्या होता है? मुनि बन जाओगे (तो) मुनि से भी क्या होगा? और अरिहंत जाओगे तो अरिहंत भी क्यों? सिद्धि ही बनो न (फिर), जब अधिकार मिल गया है (तो)। इसलिए सबको हटाओ फिर। तो सबको हटाओ, तो वहाँ पर सिद्धदशा में लाना उनको (उन पर्यायों को)। क्योंकि वहाँ रहेंगी वो तो साथ (में फिर)।

मुमुक्षु:- तो इसका मतलब तो ये अच्छा है कि अपने-आप में वो उत्पाद हो और व्यय होकर…

पूज्य बाबूजी:- होता है माने वही है। वस्तु-व्यवस्था है वो तो। अटल है, अचल वस्तु-व्यवस्था है (वो)। एक-एक पर्याय भी पार्वती है - पर्वत की पुत्री (जो) हट नहीं सकती (है) अपनी जगह से।

मुमुक्षु:- बराबर! बिल्कुल सही बात है। कोई भी हिला नहीं सकता (है)।

पर्यायें 75इतनी व्यवस्थित हैं तो फिर पुरुषार्थ की कहाँ जगह रही?

पूज्य बाबूजी:- हो गया न पुरुषार्थ! माने पर्याय को उलट-फेर करने का, इधर-उधर करने का जो पुरुषार्थ करता था, वो तो wastage (बर्बाद) होता था। अब इसने वो wastage तो छोड़ा और जहाँ वो सार्थक होता है, जिसके पास जाकर वो बिल्कुल निहाल होता है (जिससे) production (उत्पादन) होता है सुंदर, तो वो पुरुषार्थ ही तो हुआ वो। तो वो पुरुषार्थ ही तो हुआ। इधर-उधर करने को तो हम पुरुषार्थ मानें और इधर-उधर न करके, जैसा है वैसा करने को हम पुरुषार्थ न मानें तो ये तो हमारी गलती है न! भूल है। पुरुषार्थ पूर्वक ही हो रहा है सारा का सारा काम।

अरे! जैसे खिड़की से हमें टिकट लेना है तो एक तो पुरुषार्थ का अर्थ ये (है) कि सबको मारो, सबको हटाओ। और एक जो है चुपचाप खड़े रहो। तो अब ये समझता है कि चुपचाप खड़े रहना - ये कोई मेरा धर्म है क्या? कुछ करना चाहिए। तो वो पुरुषार्थ है या नहीं चुपचाप खड़े रहना? कितना धीरज है उसमें! कितना उद्यम है उसमें चुपचाप खड़े रहने में, उतना क्रम पार करने में। शांति रखना भी वो है न! माने अशांति में तो पुरुषार्थ है और शांति में पुरुषार्थ नहीं है। ये कैसे हो सकता है? Production (उत्पादन) तो दोनों है न? तो वो दोनों पुरुषार्थ से ही होते हैं production (उत्पादन) तो।

75 पर्यायें इतनी व्यवस्थित हैं तो फिर पुरुषार्थ की कहाँ जगह रही? पुरुषार्थ की जगह कहाँ रही? - 57.13 Mins मुमुक्षुः- स्थिरता का भी पुरुषार्थ होता है कि नहीं?

पूज्य बाबूजीः- स्थिरता का पुरुषार्थ है न! किसी को कह दिया जाए कि यहीं खड़े रहना तो उसमें पुरुषार्थ नहीं है क्या?

मुमुक्षुः- सबसे बड़ा पुरुषार्थ तो वहाँ ही है।

पूज्य बाबूजीः- बहुत बड़ा पुरुषार्थ है।

मुमुक्षुः- क्रमबद्ध का स्वीकार वो ही बहुत बड़ा पुरुषार्थ है।

पूज्य बाबूजीः- क्रमबद्ध का स्वीकार बहुत-बहुत बहुमूल्य है बात।

मुमुक्षुः- बहुमूल्य बात है!

बाबूजी! आपने तो एक ही पासा (पड़खा) लिया कि स्वतंत्रता दे दी है (पर्याय को पलटने की)। अभी (यदि) ये स्वतंत्रता नहीं दी (जाये) तो इसकी बात करें अभी। आपने तो बोला कि मान लो वो तो हमने assumption किया कि उसको स्वतंत्रता दे दी। अभी चलो स्वतंत्र है - ये बात (तो) नक्की हो गई। अभी..

पूज्य बाबूजीः- स्वतंत्रता दे दी न! तो फिर अब हम उसे परतंत्र क्यों करना चाहते हैं (उसमें) झाँककर? या उसे छेड़कर? ये ही है न हमारी मनशा, परतंत्र करने की? वरना जो वो बिल्कुल स्वतंत्र और व्यवस्थित है तो फिर हम उसकी ओर देखकर (या) झाँककर बार-बार उसकी ओर निगाह करके हम उसे परतंत्र ही तो करना चाहता हैं… कि ये नहीं ये, ये हमारा मन है। और वो हो नहीं सकेगा (तो) इसलिए कष्ट पाएगा।

ये ही कष्ट रहा पर्याय में उलट-फेर करने का ही, जितना कष्ट रहा वो। अब वो हो नहीं सकती। ये मानता है कि पर्याय मेरी है तो कैसे नहीं होगी? वो तेरी है, तो तेरी शान इसमें है कि वो व्यवस्थित हो। इसमें है घर की शान तो। ऐसा नहीं है कि इसको उठाकर वहाँ रखो और इसको उठाकर वहाँ रखो। वो तो पागलपन है वो तो। Setting होना चाहिए न घर का भी, तब सुंदर लगता है वो। और फिर इसे तो फुरसत मिलेगी ही नहीं कभी (यदि) उस एक पर्याय में (उलट-फेर) करना शुरू किया (तो) ये पर्यायें तो अनंतानंत हैं। तो अनंतानंत काल तक फँस गया ये पूरी तरह से।

मुमुक्षुः- माने कि सही बात तो ये है कि पर्याय को उसके हाल पर छोड़ दो।

पूज्य बाबूजीः- हाँ बिल्कुल! पर्याय कक्ष जो है मेरा… मेरे कई कक्ष हैं। एक द्रव्य कक्ष है, एक गुण कक्ष है (और) एक पर्याय कक्ष है। तो पर्याय कक्ष को बिल्कुल, वो व्यवस्थित है एकदम। उसके किवाड़ (दरवाज़े) ही बंद कर दो।

मुमुक्षुः- चिंता करने की जरूरत नहीं है।

पूज्य बाबूजीः- चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उसमें कुछ होना ही नहीं है।

मुमुक्षुः- अब गुणों की बात।

पूज्य बाबूजी:- गुण भी वैसे ही हैं। गुणों में तो कोई बात ही नहीं है। उनमें कहाँ उलट-फेर होता है?

मुमुक्षु:- 76बाबूजी! क्रमबद्ध के स्वीकार में द्रव्यदृष्टि आ गई?

पूज्य बाबूजी:- आई, ये आई न! इसी से आती है। ये ही आती है।

मुमुक्षु:- जो पर्याय को बार-बार देखता है, उसको फेर करने की दृष्टि बनी रहेगी?

पूज्य बाबूजी:- हाँ! दृष्टि तो है ही उसको, मिथ्यादृष्टि है। मिथ्या प्रयास है उसका वो कि पर्याय को बार-बार देखता है, उसका वो प्रयास मिथ्या है। क्योंकि वो उसको इधर-उधर करना चाहता है। अपने स्थान से हिलाना चाहता है (और) वो अपने स्थान से हिलती नहीं है। अपने स्थान से नहीं हिलती है। ये आत्मा का जो सदन है, घर है, आत्मा का जो राजमहल है उसकी शान है ये। ये उसकी शान है ये, सचमुच। द्रव्य की शान ये है कि मेरी पर्याय ऐसी व्यवस्थित है कि उसमें कुछ होना ही नहीं (है) कभी, तीन लोक (और) तीन काल में। अब हम मानते हैं कि उसे दीनता कि (फिर तो) पुरुषार्थ नहीं रहेगा, पुरुषार्थ नहीं रहेगा। निहाल हो जाएगा वो, तुरंत आनंद को लेकर उत्पन्न होगा पुरुषार्थ।

मुमुक्षु:- सही बात है! माने जहाँ पर्याय की दृष्टि छूटी तो सही प्रकार से आनंद …

पूज्य बाबूजी:- एक ही वस्तु बची है, बस। उसी वस्तु में तन्मय हो जाएगा तो आनंद का जन्म होगा क्योंकि उसके भीतर आनंद ही आनंद है। पर्याय में तो ये था ही नहीं। वो तो मैली-कुचैली न मालूम कैसी-कैसी आ रही थी। तो उससे क्या मिलने वाला था?

मुमुक्षु:- पर बाबूजी पर्यायदृष्टि के छूटने के बाद गुण-भेद के ऊपर भी तो दृष्टि जा सकती है?

पूज्य बाबूजी:- जा सकती है तो उसको भी छोड़ देगा। क्योंकि उसे मिला कहाँ उसे? उसका जो इष्ट था उसकी उपलब्धि नहीं हुई, तो वो उसको छोड़ देगा। इसमें इन गुणों को गिना थोड़े ही जाता है। गुणों को तो चूसा जाता आम की तरह, आम की तरह चूसा जाता उसे।

और वो इकट्ठे कैसे हों सारे के सारे? कि वो एक द्रव्य को मैं देखूँ तो सब इकट्ठे हो जाते हैं। सब इकट्ठे पड़े हैं उसमें। और मैं अलग-अलग देखूँगा तो एक भी नहीं आएगा। खाली विकल्प का धुआँ होकर रह जाएगा।

मुमुक्षु:- आहाहा! विकल्पों का धुआँ बनकर रह जाएगा।

पूज्य बाबूजी:- आत्मा का अनुभव करने की पद्धति ये है। कहाँ उसके टुकड़े करो? जो अखंड है, उसको अखंड अनुभव करो। बस! उसमें मिल जाएगा। टुकड़ों में क्या मिलता है? इसलिए गुण-भेद के भी विकल्प नहीं (हैं) और पर्याय के भी नहीं (हैं)। दोनों छूट जाते हैं।

76 क्रमबद्ध के स्वीकार में में द्रव्यदृष्टि आ गई? - 1.01.44 Hours
मुमुक्षुः- 77बद्ध क्यों कहा बद्ध? क्रमबद्ध?

पूज्य बाबूजी:- क्रम-नियत शब्द है शास्त्र का (और) उसका जो हिन्दी है वो बद्ध है। बद्ध का अर्थ ये कि वो बंधी हुई। बंधे हुए क्रम में चलती है। बंधा हुआ क्रम माने जिस समय होना है उस समय (होती है)।

मुमुक्षुः- जुड़ी हुई नहीं?

पूज्य बाबूजी:- क्रमबद्ध माने बद्ध-क्रम (अर्थात्) क्रम नियत - ये शास्त्र का शब्द है। क्रमबद्ध जो है अपना, उसका अर्थ (ये) है (कि) बद्ध-क्रम में चलती है पर्याय, बंधे हुए क्रम में। एक के बाद एक चलती है, वो तो क्रम हुआ खाली। लेकिन बद्ध-क्रम वो होता है कि वो उसमें फरक (भी) नहीं पड़ता है। जो आनेवाली है वो ही आएगी, दूसरी नहीं आ सकती।

मुमुक्षुः- क्रमसर तो आती है, पर…

पूज्य बाबूजी:- ये तो सब दुनिया मानती है कि पर्याय में कहाँ फर्क पड़ा? अगर हमने इधर-उधर भी की तो भी पर्याय के बाद पर्याय ही तो आई। उसमें क्या फर्क पड़ा? लेकिन बद्ध-क्रम है उसका।

मुमुक्षुः- जो आनेवाली है।

पूज्य बाबूजी:- जो आनेवाली है।

मुमुक्षुः- कितना सुव्यवस्थित है!

पूज्य बाबूजी:- बहुत व्यवस्थित है। बहुत व्यवस्थित और हर चीज में से वो ही वो ही शुद्धात्मानुभूति (ही) निकलती है। हर चीज (में) हर सिद्धांत में से वही निकलती है।

मुमुक्षुः- तो इसका मतलब तो ये हुआ कि क्रमबद्ध को नहीं माने तो कर्म से बद्ध हो जावे।

पूज्य बाबूजी:- ये बिल्कुल अपराध करता है न! अपराध करता है न कि जो अपनी जगह सुव्यवस्थित है, ये उसको जाकर और disturb करता है। तो कितना बड़ा अपराध हुआ? बहुत बड़ा अपराध हुआ न ये? एक officer का बंगला हो और वहाँ दो-चार आदमी जाकर जो हैं उसको table को भी उलट दें, कुर्सियाँ भी उलट दें (और) officer को भी पटक दें, तो क्या होगा उनका? आखिर कारावास ही तो होगा।

तो ये जो पर्याय का जो ये कक्ष है, कक्षा है पर्याय की, ये कमरा है, उसमें जो व्यवस्था है उस व्यवस्था को ये क्यों बिगाड़ता है? (और) वो बिगड़ेगी ही नहीं, तो अपराधी है इसलिए कर्म बंधते हैं।

मुमुक्षुः- बाबूजी! बहुत सुंदर! वो बिगड़ती नहीं (है) लेकिन बिगाड़ने की चेष्टा का बहुत बड़ा अपराध है न ये?

पूज्य बाबूजी:- चेष्टा ही है न ये, बिगड़ता थोड़े ही ना है।

77 बद्ध क्यों कहा बद्ध? क्रमबद्ध? - 1.04.46 Hours
मुमुक्षुः- बिगड़ने की चेष्टा का अपराध!

पूज्य बाबूजी:- हाँ! केवल चेष्टा! मिथ्यात्व में भी, मिथ्याज्ञान में भी (और) मिथ्याचारित्र में भी केवल चेष्टा (है)। उससे कोई काम होना नहीं है, उसके विषय से। चेष्टा का (अपराध) माने intention का (अपराध)।

मुमुक्षुः- सचमुच किया होता तो कितना भारी अपराध बनता!

पूज्य बाबूजी:- चेष्टा माने प्रयत्न करता है पर सफल नहीं होता (है) और नियत अच्छी नहीं है। नियत अच्छी नहीं (है)। Intention (नियत) खराब है।

मुमुक्षुः- वस्तु-व्यवस्था का अनादर का इतना दोष, अद्भुत!

पूज्य बाबूजी:- कोई बहुत बड़ी भीड़ हो। अब उसमें से पुरुष भी निकल रहे हैं, स्त्रियाँ भी निकल रही हैं और बहुत बड़ी भीड़ है। तो ऐसे ठसाठस निकल रहे हैं, एक दूसरे को छूकर। वहाँ कौन किसी को दोष देता है? कोई दोष नहीं देता कि ये है ही ऐसी, व्यवस्था ही ऐसी है। क्योंकि नियत (खराब) नहीं है। उसमें तो ये है कि मुझे निकलना है बस। नियत खराब नहीं है। और ऐसा ही वो किसी दूसरे समय पर कर ले (कि) जहाँ पर खुला सा हो मैदान और खुला सा बाजार हो, तो वहाँ चप्पल पड़ जाएगी।

मुमुक्षुः- सही बात है! Intentions (नियत) खराब है। Intentions are bad - बहुत बुद्धिगम्य है।

पूज्य बाबूजी:- एक तो कोई बदनियत पुरुष हाथ लगाता है स्त्री को और एक डॉक्टर पूरा का पूरा investigation (निरीक्षण) करता है। कौन है अपराधी? और डॉक्टर पूरा investigation करता है सारा के सारा, फिर भी निर-अपराध है।

मुमुक्षुः- पर्याय की व्यवस्था को बदलने की नियत खराब है।

पूज्य बाबूजी:- नियत खराब है। नियत खराब है क्योंकि वो होती नहीं है। होती नहीं है (तो) इसे करना नहीं चाहिए। ये स्वयं अपनी व्यवस्था बिगाड़ता है। अपने घर की व्यवस्था बिगाड़ता है न, इसलिए अपराधी है ये। सारे जीव लोक की (व्यवस्था को) बिगाड़ना चाहता है।

मुमुक्षुः- जो खुद का बिगाड़ेगा वो तो पूरे जीव-लोक का बिगाड़ेगा।

पूज्य बाबूजी:- सबको ही ऐसा मानेगा न वो।

मुमुक्षुः- एक छोटी सी दिखनेवाली गलती के पीछे तो कितनी गलतियों की बौछार लगी हुई है। मालूम नहीं पड़ता।

पूज्य बाबूजी:- अपराध के पीछे अपराध होता है।

मुमुक्षुः- अपनी पर्याय को फेर-बदलना चाहा, तो पूरे विश्व की व्यवस्था…

पूज्य बाबूजी:- मानता है न? पूरे विश्व को मानता है। सब जड़-चेतन सबको कर दिया वो तो, पराधीन… मुमुक्षुः- महासिद्धांत है ये बाबूजी।

पूज्य बाबूजी:- महासिद्धांत! महासिद्धांत ही हैं ये सब। जैनदर्शन में महासिद्धांत ही हैं सारे ही। एक-एक सिद्धांत महान है, कोई छू नहीं सका उनको।

मुमुक्षुः- एक-एक में से अनुभूति ही निकलती है।

पूज्य बाबूजी:- कोई विचार ही नहीं कर सकता। उसमें क्या है अपनी पर्याय है, कैसे भी करो। बस हो गया। उसमें पर्याय में क्या दिक्कत है? कैसी भी लाओ, कैसी भी ले जाओ, कहीं रखो। तुम्हारी इच्छा हो जिसे आने दो, तुम्हारी इच्छा नहीं हो तो मत आने दो। सीधी सी बात!

सबको समझ में बैठ जाती है कि हाँ! बात तो ठीक है कि जब अपनी है तो फिर क्या है? अपनी है, अपनी व्यवस्था है घर में। फिर भी कोई बच्चा है, वो उसको अगर गड़बड़ करता है तो उसको चपत पड़ती है (कि) क्या करता है ये? क्यों बिगाड़ता है? व्यवस्था को बिगाड़ना है ये तो। उधर झाँकना ही व्यवस्था खराब करता है।

मुमुक्षुः- आहाहा! उधर झाँकना ही।

पूज्य बाबूजी:- झाँकना ही व्यवस्था खराब करता है। तुमने देखा क्यों आखिर? किसके लिए देखा?

परम उपकारी श्री सद्गुरुदेव की जय हो!
जिनवाणी माता की जय हो!

जिनवाणी-स्तुति

आत्मज्ञान में ही आत्मा की सिद्धि और प्रसिद्धि है।
आत्मज्ञान में ही भिन्नरूप विश्व की भी सिद्धि है ॥
आत्मज्ञान ही बस ज्ञान है आत्मज्ञान ही बस ज्ञेय है।
आत्मज्ञानमय ज्ञाता ही आत्मा ज्ञान-ज्ञेय अभेद है॥
दर्शाय सरस्वती देवीने किया परम उपकार है।
निजभाव में ही थिर रहूँ, माँ वंदना अविकार है॥
जिनवाणी के ज्ञान से सूझे लोकालोक।
सो वाणी मस्तक नमूँ, सदा देत हूँ ढोक॥

तत्त्वचर्चा 21 (14 फ़रवरी 1999)

पूज्य बाबूजी जुगल किशोर जी युगल, कोटा
तत्त्व-चर्चा नंबर २१, तारीख १४-२-१९९९
श्री शांतिभाई ज़वेरी निवास स्थान - नीलांबर, मुंबई

मुमुक्षु:- 78प्रश्न का थोड़ा सा निराकरण बाकी है वो ले लेते हैं। कल एक प्रश्न आया था, उसके अनुसंधान में (ही है कि) त्रिकाली ध्रुव तो अकार्यकारणत्व का धारक (कहा) है। तो फिर श्रद्धा और ज्ञान की परिपूर्णता का असली कारण कौन है? यानि श्रद्धा की पर्याय और ज्ञान की पर्याय का असली कारण, परिपूर्णता का कारण कौन है? तो कुछ जो प्रश्न का उत्तर दिया गया था उससे ज्यादा स्पष्टीकरण हो जाए कि असली कारण कौन है? जैसे उपादान से तो बता दिया और उपचार से तो कारण परमात्मा बताया था। फिर भी थोड़ा सा…

पूज्य बाबूजी:- पर्याय का असली कारण तो पर्याय ही होती है। शुद्धात्माभिमुख जो पर्याय है वो असली कारण है (अर्थात्) उपादानकारण है। उसी के षट्कारकों से शुद्धात्मानुभूति होती है। असली कारण तो ये ही है।

मुमुक्षु:- तो इसमें कारणशुद्धपर्याय का क्या कार्य होता है?

पूज्य बाबूजी:- कारणशुद्धपर्याय का काम नहीं है इसमें, (लेकिन) वो तो साथ ही चलती है। जो शुद्धात्मा है वो उसके साथ चलती है। इसमें नहीं है। शुद्धात्मानुभूति में कारणशुद्धपर्याय नहीं है। कारणशुद्धपर्याय कोई नयी पैदा नहीं होती (है), पर कारणशुद्धपर्याय तो द्रव्यस्वरूप ही है। द्रव्य का स्वरुप ही है। यानि द्रव्य का जो प्रतिसमय एकरूप रहनेवाला जो वर्तमान है, एकरूप रहनेवाला… द्रव्य तो त्रैकालिक है। है न! भूत-भविष्य-वर्तमान सबको एकदम अपने में समेटे बैठा है (वो) और एकरूप रहता है।

तो वो द्रव्य की जो वर्तमानकालिक एकरूपता है, उसको कारणपर्याय कहते हैं। माने त्रैकालिक का तात्कालिक, उसका नाम कारण(शुद्ध)पर्याय है। और द्रव्य कैसा है? कि कैसा है? जैसे आत्मानुभूति का अवसर हो, तो उस समय क्या विचार किया जायेगा कि कौनसे द्रव्य का अनुभव करूँ? कल वाले का करूँ? या आगे आने वाले कल का करूँ? या वर्तमान का करूँ? कौनसे द्रव्य का करूँ? कि कुछ नहीं! ये वर्तमान में जो है इसका करो। तो वो वर्तमान में जो कारणपर्याय है, कारणपर्याय सहित ही जो द्रव्य है उसकी अनुभूति होती है।

मुमुक्षु:- माने प्रश्नकार का ये प्रश्न था कि उपादान से तो पर्याय का कारण पर्याय मानी गई और उपचार से जो कारणशुद्ध परमात्मा कहा गया? - वो उपचार है। तो क्या कारण परमात्मा के

78 कारणशुद्धपर्याय की चर्चा। - 0.15 Mins बजाय कारणशुद्धपर्याय भी कारण बनती है, जो कार्यरूप से श्रद्धा-ज्ञान की पर्याय परिपूर्ण हुई है तब?

पूज्य बाबूजी:- कारण परमात्मा भी कहने की बात है न! उपचार है न! तो कारणशुद्धपर्याय भी उपचार ही हो गई। वो सहित द्रव्य जो है वो उसकी अनुभूति होती है। कारणशुद्धपर्याय सहित जो शुद्धात्मा है उसकी अनुभूति होती है, अनुभव की दशा में। तो जैसे वो द्रव्य कारण बना उपचार से, उसी तरह ये भी कारण बनती है, उपचार से। क्योंकि ये उत्पाद-व्ययवाली नहीं है पर्याय। पर्याय कहने से ऐसा नहीं समझना चाहिए कि उसमें परिणमन हो ही हो। पर्याय असल में भेद को कहते हैं।

जैसे गुणों का विचार जब किया जाता है, तो वो पर्यायार्थिकनय से होता है। और गुणों को द्रव्य के साथ लेकर जब विचार किया जाता तो वो द्रव्यार्थिकनय से होता है। वो निश्चयनय से, शुद्धनय से होता है।

मुमुक्षु:- ये प्रभु क्या बताया?

पूज्य बाबूजी:- गुणों का विचार जब किया जाता है आत्मा की महिमा बढ़ाने के लिए, तो वो पर्यायार्थिकनय से होता है। क्योंकि भेद कहते हैं न उस अंश (को), अंश पर हम विचार कर रहे हैं। तो वो जो है पर्यायार्थिकनय का विषय होता है। गुण पर्यायार्थिकनय के विषय कैसे होते हैं? और द्रव्यार्थिक के कैसे हो जाते हैं? तो क्योंकि द्रव्य जो है वो सारे ही गुणों को समेटे बैठा है अपने में। इसलिए जब अनंत गुणों को द्रव्य के साथ लेकर अनुभव किया जाता है, तो वो द्रव्यार्थिकनय का शुद्धनय का विषय होता है। आया (है) न ७वीं गाथा में, आया न! परमार्थ से देखा जाए तो अनेक पर्यायों को एक द्रव्य पी जाता है। ऐसा आया न ७वीं (गाथा) में! तो अनेक पर्याय माने?

मुमुक्षु:- गुण-भेद!

पूज्य बाबूजी:- अनेक पर्याय माने गुण। गुण-भेद नहीं गुण। अनेक गुणों को द्रव्य पी जाता है। इसलिए फिर आगे कहा कि किंचिन्मिलितास्वादम (समयसार आत्मख्याति टीका गाथा ७) किंचित् मिला हुआ स्वाद अनुभव में आता है।

मुमुक्षु:- वाह! वाह!

पूज्य बाबूजी:- उसका अर्थ ये कि गुण और द्रव्य अथवा गुण और पर्याय - ये दोनों मिलकर एक भी नहीं हो जाते और सर्वथा अलग-अलग भी नहीं रहते। अनंत गुणात्मक जो द्रव्य है, वो और पर्याय, अनुभव करनेवाली (पर्याय) और उससे उत्पन्न होनेवाला आनंद - ये सर्वथा अलग-अलग भी नहीं होते और सर्वथा एक भी नहीं हो जाते। इसलिए किंचिन्मिलितास्वादम (समयसार आत्मख्याति टीका गाथा ७) किंचित् मिला हुआ स्वाद! माने सारे गुणों का स्वाद तो न्यारा-न्यारा है जो उनकी पर्याय में आता है। पर्याय में जो परिणमन होता है, उनकी योग्यता के अनुसार जितनी शुद्धि होती है तो उतना उसमें आता है। तो वो जो है (वो) है तो अलग-अलग हर एक गुण का। तो इस दृष्टि से तो वो बिना मिला हुआ (है) क्योंकि हर एक गुण का न्यारा-न्यारा पर्याय का स्वाद हुआ, शुद्ध पर्याय का। और सब गुणों की पर्याय का एकरुप होकर एक बार में अनुभव होता है। वो हुआ किंचिन्मिलितास्वादम किंचित् मिले हुए स्वादवाला। इसलिए किंचित् शब्द दिया आचार्य ने कि पर्यायें रहती हैं न्यारी-न्यारी। तो न्यारी-न्यारी होने पर भी जो अनुभूति है, उसकी गरिमा है ये, उसकी विशेषता है कि वो सबका निचोड़ यूँ… जैसे ठंडाई को पीते हैं निचोड़कर, इस तरह से वो पी जाती है। तब आनंद प्रगट होता है। अगर अलग-अलग अनुभव करे तो आनंद प्रगट नहीं होता।

इसलिए पर्याय में ही, पर्याय का उपादान ही कारण है सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान का। लेकिन मुख्यता क्या है कि तीनलोक में जितने पदार्थ हैं और जितने अन्यभाव हैं, रागादिक-द्वेषादिक, पुण्य-पाप इत्यादिक, इनमें से कोई भी शुद्धात्मा की अनुभूति के लिए काम का नहीं है। ये बताने के लिए (कहा)। तो कौन है (कारण)? कोई कारण नहीं है। इनमें से कोई भी कारण नहीं है। तो कौन है कारण? कि जो बचा हुआ है ज्ञायक चिन्मात्र, वो ही कारण है - ये कहा जाता है। इसलिए उसे कारण परमात्मा कहा।

वैसे न्याय की दृष्टि से देखा जाए तो अगर कारण कहा जाए तो वहाँ कार्य की उत्पत्ति होना (ही) चाहिए। उसकी परिभाषा ये है कि पूर्वक्षणवर्तित्वं कारण लक्षणम् और उत्तरक्षणवर्तित्वं कार्य लक्षणम्। जो पूर्व क्षण में रहता है वो कारण है और जो उत्तर क्षण में होता है वो कार्य है। लेकिन यहाँ ऐसी नहीं है विवक्षा। यहाँ तो तीन लोक, तीन काल में एकमात्र शुद्ध ज्ञायक के अवलंबन से ही सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान आत्मानुभूति होती है। इसलिए ये बताने के लिए कि सारे विश्व में कौन है कारण? तो एकमात्र ज्ञायक ही कारण है, इसलिए कहा गया। पर वो कारण नहीं वास्तव में, क्योंकि कारण अगर बन जाएगा तो वो क्षणिक हो जाएगा। क्योंकि कारण बदलता रहता है।

जैसे पहली पर्यायवाला जो द्रव्य है वो कारण, तो उत्तर पर्यायवाला जो द्रव्य है वो कार्य। फिर उत्तर पर्यायवाला द्रव्य कारण (है) और उसके आगे आनेवाली पर्यायवाला द्रव्य जो है (वो) कार्य है। इस तरह अनंतर पूर्व क्षणवर्ती पर्याय विशिष्ट द्रव्य, वो कारण (है) और अनंतर उत्तर क्षणवर्ती द्रव्य वो कार्य (है) - ऐसा होता है। ये है असली परिभाषा कारण-कार्य की। और इससे भी आगे चलें तो पर्याय का कारण पर्याय ही है। बस!

उसको तो ये बताने के लिए (कहा) कि तीन लोक में जो अनंत हैं, अनंत-अनंतानंत वस्तुयें जो हैं, इनमें से सम्यग्दर्शन और स्वसंवेदन ज्ञान शुद्ध, आत्मानुभूति ये किसके अवलंबन से प्रगट होगी? तो ये एकमात्र चिन्मात्र ज्ञायक के अवलंबन से प्रगट होगी इसलिए वही कारण है। तो अब अन्यत्र जाना छूट गया न सब जगह! अपनी पर्यायों का भी अवलंबन और जगत का (भी) अवलंबन वो छूट गया न? ये ही है एकमात्र अवलंबन लेने लायक, आश्रय करने लायक, अनुभव करने लायक - इस तरह समझना चाहिए।

मुमुक्षु:- तो बाबूजी! इसमें कारणशुद्धपर्याय का क्या प्रयोजन हुआ? कारणशुद्धपर्याय का प्रयोजन क्या हुआ?

पूज्य बाबूजी:- ये हुआ न (कि) उसमें उलझन नहीं रही (कि) कौनसे द्रव्य का अनुभव करूँ, कल वाले का कि आज वाले का? या (आने वाले) कल वाले का? वो त्रैकालिक है न! इसलिए सीधा ये जो विद्यमान है न, इसका (अवलंबन) करो।

मुमुक्षु:- वो कारणशुद्धपर्याय (है)?

पूज्य बाबूजी:- वो कारणशुद्धपर्याय (है), कारणशुद्धपर्यायवाला द्रव्य। केवल कारणशुद्धपर्याय की नहीं होती है अनुभूति। कारणशुद्धपर्यायमय द्रव्य, उसकी अनुभूति होती है।

मुमुक्षु:- तो साहब! कारणशुद्धपर्याय पर्याय नहीं है, तो पर्यायमय द्रव्य उसका अर्थ क्या?

पूज्य बाबूजी:- पर्यायमय माने कारणशुद्धपर्यायमय। कारणशुद्धपर्याय की वार्ता चलती है न? कारणशुद्धपर्यायमय जो द्रव्य है उसकी अनुभूति होती है।

मुमुक्षु:- कारणशुद्धपर्याय स्वयं ही द्रव्य है, तो फिर उसमय द्रव्य क्यों कहा?

पूज्य बाबूजी:- उसमय कहा जाएगा न ये तो। उसमय कहा जाएगा, जब दो भेद हमने किए तो उसमय (ही) तो कहा जाएगा।

मुमुक्षु:- वर्तमानमय त्रैकालिक?

पूज्य बाबूजी:- वर्तमानमय त्रैकालिक।

मुमुक्षु:- त्रिकाली में वर्तमान तो आ ही जाता है। त्रिकाल में वर्तमान तो है ही है। तो (उसको) त्रिकाली बोला जाता है - ऐसा?

पूज्य बाबूजी:- त्रिकाल में वर्तमान आया न! पर वर्तमान में वो भी तो आए भूत और भविष्य भी। इसलिए वो विकल्प टूट जाता है उसका और केवल ये जो विद्यमान है, बस इसका अनुभव करता है। उसमें काल संबंधी विकल्प टूट जाते हैं।

मुमुक्षु:- ये जो वर्तमान है वो त्रिकाली से अलग नहीं है।

पूज्य बाबूजी:- अलग नहीं है। त्रैकालिक से अलग नहीं है वो।

मुमुक्षु:- ⁷⁹एक प्रश्न है कि आत्मदर्शन होने के पहले आत्मार्थी का व्यवहार कैसा होता है? (अथवा) कैसा होना चाहिए?

पूज्य बाबूजी:- आत्मदर्शन होने के पहले (का व्यवहार) - ये गतियों की अपेक्षा न्यारा- न्यारा है। क्योंकि सब गतियों में एक से साधन नहीं मिलते। लेकिन उसमें मुख्य जो है वो आत्मा की वो विशुद्धि कि जिस विशुद्धि तक पहुँचकर शुद्धात्मा का पुरुषार्थ किया जा सकता है, अलग

79 आत्मदर्शन होने के पहले आत्मार्थी का व्यवहार कैसा होता है? - 13.43 Mins से। विशुद्धि तो वहाँ रहे। विशुद्धि तो वहाँ रहे माने अस्तित्वरूप रहे। और उस विशुद्धि से हटकर, वहाँ से उपयोग को हटाकर और शुद्धात्मा के अभिमुख होकर, उसके स्वरुप के अभिमुख होकर उसका चिंतन करे और फिर उसका अनुभव करे। तो वो विशुद्धि कारण होती है। उस विशुद्धि को कारण कहा जाता है। है वो बाधक लेकिन साधक कहा जाता है। है वास्तव में बाधक क्योंकि विपरीत है पर्याय।

विशुद्धि माने दो अर्थ में आता है। एक तो शुद्धि के अर्थ में आता है और एक विशुद्धि जो है वो शुभभाव के अर्थ में आता है। यहाँ शुभभाव से तात्पर्य है कि शुभभाव जो है, वो किस प्रकार का होना चाहिए। लोक में जो अनेक प्रकार के शुभभाव होते हैं। होते है न बहुत से - जैसे अपात्रों को खाना खिलाना, गायों को घास डालना या जानवरों को चारा डालना, धर्मशालायें बनाना इत्यादि। और कोई संस्थायें खोलना ये (भी) उसमें शामिल नहीं है। ये तो सभी करते हैं, सारी दुनिया ही करती है ये तो। इसलिए विशेष प्रकार की विशुद्धि (चाहिए)। भले वो विशुद्धि ज्यादा हो सकती है, दूसरे लोगों की; उससे नहीं है मतलब। लेकिन एक विशेष प्रकार की विशुद्धि (होनी चाहिए) कि जिसके होने पर शुद्धात्मा का पुरुषार्थ किया जा सके। वो होती है।

जैसे भोजन बनाते हैं न अपन। तो stove (चूल्हा) होता है। तो stove की दो गति होती हैं या तीन गति मान लो। एक तो ऐसी कि बहुत तेज, एक ऐसी कि बहुत धीमी और एक ऐसी कि मध्यम। तो मध्यम जो उसका ताप है, उसमें हम भोजन बना सकेंगे। बहुत तेज में बनायेंगे तो जल जाएगा। बहुत कम में बनायेंगे तो कच्चा रह जाएगा। इसलिए मध्यम जो ताप है उसमें (भोजन) बनेगा।

इसी प्रकार विशुद्धियाँ तो अनेक प्रकार की औरों को भी होती हैं। और माने जैनेतर जो दूसरे हैं, उनको भी होती है। पर वो विशुद्धि भी इधर बिल्कुल शामिल नहीं है। इसलिए यहाँ का जो व्यवहार है, वो भी विशेष प्रकार का होता है। वो नैतिकता नहीं! नैतिकता जैसे जगत में कोई आदमी जो है, वो हिंसा तो करता है लेकिन झूठ नहीं बोलता; इत्यादि, इत्यादि। इस तरह के पंगु व्यवहार होते हैं। और कैसे भी हों, वो उनके… जैसे अगर वो उपवास करते हैं और रात में खाते हैं तो वो व्यवहार नहीं माने। यद्यपि होता है और वो भी वहाँ बारहवें स्वर्ग तक जाते हैं। वो भी बारहवें स्वर्ग तक जाते हैं लेकिन वो व्यवहार बिल्कुल नहीं (है)। यहाँ तो व्यवहार है शुद्ध, जो भगवान जिनेन्द्र की भक्तिपूर्वक और जो अन्य प्रकार का व्यवहार उत्पन्न होता है आत्मा में। एक तो भक्ति वो भी व्यवहार (है) और एक अन्य प्रकार का (है) जो लौकिक व्यवहार होता है अन्य प्रकार का, जैसे अनुकंपा, दया का परिणाम (आदि)। तो दया का परिणाम कैसा होता है? और लोगों को तो ऐसा होता है कि भाई! ये ठीक हो जाए। मैं इसको ठीक करता हूँ। मैं इसको ठीक कर सकता हूँ, इसलिये मुझे इसकी सेवा करना चाहिये। इस तरह का व्यवहार अथवा उसको जो है वो भोजन दे देना, दवाई दे देना इस तरह का।

यहाँ तो व्यवहार ऐसा होता है कि वो जो अनुकंपा होती है, उसमें उसको ज्ञानी को ये विचार आता है कि ये भवार्णवों (भव के दुखों) से कैसे छूटे? बस! ऐसा जानकर उसके प्रति जो दया का भाव हो और उसमें फिर (साथ-साथ उस रूप) शारीरिक क्रिया भी हो जाए। तो वो इस तरह की अनुकंपा होती है। माने यहाँ सभी विशेष प्रकार के ही हैं, जैनदर्शन में। जितने भी अन्य प्रकार के और विशुद्ध भाव कहे जाते हैं, वो भी यहाँ पर विशेष प्रकार के हैं सारे के सारे।

अकलुष भाव माने - जिसमें हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील परिग्रह इत्यादि का परिणाम न हो। उस समय नहीं होता है। माने जिस समय वो विशुद्धि (हो उस) में वो नहीं होता है। और होता तो है, अपन सब लोगों को पापभाव तो होता है। लेकिन जिस समय वो विशुद्धि हो तो उस विशुद्धि में वो पापभाव नहीं होता, निमित्त नहीं बनता है। और सत्य को तुरंत स्वीकार करे।

इधर अहिंसा का परिणाम इतना जबरदस्त कि किसी एक जीव की मेरे से हिंसा न हो। यद्यपि लोग इसको चारित्र में लेते हैं, लेकिन ये चारित्र नहीं है। ये तो व्यवहार-चारित्र कहलाता न? पर यहाँ व्यवहार-चारित्र भी नहीं है क्योंकि असली चारित्र का अभी जन्म ही नहीं हुआ। इसलिए व्यवहार भी नहीं बताया (है)। तो उसके पहले की भूमिका है ये तो। जैसे हम भोजन बनाते हैं, तो उसके पहले रसोई को साफ करते हैं। तो ये सफाई है एक तरह की।

मुमुक्षु:- बस! वो सफाई कैसे हो?

पूज्य बाबूजी:- वो सफाई है। भोजन बनाना नहीं है लेकिन ये सफाई है एक तरह की। इसलिए ऐसा परिणाम हो कि दया में भीगा रहे हमेशा। चित्त हमेशा दया में, अनुकंपा में भीगा रहे और वो इस रूप में कि ये जीव भवार्णव से कब छूटे - ये। और उसके लिए जो भी करना (हो), जो भी औषधि देना हो, वो (सब) सेवा भले ही उसकी हो। लेकिन भीतर से परिणाम ये हो कि ये कैसे छूट जाए हमेशा के लिए - इस तरह का। ऐसी दया का परिणाम!

तो और तो लोक व्यवहार के बारे में बहुत बातें हैं। जैसे व्यवसाय करता है, तो व्यवसाय में सत्यवादिता होनी चाहिए। झूठ-अझूठ बहुत अधिक न हो। अथवा ऐसा न हो कि जो राजकीय नियमों के विरुद्ध हो, जिसके कारण हमेशा tension (आकुलता) बनी रहे, हमेशा पापभाव बना रहे, भय बना रहे, चिंता बनी रहे। तो उस परिणाम में जो है वो, तत्त्व का सुनना (श्रवण) ही नहीं हो (पाये)गा। तत्त्व का सुनना (श्रवण) नहीं होगा। इसलिए उसमें बन नहीं सकता है। माने इतना विरुद्ध कार्य करे कि जिसमें हमेशा शंका बनी रहे कि कहीं मैं पकड़ा नहीं जाऊँ! कहीं जो है, वो मेरे ऊपर कोई मुसीबत न आ जाए, इत्यादि-इत्यादि।

दया का परिणाम ऐसा हो कि जैसे घर में कोई बीमार है परिवार में। आजकल तो क्या है, प्रचलन क्या है आज (कि) घर में तो भले ही कोई पिता मर रहा हो तो मरे, लेकिन वो hospital (अस्पताल) में (दूसरों की) सेवा करने जाएगा। वो अपनी सेवा दिखाने के लिए hospital (अस्पताल) जाएगा। लेकिन तत्त्वज्ञानी को या जो तत्त्वज्ञान के मार्ग पर है उसको ऐसा नहीं होता है। उसको तो पहले घर में अगर उसको ये दया नहीं है तो उसको (कहीं और) दया हो ही नहीं सकती (है)।

जैसे उदाहरण के लिए अपना जो परिवार है, पारिवारिक जो अपना परिक्षेत्र है एक। तो उस क्षेत्र में अगर अपने को अपने जो भाई हैं, बहन हैं या कुटुंब है, परिवार है। उनके प्रति तो दया नहीं हो और पंचकल्याणक करावे। वो तो भूखो मरते हों माने उनको तो रोटियाँ भी बड़ी मुश्किल से मिलती हों और (ये जो है वो) पंचकल्याणक करावे। तो वो जीव पंचकल्याणक नहीं करा सकता, भले ही करा लिया हो उसने लेकिन वो करा नहीं सकता है। उसको पुण्यभाव नहीं होगा उतना। इसलिए उसका पहला कर्तव्य ये है कि वो अपने परिवार को संभाले - ये। दान न दे (क्योंकि) वो दान नहीं कहलायेगा परिवार का। लेकिन उसका पहला कर्तव्य ये है।

इसलिए सबसे पहले तो वो सेवा और दया का जो (परिणाम) है, वो परिवार से शुरू हो। जैसे परिवार में कोई ऐसा है (कि) बहुत कष्टसाध्य बीमार है। बहुत अधिक बीमार है। तो जैसे ये वृद्धायें होती हैं न बूढ़ी स्त्रियाँ जो होती हैं। तो उनको क्या होता है कि उनको कुछ नियम जैसे होते हैं। तो उन नियमों में क्या होता है कि - मुझे तो जल्दी मंदिर जाना है। ६ बजे मंदिर पहुँचना है (और) फिर वहाँ जाकर पाठ सुनना है। फिर वहाँ जाकर जो है मुझे पूजा करना है, ये करना है। तो घर में जैसे कोई बीमार है तो वो उसकी उपेक्षा करके और (मंदिर) चली जाएगी। और उसको कह जाएगी कि ये ले, ये दवा ले लेना और ये-ये कर लेना और मेरा तो मंदिर का टाइम हो गया। तो उसको समझना चाहिए कि उसका मंदिर पहले ये है, उसका पहला मंदिर (बीमार को संभालना है)। इसलिए उसको उसकी सेवा करनी चाहिए। भले पूजा छूट जाए, दर्शन छूट जाए और (सब) छूट जाए लेकिन उसको पहले उसकी सेवा करना चाहिए। तो इस तरह का छल-कपट न हो।

घर में जैसे अपन ये नौकर वगैरह लगाते हैं। तो उन नौकरों से इतना काम न ले, हमेशा ध्यान रखें इस बात का। ये नहीं रखे कि हम पैसा देते हैं, इसलिए उनसे खूब डटकर काम लें - ऐसा भाव न रखे। लेकिन कितना ही पैसा दो, पर भाव ये रहे कि इनपर हल्के से हल्का वजन हो।

जैसे अपन भोजन करते हैं। तो भोजन की थाली में चार कटोरी (हो) सब्जी की। तो चार कटोरी की कहाँ जरुरत है? तीन सब्जी तो उसमें थाली में ही आ सकती हैं, तो तीन कटोरी बच गईं। और एक दाल की कटोरी चाहिए खाली। तो ये standard (स्तर) की बातें हैं। ये standard, महापाप है ये। और उसपर कितना वजन हो गया, घर में बीस आदमी हैं तो? उस पर वजन कितना हो गया? इसी तरह कपड़ों में standard कि जल्दी-जल्दी रोज़-रोज़ ही धुलने डाले, क्योंकि इसे तो पैसे देते हैं (न, तो) धोएगा। तो ये जो हैं ये महापाप के परिणाम हैं। और इसमें कभी भी चाहे कितनी ही पूजा करो और कितने ही दर्शन करो, लेकिन इसमें नहीं हो सकता है।

एक ये कि सत्य को तुरंत स्वीकार करे। भले (ही) वो कर न सके, लेकिन सत्य को तुरंत स्वीकार करे। और अहिंसा का भाव इतना हो कि एक भी प्राणी की हत्या मेरे से न हो। जैसे लोग नहाते हैं तो कितना पानी खर्च करते हैं? कितना करते हैं? बाल्टियों की बाल्टियाँ पानी खर्च करते हैं। घर में geyser (गीज़र) लगें रहते हैं, उनमें अनछने पानी (को) उड़ेलते हैं। अनछना पानी जिसमें अनंत जीव हैं, अनंत त्रस माँसवाले जीव… ४८ मिनट में, ४८ मिनट के भीतर अंतर्मुहूर्त में जो ठंडा पानी होता है छना हुआ, उसमें अंतर्मुहूर्त बीत जाने पर अनंत जीव पैदा हो जाते हैं, माँस वाले त्रस जीव। तो उसको वैसे ही पीता रहे, बिना छानकर ही पीता रहे दिनभर। और खूब जो है वो geyser (गीज़र) में डाले अथवा नहाने के लिए पानी इस तरह से उड़ेले अथवा बहुत पानी खर्च करे, अनर्गल पानी खर्च करे - ये सारा का सारा महापाप कहा है। बहुत आसानी से बहुत थोड़े पानी से नहा सकता है। एक व्यक्ति एक मग या दो मग से नहा सकता है, आराम से। कितने से? दो मग से नहा सकता है अच्छी तरह से। लेकिन वो पानी ज्यादा खर्च करेगा फिर भी नहा नहीं सकेगा क्योंकि स्नान में जो है जो रक्त-संचार होना चाहिए, वो तो हुआ ही नहीं। तो उसको टोवेल से करना चाहिए। टोवेल-बाथ (towel-bath) करना चाहिए। उससे पानी भी कम खर्च होगा और काम भी हो जाएगा। तो ये सब ऐसी चीज़ें हैं।

खाने-पीने की जो चीज़ें जिनमें बहुत अधिक हिंसा होती है, तो उनका त्याग करे। जो त्याग करने लायक हैं एकदम (कि) जिनमें बहुत अधिक हिंसा होती है (और) अनंत जीव जिसमें रहते हैं, उनका तो तुरंत त्याग करे ही करे। उसमें ऐसा नहीं सोचे कि इसमें vitamin ज्यादा है। यहाँ विटामिनों का हिसाब नहीं लगाया जाता है धर्म में कि इसमें vitamin ज्यादा हैं या कम (हैं)। यहाँ तो धर्म कहा है सबसे पहले। जो तत्त्वज्ञानी है, उसको धर्म प्रधान है। इसलिए जितना उससे बनता है तो उतना अवश्य त्याग करे।

ऐसे अभक्ष के भेद तो बहुत हैं पर वो सारा नहीं कर पाता (है)। मनुष्य-जीवन की बात कर रहे हैं अपन अभी। तो वो सारा नहीं कर पाता है। लेकिन जिसमें बहुत अधिक हिंसा होती है, बहुत अधिक जीव रहते हैं जैसे वनस्पतियों में तो उनका तुरंत त्याग कर देना चाहिए। जैसे गोभी है, आलू है, प्याज है, लहसुन है, शक्करकंद है, गाजर है, मूली है इत्यादि, इत्यादि। अब इसमें और दूसरी चीजें भी होती हैं (कि) जिनमें छूट दी जाती है।

ये सारा जो है चरणानुयोग का है, तो इसमें अपनी बुद्धि नहीं लगाना एक तो कि किसने देखे हैं आलू में जीव? अरे! किसने देखें हैं? आत्मा शुद्ध है ये किसने देखा है? तो जिस सर्वज्ञ ने वो देखा, वो ही सर्वज्ञ ये देख रहा है। (ये) तो सारे वचन सर्वज्ञ के हैं। इसलिए ऐसी दुर्बुद्धि का तर्क नहीं करना चाहिए। ये सारी चीज़ें हैं तो इन सबको ज़मीकंद कहते हैं। जमीन के भीतर जो पैदा होते हैं और जिनमें अनंत जीव होते हैं, उनको ज़मीकंद कहते हैं। तो उनका त्याग करना चाहिए, इन चीजों का (क्योंकि) उनमें बहुत जीव होते हैं।

वनस्पति दो प्रकार की होती है - एक साधारण और एक प्रत्येक। तो जो साधारण वनस्पति होती है उसमें अनंत जीव होते हैं। और उसमें प्रत्येक में भी दो भेद होते हैं। प्रत्येक में एक तो ऐसी होती है कि जिसके आश्रित अनंत साधारण जीव रहते हैं; साधारण माने निगोदिया जीव। साधारण कहें अथवा निगोद कहें - एक ही बात है। तो वो अनंत जीव उसके आश्रित रहते हैं। और वो जिस समय बड़ी होती है तो वो अनंत जीव निकल जाते हैं। इस तरह की साधारण होती हैं।

कई ऐसी भी होती हैं कि वे जीव उनमें से नहीं निकलते (हैं) जैसे आलू है, गोभी है, ये गाजर है इत्यादि। ये ऐसे हैं कि इनमें (से) वो जीव निकलते नहीं (हैं)। और कुछ ऐसी होती हैं कि जैसे बहुत छोटी अवस्था होती है। जैसे ककड़ी है, तो बिल्कुल बारीक ककड़ी छाँटते हैं लोग उस सब्जीवाले से; बहुत बारीक ककड़ी। अब वो ककड़ी जो है एकदम तोड़ते ही ऐसी टूटती है (कि) जैसे चाकू से तोड़ी हो। तो उसमें अनंत जीव होते हैं। केरी हो जैसे अभी आने लगी हो, छोटी हो और उसके भीतर जाली नहीं पड़ी हो (तो) उसमें अनंत जीव होते हैं। इन सब चीज़ों का त्याग कर देना चाहिए। इनके बिना मर थोड़े ही जाता है! मरेगा नहीं न! बस तो वहाँ तक ही सोचना चाहिए कि (मैं) मर तो नहीं जाऊँगा।

मुमुक्षु:- इनको लेगा तो मरेगा।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! तो तो न मालूम क्या-क्या होगा!

दूसरा ये है कि जैसे द्विदल होता है, वो बहुत बड़ा अभक्ष होता है द्विदल कि जिन चीज़ों की दो दाल होती हैं, उनको दही-छाछ और दूध इन तीनों में मिलाकर खाना। माने मिलाने से नहीं होता (है) कुछ भी। लेकिन वो जब मुँह में जाते हैं और उनका लार के साथ संयोग होता है, तब उसमें अनंत जीव त्रस जीव पैदा होते हैं; त्रस माँसवाले जीव अनंत जीव पैदा होते हैं। तो वो श्मशान बन जाता है जो मुँह है (वो)। दाल तो सभी ऐसी होती हैं। और बाकी जिसकी भी दो दालें होती है, जैसे मिर्च का ही बीज है (तो) उसकी भी दो दाल होती है। अपन जो सब्जियाँ लेते हैं उनमें भी बीज निकलते हैं, उनकी भी दो दाल होती है। तो वो सब त्यागने लायक है।

अब उसमें दो विकल्प हैं कि एक तो ऐसे होते हैं (कि) जिनमें तेल निकलता है। तो उनकी कहीं तो छूट दी है और कहीं नहीं दी है। तो त्याग कर सके तो सबका त्याग कर देना चाहिए। और नहीं तो छूट भी दी है उसके माने आगम के प्रमाण भी हैं कि जिन चीज़ों में तेल निकलता है, उसकी दो दाल होती हो तो भी दोष नहीं लगता।

मुमुक्षु:- जैसे तिल!

पूज्य बाबूजी:- तेल किसी में भी निकलता हो जैसे ये सारे मेवे हैं, अब इनमें तेल निकलता है। तो इसमें दो मत मिलते हैं यहाँ। (एक) क्रिया-कोष नाम की पुस्तक है। उसमें तो बताया, सब गिनाए हैं ये कि इनमें भी दोष लगता है। और कुछ और हैं ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि जिनमें (से) तेल निकलता हो, तो (भी) उसमें द्विदल का दोष नहीं लगता है।

लेकिन हम तो जो है घर की बात तो बहुत दूर लेकिन जहाँ हज़ारों लोगों (का) जीमन होता है वहाँ दहीं-बड़े और इस तरह के अनेक प्रयोग करते हैं। इसलिए आचार्य ने कहा कि अल्पफल (कि जिसका) फल तो हो थोड़ा और बहुत विघात (हिंसा) हो, घात हो ज्यादा ऐसे जो मूली है, अदरक है, शंगबेर माने छोटे बेर आते हैं, वो लाल-लाल वो हैं और नवनीत माने मक्खन… मक्खन में बहुत जीव होते हैं। मक्खन खाने लायक ही नहीं है बिल्कुल, बिल्कुल जैसे माँस का ही दूसरा नाम है।

इसलिए जो घी बनाने की विधि है, वो ये होती है कि वो २४ घंटे का होता है वो सारा जमाया हुआ; और उसका रोजाना घी बनता है। और अंतर्मुहूर्त से ज्यादा वो… उसको तो ऐसा करते हैं कि वो उधर तो छाछ में से निकाला और इधर उसको पात्र को अग्नि पर (ही) रखे रहते हैं (पहले से ही)। तो उसमें (मक्खन को) डालते जाते हैं। वरना वो उस मक्खन में बहुत जल्दी जीव पैदा होते हैं। (और) अपन तो बाजार में से लाते हैं, ना मालूम कबसे फ्रीज में रखा हुआ!

इसलिए ये बहुत सी चीजें हैं कि इन सबका त्याग एकदम कर देना चाहिए। उसका कारण (ये) है कि हम तत्त्वज्ञान चाहते हैं और तत्त्वज्ञान में भी हम शुद्धात्मा को चाहते हैं। तो शुद्धात्मा के लिए जितने नरम परिणाम होने चाहिए, तो वो परिणाम तो होंगे ही नहीं क्योंकि हमारे चित्त में कहाँ है इनके प्रति दया? हमको तो जिनवाणी मिली है। जिनवाणी से ये सीखने को भी मिला है। तो सीखने को मिल गया तो हमें पालन करना चाहिए न? अभी तिर्यंच है, तो उसको कोई दोष नहीं देगा। क्योंकि उसको ना तो जिनवाणी मिली (है और) ना उसको कोई जिनवाणी सुनानेवाला मिला (है)। तो तिर्यंच को ये (इस तरह का) कोई दोष नहीं दिया जाएगा क्योंकि वो समझता ही नहीं है कि आलू में अनंत जीव होते हैं। इसलिए वहाँ दोष नहीं है। लेकिन यहाँ मनुष्य पर्याय में, जैन-कुल में पैदा हुआ और उसको जिनवाणी मिली, तो उसको अवश्य इसका पालन करना चाहिए। अन्यथा ये माना जाएगा इसका चित्त बिल्कुल पाषाण है। पाषाण! तो पाषाण-चित्त में तत्त्वज्ञान का बीज अगर डाल भी दिया जाएगा तो व्यर्थ जाएगा। व्यर्थ जाएगा। वो खूब दिनभर भले समयसार पढ़ते ही रहो न (मगर) क्या होता है उससे? चित्त तो ऐसा होता है।

मुमुक्षुः- ये ज़मीकंद में रहते हैं निगोदिया जीव?

पूज्य बाबूजी:- ज़मीकंद में भी ऐसा ही होता है कि ज़मींकंद में जैसे कुछ चीजें ऐसी हैं, जैसे हल्दी। तो उसमें उसको माना है काष्ठाधिक! काष्ठाधिक माने वो सूख जाने पर काष्टिक… तो मूँगफली गीली नहीं खाना चाहिए। लेकिन मूँगफली के छिलके में वो जीव होते हैं। भीतर दानों में वो जीव नहीं होते हैं, ऐसा। इस तरह से ये काष्ठाधिक माने गए हैं।

मुमुक्षुः- गीली माने गीली कैसे?

पूज्य बाबूजी:- गीली - नीचे ज़मीन में से ही पैदा होती है। तो गीली जो छिल्का होता है न, उसमें अनंत जीव (होते हैं)। भीतर जो दाना है उसमें नहीं होते। दाने में नहीं होते। तो ये सारी बातें हमें आज्ञा मानकर, भगवान सर्वज्ञ की आज्ञा मानकर और इनको ग्रहण करना चाहिए। उसमें बुद्धि नहीं लगाना चाहिए।

एक बूँद पानी में बहुत जीव होते हैं और हम अनछना पीते हैं, होटलों का पीते हैं। और इधर से कप-तश्तरी, ये काँच के ग्लास इत्यादि इनका सब व्यवहार करते हैं। तो उसमें क्या है वो तो बिल्कुल जूठा ही है वो तो। वो तो जूठा ही है धोने से कैसे साफ हो गया वो? धर्म की दृष्टि से तो वो त्याज्य है ही, लेकिन अपने स्वास्थ्य की दृष्टि से भी वो त्याज्य है बिल्कुल। क्योंकि कोई जो है वो संक्रामक बीमारी वाला पी गया उससे पानी। अब वहाँ कौन धोता है वहाँ होटल पर? तो हमने भी जैसे पी लिया, चाय पी, पानी पी लिया, तो उससे तो वो (शारीरिक) नुकसान भी है। पर उस नुकसान की नहीं है चर्चा। यहाँ तो धर्म की रक्षा कैसे हो? ये है यहाँ तो, खास। इसलिए इनका ऐसा करो (कि) अभी सभी त्याग कर दो, आज ये ही है। अब कल तो जाना ही है, परसों तो; सब त्याग कर दो। और सुनाऊँ इनका पूरा?

मुमुक्षु:- बोलो!

पूज्य बाबूजी:- आचार-मुरब्बे बहुत पुराने, इनकी सबकी जो (है) बहुत कम म्याद होती है।

मुमुक्षु:- बाबूजी! भूमि भीनी होनी चाहिए। कड़क भूमि है।

पूज्य बाबूजी:- हाँ, कड़क भूमि है। नरम मिट्टी में बीज पैदा होता है।

देखो! ये निगोद जो है (वो) वनस्पति को कहते हैं - पहली बात तो ये। और उस वनस्पति में जो निगोद है, तो वो उसका लक्षण ये (है) कि उसमें शरीर होता है एक। जैसे एक आलू है; (तो) आलू जो है वो निगोद नहीं है पर उसके आश्रित निगोद जीव रहते हैं। ये हमेशा याद रखना। लेकिन निगोद जो है जिसको साधारण वनस्पति कहते हैं… एक ही बात है - निगोद और साधारण वनस्पति। वो ऐसा होता है (कि) जैसे बरसात के दिन हैं और अपने जो आचार हैं, उनके ऊपर सफेद-सफेद वो आ जाती है। वो निगोद है वो।

जैसे ईंट है, ईंट। गीली ईंट, उसपर हरा-हरा वो छा जाता है, वो निगोद है वो। जैसे बरसात के दिनों में सफेद-सफेद छतरी जैसी पैदा होती है, वो निगोद है वो। जल में जो काई होती है काई, जल में, वो निगोद है वो।

मुमुक्षु:- जल में काई मतलब? शेवाल!

पूज्य बाबूजी:- शेवाल! शेवाल! वो निगोद है। उसमें अनंतानंत जीव होते हैं। और दूसरे जो अभी अपन ने बताए, ये आलू अदरक वगैरह। ये जो हैं, ये हैं तो प्रत्येक वनस्पति। प्रत्येक वनस्पति उसे कहते हैं कि जिसमें एक शरीर का स्वामी एक ही जीव हो। तो उस शरीर का स्वामी तो एक ही जीव होता है, एक। जैसे आलू है न! तो उसमें भी शरीर तो बहुत होते हैं। लेकिन फिर भी उसके जो भेद हैं उसमें एक शरीर का धारक एक जीव होता है। और उस आलू के आश्रित अनंत जीव दूसरे रहते हैं - ये निगोद (वाले), आश्रित, कि जो कभी निकल नहीं पाते हैं। आलू है, शक्करकंद है, गाजर है, मूली है - ये इनके जीव नहीं निकलते हैं। और ये जो अभी अपन ने अभी बताया जैसे ककड़ी है और (वो) बड़ी हो गई, तो उसके वो जीव निकल जाते हैं। तब वो खाने लायक मान लेनी चाहिए।

वैसे तो वनस्पति मात्र का त्याग करना चाहिए। १० लाख वनस्पति हैं, १० लाख। तो उन १० लाख में से अपने को कम से कम इतना अवश्य करना चाहिए कि अपन उसकी गिनती रख लें कि हम अपने जीवन में १०० वनस्पति से अधिक नहीं लेंगे। अथवा १५० या २०० से अधिक वनस्पति नहीं लेंगे। तो उससे ये परिणाम होगा कि बाकी जितनी वनस्पतियाँ हैं, उनके पाप से हम बच गए। और अगर हमने ये नियम नहीं लिया तो १० लाख का पाप रोजाना लगता है, चाहे वो वनस्पति हम खावें ही नहीं। काम में ही नहीं आए वो वनस्पति पर १० लाख का पाप रोजाना लगता है। क्योंकि वो परिणाम इतना (कठोर) है न! परिणाम ऐसा (कठोर) है न हमारा कि हम कौनसी नहीं खायेंगे उस दिन १० लाख में से। इसलिए इतना भीषण परिणाम है वो, निर्दयता का।

तो उनको लिखते जायें (सूची बनाकर), इसमें कोई मुश्किल नहीं है। जो-जो चीज हम रखना चाहते हैं, (जो हमारे) काम आती जाती हैं नई-नई, तो उनको लिखते जायें। और अंत में छह महीने लिखने में लगेंगे या दो महिने लिखने में लगेंगे। वो लिखकर समाप्त कर दें कि भाई! हमने ये १०० का रखा है। १५० का रखा है, २०० का रखा है।

मुमुक्षु:- वो तो बहुत easy (आसान) है।

पूज्य बाबूजी:- बहुत easy (आसान) है वो तो। ये तो बहुत easy (आसान) है। तो उससे फिर परिणाम में निर्मलता कितनी आ गई।

तो इसी तरह पानी छानकर पीना। पानी जैसे गरम कर लिया जाए थोड़ा तो वो छह घंटे तक पिया जा सकता है, बिना छानकर। और (यदि) उसे उबाल लिया जाए तो वो २४ घंटे तक पिया जा सकता है, ऐसा। और ठंडा पानी हो तो वो अंतर्मुहूर्त में माने ४८ मिनट से वो जो अपन ने जो उस दिन बात की थी… उतने समय में उसमें त्रस जीव पैदा हो जाते हैं। त्रस माने दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पाँच इन्द्रिय - इन जीवों को त्रस कहते हैं। एकेन्द्रिय जीव जो है उसमें वो माँसादिक नहीं होते हैं। तो उनका दोष लगता है। इसलिए बस थोड़ा सा उसको गरम कर लिया तो छह घंटे तक पी लो।

जैसे निगोद माने अनंतपना है निश्चित जिनका, वे अनंत रहते हैं। ऐसे जीवों का एक ही क्षेत्र माने एक शरीर जो स्थान देता है उसको निगोद कहते हैं। तो शरीर तो होता है एक। जैसे वो जो वो आचार के ऊपर जो वो फूलन आ गई वो सफेद। तो वो शरीर तो है एक और उसमें जीव हैं अनंतानंत जीव हैं, अनंतानंत ऐसे। और हम क्या करते हैं कि उसको या तो निकालकर फेंक देते हैं या उसी में घोल देते हैं कि इसमें तो विटामिन ज्यादा रहते हैं। जैसे जल की काई, ईंट आदि की काई, कूड़े से उत्पन्न हुआ हरा नीलारुप। कूड़ा होता है न, तो उसमें हरा-नीला जो होता है, जटाकार आहार कांजी आदि से उत्पन्न - ये सब बादरकाय निगोद जानने। बादर और सूक्ष्म दो प्रकार के (निगोद) होते हैं। तो ये तो हैं बादर जो दिखाई देते हैं। और सूक्ष्म जीवों से तो ये सारा लोक (ही) भरा हुआ है। सूक्ष्म निगोदिया से तो वो सारा लोक भरा हुआ है।

मुमुक्षुः- माने निगोद में भी दो प्रकार (हैं) - बादर और सूक्ष्म?

पूज्य बाबूजी:- दो प्रकार - बादर और सूक्ष्म।

अब सप्रतिष्ठित प्रत्येक और अप्रतिष्ठित प्रत्येक। तो प्रत्येक है वनस्पति, जैसे सेब है apple तो उसमें वो निगोदिया जीव नहीं हैं। तो वो एक है लेकिन उसमें भी असंख्यात् शरीर हैं, असंख्यात् शरीर हैं उसमें भी। माने एक सेब जो है वो एक जीव नहीं है। अथवा एक वृक्ष को ही एक जीव मानते हैं… ये जैसे श्वेतांबरों में प्रवृत्ति है ये कि इसमें से तोड़ लिया तो उसमें जीव नहीं रहा। वो बिल्कुल गलत है वो। उसमें असंख्यात् शरीर रहते हैं और असंख्यात् शरीर में से एक-एक शरीर में एक जीव रहता है। उसको कहते हैं प्रत्येक। और जिस प्रत्येक शरीर के आश्रित ये निगोदिया जीव रहते हैं, जैसे वो बारीक ककड़ी इत्यादि… आलू वगैरह शक्करकंद वगैरह। तो इनमें से निकलते नहीं हैं और उनमें से निकल जाते हैं। तो जिनमें से नहीं निकलते हैं उनका हमेशा के लिए त्याग करना चाहिए।

अब इनकी रचना बताई है, रचना। वो (जानकर) अपने को आश्चर्य हो जाएगा। एक निगोद शरीर में द्रव्य प्रमाण की अपेक्षा (से) देखे गए जीव सब अतीतकाल के द्वारा सिद्ध हुए जीवों से भी अनंत गुणे हैं। अब देख लिजीएगा! एक निगोद शरीर बहुत छोटा सा होता है, बिल्कुल। तो उस एक निगोद शरीर में कितने जीव होते हैं कि अपने भूतकाल में जितने सिद्ध भगवान हो गए (हैं) उन सिद्ध भगवान से अनंत गुणे जीव उसमें एक शरीर में होते हैं (उतने) छोटे से में। जैसे आलू में सूई लगा दी अपन ने, तो उतनी सी जगह में इतने जीव हैं कि अनंतकाल तक भी ६०८ जीव जो मोक्ष जायेंगे छह महिने और आठ समय में, तो भी उनका अंत नहीं होगा उस इतने से जीवों का। तो कितने जीव हो गए?

मुमुक्षुः- जीवराशि …

पूज्य बाबूजी:- वो तो उतनी सी है माने (कि) आलू में एक सुई की नोंक लगा दी। तो उस शरीर में इतने जीव हैं कि जो अनंत सिद्ध हो गए पहले, तो वो अनंत सिद्धों से अनंत गुणे हैं वो, अतीत काल के सिद्धों से। उसमें (आलू में से) एक में। अब और का क्या हिसाब लगायेंगे? पूरे आलू का क्या हिसाब लगायेंगे? और गोभी का क्या हिसाब लगायेंगे? कैसे होगा?

मुमुक्षुः- पत्ता-गोभी?

पूज्य बाबूजी:- पत्ता-गोभी भी खाने लायक नहीं है क्योंकि पत्ता-गोभी में layers होती हैं। परत होती हैं न! उन परतों में बहुत त्रस जीव पैदा होते हैं, उड़ने वाले। माँसन जीव पैदा होते हैं। तो ये जो होते हैं आलू वगैरह, इनको कहते हैं सप्रतिष्ठित प्रत्येक। और वो जिनमें जैसे सेब है मौसम्बी है, उनको कहते हैं अप्रतिष्ठित। अर्थात् उनके आश्रित निगोदिया जीव नहीं रहते हैं।

देखिए! अब यहाँ क्या कहते हैं रचना, इनकी रचना बताते हैं कि पहला होता है स्कंध। दूसरा होता है अंडर, फिर आवास, फिर पुलवी और फिर निगोद शरीर। ये पाँच भेद होते हैं। तो उनमें से जो बादर निगोदों का आश्रयभूत है, बहुत बखारों से युक्त है। ऐसे मूली, अदरक, थुवर आदि संज्ञाओं को धारण करनेवाला स्कंध कहलाता है। वो तो हुआ एक स्कन्ध।

मुमुक्षु:- थुवर माने?

पूज्य बाबूजी:- थुवर माने थुवर (एक) होता है वृक्ष होता है। थुवर (वृक्ष) होता है, काँटेवाला बहुत। आप लोग क्या कहते हैं? गँवारपाठा जैसे कुमारी। कुमारी कहते हैं उसको गँवारपाठा, गँवारपाठा। तो वो गँवारपाठा भी साधारण है, वो इसी में आता है।

मुमुक्षु:- गुमारपाठु।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! तो वो तो हुआ स्कंध और स्कंध के बाद अंडर। उन स्कंधों के जो अवयव हैं, जो स्कंध हैं एक उन स्कंध के जो अवयव होते है उन्हें अंडर कहते हैं। वे असंख्यात् लोक प्रमाण होते हैं। ये शरीर वे असंख्यात् लोक प्रमाण हुए। उसमें एक स्कंध में ही, एक में। और जो अंडर के भीतर स्थित हैं उन्हें आवास कहते हैं। एक अंडर में असंख्यात् लोक प्रमाण आवास होते हैं।

मुमुक्षु:- ये तो विश्व ही अलग सा दिखता है।

पूज्य बाबूजी:- बिल्कुल अलग चीज़ है एकदम।

और जो आवास के भीतर स्थित हैं और पिशवियों के समान हैं, उन्हें पुलवी कहते हैं। एक-एक आवास में वे असंख्यात् लोक प्रमाण होती हैं। तथा एक-एक आवास की अलग-अलग एक-एक पुलवी में असंख्यात् लोक प्रमाण निगोद शरीर होते हैं। असंख्यात् लोक प्रमाण निगोद शरीर माने कितने शरीर हुए? असंख्यात् लोक प्रमाण निगोद शरीर। असंख्यात् लोक माने लोक के असंख्य प्रदेश ऐसे असंख्यात् लोक। तो इतने उसमें निगोद शरीर होते हैं ये तो, निगोद जीव नहीं।

मुमुक्षु:- निगोद शरीर!

पूज्य बाबूजी:- निगोद शरीर होते हैं। योग्य औदारिक तेजस कार्माण पुद्गलों के उपादान कारण होते हैं। ये हर जीव में होते हैं ये औदारिक तेजस और कार्माण। और जो पुलवी के भीतर स्थित द्रव्यों के समान अलग-अलग अनंतानांत निगोद जीवों के ऐसे आपूर्ण होते हैं, (तो) कि वो जो हैं वो जो अनंत निगोदिया शरीर हैं उनमें से एक-एक निगोद शरीर में अनंतानंत जीव होते हैं।

एक पुलवी में असंख्यात् लोक प्रमाण निगोद शरीर और एक शरीर में अनंतानंत जीव - ये हुआ। अब वो अनंतानंत जीव वो अनंत भविष्य बीत जाएगा, तो भी वो जीव मोक्ष के लिए पूरे नहीं हुए उस उतने से शरीर के। तो अब कितने वनस्पतियाँ तो कितनी भरी हैं जगत में, इतना जबरदस्त पाप है।

मुमुक्षु:- निगोद शरीर की स्थिति?

पूज्य बाबूजी:- निगोद शरीर की स्थिति होती है कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण, एक निगोद शरीर की। कम भी होती है। लेकिन अधिक जो नित्य निगोद होते हैं, जैसे सात नरक के नीचे हुए … सात नरक जो हैं उसके नीचे एक राजू की निगोद-भूमि है। उसे कलकल भूमी कहते हैं।

मुमुक्षु:- कलकल भूमि माने?

पूज्य बाबूजी:- कलकल नाम है उसका, कलकल भूमि। उसमें नित्य निगोदिया जीव रहते हैं।

मुमुक्षु:- ओहोहो! कभी बाहर आने वाले नहीं हैं।

पूज्य बाबूजी:- तो उनमें ऐसी स्थिति होती है।

मुमुक्षु:- माने सातवें नरक से तो जीव वापस आ सकता है..

पूज्य बाबूजी:- सातवें नरक, सात नरक जो हैं वो छह राजू में हैं।

मुमुक्षु:- वहाँ से तो वापस आ सकता है मगर निगोद से (तो) जीव..

पूज्य बाबूजी:- नित्य निगोद से तो आते हैं। आते हैं, निकलते हैं वहाँ से भी। वहाँ भी पुण्य और पाप दोनों प्रकार के परिणाम होते हैं। ज्ञान कम होते हुए भी पाप-पुण्य के परिणाम अंतर्महूर्त में बदलते रहते हैं। अपन लोगों के भी बदलते रहते हैं, तो इसी तरह उनके भी बदलते हैं। तो जब पुण्यभाव होता है, उसमें आयु बंध जाए तो सीधे मनुष्य हो जाते हैं। सीधे मनुष्य होकर आठ वर्ष की अवस्था में सम्यग्दर्शन धारण करके और अंतर्मुहूर्त में केवलज्ञान प्राप्त करके मोक्ष चले जायें। भरत के हैं न १०८ पुत्र! उनका उदाहरण आता है न १०८ पुत्रों का? (कि) बोले नहीं। बोले तो भगवान के सामने ही बोले कि हमको जैनेश्वरी दीक्षा दीजिए। आठ वर्ष तक बोले (ही) नहीं।

मुमुक्षु:- मगर बोले तो ये ही बोले।

पूज्य बाबूजी:- बोले तो ये ही बोले।

मुमुक्षु:- बाबूजी! इसमें पुरुषार्थ क्या हुआ?

पूज्य बाबूजी:- बिना पुरुषार्थ के क्या होगा?

मुमुक्षु:- नहीं माने कि कौनसा (और) किस प्रकार का पुरुषार्थ?

पूज्य बाबूजी:- Turn (घुमाव) देना। Turn (घुमाव) देना उसको, परिणति को कि परिणति जो जगत की ओर जाती है, विषय की ओर जाती है, पुण्य और पाप की ओर जाती है, उनमें आसक्ति किए बैठी है वहाँ से तोड़ना उसको उपयोग को, ज्ञान को और शुद्धात्मा की ओर लगाना। इसमें पुरुषार्थ नहीं है?

मुमुक्षु:- वो जो है नित्य निगोद (उसमें)?

पूज्य बाबूजी:- भीतर ही भीतर होता न अपने! जैसे कोई कार्य होता है न, कोई महत्वपूर्ण कार्य होता है और वो नहीं बनता है। तो अपन भीतर ही भीतर विकल्प में ज़ोर लगाते हैं कि नहीं लगाते? हो जाना चाहिए। इतनी जल्दी होना चाहिए वरना बहुत नुकसान हो जाएगा। ये क्या है ये? पुरुषार्थ है। विकल्प अलग और ये जो परिणति होती है, ये इसका नाम पुरुषार्थ (है)।

तो सब तरफ से उपयोग को turn (घुमाव) देकर और केवल ज्ञायक की ओर लगाना, इसमें महापुरुषार्थ है इसमें। पहले अनंत लोकालोक के साथ इसको ममत्व था (और) अपना मानकर बैठा था। और कर्ता-कर्म की बुद्धि थी जबरदस्त (कि) सब कुछ कर सकता हूँ मैं। सब कुछ कर सकता हूँ - इतना मानता था न? अब उस सबको समाप्त किया तो बिना पुरुषार्थ के होगा क्या समाप्त? तो उस पुरुषार्थ से उसको समाप्त करके और उपयोग को फिर उसी प्रकार, उसी अनंत पुरुषार्थ से शुद्धात्मा की ओर ले जाना। तो अनंत होगा न (पुरुषार्थ)? कितना ममत्व फैला हुआ (है)? सारा लोकव्यापी, लोकालोकव्यापी ममत्व, उसमें अनंतानंत पदार्थ (और) उन सबमें हमारा एक ही समय में ममत्व, एक समय में… तो कितना बड़ा काम हुआ।

मुमुक्षु:- 80ये तो हुआ बाबूजी, खाने-पीने (और) रहन-सहन के बारे में व्यवहार। दूसरे जीवन के क्षेत्र में किस तरह का व्यवहार होना चाहिए?

पूज्य बाबूजी:- इस तरह का हो (कि) बस मार्दव परिणाम रहें, कोमल परिणाम रहें तो सब हो गया बस। वो तीन प्रकार के बताये न शुभभाव (कि) देव-गुरू-धर्म के प्रति भक्ति-अनुकंपा और अकलुष भाव। अकलुष भाव माने हिंसा-झूठ-चोरी-कुशील-परिग्रह इनका त्याग (हो) अथवा ये कम हों। इसलिए इसका तो हर जगह… तमाम मंदिरो में भी जावे, तो मंदिर में भी ध्यान रखे इस बात का।

और तो बहुत बातें हैं। बहुत बातें है कि जैसे मान लीजिए हम पूजा कर रहें मंदिर में। और मंदिर में दूसरे भी पूजा कर रहे हैं। अब हम ज़ोर-ज़ोर से बोल रहे हैं तो वो भी पाप है। उसको पता ही नहीं (कि) दूसरा (पूजन) कर रहा कुछ तो उसको कितना विघ्न होगा। और वो झालरें बजा रहे हैं बिना काम (के ही)। जाते ही लोग बजाते हैं न, वो (घंटी)। अब इसकी क्या जरुरत है बजाने की? कोई माला फेर रहा है, कोई पूजा कर रहा है, कोई स्वाध्याय कर रहा है (तो) उसकी क्या जरूरत है (बजाने की)? भगवान को जगाना है क्या? ये तो एक अनुकरण चल गया (है) जैसे दूसरी जगह भगवान को जगाते हैं, इस तरह से। सोते हैं न छह महिने भगवान और छह महीने जागते हैं - ऐसा आता है वहाँ। तो वो तो अपने यहाँ तो जबरदस्ती नकल हो गई।

80 सम्यग्दर्शन प्राप्त करने के पहले जीव का जीवन के दूसरे क्षेत्र में किस तरह का व्यवहार होना चाहिए? -56.26 Mins मुमुक्षुः- वो तो आरती के समय का घंटा … आरती के समय का होता है?

पूज्य बाबूजीः- आरती के समय तो अब हमने बना लिया है। वो तो उसकी जरूरत ही नहीं है न! क्योंकि वो तो टाँगेंगे तो रोज ही बजायेंगे। बल्कि खेल करते हैं लोग तो (कि) अपने गोद में बच्चा ले जाते हैं (और) उससे बजवाते हैं। उसकी जरूरत कहाँ है? बस! जिस समय कोई समारोह हो और उस समय बजाना हो तो उस समय दूसरी व्यवस्था रखो। बहुत व्यवस्थायें हैं इस तरह की।

मुमुक्षुः- माने ये दूसरे दर्शन भगवान के कर रहे हों, उसको भी बाधा वर्जित है।

पूज्य बाबूजीः- कितना अविवेक हुआ? विवेक तो जो है एक मशाल है बिल्कुल। विवेक तो मशाल है। उसके प्रकाश में चलना चाहिए जीव (को)। तो हर जगह विवेक, हर समय… सही बात को एकदम स्वीकार करना, एकदम। तो उसमें अपनी कोई मौत थोड़े ही होती है। घर में जैसे कोई बड़ा है अथवा समझदार है, वो कहता है कोई बात। कोई भी बात, कोई दुनिया संबंधी, लोक संबंधी, धर्म संबंधी, उसको एकदम स्वीकार करे क्योंकि वो तो बुरी आदत (है) छोड़ने लायक है। उसमें क्या है? मैं भविष्य में नहीं करूँगा।

घर की व्यवस्था संबंधी बात है। और वो तो बात लौकिक है लेकिन लौकिक नहीं लोकोत्तर बहुत है। क्योंकि घर में अगर हम अव्यवस्था रखेंगे तो उसमें tension (आकुलता) बहुत रहेगी, परिणाम में। जैसे किसी की चाबी है। उदाहरण के लिए जैसे पति-पत्नी हैं। अब उसका पति का स्कूटर है। अब स्कूटर की चाबी उसने पत्नी को दे दी (और) अब उसने कहीं भी डाल दी। और वो पति रखता था अपनी जगह (पर और) तो उसने (पत्नी ने तो) कहीं भी डाल दी। अब उसको (पति को) जरूरी काम आया तो वो कहता है (कि) लाओ चाबी लाओ। मुझे जरूरी जाना है। जल्दी जाना एकदम court (आदलत) जाना है, जल्दी। अब उसको चाबी ढूँढते-ढूँढते दो घंटे (हो गए और) नहीं मिली। कितना पाप हो गया?

मुमुक्षुः- परिणाम बहुत कलुषित हो गए।

पूज्य बाबूजीः- कितनी tension हो गई! दोनों को tension कितनी हो गई? तो इसकी अपेक्षा ये है कि ये यहाँ रहेगी चाबी - ये व्यवस्था है। इस जगह (से) ले लिया करो। इसलिए जो स्थान हमने नियत किये हैं किसी वस्तु के लिए, उन्हीं स्थानों पर वो चीज हम अँधेरे में भी पा सकें। और दूसरे भी पा सकें (सिर्फ) हम ही नहीं, दूसरे भी पा सकें - ऐसी व्यवस्था घर में रखना।

मुमुक्षुः- तो ये तो घर की व्यवस्था हो गई।

पूज्य बाबूजीः- घर की व्यवस्था नहीं हुई, (ये) मोक्ष की व्यवस्था हुई। मोक्ष की व्यवस्था है ये, घर की नहीं। उसमें परिणाम कितने शांत (हुए)! और ये व्यर्थ का है ये माने, ये व्यर्थ का प्रमाद है। ऐसे प्रमादी जीव को (यदि) मोक्ष भेजा जाएगा तो वहाँ वो खलबल नहीं करेगा (क्या)? खलबली नहीं मचायेगा?

मुमुक्षु:- Eligiblity (पात्रता) ही नहीं होती है।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! बिना देखे वस्तु को उठा लेना-धरना (उसमें) जीव पड़ जाते हैं अपने घरों में, वस्तुओं में जीव पड़ जाते हैं, तो उनको जो है बेरहमी से निकालना, कहीं भी धूप में डाल देना - ये सब क्या हैं ये? करना पड़ता है। गृहस्थ में है तो करना पड़ता है। लेकिन उसमें इतना विवेक हो कि जीवों की हिंसा कम से कम हो। और ये फल-फूल वगैरह मंदिर में, ये तो हिंसा है ही सही। इसमें तो क्या है? इसलिए हर चीज में विवेक हो, हर चीज में विवेक हो।

सेवा का भाव हो, अनुकंपा का भाव हो, दया का भाव हो, ऐसा। घर में बीमार है जैसे, तो वो बहू बीमार है। और सास को जो है वो नियम है कि मुझे तो जल्दी पहुँचना है; मंदिर का (नियम है)। तो ऐसा नियम होता नहीं है वैसे, (इस प्रकार का नियम) लिया नहीं जाता है। सब नियमों में अपनी परिस्थिति का ध्यान रखकर नियम लिया जाता है और शक्ति के अनुसार लिया जाता है। तो उसकी (बहू की) सेवा तो नहीं करे और वो तड़फ रही है। बुखार के मारे तड़फ रही है। (मान लो) जैसे न्यूमोनिया हो गया। अब ये क्या समझे? जो बुढ़िया है वो (तो) समझे नहीं कुछ। मुझे तो मंदिर जाना है। और देख कहाँ है, कहाँ है बुखार? कहाँ है? कहाँ? देख! ठंडा तो हो रहा है शरीर। कहाँ है? और वो कह दे (कि) ये नहा लेना इससे, ये इसमें टंकी में पानी भरा है। और सर्दी के दिन हैं और (वो सास तो) चली गई (मंदिर)। तो उसने बिचारी ने क्या किया? वो तो आज्ञाकारिणी थी, सो हो गया उसको तो डबल न्यूमोनिया हो गया। और सास आई जितने समय में तो (वो) मर गई, मर गई। अब उसकी (सास की) पूजा का क्या हुआ? ये तो घर की बात (है)।

लोग दान करते हैं और अपने घर के जो हैं वो भूखे मरते हैं; और दान करते हैं लोग। पहला दान तो ये है, पहला कर्तव्य तो ये है (कि इसको खिलाए)। साहब! वो तो स्वार्थ है न! स्वार्थ क्या है उसमें? माने तुम नहीं करते हो तो वो निर्दयता है कि नहीं? कि तुम तो खाते हो और उसमें तुम देख लेते हो कि ये भूखा मर रहा है। तो जब तुम यहीं दया नहीं कर सकते तो औरों पर क्या करोगे, दूसरों पर? तुम्हारे सामने ही जो है रात-दिन तड़प रहा है, तो उस पर नहीं कर सकते तो औरों पर कैसे होगी (दया)? उसको पैसा नहीं दे सकते तो पंचकल्याणक कैसे करोगे?

मुमुक्षु:- करेगा तो दिखावे के लिए करेगा।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! वो कर दे। कर देगा लेकिन पंचकल्याणक का फल नहीं मिल सकता ऐसे पाषाण (हृदय वाले) जीव को। हाँ! ऐसे निर्दयी जीव को।

मुमुक्षु:- पाषाण! पंचकल्याणक तो होगा पर कल्याण नहीं होगा अपना।

पूज्य बाबूजी:- कल्याण नहीं होगा।

मुमुक्षु:- रचना में कुछ बाकी है?

पूज्य बाबूजी:- बस! ये वनस्पति का था जो, बता दिया; इतना ही था। बहुत हैं लेकिन बातें ऐसी।

मुमुक्षु:- पिताजी कुछ कह रहे हैं।

शांतिभाई! द्रव्यकर्म 81का निमित्त लेकर भावकर्म (और) भावकर्म का निमित्त लेकर द्रव्यकर्म - तो थोड़ा सा करणानुयोग के बारे में कुछ कहो प्रभु।

पूज्य बाबूजी:- करणानुयोग में ये ही है द्रव्यकर्म और भावकर्म, ये दो न्यारे-न्यारे हैं। द्रव्यकर्म से भावकर्म नहीं होता लेकिन भावकर्म होता है तो द्रव्यकर्म का उदय (अवश्य) होता है। उदय रहता है। बस! ये स्थिति है। लेकिन द्रव्यकर्म के उदय में भावकर्म हो और भावकर्म से द्रव्यकर्म का बंध हो, ऐसी संतति अगर चलती ही जावे तो फिर मोक्ष के लिए कौनसा क्षण है? कौनसी परिस्थिति है कि वो बदल सकेगा? इसलिए (वो) बदलेगा नहीं।

तो इसलिए आचार्य ने कहा कि ये दो द्रव्य हैं ये। इन दोनों द्रव्यों को न्यारा-न्यारा देखो। तो जहाँ हमने द्रव्यकर्म को आत्मा से न्यारा देखा, तो फिर द्रव्यकर्म के उदय में होनेवाले जो ममत्व और राग-द्वेष के भाव (हैं), मोह-राग-द्वेष के भाव (हैं) वो कहाँ दिखाई देंगे? जब हमने उसको न्यारा ही देखा कि ये तो आत्मा से बिल्कुल पृथक है, भिन्न चीज है, पुद्गल (है), तो वो न्यारा देखने पर, फिर उसके होने पर और उसका अनुशीलन करने पर कि द्रव्यकर्म के उदय में मुझे भावकर्म होता है और भावकर्म से फिर द्रव्यकर्म का बंध हो जाता है … ये जो मानना था मिथ्यात्व भरा, ये मानना समाप्त हो जाता है। और न्यारा-न्यारा देखने पर फिर वो निमित्त नहीं बनता (है बल्कि) वो ज्ञेय बन जाता है। न्यारा देखा न! न्यारे हैं कि नहीं? पहली बात तो ये है।

जैसे एक कैदी है, उसके पैर में लोहे की साँकल है। अब वो अपने को साँकलवाला मानता है। पर बिना साँकलवाला क्यों नहीं मानता है? अरे भाई! आदमी का (और) लोहे का संबंध क्या है? वो तो तेरे अपराध का परिणाम है लेकिन वर्तमान में भी न्यारी ही है (वो साँकल)। तूने अपराध छोड़ा और वो खुली। और अपराध छोड़ना, वो (तो) साँकल के होते हुए भी हो सकता है। भले ही (वो) कारावास में हो, काल-कोठरी में हो भले ही। लेकिन तो भी अपना जो अपराध था उस अपराध के लिए प्रतिज्ञा कर सकता है कि भविष्य में नहीं करूँगा। तो जेल में भी उसका आदर होने लगता है, ऐसा व्यक्ति का। तो ऐसा कर सकता है।

इसी तरह द्रव्यकर्म का उदय (है) लेकिन गुरु से जो देशना मिली उसको इसने हृदय स्वीकार किया और स्वीकार करके अब कहने लगा कि द्रव्यकर्म मेरा कौन लगता है? ये क्या कर सकता है मेरा? ये तो मुझे जानता ही नहीं (है)।

मुमुक्षु:- ये तो मुझे जानता नहीं है।

पूज्य बाबूजी:- इसमें वो भाव ही नहीं है जो मेरे को होते हैं। मोह-राग-द्वेष के भाव द्रव्यकर्म में हैं ही नहीं, तो ये (मेरे को) करायेगा कैसे? जैसे अनपढ़ है, वो अनपढ़ को कैसे पढ़ायेगा? अनपढ़ को पढ़ाने के लिए (स्वयं उसे) पढ़ा हुआ होना चाहिए न! तो भाई! इसमें ज्ञान

81 द्रव्यकर्म और भावकर्म का करणानुयोग। 1.04.36 Hours होना चाहिए न इस बात का तो कि मुझे इससे बंधना है (और) इसको दुःख देना है, इसको मोह पैदा करना (कराना) है। वो उसमें है ही नहीं।

इसलिए देखने की पद्धति ये है कि न्यारा देखो। और न्यारा देखने पर फिर इधर जब न्यारा देखा, तो फिर इधर जो आत्मा रहा वो शुद्ध बचा या अशुद्ध बचा? कैसा बचा? कि बिल्कुल न्यारा देखा, पुद्गल से बिल्कुल न्यारा देखा। तो पुद्गल से न्यारा देखने पर मेरे को मिथ्यात्व-भाव होगा? कैसे होगा मिथ्यात्व-भाव? जब तूने उसको बिल्कुल न्यारा देख लिया (है) तो मिथ्यात्व हो कैसे सकता है अब? मिथ्यात्व होगा कैसे? तू अपने आप को बंधा हुआ मानता है - यहाँ से शुरु होता है मिथ्यात्व। उसका प्रारंभ यहाँ से होता है। इसलिए न्यारा देख लेने पर वो निमित्त नहीं बनता (है) और इधर मिथ्यात्व आदि का नैमित्तिक भाव पैदा नहीं होता (है) न्यारा देख लेने पर। तो वो ज्ञेय-कोटि में चला जाता है।

शरीर है अभी जैसे, इससे ममत्व तोड़ना है। तो शरीर को ये शरीर के रुप में नहीं देखें, क्योंकि ये एक वस्तु नहीं है ये। इसमें अनंत परमाणु हैं। अब हम क्या करें कि इन अनंत परमाणुओं को बिखरा हुआ देखें क्योंकि बिखरेंगे ही सही ये तो, आगे जाकर। तो वर्तमान में ही इनको बिखरा हुआ देखें। तो फिर शरीर ही नहीं दिखाई देगा तो ममत्व किस से करेगा? किससे ममत्व करे? बिखरा हुआ एक-एक परमाणु दिखाई देगा (कि) एक-एक परमाणु से जुड़कर बना है, तो एक-एक परमाणु (को) देखे। तो शरीर ही नहीं देखेगा तो ममत्व का कोई आधार कहाँ रहेगा?

मुमुक्षु:- बराबर! बराबर!

पूज्य बाबूजी:- (तो) देखने की पद्धति ये है। जब कर्म से बंधा हुआ मानता है, तो (उसको) नैमित्तिकभाव मिथ्यात्वादिक पैदा होते हैं। और जब कर्म को न्यारा देखता है, तो वो नैमित्तिकभाव पैदा ही नहीं होते (हैं) मिथ्यात्वादिक - ये देखने की पद्धति है। इसमें निमित्त नहीं मानना कि ये मेरे निमित्त हैं भावों के। भाव का निमित्त… तू भाव करता है तब वो निमित्त कहलाते हैं। अगर तू भाव ही नहीं करेगा और उनको न्यारा मानेगा तो फिर भाव कैसे होंगे मिथ्यात्वादि के? मैं इनसे बंधा हुआ हूँ - ये भाव कहाँ से होगा? वो तो वस्तु बंधी हुई है तो भी न्यारी है एकदम। क्योंकि उसने अपना जो स्पर्श-रस-गंध-वर्ण है, वो छोड़ा नहीं है। स्पर्श-रस-गंध-वर्णवाली ही है वो तो उस समय भी, जिस समय आत्मा के साथ है।

तो कितनी युक्तियाँ आती हैं (कि) इसकी मेरी जान-पहचान ही नहीं है। तो ये मेरे को राग-द्वेष कैसे पैदा करायेगा? और इसमें राग-द्वेष नहीं है और ये खुद अपने को नहीं जानता है (तो) मेरे को क्या जानेगा? और फिर जिन भावों के लिए मैं कहता हूँ कि ये इसके उदय में मेरे को ये भाव होते हैं, तो उसमें तो है ही नहीं वो भाव। वो तो तूने ही किये है। तूने किये हैं पूरी तरह (से) Cent-Percent (शत प्रतिशत) निरपेक्षरूप से; कर्म से बिल्कुल अलग तूने पैदा किये हैं वो भाव।

मुमुक्षु:- माने राग के करने में रागभाव है ही नहीं? अपनी गलती से रागभाव दिखते हैं।

पूज्य बाबूजी:- नहीं! अपनी गलती नहीं रही इसमें। इसमें अपनी गलती खत्म ही हो गई।

मुमुक्षु:- नहीं मेरा कहना क्या है (कि) राग कर्म में नहीं है?

पूज्य बाबूजी:- हाँ! कर्म में राग नहीं है। तो कर्म में राग नहीं है, तो (वो) कहाँ से राग पैदा करायेगा? कैसे राग पैदा करायेगा?

कोई व्यक्ति यूँ कहता है कि मुझे तुमको देखकर और एकदम क्रोध आता है। तो व्यक्ति तो यही कहेगा कि मैं क्या करूँ इसका? मैं तो भला आदमी हूँ भैया! मैं तो सद्चरित्र व्यक्ति (हूँ)।

परम उपकारी श्री सद्गुरुदेव की जय हो!
जिनवाणी माता की जय हो!

जिनवाणी-स्तुति
आत्मज्ञान में ही आत्मा की सिद्धि और प्रसिद्धि है।
आत्मज्ञान में ही भिन्नरूप विश्व की भी सिद्धि है ॥
आत्मज्ञान ही बस ज्ञान है आत्मज्ञान ही बस ज्ञेय है।
आत्मज्ञानमय ज्ञाता ही आत्मा ज्ञान-ज्ञेय अभेद है॥
दर्शाय सरस्वती देवीने किया परम उपकार है।
निजभाव में ही थिर रहूँ, माँ वंदना अविकार है॥
जिनवाणी के ज्ञान से सूझे लोकालोक।
सो वाणी मस्तक नमूँ, सदा देत हूँ ढोक॥

तत्त्वचर्चा 22 (15 फ़रवरी 1999)

पूज्य बाबूजी जुगल किशोर जी युगल, कोटा
तत्त्व-चर्चा नंबर २२, तारीख १५-२-१९९९
श्री शांतिभाई ज़वेरी निवास स्थान - नीलांबर, मुंबई

मुमुक्षु:- प्रश्न है 82(कि) स्वपरप्रकाशक विषय के जो प्रमाण हैं वो शास्त्र के आधार देकर थोड़ा सा विश्लेषण कीजिए।

पूज्य बाबूजी:- शास्त्र के तो बहुत आधार हैं।

मुमुक्षु:- बस! वही जानना चाहते हैं कि किन-किन शास्त्रों से कहाँ-कहाँ जो शास्त्रों का आधार दिया गया है (उससे) और इसका स्पष्टीकरण (थोड़ा) ज़्यादा हो जाए।

पूज्य बाबूजी:- अब इतना सारा तो नहीं हो सकेगा। पर पहला तो देखो नियमसार का है। नियमसार की गाथा है, १६४-१६५ इस तरह की हैं कुछ तीन-चार गाथायें। उनमें स्पष्ट है न बिल्कुल कि भगवान केवली निश्चय से अपने आत्मा को ही जानते हैं और जो लोकालोक है, परद्रव्य, उसको व्यवहार से जानते हैं।

व्यवहार की परिभाषा अपन समझते हैं सब। व्यवहार जब भी आवे ‘व्यवहार’ शब्द, तब सबसे पहले तो उसका निषेध करना कि ऐसा नहीं है। तो लोकालोक को व्यवहार से जानते हैं उसका अर्थ ये हुआ कि सचमुच लोकालोक जानने में नहीं आता लेकिन निश्चय से अपना आत्मा ही जानने में आता है। और उस आत्मा के जानने में ही लोकालोक समाहित हो जाता है। लोकालोक इसी में (समाहित है) क्योंकि आत्मा में ज्ञान है न! तो वो ज्ञान जगत के जितने भी ज्ञेय हैं, केवलज्ञान जगत के जितने भी ज्ञेय हैं, उन ज्ञेयों जैसे आकार से वो स्वयं स्वतः निरपेक्ष झप्ति से परिणमन करता है। और वो जो जिनको ज्ञेयाकार कहते हैं उसका अर्थ द्रव्य-गुण-पर्याय (है)। आकार का अर्थ व्यंजन-पर्याय नहीं लेना लेकिन द्रव्य-गुण-पर्याय (लेना)। उसमें सब कुछ आ गया।

तो जो कुछ उनके द्रव्य-गुण-पर्याय हैं, ठीक वैसी की वैसी रचना अपने ज्ञान में ज्ञानरूप करते हैं। ज्ञानरूप! इसलिए वो जो ज्ञानरूप रचना है कि जैसे लोक में उदाहरण के लिए अपन ये कहें कि ये मेरे सामने दीवार है। मैं दीवार को जानता हूँ - इसतरह का भीतर एक विकल्प ज्ञान में पैदा हुआ। तो मैं दीवार को जानता हूँ, इसको हम अगर दीवार की ओर से देखें तब तो यही कहा जाएगा कि ये दीवार को देख रहा है। इसका जो ज्ञान है वो दीवार को जान रहा है (अथवा)

82 स्वपरप्रकाशक के शास्त्र-प्रमाण। - 0.15 Mins दीवार को देख रहा है। लेकिन जब हम उसके अनुसंधान में उतरेंगे तो क्योंकि दीवार तो ज्ञान में है ही नहीं और ज्ञान जो जानता और देखता है, वो अपनी सीमा में जानता (और) देखता है।

ये बहुत बड़ी बात (है) याद रखने लायक (कि) ज्ञान जो जानता है वो अपनी सीमा में माने आत्मा की सीमा में (जानता-देखता है)। आत्मा जितना बड़ा है ज्ञान (भी) उतना ही बड़ा है। और ज्ञान का जितना भी परिणमन है वो परिणमन उसकी अपनी सीमा में ही होता है। इसलिए मैं दीवार को देखता हूँ अपने ज्ञान में, अपने ज्ञान से तो दीवार ज्ञान में है नहीं। तो क्या है फिर? कि ज्ञान में तो ज्ञान ही होता है। और ज्ञान में दूसरा कौन आयेगा? इसलिए वो सचमुच तो दीवार जैसा आकार, आकार माने द्रव्य-गुण-पर्याय (है कि) सफेद है, भारी है इत्यादि-इत्यादि। ये आकार अपने भीतर ही भीतर बनाता है, ज्ञानरूप-ज्ञानरूप, जाननरूप। तो वो जो उस दीवार जैसा जो उसको भीतर दिखाई दिया, तो वो ज्ञान का आकार उसको प्रतिभास कहते हैं। दीवार का प्रतिभास कहते हैं उसे। दीवार का (है -ऐसा) कहना भी व्यवहार है क्योंकि वो दीवार का नहीं है। वो प्रतिभास ज्ञान की अपनी चीज़ है। अच्छा! और वो प्रतिभास सारा का सारा ज्ञान का ही है, ज्ञानरूप है वो; माने वो प्रतिभास ज्ञान का ही बना हुआ है। इसलिए वो प्रतिभास जाननभाव स्वरुप भी है; माने (कि) वो जानता भी है वो प्रतिभास।

तो जानता भी वही है (और) जानने में भी वही आता है - तो ये बात निश्चय हुई। अब इसके अतिरिक्त हम जो भी बात कहेंगे कि वो लोकालोक को जानते हैं और हम जो हैं (वो) जगत के बाह्य पदार्थों को जानते हैं, तो वो सारी बात व्यवहार में चली जाएगी। और ये जो व्यवहार की जो बात अपन कहते हैं कि दीवार जानने में आई - ऐसा जो आया, तो दीवार की ओर से कहें तो सभी लोग ये कहेंगे कि हाँ! ये दीवार को जान रहा है। और मैं भी दीवार को जान रहा हूँ - ऐसा एक व्यवहारनयात्मक विकल्प इसके भीतर भी उठता है। आत्मदर्शन के बाद व्यवहारनयात्मक (विकल्प) है वो और आत्मदर्शन के बिना मिथ्यादर्शन है। तो वो जो जानने की बात जो आती है, तो उसकी ओर से कहें तो वो दीवार जानने में आई - ये भी स्वयं ज्ञान की ही पर्याय है। इसलिए वो जो परप्रकाशकता है वो स्वप्रकाशकता की ही पर्याय है।

परप्रकाशकता प्रथम तो है नहीं - पहली बात तो ये है। और यदि परप्रकाशकता कहें भी सही ज्ञेय पदार्थों की ओर से, क्योंकि जो निश्चय की बात है कि मेरे (को) तो सिर्फ ज्ञान जानने में आता है। ये हुआ न निश्चय? तो जो ज्ञान ही जानने में आता है, तो प्रतिसमय ये जो आकार पलटते हैं प्रतिसमय, तो ये आकार नहीं पलटने चाहिए। जब ज्ञान ही जानने में आ रहा है तो सिर्फ ज्ञान-सामान्य सपाट एकदम वही जानने में आना चाहिए। तो ये आकार प्रतिसमय क्यों पलटते हैं? क्यों ये चित्र-विचित्र रंग-बिरंगा ये क्यों होता है प्रतिसमय? तो इसका कारण है कि ऐसे के ऐसे पदार्थ जगत में बाहर विद्यमान हैं। तो इससे ज्ञेय की सिद्धि हो गई। और वो जो ज्ञेय हैं वो सारे के सारे ज्ञानरूप बनकर (ही) ज्ञान में आते हैं।

अब क्योंकि शास्त्र में कहा है कि आत्मा स्वपरप्रकाशक स्वभाववाला है। तो इसमें स्वपरप्रकाशक स्वभाव सिद्ध हुआ कि नहीं हुआ? कि वो जो ज्ञेय जैसे आकार हैं भीतर, उन ज्ञेय जैसे आकारों को हम ज्ञेय कहते हैं। हैं ज्ञान के आकार (ही), प्रतिभास जिसको कहते हैं। तो वो हैं ज्ञान के आकार और उनको हम ज्ञेय का आकार कहते हैं… जिनवाणी में भी कहा है, भगवान की वाणी में आया (कि) उनको ज्ञेय कहना। वो इसलिए कहा जाता है कि यदि उनको ज्ञेय न कहा जाए, तो वास्तविक बात समझ में नहीं आएगी। लेकिन तब कहा जाए कि जब ये समझ लिया जाए कि सचमुच ज्ञान ज्ञान को ही जानता है। आत्मा आत्मा को ही जानता है, अन्य को नहीं जानता है।

इस तरह आत्मदर्शन के बाद स्वभाव का दर्शन हो जाए कि ये जो ज्ञान है - ये ही मैं हूँ, ये ही ज्ञायक है और ये ही मैं हूँ। इस तरह जानकर और फिर भीतर ये विकल्प उठे कि मैं जगत को, लोकालोक को जानता हूँ। केवली भगवान को तो ऐसा होता नहीं (है) विकल्प। लेकिन अपने को होता है ऐसा विकल्प कि मैं लोकालोक को जानता हूँ, तो वो व्यवहारनय कहलाता है। तो प्रतिसमय जो वो अनेक आकार उस ज्ञेय जैसे हुए, उस ज्ञेय जैसे आकार को ही हम परप्रकाशकता के नाम से पुकारते हैं। क्योंकि यदि वैसा नहीं कहें और ये कहें कि ज्ञान ही जानने में आया तो फिर उत्तर नहीं बनता है। माने उसका वो जो प्रश्न किया है… मान लो कोई परमत वाला है, अन्यवादि है। वो ये कहेगा कि तुम्हारा ज्ञान तो ज्ञान को ही जानता है; और जगत को नहीं जानता है इसलिए तुम्हारे सर्वज्ञ भी नहीं हैं। तो हम कहेंगे कि हमारा जो ज्ञान है, केवली का जो ज्ञान है वो सारे लोकालोक को स्पष्ट जानता है। और ये जो प्रतिभास बनते हैं ये ठीक ज्ञेय जैसे बनते हैं।

तो ज्ञान जब अपने भीतर इतनी सामर्थ्य रखता है कि वो सारे लोकालोक के जो प्रतिभास हैं, वो अपने भीतर बना लेता है तो उसे बाहर जाने की कहाँ आवश्यकता पड़ी? तो वो जो प्रतिभास बने वो भी तो एक शक्ति है या नहीं? एक तो ज्ञान ज्ञान को ही जानता है ये हुआ - निश्चय। और दूसरा वो जो प्रतिभास बने वो भी है निश्चय ही क्योंकि वो ज्ञान ही है। लेकिन वो प्रतिभास बने तो ये प्रतिभास जो हैं वो व्यवहार की ओर से देखें तो व्यवहार से ये लोकालोक जानने में आया, इस तरह कह सकते हैं न उसको। क्योंकि ज्ञान ज्ञान को ही जानता है इतने से उत्तर नहीं होगा। कि (अगर) ज्ञान ज्ञान को ही जाने तो तुम्हारे (ज्ञान में) ये परिवर्तन नहीं होना चाहिए विविध प्रकार के, तरह तरह के। चित्र-विचित्र जो परिवर्तन होते हैं वो नहीं होने चाहिए। और ये परिवर्तन हुए तो इसका अर्थ यह है कि ऐसा का ऐसा लोकालोक जगत में विद्यमान है। और ज्ञान ने ठीक वैसा का वैसा लोकालोक अपने ज्ञान का बनाया है, अपने भीतर। (वो) अपने ज्ञान का बनाया है।

तो वो जो ज्ञान का लोकालोक बनाया, वो ज्ञान की एक ताकत हुई कि नहीं हुई वो? एक तो ज्ञान ज्ञान को ही जानता है ये तो केवल सपाट बात हुई। और एक वो जो प्रतिभास बने हैं अनेक, अनंतानंत सारे लोकालोक के, तो वो जो प्रतिभास बने वो भी ज्ञान की ताकत से ही बने हैं न? किसी दूसरे का उसमें कुछ नहीं (हैं) क्योंकि जो ज्ञप्ति है वो ज्ञप्ति (तो) निरपेक्ष होती है। इसलिए ये बिल्कुल निरपेक्ष बने हैं। तो ये भी एक स्वभाव हुआ कि नहीं हुआ? तो इस स्वभाव को हम परप्रकाशकता कह सकते हैं। लेकिन क्योंकि एक पर्याय के दो खंड नहीं होते हैं। वो प्रतिभास जो हैं वो सारी एक ही ज्ञान की पर्याय है वो। थोड़ा अलग हो ज्ञान, ज्ञान को जाननेवाला और ये प्रतिभासों को जाननेवाला (ज्ञान) अलग हो ऐसा नहीं है। क्योंकि प्रतिभास हर जीव में प्रतिसमय होते (ही) हैं। किसी न किसी पदार्थ (के) जैसे प्रतिभास हर समय माने निगोदिया से लगाकर भगवान केवली तक प्रतिसमय प्रतिभास होते हैं।

तो वो जो प्रतिभास बने (हैं) वैसे, ठीक ज्ञेयों जैसे, तो वो भी तो किसी शक्ति से बने हैं न, ज्ञान-शक्ति से। तो वो ज्ञान की उस शक्ति को हम परप्रकाशकता कहें तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन है वो ज्ञान की ही पर्याय। इसलिए अंत में जब अनुसंधान हम करते हैं तो उससे ये फलित होता है कि ज्ञान सचमुच ज्ञान को ही जानता है। और इसका अर्थ ये कि ये सबका सब ज्ञान ही है क्योंकि ये जो अनेक प्रकार के प्रतिभास और ज्ञेयों जैसे आकार हैं, तो इनमें कुछ भी नहीं है। इनको मैं अच्छी तरह टटोलता हूँ तो ज्ञान ही ज्ञान आता है, सब जगह से। सारे प्रतिभास में ज्ञान ही ज्ञान है। इस तरह मैं ज्ञान ही हूँ अर्थात् मैं ज्ञायक हूँ।

तो ज्ञान ही हूँ अर्थात् ज्ञायक हूँ - ये उसने पहले निश्चय किया था जिस समय इस प्रकरण पर वो चिंतन करता है, तो उसने पहले ये निश्चय किया कि मुझे प्राप्त क्या करना है? मैं हूँ कौन असल में? ये पहले निश्चय कर लिया था। इसलिए ये मैं ज्ञान को ही जानता हूँ और मैं ज्ञान ही हूँ, यहाँ वो अटकता नहीं है। अगर वो अटक जाए तो पर्याय दृष्टिवाला मिथ्यादृष्टि बन जाएगा यहाँ भी। ज्ञान ज्ञान को ही जानता है अगर यहाँ रुक गया और वो आगे नहीं बढ़ा ज्ञायक पर तो उसका निर्णय ठीक नहीं है प्रारंभ से। इसलिए प्रारंभ से निर्णय यह है कि मैं सचमुच चिन्मात्र ज्ञायक हूँ और मुझे उसी में अहम् करना है।

तो इसलिए प्रक्रिया ये है कि सचमुच जो ज्ञेयाकार हैं, वो ज्ञेयाकार नहीं हैं आत्मा में। लेकिन वो ज्ञानाकार हैं अर्थात् प्रतिभास हैं। अब वो जो प्रतिभास हैं वो सबके सब ज्ञान ही हैं। अर्थात् वो प्रतिभास जानते भी हैं और जानने में भी आते हैं। इस तरह स्वयं ही ज्ञेय और स्वयं ही ज्ञान (है)। तो ज्ञान ज्ञान को ही जानता है और ज्ञान ज्ञान को ही जानता हैं अर्थात् सब कुल मिलाकर मैं ज्ञान हूँ और ज्ञान (हूँ) अर्थात् मैं ज्ञायक हूँ। क्योंकि ज्ञान वास्तविक लक्षण है इसलिए ज्ञान से लक्षण पर नहीं रहा जाता है। कोई भी व्यक्ति अगर किसी वस्तु को पहचानता है, ढूँढता है और उसका लक्षण देखता है तो लक्षण से तुरंत हटकर और वो लक्ष्य पर अर्थात् आत्मा पर पहुँच जाता है। इसलिए मैं तो एकमात्र चिन्मात्र ज्ञायक ही हूँ, यहाँ आकर उसका पर्यवसान हो जाता है, समापन हो जाता है और ज्ञायक के दर्शन हो जाते हैं।

ये बात 83नियमसार में जो आई न और फिर दूसरा ये आया कि अगर ये कहें कि भगवान केवली लोकालोक को व्यवहार से जानते हैं और आत्मा को नहीं जानते (हैं) तो इसमें क्या दिक्कत है? कि कोई दिक्कत नहीं है। कि कोई दिक्कत नहीं है। लोकालोक को व्यवहार से जानते हैं अर्थात् वास्तव में नहीं जानते (हैं) उसमें ये लगाना है। उसमें जानना नहीं लगा लेना कि वे जानते हैं तो जानते ही होंगे वास्तव में। जानते नहीं, जानते भीतर है न! सारा लोकालोक जो है वो मान लो वो भीतर प्रतिभासित हो गया। तो अब उसको बाहर कहाँ जाने की जरूरत है? इसलिए सब यहाँ आ गया है न? इसलिए फिर उसमें आया कि जो एक को जानता है वो सबको जानता है। तो एक को जानता है माने? जिसने अपनी, जिस ज्ञान की पर्याय ने स्वयं उसी पर्याय को जाना तो उस पर्याय में अपने अनंत गुण (को), अपने द्रव्य (को जाना)। द्रव्य तो जिस समय अनुभूति होती है उस समय होता है। पर अनंत गुण, अनंत गुणों की अनंत पर्यायें और सारे लोकालोक की सारी पर्यायें वो सब उस एक ज्ञान की पर्याय में प्रतिभासित हो जाते हैं। इसलिए बाहर जाने की आवश्यकता बिल्कुल नहीं होती।

तो भगवान केवली व्यवहार से लोकालोक को जानते हैं उसका अर्थ ये हुआ कि वास्तव में लोकालोक जानने में नहीं आता लेकिन वो तो ज्ञान ही है सारा का सारा उस तरह का। और सब पृथक-पृथक क्योंकि पदार्थ पृथक-पृथक हैं। तो इसलिए सब पृथक-पृथक जानने में आता है सारा का सारा। और पृथक-पृथक जानकर भी अंत में क्या होता है? कि अंत में ये ही प्रक्रिया केवलज्ञान में ये ही होती है। विचार नहीं होता है केवलज्ञान में। लेकिन वहाँ तो सीधी ये ही प्रक्रिया (है) कि आत्मा हूँ, ज्ञायक हूँ - सीधी ये ही प्रक्रिया। क्योंकि वो जितने भी प्रतिभास हैं न केवलज्ञान में, अनंतानंत प्रतिभास, वो सब एक केवलज्ञान की (ही) पर्याय हैं। और वो उस केवलज्ञान की पर्याय का जो देवता है वो ज्ञायक है और ये है पुजारिन। ये पुजारिन है। तो भगवान का भी ये ही तरीका है। और अपन भले ही कम पदार्थों को जानें, कम पदार्थों को जानें अर्थात् कम पदार्थ प्रतिभासित हों लेकिन ज्ञान के जानने की विधि में निगोद से लगाकर केवलज्ञान तक कोई अंतर नहीं है। अंतर केवल मानने का और जानने का, मिथ्या मानना और मिथ्या जानने का है। और दूसरा कोई अंतर नहीं है।

इसलिए एक तो 84नियमसार में आई (ये बात कि) निश्चय से तो ये ही कहा (है) १६५वीं गाथा में कि स्वप्रकाशक ही है। इसलिए परप्रकाशकता… एक १७४ वीं गाथा में आया। इसमें प्रवचनसार (की) १७४ वीं गाथा में (आया) कि जैसे ये कहा जाता है कि अमूर्त आत्मा के साथ कर्म बंधते हैं, पुद्गल कर्म। तो जैसे ये व्यवहार है। वहाँ पर बंध की सिद्धि की जा रही है। तो जैसे जो

83 भगवान केवली लोकालोक को व्यवहार से जानते हैं और आत्मा को नहीं जानते हैं, तो इसमें क्या दिक्कत है? - 15.05 Mins

84 प्रयोग-पद्धति क्या है? -17.58 Mins अमूर्त है, आत्मा उसके साथ मूर्त कर्म बंधते हैं। तो कहते हैं (कि) ये व्यवहारनय है, ऐसा कहना व्यवहारनय है। वास्तव में आत्मा के साथ कर्म नहीं बंधते हैं पर कर्म के साथ ही कर्म बंधते हैं। आत्मा के साथ कैसे बंधेंगे कर्म? आत्मा के आसपास छाए रहें भले, वो तो उनके रहने की जगह है। लेकिन वो कर्म के साथ ही कर्म बंधते है, निश्चय तो ये है। लेकिन आत्मा के साथ बंधते हैं ये भी कहना चाहिए क्योंकि वो (उसका) भी एक कारण है, अन्यथा संसार की सिद्धि नहीं हो सकेगी।

तो जैसे ये कहा जाता है तो उसमें उदाहरण ये दिया है कि ये अमूर्त आत्मा के साथ मूर्त कर्मों का बंध कैसे होता है? तो उसके लिए आचार्य ने उदाहरण दिया कि जैसे अमूर्त आत्मा मूर्त पदार्थों को व्यवहार से जानता है। जैसे अमूर्त आत्मा मूर्त पदार्थों को व्यवहार से जानता है, उसी तरह अमूर्त आत्मा के साथ मूर्त कर्म व्यवहार से बंधते हैं। व्यवहार से बंधते हैं अर्थात् व्यवहारनय से ये कहा जाता है।

मुमुक्षुः- बहुत सुंदर! दोनों एक ही बात है?

पूज्य बाबूजीः- दोनों एक ही बात है। वहाँ ये उदाहरण लिया (है) जानने का कि अमूर्त जो है (वो) मूर्त को जानता है, जैसे ये व्यवहार है उसी तरह से ये व्यवहार है कि अमूर्त के साथ मूर्त का बंध हुआ है। है न?

अब २७० जो गाथा है, वो जिसमें लिया है कि मैं अन्य जीव को पीड़ा देता हूँ अथवा अन्य जीव की रक्षा करता हूँ अथवा मैं मनुष्य हूँ अथवा मैं ये धर्मास्तिकाय आदि को जानता हूँ। ये जो लिया है तो ये लिया है, इसको कहा अध्यवसान। अध्यवसान माने मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र - ये कहा है।

मुमुक्षुः- समयसार गाथा २७०।

पूज्य बाबूजीः- तो उसमें तीन बातें तो अपन स्वीकार कर ही लेते हैं कि मैं किसी की रक्षा करता हूँ - ये बात वास्तव में सही नहीं है। क्योंकि ऐसी बात आज तक जगत में, अनादि जगत में और अनंतकाल तक भी ऐसी एक घटना नहीं घटेगी कि कोई आत्मा किसी जीव को बचा ले अथवा उसकी रक्षा करे। ऐसी घटना घटी नहीं है और अनंतकाल में भी नहीं घटेगी, इसलिए ये बात मिथ्या है। इसी तरह से मैं किसी जीव को पीड़ा देता हूँ। तो कहते हैं कि ये पीड़ा देना भी सार्थक होता नहीं है, घटता नहीं है। ये भीतर ही भीतर इस तरह के मिथ्या विकल्प करता है लेकिन किसी ने आजतक किसी को पीड़ा दी हो - ये बात कतई झूठ है; इसलिए ये भी मिथ्या है।

मैं मनुष्य हूँ - ये बात भी झूठ है। क्योंकि मनुष्य के भीतर तो वो जो ज्ञायक है चिन्मात्र, वो भीतर पड़ा हुआ है। ये तो ऊपर का आवरण और ऊपर का चोला है। जैसे किसी घड़े के भीतर जो है, दीपक जलता है और ऊपर से ढका हुआ है (तो) इस तरह से चिन्मात्र ज्ञायक इसके भीतर पड़ा है रोम-रोम में लेकिन दोनों बिल्कुल न्यारे-न्यारे हैं। सदा से ही साथ रहे हैं क्योंकि तेजस-कार्माण शरीर तो संसार अवस्था में रहता है। इसलिए सदा से साथ रहे हैं लेकिन एकमेक कभी भी नहीं हुए।

इस श्रृंखला में जिसको महापाप कहा है, उस श्रृंखला में आचार्य ने लिया है कि ये मेरे (को) परद्रव्य जानने में आता है, धर्मास्तिकाय जानने में आता है - ये भी उसी कोटि का मिथ्यादर्शन है। समान कोटि का मिथ्यादर्शन (है) क्योंकि धर्मास्तिकाय धर्मास्तिकाय की जगह (पर) है और तेरा (ये) ज्ञान है वो तो आत्म-प्रमाण है। तो वो तो वहीं जानने की क्रिया करता है। तो वहाँ कौन है कि जो जानने में आता है? ज्ञान की सीमा में ज्ञान के भीतर कौनसा पदार्थ है कि जो जानने में आता है? कि जगत का कोई पदार्थ (ऐसा) नहीं है। और हमारे भीतर उत्पन्न होनेवाले मोह-राग-द्वेष ये भी ज्ञान के भीतर कभी आज तक आए (ही) नहीं (हैं) अनादिकाल से और वो बाहर ही रहे हैं। क्योंकि दो विपरीत तत्त्व हैं वो कभी एक नहीं हो सकते। उसका हेतु ये है, उसका reason (कारण) ये (है)। कि क्यों नहीं हुए? मोही-रागी-द्वेषी तो जीव को ही कहा जाता है, तो वो बात पुरानी हो गई। अब हम बहुत आगे बढ़ गए हैं क्योंकि अब प्रयोग-पद्धति पर चल रहे हैं। इसलिए मोह-राग-द्वेष ये भी उस ज्ञान से भिन्न ही हैं सदा। तो सब भिन्न-भिन्न हैं। और ये अज्ञानी जो है, उसको ये मानने में आता (है) कि मैं ही मोही-रागी-द्वेषी हो गया।

इसलिए आचार्य अनुभूति का जो प्रारंभ है वो यहाँ से करते हैं। कहाँ से करते हैं? कि ये जो उपयोग है प्रतिसमय चलनेवाला, ज्ञान की पर्याय, ये ज्ञान की पर्याय मोह-राग-द्वेष से सदा से (ही) न्यारी है। और मोह-राग-द्वेष के भाव, क्रोध-मान-माया-लोभ के भाव ये स्वयं हमारे अनुभव में आते हैं। आते हैं न? अनुभव में आते हैं। अनुभव में आते हैं, तो उस अनुभव में वो ज्ञान सिर्फ उनके स्वरूप को जानता है - सच्चाई तो यह है। ये ऐसा मानता है कि मेरा ज्ञान और मैं ही रागी-द्वेषी-मोही हो गया हूँ। तो वो जो संधि है दोनों में, एक तो चैतन्य अथवा ज्ञान और एक मोह-राग-द्वेष; इन दोनों के बीच में जो संधि है उस संधि को भंग करके और ये ये मान लेता है कि मैं मोही-रागी-द्वेषी हो गया हूँ।

तो ये तो अब ⁸⁵आचार्य शुरु कहाँ से करते हैं? प्रारंभ कहाँ से करते हैं जिनवाणी में? कि ये जो उपयोग है हमारा, ये भले कैसा ही इसने मानो अनादिकाल से। लेकिन मान लेने पर भी मोह का एक अविभाग-प्रतिच्छेद इसके ज्ञान में प्रविष्ट नहीं हुआ और आत्मा में प्रविष्ट नहीं हुआ। तो राग-द्वेष का एक भी अविभाग-प्रतिच्छेद इसके ज्ञान और आत्मा में प्रविष्ट नहीं हुआ। वो बाहर ही बाहर रहे हैं।

तो जिस समय सद्गुरुदेव के उपदेश से ये बात जानने में आई, तभी इसने उन मोह-राग-द्वेष को अलग किया - ऐसा नहीं (है)। क्योंकि जो अलग है उनको क्या अलग करें? वो तो अलग हैं न? इसलिए उनको अलग नहीं किया जाता। ये अलग-वलग करने का धंधा है, ये ज्ञान जैसा जो

85 आचार्य शुरु कहाँ से करते हैं जिनवाणी में? - 24.49 Mins महान तत्त्व है जगत का पूजनीय तत्त्व, वो ऐसा धंधा करेगा जो न्यारा-न्यारा करे किसी को? वो तो जो न्यारे हैं उनको तो एक किया नहीं जा सकता। और जो एक हैं उसको तोड़ा नहीं जा सकता, न्यारा नहीं किया जा सकता।

तो मोह-राग-द्वेष को न्यारा किया ये व्यवहार कथन है। आता है न! आता (है) जिनवाणी में आता है, भगवान की वाणी में आता है कि मोह-राग-द्वेष छोड़े (या) मोह-राग-द्वेष को अलग किया। लेकिन सच्चाई ये है कि मोह-राग-द्वेष और ये उपयोग चलनेवाली ज्ञान की पर्याय, उसमें मोह-राग-द्वेष का प्रवेश कभी हुआ (ही) नहीं (है)। वो सचमुच स्वच्छ ही रही है हमेशा से लेकिन निर्मल नहीं हुई। क्योंकि मिथ्याज्ञान है न! उसमें इसने ये कल्पना की कि मोह-राग-द्वेष जैसा आभास ये जो ज्ञान में होता है, तो ये मेरा ज्ञान मोही-रागी-द्वेषी हो गया। तो इसने ज्ञान को और मोह-राग-द्वेष को मिलाकर अनुभव किया (वह) इस तरह निरंतर अशुद्धात्मा का अनुभव करता रहा।

तो क्या हुआ? कि जब गुरुदेव के प्रसाद से ये बात मिली और उन्होंने ये बताया कि मोह-राग-द्वेष तेरे ज्ञान से, तेरी वर्तमान ज्ञान की पर्याय से… आत्मा से तो (भिन्न) हैं ही सही। पर तेरी वर्तमान ज्ञान की पर्याय से भी ये सब न्यारे ही हैं, तेरे उपयोग से। सदा से न्यारे हैं।

तो ऐसा जब उसने न्यारा जाना कि तो ये जो उपयोग है ये मोह-राग-द्वेष में जो अहम् करता था, उनका ये अवलंबन लेता था निरंतर, तो उनका अवलंबन तोड़कर अब कौन बचा? कि सारे जगत से तो लौट ही आया था वो। अब तो अपने मोह-राग-द्वेष की बात कर रहा था कि ये तो मेरे में ही पैदा होते हैं। इसलिए मोह-राग-द्वेष वो मेरे ही हैं और मैं ही मोही-रागी-द्वेषी हूँ। ये मेरे कर्म और मैं इनका कर्ता, ऐसा कर्ता-कर्म भी जोड़ता था। अब जब समझ में आया, तो मोह-राग-द्वेष मेरे से न्यारे ही भाव हैं। इनको न्यारा करना नहीं है बल्कि ये न्यारे ही पड़े हैं - ऐसा जानकर अब एक सिर्फ ज्ञायक ही बचता है। इसलिए मोह-राग-द्वेष से छूटकर ज्ञायक पर चला जाता है। और उनका भी वही है स्वपरप्रकाशक में कि केवल उनके स्वरूप का प्रतिभास ही होता था। क्योंकि हमारे अनुभव में आते हैं न निरंतर? ये मेरे (को) राग आया, द्वेष आया, पुण्य आया, पाप आया। ये अनुभव में आते हैं न! तो ये आया, तो अनुभव में आया कि अर्थात् ज्ञान था अलग और वो अलग।

मुमुक्षुः- आहाहा! इस प्रकार था।

पूज्य बाबूजीः- अनुभव में आया। इस तरह है बात तो है असल में। लेकिन इसने दोनों को एकमेक करके अनुभव किया इसलिए अशुद्ध अनुभूति इसको हुई। और ये महा अपराध है ज्ञान के लिए। इसलिए अपराध है कि इसने सारे जगत के जीवों को, जो (कि) परमशुद्ध हैं एकदम; एकदम परमशुद्ध (हैं कि) जिनमें विकार का नाम-निशान भी नहीं है और जिनमें परिणमन है ही नहीं। परिणमन का भी जिनमें नाम-निशान नहीं है। इस तरह परिणमन भी नहीं (है) और कोई मिलावट भी नहीं (है)। ऐसा जो जीव नाम का जो परिशुद्ध तत्त्व है वो सारे जीवलोक को इसने अशुद्ध कर दिया। इसलिए ये महान अपराधी हुआ और उस अपराध के कारण इसको नरक और निगोद की सजा होती है।

तो वो जो प्रतिभास है उनका वो तो प्रतिभास ज्ञान हो गया क्योंकि उसने मोह-राग-द्वेष को नहीं बल्कि उनके प्रतिभासों को, अपने द्वारा बनाए गए जो ज्ञान के प्रतिभास हैं उनको जाना। और उनको जानकर कि ये इनमें क्या है? ये तो मोह-राग-द्वेष हैं ही नहीं, ये तो ज्ञान ही है। और ज्ञान ही है अर्थात् ये तो मैं ही हूँ, ज्ञायक ही हूँ। इस तरह जानकर एक छलांग मारकर ज्ञायक पर चला जाता है और आत्मदर्शन हो जाता है। बस! ये उसका एक छोटा सा तरीका है। छोटा सा तरीका है।

बात तो अपनी स्वपरप्रकाशक की है पर ये प्रयोग-पद्धति है ये। ये प्रयोग-पद्धति है। क्योंकि ये चूका कहाँ है? किस जगह चूका है ये? कि ये यहाँ चूका है। ये आत्मा को सदैव अशुद्ध ही अनुभव करता है क्योंकि ये देखो हो रहे हैं न मेरे को मोह-राग-द्वेष। ये मेरे को ही तो हो रहे हैं। पर ये मेरे को हो रहे हैं, इसमें भी संधि है। मैं और मोह-राग-द्वेष, मेरे (में) और मोह-राग-द्वेष (में) इनमें संधि है बीच में। संधि है इसलिए वो न्यारे हैं।

तो न्यारा जानना (है) सिर्फ, न्यारा करना नहीं (है)। ये करने का धंधा ज्ञान कभी करता नहीं है। वो उसने उनको ग्रहण किया हो तो वो उनको छोड़ेगा। पर उसने मोह-राग-द्वेष को ग्रहण ही नहीं किया तो ये द्वेष छोड़ेगा कहाँ से? इसलिए छोड़ने और ग्रहण करने का काम, त्याग करने का काम आत्मा नहीं करता। त्याग का तो नाम लिया जाता है खाली। बाकी त्याग करे तो ज्ञान, आनंद और सुख का करे क्योंकि उसके भीतर तो वही है। वो मोह-राग-द्वेष तो हैं ही नहीं। तो आत्मा को अगर त्यागी कहा जाए तो आत्मा अजीव हो जाएगा। क्योंकि वो क्या छोड़ेगा? उसके पास मोह-राग-द्वेष तो (हैं नहीं, वो तो) छूटे हुए ही हैं। वो तो न्यारे के न्यारे ही हैं। अब कहते हैं (कि) उसने छोड़ा। (तो) छोड़ा, तो फिर उसके पास होगा वही छोड़ा उसने। तो वो अचेतन और जड़ हो जाएगा।

इसलिए प्रयोग-पद्धति का संक्षेप ये है कि उसने मोह-राग-द्वेष का प्रतिभास… प्रतिभास माने ठीक वैसा का वैसा जानना। वैसा का वैसा जानना! जैसा मोह-राग-द्वेष का स्वरुप है कि ये ममत्व करता है - ऐसा; ऐसा का ऐसा जानना। तो ये जाना तो ये ज्ञान ही है और इसमें मोह-राग-द्वेष न होने के कारण इस ज्ञान में कोई विशेषता नहीं है। विशेषता तब हो कि जब मोह-राग-द्वेष ज्ञान में मिल जाएँ, तब तो विशेषता हो जाए। लेकिन विशेषता इसलिए नहीं है कि जिधर से देखता हूँ ज्ञान ही ज्ञान मिलता है। मोह-राग-द्वेष कहीं भी नहीं मिलते हैं।

तो इसलिए मोह-राग-द्वेष से न्यारा मैं सदा ही चिदानंद चैतन्य ज्ञायक हूँ - ऐसा जानकर एकदम छलांग मारकर, ज्ञायक पर चला जाता है। क्योंकि ज्ञायक को पहले इसने गुरुदेव से सुना (और) सुनकर उस पर विचार किया। और (फिर) ये इस निर्णय पर पहुँचा कि इससे समृद्धिशाली तत्त्व जगत में दूसरा नहीं है। तो दूसरा तत्त्व नहीं है जगत में समृद्धिशाली। तो ऐसी उसकी समृद्धियों पर मुग्ध हुआ। और वो तब मुग्ध हुआ कि जगत की जो समृद्धियाँ हैं ये तो बिल्कुल क्षणभंगुर हैं। ये तो मैंने अपनी आँखों देखी हैं। इसलिए कोई ऐसी चीज मिलना चाहिए कि जिसका कभी व्यय न हो, कभी जिसका नाश न हो।

तो वो जब गुरुदेव से सुना तो गुरुदेव ने बताया कि इसका नाश कभी होता नहीं, इस समृद्धि का। इस समृद्धि का भोग तू निरंतर करे… माने भोजन करे और भोजन उतना का उतना (रहे)। भोजन में थोड़ा भी कम न हो। तो निरंतर भगवान सिद्ध जो भोजन करते हैं उस ज्ञान-आनंद का और वो भोजन उतना का उतना (रहता है)। वो बीतता ही नहीं है। इस तरह अटूट है वो, एक तरह से। इस तरह अटूट है। तो इस तरह से वो सिद्धि हो जाती है।

और वो जो ⁸⁶२७१ वाँ कलश है। २७१ है न कलश! तो उसमें तो कमाल ही किया राजमल जी साहब ने। बोले (कि) ये जो कहा जाता है कि वो ज्ञान लोकालोक को जानता है… तो कहते हैं (कि) ऐसा है तो नहीं - ये भ्रांति है। अब इसमें भी क्या कहेंगे? कि ये भ्रांति है। भ्रांति है माने झूठा है, झूठ है। भूला है ये। ये बिल्कुल विपरीत है माने। भ्रांति विपरीत को कहते हैं।

तो ये भ्रांति है अर्थात् ये बिल्कुल विपरीत मानता है। सचमुच लोकालोक जानने में नहीं आता क्योंकि ज्ञान और आत्मा की जगह आत्मा और ज्ञान ही हैं। और कोई न तो ये बाहर जाता है और न कोई बाहर का पदार्थ इसमें आता है। तो ये ही रहते हैं और जानने का कार्य होता ही है। तो जानने का कार्य होता है तो वहाँ पर कोई कर्म भी होता है और कोई कर्ता भी होता है। तो कौन हुए कर्ता-कर्म? तो ज्ञान ही कर्ता और ज्ञान ही कर्म। माने ज्ञान ही जानने में आया और ज्ञान ने ही (अर्थात्) उस प्रतिभास ने (ही) जाना।

मुमुक्षुः- आहाहा! उस प्रतिभास ने जाना?

पूज्य बाबूजी:- हाँ! केवली के जो अनंत प्रतिभास हैं, वो अनंत प्रतिभास सिर्फ एक ज्ञान की, केवलज्ञान की पर्याय है। ये है केवली का जो calculation (गणना) है वो कि वो सिर्फ एक केवलज्ञान की पर्याय है। और वो केवलज्ञान की पर्याय वो अनंत प्रतिभास सहित उस शुद्धात्मा में डूबती है। प्रतिभास नहीं मिटते हैं। प्रतिभास तो प्रतिसमय बनते ही रहेंगे, जब तक ये लोकालोक है तब तक। वो तो बनते ही रहेंगे। पर उन प्रतिभासों सहित अर्थात् ज्ञान के उन आकारों सहित वो उस ज्ञायक में डूबती है सदा (ही और) उसकी उपासना करती है। इस तरह भगवान सिद्ध जो करते हैं वो ही काम हमारा है।

तो यहाँ श्रुतज्ञान ने किया वो काम वहाँ केवलज्ञान ने कर लिया। तो ये श्रुतज्ञान जो है वो भगवान सिद्ध से कम न होने के कारण ये कहा गया (है) कि सम्यग्दृष्टि का अपनी आत्मा को

86 २७१ वाँ कलश - समयसार कलश-टीका। - 33.53 Mins जानने वाला ज्ञान सिद्धों के समान शुद्ध होता है। माने वहाँ राग-द्वेषादि पड़े रहते हैं। वो तो रहेंगे ही सही मोह-राग-द्वेष तो, साधक दशा में। तो साधक दशा में पड़े रहने पर भी उनकी अनुभूति नहीं होती क्योंकि इसका विषय एक मात्र शुद्ध ज्ञायक है। शुद्ध चिन्मात्र है इसका विषय। तो जो विषय होता है वही उसका नाम होता है ज्ञान का।

ज्ञान का नाम क्या है? शुद्धनय। शुद्धनय क्यों कहा गया? ज्ञान तो शुद्ध ही है असल में देखा जाए तो। ज्ञान में क्या खराबी आई? लेकिन शुद्धनय क्यों कहा गया? क्योंकि इसका विषय जो है (वो) शुद्ध ज्ञायक है, तो शुद्ध कहा गया।

केवल वो भ्रांति है। भ्रांति अर्थात् है मैं मोही-रागी-द्वेषी हो गया हूँ। इतनी सी भ्रांति है सिर्फ इतनी सी। एक वाक्य जितनी कि मैं मोही-रागी-द्वेषी हो गया। कहते हैं पलट दे इसको एकदम और इससे उल्टा बोलने लग जा। और (उसमें) केवल ‘नहीं’ लगा दे। उसमें क्या (है)? वाक्य तो वो का वो ही रह जाएगा। मैं मोही-रागी-द्वेषी हो गया (उसको पलटकर) कि मैं मोही-रागी-द्वेषी नहीं हुआ। मैं चिन्मात्र ज्ञायक हूँ - बस हो गया। काम बन गया।

इस तरह के अच्छे-अच्छे प्रमाण हैं, पढ़ना। २७० गाथा में तो बहुत कमाल किया है। बहुत कमाल किया है। माने उस पंक्ति में ही लिया है वो। वो जो महापाप है न बचाने का (और) मारने का। मैं मनुष्य-तिर्यंच-देव-नारकी हूँ - इस तरह का ये उस line (पंक्ति) में ये लिया है कि ये मेरे को जगत जानने में आता है। मेरे को धर्मास्तिकाय जानने में आता है। उस पंक्ति में इस जानने को लिया है और उतना ही बड़ा पाप है जैसे वो मिथ्यात्व है, उसी तरह ये भी मिथ्यादर्शन है।

मुमुक्षुः- जैसे कि अशुभभाव का तीव्र स्वरुप और पर को जानने का स्वरुप - एक ही प्रमाण है।

पूज्य बाबूजीः- शुभभाव-शुभभाव। पर उधर, उधर उन सबका जो जनक है, पिता, वो पड़ा (है) मिथ्यादर्शन। इसलिए वो सबको पाप कर देता है। तो वो पड़ा (हुआ) है क्योंकि मैं जानता हूँ (ऐसा जीव मानता है)।

अब उसका सबसे अच्छा प्रमाण ये कि जगत के सारे जीवों को ये श्रद्धा है और ये ज्ञान भी है कि हम जगत को जानते हैं। ये जगत के पदार्थ हमारे जानने आते हैं। तो अगर ये श्रद्धा सच्ची होती तो फिर मुक्ति अवश्य होती। क्योंकि एक ही विषय हो लेकिन वो perfect (निष्कलंक) हो, तो वो जो है वो ज्ञायक की अनुभूति के calculation (गणना) में जाता है।

तो अगर ये श्रद्धा सच्ची होती तो फिर सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान क्यों नहीं होते? लेकिन हुए क्या? तो नहीं हुए। तो हमको तो इससे ही जान लेना चाहिए कि आज तक ये काम हमारे इस तरह से जानने से और ऐसी श्रद्धा से नहीं हुआ… तो इसका अर्थ ये है कि इससे उल्टा है कोई और इसको (जो है वो) उल्टा कर देना चाहिए। तो उसको उल्टा कर दे, सीधा है। उल्टा कर देता है तो ज्ञायक के दर्शन सीधे हो जाते हैं।

इस तरह परप्रकाशकता भी सिद्ध हो जाती है। सिद्ध हो जाती है लेकिन फिर भी वो स्वप्रकाशकता की ही पर्याय है और वो है व्यवहार। स्वपरप्रकाशक शक्ति जो कही है, तो वो भी तो एक शक्ति है न, कि जो प्रतिभास (हैं) जो सारे जगत जैसे हुऐ… वो भी एक इसने अपनी ताकत से बनाए हैं कि नहीं? और सामान्य से देखा जाए तो ज्ञान है।

मुमुक्षुः- सामान्यरूप से देखा जाये तो…

पूज्य बाबूजीः- ज्ञान है। ज्ञान को ही जानता है - (बस) हो गया स्वपरप्रकाशक और शक्ति हो गई वो। शक्ति नहीं होती तो कैसे बनाता? केवल एक केवलज्ञान की पर्याय (है और) इतने प्रतिभास अनंतानंत। एक भगवान अरिहंत का केवलज्ञान (है), अभी सिद्ध भी नहीं हुए। वो भगवान अरिहंत का केवलज्ञान अपने को तो सबको जानते ही है, सारे अपने आत्मप्रदेशों को भी जानते हैं और सारे गुण-पर्याय सबको जानते हैं। अब उधर जो अनंत सिद्ध हैं, उनके जो अनंत केवलज्ञान हैं और उन वो अनंत केवलज्ञानों में जो भासित हो रहा है, उसको भी ये एक केवलज्ञान जानता है भगवान अरिहंत का।

मुमुक्षुः- Calculation (गणना) करना मुश्किल हो जाए!

पूज्य बाबूजीः- मुश्किल हो जाए। क्या calculation (गणना) करे?

मुमुक्षुः- कितनी सामर्थ्य!

पूज्य बाबूजीः- माने सबके केवलज्ञान अनंत, वो अनंत केवलज्ञान क्या जान रहे हैं? कि जैसा ये जान रहा है। तो ये उन अनंतों के केवलज्ञान को भी जानता है लेकिन जानता अपना ज्ञान बनाकर (है)।

मुमुक्षुः- बराबर! अपना ज्ञान बनाकर।

पूज्य बाबूजीः- अपना ज्ञान बनाकर, उनके केवलज्ञान से कुछ नहीं लेता है। हाँ! जरा भी ज्ञेयकृत अशुद्धता कभी आती नहीं है। उनका केवलज्ञान जरा कारण नहीं है इसके केवलज्ञान में। इसी तरह श्रुतज्ञान में भी कोई कारण नहीं है। जिस समय ये आत्मानुभूति पर जाता है, तो (उस समय) कोई कारण नहीं है। रागादिक की अनुभूति होती ही नहीं है। एकमात्र सुख की और आनंद की अनुभूति होती है, एकमात्र। इसलिए उस समय वो बिल्कुल सिद्ध जैसा है; कोई फर्क नहीं है।

मुमुक्षुः- ये 87कर्ता-कर्म की प्रवृत्ति की बात आती थी न?

पूज्य बाबूजीः- कर्ता-कर्म की प्रवृत्ति आती है न! कि वो जो जैसे छठवीं गाथा में जो आया है पहला कि ज्ञेयाकार अवस्था में जो ज्ञायकरूप से जानने में आया। ये आया न! वह स्वरूपप्रकाशनकी (स्वरूपको जाननेकी) अवस्थामें भी कर्ता-कर्मका अनन्यत्व होनेसे ज्ञायक ही है। अब ये बहुत बड़ी बात हो गई ये कि स्वरूप-प्रकाशन की अवस्था में तो वो ज्ञायक है ही सही क्योंकि उस समय आत्मा जानने में आ रहा है। लेकिन ज्ञेयाकार अवस्था में जो

87 छठवीं गाथा की चर्चा। - 42.12 Mins ज्ञायकरूप से जानने में आया, तो यहाँ स्वरूप-प्रकाशन की अवस्था में भी, स्वरूप-प्रकाशन की अवस्था में जैसे ये ज्ञायक है और ज्ञायक ही जानने में आया, उसी तरह वहाँ ज्ञेयाकार अवस्था में भी वो (ज्ञायक ही) जानने में आया है। हाँ! इसलिए वहाँ भी कर्ता-कर्म का अनन्यत्त्व है। वहाँ ये ज्ञाता और वो जगत के पदार्थ कर्म - ऐसा नहीं है। लेकिन वहाँ भी ये ही ज्ञाता और ये ही ज्ञेय। ज्ञेयाकार अवस्था में जो ज्ञायकरूप से जानने में आया, वो बहुत गंभीर लाइन है वो। ज्ञेयाकार अवस्था कही आचार्य ने क्योंकि वो ज़्यादा लंबाना नहीं है।

तो वो ज्ञानाकार है असल में तो। पर ज्ञेयाकार कहा आचार्य ने तो उससे सब समझ जाते हैं समझनेवाले कि ज्ञेयाकार माने ज्ञेय जैसे आकार। तो उस अवस्था में भी जो जानने में आया तो वो ज्ञायक ही जानने में आया है। और ज्ञायक जानने में आया इसका अर्थ यह है कि अज्ञानी तो ये मानता है कि ज्ञेय मेरे जानने में आते हैं। तो ज्ञेय मेरे जानने में आते हैं तो मैं तो कर्ता और ज्ञेय मेरे कर्म। इस तरह कर्ता और कर्म का अन्यत्व जानता है। और कर्ता और कर्म का principle, सिद्धांत यह है कि वो कर्ता-कर्म अनन्य होते हैं। एक ही पदार्थ में रहते हैं। वरना तो कर्ता और कर्म का ढूँढना ही मुश्किल हो जाएगा जगत में कि कौन कर्ता (है) और कौन कर्म (है)?

जैसे ये तो कर्ता बना और जगत के अनंत पदार्थ हैं उनमें से कर्म किसको बनाएगा? इसलिए वो नहीं है लेकिन अनन्यत्व होता है। अर्थात् एक ही पदार्थ में कर्ता और कर्म होते हैं। और वो जो कर्ता है वो कर्म में व्यापक होता है, व्यापक। वो भी है (तो) व्यवहार वो। है व्यवहार लेकिन बताने के लिए बहुत आवश्यक है वो कहना कि वो उसमें व्यापक होता है। अर्थात् वो जो शुद्ध तत्त्व है शुद्धात्मा, वो उस कर्म में व्यापक होता है और वो व्याप्य होता है। तो ये कर्ता-कर्म का अनन्यत्व का principle (सिद्धांत) है ये।

तो इसी तरह यहाँ पर ज्ञेयाकार अवस्था में जो ज्ञायकरूप में जानने में आता है, तो वहाँ भी स्वरूप-प्रकाशन की तरह कर्ता-कर्म का अनन्यत्व है। जैसे स्वरूप-प्रकाशन में मैं ही ज्ञाता और मैं ही ज्ञेय (है), उसी तरह वहाँ ज्ञेयाकार अवस्था में भी मैं ही ज्ञाता (और) मैं ही ज्ञेय। ऐसा कर्ता-कर्म का अनन्यत्व होता है। और वो कर्ता-कर्म का अनन्यत्व विचार में आया हमारे, तो वहाँ तक तो विकल्प है। तो उस विकल्प पर वो ठहरता नहीं है। उस विकल्प को तोड़कर मैं ही ज्ञायक, बस! वहाँ पहुँच जाता है।

मुमुक्षु:- ओहोहो! विकल्प को तोड़ने की चेष्टा ये है कि - मैं ही ज्ञायक।

पूज्य बाबूजी:- मैं ही ज्ञायक हूँ, बस। उसमें कर्ता-कर्म… मैं कर्ता और ये कर्म - इस विकल्प से क्या मिलनेवाला है तेरे को? इससे क्या उपलब्धि होनेवाली है? कोई उपलब्धि नहीं होगी। इसलिए मूल चीज यहाँ से शुरू करना कि मेरा जो उपयोग है, ज्ञान पर्याय। ये ज्ञान पर्याय मेरी वास्तव में स्वच्छ है बल्कि शुद्ध है (ऐसा) एक बार विचार करे सच्चे मन से। गुरुदेव की देशना के अनुसार ये विचार करे कि ये सचमुच मेरी ज्ञान पर्याय में आज तक मैंने जो माना और मैंने जो कल्पनायें कीं, उनमें से कोई चीज मेरी ज्ञान पर्याय में नहीं आई। ना तो परपदार्थ आये और ना मेरे मोह-राग-द्वेष आये। तो नहीं आए इसका अर्थ ये है कि मेरी पर्याय तो शुद्ध रही।

जब मेरी पर्याय ज्ञान पर्याय शुद्ध है तो फिर मेरा ज्ञान गुण भी शुद्ध है और मैं ज्ञायक भी शुद्ध हूँ। क्योंकि ज्ञान पर्याय में ही ये भ्रम पैदा होता है। क्योंकि जानने का काम (तो) उसमें होता है न! और तो गुण जो है वो जाननेरूप परिणमित होते नहीं (हैं)। आत्मा जो है ज्ञायक, वो जाननेरूप परिणमित होता नहीं (है) क्योंकि वो तो ध्रुव है। इसलिए ज्ञान की पर्याय में ही ये भ्रम पैदा होता है कि कोई आ गया (है) जैसे। जैसे हमें भी भय-चिंता शोक-क्लेश इत्यादि जो होते हैं अथवा मेरे ऊपर बहुत संकट है - ऐसा जो हम अनुभव करते हैं तो उसमें क्या भ्रम पड़ा है? उसमें भ्रम ये है कि मेरे भीतर कोई आ गया है। कोई संकट आ गया है मेरे भीतर। जबकि ज्ञान पर कोई संकट आता नहीं है क्योंकि उसकी रेखा ही ऐसी है कि उसका उल्लंघन कोई नहीं कर सकता। इसलिए कोई संकट उसमें नहीं आता है।

तो शुरु 88यहाँ से किया उसने कि सचमुच ये जो पर्याय है न, ज्ञान की पर्याय… इस पर्याय में मेरी कल्पनायें भी प्रविष्ट नहीं हुईं। माने मेरी कल्पनाओं के विषय तो प्रविष्ट हुए ही नहीं, पर मेरी कल्पनायें भी इसमें साकार होती नहीं हैं। वो भी प्रविष्ट नहीं हुईं इसलिए मैं तो शुद्ध ज्ञान हूँ - अब बोलेगा वो (ऐसा)। अभी है (तो) विकल्पदशा इसलिए मैं शुद्ध ज्ञान हूँ। और ये जो ज्ञान है माने ये जो ज्ञान की पर्याय है जिसको अनुभूति कहते हैं, ये ज्ञान की पर्याय ज्ञायक ही है।

मुमुक्षुः- वाह रे वाह! बहुत सुंदर!

पूज्य बाबूजी:- तो ज्ञायक पर चला जाता है। ज्ञायक को तो लक्ष बनाना ही है शुरु में, प्रारंभ में। जब तक उसको लक्ष नहीं बनाएगा तो ये बीच में अटक जाएगा। और किसी भी विकल्प में फँसकर और मिथ्यात्व का वमन नहीं कर सकेगा।

मुमुक्षुः- माने अनुभव को लक्ष नहीं बनाना है, ज्ञायक को बनाना है।

पूज्य बाबूजी:- अनुभव को नहीं बनाना, हाँ। और किसी विकल्प को माने अपने ही संबंध में होने वाले (विकल्प) स्वरुप-प्रकाशन में, जैसे (कि) मैं ही कर्ता और मैं ही कर्म… कि इससे क्या सिद्धि है तेरी? तुझे ज्ञायक का अनुभव (करना है), उसका आनंद लेना है या तुझे ये उल्टी-सीधी बातें करना है? मैं कर्ता और ये मेरा कर्म इससे तुझे क्या मिलनेवाला है? कुछ मिलेगा नहीं।

इसलिए सचमुच मैं तो ज्ञायक ही हूँ, चिन्मात्र हूँ, चैतन्य हूँ। बस! ऐसा जानता हुआ उसका जो स्वरुप है उसमें एकदम लीन हो जाता है। बल्कि लीन क्या हो जाता, उसको अपनी पर्याय में उतार लेता है। वो तो वहीं का वहीं रहता है। हाँ! क्योंकि पर्याय में होती है न अनुभूति। वो अनुभूति होती है (कि) मैं ज्ञायक हूँ, तो वो ज्ञेयाकाकार होती है अनुभूति।

मुमुक्षुः- वाह रे वाह! Masterpiece. बहुत सुंदर!

88 जीव शुरुआत कहाँ से करता है? - 47.51 Mins पूज्य बाबूजी:- वहाँ नहीं जाती (है) पर्याय भी। पर्याय द्रव्य को छूने, ज्ञायक को छूने नहीं जाती है। क्योंकि होता तो ऐसा है, ज़्यादातर तो यूँ आता है न प्रवचनों में तो कि वो ज्ञायक का अवलंबन लेती है। अब अवलंबन का अर्थ हम सीधा ये समझते हैं कि पर्याय ने द्रव्य का अवलंबन लिया है। पर पर्याय तो द्रव्य को छूती नहीं है। तो (फिर वो) क्या करती है? कि वो स्वतंत्ररूप से उसकी शान ये है, गरिमा कि - वो स्वतंत्ररूप से जैसे अन्य पदार्थों जैसी रचना करती थी, उसी तरह वही principle (सिद्धांत) यहाँ लागू होता है कि वो जो ज्ञायक है, ध्रुव तत्त्व वो भी पर्याय में नहीं आता… ज्ञान की पर्याय में, श्रुतज्ञान की पर्याय में। लेकिन वो श्रुतज्ञान स्वयं ज्ञायक जैसे स्वरूप, वो उस स्वरूप का आकार बनाता है। वो स्वरूपाकार प्रवर्तित होती है। और स्वरूपाकार प्रवर्तित होती है इसी का नाम अनुभूति है कि मैं ज्ञायक हूँ।

वो अनुभूति ‘मैं अनुभव कर रहा हूँ’ - ऐसा नहीं बोलती। मैं ज्ञायक हूँ बस, ऐसा। तो इस तरह जो पर्याय है वो भी मानो द्रव्य बन गई है। उस पर्याय ने अपना एक-एक चप्पा-चप्पा खाली कर दिया है ज्ञायक के लिए और सारी पर्याय में ज्ञायक पसर गया। इसलिए अनुभूति गायब हो गई। तो अनुभूति में अनुभूति भी नहीं दिखाई देती है। शुद्धनय में शुद्धनय भी नहीं दिखाई देता क्योंकि शुद्धनय स्वयं पर्यायार्थिकनय का विषय है।

मुमुक्षु:- Masterpiece! बहुत सुंदर! शुद्धनय स्वयं पर्यायार्थिकनय का विषय है।

पूज्य बाबूजी:- स्वयं पर्यायार्थिकनय का विषय है शुद्धनय। अनुभूति स्वयं पर्यायार्थिकनय का विषय है। इसलिए वहाँ तो पर्यायार्थिकनय चलता ही नहीं है। तो इसलिए ये पर्याय जो है वो ज्ञायकाकार होकर मैं ज्ञायक… ज्ञायक भी नाम है। असल में तो स्वरुप का जो निर्णय किया चिन्मात्र, चैतन्यमात्र उसमें ये उस पर्याय में ये लीनता होती है। उसकी लीनता होती है। नाम से अनुभव नहीं होता है। नाम से, आकारों से तो खैर होता ही नहीं है। लेकिन नाम से भी अनुभूति नहीं होती (है) कि द्रव्य है अथवा ज्ञायक है अथवा जीवास्तिकाय है, कोई भी (नाम) बहुत नाम हैं। उनसे नहीं होती है अनुभूति।

मुमुक्षु:- भासन से होती है।

पूज्य बाबूजी:- भासन से होती है। उसका जो भाव है उसमें ये लीन हो जाता है, चिन्मात्र। तभी विकल्प निरस्त होते हैं सारे के सारे, वरना वो विकल्प बना रहेगा।

मुमुक्षु:- बराबर! (कि) ज्ञायक (हूँ)!

पूज्य बाबूजी:- हाँ! इसलिए एक मात्र चिन्मात्र हूँ, बस! इतना भासन होता है। ये सार है स्वपरप्रकाशक का।

मुमुक्षु:- अद्भुत! बाबूजी अद्भुत स्पष्टीकरण! क्या जानने का अर्थ है! अद्भुत!

पूज्य बाबूजी:- और सारी बातें व्यवहार की हम स्वीकार कर लेते हैं कि जैसे व्यवहार सम्यग्दर्शन (वो है कि) सच्चे देव-शास्त्र-गुरु की श्रद्धा अथवा सात तत्त्व का विचार; सात तत्त्वों के विचाररुप श्रद्धा। तो इस तरह हम स्वीकार कर लेते हैं कि ये तो व्यवहार है। लेकिन यहाँ आकर हम चूकते हैं कि ये पर को नहीं जानता… ये बात तो शास्त्रों में तो इतनी धूमधाम से लिखी है कि पता ही नहीं है। पर वो जो खास बात उन्होंने एक जगह लिख दी कि ना तो ये कहीं जाता है (और) ना कोई इसके भीतर आता है। तो ये जो सूत्र है ये सूत्र तो मंगलाचरण की तरह ही हृदय में धारण करने लायक है सबको। ये मंगल-सूत्र है जो पहनने लायक है सदा ही।

मुमुक्षुः- अरे! वाह रे वाह!

पूज्य बाबूजी:- इसलिए इस मंगल-सूत्र का अनुशीलन करना चाहिए सब जगह।

मुमुक्षुः- कि ये कहीं नहीं जाता (और) वो कहीं नहीं आता।

पूज्य बाबूजी:- इसमें कोई नहीं आता और ये कहीं जाता नहीं है। तो बस ज्ञान ही ज्ञान रहा। ज्ञान ही ज्ञान रहा माने ज्ञायक रहा। क्योंकि निर्णय में इसमें जो है ज्ञायक ही आया था कि कोई जगत में कोई नहीं (है)। कोई यानि मेरी पर्याय तक नहीं (है), सिद्ध दशा तक नहीं (है)। कोई नहीं; ना मुझे (सिद्ध) बनना है, ना मैं बनूँगा। क्योंकि भगवान सिद्ध भी इसी देवता की पूजा करते हैं, ज्ञायक की, चिन्मात्र की।

मुमुक्षुः- बहुत सुंदर!

पूज्य बाबूजी:- मैं भी यहीं से शुरु करता हूँ। यहाँ से इसने उस चिन्मात्र-देवता की पूजा शुरु की अनुभूति के द्वारा। तो अनुभूति जो है वो चिन्मात्र बन गई। चिन्मात्र हूँ ये उसका स्वर होता है। वरना मैं अनुभव करती हूँ - ऐसा स्वर होगा। मैं ज्ञायक का अनुभव करती हूँ - तो ज्ञायक का अनुभव करती हूँ इसमें छल हो गया पर्याय का।

बात बड़ी सुंदर है कि मैं ज्ञायक अनुभव करती हूँ (ऐसा) अनुभूति बोली। लेकिन इसमें बहुत बड़ा छल है। वो छल ये है कि ये ज्ञायक को तो नीचा दिखाना चाहती है और स्वयं जो है ऊपर उठना चाहती है। अपना वर्चस्व बताना चाहती है। पर ये ज्ञायक है जो, इसकी प्रसिद्धि तो बहुत थी लेकिन जब तक अनुभूति नहीं हुई तब तक ये अच्छा नहीं लगता था। शोभा नहीं थी इसकी (ज्ञायक की), ये कुरूप लगता था। और जब मैंने अनुभूति की तो इसकी सुंदरता बढ़ गई। तो वो तो असुंदर हुआ ही नहीं (है) कभी। वो तो सुंदरतम पदार्थ है जगत का।

वो तो सुंदरतम है। वो तो है most beautiful (ब्यूटीफुल) है। बहुत सुंदर! इतना सुंदर कि मुनिराज जाते हैं तो बाहर निकलना ही नहीं चाहते। इतना सुंदर है, इतनी रमणीय-वाटिका है वो। बस! ये इतना सा है शुरु से। प्रारंभ से इतना जानना चाहिए कि ये जो उपयोग है, उपयोग से चले (वो) ज्ञान की पर्याय से चले। वहाँ ज्ञायक से भी नहीं चले अभी। ज्ञान की पर्याय से चले कि इसमें कोई नहीं आया तो मैं शुद्ध ही हूँ। तो ये जो ज्ञान है मेरा बिल्कुल अनेक आकारों वाला होते हुए भी शुद्ध ही है। तो ये जो ज्ञान है, ये मैं स्वयं ही हूँ। चिन्मात्र ज्ञायक ही हूँ। बस! हो गया।

मुमुक्षुः- इतना! माने ज्ञान की पर्याय का ज्ञेयाकाररूप स्वरुप, वो परप्रकाशरूप स्वरूप कहलाता है?

पूज्य बाबूजी:- हाँ! वही कहलाता है। ज्ञान की पर्याय का ज्ञेयाकार जैसा स्वरुप वो ही परप्रकाशरूप कहलाता है। है स्वप्रकाशक, अनुसंधान में जब जाते हैं तो।

मुमुक्षुः- 89और स्वप्रकाशकरूप स्वरुप क्या है प्रभु?

पूज्य बाबूजी:- स्वप्रकाशक ये ही। ज्ञान में ज्ञान ही जानने में आता है, बस हो गया वो। प्रतिभासों को भी गौण किया। माने अस्त तो नहीं कर सकते हैं उनको क्योंकि प्रतिभास तो हमेशा रहने ही वाला है, एक गया और दूसरा आनेवाला है। इसलिए वो तो गौण किए जाते हैं, खाली। उनको गौण कर कि ये कुछ भी नहीं हैं ये प्रतिभास सारे के सारे। मैंने तो अच्छी तरह से ज्ञान की चलनी में छानकर इनको देखा तो (ये तो) कुछ भी नहीं हैं। ये तो ज्ञान ही हैं सारे के सारे। तो सब ज्ञान ही है ऐसा जानकर (और मैं) ज्ञायक ही हूँ।

प्रतिभासों में भूल होती है न असल में। उन प्रतिभासों को ज्ञेय का प्रतिभास मान लेता है कि ज्ञेय का है। उनमें ज्ञेय का मिश्रण मान लेता है। तो मिश्रण जहाँ माना वहाँ अशुद्धता हो गई। माने अशुद्धता भी उसमें नहीं हुई। ना तो ज्ञान की पर्याय में हुई और ना उनमें हुई अशुद्धता ज्ञेय पदार्थों में। लेकिन क्या हुई अशुद्धता? कि इसकी कल्पना में वो अशुद्धता हुई। इसने ऐसी कल्पना कर ली।

मुमुक्षुः- बहुत सुंदर! अशुद्ध जाने आत्मको।

पूज्य बाबूजी:- अशुद्ध जाने आत्मा को वो अशुद्ध आत्मा को प्राप्त करे।

मुमुक्षुः- तो ज्ञान की पर्याय का जाणकभावरूप स्वरुप वो स्वप्रकाशकरूप? और ज्ञेयाकाररुप स्वरुप वो परप्रकाशकरूप?

पूज्य बाबूजी:- ज्ञेयाकार जैसा जो प्रतिभास है उन प्रतिभासों को हम ज्ञेयों की ओर से मिलान करके देखें तो वो प्रतिभास बिल्कुल ज्ञेय जैसे हैं। जरा भी उन में कसर नहीं है। इसलिए उनको ज्ञेय नाम भी देते हैं, इसका नाम व्यवहारनय हुआ। पर ये शक्ति नहीं हुई। शक्ति तो हुई कि वो जो प्रतिभास बने हैं इसमें एक के बाद एक और ठीक वैसे के वैसे… (तो) ये भी एक शक्ति है कि नहीं? एक तो सामान्य ज्ञान और एक जो है अनेक प्रतिभासोंवाली शक्ति। इस तरह एक ही पर्याय स्वपरप्रकाशक (है)।

मुमुक्षुः- बहुत सुंदर! बहुत सुंदर! बराबर! माने एक तो ज्ञानरूप शक्ति और एक प्रतिभासरूप शक्ति।

89 स्वपरप्रकाशकरूप स्वरुप क्या है? - 56.58 Mins पूज्य बाबूजी:- एकरूप पर्याय की शक्ति… जाननरूप, सामान्य जाननरूप और एक वो प्रतिभासरूप! लेकिन ये दो न्यारे नहीं हैं। हाँ! ये तो हम विश्लेषण में कर रहे हैं। वो ज्ञान जो है (वो) प्रतिभास ही है (और) वो प्रतिभास ज्ञान ही है, ऐसी अभेदता है उसमें।

मुमुक्षु:- एक ही वस्तु है।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! एक ही वस्तु है। ये तो समझने के लिए हम कर रहे हैं क्योंकि अंत में वो ये करता है कि उन प्रतिभासों को गौण करके उन सबको ज्ञान बना देता है कि सिर्फ ज्ञान ही है। और ज्ञान है अर्थात् मैं ही हूँ, ज्ञायक ही हूँ, चिन्मात्र मैं एक ही हूँ बस। बस! ये अनुभूति कर लेता है।

मुमुक्षु:- इसका नाम सामान्य का आविर्भाव?

पूज्य बाबूजी:- सामान्य का आविर्भाव इसका नाम नहीं (है)। सामान्य का आविर्भाव तो वहाँ तक हुआ कि ये सारे प्रतिभास ज्ञान ही हैं - ये हुआ सामान्य का आविर्भाव। ये पर्याय है अभी तो ये, अभी तक (ये) पर्याय है। अब ये पर्याय उस ज्ञायक की अनुभूति करेगी (और) ज्ञायकाकर होगी इन सबको छोड़कर। अन्य प्रतिभासों को छोड़कर माने अन्य… अब ये ज्ञायक की ओर झाँकेगी न! तो ज्ञायक का आकार इसमें बनेगा। और ज्ञायक का आकार बनेगा तब ये बोलेगी (कि) मैं ज्ञायक हूँ - ये, ये हुआ असली सामान्य का आविर्भाव, असली जो द्रव्य है (उसका आविर्भाव)।

मुमुक्षु:- बहुत सुंदर! १५ वीं गाथा! पहले तो…

पूज्य बाबूजी:- पर्याय है पहले तो।

मुमुक्षु:- पहले तो सामान्य रुप से पर्याय आविर्भूत हुई।

पूज्य बाबूजी:- पर्याय में सामान्य है वो।

मुमुक्षु:- और फिर वो पर्याय का सामान्य ज्ञायकाकार जब हुआ, तो (वो) सामान्य (का) आविर्भाव हुआ।

पूज्य बाबूजी:- तो सामान्य का आविर्भाव हुआ। असली सामान्य का, चैतन्य का माने।

मुमुक्षु:- अनुभूति का।

पूज्य बाबूजी:- चिन्मात्र का। अनुभूति (का) नहीं, चिन्मात्र का।

मुमुक्षु:- चिन्मात्र का, जब अनुभूति हुई तब।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! चिन्मात्र-चैतन्य का आविर्भाव हुआ।

मुमुक्षु:- ज्ञान की पर्याय का सामान्यरूप स्वरूप देखा, तब उसको ज्ञायकाकर रुप से देखने की बात आ सकती है।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! तब आ सकती है। वो तो प्रतिभास तो हमेशा होते ही हैं, हर समय। प्रतिभास शून्य तो कोई जीव रहता ही नहीं है कभी (भी)। जैसे निगोद का जीव है तो उसको भी वो शरीर आकार शरीर का प्रतिभास (होता है) प्रतिसमय। ये ही मैं, ये ही मैं - ये अहम् चलता है बराबर (उसको) मिथ्यादर्शन के रूप में। इसलिए उसके बिना तो रहता ही नहीं (है) कोई ज्ञान। प्रतिसमय चलता ही रहता है।

तो प्रतिभास तो रहने ही वाला है, उसको मिटाना नहीं है। अज्ञानी उसको मिटाना चाहता है ज्ञेय मानकर। उसको ज्ञेय मानता है, तब वो उसको मिटाना चाहता है। (और) उसको मिटाने की चेष्टा में स्वयं मिट जाता है।

मुमुक्षुः- बहुत सुंदर! बहुत सुंदर! बहुत सुंदर!

पूज्य बाबूजीः- क्योंकि वो तो वो ही है स्वयं। ज्ञान है वो तो। इसलिए वो उसको निकालना चाहता है बाहर कि ये मेरे भीतर कौन आ गया है? कौन प्रविष्ट हो गया है मेरे भीतर? वो प्रतिभास जब देखता है तो उसको ज्ञेय लगता है। तो (वो) उसको निकालना चाहता है। और वो निकालने के चक्कर में ये स्वयं निकल जाता है। शून्य हो जाता है।

मुमुक्षुः- बहुत सुंदर! बहुत सुंदर! बराबर!

पूज्य बाबूजीः- माने अपनी हत्या करना चाहता है उसको निकालकर। पर्याय ही नहीं रहेगी तो द्रव्य कहाँ से रहेगा?

मुमुक्षुः- आहाहा! सही बात है! अद्भुत विश्लेषण! स्पष्ट!

पूज्य बाबूजीः- 90ये संक्षेप है।

मुमुक्षुः- वास्तव में ये स्वरूप प्रकाशन है!

पूज्य बाबूजीः- २७० गाथा और २७१ वाँ कलश - ये दोनों बहुत महत्वपूर्ण हैं। इनकी टीका जो है वो बहुत महत्वपूर्ण है। सत् अहेतुक ज्ञप्ति - ये टीका है उसकी।

मुमुक्षुः- सत् अहेतुक ज्ञप्ति!

पूज्य बाबूजीः- झप्ति, सत् अहेतुक ज्ञप्ति। अब सत् अहेतुक ज्ञप्ति किसको कहेंगे? जिसमें ज्ञेय आ जाए या ज्ञेय कारण बन जाए अथवा ज्ञेय का मिश्रण हो जाए। किसको कहेंगे सत् अहेतुक? जो सत् रुप है और जिसका कोई कारण नहीं (है)। जो स्वयं उत्पन्न हुई अपनी सामर्थ्य से - ऐसा। अपने षट्कारक को लेकर, वो सत् अहेतुक। वही जिसका एक आकार है - ऐसा बोलें।

मुमुक्षुः- बराबर! बराबर! वही जिसका एक आकार है।

पूज्य बाबूजीः- वही जिसका एक आकार है। सबको मिलाकर एक कर लिया (कि) एक ज्ञान बस। और कुछ नहीं है (ऐसा) कहते हैं; सबको मिटाकर।

मुमुक्षुः- तो वो सत् अहेतुक ज्ञप्ति को ज्ञान सामान्य बोल सकते हैं न? ज्ञान सामान्य! सत् अहेतुक ज्ञप्ति वो ज्ञान सामान्य हुआ?

पूज्य बाबूजीः- हाँ! सामान्य कर लिया। सामान्य कर लिया पर्याय का।

90 २७० गाथा और २७१ वाँ कलश की चर्चा। - 1.02.59 Hours
मुमुक्षुः- पर्याय का। पर्याय की ही बात है।

पूज्य बाबूजी:- हाँ!

मुमुक्षुः- पर्याय की ही बात है। अद्भुत!

पूज्य बाबूजी:- ⁹¹हो गया अब आज का, अंतिम हो गया?

मुमुक्षुः- अभी पाँच मिनिट बाकी हैं बाबूजी। वैसे सवा आठ को शुरु किया था।

पूज्य बाबूजी:- पाँच मिनिट में ऐसा है कि अब कल आपसे विदा लेना है, और बोलनेवाले से बहुत गलती होती हैं। कभी-कभी किसी का हृदय भी दुःख जाए। तो मैं उन सब बातों के लिए… क्योंकि बोलना मुझे ही पड़ा है ज़्यादातर, तो आप सबसे मैं क्षमा चाहता हूँ।

मुमुक्षुः- बाबूजी! ऐसा मत बोलिये। बिल्कुल मत बोलिए।

पूज्य बाबूजी:- नहीं। होता है, ऐसा होता है। कभी किसी को तकलीफ हो जाए, कोई कष्ट हो जाए सुनने में। क्योंकि यहाँ तो व्यक्तिगत तो कोई बात की नहीं जाती है। लेकिन फिर भी गलती हो जाए न तो उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ।

मुमुक्षुः- ये आपका बड़प्पन है बाबूजी। वास्तव में …

पूज्य बाबूजी:- नहीं! बड़प्पन का सवाल नहीं है। ये तो एक इतना अच्छा व्यवहार है।

मुमुक्षुः- वास्तव में हमारा पुण्य का उदय था कि आपकी देशना हमको सुनने को मिली।

पूज्य बाबूजी:- मेरा भी तो उदय था न बोलने का।

मुमुक्षुः- आप कभी तो हमारी ओर से सोच लिया करें।

बाबूजी! वास्तव में निर्णय पक्का हो गया जाने का?

पूज्य बाबूजी:- अब हो ही गया पक्का और क्या! टिकिट भी मँगा ली है।

मुमुक्षुः- टिकिट तो बाबूजी (कैन्सल) हो सकती है ऐसा नहीं है।

पूज्य बाबूजी:- नहीं हो गया। आज ही अंतिम समापन हो गया न, विषय का भी।

मुमुक्षुः- थोड़ा बाबूजी! कल काव्य की आपने कुछ बात की थी। थोड़ा गुरुदेव के बारे में कुछ ऐसा (कहिए)।

पूज्य बाबूजी:- अब मैं थक जाता हूँ।

मुमुक्षुः- अच्छा ठीक है! छोटी सी।

पूज्य बाबूजी:- है तो छोटी सी वो।

आपने क्षमा तो कर दिया न?

मुमुक्षुः- अरे प्रभु! अरे बाबूजी! ऐसा मत बोलिए। मत बोलिए ऐसा बाबूजी। यहाँ तो … कि आपको ऐसा विकल्प आया कि क्षमा माँगने का? हमें क्षमा कर दीजिए।

91 अंतिम उद्बोधन! - 1.04.48 Hours पूज्य बाबूजी:- नहीं मुझे माँगना चाहिए। जो ज़्यादा बोलता है उसी से गलती हो सकती है।

मुमुक्षु:- बाबूजी! हमको तो सभी को ऐसा लगता है कि ये यहाँ चौथा आरा (चौथा काल) चल रहा है। इतनी अद्भूत बातें ज्ञायक की जो आती हैं न बाबूजी, हम वो भूल नहीं सकते। हमारे जीवन का ये अद्भूत प्रसंग है।

पूज्य बाबूजी:- जिनवाणी की हैं न (बातें तो), मेरा क्या है? ये तो सारा प्रताप ही गुरुदेव का है।

मुमुक्षु:- सही बात है! बराबर है।

पूज्य बाबूजी:- मेरा क्या है इसमें? अपन तो उन्हीं का अनुशीलन करते हैं। जितना अपनी बुद्धि में समझ में आ जाए तो (उतनी बात) खुलकर रखनी चाहिए क्योंकि इसी में कल्याण है। जीव मात्र का जो कल्याण है वो इसी में है कि गुरुदेव की बात को अपन खुलकर, निर्भीकता से स्वयं समझकर और फिर (सामने) रखें। ये तो चर्चा है। इसमें मैं कौन होता हूँ बोलनेवाला?

मुमुक्षु:- नहीं! सही बात है। आपने बाबूजी! लक्ष हमारा जोड़ा इस पर; गुरुदेव ने ये ही बात की है लेकिन आपने हमारे लक्ष को इस ओर खींचा।

पूज्य बाबूजी:- हाँ! वो तो ठीक है। वो तो अपनी जगह है।

मुमुक्षु:- वो ही बाबूजी, अद्भूत कल्याणकारी (बात है)।

पूज्य बाबूजी:- अपने ज्ञान की गरिमा है वो तो।

मुमुक्षु:- इन दिनों जिनवाणी की वर्षा ऐसी हुई कि सब के हृदय भीग गए।

पूज्य बाबूजी:- नहीं! वो ऐसा ही होना चाहिए न! जिनवाणी तो … पूरी दुनिया में रह भी कौन गया?

मुमुक्षु:- प्रयोगात्मक (कि) किस तरह प्रयोग की भूमिका (आवे और) प्रयोग कैसे किया जाए - इस तरह का जो स्पष्टीकरण आया वो उसके लिए अंदर से सोचें तो कुछ ज़बान से कह नहीं पा रहा हूँ - ऐसा भाव होता है।

पूज्य बाबूजी:- नहीं नहीं! जिनवाणी (को) कौन कह सकता है?

मुमुक्षु:- जैसे बच्चे को माँ परोसती है एकदम ऐसे करके, उसी तरह ये जो इतनी गंभीर लगनेवाली बात आपने इतनी सरल बना दी, बस इतना ही तो करना है - स्व और पर। ये मैं और ये मैं नहीं। इतनी सी (बात)! इतनी गंभीर बातें इतनी सरल करके बता दीं कि हमारा हौसला ही बढ़ गया। ये हौसला जो बढ़ता है तो काम और निर्णय ज़्यादा ही जल्दी हो जाता है - ऐसा लगता है बाबूजी।

पूज्य बाबूजी:- ऐसा (है कि) रोटी और सब्जी भी कठोर हो तो निगली नहीं जाती हैं। तो वो नरम हो न! इसी तरह नरम भाषा सरल भाषा हो तो अपन सब समझ लेते हैं। उसमें और क्या है? उसके लिए कठिनाई क्यों की जाए?

मुमुक्षु:- बाबूजी! वास्तव में आज पता चला कि स्वपरप्रकाशक (की) वस्तुस्थिति क्या है? वास्तव में! लगता ही नहीं कि इसमें कुछ है ही नहीं problematic (समस्यात्मक)!

पूज्य बाबूजी:- नहीं! है ही नहीं! Principle (सिद्धांत) है वो तो। असल में वो कोई प्रयोजन नहीं (है)। जिनवाणी में ये भी बात आती है कि प्रयोजनवश भी कोई बात कही जाती है लेकिन वो प्रयोजन नहीं है वास्तव में; सिद्धांत है ये।

मुमुक्षु:- सिद्धांत है!

पूज्य बाबूजी:- स्वपरप्रकाशकतावाला, सिद्धांत है ये। हाँ!

मुमुक्षु:- तो बाबूजी! एक ही ज्ञान की पर्याय को ज्ञेय की ओर से देखें और माने तो अज्ञानता और से ज्ञायक की ओर से देखें और माने तो …

पूज्य बाबूजी:- तो ज्ञान है… ज्ञान ही है।

मुमुक्षु:- बहुत सरल बात कह दी। सही बात है! एकदम!

पूज्य बाबूजी:- ज्ञेय की ओर से देखकर उसको ज्ञेय माने अथवा उसका कारण ज्ञेय को माने, उसका हेतु ज्ञेय को माने। कुछ भी माने माने कुछ भी जोड़ लगाए ज्ञान के साथ, किसी को भी जोड़े… कुछ भी माने तो वो अज्ञान है।

मुमुक्षु:- वास्तव में है तो ज्ञान वो। पूरी अज्ञानदशा भ्रांति है।

पूज्य बाबूजी:- बहुत भ्रांति है, बहुत भ्रांति। क्योंकि सारी चीज़ें हम स्वीकार कर लेंगे राग-द्वेष, पाप-पुण्य और और सब स्वीकार कर लेंगे। (लेकिन) यहाँ आकर तो बस ऐसे अटकेंगे क्योंकि वो मिथ्यादर्शन भी चतुर बहुत है। (कहता है कि) तू भागेगा कहाँ? अभी तो बहुत बाकी है। कि कहाँ भाग कर जाएगा तू? बहुत बाकी है। अभी तो मैं तुझे वहाँ फँसाऊँगा जहाँ ज्ञान का प्रकरण आएगा। तो वो फँस जाता है ये।

मिथ्याज्ञान और मिथ्यादर्शन भी चतुर तो होते ही हैं। अंत में जब कोई छल में नहीं आता है, तब फिर वो वैसे पलायन करते हैं कि दिखाई भी नहीं देते (हैं) - ऐसा।

मुमुक्षु:- एक बार इसको जाननभावरूप समझ ले (कि) इसके स्वभाव से देखा जाए तो कोई, कोई इसमें दो बातें हैं ही नहीं।

पूज्य बाबूजी:- जरा भी नहीं हैं। अंतर्मुख होने का एक मात्र जो process है, विधि है, विधान है वो ये ही है। परप्रकाशक मानने में जो वृत्ती है वो बहिर्मुख होती है क्योंकि उसको भी हमने शक्ति माना न? कि वास्तव में पर को जानता है, तो ज्ञान बहिर्मुख हुए बिना रहेगा नहीं और अंतर्मुख कभी अनुभूति होगी नहीं।

कोई ऐसा कहता हैं कि हम ऐसा थोड़े ही मानते हैं (कि) परप्रकाशक ही है। स्वप्रकाशक भी तो मानते हैं। तो स्वप्रकाशक के साथ परप्रकाशक भी तो मानते हो न? तो वृत्ती बाहर गए बिना कैसे रहेगी? वो तो उसको अपना कर्तव्य मानेगा? अपना धर्म माना न उसने उसको तो, परप्रकाशकता को। तो फिर वृत्ती बाहर गए बिना कैसे रहेगी? अब ये एकमात्र अंतर्मुख होने का उपाय (है), एकमात्र। इसमें है ही नहीं बहिर्मुखता कहीं भी। कहीं भी नहीं है क्योंकि वस्तु स्वभाव में ही नहीं है। एक ही मार्ग है!

मुमुक्षु:- आपने बोला (न) बाबूजी (कि) उसको बोलो न, ज्ञेयाकार बोलो। इसमें कोई सवाल नहीं है।

पूज्य बाबूजी:- बोलो जरूर! जरूर बोलो। क्योंकि उससे ये पता लगेगा कि इस समय ज्ञान में कौनसे ज्ञेय जैसा आकार है। इसलिए उसको बताने के लिए हमें उस ज्ञान के आकार को ज्ञेय कहना ही पड़ेगा। ज्ञेयाकार या ज्ञेय कहना ही पड़ेगा। कहना तो पड़ेगा लेकिन मानना नहीं। मानते ही मिथ्यादर्शन चिपट जाएगा, चिपट जाएगा बस।

मुमुक्षु:- वो विद्यमान है उसका अस्तित्व है, बस इतना। इतना ही परप्रकाशक है वो। अद्भुत बाबूजी! अद्भुत!

ज्ञान के उस स्वरूप को भले कहो पर मानो नहीं।

पूज्य बाबूजी:- 92गुरुदेव के संबंध में आठ पंक्तियाँ लिखीं थी एक बार।

कर्मकांड की बालू के, भूधर धसकने लगे। गुरुदेव का जब अवतरण हुआ इधर दिगम्बर धर्म में, तो उस समय की चर्चा है।

कर्मकांड की बालू के, भूधर धसकने लगे,
सदियों से सिसकते मूल्य जीवन के उभरने लगे,
सदियों से सिसकते मूल्य जीवन के उभरने लगे,
रंगे सियारों की खिसकने लगी रे! धरती
(रंगेसियार - धोखेबाज व्यक्ति)
स्वर्णपुरी क्षितिज पर सुवर्ण-पुरुष हँसने लगे।

मुमुक्षु:- बराबर बराबर!

पूज्य बाबूजी:- रंगे सियारों की खिसकने लगी रे! धरती
स्वर्णपुरी क्षितिज पर सुवर्ण-पुरुष हँसने लगे
जगत जिसके करिश्मे देखता ठगा सा रहा
जगत जिसके करिश्मे देखता ठगा सा रहा
‘जादूगर’ कोई बोला, जीवन पट बुनता रहा,

92 गुरुदेव के संबंध में आठ पंक्तियाँ। - 1.14.14 Hours
विदेह का पैगंबर खुदा की बातें करता
आँधी-सा आया तूफान सा चला गया।

मुमुक्षु:- विदेह का पैगंबर!

पूज्य बाबूजी:- विदेह का पैगंबर खुदा की बातें करता
आँधी-सा आया तूफान सा चला गया। खुदा की बातें करता (अर्थात्) भगवान आत्मा (की बातें करता)।

मुमुक्षु:- अद्भुत! बाबूजी अद्भुत! एक और सुनाइए।

पूज्य बाबूजी:- अब नहीं ज़्यादा। ज़्यादा सुनाता नहीं हूँ मैं, मेरी आदत नहीं है। हो गया ये!

मुमुक्षु:- ये बाबूजी इसमें भी आत्मतत्त्व का ही भाव भरा है?

पूज्य बाबूजी:- हाँ! वही भरा है।

मुमुक्षु:- चतुष्पद!

पूज्य बाबूजी:-93 बेमौसम है, मौसम बदल जाते हैं।

मुमुक्षु:- बराबर! बराबर! अप्रभावित है!

पूज्य बाबूजी:- आत्मा का मौसम नहीं है कोई। बेमौसम है, (आत्मा का मौसम) बदलता नहीं है। मौसम बदलते हैं। एक और सुना देता हूँ।

बाहर के देवता का फंक्शन (समारोह) तो होता रहा
बाहर के देवता का फंक्शन तो होता रहा
ज्योतियों के काजल से मंदिर को धोता रहा
कैसे पूरी होंगी तेरे मन की तमन्नायें?
तेरे घर का देवता तो आज तक सोता रहा।

मुमुक्षु:- आहाहा! सही बात है! सही बात है। सोता रहा। अद्भुत!

पूज्य बाबूजी:- और कोई प्रश्न हो तो! नहीं तो हो गया समापन आज।

मुमुक्षु:- आपसे क्या कहें? जल्दी-जल्दी पधारियेगा बंबई। बस! हमारा बाबूजी यही भाव है कि आप जिस तरह से… आपके बेटे-बच्चे समान हैं हम ज़्यादा क्या कहें? जल्दी-जल्दी आ जाइए जरा।

महेंद्रभाई ने जाने का टाइम तो बताया (मगर) वापस आने का टाइम नहीं बताया। बाबूजी (का) मार्च के प्रथम सप्ताह में दो-तीन दिन के लिए फिर वापस आने का (योग बन रहा है)। बहुत सरस! चलो अद्भुत! ये मालूम नहीं था हमको लेकिन हमको खुशी हुई हमको।

93 भगवान आत्मा पर चतुष्पद! - 1.16.16 Hours बाबूजी! जैसे आपने बोला ऐसे हमारी ओर से कुछ भी गलतियाँ हो गईं हैं तो हम भी आपसे क्षमा चाहते हैं। आप तो गलतियाँ नहीं कर सकते। हमारी और से definitely (निश्चितरूप से) ऐसा हो सकता है।

पूज्य बाबूजी:- मैंने तो तकलीफ ही तकलीफ दी है, रात-दिन।

मुमुक्षु:- बाबूजी! ये तकलीफ नहीं है बाबूजी! कोई तकलीफ नहीं है। तकलीफ तो अब दिए जा रहे हैं आप बाबूजी (कि वापस जा रहे हैं)। तकलीफ तो अब होगी बाबूजी! तकलीफ तो अभी हो रही है प्रभु! तकलीफ आपने दी ऐसा आप सोच रहे हैं, वही तकलीफदेह है हमारे लिए। कैसे तकलीफ हो सकती है बाबूजी आपकी हाजिरी में?

आज बाबूजी कल से लगेगा जैसे शून्यावकाश, क्योंकि जैसे (ही) आठ बजते थे न, चलो बाबूजी के पास। इसमें क्या है बाबूजी हम आपकी प्रशंसा नहीं करते। जो तत्त्व आता है न वो इतना हृदयंगम रहता है न कि बस जैसे इसमें डूब रहे हैं। ऐसी बाबूजी २५ दिनों तक ये धारावाहिकता चली २५ दिवस! आज २२ वाँ प्रवचन है बाबूजी का, २२ प्रवचन। २५ तारीख से शुरु किया था तो आज १५ तारीख है। अस्खलित प्रवाह बाबूजी! और इसमें मुख्य एक प्रयोजनभूत बात (ही आई), प्रयोजनभूत!

पूज्य बाबूजी:- प्रयोजनभूत ही आना चाहिए न!

मुमुक्षु:- प्रयोग की, प्रयोग की पद्धति! प्रयोग की पद्धति!

चलो जल्दी-जल्दी वापस ऐसी घड़ी आए इसका ही हमको इन्तजार है। और हम प्रार्थना करते हैं (कि) बाबूजी का स्वास्थ्य हमेशा अच्छा रहे ताकि इतनी अद्भुत बातें, ज्ञायक का अद्भुत रहस्य का उद्घाटन हमारे सामने होता रहे और हम इससे अपना निज कल्याण करें। बस! ये ही भावना बाबूजी भाते हैं आज।

पूज्य बाबूजी:- बहुत बढ़िया भावना है आपकी। मेरी तो वैसी ही है स्थिति अब। यहाँ तो सब आते हैं जो सब ऐसे ही आते हैं।

परम उपकारी श्री सद्गुरुदेव की जय हो!
जिनवाणी माता की जय हो!