तत्त्वचर्चा 20 (13 फ़रवरी 1999)
पूज्य बाबूजी जुगल किशोर जी युगल, कोटा
तत्त्व-चर्चा नंबर २०, तारीख १३-२-१९९९
श्री शांतिभाई ज़वेरी निवास स्थान - नीलांबर, मुंबई
मुमुक्षुः- 62पूज्य बाबूजी! प्रश्न है (कि) ९-१०वीं गाथा से (कि) जो द्वादशांग को जानता है वह तो श्रुतकेवली है और आत्मा को जाननेवाले को भी श्रुतकेवली कहा जाता है।
फिर से। प्रश्न है कि - द्वादशांग को जो जाने उसको तो श्रुतकेवली कहा है और साथ में आत्मा को जो जाने उसको भी श्रुतकेवली कहा है। द्वादशांग को जानना वो तो पर का जानना होता है। और आत्मा के जाननेवाले को श्रुतकेवली कहें - तो ये बात (में) जरा समस्या है, समझाईये।
पूज्य बाबूजी:- द्वादशांग का जो केंद्र है वो एकमात्र शुद्धात्मा है। द्वादशांग के हृदय में जो बैठा है वो एकमात्र शुद्धात्मा है। द्वादशांग में से जो शुद्धात्मा अलग कर दिया जाए तो कुछ बचता नहीं है। इसलिए द्वादशांग के निमित्त से माने द्रव्यश्रुत के निमित्त से जो शुद्धात्मा को सीधा जानता है, शुद्धात्मा के अभिमुख होकर जो शुद्धात्मा का वेदन करता है, उसको निश्चय श्रुतकेवली कहा है। और शुद्धात्मा (का) वेदन ही निश्चय सम्यग्ज्ञान है। और श्रुतकेवली इसलिए कहा कि श्रुत उसमें निमित्त है।
श्रुत पहले शुद्धात्मा का स्वरूप जानता है और उसके बाद उसका निर्णय करके, विचार करके उसकी महिमा लाकर, शुद्धात्मा का निर्विकल्प स्वसंवेदन करता है। इसलिए वो निश्चय श्रुतकेवली रहा। और द्वादशांग को जाननेवाला वो भी ज्ञान है। द्वादशांग स्वयं नहीं है श्रुतकेवली, पर द्वादशांग को जाननेवाला ज्ञान है, वो श्रुतकेवली है। वो श्रुतकेवली माने व्यवहार श्रुतकेवली है क्योंकि निश्चय के साथ व्यवहार घटाना आवश्यक है न।
तो वो तो है उत्कृष्ट बात! लेकिन जो शुद्धात्मा को जानते हैं, वे द्वादशांग को जानते ही हों - ऐसा नहीं है।
मुमुक्षुः- ये क्या कहा?
पूज्य बाबूजी:- वो तो है ही सही न! शुद्धात्मा को जो जानते हैं, जिन्हें सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान हुआ है, वे द्वादशांग को जानें ही जाने - ऐसा आवश्यक नहीं है। द्वादशांग का सार तो वो जानते हैं। लेकिन पूरा द्वादशांग जाननेवाले ये द्वादशांग के पाठी वो श्रुतकेवली कहलाते हैं,
62 ९-१०वीं गाथा से जो द्वादशांग को जानता है वह तो श्रुतकेवली है और आत्मा को जाननेवाले को भी श्रुतकेवली कहा जाता है। - 0.15 Mins व्यवहार श्रुतकेवली; क्योंकि वो द्वादशांग को जानते हैं। द्वादशांग को जानकर आत्मा को जाने, वो निश्चय श्रुतकेवली होता है और द्वादशांग को जाननेवाले वो व्यवहार श्रुतकेवली (होते हैं)।
द्वादशांग को जानने में भी ये जो आशय है, अभिप्राय है, वो यही रहता है कि मुझे शुद्धात्मा जानना है द्वादशांग के द्वारा। तो द्वादशांग निमित्त होता है इसलिए निमित्त की ओर से वो जो शुद्धात्मा को जाननेवाले हैं, निर्विकल्प स्वसंवेदन में तो उस निर्विकल्प स्वसंवेदन को श्रुत नाम दिया। श्रुतकेवली उनको कहा। और जो सर्व द्वादशांग को जानते हैं वे श्रुतकेवली हैं - ये व्यवहार है।
लेकिन क्योंकि वो सबको संभव नहीं होता है। जैसे तुष-माष भिन्नम् जैसा वो शिवभूति मुनि का ज्ञान था, तो उसमें द्वादशांग का ज्ञान पूरा कहाँ था? द्रव्यश्रुत का? तो भी द्रव्यश्रुत का जो सारभूत कि शुद्धात्मा है, उसका ज्ञान उनको था। तो वो जो ज्ञान है, वो द्वादशांग का जो ज्ञान है वो आत्मा ही है। ज्ञान द्वादशांग का नहीं (है) पहली बात तो ये।
मुमुक्षु:- ज्ञान द्वादशांग का नहीं (है)।
पूज्य बाबूजी:- नहीं! ज्ञान आत्मा का (है)। लेकिन द्वादशांग इसकी उत्पत्ति में निमित्त हो जाता है। अगर हमारे ज्ञान का उपादान थोड़ा अच्छा हो तो वो निमित्त हो जाता है, इसलिए उसको श्रुतकेवली संज्ञा दी जाती है। लेकिन हर कोई नहीं जानता है न! इसलिए वो जितना कुछ ज्ञान होता है, उस ज्ञान में वह आत्मा का चिंतन चलता है तो उसमें भेद उत्पन्न होता है। माने ज्ञान सो आत्मा - ये इतना भेद ये (भी) बहुत अंतिम भेद (है), सूक्ष्म भेद है ये (कि) ज्ञान सो आत्मा।
ये ज्ञान सो आत्मा - इस विचार में चिंतन में जो प्रवृत्त हो रहा है वो तो हुआ व्यवहार श्रुतकेवली। यानि द्वादशांग का जाननेवाला वो तो उत्कृष्टरूप से श्रुतकेवली है ही। लेकिन सबको द्वादशांग का ज्ञान नहीं होता और निश्चय के साथ व्यवहार आवश्यक है। तो सबको नहीं होता, तो जो द्वादशांग के सारभूत आत्मा को जानता है, तो वो व्यवहार श्रुतकेवली हुआ चाहे उसका ज्ञान कितना ही (कम हो)। द्रव्यश्रुत का ज्ञान चाहे कितना ही (कम हो)! वो ज्ञान सिर्फ इतना (हो) कि ये जो ज्ञान है सो आत्मा है। बस! ये तिर्यंच ऐसा कर लेता है कि ये जो ज्ञान है सो आत्मा है। तो वो जो तिर्यंच है, वो व्यवहार श्रुतकेवली हुआ। और ऐसा करते हुए वो शुद्धात्मा पर पहुँच जाता है, तो वो निश्चय श्रुतकेवली है तिर्यंच, नारकी सब।
मुमुक्षु:- माने ज्ञानस्वरूप आत्मा के निर्णय को भी व्यवहार श्रुतकेवली कहा जाता है।
पूज्य बाबूजी:- हो गया न वहाँ। अनुभूति कहाँ है वहाँ? वहाँ तो चिंतन है, विचार है। ज्ञान सो आत्मा, बस इतना। इतना भेद जहाँ पड़ा (तो) और नहीं कुछ लंबा-चौड़ा दूसरा (कुछ भी), देव-शास्त्र-गुरुवाला नहीं वो। (बस!) ज्ञान सो आत्मा - इतना जो भेद पड़ा, तो वो व्यवहार हो गया। तो वो व्यवहार श्रुतकेवली है।
मुमुक्षु:- हाँ! पर वो अगर अनुभूति के साथ हो तो… पूज्य बाबूजी:- अनुभूति हो जाएगी। अनुभूति होनेवाली हो तो उसका नाम व्यवहार श्रुतकेवली - बस इतना। अनुभूति नहीं होनेवाली हो और वो केवल भेद में, विचार में, चिंतन में प्रवृत्तमान हो, तो (इसका अर्थ है कि) वो चिंतन उसे प्रिय लगा। चिंतन के प्रति उसे ममत्व हो गया (तो) वो शुद्धात्मा को भूल गया (और) इसलिए मिथ्यात्व और अज्ञान आ गया।
मुमुक्षु:- बराबर! माने श्रुतकेवली जैसे ज्ञान सो आत्मा, वो उतना अनुभव के पहले भी विचार चिंतन यथार्थरूप से करे, उसे भी श्रुतकेवली कहा जाता है।
पूज्य बाबूजी:- हाँ! कहा जाता है।
मुमुक्षु:- पर वो व्यवहार से है।
पूज्य बाबूजी:- हाँ! पर वास्तविक तो जिस समय निश्चय श्रुतकेवली होते हैं, शुद्धात्मा की अनुभूति करते हैं, तभी उसको व्यवहार संज्ञा मिलती है। लेकिन ये भी अनुचित नहीं है कि जिसे शुद्धात्मा का वेदन होनेवाला है, तो उसके पहले जो ज्ञान सो आत्मा, दर्शन सो आत्मा - ऐसा जो विचार चलता है उसको व्यवहार श्रुतकेवली कहना सर्वथा अनुचित हो, ऐसा नहीं है। वो कहना चाहिए, कहना चाहिए। (उसको सर्वथा व्यवहार) श्रुतकेवली कहें ही नहीं - ऐसा नहीं है, क्योंकि वो तो प्राप्त करनेवाले हैं। इसलिए प्राप्त कर लिया है, इस रूप में उसको स्वीकार किया जाता है।
मुमुक्षु:- बराबर! और प्राप्त करने के बाद अगर फिर विचार कर रहे हैं (तो) या तो ज्ञान खुल गया द्वादशांग का, (तो) उसे भी व्यवहार श्रुतकेवली कहते हैं।
पूज्य बाबूजी:- वो भी व्यवहार है।
मुमुक्षु:- माने व्यवहार श्रुतकेवली के दो प्रकार बन गए। एक तो अनुभूति के पहले ही जिसको अनुभूति होनेवाली है, उसे भी व्यवहार श्रुतकेवली कहेंगे। और अनुभव के बाद उसको जब सविकल्पदशा में शास्त्रों का ज्ञान या तो द्वादशांग का ज्ञान खुल गया (हो) तो उसे भी श्रुतकेवली कहा जाता है।
पूज्य बाबूजी:- हाँ! उसे भी श्रुतकेवली कहते हैं। जैसे 63आत्मा की जब अनुभूति होती है तो उसका process (विधि) ये ही है कि वो पहले आत्मा के किन्हीं विशेष गुणों का चिंतन उसे चलता है, और महिमा बढ़ती है तो (फिर) तुरंत शुद्धात्मा पर पहुँचकर उसका संवेदन कर लेता है। ये ही तरीका है बस। और (कोई) दूसरा तरीका नहीं है।
मुमुक्षु:- आत्मा के गुणों का चिंतन चलता है।
पूज्य बाबूजी:- आत्मा के जो मुख्य गुण हैं, मुख्य में भी फिर ज्ञान रह जाता है तो उसका चिंतन चलता है। ज्ञान और आनंद स्वरूप हूँ - ऐसा चिंतन चला। लेकिन क्योंकि इस चिंतन में तो विकल्प है, विचार है, तरलता है, चंचलता है। स्थिरता नहीं है और यह अनुभूति का स्वरुप नहीं है
63 आत्मा की अनुभूति की विधि। - 10.42 Mins तथा आत्मा का भी स्वरूप नहीं है। इसलिए आत्मा इस तरह चिंतनपूर्वक खंड-खंडज्ञान से अपना अनुभव कर सके - ऐसा नहीं है। इसलिए दोनों ही ये आत्मा न होने के कारण उनको व्यवहार कहा है। लेकिन ये व्यवहार साधन अवश्य बन जायेंगे यदि ये आत्मा का अनुभव कर लेगा, तो व्यवहार साधन (है)।
मुमुक्षुः- क्योंकि चिंतन से महिमा बढ़ती है।
पूज्य बाबूजीः- हाँ! (और) वास्तव में तो बाधक है।
मुमुक्षुः- बाबूजी! 64सविकल्प स्वसंवेदनवाले को व्यवहार केवली बोल सकते हैं न? सविकल्प स्वसंवेदनवाले जो भगवान आत्मा हैं, उनको व्यवहार केवली बोल सकते हैं?
पूज्य बाबूजीः- हाँ! बोल सकते हैं।
मुमुक्षुः- यहाँ सम्यग्दृष्टि को केवली कहा? यहाँ सम्यग्दर्शन वाला, चौथावाला (जो है) उसको केवली क्यों कहा?
पूज्य बाबूजीः- केवली कहा न! केवल को जानता है वो, केवल माने मात्र शुद्धात्मा। शुद्धात्मा को जानता है। उसका नाम केवल है, शुद्धात्मा का नाम। इसलिए कहा (है) केवली। और श्रुत उसमें निमित्त है इसलिए श्रुतकेवली कहा।
मुमुक्षुः- 65आपने अभी बताया कि द्वादशांग का ज्ञान वास्तव में द्वादशांग का नहीं है।
पूज्य बाबूजीः- नहीं है। द्वादशांग का नहीं है, आत्मा का है। इसलिए वो द्वादशांग का कोई भी, कोई भी भाग, कोई भी हिस्सा जानकर और आत्मा पर आ जाता है। उसको (बस) इतना सा रहता है (कि) ज्ञान सो आत्मा। तो ये ज्ञान बना लिया न उसने सारे द्वादशांग को।
द्वादशांग का ज्ञान द्वादशांग का नहीं (है), पर ज्ञान आत्मा का है। इसलिए यह जो ज्ञान है सो मैं ही हूँ (अर्थात्) आत्मा ही है - ये ज्ञान, ये व्यवहार श्रुतकेवली हो गया। ऐसा करते-करते ये विचार रुक जाता है और अनुभूति वो प्रगट हो जाती है।
मुमुक्षुः- माने अनेकाकार ज्ञान में से उसने एकाकार ज्ञान के स्वरूप को जाना।
पूज्य बाबूजीः- हाँ! एकाकार करना ही पड़ता है न! एकाकार करना ही पड़ता है। ये जो अनेक भेद हैं, वो सब उसमें से निकल जाते हैं और अकेला ज्ञान सामान्य जो है (वो) शुद्धात्मा का अनुभव कर लेता है। स्वयं ज्ञायक बन जाता है। स्वयं ज्ञायक बन जाता है - ऐसी अभेदता! यहाँ तो भेद है। वहाँ अभेदता ऐसी होती है कि - ये है तो अनुभूति, पर्याय (है) लेकिन ये स्वयं ज्ञायक बनकर बोलती है। ज्ञायक बनकर बोलती है (कि) मैं ज्ञायक हूँ, चिन्मात्र हूँ, चैतन्य हूँ - ऐसा इसका स्वर होता है।
64 सविकल्प स्वसंवेदनवाले को व्यवहार केवली बोल सकते हैं? - 12.22 Mins
65 ज्ञान द्वादशांग का नहीं है। - 13.10 Mins मुमुक्षुः- तो वो पर्याय का स्वर पर्यायमय होता नहीं (बल्कि) वो ज्ञायकरूप हो जाता है उसका स्वर।
पूज्य बाबूजी:- हाँ! पर्याय का स्वर पर्यायमय नहीं रहता, पर पर्याय का स्वर द्रव्य बन जाता है।
मुमुक्षुः- तो व्यवहार श्रुतकेवली निश्चय श्रुतकेवली बन जाता है।
पूज्य बाबूजी:- निश्चय श्रुतकेवली वही होता है। ये निश्चय श्रुतकेवली है। इसलिए सभी निश्चय श्रुतकेवली हैं जो ऐसा करते हैं - नारकी, तिर्यंच, मनुष्य, देव (सभी)। क्योंकि उसमें भेद कैसे होगा? क्योंकि सब एक ही विधि से उस शुद्धात्मा को पा रहे हैं। दूसरी कोई विधि है नहीं। बस ये ही विधि है कि ज्ञान सो आत्मा, आनंद सो आत्मा। ऐसे किया (तो) ऐसा करते-करते अनुभूति हुई, तो (वो) निश्चय श्रुतकेवली हो गया (और) ये व्यवहार रह गया।
मुमुक्षुः- माने इसका मतलब तो ये हुआ बाबूजी कि स्वरूप का सही चिंतन करनेवाले को, माने ज्ञानस्वरूप आत्मा का निर्णय करनेवाले को भी व्यवहार श्रुतकेवली कह दिया है।
पूज्य बाबूजी:- हाँ! कहा है। है वो, है। है वो। कहा है माने वो है व्यवहार श्रुतकेवली। क्योंकि है तो उसका भी ज्ञान श्रुत (ही)। उसके ज्ञान में भी है तो श्रुत ही निमित्त। तो श्रुत निमित्त होने पर भी वो श्रुत का विकलपात्मक चिंतन कर रहा है। विकलपात्मक चिंतन कर रहा है, इसलिए वो अभी अनुभूति में न होने के कारण व्यवहार हो गया।
मुमुक्षुः- तो ऐसा लगता है कि एक गरीब को राजमहल में बिठाकर राजा बना दिया। आत्मा के चिंतन करने वाले को व्यवहार श्रुतकेवली बोल दिया।
पूज्य बाबूजी:- आत्मा सदा ही अमीर है न, गरीब नहीं है। इसलिए जो पर्याय है न गरीब, वो पर्याय महारानी बन जाती है। वो साम्राज्ञी बन जाती है। वो तो सम्राट है शुद्धात्मा तो और वो साम्राज्ञी बन जाती है। गरीबी तो पर्याय में है (कि) मैं दुखी हूँ। ये गरीब ही बोलता है (कि) मैं अज्ञानी हूँ; (ये) गरीबी है पर्याय की। ये पर्याय की गरीबी समाप्त होकर ऊँचाईओं को छूती है।
मुमुक्षुः- ऊँचाईओं को छूती है। बराबर! Absolutely! बराबर!
पूज्य बाबूजी:- हो ही जाता है (न)! कोई गरीब कन्या किसी राजा के घर चली जाये, तो फिर क्या स्थिति होती है उसकी? और क्या मानती है (वो) अपने आप को? बल्कि (सिर्फ) संबंध भी हो जाए तो? क्या मानती है? महारानी मानती है। अब उस गरीबी को कौन याद करे? गई वो तो, समाप्त हो गई।
मुमुक्षुः- यूँ भी बुरे दिन किसी को याद आते अच्छे नहीं लगते।
पूज्य बाबूजी:- बुरे दिन तो लोक में याद करने चाहिए, बाकी प्रकरण में। अध्यात्म में बुरे दिन होते ही नहीं हैं आत्मा के। आत्मा के कभी बुरे दिन आए ही नहीं। अब कल्पना में कोई ऐसा बन जाए तो उसका कोई क्या करे? कल्पना में, भ्रम में किसी भी रूप से आत्मा को भूलकर जो दीन हो गया, हीन हो गया। हीन हो गया माने अपने आपको हीन मानने लगा पर्याय में, स्वयं अत्यंत उच्च होने पर भी, ओजस्व-तेजवाला होने पर भी अपने आप को पर्याय में दीन और हीन मानने लगा। लेकिन इससे वो जो तत्त्व है परम तत्त्व, उसमें हीनता नहीं आई। उसमें दीनता नहीं आई। वो तो ऊँचा ही रहा, आसमान को ही चूमता रहा वो।
हाँ! ये पर्याय (है) यदि उसको आज समझ में आ जाए (और उसकी) समझ ठीक हो जाए तो ये उस जैसी बन जाती है। और ऐसी बनती है कि फिर अपना स्वर ही बदल देती है। तो स्वर बदलकर बिल्कुल जैसे कोई छाती से छाती लगाकर ऐसा एकाकार मिलन हो रहा हो, ऐसा एकाकार मिलन होता है कि जिसमें (वो) स्वयं गायब हो जाती है।
मुमुक्षु:- बराबर! सही बात है!
एक दूसरा प्रश्न है प्रभु!66 अनुभूति के पहले की विचारधारा में स्व-पर के भेद की धारा का चिंतन कार्यकारी है कि ज्ञायक की महिमा का (चिंतन कार्यकारी है)?
पूज्य बाबूजी:- हाँ! ज्ञायक की महिमा का। स्व-पर का भेद तो पहले ही कर लेना चाहिए। पहले ही किया जा चुका होता है, स्व-पर का भेद (तो)। स्व-पर का भेद करके जो पर है, वो तो मेरे किसी काम का नहीं है, किसी प्रयोजन का नहीं है - ये मैंने जान लिया है। उसको कहते हैं जानना। अब उनको ज्ञेय की कोटि में रखना कि वे मेरे किसी काम के (और) किसी मतलब के नहीं हैं। सारे के सारे हेय तत्त्व हैं और अहम् करने लायक नहीं हैं। मैंने जो अब तक उनमें अहम् किया वो सारा का सारा बरबाद हुआ, व्यर्थ हुआ। और उसमें जो श्रम किया गया वो भी सारा का सारा बरबाद हुआ। ऐसा जानकर पर से विमुख होकर और अपनी पर्याय को पर से खाली कर देता है, विविक्त कर लेता है पर्याय को। ज्ञान की पर्याय को परपदार्थों से विविक्त करके उसमें एकमात्र चैतन्य को भर देता है। और चैतन्य को भरकर चैतन्य का चिंतन करने लगता है कि मैं तो शुद्ध, बुद्ध, एक, एकरूप, अनंत और अनंत समृद्धि सम्पन्न हूँ। अनंत वैभव सम्पन्न हूँ। तो अनंत वैभव सम्पन्न मैं हूँ अगर ज्ञान ने ऐसा वास्तव में दृढ़ता से स्वीकार किया तो इस चिंतन में प्रसन्नता नहीं होगी क्या?
मुमुक्षु:- आनी ही है। प्रसन्नता ही होगी।
पूज्य बाबूजी:- होगी ही होगी न! क्योंकि निश्चितरूप में, अत्यंत निश्चित रूप में वो इस बात को (स्वीकार) करता है। दृढ़ता से ज्ञान ने स्वीकर किया कि और कुछ नहीं है इसके सिवाय। बस! ये एक ही मेरा उपादेय और अहम् करने योग्य है - ऐसा जानकर और (ऐसा माना कि) इसका जो वैभव है, वो अनंत है (और) अपार है। अर्थात् मेरा वैभव अनंत और अपार है और वो वर्तमान में विद्यमान है। वो कोई लाया जाएगा (और) पर्याय उसे पैदा करेगी - ऐसा नहीं है। लेकिन
66 अनुभूति के पहले की विचारधारा में स्व-पर के भेद की धारा का चिंतन कार्यकारी है कि ज्ञायक की महिमा का? - 19.52 Mins वर्तमान में विद्यमान है वो और अपरंपार है उसकी महिमा। इस तरह जिसने महिमा को जाना तो तुरंत विकल्प छूटकर महिमा-मग्न हो जाता है।
मुमुक्षु:- तुरंत विकल्प छूटकर महिमा-मग्न हो जाता है।
पूज्य बाबूजी:- हो जाता है। आनी महिमा और उसका स्पष्ट ज्ञान। (बाकी) सबको निकाल दिया, सारे जगत को निकाल दिया (उसने)। सारे जगत को अपने से, अपनी जो पर्याय है, वो सारे जगत से खाली कर ली क्योंकि राग-द्वेष नहीं बचे। क्योंकि राग-द्वेष तो कब पैदा होते थे? कि जब उन पदार्थों को यह अपने साथ जोड़ता था ममत्व में, अहम् में जोड़ता था। तब न मिथ्यादर्शन और राग-द्वेष पैदा होते थे। अब जब वो सारे पदार्थ मेरे से न्यारे ही हैं, तो वो उनके ममत्व से उत्पन्न होने वाले जो मिथ्यादर्शन और राग-द्वेष के भाव हैं, क्या वे अब पैदा होंगे?
फिर से। जब सारे पदार्थों को अपने से बिल्कुल न्यारा मान लिया तो वे राग-द्वेष और मिथ्यादर्शन बचा या नहीं बचा?
मुमुक्षु:- कैसे बच सकता है?
पूज्य बाबूजी:- तो कैसे नहीं बचेगा? ये जब सारे को अलग माना तो उनसे ममत्व करने का कोई प्रश्न ही नहीं रहता। कोई अवकाश ही नहीं रहता। इसलिए ममत्व और राग-द्वेष से भी खाली हो गया। वो भी पर में चले गए। पर के साथ वो भी पर में चले गए क्योंकि ये जो भाव (हैं, ये) पैदा तो मेरे में (ही) होते थे लेकिन इनका संबंध था अन्य पदार्थों से। इसलिए उनको परपदार्थों में ही रख दिया। इस तरह सबसे विविक्त हो गया। मोह-राग-द्वेष और परपदार्थ सबसे विविक्त होकर, खाली होकर और वो जो पर्याय है, वो पर्याय ज्ञायक से भर गई। और ज्ञायक से भरकर ज्ञायक का धारावाहिक चिंतन महिमापूर्वक करने लगी। और अंत में समय आया कि ये जो चिंतन है, उसको भी हेय जानता था; शुरु से ही हेय जानता था। और आत्मा का स्वरुप निश्चित हो ही चुका है। इसलिए ये जो चिंतन है, ये भी विराम पाकर अंत में आत्मा में आत्मस्थ हो जाता है। ये तरीका है।
क्योंकि वो तो गुणों की जो अनेकता है वो भी घटती जाती है। पहले तो गुण… कई गुणों के आधार से विचार करे। उसके बाद वो गुणों की अनेकता भी घटती जाती है और ज्ञानमात्र, ज्ञानमात्र, आनंदमात्र, बस इतना। अंत में जाकर इतना रह जाता है। जैसे बरफ जमते-जमते वो तरंग जो है, वो दिखाई भी नहीं देती (है)। तो इस तरह अंतिम स्थिति ऐसी हो जाती है कि बस ज्ञायक-ज्ञायक-ज्ञायक ही हूँ एक, ऐसा। और अभी भी विकल्प है लेकिन और इसको भी हेय जान रहा है। और बस अगले कदम में शुद्धात्मा में पदार्पण कर लेता है।
मुमुक्षु:- बराबर! अद्भुत! अद्भुत! अनुभव पूर्व के अंतिम क्षणों का परिणमन कैसा होता है?
पूज्य बाबूजी:- ये (ही) होता है।
मुमुक्षु:- ये होता है।
पूज्य बाबूजी:- बहुत मधुर प्रकरण है ये। बहुत मधुर! दुनिया में इतना मधुर, इतना सुंदर प्रकरण कोई सुनने को मिल जाए, ऐसा आज तक हुआ नहीं और होगा नहीं। इतना मधुर प्रकरण है ये आत्मानुभूति का और उसकी विधि का।
मुमुक्षु:- उसकी विधि में भी मधुरता है।
पूज्य बाबूजी:- हाँ! विधि ये ही। ये ही विधि है उसकी। (इसमें भी) बहुत मधुरता है, बहुत मधुरता है। उछलता है जैसे भीतर ही भीतर। भीतर ही भीतर उछलता है कि ये मिला, ये मिला, ये मिला, वो आ गया।
मुमुक्षु:- आहाहा! ⁶⁷पर को जानना कहा आपने, तो इसका मतलब ये मेरे नहीं हैं - ये पर को जानना हुआ?
पूज्य बाबूजी:- ये हुआ पर को जानना क्योंकि मेरा अस्तित्व स्वीकृत हो गया। तब ही कहा न इसने कि ये मेरे नहीं है और इनका मेरे से कोई संबंध नहीं है। ये कब कहा? कि जब उनका अस्तित्व स्वीकार कर लिया। तो हो तो गया तीनलोक का जानना।
मुमुक्षु:- बराबर! पर कैसे हैं - ये पर का जानना नहीं।
पूज्य बाबूजी:- वो नहीं। पर कैसे हैं उनसे नहीं (है) मतलब।
मुमुक्षु:- पर मेरे नहीं हैं - वो पर का जानना हुआ।
पूज्य बाबूजी:- वो पर का जानना हुआ।
मुमुक्षु:- ये क्या बाबूजी! ये बात तो विचारकोटि में भी आने की मुश्किल है।
पूज्य बाबूजी:- मुश्किल लगती है क्योंकि उसमें दिल नहीं लगता है। विस्तार में जाता है। उसकी आदत विस्तार में जाने की पड़ी है इसलिए अनेक पदार्थों पर विचार करने लगता। शरीर मेरा नहीं है, इंद्रियाँ मेरी नहीं हैं। अरे भाई! एक में डाल दे न सबको। अजैन-अजैन सब एक कोटि के हैं। बस! हो गया खतम। मैं जैन हूँ बस। वो सब एक ही कोटि के हैं।
मुमुक्षु:- बहुत सुंदर! पर को जानना माने पर मेरे नहीं हैं - ये जानना है। ये पर का जानना (है)।
पूज्य बाबूजी:- ये प्राण है उसका, पर को जानने का। ज्ञान का प्राण है ये।
मुमुक्षु:- बहुत सुंदर! स्व-पर को विभाजित करने की प्रक्रिया में ये है कि पर कैसे हैं - ये नहीं जानना है। पर मेरे नहीं हैं - ये जानना है पर का।
पूज्य बाबूजी:- बस वही है। उसी में ये परम सदाचारी हो गया, परम सदाचारी। एक अणुमात्र भी मेरा नहीं है।
67 पर को जानना कहा आपने, तो इसका मतलब ये मेरे नहीं हैं - ये पर को जानना हुआ। - 27.10 Mins तो जिसने इतने बड़े विश्व के साथ फैले हुए अपने ममत्व को समेटकर जो जिस क्षण में ये बोला कि अणुमात्र भी मेरा नहीं है, तो फिर केवलज्ञान का ताज किसको पहनाया जाएगा? इसको नहीं पहनाया जाएगा (क्या)? और कौन है जो केवलज्ञान के लायक है? क्योंकि केवलज्ञान में तो दिखाई अनेक देंगे। जो इसने इतने थोड़े से श्रुतज्ञान में सारे ही विश्व को परत्व दे दिया, सारे विश्व को! इतने छोटे से ज्ञान में सारे विश्व को परत्व दिया और केवलज्ञान भी सारे विश्व को परत्व देता है, तो इसमें (और) केवलज्ञान में कहाँ अंतर रहा? और जो यदि अंतर माना भी जाता है तो केवलज्ञान का उत्तराधिकारी कौन है? कहते हैं (कि) ये ज्ञान है तुष माष भिन्नम् जितना।
मुमुक्षु:- वाह रे वाह! ये ज्ञान है..
पूज्य बाबूजी:- इसको ताज पहनाया जाएगा।
मुमुक्षु:- Beautiful! केवलज्ञान का उत्तराधिकारी किसको माना जाता है? ये तुष माष (भिन्नम्) जितना ज्ञान (उसका) उत्तराधिकारी है।
पूज्य बाबूजी:- इस अल्पज्ञान में ताकत कितनी कि संपूर्ण विश्व में अणुमात्र भी मेरा नहीं है। कितनी ताकत! कितना ईमान-धर्म! इसको कहते हैं ईमान-धर्म।
मुमुक्षु:- ये छोटे मुँह बड़ीवाली बात नहीं है। ये तो ईमान-धर्म की है।
पूज्य बाबूजी:- ईमान-धर्म की बात है।
मुमुक्षु:- हमने तो ये सोचा था कि आपने कह दिया कि पर को जानना मत, तो जानना ही बंद कर दिया था। तो ये मेरे नहीं है - इतना जो जानना बाकी रह गया था, उसका सुझाव (अब) मिल गया।
पूज्य बाबूजी:- बस! तो वो हो गया। जानना बंद हो गया (और) यहाँ पर पूर्णाहुति हो गई। पूर्ण ज्ञान हो गया (कि) बस मेरे नहीं हैं। अब कोई संबंध भी नहीं है। था भी नहीं (और) है भी नहीं। केवल मानने की कल्पना में था, वो ख़त्म हो गई। वो मेरे से जुदा हो चुकी (है), बस।
मुमुक्षु:- 68तो ज्ञायक की महिमा फलदायी होती है।
पूज्य बाबूजी:- हाँ! ज्ञायक की महिमा इसी तरह आवे कि उसे (ज्ञायक को) वो समृद्धशाली माने। जगत का सबसे समृद्धशाली पदार्थ वो मैं हूँ। वो इसलिए हूँ कि जगत में भले ही हैं जीव मेरे जैसे, लेकिन उनकी समृद्धियाँ उनके पास हैं। वे तो मुझे एक दाना भी नहीं देते हैं। इसलिए सबसे समृद्धशाली मैं हूँ क्योंकि मैं उनके भी सामने जाता नहीं हूँ। मैं उनसे भीख कभी माँगता नहीं हूँ।
तो मेरा जो आत्म-गौरव है वो सबसे ऊँचा है। सबसे ऊँचा! मैं तो भगवान सिद्ध से ही नहीं माँगता हूँ, और की (तो) क्या बात है? और की क्या बिसात है? मैं तो भगवान सिद्ध से ही नहीं माँगता हूँ। क्योंकि मेरे पास (जो) है वो क्या काम आएगा? मेरा टिफ़िन क्या काम आएगा अगर
68 ज्ञायक की महिमा कब फलदायी होती है? - 31.11 Mins मैं भगवान से माँगूँगा तो? और वो क्यों देंगे? वो देंगे तो.. वो पूजा में लिखी है ये बात कि वो अपराधी हैं अगर दे देवें (तो)। अपराधी हैं वो क्योंकि उन्होंने जगत में भीख माँगने का व्यवसाय शुरू करा दिया। ये अपराध है बड़ा भारी (है)। ये बड़ा भारी अपराध है।
मुमुक्षुः- विश्व की सुंदरता खत्म हो जाती है।
पूज्य बाबूजीः- हाँ! विश्व की ही नहीं (बल्कि) ये तो सौन्दर्य समाप्त हो गया उसका, जीव का। जीवलोक जो है वो सब भिखारी बन गया। भिखारी बन गया।
मुमुक्षुः- आहाहा! जीवलोक है, वो सब भिखारी बन गया।
पूज्य बाबूजीः- अज्ञानी तो चाहता ही ये ही है कि कोई दे दे। बिना मेहनत के मिल जाए बस और क्या है! अज्ञानी को तो प्रमाद ने घेर रखा है, इसलिए वो शुद्धात्मा की ओर आना ही नहीं चाहता। उसको तो ये है कि दे दें भगवान और क्या है? उनके पास बहुत तो है, क्या करेंगे? मेरे पास भी है उसका बोध इसको नहीं है।
ज्ञान को भगवान के सामने ले जाया जाये, केवल राग को नहीं ले जाये। हाँ! हम तो राग को ले जाते हैं इसलिए फेरी लगाकर आ जाते हैं। ज्ञान को भगवान के सामने ले जाए तो निश्चितरूप में कुछ लेकर लौटता है। माने ये स्वीकार करके लौटता है कि अरे! मैं तो स्वयं ही भगवान हूँ। मैंने क्या किया ये कि मैं भगवान के सामने गया और उनसे माँगा?
मुमुक्षुः- आहाहा! ज्ञान को भगवान के पास लेकर गया तो भगवान के द्रव्य, गुण और पर्याय से मिलान हो गया।
पूज्य बाबूजीः- अनेक करोड़पति हों, उसमें कौनसे करोड़पति को यह याद आवे कि ये दूसरे और भी अपने जैसे करोड़पति हैं। तो अपन देखें, एक दिन चलें तो सही न उनके पास। कुछ थोड़ा-बहुत माँगकर तो देखें! ऐसा विचार आएगा? अरे अपन तो (खुद) हम ही करोड़पति हैं। वो भी हैं तो होंगे, उनके घर के हैं वो। भगवान भगवान के घर के हैं। मुझे देकर थोड़े (ही) खाते हैं।
मुमुक्षुः- तो तो बाबूजी आपने तो सभी को अहमिंद्र बना दिए।
पूज्य बाबूजीः- अहमिंद्र ही है ये।
मुमुक्षुः- कमी है ही नहीं।
एक प्रश्न है69 कि सम्यग्दर्शन होते ही श्रद्धा परिपूर्ण हो जाती है। प्रश्नकार का विचार लिखा है कि - सम्यग्दर्शन होते ही श्रद्धा परिपूर्ण हो जाती है और ज्ञान केवलज्ञान होते परिपूर्ण होता है। त्रिकाली ध्रुव तो अकार्यकारणत्व का धारक है। तो फिर श्रद्धा-ज्ञान की परिपूर्णता का असली कारण कौन है? कृपया समाधान कीजिए।
69 श्रद्धा-ज्ञान की परिपूर्णता का असली कारण कौन है? - 35 Mins पूज्य बाबूजी:- स्वयं ही है वैसे तो। दोनों बातें आती हैं कि - वो जो शुद्धात्मा है (उसको) कारण परमात्मा भी कहते हैं। वो इसलिए कहते हैं कि पर्याय जो है, वो सारे जगत से लौटकर उसकी ओर झाँकती है। तो इसलिए उसे कारण भी कहा जाता है। (लेकिन वो तो) हमेशा से ही बना हुआ है। इसलिए पर्याय में कहाँ दोष का निवारण हुआ? लेकिन पर्याय ने अपना अपराध छोड़कर उस कारण परमात्मा की ओर (जब) झाँकी, तो वो कारण परमात्मा बन गई स्वयं। स्वयं परमात्मा बन गई, इसलिए पर्याय में ही होता है।
और केवलज्ञान में पूर्ण होता है सम्यग्ज्ञान - ऐसा नहीं (है)। सम्यग्ज्ञान तो हो गया। जिस समय श्रद्धा पूरी हुई उस समय ज्ञान भी सम्यक् रूप में तो पूरा हो गया। अब ये केवलज्ञान की बात है तो वो तो गिनती की (बात) है, पदार्थों की। पदार्थों की गिनती की है। तो वो दिखाई दें (अथवा) न दें, इससे क्या मतलब है इसको? उनको दिखाई देते हैं भगवान को, तो भी भगवान को उनके प्रति पूरी उपेक्षा है। पूरी उपेक्षा है।
तो जिनके प्रति उपेक्षा है तो उसके संबंध में इसको अपेक्षा होगी क्या कि - मैं केवलज्ञान लूँ? ऐसा केवलज्ञान लूँ कि जिसमें लोकालोक दिखाई दे.. और फिर केवलज्ञान को क्या कहेगा? कि भाई! तेरे श्रुतज्ञान में ये लोकालोक का वो जो अपनी छाती में दबाकर बैठा है, वो दिख रहा है। तो तू उस केवलज्ञान को लेकर क्या करेगा? इस तरह केवलज्ञान की प्रीति तोड़ने पर केवलज्ञान भागा आता है।
मुमुक्षु:- दौड़ा आता है।
पूज्य बाबूजी:- दौड़ा आता है।
मुमुक्षु:- माने ज्ञान भी परिपूर्ण हो गया, सम्यक् प्रकार से।
पूज्य बाबूजी:- सम्यक् हो गया। सभी सम्यक् हैं ये मति सम्यक्, श्रुत सम्यक्, अवधि सम्यक्, मनः पर्यय सम्यक् और केवलज्ञान सम्यक्। सम्यग्ज्ञान तो हो गया पूरा।
मुमुक्षु:- 70कार्य परमात्मा को निश्चय से कारण परमात्मा की अपेक्षा है?
पूज्य बाबूजी:- कारण परमात्मा निरपेक्ष है। तो उसकी अपेक्षा से कार्य परमात्मा सापेक्ष है, उसकी अपेक्षा से। क्योंकि कार्य परमात्मा तो नया बना है (और) कारण परमात्मा पुरातन है।
मुमुक्षु:- वो कहा गया है इसका मतलब क्या? शुद्धात्मा कारण परमात्मा है - ऐसा जो कहा गया है (उसका अर्थ क्या)?
पूज्य बाबूजी:- शुद्धात्मा कारण परमात्मा यानि ऐसा कारण नहीं है कि उसके होने पर शुद्धि हो ही हो - ऐसा आवश्यक नहीं। लेकिन फिर भी जब-जब शुद्धि प्रगट होगी, तो उसकी ओर ही पर्याय को झाँकना पड़ेगा। इसलिए उसे कारण परमात्मा कहते हैं। और, और जगत में
70 कार्य परमात्मा को निश्चय से कारण परमात्मा की अपेक्षा है? - 38.12 Mins कोई नहीं, कोई पदार्थ कि जिसकी ओर ये देखे। केवल उसी की ओर देखेगा, तो पर्याय जो है वो कार्य परमात्मा बन जाएगी। इसलिए उसे कारण कहते हैं। वरना वो तो शुद्धात्मा शुद्ध चैतन्य है।
मुमुक्षुः- वो किसी का कारण होता नहीं।
पूज्य बाबूजी:- और भावरुप में अनुभव (में) आता है। किसी नाम से अनुभव में नहीं आता। इसलिए एक चैतन्यमात्र हूँ बस - ऐसा। ऐसा जो एक सामान्य बनाया चैतन्यमात्र हूँ मैं, ऐसा सामान्यभाव अनुभव में आता है। (उसको) चिन्मात्र कहते हैं। चिन्मात्र नाम से अगर करें तो नहीं आएगा।
मुमुक्षुः- वाह रे वाह! भावरुप से अनुभव में आता है, नामरुप से नहीं - ये क्या कहा?
पूज्य बाबूजी:- नामरुप से नहीं आता है (क्योंकि) नाम में तो विकल्प हो जाएगा। नाम में तो विकल्प हो जाएगा। नामरूप से नहीं आता। सीधा जैसा उसका स्वरुप निर्णय किया, ठीक वैसा का वैसा भासित ज्ञान में होता है।
मुमुक्षुः- माने सोचे तो अशांति, परिणमे तो शांति।
उसी भाँति का एक प्रश्न है 71- पर्याय का षट्कारक पर्याय है। ये माननेवाला ज्ञानी हो या अज्ञानी, दोनों के अभिप्राय में फर्क होता है क्या?
पूज्य बाबूजी:- अज्ञानी तो जानता ही नहीं है इस बात को। वो तो पर्याय के षट्कारक मानता ही नहीं है। वो तो पर्याय को पराधीन मानता है। वरना अन्य के साथ ममत्व क्यों जोड़ेगा? और पराधीन क्यों बनाएगा उसको? इसलिए वो तो इस बात को मानता ही नहीं (है) क्योंकि वस्तु व्यवस्था… कहे भले ही। कहे भी (और) नहीं भी कहे।
और वस्तु-व्यवस्था ऐसी है कि पर्याय के जो है कारक हैं, कारक सामग्री (अर्थात्) काम बनानेवाली, काम करनेवाली सामग्री, उसका नाम कारक (है)। तो ये छह प्रकार के कारक जो हैं, वो कार्य की सामग्री हैं। तो वो हर पर्याय के पास रहते हैं - ये ज्ञानी जानता है। ये पर्याय अपने षट्कारकों से पैदा होती है। इसमें द्रव्य भी कारण नहीं और गुण भी कारण नहीं (है) - ऐसा जानकर वो पर्याय से भी निरपेक्ष हो जाता है। उसकी भी उपेक्षा कर देता है कि ये जो होगी तो अपने षट्कारक से होगी। इसमें अपने द्रव्य और गुण का कहाँ काम है? तो उससे विमुख हो जाता है, तो पर्यायदृष्टि छूट जाती है। इसमें भी पर्यायदृष्टि छूट जाती है। पर्याय के षट्कारक मानने में (क्योंकि) उसमें मेरा कोई काम नहीं है।
मुमुक्षुः- 72पर्याय में राग-द्वेष हुआ तो अज्ञानी बोले कि उसको होनेवाला था तो हुआ, उसमें हमें क्या? तो क्या दोष आता है?
71 पर्याय का षट्कारक पर्याय है - ऐसा माननेवाले ज्ञानी और अज्ञानी में कोई फरक होता है क्या? - 40.43 Mins
72 पर्याय में राग-द्वेष हुआ तो अज्ञानी बोले कि जो होनेवाला था तो हुआ, उससे हमें क्या? तो क्या उसमें दोष आता है? - 42.34 Mins पूज्य बाबूजी:- हाँ! होनेवाला था सो हुआ - ऐसा वो मानता है क्या? अज्ञानी बोला (कि जो) होनेवाला था सो हुआ, तो ऐसा वो मानता है कि नहीं मानता है? पहली बात (तो) ये। अगर वो खाली कहता ही है (और) मानता नहीं है, तो फिर उसने कहाँ माना कि होनेवाला है सो होता है? और यदि उसने मान लिया (हो) तो (फिर) उसकी दशा ही बदल जाती है। दशा बदल जाती है क्योंकि होनेवाला था तो हुआ - ऐसा जिसने जाना, उसका पर्याय की ओर से उपयोग हट जाता है; कि इसमें मैं क्या करूँगा? जो उसमें होना है वो सिद्ध भगवान, केवली भी नहीं लौटा सकते। तो मैं भी इसको (नहीं लौटा सकता)।
और इसको क्यों लौटाऊँ मैं? ये तो मेरे घर की व्यवस्था है, शान है मेरी कि मेरा कार्य कभी भी, तीन लोक, तीन काल में इधर-उधर होता ही नहीं है। इतना निश्चित timetable (समय-सारिणी) है कि वो इधर से उधर कभी होगा ही नहीं। तो ये तो मेरे द्रव्य की इतनी सुंदर व्यवस्था है कि जैसी है ही नहीं अज्ञानी के पास। अज्ञानी के पास नहीं है। ये तो मेरे द्रव्य का गौरव है न! कि वहाँ जो कुछ कार्य निश्चित है वो कार्य अपने समय पर होना है। तो ये गौरव है या नहीं?
तो उसने जाना कि ये जो होना है ये अपने समय पर होना है। तो इसमें मेरा कोई हिस्सा वास्तव में नहीं है। इसमें उलट-फेर करना, वो मुझे उलट-फेर करना भी नहीं है और ताकत भी किसी में नहीं है - इस तरह जानता है। ताकत नहीं है (ऐसा) माने तो कमजोरी आती है। तो ऐसे में उलट-फेर करना ही नहीं है। क्यों करे? व्यवस्था है, ये तो अपने घर की शान है। शान है ये तो। इसलिए व्यवस्थित को व्यवस्थित करने का नाम अव्यवस्था है।
तू उस व्यवस्थित को व्यवस्थित करना चाहता है। (तो) वो क्या करता है? (कहता है कि) होना था सो हुआ, होना था सो हुआ, होना था सो हुआ - (जब) ये व्यवस्थित है तो तू ये सौ बार क्यों दोहराता है इस बात को? इसका मतलब कि तू उसमें व्यवस्था थोपना चाहता है अपनी। होना तो ये चाहिए कि जब व्यवस्थित मान लिया तो तू वहाँ से हट जा एकदम। क्योंकि उसकी ओर देखना भी पाप है तेरे लिए। उसकी ओर देखना भी पाप है। क्यों देखा तूने उधर? इसका मतलब तुझे विश्वास नहीं है उसकी व्यवस्था पर तो (इसलिए) देखता है तू। (और) बार-बार (उसको) छेड़ता है।
जैसे (नक्की) हो गया है कि सवेरे बारात आनेवाली है और रात को सारा हमने, सारी सामग्री व्यवस्थित कर ली। सारी कुर्सियाँ, सोफा-सेट और दुनियाभर का सब-सब set (व्यवस्थित) कर लिया। अब एक व्यक्ति कोई आता है (कि) नहीं ये कुर्सी यहाँ नहीं, यहाँ। ये कुर्सी यहाँ नहीं, यहाँ। ये सोफा यहाँ नहीं, यहाँ - तो वो तो व्यवस्था बिगाड़नेवाला है। अरे भई! हमने तो सब सोच समझकर पहले किया था। ये क्या करता है तू? तो उसको हटा दिया जाएगा वहाँ से (कि) छेड़ना मत बिल्कुल। ऐसा का ऐसा रहने देना।
तू तो छेड़खानी क्यों करता है उसकी? इसलिए उस सारे कक्ष को ही, पर्याय के कक्ष को ही तू उपेक्षित कर दे। और उपेक्षित किया (तो) तेरी पर्यायदृष्टि छूट जाएगी। इसलिए जो होना है सो होता है, यदि ये भी तूने माना है (तो) तेरी ये पर्याय दृष्टि छूट जाएगी। बल्कि और कहें इससे भी बड़ी बात? क्रमबद्धपर्याय की श्रद्धा ही छूट जाएगी। क्रमबद्धपर्याय की श्रद्धा करके और क्रमबद्ध पर्याय की श्रद्धा छूट जाएगी।
मुमुक्षु:- क्योंकि अक्रम स्वरूप से एकरूप हो जाता है।
पूज्य बाबूजी:- एकदम एकरूप हो गया न, क्रम से। तो अब पर्याय की थोड़े ही श्रद्धा रहेगी। क्रमबद्ध भी पर्याय है न! उसकी श्रद्धा छूट जाएगी पर्यायमात्र की। क्योंकि उधर क्यों देखेगा ये? उसमें अगर थोड़ी भी बुद्धि है, तो वो तो इतना सेट है, ऐसा सेटिंग है वो कि - तीन लोक (और) तीन काल में उसमें ज़रा भी तो फरक नहीं पड़ सकता है। तो ये उधर क्यों झाँकेगा? और क्यों जाएगा उधर?
बस! तो उससे विमुख हुआ कि यहाँ तो ठीक है। ये तो बिल्कुल सेट है मेरा कक्ष। पर्याय का कक्ष तो मेरा सेट है बिल्कुल, तो प्रसन्नता होती है। और प्रसन्न होकर वहाँ से विमुख हो जाता है कि बस! अब यहाँ तो कोई तीन लोक (और) तीन काल में कोई इसमें कुछ कर ही नहीं सकता। और मैं भी कुछ, (उसमें) मुझे भी कुछ करना नहीं है। बस! वहाँ से हटा और वो द्रव्य ही तो दिखता है फिर, और कौन दिखता है?
मुमुक्षु:- कोई जगह ही नहीं है दूसरी।
पूज्य बाबूजी:- कोई है ही नहीं बिल्कुल। ये उसका फल होता है। असल में तो फल तो हम समझते ही नहीं हैं। हम तो जो होना था सो हुआ। जो होना था तो (ऐसा कहकर) तू भीतर से तो रो रहा है और बाहर से ये बोल रहा है।
मुमुक्षु:- ये तो मनःपर्यय ज्ञान जैसी बात हो गई बाबूजी, आपके मन से। अद्भुत बात! अद्भुत बात! ये ही बाबूजी बात चल रही है।
पूज्य बाबूजी:- ये ही होता है।
मुमुक्षु:- ये ही होता है।
पूज्य बाबूजी:- अरे भाई! तेरा उनमें क्या है? होना था सो हुआ। उनमें क्या है? कि तेरे घर में हुआ, नोटों में हुआ, बंगले में हुआ, बंगले की दिवार गिरी। जो कुछ होना था सो हुआ। तेरा क्या हुआ इसमें? इसमें क्या होना-होना करता है तू? इसमें क्रमबद्ध पर्याय लगाता भी क्यों है तू?
मुमुक्षु:- सही बात है! ये तो उदय के खाते में (है)।
पूज्य बाबूजी:- हाँ! तू तो अपनी जो पर्याय होती है, उसमें लगा (क्रमबद्ध)। हाँ! कि ये मेरी पर्याय सेट है एकदम, त्रैकालिक! बस! उसका सेटिंग जानकर वहाँ से हट जा। वहाँ क्या करेगा? कोई भी बुद्धिमान होगा तो वहाँ से हट जाएगा (कि) यहाँ कुछ होनेवाला ही नहीं है। फिर क्या है?
तीन लोक में किसी की शक्ति ही नहीं है और मुझे करना नहीं है। क्योंकि इससे तो मेरा घर जो है वो अव्यवस्थित दिखता है, अगर मैं पर्याय को इधर-उधर करूँ तो।
मुमुक्षु:- बहुत सुंदर!
पूज्य बाबूजी:- (ऐसा दिखता है) कि इसके घर में व्यवस्था नहीं है। तो मेरा तो घर व्यवस्थित है। इसलिए पर्याय का कक्ष इतना सुव्यवस्थित है कि वहाँ झाँकना ही नहीं है मुझे अब। और विश्व में झाँकूँगा ही नहीं - ऐसी शपथ लेता हूँ। ऐसी शपथ लेता हूँ कि झाकूँगा ही नहीं उधर।
मुमुक्षु:- प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, आलोचना सब हो गया?
पूज्य बाबूजी:- हो गया सब।
मुमुक्षु:- उसकी ओर झाँकूँगा भी नहीं।
पूज्य बाबूजी:- झाँकूँगा भी नहीं। क्यों झाँकूँगा? किसलिए झाँकूँगा? इसका अर्थ ये हुआ कि तुझे विश्वास नहीं है तेरी setting पर, तेरी व्यवस्था पर।
मुमुक्षु:- तो व्यवहार जाना हुआ प्रयोजनवान है, वो कहा है - तो पर्याय की ही बात कही है।
पूज्य बाबूजी:- हो गया न! ये सारी पर्याय व्यवहार हुई। जाना हुआ प्रयोजनवान का अर्थ ये है कि वो उसे जानता रहे - ये नहीं है। लेकिन जानने में कभी आ जाए तो, बस इतना। कभी जानने में आ जाए, अपने ज्ञान की क्रमबद्ध दशा में। ज्ञान की क्रमबद्ध दशा में कभी जानने में आ जाए तो वो जाना हुआ प्रयोजनवान (है)। बस इतना! और जो जाना हुआ प्रयोजनवान होता है, उधर ज्ञान जाए क्यों बार-बार? ये तो सिर्फ जानना ही है, कुछ करना (तो) नहीं है। तो उधर क्यों जाए ज्ञान? जाएगा भी क्यों? नहीं जाएगा। समझदार होगा ज्ञान तो नहीं जाएगा।
मुमुक्षु:- 73पर्याय की क्रमबद्धता निश्चित करके वो क्रमबद्ध से भी अलग हो जाता है।
पूज्य बाबूजी:- अलग हो जाता है। अलग हो जाता है, फिर नहीं करता है वो।
ये तो लोक के पदार्थों में लगा है। अब क्या है, क्या करें? अब तेरा बस नहीं चला तब तू कहने लगा और रोने लगा, तेरा बस नहीं चला जो। और नहीं तो बस चलता तब तो (कहता कि) कैसे हो सकता है ये? कैसे हो सकता है? - ऐसा। तो जब सारे प्रयत्न fail (अनुत्तीर्ण) हुए तब ये यहाँ आया (है)। पर आया क्या? आया ही नहीं वो तो, रो रहा है वो तो।
मुमुक्षु:- रो रहा है, रो रहा है। सचमुच रो रहा है। वो ही स्थिति है।
पूज्य बाबूजी:- दुःखी है वो तो, महादुःखी है भीतर से। क्रमबद्ध पर्याय का जो निर्णय है, वो तो सुख पैदा करता है एकदम। कि अरे! इतना बड़ा ये पर्याय समुदाय (और) इसमें मुझे कुछ करना नहीं। इतनी मेरी शान! इतनी मेरी व्यवस्था कि मुझे इसमें कुछ करना ही नहीं है।
73 पर्याय की क्रमबद्धता निश्चित करके वो क्रमबद्ध का से भी अलग हो जाता है? - 51.12 Mins वो तो topic ही बहुत बड़ा है कि एक पर्याय को दूसरी जगह रखे तो सारा तेरा द्रव्य ही नष्ट होता है। द्रव्य ही नष्ट होता है। वो तो बहुत बड़ा topic है ये तो, क्रमबद्ध पर्याय का।
मुमुक्षुः- बाबूजी! उसका संक्षिप्त में हो सकता है तो बाबूजी, थोड़ा बोलिये न। क्योंकि जो आप इतनी बड़ी बात करते हैं और हम इससे विमुख रह जायें ये, ये बाबूजी थोड़ा दुखता है। तो आप इसमें अपना limited time (सीमित समय) लगाएँ, जितना है बाबूजी प्रयोजनभूत बोलिये।
पूज्य बाबूजी:- पर्याय को इधर-उधर कर सकता है का अर्थ ये हुआ कि इसको पर्याय को इधर-उधर करने का अधिकार मिल गया। ठीक हो गया न? नहीं?
ये अपनी पर्याय को, क्योंकि ये स्वयं इसकी है पर्याय। इसलिए ये उस पर्याय को इधर-उधर कर सकता है, ऐसा इसको अधिकार है। ऐसा इसने माना तो फिर ये कौनसी पर्याय को लायेगा? और वर्तमान में पर्यायें जो चल रही हैं, वो (तो) चल ही रही हैं। लेकिन इसका मन संतुष्ट नहीं है कि मुझे तो ये दुख नहीं चाहिए और दीनता नहीं चाहिए। हीनता नहीं चाहिए, अज्ञानता नहीं चाहिए। तो फिर उसको क्या करना पड़ेगा? कि वो जितना पर्याय का रास्ता है, जहाँ ये चल रही हैं पर्यायें, उन सारी पर्यायों को तो वो हटाएगा क्योंकि उनको हटाने का अधिकार मिल गया न इसको। उलट-फेर करने का (अधिकार)! उनको तो हटाएगा और उनके स्थान पर अब कमी भी क्यों रखेगा? वो तो सिद्ध दशा (ही) लाएगा (फिर)। ठीक हो गया? अच्छा! अब जो पर्यायें हटायी हैं उनका क्या हुआ? वो तो आयेंगी तो सही न आगे-पीछे (कभी भी)? तो वो सिद्ध भगवान करेंगे मोह का अनुभव।
मुमुक्षुः- आहाहा! अद्भुत बाबूजी! अद्भुत! क्योंकि दुख की पर्याय..
पूज्य बाबूजी:- क्योंकि उसने हटा दिया था उस समय। और वो उसको (सुख की पर्याय को) ले आया था। लेकिन वो हटी हैं लेकिन आयेंगी तो सही (कभी न कभी)। वो नष्ट थोड़ी (ना) हो गई हैं। तो आयेंगी, तो वहाँ आयेंगी (उधर)। इसलिए भगवान सिद्ध होंगे मोही-रागी-द्वेषी।
मुमुक्षुः- आहाहा! कितनी सुंदर व्यवस्था! तो अपने हाथ से ही अपनी शान (को) तोड़े रखता है?
पूज्य बाबूजी:- है ही नहीं न! एक सुख का मार्ग है (और) एक अत्यंत दुख का मार्ग है। बहुत कष्ट का मार्ग है!
मुमुक्षुः- 74संपूर्ण द्रव्य कैसे नष्ट होता है इसमें?
पूज्य बाबूजी:- संपूर्ण द्रव्य तो नष्ट हो ही जाएगा जब वो पर्याय का प्रवाह टूट जाएगा। पर्याय का एक सुनिश्चित प्रवाह है और उस प्रवाह में से हमने एक पर्याय को निकाल दिया, तो वो टूटा कि नहीं वो प्रवाह? टूट गया! तो वो टूट गया तो वो द्रव्य टूट गया, खतम हो गया।
74 पर्याय की क्रमबद्धता न स्वीकारने में संपूर्ण द्रव्य कैसे नष्ट होता है? - 55.04 Mins तोड़े बिना नहीं हो सकता है, पर्याय को निकालना क्योंकि पर्याय तो set है बिल्कुल अपनी जगह। और उसका प्रवाह है सुनिश्चित, एक के बाद एक, एक के बाद एक, एक के बाद एक। ये जानता (है) कि पर्यायें इकट्ठी पड़ी हैं (तो) जो मेरी इच्छा हो, जो लाऊँ। उसका मानना ऐसा होता है। पर्यायें सब इकट्ठी पड़ी हैं। तो उनमें से मैं ढूँढ-ढूँढकर मेरी इच्छा हो जिसको लाऊँ। कि तू ला (तो) फिर बाकी का क्या होगा? जो विकारी हैं उनका (क्या होगा)? क्योंकि ऐसा थोड़े ही है कि तू कहेगा कि मैं सम्यग्दर्शन … ना ना! सम्यग्दर्शन से क्या होता है? मुनि बन जाओगे (तो) मुनि से भी क्या होगा? और अरिहंत जाओगे तो अरिहंत भी क्यों? सिद्धि ही बनो न (फिर), जब अधिकार मिल गया है (तो)। इसलिए सबको हटाओ फिर। तो सबको हटाओ, तो वहाँ पर सिद्धदशा में लाना उनको (उन पर्यायों को)। क्योंकि वहाँ रहेंगी वो तो साथ (में फिर)।
मुमुक्षु:- तो इसका मतलब तो ये अच्छा है कि अपने-आप में वो उत्पाद हो और व्यय होकर…
पूज्य बाबूजी:- होता है माने वही है। वस्तु-व्यवस्था है वो तो। अटल है, अचल वस्तु-व्यवस्था है (वो)। एक-एक पर्याय भी पार्वती है - पर्वत की पुत्री (जो) हट नहीं सकती (है) अपनी जगह से।
मुमुक्षु:- बराबर! बिल्कुल सही बात है। कोई भी हिला नहीं सकता (है)।
पर्यायें 75इतनी व्यवस्थित हैं तो फिर पुरुषार्थ की कहाँ जगह रही?
पूज्य बाबूजी:- हो गया न पुरुषार्थ! माने पर्याय को उलट-फेर करने का, इधर-उधर करने का जो पुरुषार्थ करता था, वो तो wastage (बर्बाद) होता था। अब इसने वो wastage तो छोड़ा और जहाँ वो सार्थक होता है, जिसके पास जाकर वो बिल्कुल निहाल होता है (जिससे) production (उत्पादन) होता है सुंदर, तो वो पुरुषार्थ ही तो हुआ वो। तो वो पुरुषार्थ ही तो हुआ। इधर-उधर करने को तो हम पुरुषार्थ मानें और इधर-उधर न करके, जैसा है वैसा करने को हम पुरुषार्थ न मानें तो ये तो हमारी गलती है न! भूल है। पुरुषार्थ पूर्वक ही हो रहा है सारा का सारा काम।
अरे! जैसे खिड़की से हमें टिकट लेना है तो एक तो पुरुषार्थ का अर्थ ये (है) कि सबको मारो, सबको हटाओ। और एक जो है चुपचाप खड़े रहो। तो अब ये समझता है कि चुपचाप खड़े रहना - ये कोई मेरा धर्म है क्या? कुछ करना चाहिए। तो वो पुरुषार्थ है या नहीं चुपचाप खड़े रहना? कितना धीरज है उसमें! कितना उद्यम है उसमें चुपचाप खड़े रहने में, उतना क्रम पार करने में। शांति रखना भी वो है न! माने अशांति में तो पुरुषार्थ है और शांति में पुरुषार्थ नहीं है। ये कैसे हो सकता है? Production (उत्पादन) तो दोनों है न? तो वो दोनों पुरुषार्थ से ही होते हैं production (उत्पादन) तो।
75 पर्यायें इतनी व्यवस्थित हैं तो फिर पुरुषार्थ की कहाँ जगह रही? पुरुषार्थ की जगह कहाँ रही? - 57.13 Mins मुमुक्षुः- स्थिरता का भी पुरुषार्थ होता है कि नहीं?
पूज्य बाबूजीः- स्थिरता का पुरुषार्थ है न! किसी को कह दिया जाए कि यहीं खड़े रहना तो उसमें पुरुषार्थ नहीं है क्या?
मुमुक्षुः- सबसे बड़ा पुरुषार्थ तो वहाँ ही है।
पूज्य बाबूजीः- बहुत बड़ा पुरुषार्थ है।
मुमुक्षुः- क्रमबद्ध का स्वीकार वो ही बहुत बड़ा पुरुषार्थ है।
पूज्य बाबूजीः- क्रमबद्ध का स्वीकार बहुत-बहुत बहुमूल्य है बात।
मुमुक्षुः- बहुमूल्य बात है!
बाबूजी! आपने तो एक ही पासा (पड़खा) लिया कि स्वतंत्रता दे दी है (पर्याय को पलटने की)। अभी (यदि) ये स्वतंत्रता नहीं दी (जाये) तो इसकी बात करें अभी। आपने तो बोला कि मान लो वो तो हमने assumption किया कि उसको स्वतंत्रता दे दी। अभी चलो स्वतंत्र है - ये बात (तो) नक्की हो गई। अभी..
पूज्य बाबूजीः- स्वतंत्रता दे दी न! तो फिर अब हम उसे परतंत्र क्यों करना चाहते हैं (उसमें) झाँककर? या उसे छेड़कर? ये ही है न हमारी मनशा, परतंत्र करने की? वरना जो वो बिल्कुल स्वतंत्र और व्यवस्थित है तो फिर हम उसकी ओर देखकर (या) झाँककर बार-बार उसकी ओर निगाह करके हम उसे परतंत्र ही तो करना चाहता हैं… कि ये नहीं ये, ये हमारा मन है। और वो हो नहीं सकेगा (तो) इसलिए कष्ट पाएगा।
ये ही कष्ट रहा पर्याय में उलट-फेर करने का ही, जितना कष्ट रहा वो। अब वो हो नहीं सकती। ये मानता है कि पर्याय मेरी है तो कैसे नहीं होगी? वो तेरी है, तो तेरी शान इसमें है कि वो व्यवस्थित हो। इसमें है घर की शान तो। ऐसा नहीं है कि इसको उठाकर वहाँ रखो और इसको उठाकर वहाँ रखो। वो तो पागलपन है वो तो। Setting होना चाहिए न घर का भी, तब सुंदर लगता है वो। और फिर इसे तो फुरसत मिलेगी ही नहीं कभी (यदि) उस एक पर्याय में (उलट-फेर) करना शुरू किया (तो) ये पर्यायें तो अनंतानंत हैं। तो अनंतानंत काल तक फँस गया ये पूरी तरह से।
मुमुक्षुः- माने कि सही बात तो ये है कि पर्याय को उसके हाल पर छोड़ दो।
पूज्य बाबूजीः- हाँ बिल्कुल! पर्याय कक्ष जो है मेरा… मेरे कई कक्ष हैं। एक द्रव्य कक्ष है, एक गुण कक्ष है (और) एक पर्याय कक्ष है। तो पर्याय कक्ष को बिल्कुल, वो व्यवस्थित है एकदम। उसके किवाड़ (दरवाज़े) ही बंद कर दो।
मुमुक्षुः- चिंता करने की जरूरत नहीं है।
पूज्य बाबूजीः- चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उसमें कुछ होना ही नहीं है।
मुमुक्षुः- अब गुणों की बात।
पूज्य बाबूजी:- गुण भी वैसे ही हैं। गुणों में तो कोई बात ही नहीं है। उनमें कहाँ उलट-फेर होता है?
मुमुक्षु:- 76बाबूजी! क्रमबद्ध के स्वीकार में द्रव्यदृष्टि आ गई?
पूज्य बाबूजी:- आई, ये आई न! इसी से आती है। ये ही आती है।
मुमुक्षु:- जो पर्याय को बार-बार देखता है, उसको फेर करने की दृष्टि बनी रहेगी?
पूज्य बाबूजी:- हाँ! दृष्टि तो है ही उसको, मिथ्यादृष्टि है। मिथ्या प्रयास है उसका वो कि पर्याय को बार-बार देखता है, उसका वो प्रयास मिथ्या है। क्योंकि वो उसको इधर-उधर करना चाहता है। अपने स्थान से हिलाना चाहता है (और) वो अपने स्थान से हिलती नहीं है। अपने स्थान से नहीं हिलती है। ये आत्मा का जो सदन है, घर है, आत्मा का जो राजमहल है उसकी शान है ये। ये उसकी शान है ये, सचमुच। द्रव्य की शान ये है कि मेरी पर्याय ऐसी व्यवस्थित है कि उसमें कुछ होना ही नहीं (है) कभी, तीन लोक (और) तीन काल में। अब हम मानते हैं कि उसे दीनता कि (फिर तो) पुरुषार्थ नहीं रहेगा, पुरुषार्थ नहीं रहेगा। निहाल हो जाएगा वो, तुरंत आनंद को लेकर उत्पन्न होगा पुरुषार्थ।
मुमुक्षु:- सही बात है! माने जहाँ पर्याय की दृष्टि छूटी तो सही प्रकार से आनंद …
पूज्य बाबूजी:- एक ही वस्तु बची है, बस। उसी वस्तु में तन्मय हो जाएगा तो आनंद का जन्म होगा क्योंकि उसके भीतर आनंद ही आनंद है। पर्याय में तो ये था ही नहीं। वो तो मैली-कुचैली न मालूम कैसी-कैसी आ रही थी। तो उससे क्या मिलने वाला था?
मुमुक्षु:- पर बाबूजी पर्यायदृष्टि के छूटने के बाद गुण-भेद के ऊपर भी तो दृष्टि जा सकती है?
पूज्य बाबूजी:- जा सकती है तो उसको भी छोड़ देगा। क्योंकि उसे मिला कहाँ उसे? उसका जो इष्ट था उसकी उपलब्धि नहीं हुई, तो वो उसको छोड़ देगा। इसमें इन गुणों को गिना थोड़े ही जाता है। गुणों को तो चूसा जाता आम की तरह, आम की तरह चूसा जाता उसे।
और वो इकट्ठे कैसे हों सारे के सारे? कि वो एक द्रव्य को मैं देखूँ तो सब इकट्ठे हो जाते हैं। सब इकट्ठे पड़े हैं उसमें। और मैं अलग-अलग देखूँगा तो एक भी नहीं आएगा। खाली विकल्प का धुआँ होकर रह जाएगा।
मुमुक्षु:- आहाहा! विकल्पों का धुआँ बनकर रह जाएगा।
पूज्य बाबूजी:- आत्मा का अनुभव करने की पद्धति ये है। कहाँ उसके टुकड़े करो? जो अखंड है, उसको अखंड अनुभव करो। बस! उसमें मिल जाएगा। टुकड़ों में क्या मिलता है? इसलिए गुण-भेद के भी विकल्प नहीं (हैं) और पर्याय के भी नहीं (हैं)। दोनों छूट जाते हैं।
76 क्रमबद्ध के स्वीकार में में द्रव्यदृष्टि आ गई? - 1.01.44 Hours
मुमुक्षुः- 77बद्ध क्यों कहा बद्ध? क्रमबद्ध?
पूज्य बाबूजी:- क्रम-नियत शब्द है शास्त्र का (और) उसका जो हिन्दी है वो बद्ध है। बद्ध का अर्थ ये कि वो बंधी हुई। बंधे हुए क्रम में चलती है। बंधा हुआ क्रम माने जिस समय होना है उस समय (होती है)।
मुमुक्षुः- जुड़ी हुई नहीं?
पूज्य बाबूजी:- क्रमबद्ध माने बद्ध-क्रम (अर्थात्) क्रम नियत - ये शास्त्र का शब्द है। क्रमबद्ध जो है अपना, उसका अर्थ (ये) है (कि) बद्ध-क्रम में चलती है पर्याय, बंधे हुए क्रम में। एक के बाद एक चलती है, वो तो क्रम हुआ खाली। लेकिन बद्ध-क्रम वो होता है कि वो उसमें फरक (भी) नहीं पड़ता है। जो आनेवाली है वो ही आएगी, दूसरी नहीं आ सकती।
मुमुक्षुः- क्रमसर तो आती है, पर…
पूज्य बाबूजी:- ये तो सब दुनिया मानती है कि पर्याय में कहाँ फर्क पड़ा? अगर हमने इधर-उधर भी की तो भी पर्याय के बाद पर्याय ही तो आई। उसमें क्या फर्क पड़ा? लेकिन बद्ध-क्रम है उसका।
मुमुक्षुः- जो आनेवाली है।
पूज्य बाबूजी:- जो आनेवाली है।
मुमुक्षुः- कितना सुव्यवस्थित है!
पूज्य बाबूजी:- बहुत व्यवस्थित है। बहुत व्यवस्थित और हर चीज में से वो ही वो ही शुद्धात्मानुभूति (ही) निकलती है। हर चीज (में) हर सिद्धांत में से वही निकलती है।
मुमुक्षुः- तो इसका मतलब तो ये हुआ कि क्रमबद्ध को नहीं माने तो कर्म से बद्ध हो जावे।
पूज्य बाबूजी:- ये बिल्कुल अपराध करता है न! अपराध करता है न कि जो अपनी जगह सुव्यवस्थित है, ये उसको जाकर और disturb करता है। तो कितना बड़ा अपराध हुआ? बहुत बड़ा अपराध हुआ न ये? एक officer का बंगला हो और वहाँ दो-चार आदमी जाकर जो हैं उसको table को भी उलट दें, कुर्सियाँ भी उलट दें (और) officer को भी पटक दें, तो क्या होगा उनका? आखिर कारावास ही तो होगा।
तो ये जो पर्याय का जो ये कक्ष है, कक्षा है पर्याय की, ये कमरा है, उसमें जो व्यवस्था है उस व्यवस्था को ये क्यों बिगाड़ता है? (और) वो बिगड़ेगी ही नहीं, तो अपराधी है इसलिए कर्म बंधते हैं।
मुमुक्षुः- बाबूजी! बहुत सुंदर! वो बिगड़ती नहीं (है) लेकिन बिगाड़ने की चेष्टा का बहुत बड़ा अपराध है न ये?
पूज्य बाबूजी:- चेष्टा ही है न ये, बिगड़ता थोड़े ही ना है।
77 बद्ध क्यों कहा बद्ध? क्रमबद्ध? - 1.04.46 Hours
मुमुक्षुः- बिगड़ने की चेष्टा का अपराध!
पूज्य बाबूजी:- हाँ! केवल चेष्टा! मिथ्यात्व में भी, मिथ्याज्ञान में भी (और) मिथ्याचारित्र में भी केवल चेष्टा (है)। उससे कोई काम होना नहीं है, उसके विषय से। चेष्टा का (अपराध) माने intention का (अपराध)।
मुमुक्षुः- सचमुच किया होता तो कितना भारी अपराध बनता!
पूज्य बाबूजी:- चेष्टा माने प्रयत्न करता है पर सफल नहीं होता (है) और नियत अच्छी नहीं है। नियत अच्छी नहीं (है)। Intention (नियत) खराब है।
मुमुक्षुः- वस्तु-व्यवस्था का अनादर का इतना दोष, अद्भुत!
पूज्य बाबूजी:- कोई बहुत बड़ी भीड़ हो। अब उसमें से पुरुष भी निकल रहे हैं, स्त्रियाँ भी निकल रही हैं और बहुत बड़ी भीड़ है। तो ऐसे ठसाठस निकल रहे हैं, एक दूसरे को छूकर। वहाँ कौन किसी को दोष देता है? कोई दोष नहीं देता कि ये है ही ऐसी, व्यवस्था ही ऐसी है। क्योंकि नियत (खराब) नहीं है। उसमें तो ये है कि मुझे निकलना है बस। नियत खराब नहीं है। और ऐसा ही वो किसी दूसरे समय पर कर ले (कि) जहाँ पर खुला सा हो मैदान और खुला सा बाजार हो, तो वहाँ चप्पल पड़ जाएगी।
मुमुक्षुः- सही बात है! Intentions (नियत) खराब है। Intentions are bad - बहुत बुद्धिगम्य है।
पूज्य बाबूजी:- एक तो कोई बदनियत पुरुष हाथ लगाता है स्त्री को और एक डॉक्टर पूरा का पूरा investigation (निरीक्षण) करता है। कौन है अपराधी? और डॉक्टर पूरा investigation करता है सारा के सारा, फिर भी निर-अपराध है।
मुमुक्षुः- पर्याय की व्यवस्था को बदलने की नियत खराब है।
पूज्य बाबूजी:- नियत खराब है। नियत खराब है क्योंकि वो होती नहीं है। होती नहीं है (तो) इसे करना नहीं चाहिए। ये स्वयं अपनी व्यवस्था बिगाड़ता है। अपने घर की व्यवस्था बिगाड़ता है न, इसलिए अपराधी है ये। सारे जीव लोक की (व्यवस्था को) बिगाड़ना चाहता है।
मुमुक्षुः- जो खुद का बिगाड़ेगा वो तो पूरे जीव-लोक का बिगाड़ेगा।
पूज्य बाबूजी:- सबको ही ऐसा मानेगा न वो।
मुमुक्षुः- एक छोटी सी दिखनेवाली गलती के पीछे तो कितनी गलतियों की बौछार लगी हुई है। मालूम नहीं पड़ता।
पूज्य बाबूजी:- अपराध के पीछे अपराध होता है।
मुमुक्षुः- अपनी पर्याय को फेर-बदलना चाहा, तो पूरे विश्व की व्यवस्था…
पूज्य बाबूजी:- मानता है न? पूरे विश्व को मानता है। सब जड़-चेतन सबको कर दिया वो तो, पराधीन… मुमुक्षुः- महासिद्धांत है ये बाबूजी।
पूज्य बाबूजी:- महासिद्धांत! महासिद्धांत ही हैं ये सब। जैनदर्शन में महासिद्धांत ही हैं सारे ही। एक-एक सिद्धांत महान है, कोई छू नहीं सका उनको।
मुमुक्षुः- एक-एक में से अनुभूति ही निकलती है।
पूज्य बाबूजी:- कोई विचार ही नहीं कर सकता। उसमें क्या है अपनी पर्याय है, कैसे भी करो। बस हो गया। उसमें पर्याय में क्या दिक्कत है? कैसी भी लाओ, कैसी भी ले जाओ, कहीं रखो। तुम्हारी इच्छा हो जिसे आने दो, तुम्हारी इच्छा नहीं हो तो मत आने दो। सीधी सी बात!
सबको समझ में बैठ जाती है कि हाँ! बात तो ठीक है कि जब अपनी है तो फिर क्या है? अपनी है, अपनी व्यवस्था है घर में। फिर भी कोई बच्चा है, वो उसको अगर गड़बड़ करता है तो उसको चपत पड़ती है (कि) क्या करता है ये? क्यों बिगाड़ता है? व्यवस्था को बिगाड़ना है ये तो। उधर झाँकना ही व्यवस्था खराब करता है।
मुमुक्षुः- आहाहा! उधर झाँकना ही।
पूज्य बाबूजी:- झाँकना ही व्यवस्था खराब करता है। तुमने देखा क्यों आखिर? किसके लिए देखा?
परम उपकारी श्री सद्गुरुदेव की जय हो!
जिनवाणी माता की जय हो!
जिनवाणी-स्तुति
आत्मज्ञान में ही आत्मा की सिद्धि और प्रसिद्धि है।
आत्मज्ञान में ही भिन्नरूप विश्व की भी सिद्धि है ॥
आत्मज्ञान ही बस ज्ञान है आत्मज्ञान ही बस ज्ञेय है।
आत्मज्ञानमय ज्ञाता ही आत्मा ज्ञान-ज्ञेय अभेद है॥
दर्शाय सरस्वती देवीने किया परम उपकार है।
निजभाव में ही थिर रहूँ, माँ वंदना अविकार है॥
जिनवाणी के ज्ञान से सूझे लोकालोक।
सो वाणी मस्तक नमूँ, सदा देत हूँ ढोक॥