नाथ तेरी वीतराग छवि भावे ।
रागादिक तें भिन्न ज्ञानमय, निज महिमा दरशावे ।। टेक ।।
सिन्धु-यान-पक्षी सम प्राणी, चहुँगति शरण न पावे।
ज्ञानभाव की महाशरण से, अविचल पद प्रगटावे।। 1।।
तुम दर्शन कर, मुक्तिमार्ग पा, मेरो मन हरषावे।
तुम सम ही निज में थिर होऊँ, यही भाव उमड़ावे ।। 2 ।।
अखिल विश्व मम ज्ञेय मात्र हो, मोह क्षोभ नहीं आवे ।
निजानन्द में तृप्त परिणति, परम साम्य प्रभु पावे।। 3।।
हे आसन्न उपकारी जिनवर, ‘आत्मन्’ शीस नवावे ।
मुक्त-मुक्त मैं सदा मुक्त हूँ, आनंद उर न समावे।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’