तर्जः केशरिया चावल रंगवा दो …
नाथ तेरी पूजा को मैं आऊँ ।। टेक ।।
थारी पूजा करते बहु दिन बीते, निज की पूज रचाऊँ।
तुम जैसा स्वभाव है मेरा, उसको अब लख पाऊँ।। 1।।
तुम सी निज स्वभाव रुचि करके, और सभी विसराऊँ।
राग-द्वेष दुःख द्वन्द्व तोरिके, निज में ही रम जाऊँ।। 2।।
तजि भव फाँसी हो निज वासी, नाशा दृष्टि लगाऊँ।
निज की प्रभुता निज से ही प्रभु, निज में ही प्रगटाऊँ ।। 3 ।।
जब तक ऐसी दशा नहीं भई, नित जिन दर्शन पाऊँ।
तेरी स्थिरता लखकर प्रभु, निज पुरुषार्थ बढ़ाऊँ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३८ से ३९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’